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Adultery Chudasi (चुदासी )

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थोड़ी देर बाद अंकल खड़े हुये और बोले- “बिटिया तुम आई हो तो आंटी के कपड़े चेंज कर देते है...” आंटी को हास्पिटल से दिया हुवा गाउन पहनाया हुवा था।

वो देखकर मैं बोली- “अंकल इसे चेंज करने की क्या जरूरत है? और इसको तो नर्स ही चेंज कर देती होगी ना?” मैंने मन ही मन अंकल को चैलेंज दे दी थी और मुझे इसमें भी उनकी कोई साजिश नजर आ रही थी और मुझे इस नये खेल को ज्यादा रोचक बनाना था।

अंकल- “तुम्हारी बात सही है बिटिया, पर इस बूढ़े का पागलपन कहो या जो समझो आप लोग। मैं तुम्हारी आंटी को हमारी शादी का जोड़ा पहनाना चाहता हूँ, और उसके लिए मैंने डाक्टर से भी बात कर ली है...” अंकल ने बड़े भावुक लब्जों में कहा।

नीरव- “जाओ निशा आंटी के कपड़े चेंज करो। सच में अंकल प्यार करना तो आपसे सीखना चाहिए, इस उमर में भी आप बहुत प्यार करते हैं आंटी से..." नीरव ने कहा।

मैं खड़ी होकर आंटी के पास गई, अंकल भी खड़े हो गये ओर पास में पड़ी प्लास्टिक की बैग ले आए, उसमें रेड कलर के कपड़े थे। अंकल ने बैग में से वो कपड़े निकाले, वो कपड़े पेटीकोट, ब्लाउज और साड़ी थी।

अंकल- “बिटिया तेरी आंटी के कपड़े चेंज करने में मैं भी तुझे मदद करूंगा...” अंकल ने आंटी के गाउन को पैरों से ऊपर करते हुये कहा।

ये देखकर नीरव खड़ा हो गया और बाहर जाने लगा।

ये देखकर मैं अंकल का दांव समझ गई की वो नीरव को बाहर निकलकर मुझे... पर उन्होंने तो नीरव के सामने मूठ मारने की चैलेंज मारी थी ना, इसमें तो मैं जीत जाऊँगी। पर ये क्या?

अंकल ने नीरव को रोका- “बैठो बेटा, बाहर जाने की कोई जरूरत नहीं..”

नीरव- “पर अंकल..." नीरव ने इतना कहा की अंकल ने उसकी तरफ हाथ करके आगे बोलने से रोक लिया और फिर वो रूम के बाहर चले गये।

मुझे अंकल की एक भी बात समझ में नहीं आ रही थी।

एकाध मिनट बाद अंकल अंदर आए तो उनके हाथ में ग्रीन कलर का बड़ा कपड़ा था, उन्होंने नीरव को वो कपड़ा पकड़ने को कहा। रूम के एक कोने की तरफ पलंग था और दूसरे कोने पे इंडियन साइटिंग था। जहां नीरव बैठा था वहां से वो आया। अंकल ने उसे एक हाथ में कपड़ा थमाया और आमने सामने दीवार की खिड़की पर बाँधने को कहा। कपड़ा बाँधते ही रूम के दो भाग हो गये, एक भाग में आंटी का पलंग और दूसरे भाग में गेस्ट की बैठने की जगह। लेकिन पर्दा इतना नीचा बाँधा था की हम एक भाग में खड़े होकर दूसरे भाग में खड़े लोगों का चेहरा देख सकते थे।

कपड़ा बाँधकर नीरव अपनी जगह पे जाकर बैठ गया और अंकल ने मेरी तरफ आँख मारते हुये कहा- “चल आ जा बिटिया कपड़े निकालते हैं...”

मैं मुश्कुराई, और मन में- “हरामी बूढा दो अर्थी भाषा में बोलता है...”

उस तरफ जाते ही मैंने आंटी का गाउन ऊपर किया तो अंकल ने उन्हें पकड़कर बिठाया और हम दोनों ने मिलकर आंटी का गाउन निकाल दिया। आंटी का बदन इस अवस्था में भी आकर्षक लग रहा था, सच में उन्होंने अपने फिगर को इस उमर में भी अच्छा मेंन किया हुवा था। मैंने हाथ में ब्लाउज लिया और मैं वो आंटी को पहनाने गई।

तब अंकल ने उसे खींच लिया और कहा- “ये मैं कर लूंगा, तुम नीचे देखो...”

 
मैंने नीचे देखा तो अंकल का लण्ड बाहर था, मैंने भी वैसे ही धीमी आवाज में उन्हें कहा- “क्या करूं मैं? हमारी शर्त तो नीरव के देखते करने की थी वो कहां हमें देख रहा है?”

अंकल- “वो सामने बैठा देख तो रहा है। कितना दिख रहा है और क्या देख रहा है उसमें मैं क्या करूं?”

मैंने नीरव की तरफ नजर डाली तो वो मोबाइल में गेम खेल रहा था।

अंकल- "नीरव बेटा, तुम शर्माते बहुत हो। हम लोग दिख रहे हैं उसमें तो तुझे कोई प्राब्लम नहीं है ना?" अंकल ने आवाज को ऊंची करके पूछा।

नीरव- “अरे अंकल, सिर्फ आप लोग दिख रहे हैं, आंटी नहीं दिख रही...” नीरव ने कहा।

अंकल- “बस अब खुश, उसने कहा ना की हम दिख रहे हैं, चल अब मुझे मूठ मार दे...” अंकल ने कहा।

मैं- “ओके बाबा...” कहकर मैंने अंकल का लण्ड पकड़ा और हाथ को गोल बनाकर मैं लण्ड को हिलाने लगी। सामने नीरव बैठा था और मेरे हाथ में अंकल का लण्ड था, जो मैं हिला रही थी। ये सब मुझे इतना ज्यादा रोमांचित (साथ में थोड़ा डर भी था) कर रहा था की मेरी चूत गीली हो गई थी।

अंकल का लण्ड ढीला था, शायद उनके लण्ड के अंदर की नशों में नरमाई आ गई थी। अंकल ने आंटी को ब्लाउज पहना दिया था और वो अब ब्लाउज के हुक बंद कर रहे थे।

तभी एकदम से नीरव खड़ा हुवा तो मैं डर गई, और मैंने अंकल के लण्ड को मेरे हाथों की गिरफ्त से छोड़ दिया। नीरव पर्दे के नजदीक आया। मैंने मेरी नजरें झुका दी, अंकल का लण्ड अभी भी बाहर ही लटक रहा था वो देखकर मेरा डर बढ़ गया।

नीरव- “अंकल, आप लोग अपना काम शांति से कीजिए, मैं बाहर बैठा हूँ...” कहकर नीरव दरवाजे की तरफ मुड़ गया।

अंकल- “अरे बैठो ना बेटा, ये पर्दा है ना... हमें तुमसे कोई परेशानी नहीं...” इतना कहकर अंकल ने मेरी तरफ देखा और बोले- “बोलो ना बिटिया नीरव को बैठने को, हम तो हमारा काम कर ही रहे हैं ना?”

 
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//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f33c.svgऔर दिल मे छुपी हैं जो भी अभिलाषायें//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f33c.svg

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//cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f338.svg नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं //cdn.jsdelivr.net/gh/twitter/twemoji@latest/assets/svg/1f338.svg

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तभी एकदम से नीरव खड़ा हुवा तो मैं डर गई, और मैंने अंकल के लण्ड को मेरे हाथों की गिरफ्त से छोड़ दिया। नीरव पर्दे के नजदीक आया। मैंने मेरी नजरें झुका दी, अंकल का लण्ड अभी भी बाहर ही लटक रहा था वो देखकर मेरा डर बढ़ गया।

नीरव- “अंकल, आप लोग अपना काम शांति से कीजिए, मैं बाहर बैठा हूँ...” कहकर नीरव दरवाजे की तरफ मुड़ गया।

अंकल- “अरे बैठो ना बेटा, ये पर्दा है ना... हमें तुमसे कोई परेशानी नहीं...” इतना कहकर अंकल ने मेरी तरफ देखा और बोले- “बोलो ना बिटिया नीरव को बैठने को, हम तो हमारा काम कर ही रहे हैं ना?”

अंकल की बात सुनकर नीरव ने मेरी तरफ देखा। मैंने मेरी नजरें तो ऊपर उठा ली थी पर मेरा इर इतना ज्यादा बढ़ गया था की, एसी रूम था फिर भी मैं पसीने से तर-बतर हो गई थी। मैंने मेरे गले से थूक नीचे उतारा और सिर्फ सिर हिलाकर हाँ कहा।

नीरव- “अंकल, निशा की हालत तो देखिए? कितनी गर्मी हो रही है उसे, इस पर्दे की वजह से हवा उस तरफ नहीं आ रही, एसी गेस्ट की बैठक की तरफ है...” इतना कहकर नीरव रूम से बाहर निकल गया।

नीरव के बाहर निकलते ही अंकल पर्दे के उस तरफ गये और दरवाजे को अंदर से बंद करके मेरी तरफ मुड़कर बोले- “आ जा बाहर, नीरव बोलकर गया है अपना काम शांति से करो...”

मैंने पर्दा उठाकर बाहर देखा तो अंकल का लण्ड पैंट के बाहर ही था, किसी घड़ी के डंके की तरह नीचे की तरफ झुका हुवा था। मैंने अंकल के लण्ड की तरफ इशारा करके पूछा- “ऐसे ही चले गये थे दरवाजा बंद करने, कोई सामने से आकर खोल देता तो?”

अंकल- “ऐसा हो ही नहीं सकता बेटा, तेरा पति बाहर जो खड़ा है हमारी चौकीदारी करने। मैं तो ये दरवाजा भी बंद ना करूं, पर तेरे डर की वजह से बंद किया है, बाकी जब तक नीरव बाहर खड़ा है, हमें कोई टेंशन करने की जरूरत नहीं..”

अंकल की बात तो सही थी, फिर भी मुझे पसंद नहीं आई। और मन ही मन बोल उठी- “हरामी बूढे..” और मैं पर्दे के इस तरफ आ गई। पर्दे के उस तरफ आते ही अंकल ने मेरा हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा, तो मैंने उनपर बनावटी गुस्सा करते हुये कहा- “थोड़ा धीरज रखिए अंकल, जल्दी क्या है?”

अंकल- “जल्दी तो होगी ही ना... तेरी जैसी हसीना के तो जवानी में सपने भी नहीं देखे थे...” कहते हुये अंकल मेरी गर्दन को चूमने लगे।

मैंने मेरे दोनों हाथों से उनके सिर के दबाया और धीरे-धीरे पीछे होने लगी।

जैसे-जैसे मैं अपने कदमों को पीछे लेती गई वैसे-वैसे अंकल भी मेरे साथ-साथ अपने कदम मिलाते गये। चलते-चलते भी अंकल मेरी गर्दन से लेकर मेरे खुले सीने को चूम और चाट रहे थे। दसेक कदम पीछे चलने के बाद मैं वहां आ गई जहां थोड़ी देर पहले नीरव बैठा हुवा था। मैं बैठ गई तो अंकल थोड़ा झुक गये पर उन्होंने अपना चूमना रोका नहीं। मैंने अंकल के सिर को छोड़ा और उनका चेहरा ऊपर उठाया। मेरी गर्दन उनके थूक से भीग चुकी थी और वहां से अजीब गंध आ रही थी। जिससे मुझे खुशबू भी नहीं आ रही थी तो वहां से मुझे बदबू भी नहीं आ रही थी।

 
अंकल ने मुझे खड़ा किया और फिर झुक के नीचे से मेरी साड़ी और पेटीकोट ऊपर उठाकर मेरी चूत पर उनके बायें हाथ का अंगूठा दबाया और फिर मुझे किस करते हुये कहा- “बैठ जाओ निशा रानी, आज तो तुझे बिठाकर तेरी चुदाई करूँगा...”

अंकल की बात सुनकर मैं बैठ गई, अंकल मेरे दोनों पैरों के बीच आ गये। उन्होंने मुझे मेरे पैर उठाकर उनकी कमर के चौतरफा लगाने को कहा। मैंने वही किया। अब अंकल अपने लण्ड को मेरी चूत के ऊपर घिसने लगे।

मैं मेरा हाथ वहां ले गई और उनके लण्ड को पकड़कर सहलाने लगी जिससे उनके लण्ड में ज्यादा कसाव आया और थोड़ा ज्यादा बड़ा होकर ठुमके मारने लगा, मैंने लण्ड को मेरी चूत के द्वार पर रखा और अंकल को कहाधक्का लगाइए अंकल...”

अंकल- “क्या? कहां धक्का मारूं?" अंकल ने अपने खास अंदाज में पूछा।

मैं- “मेरी चूत में..” मैंने भी शर्म और संकोच छोड़ दिया और मेरे बोलते ही अंकल ने फिर से झटका मारा।

अंकल- “किससे धक्का मारूं?” अंकल ने फिर पूछा।

मैं- “आपके लण्ड से..."

और मेरे इस जवाब ने तो अंकल के लण्ड पे झाडू कर दिया। उसने जोर से झटका लगाकर मेरी चूत को सलामी दी और फिर अंदर दाखिल हो गया। अंकल का लण्ड अंदर आते ही मेरे बदन में मीठी सी लहर आ गई। मेरी चूत ने भी उनके लण्ड को जकड़ लिया। थोड़ी देर रुक के अंकल ने अपनी गाण्ड आगे-पीछे करके मेरी चुदाई चालू की।

मेरी टाँगें उनकी कमर पे थी और अंकल जब भी लण्ड को चूत के अंदर डालते थे तब मैं टांगों को कमर पे सख्ती से भींच देती थी और वो अंदर से बाहर खींचते थे तब मैं मेरी गिरफ्त को खोल देती थी। अंकल ने दोनों हाथों से बैठक को पकड़ा हुवा था, मेरी गाण्ड को मैंने सरका के बैठक के आगे की हुई थी। अंकल चोदते हुये। झुक के मेरी गर्दन को फिर से चूमने, चाटने लगे थे।

 
मेरी टाँगें उनकी कमर पे थी और अंकल जब भी लण्ड को चूत के अंदर डालते थे तब मैं टांगों को कमर पे सख्ती से भींच देती थी और वो अंदर से बाहर खींचते थे तब मैं मेरी गिरफ्त को खोल देती थी। अंकल ने दोनों हाथों से बैठक को पकड़ा हुवा था, मेरी गाण्ड को मैंने सरका के बैठक के आगे की हुई थी। अंकल चोदते हुये। झुक के मेरी गर्दन को फिर से चूमने, चाटने लगे थे।

मेरे और अंकल के मुँह से सिसकारियां गूंजने लगी थीं। तभी मुझे शरारत सूझी और मैंने मेरा हाथ नीचे किया और जैसे ही अंकल का लण्ड बाहर आया तो मैंने उसे पकड़ लिया तो अंकल रुक गये।

तब मैंने मादक आवाज में कहा- “चोदो ना अंकल...”

मेरे बोलते ही अंकल के लण्ड ने झटका मारा और ज्यादा सख्त हो गया। मैंने लण्ड छोड़ दिया और अंकल ने फिर से चुदाई चालू कर दी।

मुझे ज्यादा मजा आने लगा, मैंने अंकल का शर्ट ऊपर किया और उनकी पीठ सहलाने लगी और बोलने लगी

चोदो अंकल, जोर से चोदो...” बोलते हुये मेरी सांसें भारी होने लगी थी।

अंकल- “वाह बिटिया वाह... तुम तो बहुत काबिल बन गई चुदवाने में...” कहते हुये अंकल ने और स्पीड बढ़ाई।

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अंकल की भी आवाज मेरी तरह ही हो गई थी और मैं अंकल को उकसा रही थी अलग-अलग तरीकों से। धीरेधीरे मुझे मेरी मंजिल करीब दिखने लगी थी। अंकल की भारी सांसों की आवाज से लग रहा था शायद वो भी मेरी तरह मंजिल के करीब हैं। अंकल ने गर्दन चूमना बंद किया और अपना सिर ऊपर करके मेरे होंठों को उनके होंठों से चूसना चालू किया। अंकल मेरे ऊपर के होंठ चूस रहे थे और मैं उनके नीचे के होंठ चूस रही थी। आज अंकल जवान हो गये थे, और वो अपनी रफ़्तार बढ़ाते ही जा रहे थे।

थोड़ी देर ऐसे ही हम दोनों चुदाई करते-करते एक दूसरे के होंठों को चूसते रहे, 3-4 मिनट निकल गये और मुझे लगा की मैं सातवें आसमान पर उड़ रही हूँ। मैं झड़ गई और मेरे साथ-साथ अंकल भी झड़ गये। झड़ते वक़्त अंकल ने अपनी जीभ बाहर निकाली, जो मैंने मेरे दोनों होंठों के बीच ले ली और उसे चूसने लगी। आज भी अंकल ने बहुत कम वीर्य मेरी चूत में छोड़ा।

झड़ने के आधे मिनट बाद अंकल तुरंत खड़े हो गये और बोले- “जल्दी करो निशा रानी, हमारे कपड़े पहनने के बाद हमें आंटी को भी तैयार करना पड़ेगा..."

अंकल की बात सुनकर मैं भी फटाफट खड़ी हो गई, और मेरे कपड़े और बालों को ठीक करने लगी।

फिर मैंने और अंकल ने आंटी के कपड़े बदले और रूम का दरवाजा खोल दिया। बाहर नीरव नहीं था। थोड़ी देर बाद नीरव और वो भाई दोनों एक साथ रूम में आए।

नीरव ने आकर अंकल को कहा- “हम निकलते हैं अंकल..” इतना कहकर नीरव ने मेरी तरफ देखकर कहा- “चलो निशा, निकलते हैं..."

मैंने सिर हिलाते हुये निकलने का इशारा किया और रूम के बाहर निकल गई, और मेरे पीछे नीरव भी बाहर निकल आया।

पीछे से अंकल की आवाज आई- “बिटिया हर रोज आया कर, हम आंटी के कपड़े बदलते रहेंगे...”

 
अंकल की बात सुनकर मेरा दिल धड़क उठा की नीरव कहीं समझ न जाय अंकल की बात। मुझे अंकल पे बहुत गुस्सा आया और मैं मन ही मन बड़बड़ा उठी- “हरामी बूढ़ा...”

रास्ते में मैंने नीरव से पूछा- कहां चले गये थे तुम?

नीरव- “भूख लगी थी, नाश्ता करने गया था..” नीरव ने कहा।

नीरव की बात सुनकर मैं सोच में पड़ गई की बात तो सही है नीरव की। भूख तो मिटानी ही पड़ती है इंसान को फिर चाहे वो कोई भी भूख हो... पेट की हो या जिम की? इंसान को अपनी भूख तो मिटानी ही पड़ती है। पर। इंसान को सिर्फ अपनी ही भूख के बारे में नहीं सोचना चाहिए। सामने वाले की भूख को भी पहचानना पड़ता है। मैं नीरव की पेट की भूख जानती हूँ, उसकी पसंद, नापसंद के बारे में जानती हूँ। उसे क्या भाता है वो मैं अच्छी तरह जानती हैं, लेकिन मेरे जिश्म की भूख उसकी समझ में कब आएगी?

नीरव- “निशा गाड़ी से उतरो, घर आ गया। क्या सोच रही हो तुम?” नीरव की आवाज सुनकर मैं मेरी सोच में से बाहर आई और हड़बड़ा गई।

मैं- “नहीं नहीं कुछ भी तो नहीं, मैं क्या सोचूं?” मैंने पूछा।

नीरव- “कब से कह रहा हूँ, पर तुम तो सुन ही नहीं रही थी..” नीरव ने कहा।

मैं कोई जवाब दिए बगैर गाड़ी से उतर गई और नीरव गाड़ी पार्क करने गया। मैं लिफ्ट के पास गई और नीरव के आने की राह देखने लगी।

तभी सीढ़ियों से रामू आया और मेरे हाथ में फिल्म की सीडी देकर बोला- “मेमसाब अकेली हो तब देखना.." और वो फिर से सीढ़ियां चढ़ गया।

सीडी तो ले ली मैंने, पर मेरा पूरा मस्तिष्क हिल गया। मेरे दिमाग में ढेरों सवाल खड़े हो गये थे की सी.डी. में क्या होगा? तभी नीरव को आते देखकर मैंने जल्दी से सी.डी. पर्स में डाल दी।

 
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