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प्यारेलाल- “भाभी आप जरा प्यार से चला करो..."
सुखजीत- क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हो?
प्यारेलाल- भाभी आप अपनी गाण्ड को इतनी तेज मटका-मटकाकर चलती हो की पीछे अगर लड़के देखें तो उनका दिमाग खराब हो जाए।
सुखजीत प्यारेलाल की बात सुनकर कहती है- "इसी की वजह से तो वाक करने आती हूँ ताकी ये कम हो जाए..."
प्यारेलाल- इसका ये इलाज नहीं है।
सुखजीत- तो क्या इलाज है?
प्यारेलाल अब उसकी सलवार पर हाथ रखते हुए उसकी सलवार में से ही उंगली अंदर को डाल देता है। उसके ऐसे करने से वो पागल हो जाती है। और उसके मुँह से आह्ह... निकल जाती है।
अब प्यारेलाल उससे कहता है- “ये तो कसरत करने से होगा..."
सुखजीत- अच्छा तो वो कसरत कर लो। पर वहीं जहां पहले की थी।
सुखजीत और प्यारेलाल वहीं पीछे की ओर चले जाते हैं। वहां पर हर जगह खेत ही खेत होते हैं, और बड़े-बड़े पेड़ होते हैं। प्यारेलाल सुखजीत को पेड़ पर सटाकर उसके होंठों में अपने होंठ डाल देता है। उधर दूसरी तरफ अपना एक हाथ लाकर उसकी चूचियों पर रखकर उसकी चूचियों को दबाना शुरू कर देता है।
उधर सुखजीत भी पेड़ से चिपकी हुई उसकी चूचियों के दबाने का मजा लेती है और उसके साथ होंठों को चुसवाती है। होंठों को चूसते हुए साथ में प्यारेलाल उसकी सलवार का नाड़ा खोल देता है जिससे की वो अब पागल हो जाती है और तभी होंठों को निकालते हुए कहती है।
सुखजीत- “प्यारेलाल, मुझे यहां डर सा लग रहा है...” दो दिन की प्यासी सुखजीत भी लण्ड लेने को बेताब थी और वो पेड़ से चिपकी हुई थी।
तभी प्यारेलाल कहता है- “भाभी तू यहां डर मत, क्योंकी यहां कोई नहीं आता है..."
इतने में अब सलवार का नाड़ा ढीला हो जाता है और फिर सलवार नीचे को गिर जाती है। प्यारेलाल उसके होंठों को चूसता रहता है और ऐसे ही फिर बाद में वो सुखजीत की पैंटी में हाथ दे देता है और उसकी चूत में उंगली डाल देता है। सुखजीत उसके ऐसे करने पर पागल हो जाती है और पागलों की तरह चुदवाने लगती है।
प्यारेलाल उसकी चूत में उंगली पेककर जोर-जोर से ऊपर नीचे करता है और थोड़ी देर करने के बाद अब उंगली को निकाल देता है। अब वो लण्ड को बाहर निकालता है और त के हाथों में देकर कहता है- “ले भाभी इसे चूस..."
सुखजीत- क्यों, आप ऐसा क्यों कह रहे हो?
प्यारेलाल- भाभी आप अपनी गाण्ड को इतनी तेज मटका-मटकाकर चलती हो की पीछे अगर लड़के देखें तो उनका दिमाग खराब हो जाए।
सुखजीत प्यारेलाल की बात सुनकर कहती है- "इसी की वजह से तो वाक करने आती हूँ ताकी ये कम हो जाए..."
प्यारेलाल- इसका ये इलाज नहीं है।
सुखजीत- तो क्या इलाज है?
प्यारेलाल अब उसकी सलवार पर हाथ रखते हुए उसकी सलवार में से ही उंगली अंदर को डाल देता है। उसके ऐसे करने से वो पागल हो जाती है। और उसके मुँह से आह्ह... निकल जाती है।
अब प्यारेलाल उससे कहता है- “ये तो कसरत करने से होगा..."
सुखजीत- अच्छा तो वो कसरत कर लो। पर वहीं जहां पहले की थी।
सुखजीत और प्यारेलाल वहीं पीछे की ओर चले जाते हैं। वहां पर हर जगह खेत ही खेत होते हैं, और बड़े-बड़े पेड़ होते हैं। प्यारेलाल सुखजीत को पेड़ पर सटाकर उसके होंठों में अपने होंठ डाल देता है। उधर दूसरी तरफ अपना एक हाथ लाकर उसकी चूचियों पर रखकर उसकी चूचियों को दबाना शुरू कर देता है।
उधर सुखजीत भी पेड़ से चिपकी हुई उसकी चूचियों के दबाने का मजा लेती है और उसके साथ होंठों को चुसवाती है। होंठों को चूसते हुए साथ में प्यारेलाल उसकी सलवार का नाड़ा खोल देता है जिससे की वो अब पागल हो जाती है और तभी होंठों को निकालते हुए कहती है।
सुखजीत- “प्यारेलाल, मुझे यहां डर सा लग रहा है...” दो दिन की प्यासी सुखजीत भी लण्ड लेने को बेताब थी और वो पेड़ से चिपकी हुई थी।
तभी प्यारेलाल कहता है- “भाभी तू यहां डर मत, क्योंकी यहां कोई नहीं आता है..."
इतने में अब सलवार का नाड़ा ढीला हो जाता है और फिर सलवार नीचे को गिर जाती है। प्यारेलाल उसके होंठों को चूसता रहता है और ऐसे ही फिर बाद में वो सुखजीत की पैंटी में हाथ दे देता है और उसकी चूत में उंगली डाल देता है। सुखजीत उसके ऐसे करने पर पागल हो जाती है और पागलों की तरह चुदवाने लगती है।
प्यारेलाल उसकी चूत में उंगली पेककर जोर-जोर से ऊपर नीचे करता है और थोड़ी देर करने के बाद अब उंगली को निकाल देता है। अब वो लण्ड को बाहर निकालता है और त के हाथों में देकर कहता है- “ले भाभी इसे चूस..."