• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Fantasy मोहिनी

लेकिन पुलिस मुझे गिरफ्तार करने नहीं आई। शाम होते ही अचानक वह सुंदर लड़की जरूर मेरे सिर पर आ बैठी। अब मुझे उससे डर नहीं लग रहा था।

“राज!” वह फुसफुसाई।

“त...तुम कौन हो?” मैंने धड़कते दिल से पूछा।

“मोहिनी।” वह मुस्कुरा कर बोली।

“मोहिनी....त....तो क्या तुम छिपकली हो ?”

“हाँ, वह भी मेरा रूप है असली रूप और यह भी मेरा ही रूप है, दोनों असली रूप हैं।”

“तुमने मेरे हाथो बॉस का कत्ल क्यों करवा दिया।”

“उसने तुम्हे थप्पड़ क्यों मारा... वैसे भी मैं नहीं चाहती थी कि तुम ऐसी छोटी-मोटी नौकरी करो...नौकरी की तुम्हे जरूरत ही क्या है।”

“आखिर वो नाराज़ क्यों था ? मैं तो ऑफिस ठीक वक्त पर पहुंचा था।”

“नहीं, तुम आधा घंटा लेट थे।”

“पर मैंने तो अपनी घड़ी में टाइम देखा था।”

“जो तुमने देखा वह सच नहीं था। तुम वही देख रहे थे जो मैं तुम्हें दिखाना चाह रही थी। फिर जब तुम्हारे बॉस ने ज्यादा ही बदतमीजी की तो मुझे बहुत बुरा लगा। ऐसे लोगों को सबक सिखाना जरुरी होता है।” वह बोली।

“इसका मतलब यह तो नहीं कि उसे मार ही डालो। अब पुलिस मुझे गिरफ्तार कर लेगी।”

“ऐसा नहीं होगा। मैंने सब ठीक कर दिया है।”

“क्या ठीक कर दिया है ?”

“ऑफिस के चपरासी ने उसके कत्ल का इल्जाम अपने सिर ले लिया है। तुम्हारा बॉस मर चुका है और पुलिस ने चपरासी को गिरफ्तार कर लिया है।” फिर वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसके दांत मोतियों की तरह चमक रहे थे।

मोहिनी सुर्ख रंग के जोड़े में थी और आलथी पालथी मारे मेरे सिर पर बैठी थी।

“क्या तुम यह सब कर सकती हो ?” मैंने पूछा।

“यह सब क्या ?”

“मतलब चपरासी ने कत्ल का इल्जाम अपने सिर कैसे ले लिया ?”

“थोड़ी देर के लिये मैं उसके सिर पर चली गई थी। मुझे वही देख सकता है जिसे मैं देखने की अनुमति देती हूँ या जिसकी मैं गुलाम बन जाती हूँ। मैं जिसके सिर पर बैठ जाती हूँ उसका दिमाग पूरी तरह मेरे नियंत्रण में आ जाता है।” मोहिनी ने एक भरपूर अंगड़ाई ली। “ज्यादा मत सोचो अभी तुम्हें मोहिनी की शक्तियों की जानकारी नहीं है। दुनिया के बड़े से बड़े तांत्रिक मुझे गुलाम बनाने की तमन्ना रखते हैं। उनमें से बहुत से मर भी जाते हैं, जैसे रामा की माँ मर गई, वह मुझे गुलाम बनाना चाहती थी। तुम्हे देखकर उसे अंदाजा हो गया था कि तुम मुझे प्राप्त कर सकते हो फिर वह तुम्हारे जरिये अपने काम करवाती। वह सब मुझे मंजूर नहीं था। मैं तो तुम्हे खुद पसंद करती हूँ और सिर्फ तुम्हारी ही होकर रहना चाहती हूँ।”

“लेकिन मैं ही क्यों, मुझमे ऐसी क्या बात है?”

“पिछले जन्म में तुम एक तांत्रिक थे और तुमने मुझे हासिल कर लिया था। मैं तुम्हारी गुलाम थी। फिर हम एक-दूसरे को बेहद चाहने लगे। मैं भी तुम्हे बेहद चाहती थी। मुझे पाने के लिये कुछ तांत्रिकों ने तुम्हें मौत के घाट उतार दिया पर मरते वक्त भी तुम मुझे याद करते हुए मरे। फिर तुम्हारा जन्म एक विलक्षण घड़ी में हुआ। उसी घड़ी में जन्म लेने वाला मुझे आसानी से पा सकता है।”

कुछ रुक कर उसने आगे कहा–

“शायद तुम्हे अपने बचपन की बातें याद न हो, तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हे बेच दिया था और जिसने ख़रीदा था वह तुम्हारी बलि चढ़ाकर मुझे ही हासिल करना चाहता था। तुम उस वक्त सात-आठ बरस के थे। वे लोग तुम्हारी बलि नहीं चढ़ा पाये बल्कि मैंने शम्भु के हाथो जयधर की ही बलि चढ़ा दी जो तुम्हे खरीद कर ले गया था। लेकिन बाद में हुआ यह कि डमरू ने घोर तप करके मुझे घेर लिया और मैं उसकी गुलाम बन गई। डमरू की मौत के बाद ही मैं मुक्त हो पाई। तब तक बहुत बरस बीत चुके थे और तुम जवान हो चुके थे।
 
“हे भगवान।” मेरी खोपड़ी चकरा गई। पिछले जन्म से तुम मेरे साथ हो....?”

“हाँ...बशर्ते कि कोई मुझे अपना गुलाम न बना ले जो मुझे गुलाम बना लेता है मैं तब तक उसकी कैद में रहती हूँ जब तक वह जिन्दा रहता है या वह खुद ही मुझे आजाद कर दे।”

“यह तो अलिफ़ लैला जैसी दास्तान है।” मोहिनी की बातें अब मुझे अच्छी लगने लगी थी। “अब मेरी नौकरी का क्या होगा?”

“तुम्हे नौकरी करने की जरूरत नहीं, तुम्हे याद है एक बार तुम्हे रेस खेलने का चस्का लगा था।”

“वह सब मेरे एक दोस्त की वजह से हुआ, वह रेस खेलता था...मैंने भी रेस खेली और हार गया...पर तुम्हे कैसे मालूम ?”

“जब मैं तुम्हारे सिर पर बैठी हूँ तो तुम्हारा अतीत खुली किताब है मेरे लिये। अब मैं तुम्हे बताउंगी कि किस घोड़े पर दांव लगाना है, तुम वह दांव जीतोगे...”

“क्या मतलब?” मैंने बहुत तेजी से पूछा।

“मतलब यह कि मुझे सब मालूम रहता है।” उसने विश्वास भरे स्वर में उत्तर दिया।

“क्या सच में?” मैंने बौखलाकर पूछा।

“मोहिनी का फिर तुम्हारे साथ रहने से क्या लाभ?” उसने नाज से कहा। यह तिलस्मी बातें मुझे यूँ लग रही थीं मानो मैं किसी सिनेमा हॉल में बैठा अलादीन और जादू के चिराग से सम्बन्धित कोई फिल्म देख रहा हूँ।

परन्तु जब मैंने मोहिनी की बात सुनकर रेस में दिलचस्पी ली तो वारे के न्यारे हो गये। मेरी जेबें बड़े-बड़े नोटों से भर गयी। मुझे याद है रेस जीतकर जब मैं आया तो नोटों से मेरी जेबें भरी हुई थीं। मैं आश्चर्यचकित था।

“तुम्हें आश्चर्य क्यों हो रहा है राज?” मोहिनी फुसफुसाई। “मेरे लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। तुम मुझसे जो माँगोगे, वह पूरा हो जाएगा। परन्तु इसके लिये एक शर्त है।”

“क्या?” मैंने धड़कते हुए दिल से पूछा। इस ख्याल से कि अब मैं मोहिनी के कारण बहुत जल्द बड़ा आदमी बन जाऊँगा। मेरी झल्लाहट और बौखलाहट अचानक समाप्त हो गयी। स्वर में जो कड़वाहट पायी जाती थी वह भी समाप्त हो गयी।

“जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें मेरे साथ दोस्ती निभाने का वादा करना होगा।”

“मन्जूर है।” मैंने बिना सोचे-समझे कह दिया।

“तुम एक अच्छे दोस्त की हैसियत से जो कुछ भी मुझसे कहोगे मैं उसे अवश्य पूरा करूँगी। परन्तु उसके बदले तुम्हें मेरा एक काम करना होगा। वह काम मै स्वयं नहीं कर सकती।”

“वह काम क्या है?” मैंने जल्दी से पूछा।

“इस समय तुम वादा कर लो। जब समय आयेगा तो मैं तुम्हें वह काम भी बता दूँगी।”

“मैं वादा करता हूँ।”

“अच्छी तरह सोच-समझ लो।” मोहिनी का लहराता स्वर उभरा। “यदि तुमने बाद में वादा खिलाफी की तो फिर हमारी दोस्ती दुश्मनी में बदल जाएगी। यह भी हो सकता है कि मैं तुम्हें कोई भारी हानि पहुँचा दूँ।”

“उसकी नौबत नहीं आयेगी।” मैंने करेंसी नोटों को जेबों में दोबारा गिनते हुए कहा – “मैं वादा करता हूँ कि जिस काम को भी तुम मुझसे कहोगी, वह मैं अवश्य पूरा करूँगा।” मोहिनी द्वारा हुए उस काम के बाद मेरे ऊपर छाई हुई बौखलाहट धीरे-धीरे छंट गयी। मुझे अब उसकी बातों पर विश्वास हो गया था। इस विश्वास का दूसरा कारण वह करेंसी नोट भी थे जो उस समय मेरी जेब में पड़े हुए थे। मुझे विश्वास था कि जब मोहिनी की रहस्यमय शक्ति मुझे एक संकेत द्वारा इतनी सारी दौलत की मालिक बना सकती है तो बॉस कि जुबान भी बंद करा सकती है।
 
बहरहाल मैंने अपनी कुशलता इसी में समझी कि मोहिनी से छुटकारा प्राप्त करने की बजाय उसे दोस्त बना लिया जाये। मैं बड़े चैन से था। मेरे घर की वस्तुओं में बढ़ोत्तरी हो रही थी और अब मुझे ज़िन्दगी कुछ अधिक ही दिलचस्प महसूस होने लगी थी। प्रतिदिन मैं बड़े इत्मीनान से बिस्तर में लेटकर मोहिनी से बातें करता। मोहिनी ने मुझे बताया था कि उसकी आवाज मेरे अतिरिक्त कोई और नहीं सुन सकता। परन्तु जहाँ तक उसे देखने का सम्बन्ध था, तब यह बात मेरे वश से भी बाहर था।

मैं केवल उसकी हरकतों का आभास पा सकता था। वार्तालाप के बीच मैंने कई बार चेष्टा की थी कि वह अपने अस्तित्व के रहस्य के बारे में भी कुछ बता दे। परन्तु मुझे सफलता नहीं मिली। एक-दो बार मैंने यह भी पता लगाना चाहा कि आखिर वह काम क्या है जिसके लिये वह मेरी सहायता चाहती है ? किसके लिये वह मेरी सहायता की मोहताज थी ? परन्तु उसने हर बार यही कहकर टाल दिया कि अभी इसका समय नहीं आया। जब वह समय आएगा तो मुझे सब कुछ मालूम हो जाएगा। मैंने इस भय से अधिक पूछना उचित नहीं समझा कि कहीं वह मुझसे रुष्ट न हो जाए।

जब हम गयी रात तक बातें करते और नींद आने लगती तो मुझे यूँ महसूस होता कि वह मेरे सिर पर विश्राम करने के लिये हाथ-पाँव फैलाकर पसर गयी है। उसके थोड़ी देर बाद ही मोहिनी के खर्राटों की मद्धिम-मद्धिम आवाज सुनायी देती। वह दिलकश बातें करती थी। उसके सोने का अन्दाज भी निराला था। मुझे अब उसकी हर बात बड़ी दिलकश लगती। मैं उसके जिस्म का गुराज अपने सिर पर महसूस करता।
 
जब हम गयी रात तक बातें करते और नींद आने लगती तो मुझे यूँ महसूस होता कि वह मेरे सिर पर विश्राम करने के लिये हाथ-पाँव फैलाकर पसर गयी है। उसके थोड़ी देर बाद ही मोहिनी के खर्राटों की मद्धिम-मद्धिम आवाज सुनायी देती। वह दिलकश बातें करती थी। उसके सोने का अन्दाज भी निराला था। मुझे अब उसकी हर बात बड़ी दिलकश लगती। मैं उसके जिस्म का गुराज अपने सिर पर महसूस करता।

कोई बीस दिन बड़े आराम से बीत गये। इस अरसे में मेरे और मोहिनी के बीच अच्छी-खासी मित्रता हो चुकी थी; जबकि मैं उसे देख न सकता था। फिर भी मैंने अपने अनुमान के माध्यम से अपने मस्तिष्क के कैनवस पर मोहिनी की एक खूबसूरत तस्वीर बना डाली थी नाजुक और कोमल सी एक खूबसूरत लड़की जिसके चेहरे पर सौंदर्य की आग दमकती थी। उसके पतले और नाजुक तराशे होंठ हर समय मुस्कुराने के आदी थे। उसकी आँखों में मुझे हर समय तरोताजा कमल तैरते नज़र आते और उसके बात करने का अंदाज; मैं सदैव यही महसूस करता जो बातें करते समय वह बेहद शर्मीली और मासूम सी नज़र आती थी। हाँ, तो हम दोनों एक-दूसरे से बेहद खुल गये थे। अपने फ्लैट में लेटा मैं घण्टों उसके साथ इधर-उधर की बातें करता। मैं दबी-दबी जुबान में लोगों से नजरें बचाकर उसका उत्तर दे दिया करता।

मोहिनी ने मुझसे जो कुछ वायदा किया था, वह उस पर स्थिर थी। मेरी प्रत्येक इच्छा एक के बाद एक पूरी हो रही थी। मैं मोहिनी से कहता और मोहिनी मुझे उसकी प्राप्ति का रास्ता बता देती। मेरे फ्लैट का हुलिया अब एकदम बदल चुका था। टूटी हुई कुर्सियों के स्थान पर फ्लैट में एक खूबसूरत सोफ़ा सैट मौजूद था। झिलंगी चारपाई का स्थान मसहरी ने ले लिया था। साधारण सुती कपड़ों के बजाय अब मेरे पास पहनने के लिये बेहतरीन सूट भी मौजूद थे। अब मैंने सामने वाले होटल में बैठकर नाश्ता करना छोड़ दिया था। बल्कि मैं शहर के एक ऊँचे किस्म के होटल में जाया करता था जहाँ नौकर और वेटर मेरे आगे-पीछे हाथ बाँधे खड़े रहते थे और में गर्व के साथ छुरी का ँटे से खाने में जुटा रहता। अब मुझे बिल पेमेंट के लिये पैसों का हिसाब करने की आवश्यकता नहीं थी; बल्कि अब मैं बिल के साथ-साथ पाँच-दस रुपए टिप भी दे दिया करता था।

दोपहर के खाने के बाद कुछ देर आराम करना और रात के खाने के बाद टहलना मेरी नित्य क्रिया बन चुकी थी। शाम के समय अब मैं बड़े नियमित रूप से सिविल लाइब्रेरी के क्षेत्र में जाता था जहाँ केवल बड़े लोग आ और जा सकते थे। साधारण लोग और मध्यम श्रेणी के लोग वहाँ के रखरखाव और वहाँ के घूमने-फिरने वालों की शान-ओ-शौकत देखकर ही आत्मग्लानि के शिकार बन जाते थे। मेरे साथ कोई ऐसी समस्या नहीं थी। मैं बराबर जीत रहा था। मोहिनी ने इन बीस दिनों में मेरे साथ जो कुछ किया था, जीवन भर भी यदि हाथ-पाँव मारता रहता तो भी पूरा न हो सकता। इसलिए मैं भी उसका बेहद ख्याल रखता। यदि मैं महसूस करता कि वह सो रही हैं या आराम करने के लिये लेटी हुई हैं तो मैं उसे सम्बोधित करने की बजाय खामोश ही रहता। तो हम दोनों के बीच गढ़ी छन रही थी। मुझे यदि कोई चिन्ता थी तो बस इतनी ही थी कि मोहिनी ने अभी तक मुझसे कोई काम नहीं लिया था। जबकि मैं यही चाहता था कि वह मुझसे कोई काम ले और मैं उसे पूरा करके उसके अहसानों के बोझ को कुछ हल्का कर सकूँ।

आज भी रोज के समान जब मैं एक कीमती सूट से अपने जिस्म को सजाए सिविल लाइब्रेरी वाले पार्क में चहलकदमी कर रहा था। मेरा मस्तिष्क इस सोच में उलझा हुआ था कि आखिर मोहिनी ने अब तक मुझसे कोई सेवा क्यों नहीं प्राप्त की। फिर मैंने सोचा सम्भव है उसने मात्र समझौते के कारण यूँ ही एक शर्त लगा दी हो वरना भला उसे मेरी क्या आवश्यकता पड़ सकती है?

अब मैं इस बात को अच्छी प्रकार महसूस कर चुका था कि वास्तव में मोहिनी रहस्यमय शक्तियों की मालिक है। दुनिया का कोई भी काम उसके लिये कठिन या असम्भव नहीं है। परन्तु मेरा ख्याल गलत साबित हुआ। मोहिनी वास्तव में मेरी सहायता की मोहताज थी लेकिन किस सिलसिले में यह मैं बाद में बताऊँगा। बहरहाल मोहिनी के साथ समझौता कर लेने बाद किस तरह गले-गले तक मुसीबतों के दल-दल में फँस चुका था इसका आभास मुझे बाद में हुआ। यदि कहीं आरम्भ में मुझे इस बात की हवा भी लग जाती कि मोहिनी अपनी कृपाओं का बदला मुझसे इस प्रकार चाहेगी तो मैं मरते मर जाता लेकिन मोहिनी के साथ कोई समझौता कभी न करता।

अब मैं फिर वास्तविक घटना की तरफ आता हूँ। जब से मोहिनी से मेरी भेंट हुई और मेरे बुरे दिन फिरे थे, मैं बड़े नियमित रूप से चहलकदमी के लिये शाम के समय पार्क में आया करता था। यहीं मेरी दृष्टि एक लड़की से लड़ी थी और मेरे हृदय में यह इच्छा बल पकड़ती गयी थी कि उसे जीवन साथी के रूप में सदैव के लिये अपना लूँ। क्लर्की के जमाने में उस लड़की का ख्याल करके मैं दिल मारकर रह जाता था परन्तु अब मुझें विश्वास था कि लड़की भी मुझ में दिलचस्पी ले रही थी जिसका अनुमान मैंने उसकी मुस्कुराती हुई दृष्टि से लगा लिया था। जबकि उसकी और मेरी आज तक कोई बात नहीं हुई थी। लेकिन जितनी देर मैं पार्क में उपस्थित रहता वह भी वहाँ रहती। हम एक-दूसरे को देखते फिर जल्दी से दृष्टि को झुका लेते। अभी तक न तो उसने मेरे निकट आकर कोई बात करने की कोशिश की थी, न ही मेरा साहस पड़ा था कि मैं अपनी तरफ से पहल कर सकूँ।
 
बहरहाल जितनी देर पार्क में रहते एक-दूसरे के आमने-सामने रहते और दिलों की भाषा नज़रों की जुबानी एक-दूसरे से बयान करने में व्यस्त रहते। मैंने उस लड़की के बारे में अब तक इतनी जानकारियाँ प्राप्त कर ली थीं कि उसका नाम डॉली है। उसका बाप एक बड़ा प्रकाशक था जिसकी गणना हिंदुस्तान के पॉकेट बुक्स व्यवसाय के बड़े प्रकाशकों में होती थी। यदि मोहिनी से मेरी मुलाकात न होती तो कदाचित मैं डॉली की कल्पना भी न कर सकता था। परन्तु मौजूदा सूरत में दौलत के लिहाज से डॉली के बाप से किसी तरह कम नहीं था। जितनी दौलत उसने अपने सारे जीवन भर लेखकों का खून चूसकर कमाई थी, उतनी दौलत मैं किसी भी समय मोहिनी के माध्यम से प्राप्त कर सकता था।

डॉली मेरे दिलोदिमाग पर छा चुकी थी। आज भी मैं पार्क के एक सुनसान कोने में बैठा उसे कनखियों से देख रहा था। वह मुझसे आठ-दस फीट के फासले पर दूसरे बेंच पर बैठी थी। कभी-कभी जब हम दोनों की दृष्टि एक-दूसरे तक जाती थी तो वह झिझककर अपनी निगाहें झुका लेती। बहुत देर से हमारे बीच आँखमिचौली हो रही थी। अचानक मैंने एक खूबसूरत नौजवान को डॉली के निकट जाकर बैठते देखा। नौजवान के आ जाने से डॉली कुछ चिन्तित हो उठी थी। परन्तु मैंने यही अनुमान लगाया कि वह नौजवान उसके लिये अजनबी था। यदि ऐसी कोई बात होती तो डॉली यकीनन उठ गयी होती। उसका अपने निकट बैठना कभी गँवारा नहीं करती। मैं अपने स्थान पर बैठा उस नौजवान को खा जाने वाली दृष्टि से देख रहा था। वह जिस भाव में मुस्कुरा-मुस्कुराकर डॉली से बात करने की कोशिश कर रहा था, उससे मेरे सीने में एक आग सी लग गयी थी।

ठीक उसी समय जब मैं अपनी बेंच पर बार-बार पहलू बदल रहा था और दिल ही दिल में कसमसा रहा था तो मैंने महसूस किया कि मोहिनी जो मेरे सिर पर लेटी थी अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठी। उसी के साथ मेरे कानों में उसकी रसीली आवाज गूँजी।

“राज! क्या तुम जानते हो यह नौजवान कौन है?”

“नहीं!” मैंने धीरे से कहा।

“यह डॉली का मंगेतर है।” मोहिनी फुसफुसाई – “मैं चाहती हूँ तुम इसकी हत्या कर दो।”

मोहिनी की जुबानी यह सुनकर कि वह नौजवान डॉली का मंगेतर है। मेरे दिल को बड़ा धक्का लगा। परन्तु मैं चूँकि शुरू से ही अहिंसा पसन्द आदमी था इसलिए नौजवान को मार डालने का सुझाव सुनकर मेरा दिल धड़कने लगा।

“मोहिनी! क्या तुम मेरे लिये कुछ नहीं कर सकतीं ?” मैंने दबी जुबान में कहा। “मैं बहुत बेचैन हूँ।”

“नहीं! तुम्हें इस नौजवान की हत्या वैसे भी मेरे लिये करनी होगी। तुम्हें अपना वादा तो याद होगा न ?”

“मैं अब भी अपने वायदे पर अडिग हूँ; लेकिन तुम्हारी इस नौजवान से कौन सी दुश्मनी है ?” मैंने पूछा।

“कुछ भी नहीं! परन्तु इसके बावजूद तुम्हें मेरी आज्ञा पर इस नौजवान की हत्या करनी होगी।” मोहिनी का स्वर इस बार कठोर और आज्ञा भरा था – “मुझे इस नौजवान के खून की आवश्यकता है।”

“क्या?” मैं बौखला गया।

“स्पष्ट है, तुम इंकार नहीं कर सकते। इंकार का मतलब है वायदा खिलाफी और वायदा खिलाफी करने वाला मेरे लिहाज से बहुत बड़ी सजा का मुजरिम है। तुम मेरी शक्तियों का अनुमान तो लगा ही चुके हो।”

“लेकिन?”

“बहस मत करो राज!” मोहिनी ने झल्लाये स्वर में मेरी बात काटते हुए। “सुनो, इंसानी खून मेरा भोजन है। उसके बिना मेरा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। तुमने यदि वायदा खिलाफी की तो नुकसान में रहोगे। तुम्हें हर हाल में मेरे लिये यह खतरा उठाना होगा जिसका तुम वायदा कर चुके हो।”

इससे पहले कि मैं कोई उत्तर देता, मेरे सिर में नुकीले पंजों की चुभन तेज होने लगी। यह कदाचित मोहिनी की ओर से खामोश चैलेंज था कि यदि मैंने उसकी बात न मानी तो वह मुझे भी हानि पहुँचाने में नहीं हिचकिचायेगी।

समय की नजाकत को महसूस कर मैं काँप उठा। मेरे चेहरे पर पसीने की नन्ही-नन्ही बूँदे चमकने लगीं। मेरे मस्तिष्क में एक हलचल सी मच गयी थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ।

“क्यों राज ? तुमने क्या फैसला किया ?”

“मैं तैयार हूँ।” मैंने एकाएक कहा और उस नौजवान को घूरने लगा जो डॉली के साथ बैठा बातें कर रहा था। समय जैसे-जैसे गुजरता गया मेरे खून की गर्दिश भी तेज होती गयी।

मेरी नजरें बराबर उस नौजवान पर जमी हुई थीं जो सामने वाली बेंच पर बैठा डॉली से हँस-हँसकर बातें कर रहा था। हालाँकि डॉली को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी – ऐसा मैं महसूस कर रहा था। जब से मोहिनी ने मुझे यह बताया था कि वह नौजवान डॉली का मंगेतर है तब से मैं काँटों पर लोट रहा था। ऐसा सोचना ही मेरे लिये असहनीय था। इसलिए कि मैंने डॉली के लिये न जाने कितने खूबसूरत रंग अपने दामन में बना लिये थे।

कुछ दिन ऐसे भी आए जब मैं उसी के सम्बन्ध में सोचता रहा। फिर यह कैसे सम्भव था कि मैं अपनी खुशियों, अपने अरमानों का खून आसानी से बर्दाश्त कर लेता और अब तो यह बात यूँ भी असम्भव थी। क्योंकि मोहिनी मेरी सहायता को तैयार थी। वह मोहिनी जो रहस्यमय शक्तियों की मालिक थी। जैसे-जैसे समय गुजरता गया मेरे दिल से उठने वाली आग भड़कती गयी। यदि मोहिनी से वायदा खिलाफी का ख्याल न होता तब भी यह मालूम हो जाने के बाद कि वह नौजवान मेरे सपनों की शहजादी को मुझसे छीन ले जाने की कोशिश कर रहा है, मैं इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं कर सकता था।

बहरहाल मैं निर्णय कर चुका था कि इस नौजवान को जरूर ठिकाने लगा दूँगा। डॉली ने नौजवान की उपस्थिति में भी दो-तीन बार तिरछी नज़रों से मेरी ओर देखा था। कदाचित वह अपने चेहरे पर फैली हुई बेचैनी के भावों द्वारा बताना चाहती थी कि नौजवान उसके लिये बिन बुलाए मेहमान की हैसियत रखता है। मैंने उसकी नज़रों से यह भी अनुमान लगाया कि वह अब तक वहाँ केवल मेरे लिये बैठी हुई थी वरना नौजवान की उपस्थिति से वह बोर होकर उठ चुकी होती। इन सब बातों को महसूस कर लेने के बाद मैं इस उधेड़बुन में लगा हुआ था कि किस समय मुझे अवसर मिले और मैं अपने दुश्मन को ठिकाने लगाऊँ।

मैंने उसकी हत्या करने के लिये उचित स्थान का निरीक्षण करना शुरू कर दिया। शाम का धुंधलापन गहरा होने लगा तो मैंने डॉली को बेंच से उठते देखा। उसने अंतिम बार थकी-थकी नज़रों से देखा फिर वापसी के लिये चल पड़ी। नौजवान बराबर उसके साथ था। उन दोनों के आगे बढ़ते ही मैं झटके से खड़ा हुआ और कदम बढ़ाता उनके पीछे हो लिया। मेरे दिल की धड़कने हर पल तेज होती जा रही थी। मुझे केवल एक ऐसे अवसर की तलाश थी जब मैं उस नौजवान को किसी सुनसान स्थान पर पकड़ सकता और मुझे यह अवसर शीघ्र प्राप्त भी हुआ।
 
डॉली उस समय एक ऐसे रास्ते से गुजर रही थी जिसके दोनों ओर नींबू की आदमकद झाड़ियाँ मौजूद थीं। इन झाड़ियों के दूसरी ओर खूबसूरत लॉन था जहाँ उस समय भी इक्का-दुक्का जोड़े चहलकदमी करने में मग्न थे। अपने दुश्मन को पछाड़ डालने के लिये यह मेरे लिये एक उत्तम अवसर था। मैंने अपनी रफ़्तार तेज कर दी। मेरे ज़हन में बार-बार एक ही ख्याल उभर रहा था कि मैं जल्द से जल्द उस नौजवान को ठिकाने लगा दूँ। मेरे ऊपर खून सवार था। सच तो यह है कि मैं अपने होश-ओ-हवास में नहीं था। नौजवान और मेरे मध्य अब कठिनाई से दस कदम का फासला रह गया था। जब बायीं ओर से डॉली की किसी सहेली ने उसे आवाज दी तो मैं अचानक ठिठककर रुक गया। डॉली के साथ मेरा दुश्मन भी उस आवाज को सुनकर रुक चुका था। उसके चेहरे पर अचानक गंभीरता छा गयी थी। शायद इसीलिए कि वह उल्लू का पठ्ठा डॉली से अलग होना नहीं चाहता था। लेकिन डॉली के चेहरे पर खुशी छा गयी थी। उसने पलटकर नौजवान से कुछ कहा फिर लम्बे-लम्बे डग भरती हुई अपनी सहेली के निकट चली गयी। ऊपर वाले ने मेरे लिये अब एक अच्छी सरलता पैदा कर दी थी। डॉली की उपस्थिति में उसी नौजवान को कत्ल किया जाता तो सम्भवत वह मुझे हत्यारा और पापी समझकर मुझसे दूर हो जाती। लेकिन अब रास्ता मेरे लिये बिल्कुल साफ था। जहाँ मैं खड़ा था वहाँ मेरे और मेरे दुश्मन के अलावा दूर-दूर तक कोई उपस्थित नहीं था। डॉली जब तक नज़रों से ओझल न हो गयी, मेरा दुश्मन अपनी पतलून की जेब में हाथ डाले उसे देखता रहा। फिर वह जैसे ही आगे बढ़ा मेरा दिल चाहा कि पीछे से उसकी गर्दन पर हमला कर दूँ। फिर तुरन्त मुझे ख्याल आया कि यहाँ इस अवसर पर यह खतरनाक कदम उठाना किसी भी प्रकार कामयाब न होगा। उचित होगा कि नौजवान का घर तक पीछा किया जाए और उचित अवसर पर उसकी हत्या की जाए।

जैसे ही मेरे ज़हन में यह सवाल आया मैंने मोहिनी के पंजों की चुभन अपने सिर में महसूस की। वह अत्यंत बेचैन नज़र आती थी। मैंने अपनी विवशता स्पष्ट करनी चाही तो मोहिनी के नुकीले पंजों की पकड़ और कठोर हो गयी। अतः मुझे विवश होकर उसी समय उस नौजवान को कत्ल करने के लिये स्वयं को तैयार करना पड़ा।

अंदाज चाहे जो भी हो, फिर भी मैं अंधेरे में उसे मारना चाहता था। अंधेरा हो चुका था और पीछा करते-करते एक ऐसा सुनसान कोना हाथ आ ही गया। अचानक उसकी गर्दन पर मैंने पीछे से भरपूर आक्रमण कर दिया। यह आक्रमण उसके लिये आकस्मित था। अचानक और भरपूर आक्रमण था इसलिए वह अपना संतुलन बरकरार न रख सका और त्यौराकर नीचे गिर पड़ा। मेरे सिर पर खून सवार था इसलिए इससे पूर्व की वह किसी जवाबी कार्यवाही के लिये स्वयं को तैयार करता मैंने जूते की नोक से एक जोरदार ठोकर उससे सिर पर मारी फिर उसकी छाती पर सवार होकर उसकी गर्दन को पूरी ताकत से दबाने लगा। मेरे हाथ की पकड़ बेहद मजबूत थी इसलिए वह छुटकारा न पा सका। मैं कुछ सोचे-समझे बिना अपनी उंगलियों के घेरे को तंग करता चला गया फिर उस समय चौंका जब नौजवान की आँखें अपने स्थान से उबलकर भयानक हद तक बाहर निकल आयी। उसका शरीर शिथिल पड़ चुका था। उसमें साधारण सी हरकत भी बाकी न रही। यह सब मिनटों में हो गया।

ज़िन्दगी में यह पहला संगीन जुर्म मेरे हाथों से हुआ था। फिर इस ख्याल से कि कहीं मैं धर न लिया जाऊँ और कोई मुझे लाश के निकट न देख ले, मैं तेजी के साथ नौजवान के निकट से हटा और बौखलाहट में भाग खड़ा होता कि मेरे कानों में मोहिनी की रहस्यमय फुसफुसाहट उभरी।

“डरो मत राज! तुम तो बड़े दिलेर और मेरी आशाओं से बढ़-चढ़कर सिद्ध हुए।”

मैं उस रहस्यमय अस्तित्व को देख तो न सकता था परन्तु महसूस अवश्य कर सकता था। मैं महसूस कर रहा था कि मेरे हाथों द्वारा हुई हत्या से उसे एक आत्मिक सुख प्राप्त हुआ है। उस समय मेरे सिर पर खड़ी झूम रही थी। इससे पहले कि मैं मोहिनी की बात का उत्तर देता उसने दोबारा मुझे सम्बोधित किया –

“सुनो राज! मेरा अस्तित्व इसी सूरत में बरकरार रह सकता है कि मैं थोड़े-थोड़े समय बाद इंसानी लहू पीती रहूँ। मगर तुम तुरन्त भाग जाओ। अभी इसी समय।”

मैं स्थिर खड़ा था। क्या वास्तव में मैं किसी की हत्या कर सकता था ? यह विचार ही मेरे होश-हवास को खो देने के लिये पर्याप्त था। अचानक मैंने महसूस किया जैसे कोई नन्ही-मुन्नी लिजलिजी सी वस्तु मेरे सिर पर से रेंगती हुई नीचे उतर गयी। जैसे कोई छिपकली हो। फिर अनायास मेरे कानो में ऐसी आवाजें गूँजने लगी जैसे कोई जानवर किसी वस्तु को अपनी जुबान से चपड़-चपड़ चाट रहा हो मेरे मस्तिष्क में यह विचार उभरा कि मोहिनी नौजवान के लहू से अपनी हवस की पूर्ति कर रही है। उसने मुझसे कहा भी था कि अपने अस्तित्व को जीवित रखने के लिये यदा-कदा इन्सानी लहू की आवश्यकता पेश आती है। मेरा दिल चाहा कि एक बार नज़र घुमाकर उस लाश को देख लूँ जो झाड़ियों के निकट पड़ी थी लेकिन मैं इसका साहस न कर सका।
 
लम्बे-लम्बे डग भरता, छिपता-छिपाता और काँपता हुआ तेजी के साथ पार्क से बाहर आया। फिर एक गुजरती हुई टैक्सी को रोककर उसमें बैठ गया। मैंने टैक्सी वाले से क्या कहा मुझे याद नहीं। मुझे केवल इतना याद है कि पसीने से मेरा माथा भीगा हुआ था। दस मिनट बाद मैंने अपने आपको एक बार में बैठा जल्दी-जल्दी शराब के घू ँट अपने हलक से उतरता हुआ पाया। बार में मेरे अलावा और भी बहुत से मर्द और औरतें मौजूद थीं। लेकिन मुझे उनसे कोई सरोकार नहीं था। मैं तो केवल उस भयानक हकीकत से छुटकारा पाने के लिये स्वयं को शराब में डूबो देना चाहता था। बहुत पी लेने के बाद मैं झूमता हुआ अपनी मेज से उठा। काउंटर पर जाकर मैंने बिल अदा किया। फिर लड़खड़ाता हुआ बाहर आ गया। अब मेरा मस्तिष्क इस भय से स्वतंत्र था कि मैं एक हत्यारा हूँ और जो जुर्म मेरे हाथों से हो चुका है, उसकी सजा मेरे लिये केवल फाँसी का फंदा ही हो सकती है। शराब पूरी तरह दिलों-दिमाग पर अपना अधिकार जमा चुकी थी। मेरा सिर हल्का और दिमाग शांत हो गया था। रात का खाना सदैव के अनुसार मैंने उसी होटल में खाया जहाँ के वेटर और दूसरे नौकर लम्बी-लम्बी टिप मिलने के कारण मुझे अच्छी तरह जानते थे। खाने से फुर्सत पाकर काफी रात तक इधर-उधर घूमता रहा। शराब का नशा जब तक मेरे दिलो-दिमाग पर छाया रहा, मुझे कोई चिन्ता न थी लेकिन जब नशे की हालत काम हुई तो मैंने बड़ी गंभीरता से मोहिनी के सम्बन्ध में सोचना आरंभ कर दिया।

यह मैंने क्या कर दिया? मैंने हत्या कर दी थी। मुझे किसी भी प्रकार विश्वास नहीं आ रहा था। यह दूसरा संयोग था जब मोहिनी ने मुझे किसी गलत काम के लिये उकसाया था और मैं उसकी बातों में आ गया। मोहिनी की बदौलत मेरे बिगड़े दिन सँवरे थे। परन्तु मैं चूँकि अहिंसा पसंद इन्सान हूँ इसलिए दंगा-फसाद और लड़ाई-झगड़ा मेरे वश की बात न थी। इन सारी बातों से बचने का केवल एक ही उपाय था कि मैं मोहिनी से किसी तरह छुटकारा प्राप्त कर लेता। मोहिनी का विचार आया तो आकस्मित तौर से उंगलियों से बालों को कुरेदा फिर मुझे याद आया, मोहिनी तो एक ऐसे अदृश्य रहस्यमय अस्तित्व का नाम है जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। देखा नहीं जा सकता। बहरहाल मैंने यही महसूस किया कि वह उस समय मेरे सिर पर उपस्थित नहीं थी और उसके केवल दो कारण हो सकते थे। या तो मोहिनी अभी तक मेरे दुश्मन का लहू पीने में मग्न थी या फिर यह भी हो सकता था कि उसने मेरे बजाय अब किसी और को अपना माध्यम बना लिया था। परन्तु अब मोहिनी की अनुपस्थिति में मेरा ज़हन तेजी से आने वाली भयानक घटनाओं पर गौर कर रहा था। मैंने तो परिस्थितियों की चिन्ता किए बिना मूर्खों और पागलों के समान एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी इसलिए जब मैं उसके सम्बन्ध में सोचता तो मेरा दिल डूबने लगता। अब क्या होगा। है भगवान मुझे इस पाप से बचा लो।

घर वापस आकर जब मैं सोने के इरादे से लेटा तो नींद कोसों दूर थी। मोहिनी उस समय मेरे सिर पर मौजूद नहीं थी। मैं दिल ही दिल में भगवान से दुआ माँगने लगा कि अब मोहिनी दोबारा मेरे सिर का रुख न करे। जहाँ तक मेरे हत्या करने का प्रश्न था तो मैं उस समय अपने होश-ओ-हवाश में नहीं था। मोहिनी ने मेरे सोचने-समझने की सारी शक्ति छीन ली थी।

मैंने अपने मन में पक्का इरादा कर लिया था कि सुबह होते ही चुपचाप नगर छोड़कर किसी दूसरी ओर निकल जाऊँगा और नये सिरे से अपने जीवन को बसाने की कोशिश करूँगा। चाहे इसके लिये मुझे दोबारा क्लर्की ही क्यों न करनी पड़े। इस ख्याल से मेरे ज़हन को थोड़ी तसल्ली मिली। मैंने उठकर बत्ती गुल की और सोने की कोशिश करने लगा। रात मुझे किस तरह नींद आयी मुझे कुछ याद नहीं, परन्तु सुबह जब मेरी आँख खुली तो सबसे पहले मैंने जिस बात को महसूस किया वह मोहिनी का अस्तित्व था। वह रात ही किसी समय मेरे सिर पर दोबारा आ चुकी थी और अब बड़े आराम से मेरे सिर पर लेटी सो रही थी। उस के मद्धिम-मद्धिम खर्राटों की आवाज मुझे सुनायी दे रही थी। मैं महसूस कर रहा था कि उसने अपने नाजुक हाथों को तकिए के रूप में इस्तेमाल कर रखा है और बायीं करवट लेटी हुई है। मैंने अपने ज़हन में उसकी शक्ल-ओ-सूरत के सम्बन्ध में जो तस्वीर बनायी थी, उसके अनुसार मुझे महसूस हो रहा था कि लहू को पीने के बाद उसकी हुस्न में खास परिवर्तन हो गया। वह अब गुदाज महसूस हो रही थी। मुझे यूँ महसूस हुआ कि वह किसी अत्यन्त सुंदर युवती के रूप में हैं। उसके गालों की लाली कुन्दन की तरह दमक रही है। मैंने उसके तराशे हुए लबों पर बहुत ही शानदार मुस्कुराहट की कल्पना अपने ज़हन में उभरते हुए पायी। मोहिनी की उपस्थिति को महसूस करके मैं बुरी प्रकार झल्ला गया। लेकिन यह झल्लाहट बिना मतलब थी। मैं अच्छी प्रकार जानता था कि मैं अब अपनी इच्छा से उससे छुटकारा नहीं पा सकता। मैंने यही उचित समझा कि उठकर जल्दी से अपनी यात्रा का सामान बाँध लूँ और इससे पहले कि मोहिनी सपनों की वादी से जाग उठे, स्टेशन पहुँचकर रेल में सवार हो जाऊँ।

ज़हन में प्रोग्राम सेट करके किसी प्रकार सवारी को लाने के लिये द्वार की ओर बढ़ा ही था कि यूँ चौंककर रुक गया जैसे किसी ने मेरे कदमों में बेड़ियाँ डाल दी हों। मेरी फटी-फटी नजरें उस अखबार पर जमी हुई थी जो हॉकर प्रतिदिन मेरे फ्लैट में फेंक जाता था। अखबार की पहली सुर्खी पर नज़र पड़ते ही मेरा दिल धक से रह गया। कुछ क्षणों तक मैं अपने स्थान पर स्तब्ध खड़ा उस सुर्खी को भय-पूर्ण दृष्टि से घूरता रहा फिर मैंने आगे बढ़कर धड़कते दिल से अखबार उठाया और उस समाचार को पढ़ने लगा। जिसने मुझे काँप जाने पर विवश कर दिया था। ज्यों-ज्यों मैं समाचार पढ़ता जाता, मेरे चेहरे का रंग फीका पड़ता जाता था। दिल की धड़कन हर पल तेज और तेज होती जा रही थी। मैंने बड़ी कठिनाई के बाद पूरे समाचार को पढ़ा फिर सिर पकड़कर एक कुर्सी पर बैठ गया। समाचार-पत्र का वह समाचार उसी नौजवान से संबंधित था जिसे मैंने पिछली शाम ही पार्क के उस सुनसान कोने में मोहिनी के उकसाने पर जान से मार डाला था। अखबार ने अगर केवल हत्या की सीधी-सादी कहानी सुनायी होती तो मैं जरा भी न घबराता। लेकिन हत्या की इस वारदात को जो आश्चर्यजनक रहस्यमय ढंग दिया गया था, उसने मेरे मस्तिष्क में खलबली मचा दी थी।

समाचार पत्र ने अपने सम्पादकीय और दूसरे गवाहों के हवाले से लिखा था कि पिछली शाम सिविल लाइन्स के पार्क से जो लाश मिली है वह नगर के प्रसिद्ध सेठ मिस्टर साहनी के होने वाले दामाद मिस्टर दीपक की प्रमाणित हुई। लाश को शिनाख्त करने में जो कठिनाई सामने आयी उसका कारण यह था कि मरने वाले के शरीर में खून का एक कतरा भी बाकी न बचा था। जिसके कारण लाश के चेहरे पर बेशुमार झुर्रियाँ पैदा हो गयी थीं। चेहरे की झुर्रियों ने चेहरे को इस सीमा तक बदल दिया था कि उसकी पहचान बहुत कठिनाइयों के बाद उसके शरीर पर मौजूद वस्त्रों से की जा सकी। डॉली को जब इस सम्बन्ध में टटोला गया तो उसने बताया कि दीपक कुछ देर पहले उसी के साथ था और बिल्कुल स्वस्थ था। कुमारी डॉली को जब लाश की शिनाख्त के लिये लाया गया तो पहली नज़र में वह भी लाश को पहचान न सकी। पुलिस विभाग के विशेषज्ञ अभी तक किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सके थे परन्तु उन्होंने इस बात पर सन्देह अवश्य प्रकट किया था कि मिस्टर दीपक की मौत में अवश्य ही किसी असाधारण व्यक्ति का हाथ है। उस असाधारण व्यक्ति का हाथ है जिसने मरने वाले का सारा खून पी लिया था। इस संदेह का कारण वह बारीक निशान बने थे जो मरने वाले कि गर्दन पर दोनों ओर पाए गये थे। अन्त में संवाददाताओं ने अपनी ओर से लिखा था कि पुलिस बड़ी सरगर्मी से मिस्टर दीपक के हत्यारे को खोज रही है; और बहुत जल्द वह हत्यारे तक पहुँच जाएँगे।

मेरा मस्तिष्क बुरी तरह चकरा रहा था। मुझे विश्वास था समाचार-पत्र ने दीपक के सिलसिले में जिस खून का विवरण दिया था। वह निश्चय ही मोहिनी के माध्यम से होगी। वह मोहिनी जो इस समय भी मेरे सिर पर मीठी नींद सो रही थी। वह हल्के-हल्के खर्राटे ले रही थी। मोहिनी ने मुझसे यही कहा था कि अपने रहस्यमय अस्तित्व को जिंदा रखने के लिये उसे इन्सानी खून की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन यह कैसे सम्भव था कि वह एक नन्हा सा अस्तित्व होने के बावजूद किसी इन्सान के शरीर का सारा खून पी जाती। कोई बात समझ में नहीं आती थी। सिर्फ इससे की इस आश्चर्यजनक घटना को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया जाए।
 
मैं काफी देर मोहिनी के सम्बन्ध में सोचता रहा। आप विश्वास करें कि इस समाचार को पढ़ने के बाद मुझे न जाने क्यों अब इस बात का तनिक भी भय नहीं था कि पुलिस के कारिंदे किसी भी क्षण दनदनाते हुए मेरे फ्लैट में प्रविष्ट होंगे और मुझे हत्या के अपराध में हथकड़ियाँ पहनाकर अपने साथ ले जाएँगे। फिर उसके बाद एक संगीन और भयानक जुर्म के बदले में मुझे फाँसी के फंदे पर लटका दिया जाएगा। मेरा मस्तिष्क इन विचारों से एकदम अलग था। बल्कि उसके विपरीत मैं इस समय केवल और केवल मोहिनी के रहस्यमय और भयानक अस्तित्व के बारे में सोच रहा था। जो मेरे लिये फाँसी के फंदे से अधिक खौफनाक बनी हुई थी। मैं मोहिनी से यह वायदा कर चुका था कि वह मुझसे अपनी कृपाओं के बदले जो कुछ भी कहेगी मैं उस पर बिना किसी इंकार के अमल करूँगा। उसके वायदे की पहली घटना मेरे लिये कुछ इस कदर भयानक थी कि मैं आगे के बारे में सोच-सोचकर चिन्तित हो रहा था। यदि वास्तव में इन्सानी खून मोहिनी का भोजन था तो मुझे उसके लिये हत्या करने का सिलसिला जारी रखना पड़ेगा। इंकार की सूरत में सम्भव था कि मोहिनी जो समाचार की सूचना के अनुसार खून पीने वाली भी प्रमाणित हो चुकी थी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिये मेरे ही अस्तित्व को खत्म कर देती।

अभी मैं इन्हीं विचारों में उलझा हुआ था कि दरवाजे पर हल्की दस्तक सुनकर यूँ उछल पड़ा जैसे अनजाने में मेरा पाँव किसी जहरीले नाग के फन पर पड़ गया हो। मेरे जिस्म में दौड़ते हुए खून कि रफ़्तार अचानक तेज हो गयी। मेरी फटी-फटी दृष्टि द्वार पर जमकर रह गयी। बाहर कौन हो सकता है। मेरे दिल की धड़कनों से एक पश्न उभरा। आने वाली परिस्थिति की मात्र कल्पना ने मेरे होश-ओ-हवास को झिंझोड़कर शिथिल कर दिया था। मोहिनी अभी तक किसी मासूम और दूध पीते बच्चे की तरह जिसे पेट भरकर मिल गया हो, मीठी नींद सो रही थी। अधिक क्रोध की स्थिति में मुझे यही सूझा कि मैंने दोनों हाथों से अपने सिर के बालों को नोंचना शुरू कर दिया। लेकिन यह हरकत भी मुझे कोई लाभ न पहुँचा सकी। मोहिनी पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव न पड़ा। वह लगातार अपने कंठ से हल्के-हल्के खर्राटों की आवाज निकलती रही। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मेरा अगला कदम क्या होना चाहिए? फ्लैट के बाहर जाने का एक ही द्वार था जिस पर कोई उपस्थित था। यदि बाहर जाने का कोई दूसरा रास्ता होता तो मैं निश्चय ही फरार होने के बारे में सोचता। परन्तु अब बचाव की कोई सूरत न थी। दरवाजे पर दूसरी दस्तक हुई तो मैंने स्वयं को संभाला और जी कड़ा करके आगे बढ़ा और चिटकिनी खोल दी।

मुझे विश्वास था कि पुलिस वाले फ्लैट से बाहर हथकड़ियाँ लिये उपस्थित होंगे। परन्तु मेरा अनुमान गलत सिद्ध हुआ। दरवाजा खुलते ही एक बुरकापोश स्त्री झपटकर भीतर प्रविष्ट हुई और काँपती हुई आवाज में बोली –

“राज जी, दरवाजा बंद कर दीजिए!” भीतर आने वाली युवती का चेहरा चूँकि नकाब में छिपा था इसलिए मैं उसे पहचान न सका। कुछ सोचकर मैंने दरवाजे को दोबारा चिटकनी लगायी और पलटा तो क्या देखता हूँ कि डॉली का चेहरा काले बुरके से यूँ झाँक रहा था जैसे चौदहवीं का चाँद काली घटाओ से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।

डॉली को अपने फ्लैट में देखकर मुझे खुशी भी हुई थी और घबराहट भी। मैं अभी तक यह न समझ सका कि वह मेरे पास किस उद्देश्य से आयी है। उसे मेरे निवास स्थान का पता कैसे चला? डॉली से आज तक मेरी कोई बातचीत नहीं हुई थी। सिर्फ नज़रों की भाषा में बातें होती थी। मुझे यह विश्वास था कि मैंने अपने दिल कि धड़कनों की लेन-देन निगाहों ही निगाहों में कर ली थी। परन्तु डॉली ने इतना कुछ महसूस कर लिया है, यह मैं सोच भी नहीं सकता था। मेरी हालत उस समय विचित्र थी। वह डॉली मेरे सामने थी जिसके लिये मैं अपना जीवन बलिदान कर सकता था और जो मेरे दिल की शहजादी थी परन्तु वह कैसे आ गयी? मैं इन प्रश्नों पर गौर कर ही रहा था कि डॉली ने बुरका उतारा और अपनी बेचैन दृष्टि मेरे चेहरे पर जमाती हुई बोली – “राज जी! भगवान के लिये आप इस शहर को छोड़कर जितनी जल्दी सम्भव हो सके किसी दूसरी जगह चले जाइए।”

“क्यों?” मैंने धड़कते दिल से पूछा।

“पुलिस…।” डॉली थूक निगलते हुए बोली। “यदि पुलिस को पता चल गया कि कल आप भी पार्क में उपस्थित थे तो…।”

“लेकिन म… मैंने!”

“मैं जानती हूँ, दीपक रहस्यमय वस्तु का शिकार हुआ है। परन्तु पुलिस मुफ्त में आपको जरूर उलझाने की कोशिश करेगी।” डॉली ने अपनत्व भरे स्वर में कहा। “आप कुछ दिनों के लिये यहाँ से हट जायें। विश्वास कीजिए हालात ठीक होते ही मैं आपको खबर करूँगी। मैं अत्यंत कठिनाई भरी स्थिति में आपके पास आयी हूँ। अतः इस समय हमें खुलकर बात करनी चाहिए। मुझे आपके सम्बन्ध में सब कुछ मालूम है। मैंने सब कुछ महसूस कर लिया है और इन्हीं भावनाओं के कारण मैं इतना बड़ा खतरा मोल लेकर आपके पास आयी हूँ।” डॉली ने बड़े लगाव से कहा।

“डॉली!” मैं उसके अचानक आगमन से बेचैन हो गया था। समझ में नहीं आ रहा था कि उसके आने पर क्या करूँ। उस समय मेरा मस्तिष्क बहुत बौखलाया हुआ था। फिर भी मैंने फिल्मी हीरो के अंदाज में कहा। “अगर फाँसी का फंदा मेरा भाग्य बन चुका है तो फिर इस शहर से दूर चले जाने से भी कुछ न होगा।”

“राज जी!” डॉली ने भी भावुकता से कहा। “आप मुझे दूर न समझे। विश्वास कीजिए जब तक मैं जीवित हूँ आप पर कोई आँच नहीं आ सकती। आप स्वयं सोचिए कि मैं इस समय कितनी कठिनाइयों के बाद आप तक पहुँची हूँ।”

“हूँ सच!” मैं प्रसन्नता भरे स्वर में बोला। मैं बहुत कुछ कहना चाहता था मगर कुछ कहते नहीं बन रहा था।

“समय नष्ट मत कीजिए राज जी। आपको पहली गाड़ी से कहीं और चले जाना चाहिए।”
 
“एक शर्त पर।” मैंने कहा। “आप भी मेरे साथ चलें।” मैं इस बात का समर्थन करता हूँ कि मेरा यह प्रश्न निहायत ही घटिया था। मगर डॉली की इस भावना को देखकर मेरे मुँह से एकाएक निकल गया।

डॉली मेरी बात सुनकर खामोश हो गयी। लोहे को तपता देखकर मैंने उस अवसर को उचित समझा। मैं किसी सच्चे और दीवाने आशिक की तरह डॉली को यह विश्वास दिलाने की चेष्टा करने लगा कि उसके बिना मेरी ज़िंदगी बेकार है। यदि वह मेरे साथ चलने पर तैयार न हुई तो मैं भी शहर नहीं छोड़ूंगा। चाहे हालत मेरे हक में कितने ही खतरनाक क्यों न साबित हों। मैंने उसे उन रातों का हवाला दिया जो मैंने उसकी याद में गुजरी थीं। मैंने अपनी चाहत उस पर स्पष्ट कर दी और मेरे कथन का डॉली पर कुछ ऐसा असर हुआ कि वह खाली-खाली नज़रों से कुछ देर तक मेरी ओर तकती रही। फिर उसने भी मेरी तरह सीधे-सादे शब्दों से काम लेते हुए खुलकर कहा और वायदा कर लिया कि जैसे ही परिस्थितियाँ ठीक हो जाएँगी वह मुझसे आ मिलेगी और हम दोनों सदा के लिये एक हो जाएँगे। बातों ही बातों में मैंने डॉली से यह भी पूछ लिया कि कहीं वह दीपक के सम्बन्ध में मेरे निर्दोष होने पर अविश्वास तो नहीं करती? उसे विश्वास था कि कातिल कोई दूसरी ही शैतानी शक्ति है। इससे मेरा दिल हल्का हो गया। मैं सचमुच यह महसूस करने लगा जैसे दीपक को मैंने नहीं किसी और ने मारा हो।

डॉली कुछ देर तक बैठी मुझे परिस्थितियों का विवरण देती रही। वह बहुत शीघ्र ही मेरे निकट आ गयी। ऐसा लग रहा था जैसे हम वर्षों से एक-दूसरे को जानते हो। चलते-चलते उसने मुझे अपनी मोहब्बत का विश्वास दिलाया और मुझे दिलासा देती हुई वापिस चली गयी। परिस्थितियों ने जो नया रूप धारण किया था वह शत-प्रतिशत मेरे पक्ष में था। डॉली की बातों से मुझे विश्वास हो गया कि वह मेरी ओर पूरी तरह झुकी है और मेरे लिये अपना सब कुछ छोड़ देगी। उसके जाते ही मैं लपकता उसके पीछे लपका। एक टिक्सी इंगेज की फिर शीघ्र अतिशीघ्र अपना सामान टैक्सी में भरकर स्टेशन की ओर चल पड़ा।

स्टेशन पहुँचकर मैंने गाड़ियों के सम्बन्ध में इंक्वायरी से पता किया। फिर बम्बई के एक सेकिंड क्लास का टिकट खरीदा और पहली गाड़ी को पकड़कर अपनी नयी मंजिल की ओर चल पड़ा। उस बीच मोहिनी के खर्राटे बराबर मेरे कानों से टकराते रहे थे। वह बराबर मेरे सिर पर लेटी सपनों की वादी में खोई हुई थी। मुझे खुशी था कि वह सो रही है, वरना जागने की सूरत में सम्भव था कि वह मुझे बाहर जाने से रोंक देती जैसा कि एक बार पहले हो चुका था। दो-तीन स्टेशन गुजर जाने के बाद मैंने इत्मीनान की एक साँस ली। यूँ लगा जैसे अब मैं तमाम खतरों से और पुलिस की पहुँच से बाहर निकल आया हूँ।

सीट पर बिस्तर लगाकर मैंने अपना सूट उतारा और हल्के-फुल्के कपड़े पहनकर अपनी बर्थ पर लेटकर एक फिल्मी पत्रिका के पृष्ठ पलटने लगा। पत्रिका को पढ़ते हुए मुझे अधिक देर नहीं हुई थी कि मैंने मोहिनी को अपने सिर पर कसमसाते हुए महसूस किया। वह जागने वाली थी। एक-दो बार उसने करवट बदल ली, फिर चित लेटकर दो-चार बार लम्बी-लम्बी जमहाई ली और उसके बाद एक लम्बी अंगड़ाई लेकर उठ बैठी। मैं उसकी एक-एक हरकत को महसूस कर रहा था। वह जल्दी-जल्दी अपनी पलकें झपका रही थी और खिड़की से बाहर देख रही थी। मैंने महसूस किया कि उसके पतले-पतले तराशे हुए होठों पर शरारत भरी मुस्कान उभरी। दूसरे ही क्षण वह धीरे-धीरे रेंगती हुई मेरे कान के निकट आ गयी और रहस्यमय स्वर से बोली –

“कहिए मिस्टर राज, कुशल तो हैं? कहाँ जा रहे हैं?”

“नरक में।” मैंने कम्पार्टमेन्ट के एकमात्र यात्री को कनखियों से घूरते हुए दबी आवाज में कहा।

“तो इसमें चिन्ता की क्या बात है?”

“मैं उल्लू का पट्ठा हूँ।” मैं तिलमिलाकर बोला। “मुझे आज खुशी के मारे नाचना चाहिए कि तुमने मेरे लिये फाँसी का फंदा तैयार कर दिया है।”

“अरे!” मोहिनी ने मुस्कुराकर बड़ी लापरवाही से कहा। “तुम इस घटना से डर गये हो?”

मुझे मोहिनी की लापरवाही और उसकी यह अदा उस समय बेहद जहरीली लगी। इस विचार से की सम्भव हैं वह परिस्थितियों से अनभिज्ञ हो। मैंने दबे स्वर में उसे समाचार पत्र से छपने वाली खबर सुना डाली।

पूरी कहानी सुन लेने के बाद मोहिनी ने मुझे चंचल स्वर में ठुनककर सम्बोधित किया - “तुम मेरा उपकार मानने की बजाय मुझ पर क्रोधित क्यों हो? तुम बड़े ही अहसान फरामोश हो।”

“क्या?” मैंने खून का घूँट पीते हुए कहा। “तुमने यह किस तरह का अहसान किया है? मुझसे एक निर्दोष की हत्या करवा दी।”

“कुमारी डॉली।” मोहिनी ने अर्थपूर्ण स्वर में कहा। “तुम भूल रहे हो। तुम्हें मेरी रहस्यमय शक्तियों पर विश्वास नहीं। क्या यह मेरी ही पैदा की हुई परिस्थितियों का करिश्मा नहीं जो डॉली स्वयं तुमसे आकर मिली। उसने तुम्हें अपने प्यार का विश्वास दिलाया और अब सब कुछ छोड़कर तुम्हारा साथ निभाने के लिये तैयार हो गयी है। दीपक का काँटा भी मेरे ही कारण बीच से निकल गया।”
 
Back
Top