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Adultery शीतल का समर्पण

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वसीम बैंड पे लेटते ही अपने लण्ड को फ्री किया और सहलाने लगा। उसकी हथेली में शीतल की नंगी चूचियों की एअन अब भी थी। उसकी आँखों के सामने शीतल की नंगी चूचियां चमक रही थीं। उफफ्फ.. आग भर गई है रांड की चूत में। अब ये पूरी तरह तैयार है और अब इसे छोड़ना होगा, नहीं तो कहीं ऐसा ना हो की देर हो जाए। बस एक-दो दिन और फिर उसके बाद तो त मेंरी पालत कृतिया बनकर मेरे इशारों में नाचेंगी। वसीम अपने लण्ड को सहलाता हवा सो गया।

*****

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शीतल रोज की तरह सवेरे जाग कर घर में झाइ की और फ्रेश होकर नहाने चली गई। विकास भी रोज की तरह सो रहा था लेकिन शीतल की आहट सुनकर वसीम की आँखों से नींद उड़ चुकी थी। वसीम सोने की आक्टिंग करता हुआ शीतल पे ही नजर रखे हुए था।

थोड़ी देर में वसीम उठा ता उसे लग गया की शीतल बाथरूम में है और विकास सो रहा है। उसके लिए मौका अच्छा था। वसीम एप कर शीतल के बाथरूम में झोंक कर देखने लगा। अंदर उसकी होने वाली रांड़ पूरी नंगी थी। उसका गोरा जिश्म पानी में भीग कर चमक रहा था। सुडौल चूचियां जवानी के नशे में टाइट थी, जिसे कल वसीम ने मसला था, भले एक ही बार मसला हो। मौका ता भरपूर था उसके पास लेकिन तब सही चाल नहीं होती बो। चूची के नीचें चिकना सपाट पेंट चूत तक जिस रात में वसीम अच्छे से सहला चुका था, लेकिन मजा तब आता जब वो अपने हिसाब से पेट को सहलाते हुए चमता भी और चूची चूत भी मसलता। चूत पूरी चिकनी थी, एक भी बाल नहीं। वसीम के लण्ड के लिए सीधा चिकना रास्ता, चिकनी जांचें। शीतल शाका के नीचे थी और पानी उसके जिश्म को भिगाता हुआ नीचे उतर रहा था।

वसीम ने एक नजर विकास पे डाला, तो वो सो रहा था। वसीम ने अपने लण्ड को बाहर निकाला और सहलाने लगा। आज पहली बार उसने शीतल के नंगे जिएम को देखा था। वसीम कई बार शीतल के नाम की वीर्य गिरा चुका था। लेकिन आज वो जंगी उसके सामने थी। वसीम मूठ मारने लगा। अंदर शीतल का नहाना हो चुका था और वसीम का वीर्य गिरने वाला था। वसीम ने बाथरूम के दरवाजा में ही डार मैट्रेस के बाद नीचे टाइल्स में अपना वीर्य गिरा दिया। वीर्य बर्बाद नहीं होना चाहिए। शीतल को पता चलना चाहिए की यहाँ पे वसीम खान ने उसे नहाता देखकर फिर से अपना वीर्य गिराया है। वसीम अपने रूम में चला गया जिसमें वो रात में सोया था

और कुपकर देखने लगा।

थोड़ी देर में बाथरगम का दरवाजा खुला और शीतल नजर आई। शीतल किसी अप्सरा की तरह नजर आ रही थी। कमर के नीचे बैंधी कीम कलर की साड़ी, स्लीवलेश ब्लाउज़ और उसके बीच में सिंगल लाइन में आँचल, जिससे शीतल का एक उभर झाँक रहा था। गीले बाल इस हश्न को और बढ़ा रहे थे।

शीतल बाथरूम से निकलकर मट्रेस में पैर पॉछी और जैसे ही कदम बढ़ाई की उसका पैर वसीम के वीर्य में पड़ा। चिपचिप करते ही वो नीचे देखी तो उसे कोई चमकदार सफेद लिक्विड जमीन पे गिरा हुआ दिखा। उसकी धड़कन तेज हो गई। वो अच्छे से देखने लगी और फिर कन्फर्म होने के लिए बा बैठकर देखने लगी। उफफ्फ... तो क्या वसीम चाचा मुझे नहाता देख रहे थे? ये सोचकर शीतल शर्मा गई की वसीम ने उसे नंगी नहाता हुआ देख लिया हैं। उसे लगा की कल रात उन्होंने खुद को तो रोक लिया, इसलिए उनकी प्यास अब और बढ़ गई होगी। वो मेरे पेट को सहला तो रहे थे लेकिन मजा नहीं लिया, क्योंकी उन्होंने अपनी फीलिंग्स को दबा रखा है। कोई बात नहीं वसीम चाचा, मैं भी देखती है की आप और कितना दबाते हैं खुद को।

कल रात तो आपने मेरी चूचियों में हाथ हटा लिया था, देखती हैं की क्या-क्या हटाएंगे और खुद को कितना तड़पाएंगे? मुझसे दूर रहेंगे और छिपकर बीर्य गिराएंगे, ये कौन सी बात हई? अगर अभी भी आपका डर शर्म मुझसे खतम नहीं हुआ है तो अब होगा। अब मेरा रण्डीपना और बढ़ेगा और तब देखेंगी की आप खुद को कितना रोकते हैं, और कैसे रोकते हैं? लेकिन एक बात तो तय है की आप बहुत महान इंसान हैं। इतने में तो कोई भी मर्द अब तक बिक गया होता मेरे ऊपर। इसलिए अब मुझे भी जिद होती जा रही है आपको खोलने की।

शीतल उंगली से वीर्य को उठाई और उठाते हुए मुँह में चाटने लगी। वो फिर से ऐसा की और जब उसका मन नहीं भरा तो बो जमीन को चाटकर बीर्य चाटने लगी। उसकी चूत गीली होती जा रही थी। वो जब झुक कर बीर्य चाट रही थी तो उसके मंगलसूत्र पे भी वसीम का वीर्य लग गया था। जब सारा वीर्य चाटने के बाद बा खड़ी हुई तो उसका ध्यान मंगलसूत्र में लगे वीर्य में गया, जो ब्लाउज़ के ऊपर भी थोड़ा सा लग गया था। उसके सुहाग की निशानी में किसी और का वीर्य लगा है, ये सोच में उसे अंदर से पूरी तरह गोला कर दिया। वो मंगलसूत्र को साफ नहीं की। उसने सोचा की पटी ब्रा तो बहुत बार वीर्य में भरी थी, आज मंगलसूत्र को भी वीर्य लगा ही रहने देती हैं।

वसीम शीतल को अपने रूम में देख रहा था और शीतल की हालत देखकर उसे खुद में गर्व हआ की अब शीतल मन से उसकी रांड़ बन चुकी है, और अब बस उसके तन पे कब्जा करना बाकी है। वसीम ने अपने लण्ड का अइजस्ट किया और बेड में लेट गया।

शीतल रूम में आकर चेहरे में क्रीम लगाई और फिर आँखों में काजल और होठों में लिप-उलास। ये उसका रोज का नियम था। उसने सिर की डिब्बी को हाथ में लिया और अपनी माँग में भरने जा रही थी की उसे कुछ ख्याल आया। वो अपने मंगलसूत्र पे लगी वीर्य को उंगली में लगाई और अपनी मौंग में भर ली। आह्ह... पता नहीं क्या हुआ लेकिन उसे बहुत मजा आ रहा था। उसने पूरे मंगलसूत्र के वीर्य को अपनी माँग में भर लिया और फिर सिंदूर लगा ली। सिदर शीतल की मांग में लगे वीर्य से चिपक गया। शीतल माथे में लाल कुमकुम लगा ली।
 
वो आईने में खुद को निहार रही थी। उसकी पैंटी पूरी तरह गीली हो चुकी थी।

शीतल मन ही मन सोच रही थी- "लीजिए वसीम चाचा, अब तो मेरे मंगलसूत्र और माँग में भी आपका वीर्य लग गया। अब तो एक तरह से आप भी मेरे पति हुए। अब तो मेरे पूरे जिश्म में आपका भी हक है और मैं चाहकर भी आपको मजा नहीं कर सकती। अब तो मुझसे शर्माना छोड़ दीजिए और खुलकर जी लीजिये अपनी जिंदगी." शीतल मुश्कुराते और शांत हुए रूम से बाहर आ गई।

आज वो पूजा नहीं की और किचन में जाकर चाय बनाने लगी। वो चाय लेकर पहले वसीम के कमरे में गई, जहाँ वसीम को सच में नींद आ गई थी। शीतल उसे सोता देखकर सोच रही थी- "अभी मझें नंगी नहाते देखें और वीर्य गिराए, तब तो बहुत मजा आ रहा होगा जनाब को। लेकिन अभी सोने की आक्टिंग कर रहे हैं..."

उसका मन हुआ की वसीम के साथ कुछ करें लेकिन फिर वो सोची की अभी सही वक़्त नहीं है। विकास घर में हैं, और में कुछ बोलें अगर तो मैं कुछ बोल नहीं पाऊँगी। दोपहर का वक़्त तो अपना है आज। उसने फार्मल आवाज में कहा- "क्तीम चाचा गुड मानिंग, उठिए चाय हाजिर है, उठिए उठिए..."

वसीम को बहुत मजा आया। बरसों से किसी ने उसे इस तरह नहीं जगाया था। वो आँखें खोलकर शीतल को देखा तो मेकप के बाद शीतल और हसीन लग रही थी। वो शीतल को देखता ही रह गया की शीतल शर्मा गई।

वसीम ने नजरें नीची कर ली और उठकर बैठ गया।

शीतल उस रूम से निकालकर अपने रूम में गई और विकास को भी जगाई। दोनों जाग कर बाहर आ गयें और सोफे में बैठ गये। शीतल दोनों को मानिंग ताय सर्व की।

वसीम के कप उठाते ही वसीम का हाथ थोड़ा हिला।

शीतल तुरंत ताना मारी- "सम्हल कर वसीम चाचा, जमीन पे मत गिराइए."

वसीम समझ गया की रांड़ क्या बोल रही है। लेकिन वो सिर झकाए चाय पीने लगा।

नाश्ता करके विकास और वसीम अपने-अपने कम पे चले गये और शीतल सोचने लगी की क्या किया जाए? अब वो और देर नहीं करना चाह रही थी। उसने सोच लिया की आज दोपहर में उसे वसीम से बात कर ही लेनी हैं, क्याकी कल सनडे है। कल विकास घर में रहेंगे तो फिर बात नहीं हो पाएगी। अब उसकी हिम्मत बहुत बढ़ गई थी। शीतल दोपहर का इंतजार करने लगी। दोपहर में जब वसीम घर आया, तब तक शीतल मन बना चुकी थी।

वसीम घर आया तो उसने आज भी शीतल का दरवाजा अंदर से ही बंद देखा। उसे आज बुरा नहीं लगा क्योंकी उमें 100 फीसदी यकीन था की आज शीतल उसके पास जरर आएगी। वो अपने रूम में गया और लंगी गंजी पहनकर बाहर आ गया।

शीतल टाइम का अंदाजा लगाकर थोड़ी देर बाद छत पे चली आई। वसीम अभी शीतल की पैटी को हाथ में लिया ही था की शीतल वहाँ पहुँच गई।

शीतल- "वसीम चाचा ये क्या कर रहे हैं आप?"

वसीम ने ऐसी आक्टिंग की जैसे हड़बड़ा गया हो- "कुछ नहीं। ये तो बस नीचे गिर गया था तो उठा दे रहा था..."

शीतल वसीम की हड़बड़ाहट देखकर मुश्कुरा दी। वो नहीं चाहती थी की उसके देख लेने में वसीम अपराधी महसूस करें। मुश्कुराती हुई शीतल बोली- "मुझे सब पता है की रोज आप मेरी पैंटी के साथ क्या करते हैं? मुझे में भी पता है की आज सुबह आपने क्या किया है?"

वसीम चुपचाप नजरें झकाए खड़ा था। वो ये सब भाषण के लिए तैयार था। तभी तो वो अपनी चाल को और आगे बढ़ाता और शीतल उसमें वसीम की पालतू कुतिया बनने के लिए अपने आपको फंसाती।

शीतल वसीम के करीब आते हए बड़े प्यार से और समझाने के लहजे में बोली "मुझे पता है वसीम चाचा की आप बहुत अरसे से अकेले हैं और मैंने यहाँ आकर आपकी साई तमन्नाओं को जगा दिया है। मुझे आपके बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए मैं जैसे बहती थी वैसे ही हमेशा रहती रही। मुझे पता है की हर मर्द के जिम की अपनी जरूरतें होती हैं, भला में क्या करती? मेरी क्या गलती की मैं खूबसूरत हैं? मैं बचपन में ऐसे ही कपड़े पहनती आई है। लेकिन जब से मुझे आपकी हालत पता चली है में खुद को आपके सामने लाने से बचती रही..."

वसीम फिर भी चुप रहा।
 
शीतल वसीम के करीब आते हए बड़े प्यार से और समझाने के लहजे में बोली "मुझे पता है वसीम चाचा की आप बहुत अरसे से अकेले हैं और मैंने यहाँ आकर आपकी साई तमन्नाओं को जगा दिया है। मुझे आपके बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए मैं जैसे बहती थी वैसे ही हमेशा रहती रही। मुझे पता है की हर मर्द के जिम की अपनी जरूरतें होती हैं, भला में क्या करती? मेरी क्या गलती की मैं खूबसूरत हैं? मैं बचपन में ऐसे ही कपड़े पहनती आई है। लेकिन जब से मुझे आपकी हालत पता चली है में खुद को आपके सामने लाने से बचती रही..."

वसीम फिर भी चुप रहा।

शीतल फिर आगे बोली- "फिर मैंने सोचा की इस तरह दूर रहकर मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकती। एकलौता उपाय था की हम इस घर में चले जाते, और इसके लिए मैंने विकास से बात भी की। लेकिन उसने कहा की तुरंत दूसरा घर कहाँ मिलेगा और उसने बात को टाल दिया। अब में संभव नहीं था की यहाँ बहते हुए आपसे दूर रह पाऊँ। कपड़े मुझे छत पे ही देने होते सूखने के लिय। किसी ना किसी तरह आपकी नजर मुझसे पड़ती ही, आप मेरी आवाज भी सुनते ही। तब सिर्फ एक उपाय था की फिर आपस छपने से आपकी मदद नहीं होगी, बल्कि खुलकर आपके सामने आना होगा.'

शीतल सांस लेने के लिए रुकी और फिर बोलना चालू की- "में कई बार सोची की आपका बोलं, आपकी मदद करें लेकिन आप मेरी तरफ देखते ही नहीं है। में आपको कितना हिंट दी, कितनी तरह से कोशिश की की आप मुझे देखें, मेरे से बात करें। लेकिन अकेले में तो आप बहुत कुछ कर लेते हैं, लेकिन सामने तो नजर भी नहीं उठाते। तब जाकर फाइनली मैंने सोचा की आज आपसे खुलकर बातें कर ही ..."

अब वसीम के बोलने की बारी थी- "ता क्या करेंग में बोलो। सालों में में अपनी बौरान जिंदगी को अपनी तन्हाई के साथ गुजर रहा था। सब कुछ ठीक चल रहा था की अचानक तुम सूखी धरती में पानी की फुहार बनकर यहाँ आ जाती हो। तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की एक ऐसे मर्द के सामने आ जाती है जो कई सालों से अकेला है, तो उसके अरमान नहीं जागेंगे क्या? अरे तुम तो ऐसी हो की कोई भी तुम्हें देखकर खुद को ना रोक पाए, लेकिन मुझे खुद को रोकना पड़ा। देखो खुद को। तुम हर अप्सरा का मत देने वाली हसीना हो और मैं बदसूरत। तुम दूध से भी गारी हो और मैं बिल्कुल सांबला। तुम्हारी छरहरी काया किसी मुर्दे में भी जान डाल सकती है और में मोटा और तोंद निकला हुआ। तुम अपनी कमसिन उम्र में हो और में बुढ़ापे की ओर जाता हुआ एक हारा हुआ इंसान। तुम किसी और की अमानत हो और मैं किसी का घर नहीं उजाड़ना चाहता। तो मुझे यही रास्ता नजर आया की मैं तुमसे दूर रहने की कोशिश करें, और फिर भी खुद को रोक नहीं पाया तो अकेले में ऐसा किया। मझे माफ कर दो। आगे से ऐसा कुछ नहीं करेंगा में, चाहे कुछ भी हो जाए..."

वसीम अपनी बात खतम करने के बाद अपने रूम की तरफ चल पड़ा, जैसे वो अपनी बात पे अब कायम रहना चाहता है। वो इंतजार कर रहा था की शीतल पीछे से आकर उसे पकड़ लेगी। शीतल वसीम को पीट से पकड़ी तो नहीं लेकिन उसके सामने जरूर आ गई।

शीतल बोली- "ता आपने मुझसे कभी बात क्यों नहीं की? मुझसे बात करते। हँसी मजाक करते तो शायद आप राहत महसूस करते। मैंने तो कितनी बार कोशिश की। मुझे आपके दर्द का अंदाजा है। तभी तो जब आपनें बात नहीं की तो मैं ही आ गई बेशर्म बनकर आपसे बात करने। वसीम चाचा, मैं आपकी मदद करना चाहती हैं। अब मैं क्या करने की मैं इतनी खूबसूरत हैं?"

वसीम बोला- "और चिंगारी को हवा दूं। देखता भी नहीं हैं टब भि तो इतना मुश्किल है, अगर बात करता या हँसी मजक करता तो शायद तुम्हें पकड़ ही लेता... वसीम अब अपने घर के अंदर आ गया। बाहर बात करने का काम हो चुका था।

शीतल भी वसीम के पीछे-पीछे उसके रूम में आ गई। आज वो रुकना नहीं चाहती थी।

शीतल आज वो अधूरी बात नहीं छोड़ना चाहती थी। बहुत हिम्मत जुटाकर वो आई थी और उसने फैसला किया हुआ था की अब वसीम का तड़पने नहीं देना है। शीतल वसीम के सामने आती हई बाली- "ता पकड़ क्यों नहीं लिए। मैं तो आपको कितनी हिंट दी, कितने इशारे दिए। पकड़ लीजिए ना, उतार लीजिए अपने अरमान लेकिन इतने परेशान नहीं रहिए. ऐसा बोलते हुए शीतल वसीम के गले लग गई।

शीतल की चूचियां वसीम के सीने से दबने लगी, कहा- "वसीम चाचा में आपका तड़पता नहीं देख सकती..."

वसीम का जी चाहा की वो भी शीतल को कस के अपनी बाहों में दबा ले। लेकिन अभी खेल पूरा नहीं हुआ था। वसीम पीछे हटता हुआ बोला- "नहीं, ये मैं नहीं कर सकता। मैं विकास के साथ चीटिंग नहीं कर सकता की उसकी गैर हिजिरी में मैंने उसकी हसीन बीवी के साथ जिस्मानी संबंध बनाए। नहीं शीतल मुझसे ये गुनाह मत करवाओ..."
 
शीतल भी और आगे आ गई और फिर से वसीम से चिपक गई. "कोई पाप नहीं कर रहे आप वसीम चाचा। मैं अपनी मर्जी से आपके पास आई हूँ। मेरी वजह से आपकी ये हालत हुई तो मेरा फर्ज बनता है आपकी मदद करने का। मुझे अपना फर्ज पूरा करने दीजिए वसीम चाचा..' कहकर शीतल वसीम से कसकर चिपक गई और उसकी छाती को चूमने लगी।

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वसीम अभी भी पीछे हटना चाह रहा था, लेकिन अब उससे ऐसा हो ना सका। वो बस खड़ा रहा।

शीतल अब पागल हो रही थी। उसे वसीम से ये उम्मीद नहीं थी। उसने सोचा था की वो वसीम को खुद को आफर करेंगी तो वा मना नहीं कर पाएगा और फिर धीरे-धीरे उससे बात करके उसकी फीलिंग्स को हल्का करेंगी। अपनें जिश्म को पूरी तरह पेश करना तो आखिरी हथियार होता। लेकिन वसीम में अभी तक बाकी अस्त्र-शस्त्र का असर तो हआ ही नहीं था। लेकिन शीतल आज फैसला करके आई थी की वो कुछ भी करेंगी लेकिन वसीम को अब और नहीं तड़पने देगी। उसने फिर से सोच लिया की कुछ भी करना पड़े तो वो करेंगी। कुछ भी मतलब कुछ भी।

शीतल- "मुझे देखिए वसीम चाचा, मुझसे बातें कीजिए, जैसी चाहे वैसी बातें कीजिए, जो भी सोचते हैं वो बोलिए। अपने आपको रोकिए मत, अपनी भड़ास बाहर निकालिए। तभी आप खुद को हल्का कर पाएंगे..."

वसीम के लिए बड़ा मुश्किल वक़्त था।

शीतल अपनी पकड़ को थोड़ा ढीला की और अपने आँचल को हटाकर जमीन पे गिरा दी- "आप मेरे जिएम को देखना चाहते हैं तो देखिए। आप मुझसे गंदी बातें करना चाहते हैं तो करिए। बाहर निकालिए अपनी भड़ास। अंदर ही अंदर मत घुटिए वसीम चाचा। मुझसे आपका तड़पना नहीं देखा जाता..."

वसीम को अब खुद को रोकना जरूरी नहीं था। अब उसे शीतल की प्यास बढ़ानी थी। उसने शीतल को अपनी बाहों में जकड़ लिया और उसकी नंगी पीठ को सहलाने लगा। वसीम में शीतल के चेहरे को ऊपर उठाया और उसके रसीले होठों को चूमने लगा। वो पागलों की तरह शीतल को चूम रहा था और उसके बदन को सहला रहा था जैसे नदी का बाँध टूट गया हो आज।

शीतल अपनी जीत मानकर वसीम का पूरी तरह साथ दे रही थी। शीतल भी वसीम की गंजी को ऊपर कर दी और उसकी लुंगी को खोलकर गिरा दी। वसीम जीचं से नंगा था। शीतल भी उसकी पीठ और गाण्ड को सहला रही थी।

वसीम ने एक पल के लिए शीतल के होठों को छोड़ा और फिर से चूसने लगा। वो शीतल की जीभ को चूस रहा था। ये सब नया अनुभव था शीतल के लिए और उसका जिम पिघलता जा रहा था।
 
वसीम ने एक पल के लिए शीतल के होठों को छोड़ा और फिर से चूसने लगा। वो शीतल की जीभ को चूस रहा था। ये सब नया अनुभव था शीतल के लिए और उसका जिम पिघलता जा रहा था।

वसीम ने शीतल के होठों को छोड़ा और गाल गर्दन पे किस करता हुआ बोला- "हाँ शीतल... मैं तुम्हें देखना चाहता हूँ, तुम्हें छूना चाहता हूँ, चूमना चाहता हूँ, मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ, मसलना चाहता हूँ, चाहता हूँ की वैसे चोदूं जैसे एक बडी को चोदा जाता है लेकिन कोई गलत नहीं करना चाहता.."

शीतल भरपर साथ दे रही थी वसीम का। उसने अपनी साड़ी की गाँठ को खोल दिया तो साड़ी नीचे गिर पड़ी। शीतल ने पेंटीकोट का नाड़ा भी खोल दिया और वा भी शीतल के कदमों में जा गिरी। 23 साल की शीतल अब पैटी और ब्लाउज़ में थी और 50 साल का वसीम सिर्फ गजी में।

शीतल- "तो देखिए ना, चूमिए, चूसिए, मसलिए, चोदिए मुझे। रंडी की तरह चोदना चाहते हैं तो रडी की तरह चोदिए। मैं आपके लिए रंडी बनने को भी तैयार हैं। आपसे बात करने के लिए और आपको दिखाने के लिए रंडी बनी ही तो घूमती हैं आजकल आपके आगे-पीछ... कहकर शीतल अपने ब्लाउज़ का हक खोलने लगी।

शीतल खुद से अपने कपड़े इसलिए उतार रही थी की वसीम को शमिंदगी का सामना ना करना पड़े। वसीम को ये ना लगे की उसने गलत किया है। शीतल बल्लाउज़ का हक खोल दी और अब उसकी बा चूचियों को कैद किए दिख रही थी। शीतल वसीम के लण्ड को हाथ में लेना चाहती थी लॉकन वो ऐसा कर नहीं पाई। उसे शर्म आ रही थी।

वसीम फिर से शीतल के होंठ चूम रहा था और शीतल के ब्लाउज़ और ब्रा को ऊपर उठा दिया और बाहर आ चुकी नंगी चूचियों को मसलने लगा। दोनों को करेंट जैसा लगा। वसीम कस के चूचियों को मसलने लगा।

शीतल आहह ... करती हुई वसीम के लण्ड को पकड़ ली- "उफफ्फ.. देखने में जितना बड़ा लगता है ये तो उससे बहुत बड़ा है। ये चूत में जा पाएगा क्या?"

वसीम ने शीतल को खड़े-खड़े ही गोद में उठा लिया और बैंड में गिरा दिया। शीतल बैंड पै सीधी लेट गई और वसीम ने भी अपनी गंजी को उतार दिया और शीतल के ऊपर लेट गया। वो शीतल की चूची चूसता हआ उसके गारे चिकने बदन को सहला रहा था। उसने शीतल के ब्रा के हक को खोल दिया और बाउज़ ब्रा को उतार दिया। शीतल अब ऊपर से नंगी थी। वसीम शीतल के पेट जाँघ को सहला रहा था और चूचियों को चस और मसल रहा था। वसीम ने शीतल की पैंटी को भी नीचे खींच लिया तो शीतल ने कमर उठाकर वसीम की हेल्प कर दी। शीतल की पैटी भी उतर गई और उसे भी वसीम ने नीचे फेंक दिया। शीतल और वसीम पूरी तरह नंगे थे और वसीम पीतल के दोनों पैरों के बीच ने बैठकर उसकी चिकनी रसीली चूत को चाट रहा था। वसीम दोनों हाथों से शीतल की चूत को फैला रहा था और जीभ को ऐद के अंदर डालकर चूस रहा था।

वसीम- "आहह.. मेरी रानी, क्या रसीली चूत है तेरी, क्या खुश्बू है, आह्ह... मजा आ जाएगा इसे चादकर मेरी चंडी."

शीतल को बहुत मजा आ रहा था। ये सब पहली बार हो रहा था उसके साथ। वो अपनी कमर उठाकर वसीम का चेहरा अपनी चूत में दबा रही थी। वसीम की उंगली चूत के अंदर थी और उसने अपनी उंगली में गरम पानी की धार को महसूस किया। रंडी शीतल झड़ चुकी थी। शीतल हौंफ रही थी।

अब शीतल की बारी थी। वो उठी और वसीम को बेड पे लिटा दी और उसकी छाती का चूमती हुई पेट और जाँघ को सहलाने लगी। फिर शीतल ने वसीम के लण्ड को फिर से हाथ में ले लिया। अब वो लण्ड को देख भी रही थी और महला भी रही थी। वसीम के लण्ड के आगे विकास का लण्ड सच में बच्चा था। शीतल लण्ड में हाथ आगे पीछे कर रही थी और कटें हुए स्किन को और चमकते हुए सुपाड़े को देख रही थी।
 
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वसीम शांत सा लेटा हुआ था। उसकी चाल का अगला कदम आ गया था। लेकिन वो लालच में रुका हुआ था की शीतल उसके लण्ड को मुँह में लेगी।

शीतल ने सुपाड़े पे किस की तो उसे वही खाब आई, जिसकी वो दीवानी थी। शीतल उस खुश्ब को असरे से सूंघते हुए सुपाड़े पे जीभ लगाई और चाटी। शीतल को अपना मुँह बड़ा सा खोलना पड़ा और वो वसीम के मसल लण्ड के सुपाई को मुँह में लेकर चूसने लगी।

जितना मजा शीतल का आ रहा था, उससे ज्यादा मजा वसीम का आ रहा था। लेकिन अब वक्त आ गया था

शीतल को रोकने का। वसीम ने शीतल को खुद से अलग किया और खड़ा हो गया।

शीतल चकित सी उसे देखती रही की उससे कुछ गलती हो गई क्या?

वसीम ने अपनी लुंगी को लपेट लिया और गंजी पहनता हुआ शीतल को बोला- "शीतल तुम जाओ यहाँ से। ये गलत है और में ये नहीं कर सकता। अपने कपड़े पहनो और चली जाओं यहाँ से, प्लीज..."

शीतल अभी भी चकित ही थी- "क्या हआ वसीम चाचा। मुझसे कुछ गलती हो गई बया? पहली बार लण्ड चूस रही हैं, इसलिए ठीक से चूसना नहीं आया होगा। अब मैं ठीक में करेंगी। आइए वसीम दूसरी तरफ मुँह करके खड़ा था जैसे वो शीतल के नंगे बदन को देखना नहीं चाहता हो। उसकी तरफ बिना देखें हर वसीम बोला- "नहीं शीतल, तुम अच्छे से चूस रही थी। कोई गलती नहीं की तुमनें। लेकिन मैं गलत कर सकता। जितना मैंने किया उसके लिए मुझे माफ कर देना। तुम किसी और की अमानत हो। बीवी हो किसी और की। मैं दूसरे की बीवी के साथ छिपकर ऐसा नहीं कर सकता। ये बहुत बड़ा गुनाह है। तुम जाओ यहाँ से..."

शीतल चिड़चिड़ा गई की उसके जैसी खूबसूरत औरत उसके सामने खुद को पेश कर रही है और ये पागल इंसान मना कर रहा है। शीतल का नंगा जिस्म पूरी तरह गरम था और वो अपनी चूत में वसीम का लण्ड लेने का इंतेजार कर रही थी और ये पागल वसीम फिर से पुराने राग को गाने लगा था।

शीतल बैंड से उठकर वसीम की तरफ आगे बढ़ने लगी। लेकिन क्सीम ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। वो शीतल की तरफ देख भी नहीं रहा था।

शीतल खड़ी हो गई और उसे समझने के अंदाज में बोली- "आप कुछ गलत नहीं कर रहे वसीम चाचा। मैं खुद आपके पास आई, आपके बदन में सटी, खुद अपने कपड़े उतारी। आपने कोई गलत काम नहीं किया। मैं किसी और की बीवी हैं तो क्या हआ, आपके लिए बस एक रंडी हैं। आप किसी और के बीबी को नहीं, एक रंडी के जिश्म को चूम रहे थे, आप बिकास की बीवी शीतल शर्मा को नहीं, अपनी शीतल रंडी को चाँदिए। इसमें कुछ गलत नहीं है। आपकी कोई गलती नहीं है."

शीतल का जवाब तो लाजवाब था लेकिन अभी वसीम शीतल को चोदने वाला नहीं था। अगर उसने अभी शीतल को चोद लिया तो इसका मतलब उसे छुप-छुपकर शीतल के जिश्म के मजे लेने होंगे। लेकिन वो तो शीतल को अपनी पालतू कुतिया बनाना चाहता था। और इसके लिए शीतल का प्यासी रहना ज़रूरी था।

वसीम बिना शीतल की तरफ देखें ही बोला- "तुम कुछ भी बोलो, लेकिन हम दोनों जानते हैं की ये गुनाह है। तुम अपने पति से छिपकर मेरे से चुदवाओगी तो वो भी गुनाह है। मैं तुम्हारे पति से छिपकर तुम्हें चोद्गा ये गुनाह है। इसलिए मुझे मेरे हाल में छोड़ दो और जाओ। अपने कपड़े पहन लो और मुझे माफ कर दो जो मैंने किया तुम्हारे साथ। ये मेरी गलती थी की मैंने तुम्हारी पटी बा को हाथ में लिया और तुम्हें सोच करके उसमे बीर्य गिराया। ये सच है की इस तरह मैं खुद को हल्का महसूस करता था, लेकिन ये मेरी गलती थी जो आगे से नहीं होगी। प्लीज तुम जाओ..."

शीतल फिर बोली- "एक जवान औरत को नंगी करके प्यासी छोड़ देना भी गुनाह है। अब आपको मुझे चोदना ही होगा..."

वसीम ने कहा- "मुझसे गलती हुई, मुझे माफ कर दो, लेकिन अब मुझसे और गुनाह मत करवाओ.."

शीतल समझ रही थी की वसीम की नजर में ये गलत है, पाप है। उसने खुद पे काबू पा लिया है। अब वो और तड़पेगा। इतना कुछ कर लेने के बाद वो बिना चोदे मुझे यहाँ से भेज तो देगा, लेकिन फिर पागल हो जाएगा। शीतल फिर कुछ बोलने जा रही थी लेकिन वसीम ने उसे मना कर दिया। शीतल जैसी सुंदरी पा समर्पण के

साथ नंगी खड़ी थी, लेकिन वसीम उसे मना कर रहा था। ये बीम की महानता थी शीतल की नजरों में। लेकिन वसीम के लिए ये एक चाल थी। बड़े फायदे के लिए छोटे नुकसान टाइप का।
 
शीतल बोली- "ठीक है, मैं चली जा रही हूँ । अगर आपकी नजर में ये पाप है तो फिर अब मेरा यहाँ कोई काम नहीं। हम लोग ये घर खाली करके आज ही चले जाएंगे। हमें चाहे रोड में रहना पड़े लेकिन हम यहाँ से चले जाएंगे। ना मैं रहूंगी और ना ही आपको परेशानी होगी। लेकिन मेरी बस आखिरी बात मान लीजिए। आपने मेरे साथ इतना कुछ किया तो अपना बीर्य मेरे सामने निकाल लीजिए। नहीं तो मुझं लगेगा की मेरा कुछ आपके सामने बाकी रह गया...'

वसीम कुछ नहीं बोला। शीतल उसकी तरफ आगे बढ़ी तो वसीम ने उसे मना कर दिया।

शीतल फिर बोली- "जब तक आप अपना वीर्य नहीं निकल लेतं, तब तक ना तो मैं अपने कपड़े पहनूँगी और ना हो यहाँ से जाऊंगी..." बोलती हईशीतल बेड पे बैठ गई।

वसीम समझ गया की ये ऐसे नहीं जाएगी और इसमें उसके प्लान को काई नुकसान तो नहीं हो होना था। वसीम ने लंगी को नीचे गिरा दिया और लण्ड सहलाने लगा। लण्ड में अभी कोई जान नहीं थी और वो बैंजान मुर्दे की तरह लटक रहा था।

शीतल खड़ी हो गई और बोली- "प्लीज मुझे करने दीजिए। आपने इतने दिनों तक मेरे नाम से मेरी पैटी में अपना वीर्य गिराया है तो क्या मेरा हक नहीं की एक बार में उस वीर्य को गिराऊं?"

वसीम कुछ बोलता इससे पहले ही शीतल फिर से बोल पड़ी- "प्लीज इसे मेरी आखिरी इच्छा समझ लीजिए.."

वसीम कुछ नहीं बोला और शीतल उसके नजदीक जाकर लण्ड को हाथ में ले ली। शीतल का हाथ लगते ही मुर्दे में जान आ गई और लण्ड तरत ही फुल टाइट हो गया। ये शीतल का आखिरी हथियार था की इस तरह शायद फिर से वसीम जज्बाती हो जाए और उसे चोद दें। शीतल वसीम के नंगे जिस्म के साथ सटकर जंगी खड़ी थी। उसके बदन से रगड़ती हुई नीचे बैठी और लण्ड को चूसने लगी। शीतल अपनी चूची वसीम की जाँघ में गड़ रही थी और उसका लण्ड चूस रही थी।

वसीम को बहुत मजा आ रहा था। इतनी हसीज, कम उम्र की और अमीर लड़की वो भी नई-नवेली शादीशुदा औरत उसके लण्ड को चूस रही थी। लेकिन अभी तो क्सीम को शीतल का बहुत मजा लेना था। वसीम का लण्ड वीर्य गिराने वाला था। वसीम ने शीतल को खुद से अलग किया और थोड़ा किनारे होकर जमीन पे अपना वीर्य गिरा दिया।

शीतल वीर्य को अपने हाथ में लेना चाहती थी लेकिन वसीम ने उसे अपने जिस्म से दूर कर के रोक दिया और वीर्य को जमीन में गिरा दिया। वो तेज सांस ले रहा था।

शीतल वसीम को साइड की और घुटने के बल चलती हुई बीर्य के पास पहुंची और झुककर अपने मंगलसूत्र को दी। फिर शीतल अपनी 4 उंगलियों से वीर्य का उठाई और अपनी माँग में भर ली। वा वसीम को देखी जो उसे ही देख रहा था। शीतल फिर एक उंगली में वसीम का वीर्य लगाई और बिंदी पे लगा ली।

शीतल बोली- "देख लीजिए वसीम चाचा, ये सब मेरी सुहागन होने की निशानियां हैं और सब आपके वीर्य से सनी हुई हैं। मेरी माँग में आपका वीर्य है। मैंने आपका वीर्य लगा मंगलसूत्र पहना हआ है। तो अब आप भी मेरे पति हए। सुबह जब आपने बाथरूम के पास अपना वीर्य गिराया था, तब अंजाने में मेरा मंगलसूत्र उसमें भीग गया था। अभी में जानबूझ कर आपके वीर्य को हर जगह लगा ली। अब आप मुझे रंडी समझकर चादिए या बीवी समझकर या रखेल समझकर। लेकिन अब मैं आपको ऐसे नहीं छोड़ सकती। अब मैं आपको तड़पने नहीं दूँगी."
 
शीतल बोली- "देख लीजिए वसीम चाचा, ये सब मेरी सुहागन होने की निशानियां हैं और सब आपके वीर्य से सनी हुई हैं। मेरी माँग में आपका वीर्य है। मैंने आपका वीर्य लगा मंगलसूत्र पहना हआ है। तो अब आप भी मेरे पति हए। सुबह जब आपने बाथरूम के पास अपना वीर्य गिराया था, तब अंजाने में मेरा मंगलसूत्र उसमें भीग गया था। अभी में जानबूझ कर आपके वीर्य को हर जगह लगा ली। अब आप मुझे रंडी समझकर चादिए या बीवी समझकर या रखेल समझकर। लेकिन अब मैं आपको ऐसे नहीं छोड़ सकती। अब मैं आपको तड़पने नहीं दूँगी."

शीतल खड़ी हो गई और अपने पैटी बा ब्लाउज़ पेटीकोट को हाथ में ले ली और साड़ी को बस एक बार लपेट कर तेजी से चलती हुई सीढ़ी से नीचे उतर गई और अपने गम में आ गई। उसने दरवाजा बंद कर लिया और साड़ी को उतारकर फेंक दी और सोफे पे निढाल होकर लेट गई।

शीतल सोच रही थी- "अब तो मैं आपसे चुदवाकर ही रहंगी वसीम चाचा। मैं किसी और की हैं, इसलिए आपको गुनाह लगा ना। अब आपकी तड़प और बढ़ जाएगी और अब आप खुद का और रोकगे और अंदर ही अंदर तड़पेंगे। लेकिन मेरी भी जिद है की मैं आपका और नहीं तड़पने दूँगी। जब मैं इतना कुछ की तो और भी बहुत कुछ करेंगी।

शीतल बहुत गुस्से में भी थी और चिड़चिड़ाहट में भी थी। उसे ये उम्मीद नहीं थी। उसने सपने में भी नहीं सोचा था की ऐसा होगा। कहीं तो वो सोची थी की धीरे-धीरे बात करके वसीम को हल्का करने की कोशिश करेंगी, जिष्म दिखाना और फिर खुद को पेश करना तो आखिरी हथियार होगा, और शीतल इसके लिए भी तैयार होकर गई थी। लेकिन उसका ये बम्हास्त्र भी बैंकार हो गया वसीम प? अजीब पागल इंसान हैं। अपनी ही घुटन में मार जाएगा ये। क्या-क्या नहीं की मैं? खुद अपने कपड़े खोली, खुद को पेश कर दी, खुद को रंडी भी बोली। फिर भी असर नहीं हुआ उनपे। यहाँ तो लोग मौका टूटते हैं बात करने का और ये इंसान महानता की मूर्ति बना बैठा है?

शीतल बहुत बुरा महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था की जिसके लिए मैं इतना कुछ कर दी, वो मेरे बारे में क्या सोच रहा होगा। में खुद को रंडी बना ली। वसीम चाचा का लग रहा होगा की में सच में रंडी टाइप की गिरी हुई औरत हैं जो उनपे डोरे डाल रही है। ये शीतल का अपमान था। उसके रूप का उसके हश्न का अपमान था। शीतल ऐसी औरत थी जो अगर किसी को देखकर अच्छे से मुश्का दे तो उसका लण्ड पानी छोड़ दें, और यहाँ नंगी होने के बाद भी किसी ने उसे ठुकरा दिया था। अब शीतल को जिंद हो गई थी वसीम की। अब उसे वसीम से चुदवाना ही था।

शीतल के जाने के बाद वसीम ने दरवाजा बंद कर लिया और बैंड पर लेटकर आराम करने लगा। अभी बहुत तकलीफ में था वो। शीतल जैसी अप्सरा को बिना चोदे वापस भेजना बहुत दिलेरी का कम था। उसे अफसोस भी हो रहा था की चोदता नहीं मैं, लेकिन कुछ देर और तो मजे लेता उसके हश्न का। फिर उसके दिमाग में उसे समझाया की फिर खुद को रोक नहीं पता मैं। और मजा तो मुझे उसकी पूरी जवानी का लेना है। दो दिन भी नहीं रह पाएगी और फिर आएगी अपना नशीला बदन लेकर। अब वो मन से मेरी रांड हैं। मेरे लिए वो कुछ भी कर सकती है। सिर्फ मझें पं ध्यान रखना है की वो लोग घर खाली ना करें। हालौकी जाते वक़्त जो शीतल बोलकर गई तो अब तो नहीं हो जाएगी। आह्ह.... क्या रसीली चूत है साली की। कितना मजा आएगा उसे चोदने में? उम्म्म्म ।

शीतल अपने ख्यालों में खोई थी की उसका फोन बजा। उसकी बहन संजना का काल था की वो कल आ रही है एक हफ्ते के लिए। शीतल चिड़चिड़ाई हई थी तो वो ठीक से बात भी नहीं की और उसे आने से मना भी कर दी। वो नहीं चाहती थी की अभी कोई भी उसे वसीम से चुदवाने में डिस्टर्ब करे।

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थोड़ी देर बाद वसीम के जाने की आहट हुई। शीतल भी अपने ख्यालों से बाहर निकली और रूम में जाकर खुद को आईने में देखने लगी। उसके बाल बिखरे हुए थे और माँग में लगे वीर्य की वजह से सिंदूर पूरा फैला हुआ था। शीतल बाथरूम में जाकर नहा ली और फ्रेश हो ली। उसे अब आगे की तैयारी करनी थी। नहाने के बाद शीतल टाप और शार्टस में थी। वो कोई पैंटी बा नहीं पहनी थी।

विकास आया तो पूछा भी, तो वो बोली "गर्मी की वजह से नहीं पहनी हैं.."

शीतल की हिलती चूची को टाप के ऊपर से देखकर विकास का लण्ड टाइट हो गया था। उसे लगा था की शीतल वसीम के लिए ही बिना ब्रा के होगी और आज दोपहर में शीतल वसीम से चुदवा चुकी है, और तभी इस तरह रंडी बनी घूम रही है। शीतल की वसीम के साथ चुदाई की बात सोचकर ही विकास टाइट हो जाता था।

रात में सोते वक़्त विकास शीतल को सहलाने लगा और पहले टाप के ऊपर से उसकी चूचियों को मसला और फिर टाप को उठाकर चचियों को मसलने चूसने लगा। शीतल उसे बिल्कुल मना नहीं की। विकास ने शीतल के टाप को उतार दिया और फिर शार्टस को भी उतारकर शीतल के चमकते जिश्म को चमने सहलाने लगा। विकास ने अपने कपड़े भी उतार दिए और नंगा होकर शीतल के बदन से चिपक गया।

शीतल विकास का साथ नहीं दे रही थी लेकिन उसे मना भी नहीं कर रही थी। विकास परा मह में था। उसने शीतल की चुदाई स्टार्ट कर दी और दो-तीन मिनट में अपने वीर्य को शीतल की चूत में डालकर हॉफने लगा। वो शीतल के ऊपर ही लेटा हुआ था। अब विकास बगल में लेट गया। दोनों नंगे ही थे।

शीतल अब विकास की तरफ घूम गई। उसे विकास से बड़ी बात करनी थी तो उसके पहले उसे खुश करना जरूरी था। विकास जब चोद रहा था तो शीतल को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वो बस ऐसे लेटी थी की विकास अपना काम कर ले फिर वो अपना काम करेंगी।

शीतल बड़े प्यार से विकास के गाल पे हाथ रखकर बोली- "एक बात पुछु विकास?"
 
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