• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Adultery Chudasi (चुदासी )

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
दीदी- “मैंने तुम्हारे साथ जो किया था वो याद आता है तब मुझे अपनी मूर्खता पे गुस्सा आता है। अनिल को देरी हो रही है, बाद में फोन करती हूँ बाइ...” इतना कहकर दीदी ने काल काट दी।

सच में मुझे अब दीदी से ईर्ष्या हो रही थी। जीजू के पास पैसे भले न हों, पर वो दीदी को भरपूर प्यार देते हैं।

थोड़ी देर बाद खुशबू आई, उसे जल्दी थी खाना पकाने की इसलिए वो जल्दी-जल्दी बात करके निकल गई। दो साल पहले उसकी अम्मी का इंतेकल हो गया था, तब से घर के काम की जिम्मेदारी उस पर थी। उसके अब्बू कुछ ज्यादा ही सख़्त किस्म के इंसान हैं, जो मैं भी जानती थी।

पप्पू के बारे में भी हमने बातें की। तीन महीनों से ही उन दोनों को प्यार हुवा था। दोनों यहां नये-नये ही रहने के लिए आए थे और पप्पू तो पहली नजर में खुशबू के प्यार में पड़ गया था। लेकिन खुशबू ने 'हाँ' कहने में थोड़ा समय लिया था। उसे मालूम नहीं था की प्रेम का पेट नाम पप्पू है। मैंने जब उसे बताया तो वो खूब हँसी।

मैंने खुशबू से हमारी चुदाई की बातें छुपाकर कल रात मिला था और पतंगबाजी की सारी बातें बताई। उसके साथ बात करके मुझे लगा की खुशबू बहुत ही प्यारी लड़की है, थोड़ी देर में हम दोनों पक्की सहेलियां बन गईं।

शाम को मैं आटो में रीता के घर गई। मुझे देखकर रीता के साथ-साथ उसकी भाभी भी खुश हो गई। उन्होंने खाना खाकर ही जाना है, ये हिदायत दे दी। खाना बना तब तक मैंने और रीता ने बातें की और फिर मैं खाना खाकर घर जाने को निकली।

आटो पकड़कर मैं घर वापस आ रही थी, तब सड़क के साइड में खुशबू को देखा, शायद उसे भी आटो का इंतेजार होगा ये सोचकर मैंने आटो वाले को रोकने को कहा और मैं आटो से उतरी, तब तक वो वहां से गायब हो चुकी

थी। मैंने इर्द-गिर्द नजर घुमाई तो खुशबू को एक होटेल के अंदर जाते देखा।

मुझे लग रहा था पप्पू को मिलने आई होगी लेकिन किसी पार्क और गार्डन को छोड़कर होटेल में ये ज्यादा लग । रहा था। मैंने आटो वाले को पैसे देकर जाने को कहा और जल्दी-जल्दी होटेल के अंदर गई। अंदर जाकर देखा तो खुशबू नहीं थी। होटेल देखने से सस्ता और गंदा मालूम हो रहा था।

मैं- “दोनों को यही जगह मिली थी मिलने के लिए?" मैं धीरे से बड़बड़ाई।

मैं वापस मुड़ी तभी रिसेप्शन काउंटर पर बैठे आदमी की आवाज आई- “बोलिए मेडम, क्या काम है?”
 
मैं कुछ बोले बगैर बाहर निकल गई। फिर न जाने क्या सोचकर वापस अंदर गई और पूछा- “वो लड़की आई थी अभी, कहां गई?”

वो आदमी कुछ देर मेरी तरफ देखता रहा, वो कोई 40-45 साल का होगा। मुझे उसके गंदे दांत दिखाने के लिए पहले तो वो हँसा और फिर बोला- “वो लड़की अभी ही कमरे में गई है, दो-तीन दिन होता है और आती है उसके यार से मिलने के लिए..” उस आदमी ने मुझे घूरते हुये ये सब बताया।

मैं- “वो लड़की मेरी फ्रेंड है...” मैंने कहा।

तो...” उसने कंधों को उचकाते हुये कहा।

मैं- “मैं... मैं किसी भी तरह देख सकती हूँ की वो क्या कर रही है? उसे मालूम नहीं पड़ना चाहिए...”

मेरी बात वो ध्यान से सुनकर ऐसे हाव-भाव कर रहा था की मुझे उसका डर लग रहा था। शायद मैं इतनी हसीन नहीं होती तो उसने मुझे कब का निकाल दिया होता। वो बहुत जल्दी से 'आप' से 'तुम' पर आ गया- “तुम्हें क्या लगता है की वो क्या कर रही होगी?”

मुझे अब लगा की यहां से खिसक जाना ही बेहतर रहेगा मेरे लिए, मैं फिर से वापस निकलने के लिए मुड़ी तो वो आदमी रिसेप्शन से निकलकर मेरे सामने आ गया- “तुम्हें देखना है तो मैं दिखा सकता हूँ...”

मैं- “मुझे नहीं देखना...” कहकर मैं साइड में होकर आगे निकलने लगी।

उसने चाबी मेरी तरफ करते हुये कहा- “उसके बाजू का रूम खाली है मेडम, रूम के अंदर रोशनदन है, पर्दा होगा उठकर देख लेना। बोलो तो चाबी दे दें, आप अकेली जाना...”

मैं- “मुझे नहीं देखना, जाने दो मुझे..” कहकर मैंने उसे सामने से खिसकना चाहा।

उसकी बात करने की स्टाइल फिर से बदल गई थी, वो अच्छी तरह से बात करने लगा- “देख आओ मेडम, हो। सकता है आपके करण आपकी फ्रेंड गलत रास्ते पे जा रही हो तो आप उसके लिए कुछ कर सकती हैं..."

मैंने उसके हाथ से चाबी ली- “कौन से नंबर का रूम है?"

फर्स्ट फ्लोर पे पाँच नंबर में आप जाओ, चार नंबर में है आपकी फ्रेंड..”

मैंने उसके हाथ में से चाबी ली और फटाफट सीढ़ियां चढ़ गई। पाँच नंबर के रूम के दाहिने तरफ चार नंबर का रूम था। मैं रूम खोलकर अंदर गई और दाहिनी दीवार पे नजर डाली, वहां ऊपर रोशनदन था। मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई तो कहीं टेबल या स्टूल जैसा कुछ नहीं था की जिस पर मैं चढ़कर रोशनदन से देख सकें। मैं रूम से बाहर आई तो थोड़ा दूर एक टेबल पड़ा था। मैंने वो उठाया और रूम के अंदर रोशनदन के नीचे रखकर रूम बंद किया और मैं टेबल के ऊपर चढ़ी और पर्दा हटाकर रूम के दूसरी तरफ नजर की। अंदर जो दिख रहा था उसका मुझे कुछ अंदाजा था ही।
 
खुशबू ब्रा, पैंटी में बेड पर सोई हुई थी। ब्लैक कलर की ब्रा-पैंटी में कैद खुशबू का बदन कयामत लग रहा था, मैंने पर्स में से मोबाइल निकाला और वीडियो किया, साथ में लेन्स को जूम भी कर दिया जिससे दृश्य साफ-साफ आए, और उसे रोशनदान में ऐसी जगह पे रख दिया जहां से अंदर के दृश्य अच्छे आएं। तभी दरवाजा खुलने की। आवाज आई। पप्पू ने आने में इतनी देर क्यों लगाई होगी? उस दिन खुशबू के उरोजों को पप्पू ने छुवा ही था। तो वो मारने, काटने की बात कर रही थी, और इस वक़्त अधनंगी होकर पप्पू की राह देख रही थी, कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

इतने भी कपड़े क्यों पहन रखे हैं, चल निकाल इसे भी...” अंदर से आवाज आई।

तब मैं मेरी सोच से बाहर निकली। अब तो मैं पप्पू की आवाज अच्छी तरह से पहचानने लगी थी, मुझे ये आवाज उसकी नहीं लगी। मैंने फिर अंदर की तरफ ध्यान दिया। कोई आदमी तौलिया में खड़ा था। उसका चेहरा नहीं दिख रहा था क्योंकि उसकी पीठ मेरी तरफ थी और उसके तकले सिर से साफ जाहिर हो रहा था की वो पप्पू नहीं कोई और था। और दरवाजा रूम का नहीं बाथरूम का खुला होगा।

पप्पू नहीं है कोई और है, ये जानकार मेरे सारे शरीर में कुछ पल के लिए कंपकंपी छूट गई। आजकल सेक्स के प्रति मेरी विचारधारा बदल चुकी थी। मैं किसी भी बात को गलत नहीं समझती थी। फिर भी मुझे खुशबू पे । गुस्सा आ रहा था, और पप्पू से हमदर्दी हो रही थी। वो लड़का था फिर भी उसने मुझे एक बार ठुकराया था और करने के बाद भी रोया था और ये लड़की बिंदास होकर होटेल में आ गई थी।

मैं अब अंदर का नजारा देखने लगी। खुशबू ने अपने सारे कपड़े निकाल दिये थे, उसके छोटे-छोटे नींबू जितने । स्तन और पतली कमर गजब लग रही थी। उस आदमी ने तौलिया निकाल दिया और खुशबू को लण्ड चूसने को कहा। ये लड़की ये भी करने लगी है, ये सोचकर मुझे उससे नफरत होने लगी।

खुशबू बेड से उठकर जमीन पे बैठ गई। फिर तो सिर्फ उस आदमी की पीठ दिखाई दे रही थी और उसकी सिसकारियां सुनाई दे रही थीं। थोड़ी देर बाद खुशबू फिर से खड़ी हो गई और बेड के किनारे पे उसकी टाँगें चौड़ी

करके बैठ गई।

अब वो आदमी जमीन पे बैठ गया और उसकी चूत चाटने लगा। खुशबू आँखें बंद करके सिसकियां भरने लगी, उसके चेहरे पे उत्तेजना के भाव साफ दिख रहे थे। वो उस आदमी की पीठ को, और कभी सिर को सहला रही ।

थी। तभी मुझे लगा की किसी ने मेरे पैरों को पकड़ा हुवा है। मैंने नीचे नजर की तो वो आदमी जो रिसेप्शन पर बैठा था और मुझे चाबी दी थी, वो मेरे पैर को पकड़कर खड़ा था।

मैं- “तुम अंदर कैसे आए?” मैंने उससे पूछा।

हमारे पास दूसरी चाभी रहती ही है मेडम...” इतना कहकर उसने उसका हाथ ऊपर किया और मेरी चूत को बाहर से सहलाया। मैंने जीन्स और टाप पहना था इसलिए वो नीचे खड़े रहकर ज्यादा तो कुछ कर नहीं सकता था।

मैं- “ये क्या कर रहे हो? जाओ यहां से...” मैंने कहा।

वाह री मेडम, रेंट तो वसूल करने दो...” उसने दूसरे हाथ को पीछे किया और मेरी गाण्ड को सहलाया।

मैं- “छोड़, नहीं तो मैं चिल्लाऊँगी..” मैंने धमकी दी।
 
मैं- “ये क्या कर रहे हो? जाओ यहां से...” मैंने कहा।

वाह री मेडम, रेंट तो वसूल करने दो...” उसने दूसरे हाथ को पीछे किया और मेरी गाण्ड को सहलाया।

मैं- “छोड़, नहीं तो मैं चिल्लाऊँगी..” मैंने धमकी दी।

चिल्लाओ, मैं सबको बताऊँगा की इस लड़की ने रूम गलत बोलकर चाभी ली थी और बाजू के रूम में झांक रही थी, तो मैंने उसे पकड़ा तो ये चिल्ला रही है...” उसने इतना कहा और थोड़ा रुक के मुझे आदेश दिया- “चल नीचे उतरकर कपड़े निकाल...”

मैं- “मुझे देखना है कि वो लोग क्या कर रहे हैं प्लीज़..” मैंने कहा।

मैं तुम्हें करके दिखाता हूँ ना...” उसने फिर से अपने गंदे दांत दिखाते हुये हँसकर कहा।

मैं- “थोड़ी देर ठहर जाओ ना...” मैंने उसकी बात मानते हुये कहा और वो तो मेरी हाँ है ये जानकर पागल हो। गया।

“मैं दूसरा टेबल लेकर आता हूँ, तेरे पीछे खड़ा हो जाऊँगा, तुम अंदर का देखना, और मैं यहां पे करूँगा..." इतना कहकर वो बाहर निकल गया।

मैंने अंतिम बार अंदर नजर डाली, खुशबू अब चुदवा रही थी। मैंने मेरा मोबाइल उठाया और टेबल से नीचे उतरकर रूम से बाहर निकल गई। वो आदमी अभी टेबल लेकर आता दिखाई नहीं दे रहा था। मैं फटाफट सीढ़ियां उतरकर होटेल में से बाहर निकलकर आटो में बैठ गई। घर पहुँचते ही मैं आटो से उतरी और आटो वाले को पैसे देकर निकल ही रही थी की कहीं से अब्दुल आ गया।

अब्दुल ने कहा- “एक दिन निकल गया लड़की, अब एक ही दिन है तेरे हाथ में, मेरे नीचे सोने के लिए आ जा, नहीं तो तेरी अम्मी की इज्ज़त की नीलामी कर दूंगा..."

मैं उसके मुँह पे थूकना चाहती थी और कहना चाहती थी- “हरामी तू दूसरों की बेटियों को चोदने के लिए ढूँढ़ रहा है, वहां तेरी बेटी चुदा रही है...” लेकिन मैं कुछ बोले बगैर आगे निकल गई, वो हरामी मुझे तब तक घूरता रहा जब तक मैं लिफ्ट में न बैठ गई।

मैं मन में- “साला कुत्ता, मेरी मम्मी को चोदता था, आज उसकी बेटी चुदवा रही है, जैसी करनी वैसी भरनी...” मैं लिफ्ट के अंदर दाखिल हुई और मैंने धीरे से बोलकर मेरी भड़ास निकाली। वो मुझे ब्लैकमेल कर रहा है मेरी मम्मी के नाम पे, क्या करूं मैं? सोचती हुई लिफ्ट में से बाहर निकली और घर में दाखिल हुई।

मम्मी- “आ गई बेटा...” मम्मी ने स्वागत किया।

मैं- “मम्मी, मैं खाकर आई हूँ..” इतना कहकर मैं कुर्सी पे बैठ गई। मम्मी को देखकर मेरे दिमाग में फिर से अब्दुल आ गया। मुझे अब हर हाल में उसके नीचे सोना ही था, नहीं सोऊँगी तो अब्दुल जो कह रहा है वो करेगा तो मम्मी-पापा सच में मर जाएंगे।
 
वैसे अब्दुल, रामू, और अंकल से तो दिखने में काफी अच्छा था, उसकी उमर अंकल से कम थी और रामू से । बेहतर था दिखने में। आप सोचेंगे की मैं उन दोनों से चुदवा सकती हूँ तो मुझे अब्दुल से क्या प्राब्लम है? मुझे प्राब्लम है उसके रवैए से, वो सेक्स को खरीदने और छीन लेने की चीज समझता है। मेरी मम्मी को उसने पैसे का लालच देकर चोदा, और अब मुझे धमकाकर चोदना चाहता है। पर देखो उसकी करनी का फल की उसकी बेटी भी चुदवा रही है उसकी ही उमर के आदमी से।

मैंने उन दोनों की क्लिप भी बना ली है, आने दो खुशबू को वो क्लिप दिखाकर पूछती हूँ- “ये क्या है?"

क्लिप का खयाल आते ही मेरे दिमाग में एक बात आई की मुझे ये क्लिप खुशबू को नहीं अब्दुल को दिखानी चाहिए और कह देना चाहिए- “तुमने अगर मेरी मम्मी को बदनाम करने की कोशिश की तो मैं ये क्लिप सबको दिखा देंगी.” हाँ यही ठीक रहेगा। थोड़ी हिम्मत करनी पड़ेगी और मुझे उससे चुदवाना भी नहीं पड़ेगा।

*

रात के दस बजे थे, मम्मी-पापा चाचा के घर गये थे और मैं गहरी सोच में डूबी हुई थी। दो दिन पहले मैं पप्पू से खुशबू को बचाना चाहती थी, और आज उल्टा हो गया था, अब मुझे खुशबू के जाल में से पप्पू को निकालना जरूरी लग रहा था। मैं कब से पप्पू की राह देख रही थी कि वो कब मिले और उसे मैं खुशबू की क्लिप दिखाऊँ। यही सोच रही थी मैं।

“दीदी...” आवाज सुनकर मैं चौंक उठी और सोच में से बाहर निकलकर देखा तो खुशबू थी। मैं उसके भोले भाले चेहरे को ध्यान से देखने लगी की कहीं कोई पाप, कपट या दाग दिख रहा है की नहीं?

खुशबू- “क्या सोच रही हो दीदी?” वो फिर से बोली।

मैं- “तेरे इस चेहरे के पीछे जो नागिन है उसे देखने की कोशिश कर रही हूँ..”

मेरी बात सुनकर खुशबू का गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया- “आप क्या कह रही हो दीदी?" उसने एक-एक शब्द को चबाते हुये बोला।

मैं- “सच कह रही हूँ और क्या?” मैंने कहा।

खुशबू- “आपसे तो बात करना ही बेकार है, मार डालूंगी प्रेम को वो अब आपसे मिलने आया तो...” खुशबू गुस्सा होकर बाहर निकलने लगी।

मैं- “ऐसे भी मार ही दिया है तूने उसे, वो तुम्हें पागलों की तरह प्यार करता है और तू होटेल में गुलछरें उड़ाती है...” मुझे जो कहना था वो मैंने कह दिया।

मेरी बात सुनकर खुशबू के पाँव रुक गये।

मैं- “वापस आ जा, नहीं तो मैं प्रेम को सब कुछ बता देंगी.”

मेरी बात का जादुई असर हुवा खुशबू के ऊपर और वो वापस आकर मेरे पास बैठ गई। मैंने उसकी तरफ देखा तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में आँसू आ गये थे।

मैंने फिर पूछा- “क्यों करती है ये सब? एक के साथ प्यार और दूसरे के साथ वासना का खेल, कितना प्यार करता है पप्पू तुझसे?”

मेरी बात सुनते ही खुशबू रोने लगी। मैं उठकर पानी का ग्लास ले आई और उसकी पीठ सहलाते हुये मैंने उसे चुप कराया।

थोड़ी देर बाद ठीक होकर खुशबू ने बताया की उस आदमी का नाम इमरान है, और वो उसके अब्बू का खास आदमी है। एक साल पहले अब्दुल दुबई गया था, तब खुशबू को उसके घर छोड़ गया था। एक महीने तक खुशबू उसके घर रही थी। तब उसने किसी भी तरह बहलाकर खुशबू से शारीरिक संबध बना लिए थे और तब से लेकर आज तक वो जब मन करे तब खुशबू को बुलाकर चोदता है। हर बार चुदवाते वक़्त खुशबू बहक जाती है और बाद में खुद से नफरत करके रोती है। खुशबू ना कहती है तो वो अब्दुल को बता देने की धमकी देता है। माँ के बगैर बच्ची करे तो क्या करे? किसे कहे वो समझ नहीं पा रही थी। प्रेम उसे भी पहली नजर में ही पसंद आ । गया था, लेकिन इन्हीं करणों से उसने पहले 'ना' कहा और फिर दिल के आगे मजबूर हो गई और प्रेम के प्यार को स्वीकार कर बैठी। पहले खुशबू ने सोचा था की बाद में प्रेम को सब सच-सच बता देगी, लेकिन अब डर रही है की सच बताकर प्रेम को कहीं खो न दे और यही डर की वजह से वो प्रेम को कुछ भी बताना नहीं चाहती थी।
 
पहले खुशबू ने सोचा था की बाद में प्रेम को सब सच-सच बता देगी, लेकिन अब डर रही है की सच बताकर प्रेम को कहीं खो न दे और यही डर की वजह से वो प्रेम को कुछ भी बताना नहीं चाहती थी।

खुशबू- “दीदी उस कुत्ते के बच्चे ने दो दिन पहले मेरे अब्बू को जो कहा, वो आप सुनोगी तो हैरान हो जाओगी...” खुशबू अब थोड़ा संभल चुकी थी।

मैं- “क्या कहा?” मैंने पूछा।

खुशबू- “उसने मेरी शादी की बात की...”

मैं- “किसके साथ?”

खुशबू- “उसके बेटे से...”

मैं- “उसके बेटे से?” सुनकर मैं सच में हैरान हो गई- “उसके बेटे से तुम्हारी शादी होगी तो उसके बाद तू पूरी तरह उसके हाथ की कठपुतली बन जाएगी और वो जो चाहेगा वो कर सकेगा तेरे साथ...” सच में ये इमरान एक नंबर का हरामी आदमी लगा मुझे। वो उसकी भूख मिटाने के लिए खुशबू से उसके बेटे की शादी तक करना चाहता है।

खुशबू- “क्या करूं दीदी, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा?” खुशबू की आवाज में दर्द था।

मैं- “मुझे तो इसमें से निकलने का एक ही रास्ता दिख रहा है..” मैंने सोचते हुये कहा।

खुशबू- “बताओ, मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ दीदी..” खुशबू ने कहा।

मैं- “पप्पू के साथ भाग जाओ..” मैंने कहा।

खुशबू- “नहीं दीदी...”

मैं- “क्यों?”

खुशबू- “मैं प्रेम को तीन महीने से ही जानती हूँ दीदी, मैं उसे अभी ज्यादा जानना चाहती हूँ। आप ये मत सोचना दीदी की मुझे प्रेम पे भरोसा नहीं है। मुझे आज की दुनियां पे भरोसा नहीं है। हम हर रोज अख़बार में पढ़ते हैं। की आजकल के लड़के लड़कियों को फँसाकर क्या-क्या करवाने लगते हैं। मैं अभी प्रेम को पूरी तरह से पहचानना चाहती हूँ दीदी..”

खुशबू की बात सुनकर मुझे लगा की शायद उसने एक बार इमरान के हाथों ठोकर खाई है, इसलिए इतना ज्यादा सोच रही है।

मैं- “खुशबू, तुम तो प्रेम को तीन महीने से जानती हो पर मैं तो उसे तीन बार ही मिली हूँ। फिर भी मैं पूरे यकीन से कह सकती हूँ की तुम उसके साथ चली जाओ, वो तुम्हें अच्छी तरह से रखेगा...” मैंने खुशबू को कहा

जो वो पूरे ध्यान से सुन रही थी।
 
खुशबू- “पर दीदी...” खुशबू इतना बोली की दरवाजे पर टक्कर पड़ी और वो रुक गई।

मैंने उठकर दरवाजा खोला, मम्मी-पापा आ गये थे। खुशबू उन्हें सलाम कहकर अपने घर चली गई।

* *

* * *

11:00 बजे थे, मैं अकेली बाहर के रूम में लेटी हुई थी, नींद नहीं आ रही थी मुझे। मैं फिर से समझ नहीं पा रही थी की मैं क्या करूं?

मैंने सोचा था की मैं अब्दुल को उसकी बेटी की क्लिप दिखाऊँगी, तो मुझे उसकी धमकियों के वश में नहीं होना पड़ेगा। लेकिन खुशबू की बात सुनकर मेरा मन बदल गया था, मैं अब अब्दुल को खुशबू की क्लिप दिखा नहीं सकती थी। क्योंकि हो सकता है की अब्दुल क्लिप देखकर खुशबू की शादी जल्दी-जल्दी में कहीं भी कर सकता है, और साथ में अच्छा हुवा की पप्पू के पहले मुझे खुशबू मिल गई। पहले पप्पू मिलता और मैं उसे खुशबू के बारे में ये सब बता देती तो बहुत बड़ी भूल हो जाती मुझसे। मैंने फैसला कर लिया की मैं अब खुशबू की क्लिप डेलीट कर देती हूँ। मैंने लाइट चालू की और देखा की मोबाइल कहां है। मोबाइल टेबल पे पड़ा था।

मैंने उठाया और मेनू खोला तभी नीरव का काल आया- “हेलो...”

नीरव- “मोबाइल हाथ में था क्या निशु डार्लिंग...” नीरव ने बड़े प्यार से पूछा।

मैं- “क्यों?"

नीरव- “पहली ही रिंग में उठाया तूने निशु...”

मैं- “मैं तुम्हें ही फोन करने की सोच रही थी...” मैं ऐसे ही झूठ बोली।

नीरव- “तुम मुझे फोन करने की सोच रही थी, मतलब की तुम मुझे याद कर रही थी...”

मैं- “पहले तुम्हारे कहने का मतलब बताओ, मैं तुम्हें याद नहीं करती क्या?”

नीरव- “जितना मैं करता हूँ उतना तुम नहीं करती होगी..." नीरव ने कहा।

मैं- “मैं कितना तुम्हें याद करती हूँ वो तुम क्या जानो...” मैंने कहा।

नीरव- “अच्छा बाबा तुम ज्यादा याद करती होगी, और बताओ, कैसी तबीयत है तेरी?”

मैं- “मैं ठीक हूँ, कब आ रहे हो?”

नीरव- “लगता है, एक दो दिन ज्यादा हो जाएंगे...”

मैं- “जल्दी आ जाओ अब, बहुत दिन हो गया अब तो..” मैंने कहा।

नीरव- “काम पटते ही आ जाता हूँ जान, मुझे भी तेरे बिना मन नहीं लग रहा...”

मैं- “तो फिर जल्दी से काम पटाओ और उड़कर आ जाओ...”

नीरव- “तू कहती है तो उड़कर आ जाऊँगा, काम पटते ही। एक किस दे दो...” नीरव आज ज्यादा ही रोमेंटिक हो रहा था।

मैं- “मुआवाच, अब तुम दो..”

नीरव- “मुआवाच, बाइ डियर...”

मैं- “बाइ..”

नीरव के काल काटते ही मैंने मोबाइल फिर से टेबल पे रख दिया और लाइट आफ करके सो गई। मैंने मोबाइल किस मकसद से हाथ में लिया था मैं वोही भूल गई और खुशबू का क्लिप डेलीट किए बगैर मैं सो गई।
 
सुबह दस बजे खुशबू आई तब मैं किचन में थी तो वो सीधे ही वहां आई- “क्या बना रही हो दीदी?”

मैं- “आलू के पराठे..” मैंने कहा।

खुशबू- “एक ज्यादा बनाना, मैं ले जाऊँगी...”

मैं- “एक बात पुछू, बुरा न मानो तो...”

खुशबू- “पूछो दीदी..”

मैं- “तुम नानवेज़ होगी ना?”

खुशबू- “हाँ, दीदी...”

मैं- “और पप्पू?”

खुशबू- “वो तो प्योर वेज़ है दीदी...”

मैं- “तो फिर बाद में तुम दोनों के बीच कुछ प्राब्लम नहीं होगी?”

खुशबू- “दीदी मैंने बीस दिन से नानवेज़ नहीं खाया और मैंने सोच भी लिया है की मैं अब नानवेज़ नहीं खाऊँगी...”

मैं- “पप्पू ने कहा छोड़ने को?”

खुशबू- “नहीं दीदी, उसने तो कहा की तू छोड़ दे या मैं चालू कर दें। लेकिन मैंने सोचा की प्रेम तो मेरे लिए चालू कर देगा, पर उसकी बाकी की फैमिली का क्या? यही सोचकर मैंने नानवेज़ छोड़ने का फैसला किया...”

खुशबू की बात सुनकर मैं मुश्कुराई और बोली- “इतना प्यार करती हो पप्पू को और उसपर भरोसा नहीं करती?”

खुशबू- “मैंने सोच लिया दीदी। मैं तैयार हूँ, प्रेम के साथ जाने के लिए..”

मुझे भी सबसे सही रास्ता यही लग रहा था खुशबू के लिए, और मैंने उसे कल कहा भी था। फिर भी मैंने कहा जो भी फैसला लेना, सोच समझकर लेना...”

खुशबू- "दीदी, कल रात भी इमरान चाचू उनके लड़के साहिल से मेरी शादी की बात करने आया था, और अब्बू ने उन्हें कल बताऊँगा, ये कहा है...” खुशबू ने इतनी जल्दी फैसला क्यों लिया उसका राज बताया।

मैं- “तो... तो तुम दोनों को जल्दी भागना पड़ेगा...” मैंने सोचते हुये कहा।

खुशबू- “हाँ दीदी, आज ही जाना पड़ेगा, एक बार मेरी शादी साहिल से पक्की हो गई तो मेरा बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाएगा.” खुशबू ने अपनी प्राब्लम बताई।

मैं- “तो फिर एक काम करो, तुम जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी पप्पू को बुला लो...” मैंने कहा।

खुशबू- “हाँ दीदी यही ठीक रहेगा, मैं चलती हूँ..” इतना कहकर खुशबू जाने लगी।

तब मैंने उसे पीछे से आवाज दी- “पराठे ले जाना भूल गई...”

फिर खुशबू वापस आकर पराठे लेकर निकल गई।

* *

* * *

दोपहर को एक बजे खुशबू ने मुझे आवाज दी। मैं मम्मी को कहकर उसके साथ निकली। हम लिफ्ट में ग्राउंड फ्लोर पर आए और फिर वहां गये, जहां मैंने पप्पू के साथ सेक्स किया था। पप्पू पहले से ही वहां मोजूद था मुझे देखकर मुझकुराया।

मैं- “खुशबू को कब तुम्हारी दुल्हन बना रहे हो?” मैंने उसे पूछा।

पप्पू- “खुशबू कहे आज तो मैं आज ही तैयार हूँ..” पप्पू ने कहा।

खुशबू- “मैं तैयार हूँ और आज ही के दिन...” खुशबू ने कहा।

पप्पू- “आज ही?” कहकर पप्पू सोच में पड़ गया।
 
मैं- “हाँ आज ही, उसकी शादी की बात चल रही है और एक बार फिक्स हो गई तो उसके लिए मुश्किल हो जाएगी..." इस बार मैं बोली।

पप्पू- “मैं भी तैयार हूँ, शाम को पाँच बजे निकलते हैं..." पप्पू ने कहा।

खुशबू- “मैं आ जाऊँगी..” खुशबू ने कहा।

पप्पू- “थॅंक्स माई डार्लिंग, आई लव यू..” कहकर पप्पू खुशबू से लिपट पड़ा।

मुझे अब वहां से निकल जाना बेहतर लगा, क्योंकि उन लोगों को यहां से निकलकर कहां जाना है, वो उन्हें ही सोचना था। उस बारे में मैं उन्हें कुछ समझा नहीं सकती थी और साथ में उन प्रेमियों के बीच ज्यादा देर तक खड़े रहना मैंने ठीक नहीं समझा। मैंने उन लोगों को कहा- “मैं निकल रही हूँ..”

मेरी बात सुनकर पप्पू बोला- “हम भी आ रहे हैं दो मिनट में। पाँच बजे निकलने के लिए बहुत तैयारियां करनी पड़ेंगी...”

मैं बाहर निकली तो प्रेम ने दरवाजा बंद कर दिया। मैं ग्राउंड फ्लोर पे आई, बिजली नहीं थी तो लिफ्ट बंद थी। मैं सीढ़ियां उतरने लगी, दूसरे और तीसरे माले के बीच की सीढ़ियों पर मुझे अब्दुल मिल गया। वो थोड़ा जल्दी में है, ऐसा लग रहा था।

उसने पूछा- “तीन घंटे बाकी है, क्या सोचा?”

मैंने मेरी नजरें नीची कर ली और उसके बाजू से निकल गई- “तीन घंटे में पूरी दुनियां बदल सकती है कोई ना कोई रास्ता जरूर मिल जाएगा...” मैं मन ही मन बोली।

जरा सा आगे निकली तो मुझे पप्पू और खुशबू का खयाल आया की वो लोग जहां हैं वहां से अब्दुल निकलेगा और कहीं उसे मालूम पड़ गया तो? इसलिये मैंने आवाज लगाई- “कहां मिलना है?”

अब्दुल दूसरे माले तक पहुँच गया था, वो वहां से वापस ऊपर आया- “कल मिलते हैं, जगह और समय शाम को बता दूंगा...”

मैं किसी भी तरह समय निकालना चाहती थी तो मैंने कहा- “कल मेरे पास समय नहीं है...”

अब्दुल- “तो परसों...”

मैं- “नहीं..”

अब्दुल- “तो फिर?”

मैं- “आज ही...” मैंने कहा।

अब्दुल- बहुत जल्दी है बुलबुल को चुदवाने की?”

अब्दुल ने कहा तो मैंने उसे स्माइल दी।

मेरी स्माइल देखकर वो झूम उठा- “समय भी तू फिक्स करेगी क्या?”

मैं- “हाँ, पाँच बजे...” मैंने कहा।

अब्दुल- “जगह भी तू कहेगी...”

मैं- “वो तुम कहोगे..” मैंने कहा।

अब्दुल- “रेलवे स्टेशन के पास होटेल मुमताज है, वहां पाँच बजे आ जाना...” ये कहते हुये अब्दुल मेरे बिल्कुल करीब आ गया। उसने मेरे चेहरे को उसके दो हाथों के बीच पकड़ा और वो मुझे किस करने लगा। तभी जोर से सीढ़ियों पर चढ़ने की आवाज आने लगी तो अब्दुल मुझे छोड़कर सीढ़ी उतरने लगा।

मैं भी ऊपर की तरफ जल्दी से चढ़ने लगी। मैं घर पर पहुँचकर एक मिनट के लिए रुकी। तभी खुशबू आई।। खुशबू को देखकर मुझे शांति हुई की वो सीढ़ी चढ़ने की आवाज खुशबू की थी। चलो अच्छा हुवा कि अब्दुल को कुछ मालूम न पड़ा।

मैंने अब्दुल को कुछ देर रोकने के लिए ही उसे 'हाँ' कहा था। पर बाद में समझ में आया की उसे एक बार ‘हाँ कह ही दिया तो अब मुझे जाना ही पड़ेगा, नहीं तो वो गुस्सा होकर जो कह रहा था वो कर सकता है, और वो पाँच बजे मेरे साथ होगा। ये बात पप्पू और खुशबू के लिए भी अच्छी साबित हो सकती है। मैं जितना हो सकेगा उतना ज्यादा समय अब्दुल के साथ निकालूंगी, तब तक वो दोनों जितना हो सके उतना दूर निकल जाएंगे। हाँ यही ठीक रहेगा मैं जरूर जाऊँगी। मैंने निश्चय कर लिया।

साढ़-चार बजे मैंने जल्दी से हल्का सा मेकप किया, मैंने कपड़े चेंज नहीं किए थे, सुबह से जो सलवार कमीज पहनी थी, वोही पहनकर निकल पड़ी। मैंने मम्मी से झूठ बोल- “मैं रीता के यहां जा रही हूँ..."
 
मैंने बाहर आकर स्टेशन के लिए आटो की। मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था, क्योंकि होटेल मुझे अकेले जाना था। सुबह मेरी और अब्दुल की ज्यादा बात नहीं हुई थी, ना तो मैंने उससे रूम नंबर पूछा था, ना मैंने उससे पूछा था कि वो कहां मिलेगा? स्टेशन आ गया तो मैंने आटो से उतरकर आटो वाले को पैसे दिए। मैंने मुमताज होटेल देखा नहीं था। स्टेशन सीधे रोड पर था, और स्टेशन के सामने दो सिंगल रोड भी थी। इनमें से कौन सी रोड पे मुमताज होटेल होगा वो किसी को पूछे बिना मालूम नहीं पड़ सकता था। होटेल कैसी होगी ये मुझे मालूम नहीं था, इसलिए मैं पूछने से डर रही थी।

मेरा मानना था की स्टेशन पे जो होटेल होती है वहां कालगर्ल होती ही हैं, इसीलिए मैंने आटो वाले को होटेल का नाम नहीं दिया था।

तभी मेरा ध्यान सामने के रोड पर पड़ा, एक पोलिस वाला एक औरत को खींचता हुवा ला रहा था। वो मेरी तरफ ही ला रहा था। मैं डरने लगी की वो मेरी तरफ क्यों ला रहा है? लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी वहां से हिलने की भी। वो दोनों मेरे बिल्कुल करीब आ गये, पोलिस वाले ने मेरी तरफ उंगली करके गुस्से से वो औरत को कुछ कहा तो मैं और डर गई। वो दोनों बिल्कुल मेरे नजदीक आ गये।

मुझे ऐसा लगने लगा की मेरी जान मेरे गले में आ चुकी है और वो लोग मेरे पास होते हुये मेरे बाजू में से । निकल गये। उन्हें मेरे पास से निकलते देखकर मेरी जान में जान आई। मैंने पीछे उन लोगों की तरफ देखा तो मेरे पीछे पोलिस स्टेशन था। वो पोलिस वाला उस औरत को वहां घसीटता हुवा ले जा रहा था।

मैंने थोड़ा आगे जाकर हिम्मत जुटाकर एक पान की दुकान पे होटेल मुमताज के बारे में पूछा। पान वाले ने सामने के रोड पे है ऐसा कहा।

मैं जा ही रही थी तभी उसकी आवाज सुनाई दी- “समझ में नहीं आता कि सब अच्छे घर की दिख रही हैं और मुमताज होटेल के बारे में पूछ रही हैं..."

अभी वो औरत को पोलिस पकड़कर ले गई ना, वो भी वहीं से लेकर आ रहे थे...” पान वाले की बात का जवाब वहां खड़े एक आदमी ने दिया, जो सुनकर मेरे सारे बदन में डर फैल गया।

मैंने सोच लिया की चाहे कुछ भी हो जाय, मैं इस होटेल में नहीं जाऊँगी। मुझे याद आया मैं जीजू के साथ। होटेल युवराज में गई थी। अब्दुल को वहां आना है तो ठीक है, नहीं तो मैं निकल जाऊँगी।

मुमताज होटेल का बोर्ड नजर आया तो मैं थोड़ी दूर पर खड़ी रहकर अब्दुल का इंतेजार करने लगी। पाँच बजकर दस मिनट हुई थी,

और बीस मिनट बाद अब्दुल गाड़ी लेकर आया।

मैं उसके पास गई और दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गई और उससे कहा- “यहां से थोड़ा दूर ले लो.."

अब्दुल ने गाड़ी को थोड़ा आगे लिया और फिर मेरी तरफ मुँह करके पूछा- “क्या हुवा बुलबुल?”

मैं- “ऐसे गंदी होटेल में नहीं जाना मुझे...”

अब्दुल- “मैंने तुम्हें सुबह कहा था जगह भी तू ही कह दे पर तूने ना कहा, बोल कहा लँ?”

मैं- “होटेल युवराज...” मैंने कहा।

अब्दुल- “दूर है, आधा घंटा तो ऐसे ही निकल जाएगा..."
 
Back
Top