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वीरंग- “हाँ... कहा तो है...” भैया ने कहा।
भाभी- “मतलब की आज भी फिक्स नहीं है, कितने दिन हो गये वसीयत बनाने में?” भाभी ने कहा।
वीरंग- “काम तो दो दिन पहले ही शुरू किया है...”
भाभी- “मैं एक महीने से आपको कह रही हूँ की पापा से मैं किसी भी तरह साइन करवा देंगी, लेकिन आप हैं। की..” भाभी गुस्से में थी फिर भी दबी आवाज में बोल रही थी।
वीरंग- “कोई ऐरा-गैरा तो नहीं बना देगा ना? अपनी पहचान वाला होना चाहिए। बाद में किसी को बता दे या हमें ब्लैकमेल करे तो ये सोचकर मैंने अपने दोस्त से वसीयत बनाने की सोची और वो फारेन में था, दो दिन पहले। ही इंडिया में आया, आते ही पहला काम हमारा हाथ में लिया है...”
भाभी- “लेकिन उसके पहले पापा को कछ हो गया तो?"
वीरंग- “देख तू जितना सोचती है उतना आसान नहीं है ये, इसमें दो गवाह की साइन भी लेनी पड़ती है और रजिस्ट्री भी करवाना पड़ता है। इसलिए मैंने मेरे दोस्त को काम दिया है उसकी पहुँच ऊपर तक है...”
भाभी- “वो पुरानी वसीयत जिसमें नीरव भी हिस्सेदर है, वो रेजिस्टर्ड हैं क्या?” हमारा जिकर आते ही मैं और चौंकन्नी हो गई।
वीरंग- “अरे यार, वो रजिस्टर्ड नहीं होती तो क्या टेन्शन था? उसका हिस्सा लेने के लिए तो हमने ये सब किया है, लेकिन तू पापा को जल्दी लपेट न सकी...”
भैया की बात सुनकर मैं चौंक गई- “क्या भाभी और मेरे ससुर? नहीं इसका और कोई मतलब होता होगा...” मैंने सोचा।
भाभी- “तुमने जो कहा वो सब मैंने किया। मेरी एक भी ना ना तूने सुनी थी? मैं अपनी मर्जी से तुम्हारे पापा के साथ सोती नहीं थी, तुम्हारे कहने पर मैंने ये किया था। फिर भी तुम मेरी गलती निकाल रहे हो...” बोलते हुये भाभी की आवाज भारी हो गई थी और मेरा दिमाग।
वीरंग- “चल अब चुप कर, मैं फोन करके पूछता हूँ वसीयत बन गई है की नहीं?” कहकर भैया चुप हो गये और कुछ सेकेंड बाद उनकी आवाज फिर से सुनाई दी- “बन गई, ओके मैं आधे घंटे में ले जाता हूँ...”
भाभी- “बन गई...” भाभी की आवाज सुनाई दी, शायद भैया ने फोन रख दिया होगा।
वीरंग- “हाँ... जानेमन अब जल्दी कर, आज ही खतम कर देते हैं हम अपना काम..” भैया ने कहा।
और मैं सोच में पड़ गई की अब क्या होगा? वसीयत में पापा की साइन हो गई तो हमारा क्या होगा? ऐसे भी नीरव की कोई अहमियत नहीं है इस घर में, साइन हो गई तो भैया और भाभी तो हमें घर से भी निकाल देंगे। मैं जल्दी से वापस किचन के पास आ गई, मैं किसी भी तरह भैया और भाभी को हास्पिटल जाने से रोकना चाहती थी। लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या करूं?
तभी मेरे दिमाग में एक बात आई। मैं किचन के पास वहीं नीचे बैठ गई। थोड़ी देर बाद मेरी सास कमरे से बाहर आई तो मैंने उन्हें झूठ कहा- “मेरा मासिक (पीरियड) आ गया है...”
मासिक में हमारे यहां मंदिर और किचन में नहीं जाते। मेरी बात सुनकर मेरी सास ने पूछा- “वो डोरा?”
मैंने मेरे हाथ की मुट्ठी खोलकर उन्हें डोरा दिखाया।
सास- "हे भगवान्... अब तो ये काम नहीं आएगा... नहीं तो पूजा को भेज देते डोरा बाँधने के लिए...” ।
हम बात ही कर रहे थे तभी भाभी ऊपर से आई, और पूछा- क्या हुवा?
सास- “निशा का मासिक आ गया, अब रसोई की पूरी जिमेदारी तुझ पर आ गई है। एक काम करो मुझे और निशा को खाना दे दो..” मेरी सास ने कहा।
भाभी- “देती हूँ..” कहते हुये भाभी दो थाली लेकर आई।
हम खाना खा ही रहे थे कि वीरंग भैया आए. “जल्दी करो पूजा हमें हास्पिटल जाना है...”
सास- “हास्पिटल पूजा नहीं निशा जाएगी...” मेरी सास ने कहा।
वीरंग- “क्यों?” भैया ने पूछा।
सास- “पूजा हास्पिटल जाएगी तो रसोई कौन बनाएगा? निशा मासिक में है...” मेरी सास ने कहा।
मैंने भैया की तरफ देखा। उनका मुँह लटक गया था।
वीरंग- “ऐसा करो ना मम्मी, हम थोड़ी देर के लिये चले जाते हैं बाद में निशा को भेजना, वो बोर हो जाएगी अकेली...”
सास- “निशा अकेली नहीं जाने वाली, तुम जाओगे उसके साथ। अब दो दिन तक निशा ही वहां रहेगी और तुम दोनों भाई बारी-बारी..” मेरी सास ने अपना हुकुम सुना दिया।
थोड़ी देर बाद मैं और भैया हास्पिटल जाने के लिए निकले, रास्ते में भैया ने फोन भी किया- “मैं बाद में ले जाऊँगा..."
मैं समझ गई थी की वो किस चीज की बात कर रहे हैं।
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भाभी- “मतलब की आज भी फिक्स नहीं है, कितने दिन हो गये वसीयत बनाने में?” भाभी ने कहा।
वीरंग- “काम तो दो दिन पहले ही शुरू किया है...”
भाभी- “मैं एक महीने से आपको कह रही हूँ की पापा से मैं किसी भी तरह साइन करवा देंगी, लेकिन आप हैं। की..” भाभी गुस्से में थी फिर भी दबी आवाज में बोल रही थी।
वीरंग- “कोई ऐरा-गैरा तो नहीं बना देगा ना? अपनी पहचान वाला होना चाहिए। बाद में किसी को बता दे या हमें ब्लैकमेल करे तो ये सोचकर मैंने अपने दोस्त से वसीयत बनाने की सोची और वो फारेन में था, दो दिन पहले। ही इंडिया में आया, आते ही पहला काम हमारा हाथ में लिया है...”
भाभी- “लेकिन उसके पहले पापा को कछ हो गया तो?"
वीरंग- “देख तू जितना सोचती है उतना आसान नहीं है ये, इसमें दो गवाह की साइन भी लेनी पड़ती है और रजिस्ट्री भी करवाना पड़ता है। इसलिए मैंने मेरे दोस्त को काम दिया है उसकी पहुँच ऊपर तक है...”
भाभी- “वो पुरानी वसीयत जिसमें नीरव भी हिस्सेदर है, वो रेजिस्टर्ड हैं क्या?” हमारा जिकर आते ही मैं और चौंकन्नी हो गई।
वीरंग- “अरे यार, वो रजिस्टर्ड नहीं होती तो क्या टेन्शन था? उसका हिस्सा लेने के लिए तो हमने ये सब किया है, लेकिन तू पापा को जल्दी लपेट न सकी...”
भैया की बात सुनकर मैं चौंक गई- “क्या भाभी और मेरे ससुर? नहीं इसका और कोई मतलब होता होगा...” मैंने सोचा।
भाभी- “तुमने जो कहा वो सब मैंने किया। मेरी एक भी ना ना तूने सुनी थी? मैं अपनी मर्जी से तुम्हारे पापा के साथ सोती नहीं थी, तुम्हारे कहने पर मैंने ये किया था। फिर भी तुम मेरी गलती निकाल रहे हो...” बोलते हुये भाभी की आवाज भारी हो गई थी और मेरा दिमाग।
वीरंग- “चल अब चुप कर, मैं फोन करके पूछता हूँ वसीयत बन गई है की नहीं?” कहकर भैया चुप हो गये और कुछ सेकेंड बाद उनकी आवाज फिर से सुनाई दी- “बन गई, ओके मैं आधे घंटे में ले जाता हूँ...”
भाभी- “बन गई...” भाभी की आवाज सुनाई दी, शायद भैया ने फोन रख दिया होगा।
वीरंग- “हाँ... जानेमन अब जल्दी कर, आज ही खतम कर देते हैं हम अपना काम..” भैया ने कहा।
और मैं सोच में पड़ गई की अब क्या होगा? वसीयत में पापा की साइन हो गई तो हमारा क्या होगा? ऐसे भी नीरव की कोई अहमियत नहीं है इस घर में, साइन हो गई तो भैया और भाभी तो हमें घर से भी निकाल देंगे। मैं जल्दी से वापस किचन के पास आ गई, मैं किसी भी तरह भैया और भाभी को हास्पिटल जाने से रोकना चाहती थी। लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की मैं क्या करूं?
तभी मेरे दिमाग में एक बात आई। मैं किचन के पास वहीं नीचे बैठ गई। थोड़ी देर बाद मेरी सास कमरे से बाहर आई तो मैंने उन्हें झूठ कहा- “मेरा मासिक (पीरियड) आ गया है...”
मासिक में हमारे यहां मंदिर और किचन में नहीं जाते। मेरी बात सुनकर मेरी सास ने पूछा- “वो डोरा?”
मैंने मेरे हाथ की मुट्ठी खोलकर उन्हें डोरा दिखाया।
सास- "हे भगवान्... अब तो ये काम नहीं आएगा... नहीं तो पूजा को भेज देते डोरा बाँधने के लिए...” ।
हम बात ही कर रहे थे तभी भाभी ऊपर से आई, और पूछा- क्या हुवा?
सास- “निशा का मासिक आ गया, अब रसोई की पूरी जिमेदारी तुझ पर आ गई है। एक काम करो मुझे और निशा को खाना दे दो..” मेरी सास ने कहा।
भाभी- “देती हूँ..” कहते हुये भाभी दो थाली लेकर आई।
हम खाना खा ही रहे थे कि वीरंग भैया आए. “जल्दी करो पूजा हमें हास्पिटल जाना है...”
सास- “हास्पिटल पूजा नहीं निशा जाएगी...” मेरी सास ने कहा।
वीरंग- “क्यों?” भैया ने पूछा।
सास- “पूजा हास्पिटल जाएगी तो रसोई कौन बनाएगा? निशा मासिक में है...” मेरी सास ने कहा।
मैंने भैया की तरफ देखा। उनका मुँह लटक गया था।
वीरंग- “ऐसा करो ना मम्मी, हम थोड़ी देर के लिये चले जाते हैं बाद में निशा को भेजना, वो बोर हो जाएगी अकेली...”
सास- “निशा अकेली नहीं जाने वाली, तुम जाओगे उसके साथ। अब दो दिन तक निशा ही वहां रहेगी और तुम दोनों भाई बारी-बारी..” मेरी सास ने अपना हुकुम सुना दिया।
थोड़ी देर बाद मैं और भैया हास्पिटल जाने के लिए निकले, रास्ते में भैया ने फोन भी किया- “मैं बाद में ले जाऊँगा..."
मैं समझ गई थी की वो किस चीज की बात कर रहे हैं।
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