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Fantasy मोहिनी

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अख़बार में सारा विवरण लिखा हुआ था और यकीनन यह कारनामा मोहिनी का था। मोहिनी के जागने पर मैंने उससे इस बारे में पूछा।

“हाँ राज! मैंने सोचा क्यों न उसे कंगाल कर दूँ इसलिए मैंने ऐसा ही किया। साथ ही उसे इतना बदसूरत बना दिया कि वह अपनी सूरत दर्पण में देखते हुए भी डरा करेगा।”

“लेकिन वह मर गया तो...”

“नहीं मरेगा नहीं, बड़ी सख्त जान है। अब वह अस्पताल में है ठीक होने में काफी दिन लगेंगे। अब चाहो तो एक-दो रोज बाद अस्पताल में उससे मिलकर आ सकते हो। उससे कोठी में मिलना ठीक न था। अस्पताल में तो कोई भी उससे मिल सकता है।”

“ठीक है मोहिनी, तुमने शुरुआत बहुत अच्छी की।”

तीन-चार रोज में ही मैंने रेस के मैदान से खासी दौलत समेट ली। मेरी आर्थिक स्थिति तेजी के साथ सुधरती जा रही थी। मेरे ठाट-बाठ फिर पुराने ढर्रे पर लौटने लगे थे। वेटर को तगड़ी टिप देना, भिखारियों को सौ-सौ रुपये तक दे देना। इस बार मोहिनी आई थी तो मैं बुराइयों से दूर रहना चाहता था। इसलिए मैंने कलवन्त को सिर्फ अपनी दोस्ती तक ही सिमित रखा। मैं त्रिवेणी की तरह जालिम नहीं बनना चाहता था। एक सप्ताह बाद मैं त्रिवेणी से अस्पताल में मिला। बड़ी मुश्किल से उसने मुझे पहचाना। उसका पूरा जिस्म पट्टियों में लिपटा था और पूरी तरह अपने होश में नहीं था। वह गूँगा सा होकर रह गया था या मुझसे बात करने के लिये उसके कंठ से शब्द ही नहीं फूट पा रहे थे।

“क्यों, अब कैसे मिजाज हैं ?” मैंने उससे पूछा, “यह आग कैसे लग गयी महाराज ?”

वह चुप रहा। बस याचना भरी दृष्टि से मुझे देखता रहा।

“तुम्हें अपनी दौलत से तो बड़ी लगावट थी त्रिवेणी और यह कोठी तुम्हें बड़ी प्यारी थी। फिर आग क्यों लगा दी।”

“कुँवर साहब!” त्रिवेणी कराहा, “मुझे क्षमा कर दो!”

“क्षमा किस बात की ?” मैंने आश्चर्य प्रकट किया।

“मैं जानता हूँ यह कैसे हुआ। आप मुझसे बदला लेना चाहते हैं। आप मेरे दोस्त हैं, मुझे क्षमा कर दो।”

“त्रिवेणी, तुमने तो मुझे कभी क्षमा नहीं किया। मैंने तुम्हारे जुल्म सहे और तुम भी मर्द बनकर मेरा मुकाबला करो। यह शुरुआत है त्रिवेणी, उस मुलाकात के बाद यह हमारी दूसरी मुलाकात है और तीसरी मुलाकात तब होगी जब तुम अस्पताल से निकल चुके होंगे।” मैंने अपने को संतुष्ट कर दिया और फिर उसके स्वास्थ्य के सम्बन्ध में बातें करता रहा– “मैं तुम्हें अपने ऊपर तोड़े गए हर जुल्म की याद दिलाऊँगा त्रिवेणी दास।”

फिर मैं उसे दयनीय हालत में कराहता छोड़कर अस्पताल से बाहर आ गया।

पूना में दस-बारह दिन रहने के बाद मैंने बम्बई प्रस्थान की तैयारी शुरू कर दी। जाते समय मैं इंस्पेक्टर से मिलता आया और उसे बताया कि मैं पूना छोड़ रहा हूँ। जरूरत पड़े तो बम्बई के ताज होटल में मुझसे संपर्क किया जा सकता है। मैंने उसे ताज होटल का पता दे दिया।

कलवन्त मुझसे अलग नहीं होना चाहती थी। जब मैं उससे विदा हुआ तो उसने मेरे गले में बाहें डाल दी।

“हम फिर कब मिलेंगे ?” उसने पूछा।

“जल्दी ही...”

“क्या आप अपनी रियासत में हमें बुलाएँगे।”

“सुनो कलवन्त, हम किसी रियासत के राजकुमार नहीं! यह सुनकर धक्का पहुँचेगा पर तुम्हें विदाई के समय किसी तरह के धोखे में नहीं रखना चाहता।”

मेरा ख्याल था कि यह सुनकर कलवन्त को मुझसे किसी प्रकार की लगावट नहीं रहेगी परन्तु ऐसा न था। इस बात का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह किसी रियासत के प्रिंस को नहीं बल्कि राज को चाहती थी।

बम्बई पहुँचकर मैंने अपना कारोबार जल्दी ही खड़ा कर लिया। एक शानदार कोठी भी खरीद ली और जल्दी ही मैं फिर उसी समाज में साँस लेने लगा जहाँ पहले जीता था। जब मेरे अच्छे दिन थे तो यह लोग मेरे इर्द-गिर्द रहते थे। मेरे सबसे बड़े शुभचिंतक थे। परन्तु बुरे दिनों में कोई साथ नहीं रहा। किसी ने मेरे फैले हुए हाथ में भीख तक न डाली। हर कोई मुझसे नफरत करने लगा था। मैंने बहुत अच्छे दिन देखे थे और बहुत बुरे भी। और मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा किसी इंसान को अच्छे दिन न दे तो फिर उसे बुरे दिन न देखने पड़े। यदि किसी को बुरे दीन देखने पड़े तो उसे अच्छे दिन भी दिखाए। इंसान भी एक अजीब फितरती चीज है। उसके बनाये हुए समाज में उन लोगों के लिये कोई जगह नहीं होती जो बुरे दिनों को देखते हैं। हर कोई उससे मुँह मोड़ लेता है और सिर्फ अँधेरा उसका साथ देता है। उजाले उससे रूठ जाते हैं। लोग भी ऐसे ही समाज के प्राणी थे।

अब मैं फिर बड़ी-बड़ी पार्टियों में घिरा रहता। सुंदर औरतें मेरे पहलू में आने के लिये तरसती लेकिन मैं कड़वा घूँट पीकर आया था इसलिए उनसे दूर ही रहता...

बस अब मुझे डॉली की जरुरत थी ताकि मेरी घरेलू जिंदगी के दोपजल उठे और फिर मैंने एक निश्चित तारीख में बम्बई से डॉली के शहर की यात्रा शुरू कर दी।

उस नगरी में पहुँचकर मुझे फिर कई चेहरे याद आये। डॉली के बाप का चेहरा उनमें सबसे ऊपर था। लेकिन मैं डॉली के बाप को सबक पढ़ाना चाहता था। मैं जानता था मोहिनी मेरे पास है और अब डॉली को प्राप्त करने में कोई बाधा मेरे सामने न आएगी। डॉली का बाप अगर मेरा ससुर न होता तो मैं न जाने उसके बारे में क्या फैसला कर डालता।

इस सिलसिले में मैंने मोहिनी की सावधानी से निर्देश दिए और मोहिनी ने अपना काम शुरू कर दिया। जिस तरह मोहिनी के चले जाने से डॉली भी मुझसे रूठ गयी थी और मेरा घर उजड़ गया था। उसी तरह मोहिनी की वापसी से मेरा जहाँ आबाद होने लगा। मोहिनी के लिये डॉली के बाप को सबक पढ़ाना कोई मुश्किल काम न था। चार दिन में ही डॉली का बाप सीधे रास्ते पर आ गया और डॉली की कोठी पर पहुँचकर उसने एक दामाद की तरह ही मेरा स्वागत किया। डॉली एक बार फिर मेरे जीवन में वापिस आ गयी थी।

डॉली को मैं होटल में ले आया। वह बहुत कमजोर हो चुकी थी और उसके चेहरे पर रौनक भी न रही थी।
 
अभी डॉली को होटल में आये दूसरा दिन था कि अचानक एक शाम जब हम दोनों कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी तो न जाने क्यों मेरी धड़कन बढ़ गयी।

कुछ क्षण बाद ही दरवाजे पर दस्तक हुई जैसे कोई दुहत्तड़ मारकर दरवाजा पीट रहा हो। मैं डॉली को छोड़कर दूसरे कमरे में गया फिर मैंने दरवाजा खोल दिया तो आश्चर्य से मेरी आँखे फ़ैल गयी।

सामने हरि आनंद खड़ा था। वही पंडित हरि आनंद जिसकी मदद से मोहिनी मुझे प्राप्त हुई थी। अगर कोई और होता तो उसकी इस बेहूदगी पर मैं उसके साथ कठोरता से पेश आता परन्तु हरि आनंद को देखते ही मेरा क्रोध ठंडा हो गया।

“आप पंडित जी।”

“क्यों...क्या मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था ?” हरि आनंद ने मुझ पर मुस्कुराती दृष्टि फेंकते हुए कहा।

“अहो भाग्य मेरे जो आपने दर्शन दिए। आइये।”

मैंने देखा हरि आनंद को देखकर मोहिनी एकदम सहमी सी नजर आ रही है। वह बेचैनी से पहलू बदल रही थी। हरि आनंद कमरे में आ गया।

“क्यों कुँवर साहब, आप तो हमें भूल ही गए होंगे।”

“यह बात नहीं पंडित जी। आपको भला मैं किस तरह भूल सकता हूँ।”

“तुमने अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर ली है न।”

“जी हाँ, आपकी दुआ से! चलिये, चलकर रेस्टोरेंट में बातें करते हैं।”

मैं नहीं चाहता था कि डॉली हमारी बातें सुने। इसलिए मैं हरि आनंद को होटल के रेस्टोरेंट में ले आया। फिर हम किनारे की एक ऐसी मेज पर बैठ गए जहाँ हमारी बातें कोई नहीं सुन सकता था।

“मैं एक आवश्यक काम से आया था राज।” हरि आनंद ने कहा, “मोहिनी तुम्हें मिल गयी है और तुम्हें अपना वचन तो याद होगा या भूल गए ?”

“कौन सा वचन पंडित जी ?”

“वाह, तुम दिया हुआ वचन भूल गए! खूब! खैर, मैं तुम्हें याद दिला देता हूँ। तुमने वचन दिया था कि मोहिनी को कुछ दिन के लिये मेरे हवाले कर दोगे।”

“ओह हाँ! याद आया। आप ठीक कहते हैं। मुझे अच्छी प्रकार याद है और मैं अवश्य अपना वचन निभाऊँगा। मेरे मन में कोई खोट नहीं है। क्या पिएँगे आप, क्या खाएँगे ?”

“मैं होटल में न तो खाता हूँ, न पीता हूँ। मैं सिर्फ दूध पीता हूँ और हरि सब्जियाँ खाता हूँ। वास्तव में मैं इस समय तुम्हारे पास इसलिए आया था क्योंकि मुझे कुछ दिन के लिये मोहिनी की आवश्यकता है। मैं उससे एक काम लेना चाहता हूँ।”

“आप काम बता दीजिये मैं मोहिनी से कहकर करवा दूँगा।”

“वह काम तुम्हारे वश का नहीं।” हरि आनंद ने मुस्कुराते हुए कहा, “वह काम मोहिनी से मैं ही ले सकता हूँ।”

मोहिनी अब भी सहमी हुई थी।

मैंने बहाना बनाते हुए कहा– “वास्तव में हरि आनंद जी अभी-अभी मैं कुछ सँभला हूँ और इस वक्त भी हर कदम पर मुझे मोहिनी के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है इसलिए अगर आप कुछ दिन रुक जाएँ तो उचित होगा। मेरे हालात भी सम्भल जायेंगे और मैं अपना वचन भी निभा दूँगा।”

पंडित हरि आनंद की भृगुटि तन गयी। वह ठंडे स्वर में बोला, “तुम्हारे मन में खोट आ गया है बालक। तुम क्या सोच रहे हो यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ। मेरे लिये किसी इंसान के भीतर का हाल जानना कोई कठिन कार्य नहीं। मेरी शक्ति का अनुमान तुम इसी से लगा सकते हो कि मैं यहाँ तुम तक कितनी आसानी से पहुँच गया। तुम पर हर समय मेरी दृष्टि में रहे हो। तुमने कब क्या किया यह मुझसे छिपा नहीं है।”

“आप नाराज न होइए। मैं सच कहता हूँ, मेरे मन में कोई खोट नहीं है।”

“तो फिर तीन दिन बाद पूर्णमासी की रात तुम मेरे स्टेशन पार वाले मरघट पर रात के बारह बजे आओगे और मोहिनी को साथ लेकर आओगे। मैं तुमसे वहाँ बात करूँगा। अगर तुम न आये तो मैं समझूँगा तुम अपने वचन से फिर गए। उसके बाद तुम्हें मेरी शक्तियों का पता चल जायेगा।” इतना कहकर हरि आनंद उठ खड़ा हुआ। मैं उसे रोकता रह गया परन्तु वह नहीं रुका।

और अब मैं उलझन में फँस गया।
 
मोहिनी ने सहमे हुए स्वर में पूछा– “यह हरि आनंद को तुम कब से जानते हो ?”

मैंने मोहिनी को सारी कहानी सुना दी।

“ओह तो इसी ने वह पर्दा बड़ा किया था जो मैं उन दिनों तुम्हें देख न सकी राज ? तुमने उसे वचन देकर बहुत बुरा किया। हरि आनंद कोई छोटा-मोटा पुजारी-पंडित नहीं है। उसने बड़े-बड़े तप किये हैं और उसे देवताओं ने कई रहस्यमय शक्तियाँ वरदान में दी हैं। मुझे डर है कि अगर तुमने वचन न निभाया तो न जाने वह तुम्हें कितनी बड़ी हानि पहुँचा दे।” मोहिनी खुद परेशान थी।

“क्या तुम इस सिलसिले में मेरी कुछ मदद नहीं कर सकती ? मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें उसके हवाले नहीं करूँगा।”

मोहिनी सोच में पड़ गयी।

“राज, तुम हरि आनंद के बारे में कुछ भी नहीं जानते! मुझे सोचने दो राज। पंडित हरि आनंद जहाँ एक ओर चालाक और कमीना व्यक्ति है वहीं उसके पास ताकत भी है। उसके पास असंख्य प्रेत शक्तियाँ हैं। उसे काली माई का आशीर्वाद भी प्राप्त है। काले जादू में भी अपनी शानी नहीं रखता। मुझे सोचना पड़ेगा कि तुम्हें उसके चंगुल से कैसे छुटकारा दिलाऊँ।”

“मोहिनी!” मैंने डरते हुए दिल से कहा, “क्या तुम्हारी अपरम्पार शक्तियाँ भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती ? क्या तुम भी उसके सामने कमजोर हो ?”

“मेरी बात दूसरी है राज। मैं अपने आका के सिवा किसी के सामने कमजोर नहीं हूँ। मुझे देवता ही परेशान कर सकते हैं। लेकिन राज जिस तरह इंसानो में श्रेणियाँ होती हैं, रहस्यमय शक्तियाँ भी कुछ नियमों की पाबन्द होती हैं। और उस समय तक एक दूसरे से टकराने की कोशिश नहीं करती जब तक पानी सिर से ऊँचा न हो जाये।”

मैं मोहिनी से बातें करता हुआ अपने कमरे में आया तो वहाँ डॉली टहल रही थी। आते ही उसने मुझसे पूछा – “कहाँ गए थे ? और वह कौन व्यक्ति था जो इतनी बतमीजी से दरवाजा पीट रहा था ? मैं तो घबरा गयी थी।”

“इसी होटल में मेरा एक पुराना मित्र भी ठहरा है। मैं रेस्टोरेंट में उसे चाय पिलाने ले गया था।” मैंने डॉली के स्वास्थ्य लाभ के लिये मैंने यह उपयुक्त समझा कि उसे हिल स्टेशन पर ले चलूँ।

जब मैंने उसे बताया कि मोहिनी वापिस आ गयी है और उसी की मेहरबानियों से हम अच्छे दिन देख रहे हैं तो उसने ख़ुशी प्रकट की।

“मोहिनी से पूछो, क्या वह अब तो आपको छोड़कर नहीं जायेगी ?” उसने पूछा।

“नहीं, अब वह मेरी जिंदगी का एक हिस्सा है। वह मुझसे अलग न होगी।”

मोहिनी हमारी बातें बड़े गौर से सुनती रहती। उसे डॉली का विशेष ख्याल था। हमारे बीच नयी-पुरानी जिंदगी की बातें, गिले-शिकवे होते रहते और अब हमारे सामने एक सुनहरा भविष्य था।

मोहिनी इस मध्य बराबर किसी सोच में डूबी रही। स्वयं मेरा मस्तिष्क भी हरि आनंद की रहस्यमय शक्तियों में उलझा हुआ था। इसलिए जब डॉली सो गयी तो मैं धीरे से उठकर बराबर वाले कमरे में आ गया। मैंने अपनी टांगे मेज पर टिका दी और मोहिनी की तरफ मायूसी से देखा। वह बहुत चिंतित नजर आती थी।

हम दोनों देर तक एक दूसरे की तरफ देखते रहे। मैंने उसे संबोधित करके कहा–

“मोहिनी, क्या तुम्हें इस बात का ज्ञान है कि हरि आनंद ने तुम्हारे सम्बन्ध में मुझसे क्यों वचन लिया था।”

“अभी कुछ नहीं मालूम परन्तु मैं इतना अवश्य बता सकती हूँ कि वह मुझसे कोई बहुत महत्वपूर्ण काम लेगा। कोई ऐसा काम जो उसकी शक्ति से बाहर हो।”

“क्या यह सम्भव नहीं कि मैं उसका किस्सा ही तमाम कर दूँ ?” मैंने डरते-डरते दिल से यह बात कही तो मोहिनी तेजी से बोली–

“यह ख्याल मस्तिष्क से निकाल दो मेरे प्यारे राज। अव्वल तो तुम उस पंडित का बाल भी बांका नहीं कर सकते और यदि किसी तरह ऐसा हो भी गया तो एक बड़ा मठ और उसका मठाधीश तुम्हारा दुश्मन बन जायेगा।”

“क्या मतलब ?”

“हरि आनंद कोई साधारण हस्ती का पंडित नहीं। इस तरह के लोगों के भी सम्प्रदाय बँटे हुए हैं। यह बहुत उलझी हुई बात है जो तुम्हारी समझ में नहीं आएगी। अभी तुम यह समझ लो कि तुम भूलकर भी उसे मारने का कदम न उठाना। मैं पहले मुजरिम नहीं बनना चाहती।”

“फिर तुमने क्या सोचा है ?” मैंने बेबसी से पूछा।

“जल्दी न करो राज।” मोहिनी ने सपाट आवाज में उत्तर दिया, “तुम आराम करो। जब तक मैं तुम्हारे सिर पर हूँ तुम्हें घबराने की कोई आवश्यकता नहीं। अलबत्ता मुझे तो एक बात परेशान किए देती है। हरि आनंद तुम्हारी तरफ से मायूस होकर कोई ऐसी हरकत न कर बैठे जो तुम्हारे लिये दर्दनाक हो।”

“मोहिनी!” मैंने भर्रायी हुई आवाज में कहा, “तुम्हारा संकेत डॉली की तरफ तो नहीं है ?”

“इस बदमाश पंडित से कोई भी उम्मीद की जा सकती है राज। वह किसी भी समय कुछ भी कर सकता है। मोहिनी ने कहा फिर मुझे सांत्वना देती हुई बोली, “इतनी जल्दी मायूस मत हो। अब ऐसा भी नहीं। मैं तुम्हारे साथ हूँ, तीन रोज की मोहलत बाकी है। मुझे विश्वास है कि इस अरसे मैं यह मालूम कर लूँगी कि हरि आनंद क्या चाहता है। वैसे डॉली का ख्याल मुझे भी है। अब तुम डॉली के पास जाओ। हो सकता है कि मैं आज ही रात हरि आनंद के इरादे का पता लगा लूँ।

“मोहिनी! तुम जानती हो मैं सारी दुनिया के लिये बुरा हो सकता हूँ। यूँ भी मैं कोई अच्छा आदमी नहीं हूँ। लेकिन डॉली के बारे में मेरे दिल में हमेशा सच्चा प्यार रहा है। मैं उससे अपने आपसे अधिक प्यार करता हूँ। मैंने बड़ी ठोकर खाने के बाद डॉली को प्राप्त किया है। चाहें मेरी जान ही क्यों न चली जाये पर डॉली को कुछ न हो। उसके लिये मैं अपनी जिंदगी की भेंट देने से भी पीछे नहीं हटूँगा। तुम्हें हर सूरत से डॉली का ख्याल मुझसे अधिक रखना होगा। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं सारी दुनिया को आग लगा दूँगा।”

“यह तुम मुझसे क्यों कह रहे हो ?” इस बार मोहिनी ने सिर झुकाते हुए कहा, “तुम्हारा संकेत ही बहुत है राज। अच्छा अब तुम जाओ और आराम से सो जाओ। मैं वचन देती हूँ कि डॉली हर तरफ से सुरक्षित रहेगी।”
 
मोहिनी ने डॉली के सिलसिले में इत्मिनान दिलाया तो मेरी चिंता कुछ कम हो गयी। मैंने मोहिनी को अधिक नहीं कुरेदा और चुपचाप सोने चला गया।

रात के समय एक आध बार जब मेरी आँख खुली तो मैंने मोहिनी को जागते देखा। वह निरन्तर कुछ सोचती रही थी और मैं यह सोच रहा था कि पंडित हरि आनंद को किस तरह टालूँ। मैंने वचन अवश्य दिया था परन्तु अब मैं मोहिनी को किसी भी कीमत पर अपने से जुदा नहीं करना चाहता था। हरि आनंद का अचानक इस प्रकार आना मुझे शुभ नहीं लग रहा था।

सुबह जब मैं उठा तो मोहिनी को टहलते हुए पाया। उसकी आँखे बता रही थी कि वह सारी रात नहीं सोई। उसकी इस बेचैनी ने मुझे भी चिंतित कर दिया।

“क्यों मोहिनी, तुम रात भर जागती रही।”

“हाँ राज, मैं अब तक हरि आनंद के बारे में सोचती रही हूँ।”

“कोई उपाय सूझा ?”

“राज, मुझे सिर्फ इतना ज्ञात हो सका कि वह मुझसे क्या काम लेना चाहता है! दरअसल वह मुझसे एक रहस्यमय शक्ति का राज मालूम करना चाहता है जिसे वह प्राप्त करना चाहता है। अगर उसने एक बार उस शक्ति को प्राप्त कर लिया तो फिर हरि आनंद की ताकतें इतनी बढ़ जाएँगी कि मोहिनी भी उसका कुछ न बिगाड़ सकेगी और वह तुम्हारे लिये भी हानिकारक होगा। हरि आनंद हर इस व्यक्ति का दुश्मन है जिसके पास मोहिनी है।”

“तो फिर उससे निपटने की क्या सूरत है ?”

“तुम्हें उसके बताये गए समय पर मरघट जाना होगा।”

“तुम्हारा मतलब है कि तुम्हें उसके हवाले कर दूँ।”

“यह मैं कब कह रही हूँ।”

तो फिर मरघट जाकर मैं उसके सामने विवश हो जाऊँगा। वह मुझे हानि पहुँचाने की कोशिश करेगा इसलिए उसने मुझे मरघट पर बुलाया है।”

“और मैं चाहती हूँ कि वह तुम्हें हानि पहुँचाये।”

“मैं समझा नहीं। तुम क्या कहना चाहती हो ?”

“हिम्मत से काम लो राज। हमारे ऊपर कुछ पाबन्दियाँ अवश्य होती हैं। हमें उनके अनुरूप चलना पड़ता है। ऐसे में मैं हरि आनंद का कुछ नहीं बिगाड़ सकती परन्तु अपने आका की रक्षा के लिये मैं पाबन्दियाँ तोड़ सकती हूँ। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि शुरुआत हरि आनंद करे। जब उसकी तरफ से पहली चोट हो जायेगी तो मोहिनी अपनी सीमाओं के पार जाकर भी जंग कर सकती है।

“और वह जंग किस तरह की होगी ?”

“तुम स्वयं अपनी आँखों से देख लोगे– कंकलनियाँ-योनिया, जिन्नात-छलावा, हमजाद। ऐसी अनगिनत शक्तियाँ है और ये शक्तियाँ आपस में कभी नहीं टकराती। जब तक मैं तुम्हारे सिर पर हूँ इनमे से कोई शक्ति तुम्हें पराजित नहीं कर सकती। बस तुम्हें अपना हौसला बनाये रखना होगा। अगर तुमने अपने होश खो दिए तो फिर बड़ी मुश्किल हो जायेगी।”

“जब तुम मुझे यह विश्वास दिला रही तो भला तुम्हारे रहते मुझे किससे डर। मैं बड़ी-बड़ी ताकत से टकराने के लिये तैयार हूँ।”

“ठीक है राज! अब तुम इस तरफ से सोचना बन्द कर दो।”

“लेकिन मुझे एक बात तो बताओ मोहिनी। हरि आनंद के लिये जब तुम्हारा इतना महत्व है तो उसने तुम्हें प्राप्त करने के लिये आज तक जाप क्यों नहीं किया ?”

“इसका भी एक कारण है। वास्तव में हरि आनंद और त्रिवेणी का सम्बन्ध एक ही मठ से है और इस मठ के लिये एक समय में एक ही व्यक्ति जाप कर सकता है। हरि आनंद से पहले त्रिवेणी ने मोहिनी को प्राप्त करने की आज्ञा माँग ली थी और जब तक मोहिनी त्रिवेणी के पास थी हरि आनंद उसके लिये जाप नहीं कर सकता था। हरि आनंद ने दूसरी शक्तियाँ प्राप्त कर ली थी। जब उसे मालूम हुआ कि दूसरे मठ का एक साधू मोहिनी के लिये जाप कर रहा है तो उसने इस अवसर का लाभ उठाकर तुम्हारी सहायता की ताकि मैं तुम्हारे पास आ जाऊँ और त्रिवेणी मेरी शक्ति से वंचित हो जाये।”

“तो क्या अब असफल होने पर वह तुम्हारे लिये जाप नहीं कर सकता।”

“नहीं राज! जब तक त्रिवेणी जिन्दा है वह नहीं कर सकता और तुम्हारे हक में यह अच्छा ही हुआ कि तुमने त्रिवेणी को समाप्त नहीं किया। हरि आनंद ने यही सोचा था कि तुम त्रिवेणी को मार दोगे। फिर मेरी प्राप्ति के लिये उसका यह काँटा भी साफ़ हो जाता और हरि आनंद उसे मार नहीं सकता। यह मठ के नियम के विरुद्ध है।

“इन लोगों का मठ कहाँ है ?”

“बस करो राज । जितनी बातें मुझे मालूम थी, मैंने तुम्हें बता दी।

उसके बाद मैंने मोहिनी से कुछ नहीं पूछा।
 
तीन दिन इस तरह कट गए कि कुछ पता ही न चला। इन तीन दिनों में तरह-तरह के विचार मेरे मस्तिष्क में आते रहे। मोहिनी भी अधिकतर खामोश ही रही। शुरू-शुरू में मैं भयभीत सा रहा। परन्तु तीसरी शाम मोहिनी ने फिर से मेरा साहस बढ़ाया और मैं मरघट के लिये आवश्यक तैयारियाँ करने लगा।

रात के साढ़े ग्यारह बजे जब डॉली सो गयी तो मैं चुपचाप बाहर निकला। मैंने सूट का दरवाजा बाहर से लॉक कर दिया और एक तंदरुस्त वेटर को पैसा देकर डॉली की रखवाली पर छोड़ दिया। उसके बाद मैं मरघट का रास्ता नापने लगा।

वह जगह मेरे लिये नयी नहीं थी। सच पूछा जाये तो मोहिनी की दास्तान उसी मरघट से शुरू हुई थी जब मैं रामदयाल की माँ की अंत्योष्टि में वहाँ आया था।

मोहिनी ने पूरे रास्ते मुझसे कोई बात नहीं की। उसके चेहरे पर गहरी गंभीरता और चिंता के आसार बराबर मौजूद थे। मैंने उसकी चिंता में साझेदार होना उचित नहीं समझा। मैंने हरि आनंद से टकराने का ठोस इरादा कर लिया था। इसके बावजूद भी न जाने क्या बात थी जो मुझे भविष्य में आने वाले ख़तरों का अहसास दिला रही थी।

पूर्णमासी का चाँद नीले आसमान पर पूरी आब-ओ-ताब से चमक रहा था लेकिन उस समय मैं उसकी सुंदरता से प्रभावित न हो सका। कदाचित इसलिए कि मरघट की रहस्यमय और खौफनाक वीरानी ने चांदनी को भी अपने खौफनाक माहौल में जकड़ लिया था। हर तरफ बड़ा भयानक सन्नाटा छाया हुआ था। मैं नपे तुले कदम उठा आगे बढ़ रहा था। कोई पत्ता भी खटकता तो मैं चौंक पड़ता। मुझे यूँ महसूस होता जैसे किसी मुर्दे की गन्दी आत्मा मेरा पीछा कर रही हो। मेरी कलाई घड़ी में उस समय पौने बारह बज रहे थे। मैंने अँधेरे में चारों तरफ का जायजा लिया लेकिन दूर-दूर तक कोई न था। मोहिनी अब भी अपने विचारों में गुम थी। मैं एक जगह रुक गया और उस दिशा में दृष्टि जमा दी जहाँ से हरि आनंद के आगमन की उम्मीद थी।

अभी मुझे वहाँ खड़े हुए मुश्किल से एक मिनट गुजरा था कि पीछे से हरि आनंद की आवाज सुनकर मैं यूँ उछल पड़ा जैसे किसी ने बिजली का नंगा तार मेरे जिस्म पर लगा दिया हो। मैंने तेजी से पलटकर देखा, हरि आनंद मुझसे दो फ़ीट की दूरी पर खड़ा था। अँधेरे के बावजूद मुझे उसकी आँखे रोशन नजर आ रही थी। दो दहकते हुए सुर्ख अंगारों की तरह।

मुझे हरि आनंद के अचानक आगमन पर हैरत थी लेकिन फिर मैंने इस विचार से अपने आपको तसल्ली दी थी कि सम्भव है पहले से ही यहीं कहीं पीछे बैठा हो और मुझे भयभीत करने के लिये इस नाटकिय ढंग से प्रकट हुआ हो। इस विचार ने मेरे मन में उसके प्रति और नफरत बढ़ा दी।

मैं ख़ामोशी से उसके सामने खड़ा रहा। कुछ देर तक एकदम स्तब्धता छाई रही। फिर हरि आनंद की खुश्क आवाज सन्नाटे का सीना चीरती उभरी–

“कुँवर राज ठाकुर, मुझे ख़ुशी है कि तुम ठीक समय पर आ गए। क्या मोहिनी इस समय तुम्हारे सिर पर मौजूद है ?”

“हाँ!” मैंने संतुलित स्वर में उत्तर दिया।

“और मोहिनी के सिलसिले में तुम्हें अपना वचन याद है ?”

“हाँ!” मैंने सपाट स्वर में कहा।

“मैं इस समय तुम से अधिक बातें नहीं करूँगा। अपने दिए हुए वचन के अनुसार अब तुम मोहिनी को अपने आदेश से मेरे सुपुर्द करो। मैं तुम्हें अपने देवी-देवताओं की सौगन्ध खाकर वचन देता हूँ कि मोहिनी को चार रोज बाद वापिस कर दूँगा।” हरि आनंद ने एक-एक शब्द जमा कर कहा। अब मेरे लिये पैंतरा बदलने का समय आ गया था। मैंने बड़े खुश्क स्वर में कहा–

“हरि आनन्द, तुम यह इच्छा होटल में भी प्रकट कर चुके हो। मुझे आधी रात को मरघट में बुलाने की क्या आवश्यकता थी ? क्या मैं इसका कारण पूछ सकता हूँ ?”

“तुम्हें यहाँ बुलाने का कारण क्या था, यह मैं बेहतर समझता हूँ। तुम्हें इन बातों से कोई मतलब नहीं होना चाहिए।” हरि आनंद ने मुझे क्रूर दृष्टि से घूरते हुए कहा।

“मेरा ख्याल है तुम मुझसे कुछ छिपाने की कोशिश कर रहे हो ? तुम्हारी बातों से मुझे फरेब की बू आ रही है पंडित हरि आनंद जी।”

“कुँवर राज ठाकुर!” अचानक हरि आनंद गरजा, “तुम्हारी याददाश्त बहुत कमजोर है। तुम अपने पुराने दिन शीघ्र भूलने के आदी हो गए हो। क्या मैं तुम्हें याद दिलाऊँ कि इस समय तुम किससे बातें कर रहे हो ? क्या मुझे फिर बताना पड़ेगा कि इस समय तुम किसके सामने खड़े हो ?”

“तेवर बिगाड़ कर बातें न करो। इस समय तुम मुझे विवश नहीं कर सकते हरि आनंद।” मैंने लापरवाही से कहा, “अगर मामले की बात करनी है तो अपनी खोपड़ी ठंडी रखो। यह बात भी ध्यान में रखो कि जब तक तुम मुझे मरघट बुलाने का कारण नहीं बताओगे, मैं मोहिनी को तुम्हारे हवाले नहीं करूँगा।”

“तुम मूर्ख हो। तुम नहीं जानते कि तुम किसका अपमान कर रहे हो ?” हरि आनंद किसी साँप की तरह बल खाकर बोला। उसकी आँखों की सुर्खी निरन्तर गहरी होती जा रही थी।
 
“पंडित जी, मैं पहले तुम्हें नहीं जानता था लेकिन अब पहचान गया हूँ इसलिए अब तुम आँख नीली-पीली करने की कोशिश न करो और मुझे बताओ कि मोहिनी को हासिल करने के लिये तुमने शमशान भूमि का चयन क्यों किया ?” मैंने मोहिनी के संकेत पर फिर उसी लापरवाही से उत्तर दिया। वचन अपनी जगह है परन्तु एक धोखेबाज व्यक्ति से वचन निभाना उचित नहीं होता।

हरि आनंद मेरा उत्तर सुनकर क्रोध सुर्ख हो गया। वह तुम से तू पर उतर आया।

“पापी, तूने घोर पाप किया है। अगर मुक्ति चाहता है तो अब भी समय है। सीधी तरह मोहिनी को मेरे हवाले कर दे। अब अगर तूने इंकार किया तो फिर न कहना कि मैंने तेरे साथ क्या किया ?”

ठीक उसी समय मोहिनी मेरे सिर से फुदककर उतर गयी। एक पल के लिये मैं चकरा गया। मोहिनी को कुछ बताये बिना मेरे सिर से उतर जाना आश्चर्यजनक था। लेकिन दूसरे ही पल मैंने स्वयं पर काबू पा लिया।

“बर्दाश्त की भी हद होती है पंडित। तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो। तुम मुझे मजबूर न करो कि मैं अपना आपा खो बैठूँ।”

“मूर्ख! मोहिनी की शक्ति पर तुझे इतना घमण्ड है तो अपनी आँख से देख।” हरि आनंद चीखकर बोला। फिर उसके होंठ तेजी से हिलने लगे। वह किसी मन्त्र का जाप शुरू कर चुका था।

मेरे लिये यह स्थिति बड़ी विषम थी। मुझे इस समय मोहिनी के सुझाव की आवश्यकता थी परन्तु वह न जाने कहाँ गायब हो गयी थी। मुझे मोहिनी पर क्रोध आ रहा था। मेरी दृष्टि हरि आनंद के चेहरे पर जमी थी। उसके होंठ बड़ी तेजी से हिलते रहे फिर वह अचानक उछलकर दो कदम पीछे हटा और गरजदार आवाज में बोला–

“मैं नहीं चाहता कि तुम्हें यह बच्चों का खेल दिखाऊँ। जरा अपने बाएँ हाथ की ओर देखो।”

मैंने बाएँ हाथ की ओर देखा तो दिल धक से रह गया। आँखे आश्चर्य से फटी की फ़टी रह गयी। मोहिनी साक्षात् औरत के रूप में मेरे सामने खड़ी थी और कहर दृष्टि से मुझे घूर रही थी। मैं आँखे फाड़ उसे देखता रहा फिर एकाएक मेरी दृष्टि उसके पैरों पर पड़ी और मुझे अहसास हो गया कि पंडित हरि आनंद ने मुझे भयभीत करने के लिये एक नकली मोहिनी को मेरे सामने खड़ा कर दिया था। मुझे इस धोखे का विश्वास सामने खड़ी नकली मोहिनी के पाँव देख कर हो गया था। जहाँ मोहिनी जैसे नुकीले पंजों की बजाय औरतों जैसे पैर नजर आ रहे थे। इससे पहले कि मैं कुछ कहता हरि आनंद दोबारा गरजा– “पहचान यह कौन है। अगर नहीं पहचानता तो अब मैं मोहिनी का वह रूप दिखाता हूँ जो तूने हमेशा देखा है।”

हरि आनंद का वाक्य समाप्त होते ही मेरी आँखों ने जो दृश्य देखा उसे मैं आज भी याद करता हूँ तो भय के कारण रोंगटे खड़े हो जाते हैं। हालाँकि मुझे इस बात का पूर्ण विश्वास था कि मेरे सामने खड़ी औरत मोहिनी नहीं है बल्कि कोई गन्दी आत्मा है। फिर भी वह दृश्य मेरे लिये अविश्वसनीय था। औरत का जिस्म निरन्तर छोटा होता जा रहा था। उसका हर अंग उसी अनुरूप घटता जा रहा था। कुछ देर बाद उसका कद मुश्किल से छः इंच रह गया था। बिल्कुल वैसा ही जैसा मोहिनी का था। मेरी स्थिति ऐसी थी कि किसी भी क्षण अपने होश गँवा बैठता। उस समय मुझे मोहिनी की बड़ी सख्त जरूरत महसूस हो रही थी।

“कहो मूर्ख, क्या अब भी तू अपने वचन को निभाने से इंकार करता है ?” हरि आनंद एक बार फिर गरजा।

मैंने तुरन्त कोई उत्तर नहीं दिया। अचानक मुझे याद आया कि मोहिनी ने मुझसे कहा था कि मैं हर सम्भव अपने होश कायम रखूँ अन्यथा कठिनाई पैदा हो जायेगी।

अचानक मोहिनी की सरगोशी मुझे सुनाई दी।

“डरना नहीं राज, मैं तुम्हारे साथ हूँ। इस स्थिति का बिना खौफ मुकाबला करो। मोहिनी के होते यह बन्दी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।”

मोहिनी की आवाज सुनते ही मेरा संतुलन स्थिर हो गया और मनोबल बढ़ गया। अब मैंने अपने आपको तैयार किया और हरि आनंद को ललकारा।

“यह बच्चों के खेल बन्द करो पंडित। कोई और बड़ा खेल है तुम्हारे पास... ?”

“अच्छा, तो फिर सम्भल!” हरि आनंद गरजा फिर उसने छः इंच की औरत को संबोधित किया, “सुंदरी, इसे ख़ाक में मिला दे! इसे काली की भेंट चढ़ा दे! काली माई तेरे इस प्रसाद से खुश होगी।”

अब औरत का चेहरा भयंकर हो गया। उसका आकार बढ़ने लगा। उसने एक मिनमिनाता कहकहा लगाया और जमीन से मिट्टी उठाई। फिर जैसे ही उसने हाथ उठाकर मिट्टी मुझ पर फेंकनी चाहिए मैंने उसकी हौलनाक चीख सुनी। उसके गाल पर एक छिपकली पंजे गड़ाये थी और उसमें पेबस्त हुई जा रही थी। अचानक ही वह छिपकली गायब हो गयी और सुंदरी आग के गोलों में घिर गयी।

हरि आनंद एकदम से पीछे हटा। देखते-देखते वह बन्दी रूह भस्म हो गयी।

हरि आनंद ने पागलों की तरह चिल्लाते हुए कहा– “मोहिनी, तूने यह अच्छा नहीं किया! तूने देवताओं के बनाये नियम तोड़े हैं। तूने शिव शंकर को नाराज कर दिया है। संभाल मेरा वार...”

फिर मेरे सिर पर एक धमाका सा हुआ और मैं बुरी तरह चिल्ला पड़ा। एक खौफ़नाक जंगली भैंसा मेरे सिर पर दौड़ रहा था। हे ईश्वर, यह मैं क्या देख रहा था। मैं भैंसे की गर्जना सुन रहा था और खुरों की धमक मेरी खोपड़ी में बजती महसूस हो रही थी।

मैं बेहोश होने के करीब था कि अचानक मैंने उस नन्ही-मुन्नी मोहिनी का एक खौफनाक रूप देखा। वह मेरे सिर पर आ गयी थी और उछलकर भैंस के सींग पकड़ रखे थे और दोनों पंजे उसकी गर्दन पर गड़ा दिए थे।

दोनों का भयानक युद्ध देख रहा था और रणभूमि मेरा सिर बना हुआ था। मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी।

भैंसा बुरी तरह डकारता हुआ मेरे सिर पर दौड़ रहा था और मोहिनी को पटकने की कोशिश कर रहा था।

“राज, हौसला बनाये रखो!” मोहिनी का स्वर एक बार फिर सुनाई दिया। मैं संभलकर खड़ा हो गया।

अचानक भैंसे की गर्दन से खून का फव्वारा सा निकला और देखते ही देखते वह मेरे सिर से गायब हो गया। अब मोहिनी अकेली मेरे सिर पर खड़ी थी। उसने दोनों हाथ कमर पर टिका रखे थे और हरि आनंद को घूरे जा रही थी। मोहिनी की आँखों में उस समय शोले दहक रहे थे।

“मोहिनी! मैं तुझे क्षमा नहीं करूँगा। मैं जा रहा हूँ। सुन, मैं जा रहा हूँ लेकिन एक बार तेरी-मेरी भेंट फिर होगी। तूने मेरे मठ और मठाधीश का अपमान किया है। मैं तुझे चैन से नहीं रहने दूँगा।” इतना कहकर हरि आनंद तेजी से अंधकार में गायब हो गया।

मैंने इत्मिनान की साँस ली।
 
कुछ देर तक हम दोनों ही चुप रहे। चाँदनी तनी हुई थी और मरघट का वातावरण भयानक हो गया था। ऐसा मालूम होता था जैसे मरघट की तमाम आत्माएँ सिमटकर एक कोने में दुबक गयी हों और भयभीत होकर मंजर देख रही हो।

अभी-अभी मैंने अपने सिर पर एक भयानक जंग देखी थी और शरीर से पसीना छूट रहा था।

“राज!” मोहिनी कुछ शांत स्वर में बोली, “अब चलो यहाँ से। हरि आनंद अब कभी तुमसे टकराने की कोशिश नहीं करेगा।”

मैं चुपचाप चल पड़ा। मोहिनी मेरे सिर पर इस तरह टहलती रही जैसे चारों तरफ से चौकसी कर रही हो और मुझे लगा जैसे मेरी जिंदगी में अब अनगिनत खतरों का शुभारम्भ हो गया है।

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उस शहर को छोड़ने से पहले मैं अपने दोस्त रामदयाल से मिलना न भूला था। चूँकि रामदयाल ने बुरे समय पर मेरा साथ दिया था इसलिए मोहिनी की मदद से मैंने रामदयाल की अनेक समस्याएँ सुलझाई। मोहिनी के सुझाव पर ही मैं कश्मीर के लिये रवाना हुआ था। मोहिनी का कथन था कि कश्मीर की आबोहवा में डॉली के स्वास्थ्य में तेजी के साथ सुधार हो जायेगा और कुछ दिन मैं भी पहाड़ी प्रदेश में शांति से गुजारना चाहता था।

मैं कश्मीर के उस साथ स्थान का नाम नहीं बताऊँगा जो अपने खूबसूरत दृश्यों के लिये दूर-दूर तक प्रसिद्द है। मोहिनी ने मुझे इसी जगह आने का सुझाव दिया था। यहाँ हमने चंद स्थानीय लोगों को नौकर रख लिया।

कश्मीर की शीतल और स्वास्थ्यप्रद आबोहवा ने डॉली के स्वास्थ्य पर तेजी से अपना जलवा दिखाना शुरू किया। मैंने डॉली के इलाज के लिये बम्बई से एक डॉक्टर और दो नर्सों को बुलवा लिया था। वह लोग हर समय उसका ख्याल रखते थे। मैं स्वयं भी अपना अधिकतर समय डॉली के साथ बिताता था। अलबत्ता मोहिनी कभी-कभी तफ़रीह के लिये मुझे घर से बाहर ले जाया करती थी। कोई दस दिन बाद मोहिनी को भोजन की आवश्यकता महसूस हुई। मैं चूँकि डॉली के साथ अधिकतर समय व्यतीत करना चाहता था इसलिए मैंने मोहिनी को आज्ञा दे दी कि वह अपने राशन पानी का इंतजाम करने के लिये वह किसी दूसरे के सिर पर जा सकती है। मुझे नहीं मालूम कि मोहिनी ने क्या प्रबन्ध किया था। डेढ़ माह तक मेरी मोहिनी से बातचीत भी कम ही हुई थी। किन्तु इस बीच डॉक्टरों की कोशिशों ने डॉली को पूर्ण तरह स्वस्थ्य बना दिया। वह बिल्कुल वैसी ही स्वस्थ्य हो गयी जैसी शादी से पहले थी। उसके गालों पर सुर्खी लौट आई थी। मैंने उसी स्थान पर एक शानदार पार्टी का आयोजन किया और डॉली की सेहत की ख़ुशी में दावत दी। गरीबों और भिखारियों को स्वयं डॉली ने अपने हाथों से खैरात बाँटी। दावत में स्थानीय आबादी का लगभग आधा हिस्सा सम्मिलित था। रात के समय नाच और रंग की महफ़िल सजाई गयी थी। जो गयी रात तक अपने फन से दर्शकों को मुग्ध करती रही। इस जश्न में केवल चंद व्यक्ति ही आमन्त्रित किये गए थे, जिनमें स्थानीय अफसरों के अलावा स्टेट के कुछ महत्वपूर्ण अफसर भी सम्मिलित थे।

नृत्य का आयोजन एक ऐसे मैदान में किया गया था जो पहाड़ों से घिरा था। इस मैदान में शामियाने लगे थे और इन्हें कुमकुमों से सजाया गया था।

डॉली आज बड़ी खुश नजर आ रही थी। मैं उसके साथ अगली सीट पर बैठा नृत्य देख रहा था। उसी समय मोहिनी मेरे सिर से रेंगकर कान के पास आई और बोली–

“राज, वह देखो डिप्टी कमिशनर के बराबर सीधे हाथ पर जो नौजवान बैठा है उसे जानते हो ?”

मुझे इस समय मोहिनी की यह ख़ामोशी नागवार गुजरी। फिर मैंने धीरे से सिर घुमाकर उस नौजवान की ओर देखा। सूरत शक्ल से वह किसी खाते-पीते घर का युवक नजर आता था। बेहद खूबसूरत और स्मार्ट था। मैंने उसे पहली बार देखा था। मैंने जिन लोगों को निमन्त्रण दिया था वह उनमें से नहीं था। सम्भव है डॉक्टर शर्मा ने उसे आमन्त्रित किया हो क्योंकि कार्ड डॉली और शर्मा ने ही बाँटे थे या सम्भव था वह डिप्टी कमिशनर का गेस्ट हो। मैंने विशेषकर डिप्टी कमिशनर और कुछ दूसरे महत्वपूर्ण लोगों को फालतू कार्ड भी भेजे थे ताकि वह अपने मिलने-जुलने वालों को साथ ला सके। वह जवान उन्ही में से कोई था। अतः मैंने मोहिनी के प्रश्न पर इंकार में सिर हिलाया।

“उसका नाम राजकुमार है। वह डिप्टी कमिशनर के दूर के रिश्तेदारों में से है। बम्बई और दिल्ली में इसका काफी बड़ा कारोबार है। लाखों में खेलता है। कल ही कश्मीर आया है। डॉक्टर शर्मा उसे जानता है।”

मोहिनी मुझे उस नौजवान के बारे में बताती रही। मेरी समझ में नहीं आया कि मोहिनी को आखिर उससे क्यों दिलचस्पी पैदा हो गयी है। फिर सोचा कहीं वह इस नौजवान के खून को अपने अस्तित्व के लिये पसन्द तो नहीं कर रही है। अभी मैं यह सोच ही रहा था कि मोहिनी ने चौंका दिया।

“राजकुमार तुम्हारा प्रतिद्वन्दी है।”

“मेरा प्रतिद्वंद्वी, वह कैसे ?”

“कलवन्त तुम्हारी प्रेमिका है। वह भी तुम्हें बहुत प्यार करती है। क्या भूल गए उसे ?”

“यह कलवन्त बीच में कहाँ से आ गयी। मैं तो उसे भूल ही जाना चाहता हूँ यादों के जख्म बहुत कष्ट देते हैं।”

“तुम उसे भूल नहीं सकते राज। वह भूलने की चीज नहीं। ऐसी ही चीजें तो यादों के जख्म बनाने के लिये कुदरत तैयार करती है।”

“लेकिन कलवन्त का राजकुमार से क्या मतलब ?”

“यह भी कलवन्त का उम्मीदवार है।”

“होगा मुझे क्या ?” मैंने कंधे झटक दिए।

“खलबली मच गयी तुम्हारे दिल में।” मोहिनी ने शरारत में कहा।

“मेरे पास डॉली मौजूद है।”

“सोच लो, फिर बाद में कुछ मत कहना। यह नौजवान आजकल कलवन्त के सपने देख रहा है। इसके माता-पिता ने कलवन्त के माता-पिता से मिलकर रिश्ते की बात पक्की कर ली है लेकिन कलवन्त इससे शादी करने के लिये तैयार नहीं है।”

“क्यों ?”

“वह किसी और से प्यार करती है और राजकुमार से शादी करने की बजाय मौत अच्छी समझ ली है। जानते हो क्यों ?”

“क्यों ?”

“वह पगली तुम्हारे प्रेम की दीवानी हो रही है। एक हफ्ते बाद इसी स्थान पर राजकुमार और कलवन्त की मँगनी होने वाली है। सारा प्रोग्राम तय हो चुका है। दो रोज बाद कलवन्त के घर वाले यहाँ आ जायेंगे लेकिन इसके बाद क्या होगा यह मेरे सिवा कोई नहीं जानता।”

“ओ हो, अब मुझे मालूम हुआ कि तुमने यह स्थान क्यों चुना था ?” मैंने मोहिनी से कहा, “तुम अक्ल का परकाला हो।”
 
लखनऊ से आई एक नर्तकी ने नृत्य शुरू कर दिया। मोहिनी से मेरी बात अधूरी रह गयी क्योंकि मुझे मेहमानों का ख्याल रखना था। पर दिल में एक फाँस अटक गयी थी। कलवन्त का जिक्र आते ही मोहिनी ने मेरे जज्बातों को हवा दे दी। रह- रहकर मेरी दृष्टि राजकुमार की ओर उठ जाती। कई बार हम दोनों की आँखें चार हुई और हर बार कुछ झेलकर नृत्य की तरफ मुड़ गयी।

कलवन्त वह स्वप्न सुंदरी उस नौजवान के पहलू की जन्नत बनेगी। मुझे पूना में उसके साथ गुजारी गयी शामें याद आ गयी। वह हिनोर्ड खुशबु याद आ गयी जो कलवन्त के बदन से उठती थीं। मैंने उसे दिल के शीशे में उतारा क्यों ? एक बार उसने मुझे बम्बई भी फोन किया था। वह मुझसे बहुत मायूस हो गयी थी. बड़े दबे कदमों से न जाने किस चोर रास्ते से मेरे आवारा ज़हन में प्रविष्ट हो गयी थी। क्यों मैं उसके करीब आया था और फिर क्यों उससे किनारा कर लिया था। यह अच्छा न था कि मैंने उसे तड़पने के लिये छोड़ दिया। कलवन्त उन लड़कियों से भिन्न थी जिनसे मैं मिल चुका था और इसीलिए मैंने उसकी इज्जत की पूंजी उसी के पास सुरक्षित छोड़ दी थी।

मोहिनी ने कलवन्त की याद ताजा करके मेरे दिल में खलबली मचा दी थी। मुझे अब भी कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मेहमानों के परिचय के दौरान मेरा परिचय उस नौजवान से भी कराया। रस्मी बातें हो रही थी।

मैं नाच छोड़कर एक तरफ चला गया और सोचने लगा। डॉली अब मेरी जिंदगी है। अगर डॉली को कलवन्त के बारे में पता लगेगा तो उसे बड़ी चोट पहुँचेगी। एक म्यान में दो तलवारें कैसे रह सकती हैं या कलवन्त को पता चलेगा कि मैं शादीशुदा हूँ तो उस पर क्या गुजरेगी ? क्या इंसान एक वक्त में दो स्त्रियों से प्यार नहीं कर सकता ? कर सकता है पर वह दोनों में से किसी को सुखी नहीं रख सकता।

“क्यों राज ? हलचल मच गयी न...” मोहिनी ने मुझे छेड़ा।

“मोहिनी, अच्छा यही होगा कि मैं कलवन्त को भूल जाऊँ। राजकुमार अच्छा लड़का है। दोनों की जोड़ी खूब जमेगी।”

“लेकिन कलवन्त जीते जी मर जायेगी। वह जान दे देगी पर यह शादी नहीं करेगी। वह तुम्हें चाहती है राज और तुम्हें ढूँढती रही। जब उसे मालूम होगा कि तुमने उसके साथ बेवफाई की है तो ?”

“तो तुम्हीं बताओ मोहिनी मैं क्या करूँ ?”

“राजकुमार को रास्ते से हटा दो फिर सब सम्भल जायेगा।”

“मालूम पड़ता है तुमने राजकुमार का खून अपने लिये पसन्द कर लिया है। अगर यह बात है तो...”

“मैं चाहूँ तो यह काम इसी समय कर सकती हूँ।”

मोहिनी ने कहा– “तुम्हारी आज्ञा की देर भर होगी।”

“ठहरो मोहिनी, अभी नहीं! दो-चार दिन रुक जाओ। कलवन्त को आने दो फिर मैं सोचूँगा मुझे क्या करना है ?”

“अगर राजकुमार के मुकद्दर में मौत ही लिखी है तो फिर उसे मेरे ही हाथों मरना चाहिए ताकि कलवन्त को पता चल जाये कि मैंने उससे फरेब नहीं किया था। सच्चा प्यार किया था।”

“हाँ राज! यही उपयुक्त रहेगा।” मोहिनी खुश होती हुई बोली।

जश्न समाप्त हो जाने के बाद मैं डॉली के पास पहुँचा। डॉली मेरा इंतजार इस तरह कर रही थी जैसे सुहागरात की सेज पर एक दुल्हन अपने महबूब का इंतजार करती है। वह सोलह श्रृंगार किये थे। फूलों की डाल की तरह लचकी जा रही थी। उसकी आँखों में शर्म थी। मैंने उसे बाँहों में भर लिया तो वह बोली–

“मोहिनी देख रही होगी। कुछ तो शर्म करो।”

मोहिनी यह सुनकर मुस्कुराई और धीरे से बोली– “मैं जरा बाहर आवरागर्दी कर आऊँ। डॉली को बता दो।”

मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी।

मैंने डॉली को बताया फिर दरवाजा बंद किया और डॉली को बाँहों में लेकर मसहरी पर चला गया। डॉली मेरा ख्वाब थी। मेरी जिंदगी थी। कलवन्त मेरी प्रेमिका थी, डॉली मेरी पत्नी थी। एक प्रेमिका पत्नी की जगह क्यों नहीं ले सकती। पत्नी फिर भी पत्नी होती है। सुख-दुःख की संगिनी होती है। कलवन्त मेरे ख्यालों से दूर चली गयी। अब डॉली ही थी। डॉली और मैं था।
 
हमारे जीवन में अब खुशियाँ ही खुशियाँ थी। बुरे दिनों ने हमसे किनारा कर लिया था। कश्मीर की वादियों में हम इस तरह मिले जैसे बिछड़े हुए प्रेमी मिला करते हैं। हर बार हमारी मुलाकात इसी तरह होती। हालाँकि डॉली अब मेरा अंग थी पर हमारा प्यार ही इतना गहरा था। हमने वक्त के अंधड़ों का मुकाबला किया था और इस संसार की हर ख़ुशी हमारे दामन में थी।

चौथे रोज मोहिनी ने मुझे बताया कि कलवन्त अपने परिवार सहित आ गयी है तो बछियाँ सी चलने लगी। डॉली के बाद कलवन्त ही ऐसी लड़की थी जिसने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया था।

क्या मैं डॉली की उपस्थिति में कलवन्त की याद करके डॉली को धोखा दे रहा हूँ ? नहीं। मैंने स्वयं को उत्तर दिया। डॉली मुझे दुनिया में सबसे अधिक प्यारी है। उसकी जगह कोई नहीं ले सकता। फिर कलवन्त की तरफ यह झुकाव क्यों... ?

यह ठीक है कि कलवन्त का विवाह किसी से हो जाये। पर वह राजकुमार को पसन्द नहीं करती। वह तो मुझे चाहती है और मैं भी यह ख्याल करता हूँ कि वह राजकुमार के पास चली जायेगी तो सीने में आँधियाँ से चलने लगती हैं।

मुझे उससे प्रेम है– यह बात झुठलाई नहीं जा सकती। जैसे भी हो इस समय मुझे उसे बचाना होगा। मुझे राजकुमार को रास्ते से हटाना चाहिए। उसके बाद सम्भव है कि कोई न कोई रास्ता निकल जायेगा। मेरे मस्तिष्क ने सभी संभावनाओं पर गौर किया और फिर मेरा दिमाग दिल के हाथों मजबूर हो गया।

मैंने तय कर लिया कि राजकुमार का खून मोहिनी की भेंट चढ़ाऊँगा। राजकुमार को खत्म कराने के लिये मेरा एक संकेत ही काफी था लेकिन मैं किसी ऐसे अवसर की ताक में था कि राजकुमार भी मर जाये और कलवन्त को भी इस बात का अहसास हो जाये कि मैंने उसके लिये कितना बड़ा काम किया है। कैसा खतरा मोल लिया है, कैसी कुर्बानी दी है।

मोहिनी मेरी आज्ञा पर बराबर कलवन्त और राजकुमार की गतिविधियों पर नजर रखी थी। अगले रोज तक कोई सुनहरा अवसर मेरे हाथ न आया। लेकिन फिर एक रोज बाद ही जब मैं दोपहर को डॉली के साथ शयनकक्ष में सो रहा था तो मोहिनी के पंजों की तेज चुभन ने मुझे जगा दिया। मैंने उसे हड़बड़ाकर देखा तो वह तेजी से बोली–

“जल्दी उठो राज। एक-एक क्षण कीमती है। कलवन्त राजकुमार के साथ तैराई की तरफ गयी है। राजकुमार उसे शीशे में उतारने के लिये उस तरफ ले गया है। यह अवसर सुनहरा है। मैं तुम्हें उस जगह ले चलती हूँ जहाँ व दोनों गए हैं।

मोहिनी की जुबानी यह खबर सुनकर मैं शीघ्रता से उठा और एक नजर डॉली पर डालकर आंधी-तूफान की तरह उस तरफ चल पड़ा जहाँ मोहिनी मुझे ले जाना चाहती थी।

वह जगह कोई अधिक दूर नहीं थी। मैं दो-तीन फर्लांग की ठोस सड़क के किनारे भागता हुआ उस स्थान की ओर चल पड़ा। मेरा मस्तिष्क तेजी से योजना बना रहा था। शॉर्टकट के चक्कर में मैंने बड़े खतरनाक रास्तों को पार किया। जरा सा पाँव फिसलते ही मैं किसी खाई में जा सकता था परन्तु मोहिनी बराबर मुझे निर्देश दे रही थी।

आखिर मोहिनी ने मुझे रुकने के लिये कहा और मैं एक पेड़ की आड़ में छिप गया। कुछ दूरी पर ही एक दूसरे वृक्ष की आड़ में वे दोनों बैठे थे और उनकी पीठ मेरी तरफ थी। दोनों बातें कर रहे थे। मैं उनकी बातें सुनने लगा।

वह बातें बिल्कुल वैसी थी जैसी फ़िल्मी थियेटर में सुनने में आती हैं। एक आशिक जो अपनी महबूबा को मनाने के लिये संवाद बोलता है, वैसे संवाद राजकुमार बोल रहा था। परन्तु कलवन्त का उस तरफ कोई ध्यान ही न था। वह जैसे बोर हो रही थी।

फिर उसकी बातों ने नया मोड़ लिया। कलवन्त ने उसे न जाने क्या उत्तर दिया कि राजकुमार के संवाद तीखे हो गए। मोहिनी बार-बार मेरे सिर से उतर जाती थी। राजकुमार और कलवन्त में झड़प होने लगी। यह झड़प इतनी बढ़ गयी कि कलवन्त ने एक बार एक झन्नाटेदार थप्पड़ राजकुमार के गाल पर रसीद कर दिया।

“इसका मतलब, तेरा कोई दूसरा यार है...” राजकुमार एकदम खड़ा हो गया। उसने कलवन्त की कलाई पकड़ ली, “भले ही तेरी शादी मुझसे न हो पर इतने सस्ते में अब तू छूटने वाली नहीं है। इस वीराने में कोई नहीं आएगा। यहाँ मैं हूँ और तेरी जवानी है। मैं देखता हूँ तेरा आशिक तुझे बचाने कैसे आता है। तू मेरी झूठन बन ही उसकी गोद में पहुँचेगी।”

अब मेरे प्रकट होने का समय आ गया था और मैं बिल्कुल फिल्मिया अंदाज में एक हीरो की तरह प्रकट हो गया।

“औरत के साथ हाथापाई करते तुझे शर्म नहीं आती। जरा मर्द का मुकाबला कर राजकुमार।”

मेरी आवाज सुनते ही राजकुमार चौंककर उछला। उसने कलवन्त की कलाई छोड़ दी और मुझे घूरने लगा। कलवन्त ने भी मुझे देखा तो दौड़कर मेरे पहलू में लग गयी।

“ओह राज! तुम ठीक समय पर आ गए। भगवान का लाख-लाख शुक्र है।”

“अच्छा तो यह टुन्टा तेरा आशिक है।” राजकुमार गुर्राया, “मुझे क्या मालूम था कि तेरी पसन्द इतनी घटिया है। हरामजादी, वेश्या, साली। बड़ा स्वांग भरती थी।

“खबरदार, अगर तुमने आगे कुछ कहा।” मैंने राजकुमार को चेतावनी दी।

“तू मेरे रास्ते से हट जा टुन्टे । वरना तू जानता है मैं डिप्टी कमिशनर का कौन हूँ। मैं तेरा जीना हराम कर दूँगा। शादीशुदा होते हुए एक लड़की को बहकाते तुझे शर्म नहीं आई।”

“डिप्टी कमिशनर के बच्चे। सूअर की औलाद, जानता नहीं तू किससे बात कर रहा है। चला जा यहाँ से।” मैं उसे न जाने क्या-क्या गालियाँ बकता रहा।
 
अचानक मोहिनी ने चौंककर कहा– “राज, उसकी जेब में रिवाल्वर है और कलवन्त तुम्हारे पहलू में है। तुम अगर बच भी गए तो गोली कलवन्त को लग सकती है। जरा सावधानी से काम लो।”

मैंने मोहिनी की बात सुनकर सिर हिलाया परन्तु इससे पहले कि मैं कोई कदम उठाता राजकुमार ने फुर्ती से रिवॉल्वर निकाल लिया।

“कुँवर राज ठाकुर, तुमने मुझसे टकराकर भारी भूल कर दी है। मैं तुझे यहीं क़त्ल करके तेरी लाश चील-कौओं को खिला दूँगा।”

उसी समय कलवन्त चिल्लाई– “नहीं, नहीं! तुम इन्हें न मारो। मैं वादा करती हूँ कि तुमसे शादी करूँगी।”

“तुझ वेश्या से कौन शादी करेगा।” राजकुमार दहाड़ा, “हट जा सामने से नहीं तो इसके साथ-साथ तुझे भी खत्म करना पड़ेगा।”

मोहिनी फुर्ती से मेरे सिर से उतरकर रेंग गयी। कलवन्त ने मुझे खतरे में महसूस किया तो मेरे जिस्म को अपनी आड़ में ले लिया और राजकुमार से बोली-

“अगर तुझे गोली मारनी ही है तो पहले मुझे मार। जब तक मैं जिन्दा हूँ तू राज का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”

कलवन्त की इस भावना ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मैंने उसे एक हाथ से हटाने की कोशिश की।

“तुम फ़िक्र न करो। देखती रहो यह किस तरह अपनी मंजिल तक पहुँचता है।” मैं राजकुमार को खूंखार दृष्टि से घूर रहा था।

मोहिनी मेरा संकेत पा चुकी थी। अतः अवसर का लाभ उठाते हुए कलवन्त पर अपनी अजीब शक्ति के जादू का सिक्का ज़माने के लिये मैंने राजकुमार को संबोधित किया और उसकी आँखों में आँखे डाल दी। उसके बाद जो कुछ हुआ वह कलवन्त के लिये निश्चय ही आश्चर्यजनक था। राजकुमार ने किसी आज्ञाकारी दास की तरह अपना हाथ बुलन्द किया और रिवॉल्वर की नाल कनपटी से सटा कर बिना झिझक ट्रेगर दबा दिया। खौफनाक धमाके के साथ ही वह किसी कटे हुए शातिर की तरह जमीन पर गिर पड़ा और ठंडा हो गया।

मोहिनी तुरन्त मेरे सिर पर आकर बोली– “राज, तुम जल्दी से कलवन्त को लेकर यहाँ से चले जाओ। जब इसकी लाश प्राप्त होगी तो इसकी जेब में इसकी अपनी हस्तलिपि में एक पत्र बरामद होगा जिसमें आत्महत्या करने का कारण मौजूद होगा। मैं अब अपनी प्यास बुझाने जा रही हूँ राज। तुम्हारे दुश्मनों का खून मुझे बड़ा स्वादिष्ट लगता है।”

अब मेरा वहाँ रुकना उचित न था। मैं कलवन्त को लेकर ऊपर आ गया और झील की तरफ चलने लगा। झील मेरे बंगले से तीन-चार मील के फासले पर थी। राजकुमार की रहस्यमय आश्चर्यजनक मौत ने कलवन्त को गूंगा कर दिया था। रास्ते भर वह चुप रही। हाँ, कभी-कभी कनखियों से मुझे देखने लगती।

झील पर पहुँचकर मैं उसे एक वीरान हिस्से की तरफ ले गया। कुछ देर बाद कलवन्त का भय दूर हुआ तो मेरे सीने से टिकाकर बोली– “राज, तुम मुझे क्यों छोड़ गए थे ? मैं बम्बई भी आ गयी थी लेकिन वहाँ तुम्हारा पता न चला। मैं तुम्हें हर जगह ढूँढ़ती रही।”
 
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