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Adultery शीतल का समर्पण

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शीतल- "आअहह... वसीम चाँदिए। फाड़ डालिए मेरी चूत को। अहह ... खा जाइए मझे, नोच लीजिए मेरी चूचियाँ को वसीम्मह आह्ह ... आह्ह... चोदिए वसीम आहह... जैसे मन करें बैंसे चोदिए आह्ह.. में रोगी नहीं आपको। ये जिश्म आपका है, सारे गुबार को निकल लीजिए आह्ह... फाड़ डालिए मेरी चूत को आहह.. वसीम..."

वसीम और जोर-जोर से धक्कर लगाने लगा- "हाँ... मैगी रंडी, फाड़ डालूँगा तेरी चूत को, बहुत गर्मी है तेरी चूत में, आज पता चलेगा की चुदाई क्या होती है? चोद चोद कर फाड़ डालूँगा तेरी चूत को मेरी रांड़..."

शीतल की चूत पानी छोड़ दी थी और वो दोनों हाथ फैलाकर जिस्म को दीला छोड़ दी थी। उसकी चूत छिलने लगी थी। वो चाह रही थी की वसीम अब उतार जाए उसके ऊपर से, लेकिन अभी वो रुकने वाला नहीं था। बमीम उसी तरह धक्का लगाता हुआ चोदता जा रहा था और होठ, गाल, गर्दन, कंधे, चूचियों को निपल पे दाँत लगाता हुआ काटता जा रहा था।

वसीम- "क्या हुआ रंडी, निकल गई गर्मी, उतर गया चुदाई का भूत, बुझ गई चूत की आग? हाहाहा... मैंने कहा

था ना की आज पता चलेगा की चुदाई क्या होती है?

शीतल फिर से गरमा गई थी- “आहह... हाँ मेरे राजा, मेरी चूत की गर्मी निकल गई, लेकिन आप और चोदिए अपनी मंडी को, जितना मन करे उतना चादिए, आपकी रंडी आपको कभी रोकेगी नहीं। मेरी चूत का रास्ता खुला है आपके लिए और चोदिए वसीम आहह... और चोदिए."

वसीम भी फुल स्पीड में चोदता रहा और फिर शीतल के ऊपर पूरी तरह से लेटकर लण्ड को पूरा अंदर डाल दिया

और शीतल को कस के अपनी बाहों में कसता चला गया। वसीम के होंठों में शीतल के होंठ को जकड़ लिया और चूत को अपने वीर्य से भरने लगा। शीतल भी वीर्य की गर्मी पाकर दबारा झड़ गई। दोनों पशीने से लथपथ थे

और हाँफ रहे थे। बीर्य की आखिरी बंद एक बार फिर से शीतल की चूत में गिराकर वसीम बगल में लटक गया और निढाल होकर सो गया।

शीतल की चूत छिल गई थी। उसका रोम-राम दर्द में डूब गया था। लेकिन वो संतुष्ट थी। पहली इसलिए की वो वसीम का साथ दे पाई और दूसरी इसलिए की इस चुदाई ने उसकी प्यास मिटा दी थी। वो उठकर बाथरूम चली गई। पेशाब करते हुए फिर से उसकी चूत में जलन हुई गाढ़ा सफेद लिक्विड उसकी चूत से बहनें लगा। वो अपनी चूत को ठंडे पानी से धोने लगी, लेकिन उसका दर्द कम नहीं हुआ। वो किचन में आकर फ्रज से बर्फ निकाली और चूत पे रगड़ने लगी। वो आईने में अपने जिश्म को, उसपर लगे निशान को देखने लगी। अब उसे अपने जिश्म पे जलन महसूस हो रही थी। चूचियों पे दो जगह, गर्दन में एक जगह, और होंठ से तो थोड़ा सा और जोर लगाने में जैसे खून ही निकल जाता। वो इन जगहों पे भी बर्फ लगाने लगी।

शीतल- ओह्ह... वसीम, क्या मस्त चुदाई करते हैं आप, 50-55 साल की उम्र में ये हालत है, काश की मैं आपसे आपकी जवानी में मिली होती और उस वक्त आपसे चुदवाई होती। उफफ्फ...जान निकल दी आपने। आज तक में एक रात में दो बार नहीं चुदी थी। मेरी चूत छिल गई है, 6 बार पानी गिरा चुकी हैं, फिर भी मैं आपसे अभी दो बार और चुदवाना चाहती हैं। आहह... वसीम, मैं चाहती हूँ की मेरी चूत में आपका लण्ड हमेशा घुसा रहे और आप मुझे चोदते ही रहे। मैं आपसे जिंदगी भर चुदवाना चाहती हूँ राज। मेरी चूत को और काई शांत नहीं कर सकता अब। आपने मुझे अपना दीवाना बना लिया है। मैं खुशकिस्मत है की आप मुझे मिले। मुझे तो पता हो नहीं था की सेक्स इतना मजेदार होता है। आप नहीं मिलतं तो मैं तो इस एहसास को समझ ही नहीं पाती, महसूस ही नहीं कर पाती। मुझे अब आपसे हो चुदवाना है वसीम। मेरी चूत को अब आपका ही लण्ड चाहिए। मुझे अब जो भी करना पड़े इसके लिए..."

शीतल सोफा में बैठ गई थी, बर्फ को अपनी चूत के अंदर डाल ली थी। अब उसे थाहा ठीक लग रहा था। वो गम में आई तो क्सीम को नंगा सोते देखी। वो गौर से वसीम को सोते देखी, तो उसे हँसी भी आ गई। काला, मोटा, पेट निकला हुआ और जांघों के बीच झलता हुआ काला नाग। उसे वसीम पे प्यार उम्रड़ आया। वो आकर वसीम के पैरों में पैर रखकर, अपनी चूचियों को वसीम के जिस्म में दबाते हए उससे चिपक कर सो गई। वो सोचने लगी की कितना मजा आए की अभी वसीम फिर से जागकर उसे तीसरी बार भी चोद ही दें। मैं तो मर ही जाऊँगी। भले नेरी जान निकल जाए लेकिन मैं उन्हें रागी नहीं। शीतल वसीम की बाहों में सुख की नींद सो गई।

शीतल के सोते वक़्त लगभग 1:30 बज रहा था। दिन भर की भाग-दौड़ और वसीम के घोड़े जैसे लण्ड से दो बार पलंगतोड़ चुदाई के कारण शीतल बेसुध होकर सो रही थी। लभाग 3:30 बजे वो फिर से अपने जिस्म पे हाथ घूमता हुआ महसूस की। वसीम शीतल के जिश्म पे चिपका जा रहा था और उसे अपने बाहों में भरता जा रहा था। वसीम का हाथ शीतल की चूचियों पर आया और पूरी ताकत से मसल दिया।

शीतल- “आहह... माँ..' बोलती हुई शीतल की नींद खुल गई।
 
वसीम शीतल के आधे जिश्म में आ चुका था। उसने शीतल के एक चूची को मुँह में ले लिया और दूसरी को मसलने लगा। शीतल के जिस्म में करेंट दौड़ गया और उसकी चूत गीली हो गई।

शीतल- "आह्ह ... उउम्म्म्म... वमीम आह्ह.." करती हुई शीतल वसीम का सिर अपनी चूचियों पे दबाने लगी और उसकी पीठ सहलाने लगी।

वसीम एक चूची को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर उठाने लगा और मुँह में भरकर जोर-जोर से चूसने लगा। फिर उसका एक हाथ चूत में आया। शीतल तुरंत अपनें दोनों पैर फैला दी और वसीम की उंगलियों के लिए रास्ता बना दी। वसीम शीतल के दोनों पैरों के बीच में आ गया और उसकी फैली हुई चूत को चूमने लगा। फिर उसने चूत के दाने को मुँह में लेकर चूसना स्टार्ट किया और फिर उसे भी दाँतों से काटने लगा।

शीतल दर्द सहती हुई "अहह... आहह..." करती हुई कमर ऊपर उठाने लगी ताकी कम खिंचाव हो और दर्द कम हो। वसीम ने उसके दोनों पैरों को और फैला दिया और फिर चूत को पूरी तरह मुँह में भरकर चूसने लगा। उसके दोनों हाथ ऊपर चूचियों पे आ गये और वो दोनों निपल को दो उंगलियों में लेकर बेरहमी से मसलने लगा।

शीतल दर्द और मजे से भरती जा रही थी। एक तो उसका मन पूरी तरह से चुदवाने का था और दूसरे की वो अपने वसीम को अपने जिस्म का इस्तेमाल करने से मना नहीं करना चाहती थी।

वसीम फिर से शीतल के ऊपर आ गया और अपने लण्ड को चूत में सटा दिया। शीतल तैयार थी। वो अपने पैर

को फैला दी और दर्द सहने के लिए तैयार हो गई।

वसीम- "रंडी, मादरचोद, कुतिया, हरामजादी आज पता चला की चुदाई क्या होती है? एक रात के लिए तू मेरी है ना, एक ही रात में तेरी चूत का वा हाल काँगा की लगेगा जिंदगी भर चुदवाती ही रही है सिर्फ.." और वसीम ने बेरहमी से लण्ड को अंदर चूत में घुसेड़ दिया।

शीतल- "आह्ह... मौं.." बोलती हुई दर्द से भर उठी।

वसीम- "और चिल्ला मादरचोद छिनाल, और जोर से चिल्ला, सबको पता चलना चाहिए की तू वसीम से चुद रही है..." वसीम जोर-जोर से धक्का लगते हुए शीतल के कोमल जिश्म को नोचने खसोटने लगा था।

शीतल भी जोर-जोर से आइह उजनह करने लगी- "आहह... हाँन्न वसीम फाड़ दीजिए मेरी चूत को, जी भरकर चोदिए मुझे.. आह्ह... आज ही तो जानी हूँ की चुदाई क्या होती है। आज ही तो पता चला है की चूत कैसे फटती है? चोधिए वसीम, फाड़ डालिए अपनी शीतल की चूत को अहह."

वसीम ने लण्ड बाहर निकाल लिया। वो कैमरे के पास गया और उसे ओन करके शीतल के सामने आ गया "चस मादर चोद, साफ कर अपने चूत के रस को। पूरा मुँह में भरकर चूसेंगी छिनाल, नहीं तो आज ती माँ चुद जाएगी..."

शीतल तुरंत मुँह खोलकर लण्ड चूसने लगी। अपनी ही चूत का रस चूसती जा रही थी शीतल। वसीम सीधा लेंट गया और शीतल वसीम के पैरों के बीच में आकर लण्ड चूसने लगी। अपने हिसाब से वो पूरी तरह लण्ड को अंदर ले रही थी।

वसीम में शीतल के सिर को पकड़ा और लण्ड में दबा दिया। लण्ड पूरा अंदर तो घुस गया लेकिन शीतल का दम घटने लगा। वसीम ने हाथ हटा लिया और शीतल मैंह ऊपर कर जोर-जोर से सांस लेने लगी। उसकी आँखें लाल हो गई थी।

वसीम- "बस हो गया, यही है तेरी औकात?"

शीतल अपनी साँसों को नियंत्रित की और फिर से लण्ड को मुँह में भरने लगी। दो-तीन कोशिशों के बाद फाइनली परा लण्ड शीतल के मह में था।

वसीम खुश हो गया- "चल आ जा, बैठ जा ऊपर..." शीतल ऊपर आई और वसीम के पैर के दोनों तरफ पैर करके लण्ड को अपनी चूत के ऊपर रखकर अंदर लेने की कोशिश करने लगी। उससे हो नहीं पा रहा था। वो फिर से लण्ड को सामने से पकड़कर अपनी चूत में सटाई और नीचे दबाने लगी।

शीतल- "आअह माँ..." करती हई शीतल लण्ड पे बैठती गई और लण्ड चूत में घुसता गया। शीतल दर्द से भर उठी। थोड़ा रिलैक्स होने के बाद बो अपने हाथों को वसीम की छाती में रखी और अपने जिस्म का भार हाथों में देते हए लण्ड को चूत में अइजस्ट करने लगी। अब उसे ठीक लग रहा था। शीतल लण्ड पे उठक-बैठक लगाने लगी।

वसीम- "आह्ह... रंडी बहुत खूब उछल लण्ड पे आह्ह.."

शीतल जोर-जोर से उछलने लगी थी अब। वसीम शीतल की कमर को पकड़कर उसे ऊपर-नीचे करवाने लगा और फिर शीतल की चूचियों को पकड़ता हुआ मसलने लगा। शीतल पूरी तरह गरमा गई थी और उसकी चूत ने सातवीं बार पानी छोड़ दिया। शीतल थक गई थी और वसीम पे कोई असर नहीं पड़ रहा था। वो वसीम के ऊपर लेट गई।

वसीम ने शीतल को अपने जिश्म से उतार दिया और उसके पीछे आकर उसकी कमर को पकड़कर उठाया। शीतल के जिस्म में जान नहीं बची थी। वसीम ने ताकत लगाकर शीतल की कमर को ऊपर किया और उसके पैर को फैलाकर उसकी जांघों के बीच में बैठ गया। लण्ड सही निशाने में नहीं लग रहा था। उसने शीतल के बालों को पकड़कर खींचा और कमर उठता हुआ बोला- "मादरचोद रडी, कुतिया बनजे बोल रहा हूँ तुझे, समझ में नहीं आ रहा क्या?"

शीतल मजकर होकर अपनी कमर ऊपर कर दी और गाण्ड को बाहर निकाल ली।

वसीम ने लण्ड को चूत में सटाया और कमर पकड़ता हुआ अंदर पेल दिया। शीतल फिर से दर्द से भर उठी। वो आगे होने की कोशिश की, लेकिन वसीम जोर से उसकी कमर को पकड़े हए था। लण्ड अंदर घुस गया और वसीम अपनी कुतिया को चोदने लगा। शीतल की चूत की तो चटनी बन गई थी आज। शीतल को लग रहा था की अब वसीम बस करेगा, लेकिन आज वसीम रूकने वाला नहीं था। उसने लण्ड निकाल लिया और फिर में शीतल को सीधा लिटाकर उसके ऊपर चढ़ गया और फिर से चोदने लगा।
 
शीतल अब जोर-जोर से आहह... उहह... करने लगी थी- “आहह... वसीम ओहह... नहीं अब नहीं आहह... प्लीज... छोड़ दीजिए आह मौं प्लीज.. आह मर जाऊँगी अब आह्ह... मेरी चूत फट गई है अह्ह... पूरा छिल गया है अंदर आहह..."

वसीम रहम करने के लिए नहीं बना था। वो चोदता रहा और बदन में दौत के निशान बनाता रहा। शीतल ने एक-दो बार वसीम की छाती में हाथ रखकर उसे रोकने की भी कोशिश की लेकिन भला वसीम कहाँ रुकता।

शीतल फिर से गरमा गई थी- "चोद लीजिए, और चोदिए, फाड़ ही दौजिए पूरी तरह से चूत को आहह.." और शीतल फिर से झड़ गई।

वसीम ने अपना लण्ड निकाला और शीतल के सामने कर दिया। शीतल उसे हाथ में लेकर सहलाने लगी और चूसने लगी। थोड़ी ही देर में वसीम के लण्ड में हर सारा वीर्य शीतल के चहरा पे गिरा दिया। कुछ शीतल चूस गई। बाकी वो अपने चेहरा पे गिरने दी। अभी उसकें जिस्म में जान नहीं थी इसलिए उसे वीर्य पीने में मजा नहीं आया।

वसीम बगल में निटाल होकर सो गया। शीतल ऐसे ही लेटी रही। 5:00 बज चुके थे। अब वो क्या सोती? लेकिन उठने की हिम्मत नहीं थी उसमें।

शीतल इसी तरह चहरे को वसीम के वीर्य से भरे थाड़ी देर लेटी रही। अब उसे नींद भी नहीं आनी थी और उठने की हिम्मत भी नहीं थी। थोड़ी देर वो इसी तरह लेटी रही फिर उठी। सबसे पहले वो कैमरा बंद की और फिर बाहर आकर साफ पे बैठ गई। सोफे पर वो पूरी तरह से निढाल होकर बैठी हुई थी। उसके चेहरे से वीर्य बहता हुए उसके जिष्म पे आने लगा था। पूरा जिश्म दर्द कर रहा था। एक दर्द तो चुदाई के झटकों के कारण हो रहा था, तो दूसरा दर्द वो था जो वसीम ने काटकर नोंचकर दिया था। वो अपनी दोनों टांगों को फैलाकर सोफे पे फैलकर बैठी हुई थी। उसकी आँखें बंद थी।

शीतल सोच रही थी- "ये आदमी है की कोई भूत प्रेत है। ऐसे भी कोई चुदाई करता है क्या? एक ही रात में तीन बार। मेरी तो जान निकाल दी। कितने अरमानों में सजी थी की सुहागरात मनाऊँगी। मुझे लगा था की सुहागरात को महसूस करेंगे वसीम। दुल्हन के कपड़े उतारेंगे और फिर चोदकर साथ में सो जाएंगे। लेकिन इन्होंने तो हद ही कर दी। इनकी भी क्या गलती है भला, जिसे कोई औरत एक रात के लिये मिलेंगी तो क्या करेंगा? वसीम को लगा है की मैं बस आज की रात के लिए ही उनकी थी, तो रात भर में ही पूरी तरह मुझे पा लेना चाहते थें।

और इसी चक्कर में मेरी चूत के चीथड़े उड़ा दिए। लेकिन क्या मस्त लण्ड है, मजा आ गया। भले चूत छिल गई, जिश्म दर्द कर रहा है, लेकिन चुदवाने में मजा आ गया। आहह.... कितना अंदर तक जाता है लण्ड... जब वो धक्का लगा रहे थे तो मेरे तो पेट में चुभ रहा था। और जब वीर्य गिरायं चूत में ता लगा की एकदम आग भर दिए हों अंदर गहराई में। तभी तो एक बार चुदवाने के बाद मैं दूसरी बार के लिए भी तैयार थी और दूसरी बार के बाद और दो बार के लिए। एक और बार चुदवा ही लें क्या? छिल जाएगी चूत तो छिल जाएगी, लेकिन मजा आ जाएगा। नहीं नहीं, अब अगर उन्होंने मुझे चोदा तो मैं मर ही जाऊँगी। और कौन सा वो भागे जा रहे हैं। उन्हें भी यहीं रहना है और मुझे भी। लेकिन विकास... विकास क्या करेंगा? देखा नहीं कितने प्यासे हैं वसीम। तभी तो रात में पागलों की तरह कर रहे थे। अब चाहे जो भी हो मुझे उनसे चुदवाते रहना है। तभी उन्हें भी सुकून मिलेगा और मुझे भी। मेरी चूत को अब वही लण्ड चाहिए। उन्हें बोल तो दी ही है की जब मन को आकर चोद लीजिएगा अपनी रंडी को। कितना मजा आ रहा था मुझे जब वो मुझे गाली दे रहे थे। बहुत गुबार जमा है

आपके अंदर वसीम । सब निकाल लीजिए मेरे पे। जितना चोदना चाहें चोदिए। एक रात में तीन तो क्या 30 भी आप चोदिएगा तो मैं आपको मना नहीं करूँगी । जैसे नोचना हो नोच लीजिए, खा जाइए मुझे, मैं आपका साथ दूँगी। हर दर्द महंगी मैं वसीम। आपको जो गाली देनी हो दीजिए, मैं सब सुनँगी। आपने मुझे बड़ी कहा तो क्या हुआ, मैं तो कब से आपकी रंडी बनी हुई हैं। हौं, मैं आपकी बडी हैं, आपकी कुतिया है। आप जो बनाएंगे जो कहेंगे सब ह आपके लिए."
 
शीतल उठी और फिर बाथरूम गई। उसकी चाल बदल गई थी। चूत छिल जाने की वजह से उसे पैर फैला-फैला कर चलना पड़ रहा था। शीतल बाथरूम से आई तो देखी की क्सीम भी निढाल होकर पड़े हए हैं। वसीम का लण्ड पूरी तरह तो नहीं लेकिन टाइट था। शीतल को हँसी आ गई की तीन बार चोदने के बाद भी लण्ड तैयार है। वो अपने मोबाइल में वसीम की 8-10 पिक्स ले ली। शीतल का जी चाहा की वसीम के लण्ड को हाथ लगाए लेकिन उसे पता था की हाथ लगातें ही साँप फन फैला देगा और फिर जहर उगले बिना नहीं मानेगा। शीतल दर से ही अच्छे से पिक ले ली। वसीम साए हुए हैं और फूा घर बिखरा पड़ा है। मुहागरात के लिए सजी हुई सेज अस्त व्यस्त हो चुकी थी। हर फूल मसला हुआ था।

शीतल और वसीम के कपड़े इधर-उधर गिरे हुए थे। अभी तो घर साफ हो नहीं पाएगा। नहा ही लेती हैं पहले आज, घर बाद में साफ करगी। नहाने और चाय पीने से शरीर को भी थोड़ा रिलैक्स लगेगा। एक तो तीन बार पानी छोड़ चुकी हैं चूत से, और उसपे से रात भर साई नहीं हैं। नहा ही लेती हैं पहले।

शीतल नंगी ही बाथरूम चली गई नहाने के लिए। ठंडा पानी पड़ते ही उसके जिश्म को राहत मिली। वो अपने जिस्म को रगड़-रगड़ कर साफ कर रही थी और आईने में अपने जिस्म पे आए लव बाइट्स को देख रही थी। वो अपने कपड़े तो लाई नहीं थी, तो वो नंगी ही गीला बदन लिए बाथरूम से बाहर आ गई।

पता नहीं कैसे वसीम की नींद खुल गई थी। नंगी शीतल के गीले जिश्म को देखकर उसका लण्ड फिर उफान मारने लगा लेकिन इस वक्त वो अपनी इच्छाओं को दबाते हए सोने की आक्टिंग करनें लगा लेकिन उसकी नजर शीतल के जिस्म में ही थी।

शीतल अपने गीले बदन को पोंछी और फिर बाडी लोशन लगाकर चेहरे में क्रीम पाउडर, बिंदी, काजल लगाने लगी। शीतल अब तक नंगी ही थी और जिश्म फ्रेश होकर चमक रहा था।

वसीम उसकी नंगी पीठ, पतली कमर, कमर के बाद उसकी उभरी हई गाण्ड को देखकर निहार रहा था। रात में तीन बार चोदने के बाद भी उसकी प्यास बुझी नहीं थी और अभी उसका जी चाह रहा था की शीतल को पकड़ ले और उसके चिकने ठंडे जिश्म को बाहों में भरकर चमने लगे। लेकिन उसने खुद को रोका। उसका इरादा शीतल को प्यासी रखने का था और इसलिए वो उसे दुबारा चोदना नहीं चाहता था। लेकिन नींद में उसके जिशम ने उसके साथ धोखा किया था और जज्बात में बहकर बा दूसरी बार तो क्या तीसरी बार भी शीतल के जिश्म का चोद चुका था।

शीतल पलटकर वसीम को देखी तो उसे सोते हो पाई। उसे लगा की अभी जाग गये तो एक बार और चोद देंगे, और मेरी चूत तो इनके लण्ड के लिए हमेशा तैयार है। शीतल एक पेंटी ब्रा हाथ में ली लेकिन फिर उसे लगा की अगर फिर से इनका चोदने का मन किया तो? पहले वो सोची की नहीं पहनती हैं, लेकिन फिर लगा की पहन ही लेती हैं। अगर उन्हें चोदना होगा तो उतारने में देर ही कितनी लगती हैं। वो अच्छी वाली डिजाइनर पैंटी ब्रा पहनी। ये भी ट्रांसपेरेंट ही थी। फिर वो एक गंजी कपड़ा बाला नाइटी पहन ली। नाइटी उसके जिश्म से सट रही थी और उसे हसीन बना रही थी। फिर वो एक दुपट्टा सिर पे रखी और सिंदूर लगाने लगी।

शीतल एक बार सोची की- "ये किसके नाम का सिंदूर अपने माँग में भर रही हैं। फिर उसके अंतर्मन ने जवाब दिया. दोनों के नाम का। जब विकास सामने रहें तो विकास का, जब वसीम सामने रहे तो वसीम का और जब दोनों सामने रहे तो दोनों का.." सोचती हई शीतल अपनें मौंग में सिंदूर लगा ली और पूजा रूम की तरफ चल पड़ी।

वसीम शीतल की हरकत को देख रहा था और बहुत मुश्किल से उसने खुद पे काबू पाया था। शीतल के रूम से बाहर निकलते ही वसीम सीधा हुआ और अपने लण्ड को सहलाने लगा। चार-पाँच बार तेज-तेज हाथ चलाने के बाद उसे ठीक लगा और फिर करवट बदलकर वो सोने लगा। उसके प्लान के मुताबिक उसे रात में शीतल को सिर्फ एक बार चोदना था। लेकिन अब तो वो उसे तीन बार बेरहमी से चोद चुका था। अब उसे अपने प्लान में थोड़ा बदलाव लाना था। वसीम भी थका हुआ और रात भर का जगा हुआ था। वो सोचता हुआ सो गया।

शीतल पजा करके आई और किचेन में चाप बनाने लगी। एक बार वो साची की वसीम को सोने देती हैं अभी। लेकिन फिर उसे लगा की जागी तो मैं भी रात भर है और जब मैं जाग गई है तो इन्हें भी जगा देती हैं। वो चाय लेकर रूम में आई तो वसीम सीधा लेटा हुआ था और उसका लण्ड टाइट जैसा ही था। शीतल के मन में शरारत करने का विचार आया। वो चाय को टेबल पे रख दी और वसीम के पास जाने लगी। फिर उसे लगा की ऐसें मजा नहीं आएगा। वो बाहर आ गई और अपनी नाइटी उतारकर अपनी ब्रा उतार दी और फिर नाइटी पहनकर रूम में आ गई।

शीतल वसीम के ऊपर आकर अपने दोनों हाथों को वसीम के अगल बगल में रखी और उसपे अपने जिश्म का भार देते हए वसीम के ऊपर झकने लगी। वा अपनी लटकती चूचियों को वसीम के सीने पै सटा दी और रगड़तें हए थोड़ा ऊपर हो गई। अब वो वसीम के ठीक ऊपर थी और सिर्फ उसकी चूचियों का भार वसीम के सीने में पड़ रहा था। शीतल अपने जिस्म का सारा भार अपने हाथों पे रखी थी।

शीतल वसीम के ऊपर झुक गई और उसके होंठ पे अपने होंठ रखकर चूमकर कहा- "गुड मानिंग..." और शीतल के जिस्म में करेंट दौड़ गया।

वसीम नींद में था। अपने होठों पे शीतल के मुलायम होठों का स्पर्श पाकर उसके भी जिस्म में करेंट दौड़ गया। उसका रोम-रोम सिहर उठा और लण्ड एक झटके में सलामी देने के लिए उठकर खड़ा हो गया। अब वसीम शीतल को पकड़कर उसे अपनी बाहों में भरकर चूम सकता था, और चोद भी सकता था। शीतल इसके लिए तैयार थी और वसीम जो भी करता शीतल उसका साथ देती, और वो शीतल के लिए बोनस ही होता।

वसीम की आँखें खुली तो उसकी नजरों के सामने कुछ ही इंच की दूरी पे शीतल का मुश्कुराता चेहरा था।

शीतल फिर से गुड मार्जिंग की और बोली- "उठिए, चाय तैयार है."

शीतल इस उम्मीद में उठने लगी की वसीम उसे उठने नहीं देगा और अपनी बाहों में भरकर उसके होठों को चूमने चूसने लगेगा और उसके जिस्म पे छा जाएगा। इसीलिए तो वो बा उतारकर आई थी ताकी वसीम उसकी नर्म चूचियों को महसूस कर पाए और बा की बजह से उसे कोई रुकावट ना लगे।

लेकिन क्सीम में ऐसा कुछ नहीं किया और शीतल को उठकर अलग हो जाने दिया। वो भी गुड मार्निंग बोलता हुआ उठ बैठा और तब तक मायूस शीतल उस चाय का कप पकड़ा दी।
 
शीतल फिर से किचन में चली गई और अपनी चाय भी लेकर गम में ही आ गई। शीतल जब गम में आई तो वसीम की नजर शीतल की नाइटी के ऊपर उसकी गोल-गोल हिलती हुई चूचियों में पड़ गई। बो गौर से देखने लगा और समझ गया की शीतल अभी बिना ब्रा के हैं। उसने याद किया की शीतल तो ब्रा पेंटी पहनी थी लेकिन अभी नहीं पहनी हुई है। इसका मतलब वो मेरे पास आने से पहले उतारी है। उसे खुशी है की शीतल अभी भी प्यासी है। वो तो इर रहा था की जिस तरह उसने बेरहमी से तीन बार उसे चादा था, अब शीतल उसके पास भी नहीं आएगी। जिस तरह उसने शीतल को गालियां दी हैं की अभी जागते ही शीतल उसे धक्के मारकर बाहर निकाल देगी। लेकिन जिस तरह से उसे गई मानिंग किस और चाप मिली है इसका मतलब शीतल को अभी और चुदवाना है।

वसीम चुपचाप सिर झुकाए चाय पी रहा था और शीतल भी उसके सामने खड़ी मुश्कुराती हुई चाय पी रही थी। शीतल वसीम से बात शुरू करना चाह रही थी, उसके मर्दानगी की तारीफ करना चाह रही थी। जो सुख वसीम ने रात में शीतल का दिया था, उसका एहसास शेयर करना चाहती थी। लेकिन वसीम चुपचाप सिर झुकाए चाय पीता रहा। वसीम ने एक तकिया खींचा और अपनी जांघों के बीच में रख लिया। शीतल खिलखिला कर हँस पड़ी। बासीम ने सिर को और झुका लिया।

शीतल जोर-जोर से हंसने लगी।

वसीम ने धीरे से पूछा- "क्या हुआ। हँस क्यों रही हो?"

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शीतल बोली- "कुछ नहीं.." फिर और जोर से हँसने लगी और बोली "आपको तकिया रखते देखी तो हंसी आ गई। अभी शर्मा रहे हैं और छुपा रहे हैं, रात में जो हालत किए मेरी वो मैं ही जान रही हैं. और फिर से खिलखिला पड़ी।

वसीम कुछ नहीं बोला और शीतल चाय का कप लेकर अपनी चूचियों को हिलाते हुए किचन में चली गईं।

चाय पीने के बाद वसीम उठा, लूँगी पहन लिया और फिर नहाने चला गया। शीतल तब तक किचेन में नाश्ता बना रही थी। वो रात के लम्हों को याद करती हुई म कराती जा रही थी। अभी वसीम बाथरूम में था।

शीतल ने विकास को काल लगाई- "हेलो, गुड मानिंग.."

विकास अभी तक नींद में ही था। वहीं उसे जगाने के लिए शीतल नहीं थी। शीतल यहाँ वसीम को गुड मानिंग किस देकर जगा रही थी। विकास में नींद में ही कहा- "गुड मानिंग..."

शीतल- "अभी तक साए ही हो, जागे नहीं क्या?"

विकास- "नहीं, बस जाग हो गया है। कैसी हो तुम?"

शीतल- "अच्छी हूँ, तुम कब तक आओगे?"

विकास- "आ जाऊँगा दोपहर तक। कैसी रही सुहागरात वसीम चाचा के साथ?"

शीतल- "अच्छी रही। तुम्हारा खाना बना दूंगी ना?"

विकास- "हाँ, बना देना। मज़ा आया ना वसीम चाचा का?"

शीतल. "आना तो चाहिए। आपा ही होगा.."

विकास- "क्यों, तुम्हें नहीं पता। तुम्हें मज़ा आया की नहीं?"

शीतल- "मैं उनसे पूछी तो नहीं। अभी बाथरूम गये हैं.."

विकास- "हम्म्म... तुम्हें मजा आया की नहीं?"

शीतल- "ऐसे क्यों पूछ रहे हो? यहाँ आओ फिर बताऊँगी ना सब कुछ..."

विकास- "ओके... एंजाय। आता हूँ दोपहर तक..."

वसीम बाथरूम से आया और अपने कपड़े पहनकर सोफा पे बैठ गया।

शीतल के पास अब दोपहर तक का वक्त था। विकास की बातों से उसे लग गया था की वो थोड़ा नाराज, परेशान और उदास है। होगा भी क्यों नहीं? मैं यहाँ किसी और के साथ सहागरात मना रही हैं तो प तो में क्या करु? उसी ने कहा था ना की चुदवा ला। उसी ने कहा था ना की अच्छे से करना, मेमारबल बनाना वसीम चाचा के लिए। उससे पूछूकर ही ला सुहागरात मनाई। अब मेरी क्या गलती की वसीम में मुझे तीन बार चोद दिया। मैं उन्हें मना तो नहीं करती ना, और जब चुदवा रही हैं तो मजे से ही चुदवाऊँगी ना। उसी ने तो कहा था की वसीम चाचा का लगना नहीं चाहिए की में उनकी नहीं किसी और की है, तो मैं वही कर रही हैं।

अब इसमें अगर वो गुस्सा करेगा तो मैं क्या करूँ? मैं अब वसीम चाचा से चुदबाऊँगी तो चुदवाऊँगी। जब उनका मन होगा तब चुदवाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए।

शीतल बैंसें सोची थी की ब्रा पहन लें लेकिन अब तो विकास दोपहर तक नहीं आने वाला था। तो फिर वा क्यों पहनना? बो देखी की वसीम सोफा में बैठे हए हैं तो वो बोली- "नाश्ता ला रही हैं." और वो नाश्ता निकालने लगी।
 
शीतल जब नाश्ता ले जाने लगी तो वो सोची की पैटी भी पहनें रहकर क्या कर लेना है। वो पैटी भी उतार दी और उसे किचन के फर्श पे ही छोड़ दी और सिर्फ नाइटी में नाश्ता लेकर वसीम के पास आ गईं। पायला और चूड़ियों की आवाज सुनकर वसीम में सामने देखा तो उसे लगा की काई रामन देवी सामने आ रही है।

गंजी कपड़ा वाले नाइटी में शीतल के जिएम के कटाव साफ-साफ झलक रहे थे। नाइटी सामने से डीप-कट तो थी हो लेकिन अभी बा नहीं होने की वजह से सिर्फ क्लीवेज की लाइन दिख रही थी। चूचियां अपनी पूरी गोलाई में अलग-अलग दिख रही थी और निपाल के दाने बाहर झाँक रहे थे। नाइटी फिर पेट में सट गई थी और चूत तक जिस्म से सटा हुआ था। कमर और दोनों जांचं चलने पर जिश्म को सेक्सी आकर दे रही थीं। और इन सबके ऊपर उसका मैकप- बिंदी, काजल, लिपस्टिक और सिंदूर। हर कदम के साथ चड़ी और पायल छन-छन खन-खन करते हुए अपना काम कर रहे थे तो चूचियां खुशी में झूम रही थीं।

वसीम शीतल को देखता ही रह गया। सोचने लगा- "इस रडी को तो जितनी बार देखता हैं उतनी बार नई लगती है। हर बार लगता है की इसे बाहों में भर लें और चोदने लगें। क्या जिश्म है साली का... होगा भी क्यों नहीं, अभी 23 साल की तो है ही। तभी तो इतनी गर्मी है चूत में की रात में तीन बार चुदवाने के बाद भी अभी इसकी चूत फड़फड़ा रही है। कोई बात नहीं रंडी, अभी तो एक ही रात बीती है और अभी तो सिर्फ तीन बार चुदी हो। बस एक बार विकास को लाइन पे ले आऊँ किसी तरह, फिर तो बस मेरे लण्ड की ही सवारी करती रहोगी."

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शीतल जाते की प्लेट का डाइनिंग टेबल पे रख दी और वसीम को टेबल पे आने बाली, और खद किचन में जाने लगी। वसीम पीछे से शीतल के हश्न का दीदार करने लगा। पतली कमर के बाद चौड़ी गाण्ड और उससे चिपक कर नीचे गिरती हुई नाइटी। हर कदम के साथ उसके कूल्हे मटक रहे थे। वसीम को दिख गया की अभी पेंटी भी जिस्म पे नहीं है। वो अपने लण्ड को अइजस्ट करता हुआ डाइनिंग टेबल में जा बैठा, जहाँ कल रात वो नंगा बैठा था।

शीतल अपनी चूचियां उछलते हर किचन से पानी लेकर आई और टेबल पे रख दी। शीतल का मन था की बो अभी भी वसीम की गोद में बैठे, पैटी इसीलिए उतारकर आई थी वो। लेकिन वसीम ने कोई इंटरेस्ट नहीं दिखाया और चुपचाप सिर झुकाए नाश्ता करने लगा। शीतल थोड़ी देर वहीं खड़ी रही। अभी भी वो इतनी बोल्ड और इतनी बेशर्म नहीं बनी थी की खुलकर बातें कर पाए या पहल कर पाए। फिर वो किचेन में चली गई और वसीम के लिए गरमा गरम कचौड़ियां लाने लगी। एक-दो कचौरी और लेने के बाद उसने मना कर दिया। उसका नाश्ता खतम हो गया तो वो हाथ धोने उठा।

वाशबेसिन किचेन के दरवाजे के पास ही था। हाथ धोते वसीम की नजर शीतल की पैंटी में पड़ी। शीतल नाश्ता की थाली उठा रही थी, वो वसीम को पैटी की तरफ देखती देखी तो शर्मा गई। ऐसें नंगी होकर चुदवाना अलग बात है, और इस तरह काई पैटी देखें और उसकी हालत का अंदाजा लगाए में अलग बात है। शीतल थाली लेकर किचेन में आ गई और अपनी पैंटी को पैरों से साइड करके छुपाने की कोशिश करने लगी।

वसीम को हँसी आ गई।

शीतल और ज्यादा शर्मा गई, बोली- "क्या हुआ हँस क्यों रहे हैं?"

वसीम- "कुछ नहीं.." बोला और वो मुश्कुराता हुआ वापस सोफे पे आकर बैठ गया।

शीतल अपनी पैंटी को हाथ में उठा ली और वसीम के पास आकर इठलाते हुए बोली- "मुझे लगा की फिर आप कुछ करेंगे इसलिए उत्तार दी थी। इसमें हँसने वाली कौन सी बात थी?"

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वसीम कुछ नहीं बोला लेकिन मुश्कुराता रहा।
 
शीतल फिर बोली- "मुझे पता है आप क्यों हँस रहे हैं? सुबह आपको टोलिया से खुद को छुपाते देखकर मैं हँसी थी तो अभी हसकर आप उसी का बदला ले रहे हैं..."

वसीम बोला- "पेंटी उतार दी थी इसमें कोई बात नहीं थी। मेरे देखने पे उसे छिपाने क्यों लगी थी पैरों से?"

शीतल वसीम के बगल में जाकर बैठ गई और उसकी बाहों में जाकर चिपक गई। फिर बोली- "आप देख ही ऐसे रहे थे की मैं शर्मा गई थी..."

शीतल वसीम की तरफ घूमकर उससे चिपक कर बैठी हुई थी। शीतल का पूरा जिस्म वसीम के जिस्म से सट रहा था। उसकी चूचियां वसीम के जिस्म में दब रही थी। वसीम की मुस्कराहट रूक गई थी।

शीतल अपना चेहरा ऊपर की और वसीम के चेहरा को अपने हाथों से अपनी तरफ घुमाते हुए उसकी आँखों में देखती हुई बोली- "आप खुश हैं ना वसीम?"

वसीम ने अपनी नजरें नीची कर ली।

शीतल अपने जिश्म को थोड़ा ऊपर उठाई और अपनी चूचियों को वसीम के बदन से रगड़ती हुई उसके नीचे के होठों को चूमने लगी। सिर्फ नाइटी शीतल के बदन को टक रही थी, लेकिन वसीम पूरी तरह से शीतल के जिस्म को महसूस कर पा रहा था। शीतल होठ चूमती रही लेकिन वसीम ने साथ नहीं दिया। शीतल को लगा की कुछ गड़बड़ है। वो उठकर वसीम की जांघों पे बैठ गई और फिर से वसीम से चिपक गई। वो फिर से वसीम के होठों को चूमी और फिर हँसती हुई शरारत भरे अंदाज ने बोली- "क्या हुआ डार्लिंग?"

वसीम कुछ नहीं बोला। शीतल उसके सीने से लग गई और इमोशनल अंदाज में बोली- "क्या हुआ वसीम, मुझसे कोई गलती हुई क्या?"

वसीम ने शीतल की पीठ पे हाथ रखा और सहलाता हुआ बोला "गलती तुमसे नहीं मुझसे हई है। मैं बहशी बन गया था रात में..."

शीतल वसीम के जिश्म को सहलाते हुए बोली- "तो क्या हुआ? इस टाइम में तो कुछ भी हो जाता है। और फिर आप तो बहुत दिन से खुद को दबाए बैठे हैं."

वसीम- "नहीं शीतल, में जानवर बन गया था कल। तुमने मुझपे भरोसा करके, मेरा दर्द समझ कर अपना जिस्म मुझे सौंपा और मैं जानवरों की तरह रात भर तुम्हारे जिश्म को राउंडता रहा। मैं अपने होश खो बैठा था। मुझे माफ कर दो शीतल.."

शीतल- "मैं तो आपको बोली ही हैं की जैसे मन करें वैसे करिए। रोकिए मत खुद को। अपने अंदर के दर्द को बह जाने दीजिए। आपके अंदर का गुबार निकलने दीजिए बाहर.

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वसीम. "शीतल, तुम लोग तो फरिश्ता हो। लेकिन मैं इस लायक नहीं की तुम लोगों की मदद ले पाऊँ। मैं एक पागल जानवर हूँ और मुझं गोली मार देना चाहिए इस समाज को."

शीतल- "ये कैसी बातें कर रहे हैं आप वसीम? सेक्स करते वक़्त ता काई भी वहशी बन जाता है। विकास भी पागलों की तरह करने लगता है जो हमेशा करता है। और आप तो वर्षों के बाद सेक्स किए हैं। अगर कोई आदमी बहुत बात में भूखा हो और उसके सामने लजीज पकवान थाली में सजाकर पेश किया जाए तो वो क्या करेंगा, बोलिए?" शीतल थोड़ा गुस्से में बोली।

वसीम कुछ नहीं बोला। वो गहरी सोच शर्म पछतावे के अंदाज में साफे पे फैलकर बैठा हुआ था।

शीतल फिर से उसके सीने से लगती हई बोली- "प्लीज वसीम, आप इतना मत सोचिए। खुद को बाँधकर मत रखिए अब। जो होता है होने दीजिए। जब मन करें मुझे पाइए। अगर अब भी आप सोचते रहेंगे और दर्द में ही रहेंगे तो फिर हम लोगों के इतना करने का क्या फायदा?"

वसीम ने एक लंबी सांस लिया और बोला- "नहीं शीतल, तुम लोगों ने तो बहुत कुछ किया है मेरे लिए। लेकिन मैं कितना बेंगरत इंसान हैं की तुम्हें गालियां दी। इतनी गंदी-गंदी गालियां की मैं तो शर्म से डूबा जा रहा हूँ मुझे माफ कर दो शीतल। प्लीज मुझे माफ कर दो.."

शीतल उसके दर्द से भरे चेहरे को अपने हाथों में ले ली और उसके गालों को सहलाते हए बोली- "प्लीज... वसीम ऐसा मत कहिए। मैं आपको कुछ बाली क्या? आप जैसे चाहें करिए मैं बोली हैं ना। आपको और गाली देनी हो दीजिए, आपको मारना हो तो मारिए। आपने कोई गलती नहीं की है जिसकी माफी मांग रहे हैं आप। मैं आपकी मंडी हैं, आपकी पालतू कुतिया आह्ह... वसीम प्लीज... इस तरह मत करिए..."

वसीम एक गहरी सांस लेता हुआ खड़ा हो गया। उसने शीतल को अपनी गोद से अलग कर दिया- "नहीं शीतल। मैंने फैसला किया है की मैं अब यहाँ से कहीं दर चला जाऊंगा। हमेशा-हमेशा के लिए.."

शीतल को गुस्सा आ गया, तो बोली "जब दूर ही जाना था तो मेरे पास क्यों आए? क्यों मेरे साथ सुहागरात मनाए? क्यों मेरे साथ शादी किए? मेरा जिस्म तो बेकार हो गया ना आपको देना। क्यों ऐसा किए मेरे साथ?"

वसीम थोड़ा सा आगे बढ़ा और शीतल को अपनी बाहों में भरने लगा। शीतल पीछे हटने लगी। लेकिन वसीम ने उसे अपनी बाहों में भर ही लिया। शीतल वसीम के सीने पे झड़-मूठ के मक्के बरसाने लगी।

वसीम बोला- "प्लीज शीतल... मुझे गलत मत समझो। लेकिन अगर मैं यहाँ रहा तो हालात उसी तरह रहेंगे। समझो मेरी बात को.....

शीतल वसीम के सीने से लग गई थी, कहा- "मुझे कुछ नहीं समझना। और खबरदार जो अब आपने कुछ साचा तो। अब आपको दर्द सहने की कोई जरूरत नहीं है। आपने मुझे अपनी बीवी बनाया है तो मेरा हक है आपकी हर परेशानी दूर करना। अब अगर आपने ऐसी बात की तो मैं गुस्सा जो जाऊँगी.."
 
शीतल वसीम के सीने से लग गई थी, कहा- "मुझे कुछ नहीं समझना। और खबरदार जो अब आपने कुछ साचा तो। अब आपको दर्द सहने की कोई जरूरत नहीं है। आपने मुझे अपनी बीवी बनाया है तो मेरा हक है आपकी हर परेशानी दूर करना। अब अगर आपने ऐसी बात की तो मैं गुस्सा जो जाऊँगी.."

वसीम उसके पीठ को सहलाता हुआ हँसने लगा- "ठीक है नहीं करूँगा। लेकिन एक बात तय रही। मैं तुमसे बातें करूँगा, हँसी मजाक करूँगा लेकिन अब हम सेक्स नहीं करेंगे। और मेरे इस फैसले में तुम मेरा साथ दोगी। बोलो मंजूर है ना?"

शीतल अपना सिर उठाई और वसीम की तरफ देखते हय बोली- "कुछ मंजूर नहीं है। आपका शर्त रखने की क्या जरूरत है? बाँधने की क्या जरूरत है? आपको सेक्स नहीं करना होगा मत करिएगा। जरी तो नहीं है की राज करें ही या महीने में एक बार भी करें हो। आप कभी मत कीजिएगा लेकिन ये बंधन मत रखिएगा की मैं नहीं हो करगा। पं हुआ की आपको जब मन होगा तब करेंगे। इसमें कोई बंधन नहीं है। ठीक है?"

वसीम ने शीतल के माथे में किस किया और बोला- "ठीक है..."

शीतल फिर बोली- "और जब मेरा मन करेगा उस वक़्त जरब करेंगे..

वसीम शीतल की आँखों में देखकर मुश्कुराने लगा- "में तो फँसाने वाली बात कर रही हो तुम। शीतल तुम शादीशुदा हो, पत्नी हो विकास की। ये ठीक नहीं रहेगा। प्लीज समझो मेरी बात."

शीतल फिर से वसीम के सीने में लग गई, और कहा- "वो सब आप मुझमें छोड़ दीजिए। नहीं तो आप कभी नहीं सेक्स करेंगे और मैं प्यासी बह जाऊँगी..." शीतल बोलती-बोलती बोल तो दी लेकिन फिर बहुत ज्यादा शर्मा गई की ये क्या बोल गई? क्या वो वसीम से अपनी जिस्म की भूख मिटाने के लिए चुद रही है। छिः बन्या सोच रहे होंगे वसीम चाचा?

वसीम शीतल के माथे पे हाथ फेरता हुआ सोफे पे जा बैठा।

शीतल उससे पूछी- "मंजूर ना?"

वसीम हँस दिया, और बोला- "ठीक है बाबा मंजूर.."

शीतल खड़ी हो गई और बोली- "तो करिए.."

वसीम उसे आश्चर्यचकित होकर आँखें फाड़कर देखने लगा।

शीतल फिर से बोली- "हौं, करिए अभी। अभी मेरा मन कर रहा है। चोदिए मुझे अभी..' बोलती हई शीतल शर्मा गई लेकिन वो रुकी नहीं। वो झकी और अपनी नाइटी को नीचे से पकड़कर उठती गई।

वसीम बस उसे देखता गया। शीतल की नाइटी उसके घुटनों के ऊपर हई और फिर कैले के तनों की तरह चिकनी जांघों को दिखाती हई और ऊपर हो गई। अब वसीम की नजरों के सामने शीतल की चिकनी चूत, सपाट पेंट था। फिर शीतल की चूचियां भी बाहर आ गई और वसीम को उसकी रात की हैवानियत नजर आने लगी। चुचियों और निपल पे तो बहुत से निशान थे।
 
शीतल नाइटी को कंधे से ऊपर ले आई और फिर सिर से निकालकर उसे नीचे गिरा दी। अजंता एलोरा की गुफाओं की संगमरमर की मूर्ति वसीम के सामने खड़ी थी। शीतल अपनी पलकों को झुकाए खड़ी थी। वो कई दफा वसीम के सामने नंगी हुई है, लेकिन हर बार वो शर्मा जाती है। आज तो वो खुद खुला निमंत्रण दे रही थी

और खुद को पेश कर रही थी तो वो ज्यादा ही शर्मा रही थी।

वसीम शीतल को एकटक निहारे जा रहा था- "बाइ... क्या माल फसाया है वसीम मियां तुनें। अप्सरा है ये तो।

और चूत में गर्मी कितनी है। मुझे तो लग रहा था की रात में तीन बार राक्षसों की तरह निचोड़कर चोदा है तो आज तो ये पास भी नहीं आएगी। लेकिन ये रांड़ तो अभी भी पहली बार की तरह ही प्यासी है। मजा आएगा रंडी तुझे चोदने में। तू सचमुच मेरी प्यास बुझा सकेंगी.."

शीतल शर्माती हुई नजरें किए हुए ही इठलाकर छम-छम करके चलती हुई वसीम के सामने आ गई और फिर उसकी जांघों में बैठ गई। शीतल का नंगा जिश्म वसीम की गोद में था। शीतल वसीम से सट गई और उसकी गर्दन पे किस करने लगी।

वसीम गर्दन इधर-उधर करता हुआ बोला- "अभी तो दुकान जाना है ना, बाद में करेंगे... उसकी आवाज मदहोश हो रही थी।

शीतल उसे अपनी बाहों में पकड़ती हुई मदहोश सी होकर बोली- "आज मत जाइए। दोपहर के बाद जाइएगा..."

वसीम कुछ नहीं बोला। वो भला बोलता भी क्या?

शीतल उसके गाल पे किस करते हए बोली- "कोई आदमी अपनी बीवी को इस तरह प्यासी छोड़कर जाता है क्या भला?"

वसीम- "प्यासे रहें तुम्हारे दुश्मन..." बोलता हुआ वसीम शीतल के सुलगते होठो पे अपने होठों को रख दिया और चूसने लगा। उसका एक हाथ शीतल की नंगी पीठ को सहला रहा था तो दूसरा हाथ शीतल की चूचियों को मसल रहा था।

शीतल आहह... उहह... करने लगी और वसीम के गर्दन पे हाथ रखती हई उसके सिर को पकड़ ली और वसीम के होठों को चूसने लगी। वो वसीम के सिर को अपने सिर पे दबा ली और फिर वीम की जीभ को मुँह में लेकर चसने लगी। वसीम भी पूरी तरह शीतल का साथ देता हुआ उसके चिकने बदन को सहला रहा था। शीतल वसीम के जिस्म में घुस जाना चाहती थी, समा जाना चाहती थी। एक पल के लिए वो अपना मुँह हटाई और फिर से चूसने लगी। बो वसीम का हाथ पकड़कर अपनी चूचियों पे रख ली और मसलने लगी। वसीम उसकी चूचियों को जोर-जोर से मसलने लगा।

शीतल वसीम के होठों को छोड़ दी और गाल, गर्दन, कान को चूमने लगी "आह्ह... वसीम क्या कर रहे हैं आप? चोदिए ना मुझे। क्या रोक रखा है आपने खुद का? उसी तरह करिए जैसे रात में कर रहे थे। बहसियों की तरह मेरे जिएम को नोचिए, खा जाइए मुझे आहह... वसीम प्लीज़ज़... मुझसे बदाश्त नहीं हो रहा.."

वसीम समझ गया की शीतल बहुत ज्यादा गर्मी में हैं। वो भी शीतल के बदन को चूमने लगा था और थोड़ा और जोर से चुचियों मसलने लगा था।

शीतल. "आह्ह... बसीम्म जोचिए मुझे, खसाटिए मुझं, खा जाइए अपनी रंडी को। चोदिए अपनी रंडी का वसीम। गालियां दीजिए मुझे। फाड़ डालिए मेरी चूत को आहह... वसीम्म... शीतल का हाथ वसीम के लण्ड को पायजामा के ऊपर से मसल रहा था।

वसीम शीतल की हालत देख रहा था और मन ही मन मुअकुरा रहा था। वसीम को कुछ खास हरकत नहीं करता देखकर शीतल फिर बोली- “आहह... वसीम्म ये क्या कर दिया है आपने मुझे। मैं जैसे जल रही हैं। आपके लण्ड ने जादू कर दिया है आपकी कृतिया पै। वसीम मत तड़पाइए मुझे प्लीज़..."

वसीम अब शीतल को गर्दन, कंधे पे किस करने लगा और उसे सोफे पे ही लिटा दिया और उसपे झुकता हुआ निपल को मुँह में लेकर चूसने लगा। शीतल का एक पैर जमीन में था और दसरा सोफे पी वसीम खुद नीचें हो गया और शीतल की चूचियों को मुँह में भरकर चूसता हुआ उसके पेट को सहलाने लगा और फिर चूत को।
 
वसीम अब शीतल को गर्दन, कंधे पे किस करने लगा और उसे सोफे पे ही लिटा दिया और उसपे झुकता हुआ निपल को मुँह में लेकर चूसने लगा। शीतल का एक पैर जमीन में था और दसरा सोफे पी वसीम खुद नीचें हो गया और शीतल की चूचियों को मुँह में भरकर चूसता हुआ उसके पेट को सहलाने लगा और फिर चूत को।

वसीम को चूत के पास हाथ ले जाते ही गर्मी का एहसास हुआ। उसने शीतल के पैर को सोफा से उठाकर सोफा की पुष्त पे रख दिया। अब शीतल का एक पैर जमीन पे था और दूसरा सोफा की पुष्त पें। शीतल की चूत फ्री खुल गई थी और फैल गई थी। वसीम चूचियों का चूसने लगा और चूत में उंगली करने लगा। शीतल आह्ह... उहह... करने लगी। उसे थोड़ा राहत तो मिल रही थी लेकिन मजा अभी भी नहीं आ रहा था।

शीतल- "आप गाली क्यों नहीं दे रहे मुझे, नाच खसोट क्यों नहीं रहे? खा जाइए मेरी चूचियों को वसीम्म आहह.. में रंडी हैं आपकी, कतिया हैं आपकी। मेरी चूत को आपके लण्ड में पागल बना दिया है। इसे चोदकर फाड़ दीजिए वसीम..."

वसीम की उंगली तेजी से अंदर-बाहर होने लगी थी।

... आहह... वसीम में क्या बना

शीतल- "आहह ... वसीम्म... मेरे वसीम्म और जोर से आहह... और अंदर उम्म्म्म दिया है आपने मुझे? आहह... ओहह... आआआ.. उम्म्म्म ..."

वसीम उसके निपल पे दाँत से काटता हुआ बोला- "ही.... मेरी रंडी छिनाल कुतिया मादर चोद। तेरी रंडी चूत को अब मेरा मूसल लण्ड चाहिए। तू रंडी बन गई है अब हरामजादी। अब तेरी चूत की खैर नहीं.."

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शीतल की दूसरी सुहागरात के बाद उसके पति विकास की वापसी

शीतल का जिस्म ऐंठने लगा था। उसकी चूत पानी छोड़ने वाली थी। शीतल आहह... उहह... कर रही थी की तभी दरवाजा में नाक-नाक की आवाज हई। शीतल के चूत की सारी गर्मी एक झटके में उतर गई। अभी कौन हो सकता है? शीतल अपने घर में किसी गैर-मर्द के साथ नंगी थी और चुदवाने की प्रक्रिया में थी। वो घड़ी की तरफ देखी तो 11:00 बज रहे थे। वो सोफे से उठ खड़ी हुई। उसका मूड खराब हो गया। वो गुस्से में भी थी और डर भी रही थी। दरवाजा पे फिर से नाक हुआ।

शीतल अपनी नाइटी उठा ली और पहनती हुई पूछी- "कौन है?"

शीतल अपने बालों को अइजस्ट की और दरवाजा में लगे मैजिक आई से देखी, तो बाहर विकास खड़ा था। शीतल थोड़ा डर गई। उसके मन में चोर था की विकास तो दोपहर तक आएगा, तब तक एक बार और चुदवा लेती हैं वसीम से। उसे विकास के इतनी जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी। उसके हिसाब से विकास दो तीन बजे तक आता और तब तक तो उसकी चूत एक बार और वसीम के मसल लण्ड का पानी पी चुकी होती। शीतल खुद को थोड़ा अइजस्ट की और दरवाजा खोली। वसीम तब तक खुद को सम्हाल चुका था। शीतल मुश्कुराती हुई दरवाजा खोली।

विकास गुस्म में तो था ही, शीतल के हाव-भाव से और देर से दरवाजा खोलने से वा और गुस्सा हो रहा था। वो अंदर आया तो कसीम को बैंठे देखकर उसका पड़ा और चढ़ गया, और कहा- "कैसे हैं वसीम चाचा?" उसने खुद के गुस्से पे काबू किया हुआ था।

वसीम- "ठीक हूँ विकास बाबू.."

शीतल विकास का बैग ले ली और रूम में रख आई।

शीतल सोची की ब्रा पहन लेती हैं लेकिन ये संभव नहीं था। ब्रा पहनने के लिए उसे नाइटी को होना पड़ता और तब वो ब्रा पहन पाती। अगर कहीं इस बीच विकास गम में आ जाता तो? शीत समझाने लगी की- "क्या हुआ बिना बा के हूँ तो? कोई छुपकर थोड़े ही चुदवा रही थी वसीम में? उससे पूछ कर सब कुछ की हैं और अगर उसने हल्ला किया तो वो समझंगा। शीतल सांची की पैंटी पहन लेती हैं। ये तो आसान काम था..."

शीतल किचन में विकास के लिए पानी लेने आई और पेंटी दँदी तो उसे ख्याल आया की वो तो पेंटी लेकर बाहर गई थी। उसकी जान अटक गई। पानी लेकर वो बाहर आई तो देखी की पैंटी सोफा में वसीम से कछ ही दूरी पें रखी हुई है। शीतल अपने मन में कई तरह की बातें, सवाल जवाब सोचने लगी।

विकास बगल वाले सोफा पे बैठ चुका था, पूछा- "कैसी रही आपकी सुहागरात वसीम चाचा?"

वसीम उसके ताने को समझ गया। वो थोड़ी देर चुप रहा। दो पल बाद उसने सिर को झकाते हए जवाब दिया "ठीक रही विकास बाबू। बहुत-बहुत मेहरबानी आप लोगों की। आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया की आपने मुझे समझा और मेरी जिंदगी को वापस पटरी पै लाने के लिये इतना कुछ किया..."

विकास शीतल के आने की आवाज सुना तो उसे देखा। शीतल को देखकर उसे अंदाजा हो गया की शीतल अंदर कुछ नहीं पहनी है। उसके चेहरे में कुटिल मुश्कान आ गई और वो शीतल के हाथ में पानी का उल्लास ले लिया और पानी पीने लगा। विकास सोचने लगा की रात में तो दमदार रही ही होगी इनकी सुहागरात, बची-खुची कसर अभी निकल रही थी। उसे शीतल और वसीम में और गुस्सा आ गया।

विकास- "कैसी है मेरी बीवी? मस्त है ना?"

फिर विकास शीतल को देखकर बोला- "शीतल, तुमने वसीम चाचा को कोई कमी तो नहीं होने दी ना?"

फिर विकास वसीम से मुखातिब होकर बोला- "यें पूरा साथ दी ना आपका? मजा आया ना आपको?"

वसीम फिर कुछ नहीं बोला। फिर उसने कुछ देर रुककर जवाब दिया- "आप लोग तो फरिश्ता हैं मेरे लिए विकास बाबू। ये तो आप लोग हैं, जिन्होंने मेरे दर्द को, मेरी मेरे हालत को समझा नहीं तो लोग तो पता नहीं क्या-क्या सोचते मेरे बारे में? आप लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया.."

विकास उसी टोने में बोला- "में कहाँ फरिश्ता हैं वसीम चाचा? वा तो मेरी बीवी है जो आपके दर्द को समझी और आपकी मदद करने के लिए अपना जिस्म आपको देने को राजी हो गई। मैं तो बस अपनी बीबी का साथ दे रहा था." उसकी नजर सोफे में पड़े पैंटी में पड़ चुकी थी।
 
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