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दीदी ने आज मेरे साथ जो सलूक किया है वैसा आज तक मेरे साथ किसी ने नहीं किया था। दुश्मन भी न करे, वैसा दीदी ने काम किया था। दीदी का फोन रखा तब से मैं रो रही थी। पर अब मेरी आँखों में से आँसू निकलने बंद हो गये थे, शायद खतम हो गये थे या सूख गये थे।
कल मेरे ससुर ने हमें अपने ही घर आने को ना बोल दिया, वो घर हमारा भी तो था। और आज दीदी ने न जाने क्या-क्या बोल दिया? रंडी बना दिया मुझे। वो मुझसे 4 साल ही बड़ी हैं, पर मैंने उन्हें आज तक नाम से नहीं बुलाया, हमेशा दीदी कहकर ही पुकारती थी। बचपन से लेकर जवानी तक हम दोनों शायद कभी ही जुदा हुई होंगी। मैंने जो किया था उनके लिए तो किया था और उन्होंने मुझ पर इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा दिया। तभी मुझे टिफिन का खयाल आया। अगर मुझे नीरव को टिफिन नहीं भेजना होता तो मैं आज रसोई नहीं बनाती।
मैं खड़ी होकर किचन में गई। धीरे-धीरे रसोई बनाने लगी। कब 12:00 बज गये मालूम ही नहीं पड़ा। शंकर टिफिन लेने आ गया, तब तक रसोई तैयार नहीं थी। मैंने उसे सीढ़ियों पर बैठने को कहा और जल्दी-जल्दी रसोई करके टिफिन भर के उसे देने गई। उस दिन शंकर के साथ जो हुवा था तब से मैं टिफिन बाहर ही लटका देती। थी। शंकर वहां से लेकर निकल जाता था। उस दिन के बाद आज पहली बार मैं शंकर को हाथों में हाथ टिफिन दे रही थी।
जैसे ही मैंने शंकर के हाथों में टिफिन दिया और उसने आजू-बाजू में देखा तो सामने गुप्ता अंकल का घर बंद देखा और फिर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं उसकी हिम्मत देखकर सन्न हो गई और जल्दी ही कोई । प्रतिक्रिया ना दे सकी। 10 सेकेंड बाद मैंने मेरा हाथ उसके हाथ से छुड़ाया और दरवाजा बंद करने लगी।
तब उसने दरवाजा पकड़ लिया और बोला- “मेडमजी कभी हमें भी मोका दे दो...”
मैंने जोर से दरवाजा खींचा तो हाथ कटने के इर से उसने दरवाजा छोड़ दिया, और मैंने दरवाजा बंद कर दिया। इतनी मेहनत के बाद मैं हाँफ गई थी तो मैं सोफे पर बैठकर जोरों से हाँफने लगी।
रामू के आने के बाद मैं बेडरूम में चली गई, साड़ी निकालकर गाउन पहनकर बेड पर लेट गई। मैंने सोने के लिए आँखें बंद की तो एक तरफ मुझे मेरे ससुर खड़े दिखे- “तेरी वजह से मेरा बेटा चोर बन गया। तुमने उसे उकसाया था। तुम्हारे मम्मी-पापा हमारे पैसे पर जी रहे हैं.”
उनकी बाजू में नीरव खड़ा था और उनकी बात सुनकर वो भी मुझसे कहने लगा- “हाँ, हाँ तुम्हारी वजह से ही मुझे मेरा घर छोड़ना पड़ा तुम्हारी वजह से ही...” मैं नीरव की बात सुनकर रोने लगी।
तभी दूसरी तरफ दीदी दिखाई दी- “इतनी ही आग है तेरे जिम में तो किसी दूसरे को हँसा ले, मेरे घर में ही क्यों आग लगा रही हो?” दीदी गुस्से में मुझे बोले जा रही थी, और उसके पीछे जीजू खड़े मेरे सामने देखकर मुकुरा रहे थे।
मैं और जोरों से रोने लगी। तभी बेडरूम के दरवाजे को थपथापने की आवाज आई। मैंने अपने आपको संभाला।
बाहर से रामू की आवाज आई- “जा रहा हूँ मेमसाब, दरवाजा बंद कर लीजिएगा..."
कल मेरे ससुर ने हमें अपने ही घर आने को ना बोल दिया, वो घर हमारा भी तो था। और आज दीदी ने न जाने क्या-क्या बोल दिया? रंडी बना दिया मुझे। वो मुझसे 4 साल ही बड़ी हैं, पर मैंने उन्हें आज तक नाम से नहीं बुलाया, हमेशा दीदी कहकर ही पुकारती थी। बचपन से लेकर जवानी तक हम दोनों शायद कभी ही जुदा हुई होंगी। मैंने जो किया था उनके लिए तो किया था और उन्होंने मुझ पर इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा दिया। तभी मुझे टिफिन का खयाल आया। अगर मुझे नीरव को टिफिन नहीं भेजना होता तो मैं आज रसोई नहीं बनाती।
मैं खड़ी होकर किचन में गई। धीरे-धीरे रसोई बनाने लगी। कब 12:00 बज गये मालूम ही नहीं पड़ा। शंकर टिफिन लेने आ गया, तब तक रसोई तैयार नहीं थी। मैंने उसे सीढ़ियों पर बैठने को कहा और जल्दी-जल्दी रसोई करके टिफिन भर के उसे देने गई। उस दिन शंकर के साथ जो हुवा था तब से मैं टिफिन बाहर ही लटका देती। थी। शंकर वहां से लेकर निकल जाता था। उस दिन के बाद आज पहली बार मैं शंकर को हाथों में हाथ टिफिन दे रही थी।
जैसे ही मैंने शंकर के हाथों में टिफिन दिया और उसने आजू-बाजू में देखा तो सामने गुप्ता अंकल का घर बंद देखा और फिर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं उसकी हिम्मत देखकर सन्न हो गई और जल्दी ही कोई । प्रतिक्रिया ना दे सकी। 10 सेकेंड बाद मैंने मेरा हाथ उसके हाथ से छुड़ाया और दरवाजा बंद करने लगी।
तब उसने दरवाजा पकड़ लिया और बोला- “मेडमजी कभी हमें भी मोका दे दो...”
मैंने जोर से दरवाजा खींचा तो हाथ कटने के इर से उसने दरवाजा छोड़ दिया, और मैंने दरवाजा बंद कर दिया। इतनी मेहनत के बाद मैं हाँफ गई थी तो मैं सोफे पर बैठकर जोरों से हाँफने लगी।
रामू के आने के बाद मैं बेडरूम में चली गई, साड़ी निकालकर गाउन पहनकर बेड पर लेट गई। मैंने सोने के लिए आँखें बंद की तो एक तरफ मुझे मेरे ससुर खड़े दिखे- “तेरी वजह से मेरा बेटा चोर बन गया। तुमने उसे उकसाया था। तुम्हारे मम्मी-पापा हमारे पैसे पर जी रहे हैं.”
उनकी बाजू में नीरव खड़ा था और उनकी बात सुनकर वो भी मुझसे कहने लगा- “हाँ, हाँ तुम्हारी वजह से ही मुझे मेरा घर छोड़ना पड़ा तुम्हारी वजह से ही...” मैं नीरव की बात सुनकर रोने लगी।
तभी दूसरी तरफ दीदी दिखाई दी- “इतनी ही आग है तेरे जिम में तो किसी दूसरे को हँसा ले, मेरे घर में ही क्यों आग लगा रही हो?” दीदी गुस्से में मुझे बोले जा रही थी, और उसके पीछे जीजू खड़े मेरे सामने देखकर मुकुरा रहे थे।
मैं और जोरों से रोने लगी। तभी बेडरूम के दरवाजे को थपथापने की आवाज आई। मैंने अपने आपको संभाला।
बाहर से रामू की आवाज आई- “जा रहा हूँ मेमसाब, दरवाजा बंद कर लीजिएगा..."