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Adultery Chudasi (चुदासी )

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मैं- “वो... वो आपका..” मैंने फिर मस्ती की।

जीजू- “क्यों तड़पा रही हो बताओ ना...” जीजू ने कहा।

मैं- “आपके लिंग की..” मैंने शर्माते हुये धीरे से कहा।

जीजू- “हाय... मर जाऊँ तेरी इस अदा पर। कब मिलती हो? कहो तो लेने आ जाऊँ?” जीजू ने पूछा।

मैं मिलना तो चाहती थी जीजू को, पर दीदी के बारे में सोचकर मैंने दिल पर पत्थर रखते हुये जीजू से झूठ कहा- “जीजू मेरा मासिक आ गया है...”

जीजू ने मेरी बात सुनकर ढीली आवाज में कहा- “अरे यार, तुम्हारा मासिक भी अभी ही आने वाला था। तुम तो कल जाने भी वाली हो ना..."

मैं- “हाँ जीजू, आपकी याद बहुत आएगी...” मैंने कहा।

जीजू- “मुझे भी, चलो बाइ...” कहते हुये जीजू ने फोन काट दिया।

उस दिन रात को भी मैंने जीजू के बारे में सोचते हुये मास्टरबेट किया और झड़ने के बाद मैं सो गई।

सुबह नीरव का फोन आया की वो 6:00 बजे आने वाला है तो पैकिंग करके रखना। शाम को नीरव के आते ही हम खाना खाकर स्टेशन के लिए निकल गये। जीजू और दीदी भी हमें मिलने आए थे, जो हमें उनकी गाड़ी में स्टेशन छोड़ने आए। नीरव जीजू के साथ आगे की सीट पर बैठा बातें कर रहा था और मैं और दीदी पीछे बैठी बातें कर रही थीं। स्टेशन आते ही जीजू भी हमारे साथ उतरे। जीजू ने 2-3 बार मुझे इशारा किया की मैं किसी भी बहाने से साइड में जाऊँ और वो वहां आएंगे। पर मेरी हिम्मत नहीं हुई और उनकी बात समझकर भी मैं नासमझ बनी रही।

रात के 5:00 बजे हम राजकोट पहुँचे और हम आटो लेकर घर गये, कांप्लेक्स में दाखिल होते ही देखा की रामू जमीन पर सिर्फ एक चड्डी पहनकर सोया हुवा था। नंगा रामू सोते हुये किसी राक्षस जैसा लग रहा था।

नीरव- “ये हमारा रात का चौकीदार देखो कैसे सो रहा है?” नीरव लिफ्ट में दाखिल होते हुये चिढ़कर बोला।

घर के अंदर दाखिल होते ही मैं सीधी बेडरूम में गई। मैंने जो ड्रेस पहना था, वो मुझे ज्यादा ही फिट हो रहा था इसलिए मुझे वो जल्दी ही चेंज करना था। नीरव ने सामान घर के अंदर लिया, दरवाजे को लाक करके अंदर

आया, तब तक मैं नंगी हो गई थी। उसने शर्ट निकाला और जैसे ही नाइट टी-शर्ट पहनने गया तो मैंने कहाबाद में पहनना यहां आओ ना...”

नीरव नजदीक आते हुये बोला- “बहुत थका हुवा हूँ निशु..”

मैं- “5 दिन के बाद मिल रहे है और तुम हो की.....” मेरी बात अधूरी रह गई।

नीरव ने मेरे होंठों पर अपने होंठ चिपका दिये थे। हम दोनों एक दूसरे के होंठ चूसते हुये बेड पर लेट गये। बेड पर लेटते ही नीरव ने मुझे उल्टा कर दिया, और मेरी कमर पर चुंबन किया फिर थोड़ा ऊपर-ऊपर करते हुये नीरव मेरी गर्दन तक चुंबन करता रहा। मैं रोमांचित हो उठी, और मैं पलट गई। मैंने नीरव को मेरी तरफ । खींचकर उसकी गर्दन को मैंने बाहों में ले लिया। हम दोनों के चेहरे के बीच सिर्फ दो इंच जगह थी।

मैंने एक हाथ नीचे की तरफ करके उसकी पैंट की चैन खोलते हुये कहा- “तुम्हारी पैंट निकाल दो?”

नीरव ने मुझे किस करते हुये उसकी पैंट निकाल दी, और फिर नीचे झुक के मेरे उरोजों को चूसते हुये मेरी चूत के होंठों से खेलने लगा। मेरे मुँह से धीरे-धीरे सिसकारियां फूटने लगी थीं। नीरव ने अपनी उंगली मेरी योनि के अंदर दाखिल की।

तो मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा- “ऊपर आकर करो ना..."

नीरव मेरी दोनों टांगों के बीच आ गया और उसका लिंग मेरी योनि में डालने की कोशिश करने लगा। मैंने मेरा हाथ नीचे किया और नीरव का लिंग पकड़कर मेरी योनि पर टिकाकर रखा। नीरव ने धक्का देना चालू किया। उसका लिंग सरलता से अंदर चला गया, क्योंकी मेरी योनि बहुत ज्यादा ही गीली हो गई थी। नीरव ने चार-पाँच धक्के लगाए और उसकी सांसें भारी होने लगीं। नीरव ने कहा- “निशु मेरा छूटने वाला है, तुम भी जल्दी करो

ना..."

 
नीरव मेरी दोनों टांगों के बीच आ गया और उसका लिंग मेरी योनि में डालने की कोशिश करने लगा। मैंने मेरा हाथ नीचे किया और नीरव का लिंग पकड़कर मेरी योनि पर टिकाकर रखा। नीरव ने धक्का देना चालू किया। उसका लिंग सरलता से अंदर चला गया, क्योंकी मेरी योनि बहुत ज्यादा ही गीली हो गई थी। नीरव ने चार-पाँच धक्के लगाए और उसकी सांसें भारी होने लगीं। नीरव ने कहा- “निशु मेरा छूटने वाला है, तुम भी जल्दी करो

ना..."

मैंने मेरे हाथों को उसकी गर्दन के चौतरफा लपेटकर खींचा और उसके होंठ मेरे होंठों की गिरफ्त में ले लिए। नीरव ने और दो धक्के लगाए और वो झड़ गया। उसके वीर्य से मेरी योनि भर गई।

नीरव- “बहुत दिन बाद इस तरह से किया ना निशु... इसलिए कि मैं बहुत ही उत्तेजित हो गया था..." नीरव ने मेरे ऊपर से उठते हुये कहा।

मेरा मूड खराब हो गया था इसलिए कोई जवाब दिए बगैर मैंने गाउन उठाकर पहन लिया और तभी बेल बजी, और मैं दूध लेने उठी। मैं दूध लेकर वापिस आई तब तक तो नीरव सो भी गया था। थकान की वजह से नीरव 2:00 बजे सोकर उठा और 3:00 बजे आफिस जाने के लिए निकला।

थोड़ी देर बाद मेरी फ्रेंड रीता का फोन आया- “निशा दीदी अहमदाबाद आई और मिले बिना ही भाग गई...”

मैं- “मैं आने वाली थी, पर समय ही नहीं मिला...” मैं जानती थी कि उसको चाहे कितना ही समझाओ वो समझने वाली नहीं थी।

रीता- “एक फोन भी नहीं किया और मिलने वाली थी... फोन करती ना तो मैं मिलने आ जाती..” उसने नाराजगी से कहा।

मैं- “ऐसी बात नहीं है, मैं तुझसे मिलने आने वाली थी, पर काम आ गया तो आ ना सकी। तुझे किसने बताया की मैं आई थी?” मैंने रीता को समझाते हुये पूछा।

रीता- “तू मिलने नहीं आओगी तो मालूम नहीं पड़ेगा क्या? सुबह मम्मी मिली थी उन्होंने बताया...” रीता का गुस्सा अभी खतम नहीं हुवा था।

मैं- “सारी कहा ना, कान पकडूंगी तो ही माफी दोगी क्या?” मैंने मस्ती में कहा।

रीता- “चलो माफ किया, कहो तुम्हारे मिट्ठू मियां कैसे हैं?” रीता भी मजाक के मूड में आ गई।

मैं- “मजे में है नीरव, तूने ढूँढ़ा की नहीं अपने लिए कोई मिट्ठू मियां?” मैंने पूछा।

रीता- “नहीं यार। पहले मुझे कोई पसंद नहीं आ रहा था और अब मुझे कोई पसंद नहीं कर रहा...” रीता ने निराशा के सुर में कहा।

मैं- “क्यों?” मैंने पूछा।

 
रीता- “बस आजकल के लड़कों को 28 साल की लड़की बड़ी लगने लगी है, और बता क्या चल रहा है?” उसने टापिक चेंज करते हुये पूछा।।

मैं- “बस, मेरा तो क्या रूटीन चल रहा है, तू अपनी बता?” मैंने पूछा।

रीता- “मेरा भी वोही हाल है, वो विजय मिला था याद है ना?” रीता ने पूछा।

मैं- “हाँ याद है। कहां मिला था?” और मुझे कालेज का लास्ट दिन याद आ गया।

रीता- “मैं बाजार जा रही थी, तो गाड़ी लेकर आ गया। तेरे बारे में पूछा तो मैंने बहुत भला बुरा कहा...” रीता ने कहा।

सुनकर मैं उत्तेजित हो गई और पूछा- “उसने तुझे कुछ नहीं कहा?”

रीता- “धमकियां दे रहा था मुझे की तेरी नथ मैं ही उतारूँगा... मैं कहां डरने वाली थी, मैंने भी गालियां दी तो भाग गया.” रीता ने गुस्से से कहा।

मैं- “हाँ, तेरी तो बात ही निराली है, तू हंटरवाली जो है। तेरी बातों में भूल गई की मुझे सब्जी लेने जाना है। मैं फोन रखती हूँ..” मैंने कहा।

रीता- “तुम्हें तो कभी फुरसत ही नहीं मिलती, चलो बाइ..” कहकर रीता ने फोन काट दिया।

रीता के साथ बात होने के बाद, मुझे मेरी कालेज लाइफ याद आ गई। कितने सुहाने दिन थे वो, बहुत मौजमस्ती करते थे हम, ना कोई रोक-टोक, ना कोई झिक-झिक और ना ही कोई टेन्शन। टेन्शन रहता तो सिर्फ इतना रहता की कभी ना कभी हमें भी यहां से जाना पड़ेगा। मेरी और रीता की जोड़ी पूरे कालेज में मशहूर थी।

उसकी कछ वजह भी थी, एक तो मैं और रीता हर समय साथ ही रहती थीं, कभी किसी ने हम दोनों में से किसी को अकेला नहीं देखा था। हम दोनों में से कोई एक ना आने वाला हो तो दूसरा भी उस दिन नहीं आता था। दूसरी वजह मैं थी, क्योंकी कालेज में स्टूडेंट तो क्या सारे प्रोफेसर भी मुझे पहचानते थे और मेरे बारे में जानने की कोशिश करते रहते थे, और उसका पूरा लाभ रीता उठाती थी। मेरी बदौलत वो इनकमिंग चार्ज के जमाने में भी मोबाइल इश्तेमाल करती थी। जो लड़के मुझसे दोस्ती करना चाहते थे, वो रीता को मिलते तो रीता उनसे मोबाइल का रीचार्ज करवाती, या फिल्मों की टिकेट मँगवाती, या कभी स्कूटी में पेट्रोल डलवाती। फिर भी। मेरी अच्छी चाहने वाली पक्की सहेली थी। मुझे कभी ना कहती की तुम मेरे लिए ये लड़के से दोस्ती करो, और हमेशा मुझे लड़कों से दूर रहने की हिदायत देती रहती।।

मैं पढ़ने में बहुत कमजोर थी क्योंकी बचपन से ही सबकी बातें सुन-सुनकर मेरे दिमाग में घर कर गया था की मैं इतनी खूबसूरत हूँ की मुझे सबसे अच्छा और धनवान पति मिलने वाला है, इसलिए मुझे कहां नौकरी करनी है जो मैं पढ़ाई करूं?

बचपन की बातें याद आते ही मैं मन ही मन मेरी उस वक़्त की नासमझी पर हँस पड़ी और फिर से पुरानी यादों में खो गई। खूबसूरत तो मैं थी ही, जीजू जब दीदी को देखने आए थे तब मम्मी ने मुझे हिदायत दी थी की मैं । कहीं बाहर ना आ जाऊँ, और जीजू की नजर में ना चढ़ जाऊँ। दीदी बहुत ही खूबसूरत थी, पर सभी कहते थे की जब तक सामने वाला मुझे देख ना ले तब तक ही दीदी उन्हें खूबसूरत लगती थी।

रीता भी हमेशा मजाक में कहती रहती थी- “तू साथ होती है ना तो मैं सेफ रहती हूँ, लड़के तुझे ही देखते रहते हैं। मैं तो किसी की नजर में ही नहीं आती...”

 
दिल की बहुत अच्छी थी रीता, उसे कभी ईर्ष्या नहीं होती थी मेरी। रीता के माँ-बापू गाँव में रहते थे। वो यहां उसके भाई भाभी के साथ रहती थी। उसका भाई पोलिस आफिसर था। एक बार हम सब्जी मंडी में गये थे और वहां एक लफंगा हमारे पीछे पड़ गया। ना जाने दस ही मिनट में अमित भाई (रीता का भाई) कहां से आ गये और लफंगे को इतनी धोया की उसे दिन में तारे नजर आ गये होंगे।

दूसरे दिन रीता से मिलते ही मैंने पूछा- “कल भैया वहां कैसे आ गये?”

मेरी बात सुनकर रीता मूड में आ गई- “भैया ने मेरे ऊपर कैमरे लगाए हैं, मैं जो करती हूँ उन्हें मालूम पड़ जाता है, और मुझ पर मुशीबत आती है ना तब भैया मुझे बचाने के लिए सुपरमैन की तरह आ जाते हैं..”

रीता की बात सुनकर मैं अकड़ गई- “बताना हो तो बताओ, नहीं तो मैं जाती हूँ...” मैंने खड़े होते हुये कहा।

रीता ने मेरा हाथ पकड़ा- “बैठ यार, इसने भैया को बुलाया...” कहते हुये रीता ने मुझे मोबाइल दिखाया।

मैं- “मोबाइल से तुमने कब फोन किया था भैया को?” मुझे उसकी बात हजम ना हुई।

रीता- “ये देख...” कहकर रीता ने मोबाइल में कुछ बटन दबाकर मेरे हाथ में दिया। मैंने मोबाइल हाथ में लिया

और देखा तो मोबाइल में कुछ लिखा था, मैं वो पढ़ने लगी।

1. घर 2. कालेज 3. कंप्यूटर क्लासेस 4. निशा का घर 5. सब्जी मंडी 6. रिलीफ रोड 7. बस नंबर 142

मैंने ये सब पढ़ा तो सही, पर समझ में कुछ नहीं आया। ये बात उस समय की है जब ज्यादातर लोगों के पास मोबाइल नहीं होता था और हमारे घर पे तो लैंडलाइन भी नहीं था- “इससे कैसे भैया आ गये?” मैंने पूछा।

रीता ने मेरे हाथ से मोबाइल लिया और कहा- “मोबाइल के अंदर मेसेज बाक्स होता है उसके अंदर ड्राफ्ट्स का फोल्डर होता है जिसमें हम मनचाहे मेसेज सेव करके रख सकते हैं। मैंने वहां पर, मैं ज्यादातर जिस जगह पर जाती हूँ उस जगह का नाम लिखकर सेव किया हुआ है, जो तुमने अभी देखे। और कभी कोई नई जगह पर । जाने वाली होती हैं तो उस जगह का नाम ये खाली रखी लाइन पर लिखकर सेव कर लेती हैं। ये करने को मुझे भैया ने ही कहा है। अब कल वो लड़के ने हमें परेशान किया तो मैंने मोबाइल को ऐसे दो बार दबाया तो मैं ड्राफ्ट्स में आ गई। फिर सब्जी मंडी पर करके वही बटन दबाया तो मेसेज तैयार हो गया और कान्टैक्टस में । भैया का नंबर और नाम सबसे पहले है तो वही बटन फिर से दबाते ही मेसेज भैया को भेज दिया। मेसेज पाते ही भैया समझ गये की मैं किसी तकलीफ में हैं। जगह का नाम तो मेसेज में लिखा ही था। भैया वहां आ गये और उस लड़के की पिटाई की। ये सब घर पे भैया ने मुझसे इतनी बार करवाया है की मैं देखे बिना भी कर सकती हूँ, और मोबाइल पाकेट के अंदर होता है तब भी भैया को मेसेज भेज सकती हैं। पर भैया ने मुझे हिदायत दी है की मैं ये मेसेज तभी उन्हें कर सकती हूँ, जब मुझे कोई मुशीबत या तकलीफ हो...”

 
रीता ने मुझे विस्तार से समझाया पर मैं ज्यादा समझी नहीं थी- “मेरी सहेली पर कोई तकलीफ कभी ना आए...” मैंने लगनी भरे लब्जों में कहा।

रीता ने कहा- “वो हमारे हाथ में कहां है? पर तू ये बता की समझी कि नहीं समझी?"

मैंने ऐसे ही “हाँ” में सिर हिला दिया।

रीता- “वो तो मुझे ट्राई करनी थी की भैया आते हैं की नहीं? बाकी उसके जैसे 2-3 को तो मैं अकेली ही भारी पड़ती...” रीता ने अपनी बड़ाई करते हुये कहा।

मैं- “हाँ, तुम हंटरवाली जो ठहरी। पूरी कालेज तुझसे डरता है...” मैंने उससे हाथ जोड़ते हुये कहा।

थोड़े दिन बाद

रीता- “निशा वो पेड़ के नीचे लड़का खड़ा है ना उसको देख तो?” रीता ने कालेज के कंपाउंड के पेड़ के नीचे खड़े लड़के की तरफ उंगली करते हुये मुझसे कहा। रीता के कहने पर मैंने पेड़ की तरफ नजर डाली तो वहां जो लड़का खड़ा था, वो हमारी तरफ ही देख रहा था।

मैं- “क्या दिखा रही हो? वो हमें ही देख रहा है, हमारे बारे में क्या सोचेगा?” मैंने मेरी नजर उसपर से हटाते हुये रीता को नाराजगी से कहा।

रीता मेरी बात सुनकर हँसते हुये बोली- “वो हमें देख रहा है इसीलिए तो मैं तुझे दिखा रही हूँ... वो महाशय कैसे लगते हैं, ध्यान से देखकर बता ना...”

मैंने फिर से उस लड़के पर नजर डाली, लड़का मध्यम क़द का दुबला सा था और आँखों पर चश्मा लगाए हुये था- “ठीक है, सीधा-सादा लग रहा है...” मैंने कहा।

रीता- “वो तुमसे दोस्ती करना चाहता है.” रीता ने फिर हँसते हुये कहा।

मैं- “तुझे किसने बताया?” मैं समझ गई थी की रीता को उसी ने बताया होगा, पर मैं रीता के मुँह से सुनना चाहती थी।

रीता- “उसी ने बताया, और कौन बताएगा?” रीता ने कहा।

मैंने सवाल किया- “तो फिर तुमने उससे क्या कहा?”

रीता- “मैंने तो पहले उसे ना ही बोल दिया की मैं निशा से कुछ नहीं कहूँगी, पर उसने मुझसे बहुत रिकवेस्ट की तो मैं तुझे बता रही हूँ..” रीता ने अपनी सफाई दी।

मैं- “तुमने मुझे ये सब बताने की रिश्वत कितनी ली?” मैंने रीता को चिढ़कर पूछा।

मेरी बात सुनकर रीता हँसते हुये बोली- “पोलिस वाले की बहन हूँ, रिश्वत तो लँगी ही समझी... 500 का रिचार्ज करवाया। बहुत बड़ा आशिक है तेरा...”

मैंने गंभीरता से रीता को कहा- “तुम्हारी ये आदत हम पर कभी भी भारी पड़ सकती है..."

रीता- “तू यार, बहुत डरती है और मैं किसी भी लड़के से एकाध बार पैसे लेकर कह देती हूँ की निशा ने ना बोल दिया है, और बिचारों का दिल टूट जाता है, और फिर मुझे कभी नहीं मिलते...” रीता ने फिर से अपनी सफाई में कहा।

 
हम बात कर ही रहे थे, तभी एक कोने में से झगड़े की आवाज आई। मैं और रीता उस तरफ गये, जहां पर । लड़ाई हो रही थी, बहुत भीड़ थी। हम किसी तरह भीड़ चीरकर आगे गये तो देखा की हमारे कालेज के ट्रस्टी का बेटा विजय, जो संजय दत्त जैसा दिखता है और पूरे वक़्त कालेज में टपोरीगिरी करता रहता है, किसी बुजुर्ग को मार रहा था, और वो बुजुर्ग उससे हाथ जोड़कर माफी माँग रहा था।

मैं- “क्या हुवा?” मैंने वहां पहले से ही खड़ी एक लड़की को पूछा।

वो लड़की कोई जवाब दे उसके पहले ही रीता बोल पड़ी- “ये तो विजय का हर रोज का लफड़ा है, बाप नंबरी तो बेटा दस नंबरी...” मैंने उसे चुप रहने का इशारा किया।

तभी एक लड़की जोरों से रोती हुई वहां आई और विजय के पैरों पर गिरकर कहने लगी- “प्लीज़्ज़... विजय छोड़ दो मेरे पापा को प्लीज़... गलती हो गई पापा से...” ।

रीता- “यार ये तो पिंकी है ना?” रीता ने मुझसे पूछा।

मैं- “हाँ, लगती तो वही है, पर वो तो विजय की खास फ्रेंड है ना?” मैंने कहा।

हमारी बात सुनकर वो लड़की ने कहा- “कल पिंकी से विजय ने कुछ बदसलूकी की होगी, तो पिंकी के पापा प्रिन्सिपल से शिकायत करने गये थे। जैसे ही पिंकी के पापा सर की केबिन से बाहर निकले कि विजय वहां आ गया और घसीटता हुवा यहां तक लाया और मारने लगा...” लड़की ने अपनी बात पूरी की।

तब रीता ने पूछा- “पर विजय को इतनी जल्दी कैसे मालूम पड़ गया की पिंकी के पापा उसकी शिकायत करने गये हैं?”

मैं- “चल छोड़... अपने को क्या?” कहते हुये मैंने रीता का हाथ पकड़ा और हम भीड़ से बाहर निकल गये।

विजय हमारी कालेज का स्टूडेंट प्लस गुंडा था। उसके पापा शहर के नामी राजकर्मी थे साथ में कालेज के ट्रस्टी भी थे, इसलिए कालेज में कोई विजय को कुछ नहीं कर सकता था। हर वक्त विजय लुच्चों के साथ घूमता हुवा कालेज में दादागिरी करता रहता था। अगर विजय किसी से डरता था तो सिर्फ मेरी हंटरवाली सहेली से डरता था।

कालेज के शुरुवाती दिनों में मैं और रीता कैंटीन में जा रहे थे तो उसने हमारा रास्ता रोक लिया। पर वो रीता को जानता नहीं था (उस वक़्त हम भी उसे जानते नहीं थे) वो कुछ ज्यादा करे उसके पहले रीता ने उसके गाल पे एक थप्पड़ मार दी। उस दिन से आज का दिन विजय ने हमारे सामने आँख उठाकर देखा तक नहीं था। उसके बाद मैं कभी-कभार रीता को उस लड़के के साथ बात करते देखती थी, जिसने उस दिन 500 का रिचार्ज करवा दिया था। जब भी रीता उससे मिलकर आती थी, तब बहुत ही खुश दिखती थी क्योंकी वो लड़का उसे हर बार 200-300 देता रहता था।

रीता आकर मुझे बताती तो मैं उसे डांटती- “क्यों लेती हो पैसे? तुम कह रही थी ना की मैं किसी भी लड़के से एक बार ही पैसे लेती हूँ, तो इससे क्यों ले रही हो? इसे भी सच-सच बता दो...”

रीता कहती- “मैंने उससे बताया की निशा तुमसे दोस्ती नहीं करना चाहती, तो कह रहा है की मुझे सिर्फ 5 मिनट मिला दो निशा से, और पैसे मैं नहीं मांगती वो खुद दे रहा है...”

मैं- “पर तुम क्यों लेती हो? ना भी बोल सकती हो ना?” मैंने चिढ़कर कहा।

पर मेरी बात का रीता पर कोई असर नहीं होता और वो बेशर्मी से हँसते हुये कहती- “आई हुई लक्ष्मी को कौन ठुकराएगा? पर लड़का दिल का अच्छा है, तुझे एक बार उससे मिलना चाहिए...”

 
तभी बेल बजी और मैं अतीत की यादों में से बाहर निकली। उठकर मैंने दरवाजा खोला, पर दरवाजे पर तो कोई नहीं था। मैंने बाहर निकलकर भी देखा की शायद कोई बेल बजाकर जा रहा हो, पर कोई नहीं था। मैं अंदर जाकर दरवाजा बंद कर ही रही थी की गुप्ता अंकल की आवाज आई- “कब आई बिटिया?"

मैं मन ही मन बोली- “साला बूढ़ा, आजकल बिटिया-बिटिया करने लगा है, पहले तो नहीं कहता था...”

मैंने चाचा को कहा- “आज ही आई, ये बेल किसने बजाई अंकल?"

अंकल- “मैंने...” अंकल ने कहा।

मैं- “आपने, क्यों?” मैंने पूछने में गलती कर दी।

अंकल- “वाह री बिटिया, और कोई बजाए तो कुछ नहीं बोलती और हम बजाएं तो आँखें निकालती हो। हम बजाये तब दूसरे के जितना मजा नहीं आता क्या?”

साला हरामी हर बार डबल मीनिंग में बोलता रहता है। गुस्सा तो मुझे बहुत आया पर मैंने दिमाग को ठंडा रखते हुये कहा- “अंकल ऐसी बात मत कीजिए, नहीं तो मुझे आपके बारे में आंटी से बात करनी पड़ेगी...”

अंकल- “क्यों क्या बात करोगी आंटी से की मैं बजाता हूँ..”

मैंने अंकल की बात पूरी हो उसके पहले ही जोर से दरवाजा बंद कर दिया।

बाहर से अंकल की आवाज आ रही थी- “बिटिया, हम कुछ भी करें तुम्हें पसंद ही नहीं आता। मैं बजाऊँ या और कोई बजाए, ये बेल की आवाज की तरह मजा तो एक सरीखा ही आता है...”

मैं- “साला हरामी बूढ़ा...” कहते हुये मैं बेडरूम में जाकर बेड पे लेटकर फिर से पुरानी यादों में खो गई।

आज कालेज का आखिरी दिन था, ज्यादातर दोस्त आज के बाद दो महीने बाद मिलने वाले थे, और लास्ट साल वाले तो फिर कब मिलेंगे वो किश्मत के आधीन था। लेकिन मैं और रीता तो छुट्टयों में भी हर रोज मिलते थे।

आज सुबह से रीता एक ही रट लगाए बैठी थी की मैं उस लड़के से मिलू, वो मुझसे 5 मिनट के लिए मिलना चाहता है। बहुत बहस के बाद मैं रीता की बात मानकर उस लड़के से मिलने को तैयार हो गई।

मैं- “मुझे उसका नाम भी नहीं पता...” मैंने रीता से कहा।

रीता- “विकास नाम है, तुमने पूछा नहीं और मैंने बताया नहीं तो तुझे कैसे पता होगा?”

मैं- “बुला लो उसको, 5 मिनट बात कर लेती हूँ मैं..” मैं जल्दी-जल्दी बात को खतम करना चाहती थी।

रीता- “उसने 3:30 बजे बोला है...” रीता ने कहा।

मैं रीता की बात सुनकर चौंक गई- “3:30 बजे क्यों? उस वक़्त तो कालेज भी बंद हो गया होगा, और मैं कहीं बाहर नहीं मिलूंगी..."

रीता मेरी बात सुनकर हँसने लगी- “तुम तो यार बहनजी ही रह गई, विकास तुम्हें अभी ही मिल लेता, पर उसको किसी अर्जेंट काम से जाना पड़ा और वो तुम्हें यहां ही मिलने आ रहा है...”

फिर भी मेरे दिल ने सांसें नहीं छोड़ी- “3:30 बजे तो कालेज बंद हो जाएगा ना?"

मुझे जवाब देते-देते रीता थक गई थी, उसने मुझसे हाथ जोड़ते हुये कहा- “मेरी माँ कालेज के पीछे वाली जगह पर मिलना है, और वहां छोटा गेट है जहां से कूदकर हम बाहर निकल सकते हैं...”

 
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