तभी एकदम से नीरव खड़ा हुवा तो मैं डर गई, और मैंने अंकल के लण्ड को मेरे हाथों की गिरफ्त से छोड़ दिया। नीरव पर्दे के नजदीक आया। मैंने मेरी नजरें झुका दी, अंकल का लण्ड अभी भी बाहर ही लटक रहा था वो देखकर मेरा डर बढ़ गया।
नीरव- “अंकल, आप लोग अपना काम शांति से कीजिए, मैं बाहर बैठा हूँ...” कहकर नीरव दरवाजे की तरफ मुड़ गया।
अंकल- “अरे बैठो ना बेटा, ये पर्दा है ना... हमें तुमसे कोई परेशानी नहीं...” इतना कहकर अंकल ने मेरी तरफ देखा और बोले- “बोलो ना बिटिया नीरव को बैठने को, हम तो हमारा काम कर ही रहे हैं ना?”
अंकल की बात सुनकर नीरव ने मेरी तरफ देखा। मैंने मेरी नजरें तो ऊपर उठा ली थी पर मेरा इर इतना ज्यादा बढ़ गया था की, एसी रूम था फिर भी मैं पसीने से तर-बतर हो गई थी। मैंने मेरे गले से थूक नीचे उतारा और सिर्फ सिर हिलाकर हाँ कहा।
नीरव- “अंकल, निशा की हालत तो देखिए? कितनी गर्मी हो रही है उसे, इस पर्दे की वजह से हवा उस तरफ नहीं आ रही, एसी गेस्ट की बैठक की तरफ है...” इतना कहकर नीरव रूम से बाहर निकल गया।
नीरव के बाहर निकलते ही अंकल पर्दे के उस तरफ गये और दरवाजे को अंदर से बंद करके मेरी तरफ मुड़कर बोले- “आ जा बाहर, नीरव बोलकर गया है अपना काम शांति से करो...”
मैंने पर्दा उठाकर बाहर देखा तो अंकल का लण्ड पैंट के बाहर ही था, किसी घड़ी के डंके की तरह नीचे की तरफ झुका हुवा था। मैंने अंकल के लण्ड की तरफ इशारा करके पूछा- “ऐसे ही चले गये थे दरवाजा बंद करने, कोई सामने से आकर खोल देता तो?”
अंकल- “ऐसा हो ही नहीं सकता बेटा, तेरा पति बाहर जो खड़ा है हमारी चौकीदारी करने। मैं तो ये दरवाजा भी बंद ना करूं, पर तेरे डर की वजह से बंद किया है, बाकी जब तक नीरव बाहर खड़ा है, हमें कोई टेंशन करने की जरूरत नहीं..”
अंकल की बात तो सही थी, फिर भी मुझे पसंद नहीं आई। और मन ही मन बोल उठी- “हरामी बूढे..” और मैं पर्दे के इस तरफ आ गई। पर्दे के उस तरफ आते ही अंकल ने मेरा हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा, तो मैंने उनपर बनावटी गुस्सा करते हुये कहा- “थोड़ा धीरज रखिए अंकल, जल्दी क्या है?”
अंकल- “जल्दी तो होगी ही ना... तेरी जैसी हसीना के तो जवानी में सपने भी नहीं देखे थे...” कहते हुये अंकल मेरी गर्दन को चूमने लगे।
मैंने मेरे दोनों हाथों से उनके सिर के दबाया और धीरे-धीरे पीछे होने लगी।
जैसे-जैसे मैं अपने कदमों को पीछे लेती गई वैसे-वैसे अंकल भी मेरे साथ-साथ अपने कदम मिलाते गये। चलते-चलते भी अंकल मेरी गर्दन से लेकर मेरे खुले सीने को चूम और चाट रहे थे। दसेक कदम पीछे चलने के बाद मैं वहां आ गई जहां थोड़ी देर पहले नीरव बैठा हुवा था। मैं बैठ गई तो अंकल थोड़ा झुक गये पर उन्होंने अपना चूमना रोका नहीं। मैंने अंकल के सिर को छोड़ा और उनका चेहरा ऊपर उठाया। मेरी गर्दन उनके थूक से भीग चुकी थी और वहां से अजीब गंध आ रही थी। जिससे मुझे खुशबू भी नहीं आ रही थी तो वहां से मुझे बदबू भी नहीं आ रही थी।