थोड़ी देर बाद जब शीतल उससे अलग हुई तो वसीम बिलकुल उदास, मागश, थका हारा सा दिख रहा था।
शीतल उसे समझाने लगी- "आप क्यों गये यहाँ से? मैंने तो आपको मना नहीं किया था। मुझे पता है सारी गलती मेरी है, लेकिन मैं तो कह चुकी है की जब आपके मन में जो आए वैसे करिए मेरे साथ, मैं बिल्कुल मना नहीं करूँगी । विकास को भी बाद में कितना अफसोस हुआ। वो मुझे सुबह में सिर्फ नाइटी में देखें और मेरी पैंटी को सोफा पे देखें तो उन्हें गुस्सा आ गया था। लेकिन बाद में उन्हें बहुत अफसोस हुआ। कितना परेशान हुए हम लोग आपको टूटने के लिए। देखिए तो ये क्या हालत बना रखी है आपने?" शीतल एक सांस में बोले जा रही थी लेकिन वसीम उसी तरह शांत, मायूस, उदास खड़ा था।
वसीम ने थोड़ी देर बाद शीतल को अलग किया और सामान समेटने लगा।
शीतल को बुरा भी लगा और गुस्सा भी आया। वो वसीम का हाथ पकड़कर अपनी तरफ घुमाई और बोली "मैं आपसे बात कर रही हैं वसीम, ये क्या कर रहे हैं आप? आप समझ क्या रहे है खुद को?" बोलती हुई वो वसीम के हाथ का सामान ले ली और नीचे फेंक दी।
वसीम चयर में बैठ गया उदास, परेशान, हताश जैसा।
शीतल की नजर वसीम के चेहरे पे गई तो उसका गुस्सा ठंडा हो गया। वो जाकर वसीम की गोद में बैठ गई
और उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर लगभग से हई बोली- "प्लीज... हमें माफ कर दीजिए। मुझे माफ कर दीजिए.."
वसीम में कोई जवाब नहीं दिया। शीतल वसीम के जिश्म से चिपकती गई और उसके गर्दन, गालों पे किस करने लगी। वो बहुत कुछ बोलती जा रही थी, लेकिन वसीम कुछ नहीं बोल रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वो शीतल की बात सुन ही नहीं रहा हो।
अचानक वसीम चैयर से उठ खड़ा हुआ और शीतल को भी खुद से अलग कर दिया। वो लगभग चीखता हुआ बोला- "देखो शीतल प्लीज... मुझे छोड़ दो। ये किसी और की नहीं सिर्फ मेरी गलती थी। मुझे माफ कर दो और मेरे पास भी मत आओ। मैं नहीं चाहता की फिर से तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी में कोई भूचाल आए.."
शीतल वसीम के गुस्से को समझ रही थी, उसे शांत करने के लिए फिर से उसके गले लगने के लिए आगे बढ़ी।
लेकिन वसीम ने उसे रोक दिया- "नहीं शीतल, अब नहीं। जो होना था हो चुका। तुमने अपनी तरफ से भरपूर कोशिश की। मुझे वो सबसे कीमती चीज भी दे दी, जो किसी भी हालत में मुझे लेना ही नहीं चाहिए था। लेकिन मेरी किश्मत में तड़पना ही लिखा है। तभी तो मैं मर भी नहीं पाया..'
शीतल आगे बढ़कर क्सीम के मुँह पे हाथ रख दी- "प्लीज ऐसा मत बोलिए। मरें आपके दुश्मन, तड़पें आपके दुश्मन, आपको तड़पने की कोई ज़रूरत नहीं। मेरा जिस्म आपका है वसीम। मैं आपकी हैं। मैं तो विकास के सामने भी बोली भी ये बात और अभी फिर से बोल रही हैं की जब भी आपका मन करे आप करिए। जैसे मन करें वैसे करिए। मैं कभी मना नहीं करगी। मैं आपका साथ दूगी वसीम। प्लीज़.."
वसीम तुरंत बोला- "लेकिन तुम्हारा पति माना तो नहीं ना तुम्हारी बात..."
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शीतल भी तुरंत ही जवाब दी- "कैसे नहीं माना, आपके जाने के तुरंत बाद ही उसे पश्चाताप होने लगा और वो आपको हँटने आपके पीछे भी गया था लेकिन आप नहीं मिले। वो भी बहुत परेशान रहा और बहुत दूँटा आपको। उसनें आपके लिए मेसेज़ भी छोड़ा है। मैं मोबाइल लाती हैं और सुनाती हैं आपको की उसने मुझे आपसे एक नहीं सौ बार, हजार बार चुदवाने की पमिशन दी है..." कहकर शीतल अपना मोबाइल लाने के लिए नीचे जाने लगी तो वसीम ने मना कर दिया।
वसीम बोला- "रहने दो, पिछली बार भी उसने ऐसा ही पमिशन दिया था। अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है शीतल। मैं मर तो नहीं सका, लेकिन यहाँ से दूर जरूर रह सकता है। मुझे जाना होगा। मुझे जाने दो.."
और वो फिर से अपना सामान समेटने लगा।
शीतल फिर से उसके हाथ से सामान लेकर फेंक दी और बोली- "नहीं। मैं आपको जाने नहीं दूँगी अब। कहीं नहीं जाने दूंगी। कभी नहीं जाने दूँगी। अब ऐसा कुछ नहीं होगा। अब अगर विकास या कोई भी मना करेंगा फिर भी मैं आपकी ही रहूंगी। अब अगर विकास मना करेंगा तो मैं उसके सामने आपसे चुदवाऊँगी। आप उसके सामने मुझे गाली दीजिएगा और मैं हँसती हुई आपकी गालियां सुनेंगी। लेकिन अब मैं आपका जाने नहीं दूँगी..."
वसीम बोला- "जाना तो मुझे होगा ही शीतला इसी में हम सबकी भलाई है.."
शीतल दरवाजा बंद कर दी और बोली- "नहीं मैं आपको जाने नहीं दूँगी..." फिर वो अपने टाप को ऊपर करके उतार दी और फिर तुरंत ट्राउजर को भी नीचे करके उतार दी। उसका गोरा जिएम डिजाइनर ट्रांसपेरेंट ब्रा पैंटी में चमक रहा था।
शीतल जानती थी की इसका बहुत ज्यादा असर वसीम पे नहीं होता है। लेकिन अब तो वा चोद चुके हैं तो शायद कुछ असर करें। वो वसीम की बाँहा में सिमट गई और बोली- "वसीम आपको मेरी कसम है की आप यहाँ से गये। अगर आप मुझे छोड़ कर गये तो अब मैं कहीं चली जाऊँगी। मैं अपनी जान दे दूँगी..."
वसीम सीधा खड़ा रहा, और बोला- "यं तुम ठीक नहीं कर रही हो शीतल। ये गलत हो रहा है...
शीतल तुरंत बोली- "कुछ गलत नहीं हो रहा है। वसीम मैनें आपसे शादी की है। आपने मेरी माँग में सिंदूर भरा है। ये मंगलसूत्र आपने पहनाया है मुझे। मैं आपको ऐसे तड़फ्ता हुआ नहीं छोड़ सकती.."
वसीम ने शीतल का चेहरा ऊपर किया और बोला- "सोच लो शीतल। क्योंकी अब फिर चाहे कुछ भी हो जाए, में पीछे नहीं हटूंगा। मेरे अरमान तुम्हें एक बार या एक रात चोदने में पूरे नहीं होंगे। बरमों की चिनगारी दबी है इस सीने में। वो सब निकालूँगा मैं। फिर तुम भी मुझे मना नहीं कर सकती, विकास या किसी और की तो बात ही अलग है....
शीतल ने तुरंत वसीम के होंठ में एक किस की और मुश्कुराती हुई बोली- "सब सोच ली हैं मेरे गाजा। जैसे अपनी नचनिया को नचाओंगे वैसे नाचूंगी। जैसे चाहो जितनी बार चाहो चोदो। जो कहना हो सब कहो। मैं कभी मना नहीं करगी..."
वसीम उसप्तं अलग होता हुआ बोला- "सिर्फ चोदूंगा ही नहीं, और भी बहुत कुछ होता है। बहुत कुछ दबा है मेरे
मन में सब करोगा। ये सोच लो शीतल शर्मा। आराम से सोच लो फिर मुझे बताना। ऐसा ना हो की बाद में तुम्हें पीछे हटना पड़े..."