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Adultery Chudasi (चुदासी )

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मैं- “मुझे वहीं जाना है..” मैंने मेरी बात दोहराई।

अब्दुल- “वैसे मेरे होते हुये कोई टेन्शन नहीं लेने का, फिर भी तू कहती है तो ओके...” कहते हुये अब्दुल ने गाड़ी की स्पीड बढ़ाई।

करीबन छ बजे हम होटेल युवराज पहुँच गये। गाड़ी पार्क करके अब्दुल ने रूम बुक करवाया, रूम तीसरे माले पर था, हम लिफ्ट में बैठकर तीसरे माले पर पहुँचे और तभी अब्दुल का मोबाइल बज उठा। अब्दुल ने थोड़ा दूर जाकर मोबाइल पे बात की तो उसके चेहरे पर चिंता और लझन के भाव दिख रहे थे। मुझे लग रहा था की शायद उसे खुशबू के बारे में पता चल गया है, जो भी हो अब क्या हो सकता था?

अब्दुल मेरे नजदीक आया और मुझसे कहा- “मुझे काम है, तुम बाहर से आटो पकड़ लो...”

मैं आटो में घर वापिस आई। तभी मेरी आटो के बाजू में अब्दुल की गाड़ी आकर रुकी। मैं आटो से उतरी तब मेरे साथ गाड़ी में से खुशबू भी निकली जिसे देखकर में ठिठक गई। उसका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था की वो खूब रोई है और इस वक़्त उसकी आँखों में आँसू सूख गये थे।

सुबह के 11:00 बजे थे, मैंने कल शाम से अब तक खुशबू के घर की तरफ कितनी बार देखा होगा, उसकी गिनती नहीं की थी। अगर की होती तो 300 से ऊपर होती। कल शाम के बाद एक बार भी खुशबू का घर खुल्ला

नहीं था, और ना ही कोई उसके घर आया था।

कल शाम खुशबू को गाड़ी से उतरते देखा, तब से किसी अज्ञात भय ने मेरे मस्तिष्क को घेर रखा था। प्लान के मुताबिक खुशबू को इस वक़्त पप्पू के साथ होना चाहिए था। पर हो सकता है दोनों किसी वजह से पकड़े गये होंगे तो पप्पू कहां है? पप्पू को मारा तो नहीं होगा ना अब्दुल ने? मुझे सबसे ज्यादा टेन्शन यही बात की हो रही थी।

हम एक साथ ही लिफ्ट में ऊपर चढ़े। लेकिन अब्दुल साथ में था तो मैं खुशबू को कुछ पूछ ना सकी। खुशबू की आँखों के आँसू बहुत कुछ बता रहे थे, पर मैं समझ नहीं पा रही थी। थोड़ी देर बाद मैं पप्पू के घर भी गई थी, लेकिन उसका घर बंद था। अब्दुल के करण खुशबू के घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। दोनों में से किसी का भी मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था की मैं जान सकू की उन दोनों के साथ क्या हुवा था?

निशा फिल्म देखने आएगी?” रीता का मोबाइल आया।

मेरा मूड नहीं था जाने का लेकिन मैं पप्पू और खुशबू को थोड़ी देर के लिए भूलना चाहती थी- “फर्स्ट शो में जाएंगे..."

रीता- “ओके, गोलमाल-श्री की टिकेट ला दें..”

मैं- “हाँ..."

रीता- “लाकर फोन करती हैं, बाइ..” रीता ने काल काट दी।

अच्छा हुवा उसका मोबाइल आया, नहीं तो मैं ये सब सोच-सोचकर पागल हो जाती। फिल्म देखने जाना था और खाना भी मुझे ही बनाना था तो मैं जल्दी से खाना बनाने लगी। मैं यहां जब भी आती मम्मी मुझे किचन में पैर भी रखने नहीं देती थी, लेकिन इस बार उसकी तबीयत ठीक नहीं थी तो मैं ही खाना बना रही थी। खाना बनाकर पापा, मम्मी और मैं खाना खाने बैठे।

पापा- “तुम्हारी मम्मी को डाक्टर के पास ले जाना है, ले जाओगी?” पापा ने पूछा।

मेरी जगह मम्मी ने जवाब दिया- “निशा ने फिल्म देखने जाने का पोग्राम बनाया है, आप आफिस से छुट्टी ले लो..."

पापा- “किसके साथ जाने वाली हो बेटा?”

मैं- “रीता के साथ पापा...”

पापा- “तुम फिल्म देख आओ, मैं जाता हूँ तेरी मम्मी के साथ...” पापा ने खड़े होते हुये कहा।

थोड़ी देर बाद पापा और मम्मी निकले। मैं रीता के काल की राह देखती हुई घर का दरवाजा खुला रखकर खुशबू के घर की तरफ नजर गड़ाए बैठी थी। तभी लिफ्ट के ठहरने की आवाज आई और फिर जाली खुलने की आवाज आई। मैंने खड़े होकर लिफ्ट की तरफ नजर की तो उस तरफ से जो आ रहा था उसे देखकर मेरी आँखें फट गई, वो मेरे ही घर की तरफ आ रहा था।

उसने घर के अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया और मेरे नजदीक आकर कहा- “निशा कुछ करो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा...” उसके मुँह से मेरे लिए निशा का संबोधन सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गई, वो पप्पू था।
 
उसने घर के अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया और मेरे नजदीक आकर कहा- “निशा कुछ करो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा...” उसके मुँह से मेरे लिए निशा का संबोधन सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गई, वो पप्पू था।

मैं- “तुम कहां थे कल शाम से? तुम तो खुशबू के साथ जाने वाले थे ना?” मैंने पप्पू के ऊपर सवालों की बौछार कर दी।

पप्पू- “खुशबू ना बोल रही है...” पप्पू ने गीली आँखों से कहा।

मैं- “क्यों?” मैंने पूछा।

पप्पू- “कल मैं निकालने ही वाला था की मेरी मम्मी बाथरूम में फिसल गई। मैं उन्हें हास्पिटल ले गया, अभी भी ठीक नहीं हैं...” पप्पू ने अभी तक जो धैर्य बाँध रखा था वो टूट गया और वो छोटे बच्चे की तरह रोने लगा,

मैंने उसे सांत्वना देने के लिए बाहों में ले लिया, और कहा- “इसमें तो तुम्हारी गलती है, उसका दोष क्यों निकल रहे हो?”

पप्पू- “मैंने ये सब बताने के लिए उसे फोन किया था, लेकिन वो मुझे धोखेबाज बोल रही है। कभी फोन मत कर ऐसा बोला खुशबू ने मुझे..” पप्पू और जोर से रोने लगा। उसका वर्ताव छोटे बच्चे जैसा था, लेकिन उसकी हरकतें मर्दाना थीं। उसने मुझे जोरों से बाहों में भींच दिया जिससे मेरे उरोज उसके सीने से दब गये और मेरे मुँह से । सिसकारी निकल गई।

मैंने कहा- “मैं खुशबू को मोबाइल लगाती हूँ..”

पप्पू- “नहीं करना खुशबू को फोन, नहीं करनी मुझे उससे शादी। वो बता रही थी की मैं दो दिन में शादी करने वाली हूँ...” पप्पू रो रहा था लेकिन उसके हाथ करामात दिखा रहे थे। वो कपड़े के साथ मेरी गाण्ड सहला रहे थे।

मैंने गाउन पहन रखा था। मैंने पूछा- “शादी... किसके साथ?”

पप्पू- “साहिल... साहिल नाम बता रही थी...” पहले तो पप्पू ने उसका सिर मेरे कंधे पर रख दिया लेकिन बाद में वो मेरी गर्दन चूमने लगा।

मैं बहकने लगी थी लेकिन साहिल, इमरान का बेटा, का नाम सुनने के बाद मैं खुशबू के लिए चिंतित हो उठी। मैंने मेरी बाहों में से उसे मुक्त करके, धीरे से उसके कान में कहा- “छोड़ो मुझे, हम खुशबू को फोन करते हैं.”

पप्पू- “नहीं निशा, वो मुझे धोखेबाज कह रही है, जो की वो खुद है। मुझे तुम्हारी जरूरत है, निशा मुझे तुम्हारी बाहों में ले लो...” कहते हुये पप्पू ने मेरे होंठ पर उसके होंठ रख दिए।

मैं पिघलने लगी। मैंने पप्पू को फिर से बाहों में ले लिया और उसके होंठ चूसने लगी। पप्पू ने हाथ नीचे किया और मेरा गाउन उठाया और मेरी जांघों को सहलाने लगा। मैंने मदमस्त होकर मेरी आँखें बंद कर ली, तभी मेरा मोबाइल बज उठा।

मैं जमीन पर बैठकर पप्पू के लण्ड को निहारने और सहलाने लगी, पप्पू का लण्ड झटके मारकर मेरी हरकत को सलामी देने लगा, तभी मेरा मोबाइल फिर से बज उठा। मैंने पप्पू के चिढ़ भरे चेहरे को देखते हुये उसके पास से मोबाइल माँगा।

पप्पू मोबाइल को फेंकना चाहता हो ऐसी चेष्टा करते हुये मोबाइल मेरे हाथ में थमाया।

रिंग सुनकर मैं भी चिढ़ गई थी। लेकिन देखा की दीदी की काल है तो चिढ़ थोड़ी कम हुई- “हेलो दीदी...”

दीदी- “निशा, मेरी बहन कल रात अनिल ने मुझे सोने ही नहीं दिया...”

मैं बातें करते हुये पप्पू को देख रही थी। वो नंगा ही डान्स करते हुये अंदर के रूम में से बाहर आ-जा रहा था जो देखकर मुझे हँसी आ रही थी।

मैं- “क्या-क्या किया दीदी, पूरी बात बताओ..”
 
दीदी- “पवन के सोने के बाद मैं टीवी देख रही थी तब अनिल ने मुझे उसकी बाहों में उठाया और बेडरूम में ले गया..."

मैं- “वाउ दीदी... जीजू आपको उठाकर बेडरूम में ले गये, फिर?"

मेरी बात सुनकर पप्पू ने उसका डान्स रोक लिया।

दीदी- “फिर अनिल ने मुझे नंगा किया और मेरे हर अंग को चूमा...”

मैं- “नंगा करके चूमा, कहां-कहां चूमा दीदी बताओ ना?” मेरी बात पूरी होते ही मैं उधर हो गई थी।

पप्पू ने मुझे उसकी बाहों में उठा लिया था, और अंदर रूम में लेजाकर लेटाया। मैंने पप्पू की तरफ नशीली आँखों से देखा और मोबाइल का लाउडस्पीकर ओन कर दिया।

दीदी- “पहले तो मेरे पैरों की उंगलियों को चूमा...” दीदी की आवाज रूम में गूंजने लगी।

जिसे सुनकर पप्पू मेरी उंगलियां चूमने, सच कहें तो चूसने लगा जिससे मेरे मुँह से आऽऽ निकल गई।

दीदी- “तुम तो सुनकर ही आहें भरने लगी.”

मैं- “हाँ... दीदी बताओ ना फिर क्या हुवा?”

दीदी- “फिर जांघ पर, बाद में नाभि और पेट पर, बाद में चूचियों पर..”

दीदी बोले जा रही थी और पप्पू वहां-वहां चूम रहा था जहां-जहां दीदी बता रही थी और मैं आहें भर रही थी।

दीदी- “फिर हम लोगों ने एक दूसरे को किस किया...”

मैं- “दीदी जीजू ने नीचे नहीं चाटा...”

दीदी- “चाटा ना अंत में अनिल ने मेरी भोस चाटी...” दीदी की खुल्ली बात सुनकर पप्पू बौचक्का हो गया और मेरी तरफ देखने लगा।

मैंने मुश्कुराते हुये मेरी टाँगें चौड़ी की और पप्पू को झुकने का इशारा किया, और दीदी को बाइ कहकर काल काट दिया। मैंने पप्पू को झुकने को कहा लेकिन वो झुका नहीं और असमंजस से मुझे देखता रहा।

मैं- “पप्पू यहां किस करो...” मैंने मेरी चूत की तरफ उंगली करते हुये कहा।

लेकिन पप्पू ने कोई प्रतिभाव नहीं दिया।

मैं समझ गई उसे घिन हो रही है। मुझे खयाल आया की नीरव को भी होती है। मुझे पप्पू पर बहुत गुस्सा आया- “ऐसे ही ठंडा रहा ना तो खुशबू की प्यास बुझा नहीं पाओगे...”

पप्पू- “निशा, तुम ऐसा क्यों कह रही हो?" पप्पू ने झल्लाते हुये कहा।

मैंने उसके सिर के पीछे हाथ डाला और खींचकर कहा- “इसे चाटो..” मैं उसे बता तो नहीं सकती थी की खुशबू कितनी गरम है जो मैं देख चुकी हूँ।
 
पप्पू ने मेरी चूत पे चुंबन किया तो मेरे सारे बदन में करेंट दौड़ गया।

मैं लेटी हुई थी इसलिए पप्पू को मेरी चूत चाटते हुये देख नहीं सकती थी, जो मैं देखना चाहती थी। मैंने मेरा सिर उठाया और नीचे दो तकिये रख दिये जिससे मेरा सिर ऊंचा हो गया और मैं पप्पू के चेहरे को साफ-साफ । देखने लगी। मैं ऐसे क्यूट से लड़के को मेरी चूत चाटते हुये देखना चाहती थी। आज तक मैं जब भी जिससे भी चुदी थी, हर बार मैंने पूरा मजा लिया था, फिर भी सभी ने मुझे उनकी मनमानी से चोदा था। आज मैं पप्पू से मेरे तरीकों से चुदवाना चाहती थी, मैं पप्पू को मेरा स्लट बनाना चाहती थी।

मैं- “जीभ निकालकर चाटो पप्पू..."

मेरे इतना कहते ही पप्पू ने अपनी जबान निकाली और चूत के बाहरी भाग को चाटा।

मैंने उसका सिर पकड़कर मेरी चूत पर थोड़ी देर दबाया और फिर छोड़ दिया और कहा- “क्यों तड़पा रहे हो पप्पू?”

मेरे छोड़ते ही पप्पू ने एक लंबी सांस ली और चूत को उंगलियों से अलग-अलग दिशा में खींचकर जबान अंदर । डालकर चाटने लगा। शायद उसका मुँह चूत पर दबाने से उसकी झिझक कम हो गई थी। आज मुझे दोगुना मजा मिल रहा था, देखने का और चटवाने का। पप्पू ने पूरी मस्ती से थोड़ी देर मेरी चूत चाटी, उसके बाद मैंने उसे । मेरे ऊपर आने को कहा। पहले तो मैं पप्पू का लण्ड चूसना चाहती थी, लेकिन अब डर रही थी की कहीं वो झड़ न जाय।

मैंने सोचा था की मुझे पप्पू का लण्ड पकड़कर मेरी चूत में डलवाना पड़ेगा। नीरव और अंकल से चुदवाते वक़्त मुझे उनका लण्ड मेरी चूत के द्वार पर रखना पड़ता है। इसके पहले मैंने पप्पू से चुदवाया था तो, तब उसका लण्ड भी मैंने पकड़कर ही इलवाया था।

“आहह.." पप्पू का लण्ड मेरी चूत में घुसते ही मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई।

जल्दी सिख गया था वो, मुझे उसका लण्ड पकड़कर डलवाने की जरूरत नहीं पड़ी। कुछ पल रुककर पप्पू हिलाने लगा, पहले धीरे-धीरे और फिर बहुत तेजी से। मैं उसकी पीठ सहलाने लगी। उबलती जवानी के करण पप्पू बहुत ही जोरों से चोद रहा था, उसके जितनी तेजी से मैं मेरी गाण्ड उठा नहीं पा रही थी।

चुदवाते हुये मैं सिसकारी के साथ- “चोदो... चोदो... जोर से चोदो पप्पू...” ऐसा कब बोलने लगी, वो मुझे पता ही नहीं चला। मैं पप्पू को किस करते हुये उसके होंठ चूसने लगी।

मैंने मेरी जबान बाहर निकाली जिसे पप्पू उसके दोनों होंठों बीच दबाकर चूसने लगा, बाद में उसने उसकी जबान निकाली और उससे मेरी जबान को सहलाने लगा। हमारी गरम सांसों से रूम का तापमान बढ़ गया था। मैंने पप्पू को कंधे से कसकर पकड़ा और मेरी दोनों टांगों को अलग-अलग दिशा में खींचकर जोर लगाकर मेरी गाण्ड को उछालने लगी। पप्पू की स्पीड से लग रहा था की वो भी बहुत उत्तेजित हो गया है। थोड़ी देर ऐसे ही हमारी चदाई का दौर चलता रहा और बाद में हम दोनों एक साथ झई।

झड़ते वक़्त मैंने पप्पू को कसकर पकड़ रखा था, मैं चाहती थी कि उसका सारा वीर्य मेरी चूत में जाय, एक बूंद भी बाहर ना निकले। क्या मालूम कौन सी बूंद से गर्भ ठहर जाय, क्योंकि मुझे पप्पू जैसा क्यूट बच्चा चाहिए।
 
था। मेरी और पप्पू की चुदाई खतम होते ही मैंने उसे कपड़े पहनने को कहा और मैंने भी पहन लिए, और बाद में मैंने चाय बनाई और हम दोनों ने साथ मिलकर पी।

बाद में पप्पू ने खुशबू की बात निकाली- “निशा, किसी भी तरह खुशबू को समझाओ कि उसके बिना मैं जी नहीं पाऊँगा..."

पप्पू की बात सुनकर मैं उससे क्या कहूँ वो मुझे समझ में नहीं आ रहा था। थोड़ी ही देर में वो उसकी बात से पलट चुका था- “कुछ देर पहले तो तू कह रहा था की मुझे उससे शादी नहीं करनी...”

पप्पू- “वो तो मैं गुस्से में बोल गया था...”

मैं- “ऐसे कैसे गुस्से में बोल गये?”

पप्पू- “तुम्हारे साथ सेक्स करते हुये मैं उसी के बारे में सोच रहा था। मैं उसके बिना जी नहीं सकता निशा...”

मैं- “क्या तुम मेरे साथ सेक्स करते हुये उसके बारे में सोच रहे थे?” मैंने उसकी बात ऊंची आवाज में रिपीट की।

पप्पू- “हाँ..."

मैं- “निकल तू यहां से, भाग... अच्छा है तूने कपड़े पहने हैं नहीं तो मैं तुझे नंगा ही बाहर निकाल देती...” मेरी आवाज और ऊंची हो गई थी। शायद पप्पू ने सोचा नहीं था की मैं इतनी गुस्सा हो जाऊँगी।

पप्पू- “सारी निशा, प्लीज़्ज़... यार, आजकल मेरा लक काम नहीं कर रहा, कल खुशबू को बुरा लग गया, आज तुझे। यार, मेरा ये मतलब नहीं था प्लीज़..."

मैं- “थोड़ी देर बाद नहीं सोच सकता था? मुझसे सेक्स करते वक़्त तुम्हें और कोई खयाल भी कैसे आ सकता है?” मैं अब थोड़ी शांत हो गई थी।

पप्पू- “सारी निशा, कुछ कर यार, मैं उसके बिना जी नहीं पाऊँगा..”

मैं उसकी बात सुनकर उसके सामने देखने लगी। सच में बहुत बिंदास है ये लड़का, सब कुछ चाहिए इसे- प्यार भी और सेक्स भी। जिसके साथ सेक्स करता है उसी से अपने प्यार से मिलने की बात करता है।

मैं- “ओके, मुझे खुशबू का नंबर दो..”

पप्पू- “98* * * * * * * *

* * * * *

* * *
 
पप्पू ने जो नंबर कहा वो मैंने मेरे मोबाइल में सेव करके उसे फिर से दिखाया- “बराबर है ना?"

पप्पू- “हाँ..."

मैं- “अब तुम जाओ, मेरे मम्मी-पापा कभी भी आ सकते हैं."

पप्पू- “जाता हूँ, पर खुशबू को समझाना किसी भी तरह प्लीज़..”

मैं- “पहले तुम जाओ...” मैंने चिढ़कर कहा।

पप्पू- “ओके, जान..." इतना कहकर पप्पू मेरे नजदीक आया और मुझे किस करने लगा।

और मैं हट गई- “कोई जरूरत नहीं मुझे किस करके प्यार जताने की, निकल यहां से...”

मेरी बात पप्पू को बुरी तो जरूर लगी होगी फिर भी वो झूठ मूठ का हँसता हुवा चला गया। थोड़ी देर पहले बुरा तो मुझे भी लगा था।

मैंने मेरा मोबाइल हाथ में लिया और खुशबू को काल लगाया और उसे घर आने को कहा। थोड़ी ‘हाँ ना' करने के बाद खुशबू मेरे घर आने को तैयार हो गई। एक घंटे तक समझाने के बाद मैं खुशबू को मेरी बात समझाने में सफल हुई। बीच में एक-दो बार हम लड़ भी पड़े। मैंने उस पर आरोप भी लगाए की वो मेरी बात इसलिए नहीं मान रही की ‘वो अब इमरान के बिना नहीं रह सकती।

मेरी बात सुनकर खुशबू बहुत गुस्सा हुई थी। मैंने उसे पप्पू की मम्मी की हालत के बारे में भी बताया। मेरी बात सुनकर खुशबू ने कहा था- “पप्पू की मम्मी बाथरूम में फिसल गई थी, तो उसने मुझे फोन क्यों नहीं किया की अब तू घर से निकलना नहीं?”

खुशबू की बात सही भी थी मैंने उससे कहा- “वो घबराहट में भूल गया था तुम्हें फोन करने को...”

खुशबू को पप्पू पर विस्वास नहीं हो रहा था। अंत में मैंने उसे ये बात कहकर मनाया की- “इमरान से तो पप्पू अच्छा ही है, साहिल से शादी करना मतलब इमरान के जाल में फँसना, उससे तो पप्पू लाख गुना अच्छा है...”

खुशबू मेरी बात मान गई।

उसके बाद मैंने उससे पूछा- “कल क्या हवा था? तुझे किसने देख लिया था बस स्टेंड पे? कल तेरे अब्बू ने पूछा तो होगा ना की तू किसके साथ भागी हो? कौन है वो लड़का तो तूने क्या कहा था?”

खुशबू ने अब्दुल को पप्पू के बारे में कुछ नहीं बताया था। उसने कहा था- “मुझे साहिल पसंद नहीं था, इसलिए मैं घर छोड़कर चली गई थी, मैं अकेली ही भागी थी...”

खुशबू की बात अब्दुल ने सही भी मान ली थी।

खुशबू ने ये भी बताया की- “उसके अब्बू का एक आदमी है जो खुशबू को बस स्टेंड पर मिल गया, जिसे देखकर खुशबू डर गई तो उसे शक हुवा और साथ में खुशबू के हाथ में बैग देखकर उसका शक यकीन में बदल गया...”
 
मैं- “अरे बुद्धूराम, ये रोनी सूरत छोड़ और हँस। मैं मजाक कर रही हूँ, मैं तो कब की भूल गई कल की बातें..”

शायद पप्पू कुछ देर मेरी बात समझा नहीं और जब समझा तब वो भी खिलखिलाकर हँसने लगा- “थॅंक्स निशा। यार, मैं तो कल से बहुत डर रहा था...”

मैं- “दोस्ती में नो सारी, नो थॅंक्स..” मैंने डायलोग मारा।

पप्पू- “हाँ। आज से नो सारी, नो थैक्स..” कहते हुये पप्पू ने दरवाजा खोलते हुये मेरे गालों पर किस किया।

मैं- “एक मिनट मेरी बात सुनकर जा...”

पप्पू- “कहो...”

मैं- “कल तूने मेरे साथ सेक्स करते हुये खुशबू के बारे में भले ही सोचा, लेकिन आज के बाद तू किसी से भी सेक्स करेगा ना तब तुम मेरे बारे में जरूर सोचेगा, और मुझे जरूर याद करेगा। ये मुझे पूरा यकीन है...”

मेरी बात सुनकर पप्पू मुश्कुराया और मुझे जाने को कहा- “मैं पाँच मिनट बाद निकलता हूँ, आप अभी जाओ...”

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* *

खाना खाने के बाद मैंने अब्दुल से बात करने के लिए उसके घर जाने का ठान लिया। मैं थोड़ा ज्यादा सज-सवंर के उसके घर गई। अब्दुल ने ही दरवाजा खोला और पीछे ही खुशबू खड़ी थी। मैं अब्दुल को स्माइल देकर खुशबू के साथ उसके रूम में गई। मुझे देखकर अब्दुल के मुरझाये चेहरे पर थोड़ी सी चमक आई। थोड़ी देर में खुशबू से आधी-टेढ़ी बातें करती रही, हम दोनों में से किसी ने भी पप्पू की बात नहीं निकाली। मैं डर रही थी की अब्दुल घर में है और कहीं हमारी बात सुन लेगा तो मुशीबत हो जाएगी और शायद खुशबू को भी वही डर होगा। कोई सेटिंग नहीं दिखी मुझे अब्दुल से बात करने की तो मैं खुशबू के रूम से बाहर निकली, मेरे घर जाने के लिए।

मुझे देखकर अब्दुल ने खुशबू को कहा- “पहली बार घर पे आई है बिटिया रानी, खुशबू ठंडा देना..”

अब्दुल की बात मुझे जंच गई। मैं तो चाहती थी ही उससे अकेले में बात करने को। मैं जाकर अब्दुल के पास। वाली कुर्सी पे बैठ गई और खुशबू अंदर ठंडा लेने गई। तभी मेरे दिमाग में आया की ठंडा तो आधे मिनट में आ जाएगा इसलिये मैंने कहा- “चाय बनाना खुशबू, शर्दी में ठंडा नहीं पीना...”

और फिर मैंने अब्दुल तरफ नजर करके धीरे से कहा- “शायद मैं कल दोपहर को जाने वाली हूँ...”

अब्दुल- “कल दोपहर को...”

मैं- “बाद में तुम मेरे मम्मी-पापा को परेशान मत करना..”

अब्दुल- “तुम नहीं दोगी तो करूंगा?”

मैं- “मैं कहां ना कह रही हूँ?"

अब्दुल- “रुक जाओ...”

मैं- “मेरे पति का फोन आया है...” मैं झूठ बोल रही थी।

अब्दुल- “ओके, एक काम करो शाम को आ जाओ होटेल युवराज पर..” अब्दुल ने कुछ सोचते हुये कहा।

मैं- “चार बजे..." मैंने थोड़ा जल्दी का समय दिया।

अब्दुल- “ओके...”

तभी खुशबू चाय लेकर आ गई जो पीकर मैं वहां से निकल गई। वैसे मेरा काम भी तो हो गया था। मैं अब पूरी तरह से निश्चिंत हो गई थी। अब पप्पू और खुशबू को भागने में कोई रुकावट मुझे नजर नहीं आ रही थी। प्राब्लम थी तो सिर्फ एक... मुझे किसी भी तरह वहां अब्दुल को दो-तीन घंटे रोकने का था।

तभी खुशबू के मोबाइल में काल आया- “दीदी एक और मुशीबत आन पड़ी है...”

मैं- “मुशीबत...”

खुशबू- “हाँ दीदी, थोड़ी देर पहले मुझे मालूम पड़ा की अब्बू चार बजे कहीं जाने वाले हैं...”

मैं- “वो तो अच्छा है ना... तुम घर से बिंदास निकल सकोगी.”

खुशबू- “लेकिन दीदी उस वक़्त अब्बू ने घर पे मेरा ध्यान रखने के लिए इमरान चाचू को आने को कहा है...”

खुशबू की बात सही थी, उस पर मुशीबत पे मुशीबत आ रही थी। खुशबू की बात सुनकर मैं सोच में पड़ गई की अब क्या करें? वो जानती नहीं थी की उसके अब्बू क्यों बाहर जाने वाले हैं? उसे कोई मतलब भी तो नहीं था।

मैं- एक काम कर खुशबू, तुम तुम्हारे अब्बू को बोल दो की आप बाहर मत जाओ, और अगर जाना है तो किसी को घर पे छोड़कर मत जाओ। आपको मुझ पर विस्वास न हो तो आप किसी को भी मेरा ध्यान रखने के लिए नीचे, चौकीदार के पास बिठाकर जाओ, घर पे नहीं...”

खुशबू- “पर दीदी इससे क्या होगा?”

मैं- “होगा ये की तेरे अब्बू बाहर जाएंगे तो किसी को घर में नहीं नीचे बिठा के जाएंगे तुम निकलते वक़्त साड़ी पहनकर सिर पे पल्लू लगाकर निकल जाना..."

खुशबू- “ये तो ठीक है दीदी पर अब्बू बाहर नहीं गये तो?”

मैं- “तो अपनी फूटी किश्मत पे रोना, साड़ी चाहिए तो मेरे पास से ले जाना, बाइ..” मैंने खुशबू की कोई बात सुने बगैर फोन काट दिया।

हम लोग जिस तरह से मोबाइल पे बात कर रहे थे, उससे एक बात तो तय थी ही की खुशबू के भागने के बाद अब्दुल उसके मोबाइल की काल डिटेल चेक करवाएगा तब सबसे पहले मैं ही हँसने वाली थी।

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साढ़े तीन बजे थे। मैंने मम्मी को पहले से ही बता दिया था की कल फिल्म की टिकेट नहीं मिलने की वजह से मैं आज जाने वाली हूँ, और मम्मी ने मेरी बात मान भी ली थी। मैंने सुबह ही मेरी चूत पर से बाल निकाल दिए थे। मैंने सज-सवंर के अपने आपको आईने में देखा तो मैं मेरे हुस्न को देखकर देखती ही रह गई। मैंने हर चीज रेड कलर की पहनी थी, रेड साड़ी के साथ अंदरूनी कपड़े भी रेड ही थे, लिपस्टिक, बिंदी भी रेड ही लगाई थी।

मैंने। कयामत लग रही थी मैं। मैंने घर से बाहर निकलकर रोड पे आकर आटो किया और उसे होटेल युवराज पे लेने को कहा।

आटो वाला अधेड़ उमर का था, वो शायद मुझे उसके आटो में बिठाकर अपने आपको खुशनसीब समझ रहा था। क्योंकि वो मस्ती से आटो चलाते हुये कोई पुराना गीत गा रहा था- “लाल छड़ी मैदान खड़ी, क्या खूब लड़ी... क्या खूब लड़ी, हम दिल से गये हाय हम जां से गये हाय...”

आटो होटेल युवराज के पास पहुँचा तब मैंने दूर से ही अब्दुल को देख लिया था। जैसे ही मैं आटो से उतरी तो उसने आकर आटो वाले को 100 का नोट दिया और निकलने को कहा। आटो वाला सलाम मरके निकल गया, उसे 20 की जगह 100 मिले थे, सलाम तो मारेगा ही।

अब्दुल ने रूम पहले से बुक करवा के चाबी ले रखी थी। हम सीधे ही लिफ्ट में दूसरे माले पे रूम नंबर 208 में गये। रूम के अंदर दाखिल होते ही अब्दुल ने मुझे उसकी मजबूत बाहों में भींच लिया। मैं भी उसे खुशी-खुशी लिपट पड़ी। क्योंकि अब्दुल का छे फूट से ऊपर का क़द, गोरा चेहरा, चौड़ा सीना, सफेद दाढ़ी से वो मुझे पहले से ही अच्छा तो लगता ही था, हाँ उसकी तोंद थोड़ी ज्यादा ही बाहर थी, पर इतनी उमर में ये तो होता ही है।

अब्दुल- “जन्नत की हूर लग रही हो तुम...” कहते हुये अब्दुल मेरी गर्दन को चूमने लगा।

मैं उसके सफेद बालों को सहलाने लगी। अब्दुल के हाथ मेरी गाण्ड का जायजा ले रहे थे, मेरा ब्लाउज बैक लोकट था। अब्दुल ने उसके हाथों को ऊपर किया और मेरी साड़ी को आगे करके वो मेरी नंगी पीठ को सहलाने । लगा। उसने उसके हाथों को मेरी पीठ पे भींचा जिससे मेरा बदन आगे हुवा और मैं अब्दुल के सीने में और भिंच गई।

अब्दुल- “तुम इन कपड़ों में इतना जंच रही हो की तुम्हें नंगा करने का जी नहीं करता...” अब्दुल ने इतना कहकर मेरे होंठों पर उसके होंठ रख दिए। वो पीछे से मेरी पीठ को भींच रहा था उसकी तरफ, और साथ में मेरे होंठों । को उसके होंठों से दबाने लगा। वो मानो मेरे होंठों को ऐसे चूस रहा था की वहां से कोई रस निकल रहा हो, जिसे वो निचोड़कर पीना चाहता हो।

थोड़ी देर बाद जब अब्दुल ने मुझे छोड़ा तब मैंने कहा- “यहीं खड़े रहकर सब करना है क्या?”

मेरी बात सुनकर वो मुश्कुराया और मुझे उसकी बाहों से अलग किया और मेरे दोनों हाथों को उसके हाथ में लेकर वो पीछे कदम चलने लगा। रूम काफी बड़ा था, उसके एक साइड में बेड था, बेड के पास जाते ही अब्दुल उस पर बैठ गया और मुझे खींचकर उसकी गोद में बिठा लिया। मैंने मेरा चेहरा अब्दुल की तरफ किया तो वो फिर से मेरे होंठों को चूसने लगा। मैंने मेरे हाथों को उसके गले का हार बना दिया।

अब्दुल- “तुम इतनी अच्छी लग रही हो की..." अब्दुल बार-बार मेरी तारीफ कर रहा था। वो बात करते हुये कुछ पल रुका और फिर बोला- “मैं नहीं निकाल सकता तुम्हारे कपड़े...”

उसकी बात मैं समझी नहीं, कपड़े निकाले बिना तो कैसे होगा मैं सोचने लगी।

मुझे असमंजस में देखकर अब्दुल ठहाके लगाकर हँसा और बोला- “टेन्शन मत लो रानी, नंगी तो तुम होगी लेकिन मैं नहीं करूंगा...” इतना कहकर अब्दुल रुक गया।

वो टेन्शन मत लो कहकर मुझे टेन्शन दे रहा था। वो अच्छा आदमी नहीं है ये मैं जानती थी। वो जो काम । (बिजनेस) करता है वो भी अच्छा नहीं था। उसके साथ जो भी लोग काम करते हैं, वो सब मवाली थे और खुद वो भी तो उन सबका बास था। मुझे उसकी बातों से डर लगने लगा कि कही वो किसी और को तो नहीं बुलाएगा ना? मुझे सोचते हुये देखकर वो और जोर से हँसने लगा और उसकी हँसी देखकर में और डर गई।
 
अब्दुल- “कहा ना टेन्शन मत लो, तुम खुद तुम्हारे कपड़े निकालोगी."

उसकी बात सुनते ही मुझे शांति हुई और मेरा डर गायब हो गया।

अब्दुल- “निकालोगी ना रानी?”

मैं- “हाँ..” मैंने हाँ बोलते हुये सिर भी हिलाया।

अब्दुल- “वहां सामने जाकर निकालने हैं. एक तरफ खाली जगह ज्यादा थी उस तरफ इशारा करके अब्दुल ने कहा और फिर वो मेरे ऊपर झुक के मेरे होंठों को चूसने लगा।

थोड़ी देर बाद अब्दुल ने उसका चेहरा ऊपर किया, और कहा- “डान्स करते हुये निकालना.."

मैं- “नहीं, ऐसे ही निकाल देंगी...” मैं धीरे से फुसफुसाई।

अब्दुल- “डान्स करते हुये निकालना है, समझी..” अब्दुल ने उसकी बात दोहराई।

मैंने फिर से 'ना' कहा, मेरी ना सुनकर अब्दुल ने मेरा बायां उरोज जोरों से दबाया और बोला- “मर्दो को लुभाकर उससे चुदवाओ, खूब सुख मिलेगा...”

मैं- “मुझे नहीं आता..”

अब्दुल- “जैसा आता है वैसा करो, हमें कहां उसकी फिल्म बनानी है..” अब्दुल उसकी बात छोड़ नहीं रहा था, तभी घड़ी के डंके सुनाई दिए, पाँच बज गये थे।

मुझे खुशबू का खयाल आया की वो निकल गई होगी अब उसके घर से, तभी मुझे उसका अंतिम फोन याद आया, क्या मालूम हो सकता है वो भी मेरी तरह इमरान की बाहों में भी तो हो सकती है?

अब्दुल- “क्या कहती हो रानी, नाचोगी ना?” अब्दुल ने पूछा।।

मुझे अभी और दो घंटे निकालने थे यहां, ये सोचते हुये मैंने 'हाँ' कह दी। मैं बेड के सामने जो खाली जगह थी उसके बीचोबीच जाकर खड़ी हो गई। मैंने मेरे पल्लू को एक हाथ के ऊपर ले लिया जिससे मेरा ब्लाउज पूरा दिखने लगा। फिर मैंने साड़ी को प्लेट समेत निकाली और फिर कमर के चौतरफा पेटीकोट में खोंसी थी वहां से निकाली और फिर एक कोने में फेंकी। अब मैं ब्लाउज और पेटीकोट में हो गई तो मैंने अब्दुल के तरफ देखा, वो थोड़ा नाराज लगा।

अब्दुल- “खड़े रहकर नहीं निकालना है, डान्स करते हुये निकालो...”

मैंने मेरे हाथों को गोल बनाकर जितने हो सकते थे उतने ऊपर किया और बाद में बायें पैर को मोड़कर दायें पैर की जांघ पे रखा और डान्स की मुद्रा बनाई। मैंने फिर से अब्दुल की तरफ देखा तो उसकी आँखों में मेरे प्रति प्रशन्नता के भाव साफ दिखाई देने लगे।

मैंने मेरा पैर नीचे किया और दोनों पैरों को बारी-बारी थिरकाने लगी, पहले बायें पैर को जमीन पे पाँच बार थिरकाती और फिर दायें पैर को, कभी एक पैर को आगे करके उंगलियों पे नाचती, कभी दूसरे पैर के पीछे की एंडी पर नाचती। मैंने मेरे हाथों की दो उंगलियां को एक दूसरे से लगाकर दूसरी उंगली को सीधी रखकर मेरे जोबन से मेरे चहरे तक लेकर कमर को मटकती हुई मैं थिरकने लगी। फिर मैंने मेरे दोनों हाथों को मेरे स्तन पर रखे, और धीरे-धीरे मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगी।

सारे हुक खुलते ही मेरी ब्रा उजागर हो गई। मैंने ब्लाउज निकालकर अब्दुल की तरफ फेंका। वो ब्लाउज पकड़कर सँघने लगा। मैंने मेरे दोनों हाथों को जांघ पे भिड़ाए, जिससे मैं अब्दुल की तरफ थोड़ा झुक गई। मैं मेरी कमर के ऊपर के भाग को गोल-गोल उसकी तरफ घुमाने लगी। फिर मैं मेरी कमर को हाथ ऊपर-नीचे करके हिलाने लगी। मैंने अब्दुल की तरफ देखा तो, वो उत्तेजित होकर उसकी नाक फुला रहा था। मैंने मेरे पेटीकोट का नाड़ा पकड़ा और कमर हिलाती हुई धीरे-धीरे खींचने लगी, पूरा नाड़ा खुलते ही मैंने उसे छोड़ दिया और पेटीकोट जमीन पे गिर गया और मेरी गोरी-गोरी टाँगें अब्दुल के सामने आ गईं।

मैं अब सिर्फ ब्रा-पैंटी में थी। मैं नाचती हुई अब्दुल के पास गई, अब्दुल ने अपने हाथों को झूला बनाकर मुझे उठाया और फिर मुझे झुलाते हुये किस करके मुझे नीचे उतारा। मैं उसके हाथों को पकड़कर थोड़ा आगे ले गई

और फिर उसके चारों तरफ घूमती हुई नाची और फिर मैं अब्दुल की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई। उसने मेरी ब्रा को खोल दिया। मैं ब्रा को हाथों से पकड़कर थोड़ा आगे सरकी और फिर अब्दुल की तरफ हुई और फिर मैंने मेरे हाथ ऊपर उठा लिए जिससे ब्रा जमीन पे गिरी और मेरे मम्मे अब्दुल के सामने आ गये।
 
अब्दुल नथुने फुलाता हुवा एक हाथ की मुट्ठी बनाकर दूसरे हाथ की हथेली पे मारता हुवा मेरी तरफ आया। मैं रूम में भागने लगी, इस तरफ से उस तरफ, उस तरफ से इस तरफ। थोड़ी ही देर में अब्दुल ने मुझे पकड़ लिया और फिर उठाकर बेड पे लेटा दिया और झुक के मुझे चुंबन करते हुये मेरी पैंटी निकालने लगा। मेरी पैंटी निकलते ही उसने मेरी चूत को सहलाया। सहलाते ही जैसे उसे मालूम पड़ा की मेरी चूत सफाचट है तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वो झुक के ध्यान से मेरी चूत की तरफ देखने लगा और मैं बेड के ऊपर लगाई हुई घड़ी की तरफ, जिसमें पाँच बजकर बीस मिनट हुये थे।

अब्दुल थोड़ा पीछे होता हुवा मेरी चूत के सामने उसका चेहरा ले गया- “हाई तेरी बुर पागल बना देगी मुझे...” ये बोलकर अब्दुल ने अपनी उंगली अंदर डाली, पूरी उंगली अंदर जाने के बाद उसने उस पर थोड़ा दबाब दिया।

जिससे मेरे मुँह में से दर्द के मारे हल्की सी चीख निकल गई।

अब्दुल- “कितने साल हुये तेरी शादी को?”

मैं- "7 साल...”

अब्दुल- “कम चुदी चूत चोदने में बहुत मजा आता है...” फिर अब्दुल ने उसकी उंगली को मेरी चूत में से। निकालकर कहा- “औरत चुदक्कड़ है की नहीं वो उसकी चूत की महक से मालूम होता है...” अब्दुल ने चूत के

अंदर उसकी जबान डालते हुये कहा।

मेरे मुँह से सिसकारी निकल गई। आजकल सेक्स मेरा सबसे पसंदीदा खेल बन चुका है और उसमें चूत चटवाना सबसे मदमस्त खेल है मेरे लिए। अब्दुल ने अपनी जबान मेरी चूत में से बाहर निकाली और फिर चूत के बाहर, चौतरफा जो थोड़ा उभरा हुवा भाग होता है उसे चाटा। थोड़ी देर चाटकर उसने फिर से चूत को चौड़ा किया और अंदर जबान डालकर चाटने लगा। मैंने अब्दुल के बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया, मेरे दोनों पैर खुद-ब-खुद ज्यादा चौड़े हो गये।

अब्दुल की जबान शायद लंबी थी, वो बहुत अंदर तक जाती थी, मेरे मुँह से फूट-फूटकर सिसकारियां निकल रही। थीं। मैं कभी मेरे पैरों को ज्यादा चौड़ा करने की कोशिश करती थी, तो कभी पैरों को बेड पर पटकती थी। अब्दुल एक सेकेंड भी रुके बिना मेरी चूत चोद रहा था। हाँ... अब वो मेरी चूत को उसकी जबान से चाट नहीं रहा था, चोद ही रहा था।

मैं अब मेरे बदन पर काबू खो चुकी थी, जोरों से आवाज लगाती हुई चीखें निकालने लगी थी। और अब्दुल के बालों को जोर-जोर से खींच रही थी, तो बीच में कभी बालों को छोड़कर उसके सिर पे मुक्के भी मार लेती थी। मेरी सांसें इतनी भारी हो गई की मैं अब्दुल के सिर को पकड़कर नीचे धकेलने की नाकाम कोशिश करने लगी। सिर को धकेल ना सकी तो जोर-जोर से उसके सिर को मारने लगी।

मैं- “अयाया चोद अब्दुल ओहह... मैं छूट गई हूँ आहह..”

अब्दुल ने मेरी चूत में से उसकी जबान बाहर निकाली- “हाई रे रानी, चोदने का दिल ही नहीं करता...”

मैं आँखें बंद करके कुछ देर तक ऐसे ही लेटी रही। बाद में आँखें खोलकर देखा तो अब्दुल मुश्कुराता हुवा मुझे ही देख रहा था।

अब्दुल ने उसके पैंट की जीप खोल दी थी, और बोला- “मेरा लण्ड निकालो..."

मैं मुश्कुराई और फिर बोली- “मैं नहीं निकालूंगी...”

अब्दुल- “तो, मैं निकालता हूँ...”

मैं- “हाँ, तुम्हीं निकालो पर डान्स करते हुये, तुम भी अपने कपड़े डान्स करते हुये निकालो...” मैंने कहा।

अब्दुल- “तुम मुझे नाचने को कह रही हो?” अब्दुल का चेहरा देखने लायक था इस वक़्त।

मैंने कहा- “हाँ..."

अब्दुल- “पागल तो नहीं हो गई हो ना?” उसने कड़क लब्जों में पूछा।

मैं- “क्यों?”

अब्दुल- “तुम मुझे नाचने को कैसे बोल सकती हो?” अब्दुल ने कुछ गुस्से से कहा।

मैं- “तुमने मुझे कहा था, तो मैं नाची थी ना?” मैंने शांति से कहा।

अब्दुल- “तो अब तुम्हारे कहने पर मैं नाचूं?” अब्दुल का गुस्सा तो बढ़ता ही जा रहा था, लेकिन वो किसी तरह उसके गुस्से पर काबू रख रहा था।

मैं- “हाँ.."

अब्दुल- “औरतें नाचती हैं, मर्द नहीं नाचते..” अब्दुल ने कहा।

मैं- “वो जमाना चला गया, आजकल के मर्द नाचते हैं औरतों के लिए, अब तो मर्द पैसे लेकर भी नाचने लगे हैं।

औरतों के सामने..” मैंने कहा।

अब्दुल- “तुम मुझसे डान्स कराके बदला तो नहीं ले रही हो ना?” अब्दुल ने सवाल किया।
 
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