S
StoryPublisher
Guest
अखबार के समाचार के अनुसार विक्रम पाल की लाश शोलापुर में एक पार्क में एक सड़क पर कुचली हालत में मिली थी। पुलिस का विचार था कि विक्रम पाल किसी भारी बस या ट्रक के नीचे आकर मरा है। दुर्घटना इतनी भयानक थी कि मरने वाले पसलियों की तमाम हड्डियाँ चूर हो गयीं थी। शरीर के अधिकांश भाग पीस गये थे। यदि चेहरा सुरक्षित न रहता तो उसकी पहचान भी असंभव हो जाती। अंत में अखबार ने अपने निजी संवाददाता के हवाले से यह भी लिखा था कि अभी तक पुलिस उस बस या ट्रक की खोज में सफल नहीं हो सकी है जिसके द्वारा विक्रम बेदर्दी से कुचला था।
इस समाचार को पढ़कर मुझे थोड़ा सुकून तो जरूर हुआ, परन्तु मैं ये अच्छी प्रकार जानता था कि यह सब मोहिनी ने किसी विशेष कारणवश किया होगा। अस्थाई रूप से मुझे इस बात की ख़ुशी हुई थी विक्रम की हत्या के सिलसिले में डॉली का नाम नहीं आया। रहा विक्रम का शोलापुर जाने का प्रश्न तो यह भेद मेरे और विक्रम के सिवा किसी को पता न था। परन्तु जिस होटल में विक्रम ठहरा था उसमें यक़ीनन उसका नाम दर्ज था।
होटल वालों ने पुलिस को विक्रम, डॉली तथा मेरे आगमन के सम्बन्ध में अवश्य बताया होगा। परन्तु इससे भी बहुत बड़ा अंतर नहीं पड़ता। दुर्घटना के समय मैं होटल में मौजूद था और डॉली से पता करने पर वह यह बता सकती है कि टैक्सी से उतरने के बाद विक्रम उससे अलग हो गया था। जब वह उसे नहीं मिला तो वह अकेली होटल वापिस चली आयी।
पुलिस ने इस बात को एक्सीडेंट बताया था और हमारी मुक्ति के कई रास्ते मौजूद थे। फिर भी सच तो यह है शोलापुर से चलते समय हमसे कुछ गलतियाँ अवश्य हो गयीं थीं जिनके कारण पुलिस हमें परेशान कर सकती थी। पर किया भी क्या जा सकता था? शोलापुर में हमारी नज़र में यह हत्या का केस था। वहाँ से भागना जरूरी था और बम्बई में रहना भी उचित नहीं था।
बम्बई से रवानगी के पहले मैंने फोन पर अपने ऑफिस के एक आदमी को सूचना दे दी थी कि मैं कुछ आवश्यक कामों के सिलसिले में बाहर जा रहा हूँ इसलिए विक्रम के आने पर उसे बता दिया जाए। घर के नौकरों से भी मैंने वही कहा था। एक बहुत जरूरी काम के सिलसिले में दो-चार रोज के लिये मुझे बाहर जाना पड़ रहा है।
डॉली चूँकि अपने विचारों में लीन थी इसलिए उसने अखबार की इस खबर की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। कुछ देर तक मैं इस बात पर गौर करता रहा कि आखिर विक्रम की लाश को गलत ढंग से सामने लाकर मोहिनी का क्या इरादा है। फिर जब उसका कोई विशेष कारण मेरी समझ न आ सका तो मैंने डॉली को धीरे से सम्बोधित किया।
“किस सोच में डूबी हो?”
“जी?”
वह मेरे सवाल पर चौंकी। फिर मेरी ओर देखकर कहा – “यूँ ही खामोश थी।”
“शांत रहने की चेष्टा करो मेरी जान; और जो बात तुम्हारे दिलो-दिमाग को परेशान कर रही है उसे भूल जाओ। इसलिए कि अब तुम्हारे विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध न हो सकेगा।”
“क्या मतलब? यह आप क्या कह रहे हैं?”
जवाब में मैंने डॉली के सामने वह स्पष्ट कर दिया जिसमें दुर्घटना के प्रकाशित होने की खबर निकली थी। अखबार की सुर्खी देखकर वह पल भर के लिये बुरी तरह बौखला गयी। परन्तु फिर उसकी बौखलाहट धीरे-धीरे उलझन में बदलती चली गयी।
विक्रम से सम्बंधित सारी घटनाएँ विस्तार से पढ़ने के उपरान्त उसने जिस दृष्टि से मेरी ओर देखा, उनमें न जाने कितने प्रश्न छिपे थे। मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा –
“दिमाग पर ज्यादा बोझ न डालो। यह सब उसी की शरारत है।”
“लेकिन मैंने तो उसे...।”
“जो कुछ होगा देखा जाएगा। इस समय कोई और बात करो।”
डॉली लगातार मेरे चेहरे पर नज़र जमाए हुए थी। यक़ीनन उसके मनो-मस्तिष्क को भी वही प्रश्न उभरकर चिंतित कर रहे थे, जिन्होंने मुझे उलझा रखा था। कुछ क्षणों तक वह टकटकी बाँधे मेरे चेहरे को ताकती रही फिर सपाट स्वर में बोली –
“मेरी समझ में नहीं आता, आखिर यह सब क्या है।”
“सब ठीक हो जाएगा। तुम चिन्ता मत करो।” मैंने जानबूझकर बड़ी लापरवाही से यह बात कही। फिर उसके हाथ से अखबार लेकर संतुष्ट भाव से दूसरे समाचार को देखने लगा।
इस समाचार को पढ़कर मुझे थोड़ा सुकून तो जरूर हुआ, परन्तु मैं ये अच्छी प्रकार जानता था कि यह सब मोहिनी ने किसी विशेष कारणवश किया होगा। अस्थाई रूप से मुझे इस बात की ख़ुशी हुई थी विक्रम की हत्या के सिलसिले में डॉली का नाम नहीं आया। रहा विक्रम का शोलापुर जाने का प्रश्न तो यह भेद मेरे और विक्रम के सिवा किसी को पता न था। परन्तु जिस होटल में विक्रम ठहरा था उसमें यक़ीनन उसका नाम दर्ज था।
होटल वालों ने पुलिस को विक्रम, डॉली तथा मेरे आगमन के सम्बन्ध में अवश्य बताया होगा। परन्तु इससे भी बहुत बड़ा अंतर नहीं पड़ता। दुर्घटना के समय मैं होटल में मौजूद था और डॉली से पता करने पर वह यह बता सकती है कि टैक्सी से उतरने के बाद विक्रम उससे अलग हो गया था। जब वह उसे नहीं मिला तो वह अकेली होटल वापिस चली आयी।
पुलिस ने इस बात को एक्सीडेंट बताया था और हमारी मुक्ति के कई रास्ते मौजूद थे। फिर भी सच तो यह है शोलापुर से चलते समय हमसे कुछ गलतियाँ अवश्य हो गयीं थीं जिनके कारण पुलिस हमें परेशान कर सकती थी। पर किया भी क्या जा सकता था? शोलापुर में हमारी नज़र में यह हत्या का केस था। वहाँ से भागना जरूरी था और बम्बई में रहना भी उचित नहीं था।
बम्बई से रवानगी के पहले मैंने फोन पर अपने ऑफिस के एक आदमी को सूचना दे दी थी कि मैं कुछ आवश्यक कामों के सिलसिले में बाहर जा रहा हूँ इसलिए विक्रम के आने पर उसे बता दिया जाए। घर के नौकरों से भी मैंने वही कहा था। एक बहुत जरूरी काम के सिलसिले में दो-चार रोज के लिये मुझे बाहर जाना पड़ रहा है।
डॉली चूँकि अपने विचारों में लीन थी इसलिए उसने अखबार की इस खबर की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। कुछ देर तक मैं इस बात पर गौर करता रहा कि आखिर विक्रम की लाश को गलत ढंग से सामने लाकर मोहिनी का क्या इरादा है। फिर जब उसका कोई विशेष कारण मेरी समझ न आ सका तो मैंने डॉली को धीरे से सम्बोधित किया।
“किस सोच में डूबी हो?”
“जी?”
वह मेरे सवाल पर चौंकी। फिर मेरी ओर देखकर कहा – “यूँ ही खामोश थी।”
“शांत रहने की चेष्टा करो मेरी जान; और जो बात तुम्हारे दिलो-दिमाग को परेशान कर रही है उसे भूल जाओ। इसलिए कि अब तुम्हारे विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध न हो सकेगा।”
“क्या मतलब? यह आप क्या कह रहे हैं?”
जवाब में मैंने डॉली के सामने वह स्पष्ट कर दिया जिसमें दुर्घटना के प्रकाशित होने की खबर निकली थी। अखबार की सुर्खी देखकर वह पल भर के लिये बुरी तरह बौखला गयी। परन्तु फिर उसकी बौखलाहट धीरे-धीरे उलझन में बदलती चली गयी।
विक्रम से सम्बंधित सारी घटनाएँ विस्तार से पढ़ने के उपरान्त उसने जिस दृष्टि से मेरी ओर देखा, उनमें न जाने कितने प्रश्न छिपे थे। मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा –
“दिमाग पर ज्यादा बोझ न डालो। यह सब उसी की शरारत है।”
“लेकिन मैंने तो उसे...।”
“जो कुछ होगा देखा जाएगा। इस समय कोई और बात करो।”
डॉली लगातार मेरे चेहरे पर नज़र जमाए हुए थी। यक़ीनन उसके मनो-मस्तिष्क को भी वही प्रश्न उभरकर चिंतित कर रहे थे, जिन्होंने मुझे उलझा रखा था। कुछ क्षणों तक वह टकटकी बाँधे मेरे चेहरे को ताकती रही फिर सपाट स्वर में बोली –
“मेरी समझ में नहीं आता, आखिर यह सब क्या है।”
“सब ठीक हो जाएगा। तुम चिन्ता मत करो।” मैंने जानबूझकर बड़ी लापरवाही से यह बात कही। फिर उसके हाथ से अखबार लेकर संतुष्ट भाव से दूसरे समाचार को देखने लगा।