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Fantasy मोहिनी

ramangarya wrote: ↑ 26 Jan 2021 00:25
Miss dolly urf mohini g, apki khani ne man moh liya h, ab mehnat kar k kripya daily updates dene ki kosis kijiye.
 
अगले ही पल त्रिवेणी ने मुझे छोड़ दिया। वह चीखें मारने लगा। अपने सिर के बाल नोचने लगा। कहने की बात नहीं कि मोहिनी उसके सिर पर थी। एक भयानक जहरीली छिपकली ने अपने पंजे उस पर गाड़ दिए थे। मैं उठ खड़ा हुआ।

त्रिवेणी का बुरा हाल हो रहा था। वह कमरे में चीखता हुआ पागलों की तरह घूम रहा था और सविता फटी-फटी आँखों से इस दृश्य को देख रही थी। मेरा दिल चाहा कि सविता का गला घोंटकर मोहिनी देवी के लिये समर्पित कर दूँ पर फिर कुछ सोचकर मैंने उसको उसके हाल पर छोड़ दिया।

“अच्छा त्रिवेणी दास, मैं चलता हूँ! तुमने जो सजा मेरे लिये तय की थी उसे ही मैं तुम्हारे लिये उपयुक्त समझता हूँ। उम्मीद है हम फिर मिलेंगे।”

इतना कहकर मैं कमरे से बाहर निकल गया। मैं त्रिवेणी की कोठी से निकलकर सीधा होटल पहुँचा और भविष्य के लिये योजनाएँ तैयार करने लगा। मोहिनी मेरे पास थी और जिंदगी का हर सुहाना सपना साकार होने वाला था। हर वह चीज जो मुझसे जुदा हो चुकी थी अब मेरे पास आने वाली थी।

सुबह जब मैं सोकर उठा तो मालूम हुआ कि एक लम्बे अरसे बाद मैं चैन की नींद सोया था। अब मेरी किस्मत का सितारा चमकने के लिये किसी आने वाले कल की देर नहीं थी। मोहिनी आ रही थी। वह नन्ही-मुन्नी हसीन व जमील, रहस्यमय नारी जिसने मुझे अजीबो गरीब हालात से दो-चार किया था। बहुत कम लोग होंगे जिनकी जिंदगी में इतनी करवटें बदली हों।

मोहिनी मेरी है। जिन लोगो ने मेरी यह दास्तान सुनी है वे भी जान लें कि मोहिनी सिर्फ मेरी है और वे अच्छी तरह महसूस कर सकते हैं कि जब मेरी मोहिनी इतनी मुसीबतें सहने के बाद दोबारा मुझे प्राप्त हुई तो मेरे दिल पर क्या गुजर रही होगी ?

मोहिनी की मेहरबानियों से जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन मेरे साथ रहे और मोहिनी के चले जाने से मैंने जिंदगी के सबसे घिनौने दिनों का मुकाबला भी किया।

मैं लान पर बैठा धूप का आनंद ले रहा था। साथ ही साथ भविष्य के प्रोग्राम बना रहा था। इस बार मोहिनी आएगी तो मैं क्या करूँगा। मैं उसे अनमोल हीरे की तरह छिपाकर सुरक्षा के साथ रखूँगा और एक नयी जिंदगी का शुभारम्भ करूँगा। एक ऐसी जिंदगी जो बुराइयों से दूर हो। मुझे पहले मोहिनी का सही तौर पर उपयोग न करने का गम था। मैं सोच रहा था कि अब मैं सब कुछ बदल लूँगा। मेरी डॉली मेरे पास आ जायेगी। जब डॉली का ख्याल आया तो उसके डैडी की भी याद आ गयी और मेरी मुट्ठियाँ खुद ब खुद भींच गयी। मैंने उसके डैडी का ख्याल उस समय दिल से निकाल देना चाहा लेकिन ऐसे ख्यालों की एक लम्बी सूची थी जिनसे बदला लेने को जी चाहता था। वह तमाम लोग जिन्होंने मेरी हालत बिगड़ते देख मुझसे मुँह फेर लिया था। मेरे कारोबार के साथी, लड़कियाँ, त्रिवेणी वह तमाम लोग जो मुझे भीख देते हुए ठोकर मारकर चले जाते थे। वह नफरत भरी नजरें। मैंने स्वयं को इस बात पर अमादा करना चाहा कि उन सबको भुला दूँ। अब प्रतिशोध क्या होगा और मैं इस प्रयास में सफल हो गया। फिर त्रिवेणी और डॉली के डैडी के सिलसिले में स्वयं पर काबू न पा सका।

बहरहाल मोहिनी की वापसी मेरे लिये कोई साधारण घटना नहीं थी। यह सब मेरे लिये एक नया पैगाम लेकर आई थी। जब मैं नाश्ता कर चुका तो मैंने महसूस किया मेरा सिर भारी हो गया। वह आ गयी थी। वही मोहिनी, मेरी जिंदगी। वह सचमुच आ गयी थी। अब कुछ झूठ नहीं था। उसकी आँखें बोझिल थी। उसने मुझे मुस्कुरा कर देखा। मस्ती से भरपूर एक निगाह फिर उसने एक अंगड़ाई ली और मेरा दिल चाहा कि उसके हसीन अस्तित्व को अपने दिल में रख लूँ। मैं उससे आज बहुत सी बातें करना चाहता था। कुछ नयी, कुछ पुरानी बातें। कुछ शिकवे, कुछ शिकायत।

“तुम आ गयी। मुझे बेचैनी से तुम्हारा इंतजार था।”

“मुझे मालूम है।” उसने इठलाकर जवाब दिया।

“लेकिन तुम्हारी आँखों में नींद है। तुम कुछ देर के लिये सो जाओ।”

मैं जानता था खून पीने के बाद मोहिनी गहरी नींद सोती है। उसकी आँखों में उस समय भी खुमार था।

“नहीं, ऐसी बात नहीं राज!” वह इठलाते हुए बोली।

“सो जाओ मेरी जान!” मैंने बड़े प्यार से निवेदन किया।
 
“अरे, इतना प्यार न जताया करो! मैं तो एक आनी-जानी चीज हूँ।”

“अच्छा, बातें बंद करो और चुपचाप सो जाओ। तुम्हें मालूम नहीं इस समय मेरे दिल में कैसी-कैसी भावनाएँ उमड़ रही हैं।”

“मुझे मालूम है ?”

“क्या मालूम है ?”

“यही कि इस समय तुम मेरे प्यार में बुरी तरह गिरफ्तार हो।”

“हाँ मोहिनी!” मैंने गहरी साँस खींची। बहुत दिनों बाद यह दिन आया है। मैं कहाँ-कहाँ भटकता रहा। कितने जुल्म सहे। क्यों मोहिनी, तुम्हें भी तो मेरे ऊपर जरा भी तरस नहीं आता था। कितनी बेदर्द, कितनी जालिम बन गयी थी तुम। कभी सोचती भी न थी।”

“राज, मैं मजबूर थी और कुछ तो तुमने अपनी ही जिद अपनी ही गलतियों से हालात बिगाड़े थे। मैं कर भी क्या सकती थी। त्रिवेणी ने मुझे जाप करके प्राप्त किया था और मैं उसकी दासी थी। परन्तु यह बात भी नहीं थी कि तुम्हारी हालत देखकर मुझे दुःख न पहुँचता हो। क्यों राज, यह पुरानी बातें भूल क्यों नहीं जाते ? उस अतीत को भूल जाओ मेरे प्यारे। उसकी यादें बड़ी दर्दनाक होती हैं।”

“ठीक कहती हो मोहिनी। मैं भूल गया हूँ। जो न भूला, वह भी भूल जाऊँगा। लेकिन तुम अब मेरी रहोगी न।”

“राज!” मोहिनी के चेहरे पर उदासी थी, “समय के साथ समझौता करना सीखो। जो हर पल सामने आता रहता है, गुजरता रहता है, वह तुम्हें खुद जिंदगी को जीने का आनंद भरा रास्ता बताएगा।”

“तो क्या तुम यह कहना चाहती हो कि तुम फिर चली जाओगी।”

“नहीं राज, मैं तो तुम्हारी जिंदगी का एक ख्वाब हूँ! जो सच में साकार हो सकता है और इंसान के ख्वाब अपने ही होते हैं, उन्हें कोई छीन नहीं सकता।”

देर तक मोहिनी इसी प्रकार की प्यारी-प्यारी बातें करती रही। फिर बाएँ हाथ का गुदाज नन्हा सा तकिया बनाकर मेरे बालों के मखमली बिस्तर पर बायीं करवट लेट गयी। वह सो गयी तो मैं उसके धीमे-धीमे खर्राटे सुनता रहा। उसके यौवन के उफान को अपलक देखता रहा। उसके नर्म नाजुक जिस्म का एहसास पाता रहा। वह मेरी जिंदगी थी। परन्तु देखिये कुदरत का इंसाफ क्या था कि मैं उसे छू नहीं सकता था। उसे बाँहों में नहीं ले सकता था। उसके लबों की तबस्सुम पर अपने होंठ की आग नहीं जला सकता था। वह जवान रूपसी भी थी। नन्ही-मुन्नी हसीन व जमील लड़की भी थी। वह छिपकली भी थी जहरीली। न जाने वह क्या-क्या थी। वह मेरे ख्वाबों की मल्लिका थी।

सोते हुए वह मुस्कुरा रही थी। जैसे मुझसे अब भी बातें कर रही हो। मेरे दिल की कैफियत जानती हो।

दोपहर बाद मैं अपने कमरे में आ गया तो कुछ देर बाद मोहिनी ने एक जम्हाई ली और मादक अंगड़ाई लेकर उठ बैठी।

“क्या नींद पूरी हो गयी मोहिनी।”

“तुम मुझे इस तरह तक रहे हो। फिर भला मैं कैसे सो पाती...” वह शरारत से बोली, “अगर तुम्हारी मोहिनी को नजर लग गयी तो...”

“मेरी नजर।”

“अपनों की हो तो नजर लगती है मेरे राजा।” वह बोली, “दूसरे अगर मुझे इस निगाह से देखें तो आँखे न निकाल लूँ उनकी।”

“मोहिनी तुम बहुत चंचल हो।”

“राज, तुमने त्रिवेणी का हाल मुझसे नहीं पूछा।”

“अरे हाँ, मैं तो भूल ही गया था! क्या हाल है ?”

पुलिस ने उसे सविता की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया है। उसे उन तमाम लड़कियों का हत्यारा समझा जा रहा है जो पिछले दिनों हुई थीं।”

“क्या गलत समझा जा रहा है। वह है ही हत्यारा।”

“बड़े-बड़े राजों से पर्दा उठने वाला है।”

“लेकिन मोहिनी, यह अच्छा नहीं हुआ। वह जेल चला जायेगा या उसे फाँसी लग जायेगी तो मैं किससे बदला लूँगा। मेरी हसरत तो दिल ही दिल में रह जायेगी।”

“तो क्या तुम चाहते हो कि वह इस केस में छूट जाये ? पिस्तौल भी पुलिस ने बरामद कर लिया है जिससे उसने सविता को शूट किया था। जैसे ही उसने गोली चलाई पुलिस वहाँ आ धमकी। फिर वह पुलिस से बचने के लिये सारी कोठी में मारा-मारा फिरता रहा। परन्तु मैंने खुद उसे पुलिस के सामने ला दिया।”

“फिर तो उसे छुड़ाना बड़ा कठिन कार्य होगा।”

“कठिन ?” मोहिनी हँसी, “मेरे लिये क्या कठिन है ?”

“क्या तुम ऐसा कर सकती हो ?”
 
“मैं क्या कुछ कर सकती हूँ इसे जानने की आज तक किसी ने कोशिश ही कब की है। मुझसे किसी ने ऐसे जटिल काम लिये ही कब हैं। जिसने भी मोहिनी को पाया, बस शराब, दौलत, औरत के चक्कर में फँसा रहा और यही छोटे-छोटे काम मुझसे लेता रहा। किसी ने मेरी ताकत देखी ही कब है।

“हाँ...राज! दुनिया में कुछ ऐसी चीजें हैं जो मैं नहीं कर सकती। परन्तु मेरी भी अपनी सीमाएँ हैं और उन सीमाओं में रहकर मैं सब कुछ कर सकती हूँ। मैं क़त्ल नहीं कर सकती परन्तु करवा सकती हूँ। मैं जिसके चाहे दिमाग को अपने अधीन बना सकती हूँ। इन सब कामों के लिये जरुरी है कि मुझे उसके सिर पर जाना पड़ता है। मैं जाप करने वाले किसी ऋषि-मुनि, मुल्ला–पादरी या तांत्रिक के मण्डल में नहीं जा सकती। परन्तु मैं यह बता सकती हूँ कि कौन कहाँ और कब जाप कर रहा है।

“तुम्हें प्राप्त करने के लिये मैं अब किसी को जाप नहीं करने दूँगा मोहिनी।”

“राज!” तुम बहुत भोले हो, “मेरे भोले राजा, इस दुनिया में जिसमें तुम जीते हो, ब्रह्माण्ड में यही एक अकेली दुनिया नहीं है परन्तु उन सब पर कुछ न कुछ पाबंदियाँ हैं। तुम इन गहरी बातों को नहीं समझ सकते। जंगलों में तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों, साधू-संतों को तुम क्या समझते हो ? उनसे पूछो, मोहिनी क्या चीज है ? किस दुनिया में रहती है ? तांत्रिक से पूछो, कंकालनियाँ, योगनीयाँ क्या होती हैं ? क्यों उन्हें सिद्ध किया जाता है ? ऐसी कई अदृशय दुनिया हैं राज जिसके बारे में जानने के लिये और जिसमे झाँकने के लिये बड़े-बड़े तप किये जाते हैं। इस समय मोहिनी तुम्हारी दासी है, तुम्हारी कनीज है और जो तुम अपनी कनीज को हुक्म दोगे वह बजा लाएगी। हुक्म करो मेरे आका, कनीज आपके सामने हाज़िर है।”

मैं कुछ क्षण तक मौन रहा। कभी-कभी मोहिनी ऐसी बातें करती थी जो बहुत उलझी हुई होती थी। इसलिए कहता हूँ कि वह मेरे लिये हमेशा एक रहस्यमय पहेली बनी रही।

“तो फिर सुनो कनीज, मेरी बांदी, मेरी दासी, मेरी जान! मेरा सबसे पहला हुक्म यह है कि त्रिवेणी दास को छुड़ा लो।”

“जो हुक्म आका।” मोहिनी ने अदब से लखनवी अंदाज में झुकते हुए कहा, “कल सुबह त्रिवेणी को अदालत में पेश किया जायेगा। उसी समय नया हत्यारा अदालत में भेज दूँगी जो अपराध स्वीकार कर लेगा और नया हत्यारा त्रिवेणी का नौकर रामदास होगा।”

“लेकिन पिस्तौल पर उँगलियों के निशान।”

“तुम देखते रहो, मोहिनी क्या करती है। अच्छा, अब मैं चलती हूँ। मुझे बहुत सारे काम करने हैं।”

फिर मोहिनी एक छिपकली की तरह मेरे सिर से रेंगती हुई नीचे उतर गयी।

फिर शाम हो गयी। रात घिर आई। मैं काफी देर तक होटल के टेरेस पर टहलता रहा। भविष्य की कल्पनाओं में खोया रहा। डिनर के बाद मैं कमरे में सोने आया। मोहिनी अभी तक नहीं लौटी थी। मैं बिस्तर पर लेटकर सो गया। अगली सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने कल्पना के झरोखे में मोहिनी को देखा। मोहिनी अभी तक नहीं लौटी थी। मैं कुछ बेचैन हो गया।

दोपहर तक यह बेचैनी बनी रही। फिर अचानक मोहिनी के पंजो की चुभन महसूस हुई तो मैंने चौंककर देखा। मोहिनी ही थी। काफी थकी सी नजर आ रही थी जैसे उस रात भागती रही हो।

“कनीज हुक्म बजा लायी है।” मोहिनी ने कहा, “सारी रात दौड़ करनी पड़ी। अब तक मैं उनमे से कई सिरों पर चहलकदमी करती रही तब जाकर मामला सुलझा।

“पिस्तौल पर से त्रिवेणी की उँगलियों के निशान साफ किये और रामदास के इकबाली बयान दिलवाये। इंस्पेक्टर भी बड़ा हेकड़ निकल। त्रिवेणी जैसे आरोपी भला कब हाथ आते हैं। उसकी हालत भी सही करनी पड़ी तब जाकर मामला सुलझा।”

“बाद में अगर उसने बयान पलट दिए मोहिनी तो ?”

“हर मुकदमे में ऐसा ही होता है।” मोहिनी बोली, “अब तुम क्यों फ़िक्र करते हो ? चलो, आज कहीं जश्न मनाने चलते हैं।”

“जश्न नहीं मोहिनी। मुझे दूसरे बहुत काम हैं।”

“डॉली की याद आ रही है न।” मोहिनी मुस्कुरायी।

“तुम्हें कैसे मालूम ? ओह...! भला मैं भी कितना मूर्ख हूँ। यह भी कोई पूछने का प्रश्न हुआ। हाँ मोहिनी, यह बेचैनी बड़ी मुश्किल से गुजर रही है।”

“जानती हूँ लेकिन सब ठीक हो जायेगा। अब तुम चिंता न करो। फ़िलहाल तो मुझे कलवन्त की याद आ रही है।”

“कलवन्त कौर ?”

“हाँ राज! तुमने इतनी सुंदर लड़की पहले कभी न देखी होगी। त्रिवेणी उसके पीछे बड़े पंजे फाड़े था पर वह त्रिवेणी के काबू में नहीं आई थी। वह है ही ऐसी चीज। मोहिनी ने होंठ पर जुबान फेरते हुए बड़े चटखारे के साथ कहा। एक बार उसे देख लो तो तुम सब कुछ भूल जाओगे।”

“डॉली से अधिक सुंदर।”
 
“डॉली की बात कुछ और है, कलवन्त कौर की कुछ और। डॉली एक घरेलु नारी है और कलवन्त धनवान लोगों की पार्टियों की शान समझी जाती है।”

“अगर तुम उसमें इतनी दिलचस्पी ले रही हो तो फिर मेरी क्या बिसात, जो तुम्हारी बात न मानूँ। तुम्हारा मूड ख़ास रोमांटिक लगता है।”

“बात न बनाओ राज। मैं जानती हूँ एक अरसे से तुम्हें भी कोई लड़की नहीं मिली।”

“लेकिन कलवन्त कौर मिलेगी कहाँ ?”

“आज शाम एक क्लब में। जाहिर है क्लब में धनवान लोग जाते होंगे।”

“जिसे रेस के घोड़ों का नम्बर मालूम हो। उससे बड़ा धनवान दूसरा कौन हो सकता है।

लेकिन मेरे पास इस समय न तो अच्छे कपड़े हैं और न इतना पैसा। फिर रेस का समय भी नहीं रहा।”

“तुम इसकी चिंता क्यों करते हो, मोहिनी तुम्हारे साथ है। मैं इसका भी रास्ता निकाल लूँगी।”

“किस तरह ?”

“मैं अभी होटल मैनेजर के सिर पर जाती हूँ। उसे मजबूर करूँगी कि वह कुछ रुपया बाथरूम में रख आये। फिर तुम बाथरूम में जाकर रुपया उठा लाना। अब रहा कपड़ों का सवाल तो जब रुपया पास में होगा तो रेडिमेड शॉप में कपड़ों की क्या कमी।”

“ऐसी बात है तो दिखाओ चमत्कार।”

“अभी लो।”

मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी।

आधे घंटे बाद ही वह मेरे सिर पर आई और उसने बाथरूम चलने के लिये कहा। फिर मैं बाथरूम में पहुँचा और इस तरह वहाँ रखे नोटों का बण्डल उठा लाया। जैसे यह मेरी अपनी तिजोरी हो। उसके बाद मैं बाजार पहुँचा, अच्छे से अच्छे कपड़े ख़रीदे और वापिस होटल में आ गया।

शाम को मैं मोहिनी के बताये क्लब पर जा पहुँचा।

एक क्लब के कर्मचारी ने गेट पर मुझसे पूछा– “क्षमा कीजिये श्री मान। क्या आपने नयी-नयी मेंबरशिप भरी है ?”

मैंने जेब से सौ-सौ के दो नोट उसके हाथ पर रख दिए।

“ज... जी, मेरा मतलब यह नहीं था ?” वह आश्चर्य से आँखे फाड़े कभी मुझे तो कभी नोटों को देखता हुआ बोला।

मैं बिना उत्तर दिए आगे बढ़ गया। दूसरे कर्मचारी भी मुझे हैरत से देख रहे थे। मैं आगे बढ़कर एक मेज पर जा बैठा परन्तु क्लब में मेरी जान-पहचान का कोई नहीं था। एकाएक मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी। फिर चंद क्षण बाद ही एक धनवान व्यक्ति लपकता हुआ मेरी मेज पर आ गया।

“प्रिंस ऑफ़ राजेपुर! वाह, आप और यहाँ! धन्य हमारा भाग्य जो आपने इस क्लब को अपने पवित्र चरणों से पवित्र किया।” उस व्यक्ति ने इस प्रकार हर्ष से कहा जैसे वर्षों से मुझे जानता हो।
 
मैंने मुस्कुराकर उसका अभिवादन स्वीकार किया और वह मेरी मेज पर बैठ गया। फिर वह दूसरे लोगों को बुला-बुलाकर मेरा परिचय देने लगा और कुछ ही देर में लोगों की भीड़ मेरे इर्द-गिर्द थी। वह व्यक्ति जिसका नाम चंदर था, रियासत के बारे में बता रहा था। एक आदमी ने तो यहाँ तक कहा कि एक बार वह रियासत राजेपुर भी गया था। परन्तु काफी कोशिशों के बाद भी प्रिंस से नहीं मिल सका।

क्लब का मैनेजर स्वयं मेरी मेज पर आया और उसने विशेष अतिथि के रूप में मेरा स्वागत किया। मैं जानता था यह भी मोहिनी का ही एक कारनामा है। मैनेजर ने तुरन्त मुझसे मेंबरशिप भरवा ली।

क्लब में बहुत सी औरतें थी जिनमें अधिकांश सुंदर थी। पर मेरी आँखे कलवन्त कौर को खोज रही थी। चूँकि मोहिनी मेरे सिर पर नहीं थी इसलिए मुझे कलवन्त कौर को तलाश करना पड़ रहा था।

आख़िरकार मेरी दृष्टि एक युवती पर जाकर ठहर गयी जिसके इर्द-गिर्द कई पुरुष भँवरे की तरह मंडरा रहे थे और वह मेरी ही तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में भी मेरे प्रति दिलचस्पी थी।

कलवन्त कौर को मैंने एक बार देखा तो देखता ही रह गया। निश्चय ही वही कलवन्त कौर थी। सारे पूना की बात छोड़ दीजिये, कई शहरों की खूबसूरत लड़कियाँ मिलकर उसका मुकाबला नहीं कर सकती थीं।

बातों ही बातो में फिर चंदर ने कहा– “लीजिये प्रिंस, मैं क्लब की सबसे खूबसूरत सुंदरी से परिचय कराना तो भूल ही गया।” उसने कलवन्त कौर को संकेत से बुलाया, “यह है मिस कलवन्त कौर। इस क्लब की शान।”

मैंने कुर्सी से उठकर कलवन्त का स्वागत किया। उसने नमस्ते के रूप में अभिवादन किया फिर चंदर से बोली– “चंदर तुम भी बस जब देखो अपनी शरारत से बाज नहीं आते।” और वह बैठ गयी।

“कुँवर साहब!” चंदर ने कहा, “अब आप लोग बातें कीजिये, मैं अभी आया।”

जब चंदर वहाँ से चला गया तो मैं कलवन्त से बातें करने लगा। मोहिनी ने उसके बारे में कुछ गलत नहीं कहा था। उसकी आवाज में भी रस भरा हुआ था। मैंने उसे बताया कि मैं जिंदगी में अकेला हूँ और अब अकेलेपन से उकता जाता हूँ तो इसी तरह अकेला निकल पड़ता हूँ।

“आपने शादी नहीं की ?”

“नहीं! इस तरह मेरी तन्हाई टूट जायेगी और तन्हाई से मुझे मोहब्बत है।”

“आप भी खूब दिलचस्प हैं।”

“योर हाईनेस।”

“कम से कम एक कुँवारे आदमी को यह अधिकार होता ही है कि वह किसी भी खूबसूरत लड़की के बारे में सोच सके। उसके ख्वाब देख सके। शादी एक ऐसा बंधन है जिसमें बँधकर वह सिर्फ अपने दायरे तक सोच सकता है।”

साढ़े नौ बजे नृत्य शुरू हो गया तो मैं कलवन्त कौर के साथ उठकर फ्लोर पर आ गया। वह बहुत सतर्क लड़की थी। उस पर काबू पाना इतना आसान नहीं था। यह मैंने जल्दी ही समझ लिया। नृत्य के दौरान मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी, “वाह राज। तुमने तो सारा किला जीत लिया। कैसी लगी तुम्हें कलवन्त ?”

“बहुत अच्छी!” मैंने दिल ही दिल में कहा, “बहुत खूबसूरत! मगर इतनी आसान चीज नहीं। लेकिन मैं चाहता हूँ मोहिनी कि स्वयं ही उसे जीतूँ।”

“रास्ता बहुत लम्बा हो जायेगा। मुझे कुछ करना ही पड़ेगा।” इतना कहकर मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी।

और पल भर बाद ही कलवन्त में एक विचित्र सा परिवर्तन आ गया। नृत्य करते समय वह मेरी बाँहों में सिमटकर चिपक गयी। उसके गुदाज जिस्म की जवानी मेरी रगों में लहराने लगी। एक सनसनाहट पूरे जिस्म में दौड़ रही थी और मेरी साँसे उसकी साँसों में टकराने लगी।
 
मैं उसे डांस फ्लोर से हटाकर लॉन में ले आया और फिर हम दोनों एक दूसरे से सटे वृक्षों के झुरमुट की तरफ बढ़ गए। यहाँ एक बेंच पर आकर हम बैठ गए। बाग़ में कोई नहीं था। आसमान पर चांदनी छिटकी हुई थी। और कलवन्त मेरी बाँहों में निढाल हुई जा रही थी। उसके गुलाबी चेहरे पर मेरे होंठ फिसलने लगे थे। उसके लबों के साज जगने लगे थे और उसकी आँखों में नशा ही नशा था।

अचानक जैसे वह सोते से जागी। उसने अपने आपको एक झटके से अलग किया और साड़ी का पल्लू ठीक करने लगी। उसकी आँखों में अब नशा की बजाय शर्म व हया के साथ-साथ हैरत के भाव जाग गए। मैं अभी यह सोच ही रहा था कि मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी।

राज फौरन यहाँ से भाग चलो। खेल बिगड़ गया है। मोहिनी ने कहा।

“क्या हुआ ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

त्रिवेणी के नौकर रामप्रसाद के एक दोस्त बंसी ने सारा खेल चौपट कर दिया है। उसने रामप्रसाद को छुड़ाने के लिये पुलिस को बयान दे दिया है कि उस समय जब सविता की हत्या हुई तो रामप्रसाद उसके पास था। इसका प्रमाण भी दिया है और उसने तुम्हारा नाम भी लिया कि तुम उस वक्त त्रिवेणी की कोठी पर थे। पुलिस तुम्हारे होटल की तरफ बढ़ रही है। तुम्हें फौरन वहीं पहुँचना है।”

सारी स्थिति को समझकर मैं कलवन्त को लेकर वापिस लौटा फिर उसे क्लब में मिलने का वादा करके होटल की तरफ चल पड़ा। मोहिनी मेरे सिर से जा चुकी थी।

जिस समय मैं होटल पहुँचा तो मेरे कमरे का दरवाजा खुला था और एक पुलिस इंस्पेक्टर दो सिपाहियों सहित अंदर बैठा था।

मुझे देखते ही बोला– “आइये कुँवर साहब! हम आपका ही इंतजार कर रहे थे।” उसके स्वर में व्यंग्य था।

“मेरा ? भला मुझसे कौन सा अपराध हो गया है।”

इंस्पेक्टर मेरे इत्मिनान पर परेशान हो गया।

“अपराध का संदेह है श्री मान।” इंस्पेक्टर ने उसी स्वर में उत्तर दिया।

“फरमाइए, बात क्या है ?” मैंने बड़े भोलेपन से पूछा।

“मुझे ही बताना पड़ेगा तो सुनिए। कल रात बम्बई के एक व्यापारी की लड़की मिस सविता की हत्या हो गयी है। पुलिस ने इस सिलसिले में त्रिवेणी दास को गिरफ्तार किया था। चूँकि यह घटना उसकी कोठी पर घटी थी तो भी त्रिवेणी के क़त्ल से इंकार के बावजूद गिरफ्तारी करनी पड़ी। मगर आज सुबह त्रिवेणी दास के एक नौकर रामप्रसाद ने आश्चर्यजनक रूप से जुर्म का इक़बाल किया कि उसने सविता का खून किया है। पुलिस को इस सिलसिले में आपकी शहादतों की आवश्यकता है।”

“तो आप मेरे पास क्यों आये हैं ?” मैंने बीच में ही टोका।

“पहले मेरी बात सुन लीजिये मिस्टर राज।” इंस्पेक्टर ने रूखे स्वर में कहा।

“कहिये।” मैंने उसी स्वर में जवाब दिया, “मगर इंस्पेक्टर साहब, मैं जरा पुलिस के मामलों में घबराता हूँ। उचित होगा, पहले आप यह विश्वास कर लें कि आपने तफतीश के लिये सही आदमी चुना है। वैसे जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मुझे पुलिस की सहायता करने में ख़ुशी होगी।”

इंस्पेक्टर ने मेरी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया, “हमें मालूम हुआ है कि आप कल रात दुर्घटना से कुछ देर पहले त्रिवेणी से मिलने गए थे। यह बात उसके दूसरे नौकर ने बताई है।”

“हाँ! मैं कल रात वहाँ मौजूद था। मगर यह दुर्घटना किस समय घटी ?”

“कोई नौ बजे रात।”

“नौ बजे। ईश्वर का धन्यवाद, मैं वहाँ से आठ बजे या उसके पंद्रह मिनट बाद चला आया था।” मैंने सपाट स्वर में कहा।

“आपने वहाँ किस-किस को देखा था ?”

इंस्पेक्टर मेरे बर्ताव से किसी कदर बौखला गया था।

मैं बड़े इत्मिनान और कुशलता से उसकी हर बात का उत्तर दे रहा था। पुलिस, क़त्ल, और शहादतें यह मामलात मेरे लिये नए थे। मैंने उसे बड़े ठंग से समझाया-

“त्रिवेणी मेरा दोस्त है। एक अर्से बाद जब मैं पूना आया तो उससे मिलने चला गया। त्रिवेणी उस समय उपस्थित नहीं था इसलिए शाम को फिर उससे मिलने गया। उस समय वह एक लड़की के साथ अपनी रात का प्रोग्राम बना रहा था। मेरी उससे रस्मी बातचीत हुई। वह बुरी तरह थका हुआ था और लड़की उससे कुछ भयभीत मालूम होती थी। मैंने यह अवसर उचित न समझा और वहाँ से चला आया। यूँ भी मैं त्रिवेणी की मौज-मस्ती में अधिक देर तक ठहर कर विघ्न नहीं डालना चाहता था। मुझे मालूम न था कि मेरे आने के बाद इतना बड़ा हादसा हो जायेगा। अब त्रिवेणी कहाँ है श्रीमान ?”

“उसे हमने नौकर के इकबाली बयान के बाद छोड़ दिया मगर वह हमारी निगरानी में है।” इंस्पेक्टर ने कहा।

इंस्पेक्टर ने मेरे कारोबार, त्रिवेणी से मेरे सम्बन्ध और त्रिवेणी के सम्बन्ध में कुरेद-कुरेद कर पूछा। मैंने जो उत्तर दिए उससे केस और उलझना था। केस उलझाने में ही मेरा लाभ था। मैंने अपनी पोजीशन साफ करके त्रिवेणी और उसके नौकर को आपस में उलझा दिया।

“होटल का मैनेजर गवाह है कि मैं कल रात आठ बजे यहाँ आ गया था।”
 
पिस्तौल पर मेरे निशानात भी न थे और सबसे बड़ी बात यह थी कि मोहिनी मेरे पास थी। फिर भी शहर में पेश आने वाली पिछली कई वारदातें सिर उठा सकती थी, जिनमें मैं शरीक था। इसलिए मैंने पुलिस का सारा ध्यान वर्तमान घटना की संगीनी की तरफ आकर्षित कर दिया। इंस्पेक्टर मेरी उन बातों की तह न कुरेद सका।

चलते-चलते उसने मुझे हिदायत दी कि मैं एक डेढ़ महीने तक शहर न छोड़ूँ जब तक कि यह केस सुलझ नहीं जाता। उसे मेरी जरूरत पड़ सकती थी।

यहाँ ठहरना मेरे लिये अब एक पल भी गँवारा नहीं था। पर मैं इस बात को लेकर इंस्पेक्टर से अड़ जाता तो मामला नाजुक हो सकता था इसलिए मैंने उससे कहा– “इंस्पेक्टर साहब मेरी रवानगी में तो अभी बहुत दिन पड़े हैं। हाँ, यह हो सकता है कि मैं यह होटल छोड़ दूँ। यहाँ के कमरों में मुझे आराम नहीं मिल पाता। मगर उस स्थिति में मैं आपको अपने नए निवास की सूचना दे दूँगा।”

इंस्पेक्टर जब रवाना हुआ तो मेरे प्रति संतुष्ट था।

अब मेरा यहाँ ठहरना आवश्यक था जबकि डॉली की याद मुझे बेचैन किये देती थी। सारी रात मैं स्वयं से उलझा रहा। मोहिनी सुबह तक वापिस नहीं आई। जब आई तो सूरज खूब चढ़ चुका था। वह काफी थकी हुई थी। जब मैंने उससे इस बारे में पूछा तो बोली–

“राज, रात भर मैंने विभिन्न सिरों पर जाती रही हूँ! तुम्हें अंदाजा नहीं कि केस किस तरह उलझ गया है। इस शहर में तुम नए हो, पिछली कई वारदातों में तुम्हें लपेटा जा सकता था। बड़ी मुश्किल से मैंने उस पर काबू पाया। राज जिस समय तुम क्लब में कलवन्त के साथ थे उस समय इस नाटक ने अचानक उस समय मोड़ लिया जब बंशी थाने में पहुँचा। रामप्रसाद को बचाने के लिये उसने तुम्हारा नाम ले लिया और कहा कि उसने तुम्हें कोठी में जाते हुए तो देखा पर निकलते नहीं देखा। उसने यह भी बताया कि तुम त्रिवेणी के नौकर भी रह चुके हो। उधर रामप्रसाद की हालत बड़ी ख़राब हो रही थी।

हवालात में पहुँचने के बाद और मेरे उसके सिर से उतरने के बाद ही वह चीख-पुकार मचाने लगा था। वह रो-रोकर कह रहा था कि उसने क़त्ल नहीं किया। इससे यह लाभ जरूर हुआ कि उसे पागल समझा जाने लगा। रात के समय मैं उसके सिर पर पहुँची तो उसने एक बार फिर अपना बयान बदला। उसने क़त्ल का इक़बाल किया। और तुम्हारे बारे में कहा कि तुम त्रिवेणी के नौकर नहीं दोस्त हो। खुद त्रिवेणी का भी तुम्हारे बारे में यही बयान है। खैर, मैंने रामप्रसाद की ओर ही पुलिस का ध्यान आकर्षित किये रहने के लिये एक और ड्रामा खेला। रात के समय जब सब पहरेदार ऊँघ रहे थे तो मैं उस पहरेदार के सिर पर गयी जिसके पास हवालात की चाबियाँ थी। उसने ताला खोल दिया और एक और ठोकर मारकर रामप्रसाद को जगाया। फिर मैं रामप्रसाद के सिर पर गयी और दोनों को भिड़ा दिया। उसके बाद मैंने अपने पंजों की चुभन से पहरेदार को बेहोश कर दिया।

“अब फिर से रामप्रसाद के सिर पर जाकर उसे फरार किया। उसे छिपते-छिपाते रेलवे स्टेशन तक ले गयी जहाँ बम्बई जाने वाली एक गाड़ी पर उसे सवार करवाया। जब गाड़ी चल पड़ी तो मैं वापिस पुलिस स्टेशन पर पहुँची। अब मैं इंस्पेक्टर के सिर पर गयी। पुलिस स्टेशन में रामप्रसाद की फरारी से हंगामा मच गया था और पुलिस इंस्पेक्टर ने उसे एक पागल हत्यारा घोषित करके सारा ध्यान उसकी तरफ आकर्षित कर दिया। इस तरह तुम्हारी पोजीशन साफ करने के लिये बड़े पापड़ बेलने पड़े।

“इस समय त्रिवेणी अपनी कोठी में नजरबंद है और उसे मालूम है कि यह नाटक क्यों हो रहे हैं। मेरे खौफ से वह चुप है लेकिन राज अब तुम्हें यहाँ कुछ दिन और ठहरना पड़ेगा और इस बीच तुम डॉली से नहीं मिल सकोगे। लेकिन तुम्हारा यह समय भी अच्छा कट जायेगा। जब कलवन्त जैसी हूर तुम्हारे पहलू में होगी।”

“कलवन्त ने सचमुच मुझे दीवाना बना दिया मोहिनी।”

उसी दिन मैंने यह होटल छोड़कर एक बड़े होटल में सूट बुक किया और रेस खेलने निकल गया।

रेस के मैदान में मेरी मुलाकात कलवन्त से हुई। उस समय कलवन्त का मेरे प्रति वह व्यव्हार नहीं था जो रात था। कदाचित रात की घटनाएँ वह भूल गयी थी। मैं जानबूझकर उसके पास बैठ गया।

फिर मैंने उसे एक घोड़े पर दाँव लगाने के लिये कहा। कलवन्त ने मेरा उपहास उड़ाते हुए कहा– “यह रेस का मैदान है कुँवर साहब, आपकी स्टेट के घोड़ों का मैदान नहीं।”

लेकिन जब वह घोड़ा जीत गया तो कलवन्त को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसके बाद कलवन्त हारती रही और मैं जीतता चला गया। जब हम रेस के मैदान से बाहर निकले तो कलवन्त हजारों रुपया हार चुकी थी और मैं जीत चुका था। अब कलवन्त मुझसे प्रभावित हुए बिना न रह सकी।

“कमाल है, घोड़ों के बारे में तो आप जादूगर हैं...”

“हमारी जिंदगी में इन छोटी बातों का कोई महत्व नहीं, लेकिन तुम फ़िक्र न करो कल हम तुम्हारा घाटा कवर करवा देंगे।”

रेस के मैदान से बाहर निकलने के बाद कलवन्त अपने रास्ते पर चली गयी और मैं होटल की तरफ रवाना हुआ। शाम के समय मैं फिर उसी क्लब में पहुँचा। मेरा स्वागत आज क्लब के मैनेजर ने किया फिर लोगों की भीड़ मेरी मेज के इर्द-गिर्द जमा हो गयी। हालाँकि चन्दर ने मेरी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। बिल्कुल इस तरह जैसे मैं उसके लिये कोई अजनबी हूँ।

उनमें से बहुत से ऐसे थे जिन्होंने रेस के मैदान में मुझे जीतते देखा था। वे सब मुझसे घोड़ों और रेस के बारे पूछते रहे। परन्तु मेरी दृष्टि तो कलवन्त को तलाश रही थी। कलवन्त उस समय तक नहीं आई थी। मेरी दृष्टि रह-रहकर दरवाजे की तरफ मुड़ जाती।

सहसा वह दरवाजे पर लपकी तो तमाम मर्द उसकी तरफ लपक पड़े और हर कोई ‘कलवन्त आ गयी... कलवन्त आ गयी’ पुकारने लगा। सचमुच वह क्लब की शान थी। प्रत्येक पुरुष उस पर भँवरे की तरह मंडरा रहा था पर कलवन्त सीधी मेरी मेज पर आकर रुकी

“देर से आने के लिये क्षमा चाहती हूँ।”

“देर से आना और इन्तजार करवाना हर सुंदरी की नजाकत होती है।” मैंने हँसकर कहा।

उसने शर्म से अपनी दृष्टि झुका ली। फिर दूसरे लोग इधर-उधर हो गए और हम दोनों मेज पर अकेले रह गए।

“क्या पियेंगी ?”

“जो आप पिला देंगे।”

मैंने मैनेजर को तलब करके पूछा कि क्या उसके यहाँ विक्टोरिया के ज़माने की स्कॉच मिलेगी। मैनेजर ने सहमति प्रकट की और चला गया। थोड़ी ही देर में जाम आ गए।

“आज तो आपने कमाल ही कर दिया। मरियल-मरियल घोड़ों पर दाँव लगाया और जीतते चले गए।”

“घोड़ों पर लगा हुआ हमारा हर दाँव जीतता ही है।”

“क्या आपको इतना विश्वास है ?”

“लन्दन में हमने घोड़ों और बाकि के बारे में बहुत कुछ सीखा है और बात इतनी ही नहीं, कुछ और भी है।”

“और कुछ क्या ?”

“तुमने यह तो सुना होगा कि इंसान की आँखों में एक गुप्त शक्ति भी होती है जिसे दूसरे शब्दों में सम्मोहन शक्ति कहा जाता है ?”

“हाँ सुना तो है पर इसकी कभी स्टडी नहीं की।”

“यह सच है इंसान के भीतर कुछ ऐसी शक्तियाँ छिपी रहती हैं; लेकिन उन्हें जाग्रत करना हर किसी के बस की बात नहीं। मैंने बरसों तक इसका अध्ययन किया और प्रयास भी करता रहा। मुझमे कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं कि मैं आने वाले वक्त की बात जान सकता हूँ और मेरे में ऐसी शक्ति है कि किसी साधारण व्यक्ति से मनचाहा काम ले सकता हूँ।”

“अच्छा।” उसके नेत्रों में आश्चर्य था।

“तुम्हें विश्वास नहीं होगा। अच्छा देखो मैं एक करिश्मा दिखाता हूँ। वह सामने जो वेटर ट्रे उठाये चला आ रहा है उसे देखो। दस कदम चलते ही वह गिर पड़ेगा। ट्रे उसके हाथ से छूट जायेगी जबकि मैं यहाँ से हिलूँगा भी नहीं।”

इतना कहकर मैंने मोहिनी को संकेत किया वह मेरे सिर से उतर गयी।
 
“असम्भव।” कलवन्त कुछ सहमे स्वर में बोली।

“खुद देख लो।”

और वेटर दस कदम चलते ही गिर पड़ा। ट्रे उसके हाथ से छूट गयी। लोग एकदम चौंककर उसकी तरफ लपक पड़े।

“देखा तुमने।”

कलवन्त के नेत्रों में अब भय तैर रहा था।

मैंने कलवन्त को अपने प्रभाव में लेने के लिये कहा– “अच्छा बताओ इस हाल में ऐसी कोई औरत है जो तुम्हें पसन्द न हो ?”

“हाँ, वह मिसेज वर्मा!” उसने एक औरत की तरफ संकेत किया, “वह मुझे जरा भी पसन्द नहीं।”

“अब मेरा दूसरा करिश्मा देखो।”

मैंने मोहिनी को संकेत किया। मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी। वह औरत कुछ ही देर में अपनी मेज छोड़कर खड़ी हुई और मेरे पास आ गयी। बड़ी बेशर्मी से उसने मेरे गले में बाहें डाल कर हाय डार्लिंग कहा। फिर मैं उसे अपने से अलग करता रहा परन्तु वह थी कि हटने का नाम ही न लेती। उसने मेरे चेहरे को चुम्बनों से रंग दिया। आखिर उसका पति आया और बड़ा लज्जित होकर अपनी बीवी को घसीटता हुआ बाहर ले गया।

फिर मैंने उसे दो चार करिश्मे और दिखाए। हालाँकि मैं चाहता तो मोहिनी के जरिये कलवन्त को प्राप्त कर सकता था परन्तु उसे मैं स्वयं अपनी तरफ आकर्षित करना चाहता था। डांस फ्लोर पर वह मेरी बाँहों में थी पर अभी इतना करीब नहीं हुई थी जितना मैं चाहता था। उसके बाद मैं कलवन्त को लान पर ले गया वहाँ एकांत में एक बेंच पर लेट गया।

क्लब में आने से पहले उसके लिये एक कीमती हार ख़रीदा था जब हम लान में पहुँचे तो वह हार मैंने कलवन्त के गले में डाल दिया।

कलवन्त अभी धीरे-धीरे मेरे करीब आ रही थी। फिर न जाने क्यों जब मैं कलवन्त को देखता या उसकी याद आती तो डॉली भी उसके साथ याद आ जाती।

डॉली याद आती तो कलवन्त याद आती। दोनों जैसे एक दूसरे की पूरक थी। कलवन्त एक सुंदर फूल थी मैं उसे कुचलकर या मसलकर बासी नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था कि वह उसी तरह ताजा गुलाब रहे।

क्लब से लौटने के बाद मैं अपने होटल आकर सो गया। सवेरे मैंने समाचार पत्र में सविता मर्डर केस की सरगर्मियाँ पढ़ी। घटनाएँ उसी प्रकार थी जिस तरह मोहिनी ने मुझे बताई थी। बीच में एक आध जगह मेरी भी चर्चा थी, परन्तु नाम नहीं दिया गया था। पुलिस फरार मुजरिम को तलाश कर रही थी।

त्रिवेणी ने बयान दिया था कि सविता उससे मिलने के बाद चली गयी थी फिर निचले खण्ड से गोली चलने की आवाज सुनकर वह नीचे आया तो एक कमरे में सविता की खून से लथपथ लाश पड़ी थी और फर्श पर रिवाल्वर पड़ा था हत्यारा गायब था। इस तरह त्रिवेणी मोहिनी की मेहरबानियों से बच गया था।

त्रिवेणी का ख्याल आते ही मेरे सीने में बदले की आग धधक उठी। वे सारे जुल्म याद आ गए जो त्रिवेणी ने मुझ पर छोड़े थे। मैं उसे जान से नहीं मारना चाहता था बल्कि उसकी जिंदगी नर्क बना देना चाहता था। जान से मारना तो बहुत आसान था।

जब मोहिनी सोकर उठी तो मैं नाश्ता कर रहा था।

“गुड मॉर्निंग मोहिनी!” मैंने मोहिनी को शुभ प्रणाम कहा।

मोहिनी मुस्कुरायी। एक अंगड़ाई लेकर उठ बैठी और मेरे माथे पर दोनों कोहनियाँ टेककर औंधी लेट गयी।

“गुड मॉर्निंग राज!” वह इठलाती हुई बोली।

“अब क्या प्रोग्राम है ?”

“बांदी तो आपके हुक्म की पाबन्द है, हुक्म कीजिये।”

“मेरा ख्याल है कि आज त्रिवेणी से मुलाकात की जाये।”

“त्रिवेणी की कोठी पर इस समय पुलिस का पहरा है।” वह बोली, “तुम्हारा वहाँ जाना उचित न होगा। वह मूर्ख मुझसे बचने का कोई उपाय खोज रहा है। छोटा-मोटा तांत्रिक है, दो-चार चालें भी जानता है लेकिन मैं अब उसे इसका अवसर नहीं दूँगी। तुम्हारा अभी उससे मुलाकात करने से कोई लाभ न होगा। मैं अकेली उससे मिल आऊँगी।”

“जैसा तुम उचित समझो।”

अब तुम तेजी से अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में ध्यान दो राज। कोई न कोई कारोबार तुम्हें खड़ा करना ही पड़ेगा और इसके लिये बम्बई उपयुक्त रहेगा।”

“लेकिन जब तक यह मामला निपट नहीं जाता मैं किस तरह पूना छोड़ सकता हूँ।”

“यह कहो कि कलवन्त तुम्हें बहुत पसन्द आ गयी है।”

“हाँ मोहिनी, तुमसे क्या छिपाना। कलवन्त बहुत अच्छी लड़की है। इस शहर की कब्रनाक यादों के खण्डहर मेरे साथ-साथ रहेंगे।”

“धीरे-धीरे तुम सब भूल जाओगे।”

उस दिन भी मैं रेस के मैदान पहुँचा। कलवन्त मुझे मिल गयी। इस बार कलवन्त ने मेरे बताये घोड़ों पर दाँव लगाए और रेस खत्म हुई तो सवा लाख रुपया कलवन्त जीती चुकी थी। इतनी ही रकम मेरे पास थी। कलवन्त मेरे साथ-साथ होटल तक आई। उसने हजारों रुपया मुझे देना चाहा क्योंकि मेरी टिप पर उसने यह रकम जीती थी। किन्तु मैंने उसे लेने से इंकार कर दिया। वह अब मुझसे काफी धुल-मिल गयी थी।

उस शाम मैं फिर क्लब पहुँचा। मोहिनी कुछ देर के लिये मेरे सिर से चली गयी थी। काफी देर रात गए तक वह न लौटी तो मैं सो गया। मगर सुबह मोहिनी मेरे सिर पर थी, सो रही थी। हमेशा ही वह देर से जागती थी। मैं उससे रात के बारे में कुछ पूछना चाहता था कि वह कहाँ गयी थी परन्तु फिर समाचार पत्र ने मुझे सब कुछ बता दिया।

त्रिवेणी की कोठी में भयंकर अग्नि का समाचार था। पागलपन में त्रिवेणी ने स्वयं ही अपनी कोठी पर आग लगा दी थी। सारा सामान जलकर राख हो गया था और फायर ब्रिगेड वालों ने उसे बड़ी मुश्किल से बेहोशी आलम में आग से निकाला था। त्रिवेणी बुरी तरह झुलस गया था और अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा था।
 
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