S
StoryPublisher
Guest
राकेश ने उसको अपने जिश्म से और चिपकाते हुए जवाब दिया- “वो बात नहीं है अदिति, मेरे खयाल से तुम अच्छी तरह समझ रही हो की मैं क्या कहना चाहता हूँ?"
अदिति ने एक ऐसा जवाब दिया उसे की सब सोचेंगे की क्या हो रहा है इस घर में? अब क्या कुछ और राज छुपा हुआ है, जो खुलेगा या वक्त आने पर सामने आएगा?
उसने कहा- “छोड़िये मुझे, वरना लीना ने देख लिया तो आपको पता है ना क्या होगा?” कहकर अदिति राकेश की गिरफ्त से निकली और टेंट की तरफ जाने लगी चटकते हुए, जैसे बच्चे खेलते हैं पहले दायी टांग पर फिर बायीं टांग पर और फिर दायी टांग पर अपने हाथ में अपने दुपट्टे को घुमाते हुए।
जब अदिति जा रही थी तो राकेश ने आवाज थोड़ा ऊँची करके पूछा- “मगर लीना है किधर? मैंने उसको कब से नहीं देखा?”
अदिति चटकते हुए ही जोर से बोली- “वो फूल तोड़ने गई है, अपनी सहेलियों के साथ जंगल में..”
इससे पहले की अदिति टेंट तक पहुँचती उसके ससुर ने उस कोने से “प्ससस्त प्ससस्त...” करके अदिति को बुलाया। क्योंकी तब तक चटकते हुए अदिति वहीं पहुँची थी, तो अदिति ने पीछे मुड़कर राकेश की तरफ देखा पहले, और राकेश तब तक वहीं था।
अदिति ने ससुर को देखते हुए धीरे आवाज में कहा- “राकेश यहीं है, मैं नहीं आ सकती वहाँ, वो इधर ही देख रहा है..."
ससुर ने फिर भी कहा- “उसको पता नहीं की मैं यहाँ हूँ। तुम आओ तो सही। वो समझेगा तुम किसी चीज को लेने जा रही हो, आओ ना..”
अदिति ने फिर मुड़कर राकेश की तरफ देखा कि वो अब मुड़ चुका था उस तरफ जाते हुए, तो जल्दी से अदिति उस कोने में गई जहाँ ससुर खड़ा था। जिस जगह ससुर था वहाँ सिर्फ दो लोगों को खड़े होने की जगह थी सिर्फ। एक छोटा सा कोना था, तो अदिति को अपने ससुर से बिल्कुल चिपक के खड़ा रहना था, ताकी कोई और ना देख पाए उनको। ससुर ने फिर से अदिति को बाहों में भर लिया और पूरा जिश्म बिल्कुल चिपक गई थी उसके जिश्म से।
ससुर ने फिर कहा- “तुम इस लिबास में एक गुड़िया लग रही हो..."
अदिति- “सच? राकेश ने भी यही कहा...”
ससुर- “बताओ आज भी भंग पियोगी जैसे पिछले साल पिया था? हाँ बोलना प्लीज...” और ससुर ने अपनी हथेली को हल्के से अदिति के कंधे पर फेरा। अदिति ने ससुर के हाथ को अपने हाथ में थामा उसको और ज्यादा फेरने से रोकते हुए और जवाब दिया।
अदिति- “अभी मैंने नहीं सोचा की पियूंगी या नहीं? मगर शायद एक-दो घुट चढूंगी। पिछले साल आपने मुझे जबरदस्ती पिलाई थी और मैं अकेली थी। विशाल बहुत लेट आया था उस रात को। मुझे याद है मैं किचेन में सो रही थी और विशाल मुझे कमरे में ले गया था रात को...”
ससुर उसको रिझाने की कोशिश में लगा हुआ था। मगर अदिति उसकी बाहों से निकल गई और अपनी जीभ से उसको छेड़ते हए यूँ कहा- “मैं आज नहीं पियूंगी। मुझे पता है आप क्यों पूछ रहे हो की पियूं?" और ससुर को अपनी ठेंगा दिखाते हुए दौड़ती चली गई टेंट में।
कुछ देर के बाद भंग तैयार थी और ग्लास भरे जा रहे थे और टेंट में मेहमानों को सर्व किया गया। औरतें, लड़कियां, लड़के सबने पिए। घर के मर्द भी ट्ोडिशनल कपड़े पहने थे उस वक़्त।
अदिति ने एक ऐसा जवाब दिया उसे की सब सोचेंगे की क्या हो रहा है इस घर में? अब क्या कुछ और राज छुपा हुआ है, जो खुलेगा या वक्त आने पर सामने आएगा?
उसने कहा- “छोड़िये मुझे, वरना लीना ने देख लिया तो आपको पता है ना क्या होगा?” कहकर अदिति राकेश की गिरफ्त से निकली और टेंट की तरफ जाने लगी चटकते हुए, जैसे बच्चे खेलते हैं पहले दायी टांग पर फिर बायीं टांग पर और फिर दायी टांग पर अपने हाथ में अपने दुपट्टे को घुमाते हुए।
जब अदिति जा रही थी तो राकेश ने आवाज थोड़ा ऊँची करके पूछा- “मगर लीना है किधर? मैंने उसको कब से नहीं देखा?”
अदिति चटकते हुए ही जोर से बोली- “वो फूल तोड़ने गई है, अपनी सहेलियों के साथ जंगल में..”
इससे पहले की अदिति टेंट तक पहुँचती उसके ससुर ने उस कोने से “प्ससस्त प्ससस्त...” करके अदिति को बुलाया। क्योंकी तब तक चटकते हुए अदिति वहीं पहुँची थी, तो अदिति ने पीछे मुड़कर राकेश की तरफ देखा पहले, और राकेश तब तक वहीं था।
अदिति ने ससुर को देखते हुए धीरे आवाज में कहा- “राकेश यहीं है, मैं नहीं आ सकती वहाँ, वो इधर ही देख रहा है..."
ससुर ने फिर भी कहा- “उसको पता नहीं की मैं यहाँ हूँ। तुम आओ तो सही। वो समझेगा तुम किसी चीज को लेने जा रही हो, आओ ना..”
अदिति ने फिर मुड़कर राकेश की तरफ देखा कि वो अब मुड़ चुका था उस तरफ जाते हुए, तो जल्दी से अदिति उस कोने में गई जहाँ ससुर खड़ा था। जिस जगह ससुर था वहाँ सिर्फ दो लोगों को खड़े होने की जगह थी सिर्फ। एक छोटा सा कोना था, तो अदिति को अपने ससुर से बिल्कुल चिपक के खड़ा रहना था, ताकी कोई और ना देख पाए उनको। ससुर ने फिर से अदिति को बाहों में भर लिया और पूरा जिश्म बिल्कुल चिपक गई थी उसके जिश्म से।
ससुर ने फिर कहा- “तुम इस लिबास में एक गुड़िया लग रही हो..."
अदिति- “सच? राकेश ने भी यही कहा...”
ससुर- “बताओ आज भी भंग पियोगी जैसे पिछले साल पिया था? हाँ बोलना प्लीज...” और ससुर ने अपनी हथेली को हल्के से अदिति के कंधे पर फेरा। अदिति ने ससुर के हाथ को अपने हाथ में थामा उसको और ज्यादा फेरने से रोकते हुए और जवाब दिया।
अदिति- “अभी मैंने नहीं सोचा की पियूंगी या नहीं? मगर शायद एक-दो घुट चढूंगी। पिछले साल आपने मुझे जबरदस्ती पिलाई थी और मैं अकेली थी। विशाल बहुत लेट आया था उस रात को। मुझे याद है मैं किचेन में सो रही थी और विशाल मुझे कमरे में ले गया था रात को...”
ससुर उसको रिझाने की कोशिश में लगा हुआ था। मगर अदिति उसकी बाहों से निकल गई और अपनी जीभ से उसको छेड़ते हए यूँ कहा- “मैं आज नहीं पियूंगी। मुझे पता है आप क्यों पूछ रहे हो की पियूं?" और ससुर को अपनी ठेंगा दिखाते हुए दौड़ती चली गई टेंट में।
कुछ देर के बाद भंग तैयार थी और ग्लास भरे जा रहे थे और टेंट में मेहमानों को सर्व किया गया। औरतें, लड़कियां, लड़के सबने पिए। घर के मर्द भी ट्ोडिशनल कपड़े पहने थे उस वक़्त।