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Fantasy मोहिनी

अखबार के समाचार के अनुसार विक्रम पाल की लाश शोलापुर में एक पार्क में एक सड़क पर कुचली हालत में मिली थी। पुलिस का विचार था कि विक्रम पाल किसी भारी बस या ट्रक के नीचे आकर मरा है। दुर्घटना इतनी भयानक थी कि मरने वाले पसलियों की तमाम हड्डियाँ चूर हो गयीं थी। शरीर के अधिकांश भाग पीस गये थे। यदि चेहरा सुरक्षित न रहता तो उसकी पहचान भी असंभव हो जाती। अंत में अखबार ने अपने निजी संवाददाता के हवाले से यह भी लिखा था कि अभी तक पुलिस उस बस या ट्रक की खोज में सफल नहीं हो सकी है जिसके द्वारा विक्रम बेदर्दी से कुचला था।

इस समाचार को पढ़कर मुझे थोड़ा सुकून तो जरूर हुआ, परन्तु मैं ये अच्छी प्रकार जानता था कि यह सब मोहिनी ने किसी विशेष कारणवश किया होगा। अस्थाई रूप से मुझे इस बात की ख़ुशी हुई थी विक्रम की हत्या के सिलसिले में डॉली का नाम नहीं आया। रहा विक्रम का शोलापुर जाने का प्रश्न तो यह भेद मेरे और विक्रम के सिवा किसी को पता न था। परन्तु जिस होटल में विक्रम ठहरा था उसमें यक़ीनन उसका नाम दर्ज था।

होटल वालों ने पुलिस को विक्रम, डॉली तथा मेरे आगमन के सम्बन्ध में अवश्य बताया होगा। परन्तु इससे भी बहुत बड़ा अंतर नहीं पड़ता। दुर्घटना के समय मैं होटल में मौजूद था और डॉली से पता करने पर वह यह बता सकती है कि टैक्सी से उतरने के बाद विक्रम उससे अलग हो गया था। जब वह उसे नहीं मिला तो वह अकेली होटल वापिस चली आयी।

पुलिस ने इस बात को एक्सीडेंट बताया था और हमारी मुक्ति के कई रास्ते मौजूद थे। फिर भी सच तो यह है शोलापुर से चलते समय हमसे कुछ गलतियाँ अवश्य हो गयीं थीं जिनके कारण पुलिस हमें परेशान कर सकती थी। पर किया भी क्या जा सकता था? शोलापुर में हमारी नज़र में यह हत्या का केस था। वहाँ से भागना जरूरी था और बम्बई में रहना भी उचित नहीं था।

बम्बई से रवानगी के पहले मैंने फोन पर अपने ऑफिस के एक आदमी को सूचना दे दी थी कि मैं कुछ आवश्यक कामों के सिलसिले में बाहर जा रहा हूँ इसलिए विक्रम के आने पर उसे बता दिया जाए। घर के नौकरों से भी मैंने वही कहा था। एक बहुत जरूरी काम के सिलसिले में दो-चार रोज के लिये मुझे बाहर जाना पड़ रहा है।

डॉली चूँकि अपने विचारों में लीन थी इसलिए उसने अखबार की इस खबर की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। कुछ देर तक मैं इस बात पर गौर करता रहा कि आखिर विक्रम की लाश को गलत ढंग से सामने लाकर मोहिनी का क्या इरादा है। फिर जब उसका कोई विशेष कारण मेरी समझ न आ सका तो मैंने डॉली को धीरे से सम्बोधित किया।

“किस सोच में डूबी हो?”

“जी?”

वह मेरे सवाल पर चौंकी। फिर मेरी ओर देखकर कहा – “यूँ ही खामोश थी।”

“शांत रहने की चेष्टा करो मेरी जान; और जो बात तुम्हारे दिलो-दिमाग को परेशान कर रही है उसे भूल जाओ। इसलिए कि अब तुम्हारे विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध न हो सकेगा।”

“क्या मतलब? यह आप क्या कह रहे हैं?”

जवाब में मैंने डॉली के सामने वह स्पष्ट कर दिया जिसमें दुर्घटना के प्रकाशित होने की खबर निकली थी। अखबार की सुर्खी देखकर वह पल भर के लिये बुरी तरह बौखला गयी। परन्तु फिर उसकी बौखलाहट धीरे-धीरे उलझन में बदलती चली गयी।

विक्रम से सम्बंधित सारी घटनाएँ विस्तार से पढ़ने के उपरान्त उसने जिस दृष्टि से मेरी ओर देखा, उनमें न जाने कितने प्रश्न छिपे थे। मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा –

“दिमाग पर ज्यादा बोझ न डालो। यह सब उसी की शरारत है।”

“लेकिन मैंने तो उसे...।”

“जो कुछ होगा देखा जाएगा। इस समय कोई और बात करो।”

डॉली लगातार मेरे चेहरे पर नज़र जमाए हुए थी। यक़ीनन उसके मनो-मस्तिष्क को भी वही प्रश्न उभरकर चिंतित कर रहे थे, जिन्होंने मुझे उलझा रखा था। कुछ क्षणों तक वह टकटकी बाँधे मेरे चेहरे को ताकती रही फिर सपाट स्वर में बोली –

“मेरी समझ में नहीं आता, आखिर यह सब क्या है।”

“सब ठीक हो जाएगा। तुम चिन्ता मत करो।” मैंने जानबूझकर बड़ी लापरवाही से यह बात कही। फिर उसके हाथ से अखबार लेकर संतुष्ट भाव से दूसरे समाचार को देखने लगा।
 
दिल्ली पहुँचकर मुझे ठिकाने के सिलसिले में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं उठानी पड़ी। इसलिए कि मैं शादी से पहले भी दो-तीन बार यहाँ आ चुका था। पहले भी मेरा निवास यहाँ के सबसे बड़े होटल अशोका में हुआ था जो चाणक्यपुरी में स्थित है। इसलिए इस बार भी पालम हवाई अड्डे से टैक्सी पकड़कर मैं सीधा अशोका होटल पहुँचा और एक डबल-रूम अपने लिये बुक कर लिया।

मैं दिल्ली किसी विशेष योजना के अंतर्गत नहीं आया था। महज डॉली के कथन पर मैं बम्बई छोड़ आया था। यूँ स्वयं मैं भी यही चाहता था कि कुछ दिन बम्बई से दूर रहकर परिस्थितियों का जायजा लिया जाए। लेकिन अब जबकि मैं दिल्ली में ठहरा हुआ था तो अचानक मेरे मस्तिष्क में यह विचार उभरा कि क्यों न मैं यहाँ के किसी दरगाह पर उपस्थित होकर मोहिनी से छुटकारे के लिये प्रार्थना करूँ।

अपने इस विचार को मैंने डॉली के सामने रखा तो उसने मेरी बात मानी और कहा कि नेक काम में देर नहीं करनी चाहिए और इसी समय दरगाह पर हाजिरी देने जरूर चलो।

डॉली के चेहरे पर काफी हद तक शांति थी। शायद इसलिए कि उसे विश्वास था कि दरगाह पर हाजिरी देते ही हमारे दुखों की घड़ियाँ अवश्य समाप्त हो जाएँगी।

दोपहर का भोजन लेने के बाद हम दोनों सोने के इरादे से लेट गये। डॉली को अब चैन मिल गया था इसलिए बिस्तर पर लेटते ही सो गयी। परन्तु मुझे नींद न आ सकी। मैं यूँ ही सोचता रहा और फिर दिन के एक बजे लगभग मेरी आँख लग गयी। शाम को पाँच बजे मैं जागा। परन्तु डॉली अभी तक नींद के आगोश में थी। सोते समय भी उसके मासूम चेहरे पर उलझन और दुख के भाव मौजूद थे। मेरे मस्तिष्क को डॉली की हालत देखकर झटका लगा। उस बेचारी की इस हालत का जिम्मेदार केवल मैं था। विवाह से अब तक मैं उसे कोई भी सुख न दे सका था। बल्कि उसके उलट डॉली को मेरे लिये न जाने कितनी परेशानी उठानी पड़ी थी। जेल से मेरी मुक्ति कराने में उसने दिन-रात एक कर दिए थे। शोलापुर भी वह मेरे लिये गयी लेकिन एक नयी मुसीबत से उसका टकराव हो गया था।

काफी समय तक मैं डॉली के मासूम चेहरे को ताकता रहा। मेरा दिल नहीं चाहता था कि उसकी सुखमय निन्द्रा में विघ्न डालूँ, परन्तु चूँकि हमारा दरगाह पर हाजिरी देना जरूरी था इसलिए मैंने हिम्मत करके उसे जगा दिया।

वह भय और दहशत के भाव चेहरे पर समेटे हुए उठी। उसे देखकर मेरा दिल तड़प उठा।

“तुम उठकर तैयार हो जाओ।” मैंने सब्र से काम लेते हुए कहा। “मैं नाश्ते के लिये फोन करता हूँ। उसके बाद हम दरगाह पर हाजिरी देने चलेंगें।”

डॉली ने स्वीकृति में सिर को जुम्बिश दी फिर जल्दी से उठकर बाथरूम में चली गयी। मैंने फोन पर नाश्ते का ऑर्डर दे दिया। डॉली ने तैयार होने में आश्चर्यजनक तीव्रता का प्रदर्शन किया। लगभग आधे घण्टे बाद हमने अशोका से बाहर निकलकर टैक्सी पकड़ी और हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह की ओर चल पड़े।

मुझे इस बात पर मलिनता महसूस हो रही थी कि मैं पहले जब भी दिल्ली आया तो बिजनेस के इरादे से आया या फिर अय्याशी के लिये आया। पर पहले कभी मेरे हिृदय में किसी धार्मिक स्थान पर हाजिरी देने का विचार तक नहीं आया था। आज जब बुरे समय ने मुझे चारों ओर से अपने शिकंजे में बाँध रखा था तो मुझे धर्म और अधर्म याद आ रहा था।

तभी अचानक मैंने यूँ महसूस किया जैसे मेरे सिर पर कोई धमाका सा हो गया हो। मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी। उसे देखते ही मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया। मेरी आँखों के सामने एक अंधेरा सा छाने लगा। बस एक ही बात मेरे दिमाग से टकरा रही थी; और वह यह कि मुझे कभी मोहिनी से छुटकारा नहीं मिलेगा। सारी जिन्दगी मुझे उसकी गुलामी में बसर करनी पड़ेगी। मैं अपनी सारी उम्र इसी बेचैनी में फँसा रहूँगा। काश मोहिनी स्वयं मुझे अपनी खुराक के रूप में स्वीकार कर लेती।

मैं रुआँसा हो गया। मेरी आँखें भर आयीं। काश मैं उस दिन रामदयाल की माँ की अर्थी के साथ श्मशानघाट न जाता। उफ्फ...! मेरे ईश्वर यह मैं किन पापों में घिर गया हूँ।

ख्वाजा की दरगाह अब कठिनाई से एक मील दूर रह गयी थी। परन्तु इससे पहले कि मैं वहाँ तक पहुँच सकता, मोहिनी ने मेरे कानों में अपनी जहरीली फुंकार उड़ेल दी।

“राज! गाड़ी रुकवा लो। मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी हैं। किसी ऐसे स्थल पर इसी समय चलो जहाँ हमारी बातें कम से कम डॉली न सुन सके।”

मैं अभी सोच ही रहा था कि क्या जवाब दूँ कि मोहिनी ने दोबारा बड़े ठण्डे और चुभते हुए स्वर में मुझे सम्बोधित किया।

“समय मत बेकार करो राज। मेरी बात मानो। यदि तुमने मेरे कहने पर अमल नहीं किया तो फिर सोच लो, कहीं इस बार तुम्हें डॉली से ही हाथ धोना न पड़ जाए।”

मोहिनी की धमकी काम कर गयी। मैंने जल्दी से आँखें खोल दीं और टैक्सी ड्राइवर को आदेश दिया कि वह गाड़ी एक तरफ खड़ी कर ले।

“क्यों?” डॉली ने चौंकते हुए सवाल किया।

मैंने उसे टालते हुए कहा। “जल्दी में मैं कमरे को लॉक करना भूल गया था। सम्भव है दरगाह पर देर लगे इसलिए तुम टैक्सी में बैठो। मैं होटल के मैनेजर को फोन करके अभी आता हूँ।”

टैक्सी मेरी आज्ञा के अनुसार सड़क किनारे रोक दी गयी। मैंने डॉली के प्रश्नों से बचने के लिये जल्दी से दरवाजा खोला और नीचे उतरकर एक ओर हो लिया। डॉली को यह जताने के लिये कि सचमुच होटल फोन करने के इरादे से नीचे उतरा हूँ, मैंने यूँ ही एक राहगीर से बूथ का पता पूछा, फिर कदम बढ़ाता हुआ एक दूसरी सड़क पर घूम गया।

मोहिनी लगातार मेरे सिर पर खड़ी अपने दोनों हाथ कूल्हों पर रखे मुझे गजबनाक नजरों से घूर रही थी। जैसे ही मैं दूसरी सड़क पर आया, उसने मुझे सम्बोधित करते हुए खुश्क स्वर में पूछा।

“तुम इस समय डॉली के साथ कहाँ जा रहे थे?”

“मैं… व… वह… जरा डॉली का स्वास्थ्य खराब था इसलिए…।”

“इसलिए तुम उसे किसी डॉक्टर के पास ले जा रहे थे। क्यों...?” मोहिनी ने मेरी बात काटकर कहा।

“हाँ... हाँ... यही बात थी!”

“राज…!” अचानक मोहिनी का स्वर बेहद खूंखार हो गया। “तुम फिर मुझसे झूठ बोल रहे हो। मुझे पता है कि तुम इस समय डॉली के साथ एक बुजुर्ग की चौखट पर इसलिए जा रहे थे कि मुझसे छुटकारा हासिल कर सको।”
 
“हाँ...!” मैंने मुँह पर हाथ रखते हुए धीमे स्वर में कहा। “तुम सच कहती हो।”

“क्या तुम्हें विश्वास है कि तुम मुझसे इतनी सरलता के साथ बिना मेरी इच्छा के मुझसे मुक्ति पा लोगे?”

मैं थके-थके अन्दाज में कदम उठाता रहा। मोहिनी के सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मोहिनी की हर बात सच थी। मैं खामोश रहा तो मोहिनी ने आदेशात्मक स्वर में मुझसे कहा।

“वापिस चलो राज! अब तुम उस चौखट पर नहीं जाओगे। जिस चौखट पर मैं रहूँगी, वहीं रहोगे। मेरे हुक्म पर तुम्हें वापिस होटल चलना होगा जहाँ आज तुमसे आखिरी फैसला किया जाएगा।”

मोहिनी के हुक्म को न मानने की सूरत में मुझे डॉली के जीवन से हाथ धोना पड़ता। मोहिनी ने मुझे धमकी भी यही दी थी। इसलिए उसके हुक्म पर खामोशी से पलटा और दोबारा टैक्सी की ओर कदम बढ़ाने लगा। मोहिनी गजबनाक आलम में मेरे सिर पर टहल रही थी। उसका चेहरा क्रोध के कारण सुर्ख हो रहा था। वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी। मैं उसके प्रत्येक हाव-भाव से वाकिफ था इसलिए मैं बहुत भयभीत था।

मैं जब दोबारा टैक्सी में बैठा तो डॉली ने मेरे परेशान चेहरे का जायजा लेते हुए पूछा – “कर आए फोन?”

“हाँ! लेकिन मैनेजर ने मुझे हिदायत दी है कि मैं स्वंय आकर कमरे को लॉक कर दूँ।”

“फिर?”

“मजबूरी है।” मैंने तेजी से कहा। “कमरे को लॉक करना भी बेहद जरूरी है। हम दोबारा वापिस आ जाएँगें।”

मेरे आदेश पर टैक्सी वापिस होटल की ओर रवाना हो गयी। मैं गुमसुम बैठा सोच रहा था कि मोहिनी की शक्ति वास्तव में बहुत विस्तृत है। उसे अपनी रहस्यमय शक्तियों द्वारा पता चल गया होगा कि हम ख्वाजा की चौखट पर हाजिरी देने जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं। इसलिए वह तुरंत ही मेरे सिर पर आ गयी और फिर उसने मुझे जो धमकी दी वह इस तरह कारगर सिद्ध हुई कि मेरे लिये उसका आदेश मानने से इंकार कर पाना सम्भव न था।

मैं अपनी सोच में डूबा हुआ था। डॉली मुँह दूसरी ओर किए बाहर का दृश्य देखने में मगन थी और मोहिनी मेरे सिर पर क्रोध की हालत में टहल रही थी। उसके तेवर बेहद खतरनाक होते जा रहे थे।

अशोका पहुँचकर मैंने टैक्सी छोड़ दी और डॉली को साथ लिये अपने कमरे में जाकर भीतर से दरवाजा बन्द कर लिया तो डॉली ने आश्चर्य से पूछा।

“क्या वापिस चलने का इरादा नहीं है?”

“नहीं!” मैंने अनमने स्वर में जवाब दिया।

“क्या कोई खास बात है?”

मैं डॉली की बात का जवाब देने ही वाला था कि मोहिनी ने कहा – “राज, अगर तुम चाहो तो डॉली को बता दो कि मैं दोबारा तुम्हारे सिर पर आ गयी हूँ। परन्तु मेरी और तुम्हारी बातचीत एकांत में होगी।”

डॉली के मासूम चेहरे पर फैली हुई उलझन और बैचेनी जैसे मेरे दिल पर छुरियाँ चला रही थी। मैं स्वंय भी यही चाहता था कि उसे मोहिनी की मौजूदगी की खबर कर दूँ इसलिए मोहिनी ने जब आज्ञा दे दी तो मैंने डॉली को सम्बोधित करते हुए कहा –

“डॉली! तुम कुछ देरे के लिये बराबर वाले कमरे में चली जाओ। मुझे मोहिनी से कुछ जरूरी बातें करनी हैं।”

“मोहिनी...?” डॉली की आँखें हैरत से फैलती चली गयीं।

“हाँ! मोहिनी मेरे सिर पर दोबारा आ गयी है।” मैंनें बुझी हुई आवाज में कहा।

“मैं उसी के कहने पर यहाँ वापिस आया हूँ।”

डॉली का चेहरा भय से पीला पड़ गया। उसकी चमकीली आँखों में आँसू तैरने लगे। कुछ क्षणों तक वह मुझे टकटकी बाँधे देखती रही फिर अपनी उदास नजरें नीची करके कदम बढ़ाती हुई दूसरे कमरे में चली गयी तो मैं किसी हारे हुए जुआरी और थके हुए मुसाफिर की तरह आगे बढ़कर आराम कुर्सी पर बैठ गया।

“राज!” मोहिनी ने मुझे घूरते हुए कहा। “पहले तुमने डॉली के सिलसिले में मुझसे झूठ बोला था और आज तुमने फिर मुझसे झूठ बोलने की कोशिश की। तुम ऐसा क्यों करते हो? जबकि तुम मोहिनी से अच्छी तरह वाकिफ हो।”

“मैंने यह सब कुछ डॉली को सन्तुष्ट करने के लिये उसकी इच्छा पर किया था।” मैंने मरी हुई आवाज में जवाब दिया तो मोहिनी क्रोधित होकर बोली –

“तुम फिर झूठ बोल रहे हो। तुमने जेल से रिहाई हासिल करने के लिये मुझसे झूठ बोला था।”

मैं खामोश रहा मोहिनी सिर से फुदककर मेरे बाएँ कंधे पर आ गयी और कठोर स्वर में बोली – “सुनो राज! जब तक मैं खुद तुम्हारा पीछा न छोड़ूँ, तुम मुझसे छुटकारा हासिल नहीं कर सकते; और कान खोलकर सुन लो कि अगर तुमने किसी बुजुर्ग के मजार या किसी तांत्रिक तक जाने का इरादा किया तो मैं डॉली को गोली मार दूँगी। सुन लो राज, मैं डॉली को मार दूँगी। उसका खून बहुत गरम है। बहुत स्वादिष्ट होगा। बोलो, अब क्या इरादा है तुम्हारा?”

“नहीं!” मैं डॉली की जुदाई की कल्पना मात्र से ही तड़फ उठा।

“मैं वादा करता हूँ मोहिनी – भविष्य में कभी तुमसे छुटकारा प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करूँगा। मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है।”

“अपने दिल को फिर टटोल लो राज। कहीं तुम फिर मुझे धोखा देने की कोशिश तो नहीं कर रहे हो?”

“नहीं! मैं सच्चे दिल से वादा करता हूँ मोहिनी कि जो तुम कहोगी, मैं वही करूँगा।”

“क्या तुम पहले की तरह हर महीने मेरे लिये एक इन्सानी जिस्म का खून करने को तैयार हो?” मोहिनी ने इस बार होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा। फिर अपनी सुर्ख जुबान होंठों पर फेरने लगी।

“मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूँ; लेकिन केवल एक शर्त पर कि तुम डॉली को नुकसान नहीं पहुँचाओगी।”
 
“डॉली तुम्हें बहुत ज्यादा प्यारी है, क्यों?” मोहिनी के गुलाबी लबों पर बड़ी शरारत भरी मुस्कराहट खिल रही थी और उसका लहजा बदल गया था।

“हाँ! मैं उसके लिये अपनी जान की कुर्बानी भी दे सकता हूँ।”

मैंने भावुकता भरे स्वर में कहा तो मोहिनी मुस्कराकर बोली – “मुझे पता है तुम डॉली से कितनी मुहब्बत करते हो। इसलिए तो मैंने विक्रम की मौत का ड्रामा बदल डाला। अब डॉली पर कोई आँच नहीं आ सकती।”

“मगर उस पिस्तौल का क्या हुआ जो डॉली वहाँ फेंक आयी थी?” मैंने थूक निगलते हुए पूछा।

“इसकी चिन्ता मत करो। जब तक तुम मुझसे वफादार रहोगे, तुम पर और डॉली पर कोई आँच नहीं आएगी; लेकिन याद रखो यह अन्तिम अवसर है। आइन्दा किसी प्रकार की छूट की गुंजाइश नहीं होगी।”

मेरी हालत उस समय ऐसी थी जैसे किसी ने काला जादू करके मुझे अपने वश में कर लिया हो। परन्तु मैं डॉली के जीवन की खातिर बड़ी से बड़ी कीमत अदा करने को तैयार था। मैं हर सौदा करने को तैयार था। इसलिए उस समय मोहिनी ने जो कुछ भी कहा, मैंने उसकी हर बात मान ली थी।

मेरी इस बात से खुश होकर वह दोबारा रेंगती हुई मेरे सिर पर चली गयी। उसके होंठों पर अब बड़ी शोख मुस्कराहट नज़र आ रही थी। मेरे सिर पर खड़ी वह कुछ वक्त तक बड़ी प्यार भरी नजरों से मुझे देखती रही फिर एक मस्त कयामत ढाने वाली अंगड़ाई लेकर मेरे घने बालों पर इस प्रकार लेट गयी कि उसके दोनों हाथ मेरे माथे पर थे और वह मस्ती भरी निगाहों से मुझे देख रही थी। मैं उसकी एक-एक हरकत का जायजा ले रहा था और दिल ही दिल में खौल रहा था कि कुछ देर बाद मोहिनी ने मुझे फिर सम्बोधित किया।

“राज! तुम मुझसे कभी प्यार से बातें नहीं करते।”

“नहीं! तुम मुझे बहुत सताती हो।”

मेरे इस जवाब पर वह बेअख्तियार खिलखिलाकर हँस पड़ी। फिर बड़ी प्यार भरी नजरों से देखती हुई बोली –

“राज! तुम्हें सताने में मजा आता है। तुम वह पहले व्यक्ति हो जिसे मैंने सबसे ज्यादा पसंद किया है। विश्वास करो, यदि मैं वास्तविक रूप में आ सकती तो शायद... शायद मैं डॉली की जगह होती। तुम्हारी बातें मुझे बड़ी प्यारी लगती हैं। शायद यही कारण है कि मैं तुम्हें हर बार क्षमा कर देती हूँ। मुम्बई से रवानगी के समय मैंने सोचा था कि शोलापुर पहुँचकर डॉली को ठिकाने लगा दूँगी लेकिन फिर मुझे तुम्हारे ऊपर तरस आ गया। दिल की बातें ऐसी ही होतीं हैं।”

मैं मोहिनी की बातें गौर से सुन रहा था। डॉली के सिलसिले में उसकी खतरनाक बातें सुनकर मुझे बड़ा क्रोध आया लेकिन मैं धीमे स्वर में बोला –

“एक पत्नी की हैसियत से डॉली का कर्तव्य है कि मेरे सुख-दुख में बराबर की भागीदार रहे। वह शोलापुर भी इसी उद्देश्य से गयी थी कि मुझे तुमसे छुटकारा मिल सके।”

“मुझसे…?” मोहिनी ने गंभीरता से कहा। “राज, तुम बहुत अहसान फरामोश हो! अब तक मैंने तुम्हारे ऊपर जो उपकार किए हैं, तुम वह सब कुछ भूल बैठे हो। हालाँकि तुम्हें अपने भाग्य पर नाज करना चाहिए था कि मैं स्वयं तुम्हारे सिर पर आ गयी हूँ। मुझे अपने कब्जे में करने के लिये अब तक न जाने कितने सिरफिरे उलटे-सीधे अमल करके या तो पागल हो चुके हैं या फिर अपने जीवन से हाथ धो बैठें हैं। कदाचित तुम नहीं जानते कि रामदयाल की माँ भी मुझे पाने के लिये अपनी जान गँवा बैठी थी।”

“मैं तुम्हारे रहस्यमय अस्तित्व का कायल हूँ और कृतज्ञ भी लेकिन...।”

“तुम झूठ बोलते हो।” मोहिनी ने मेरा वाक्य काटते हुए तेजी से कहा। “जब तक डॉली तुम्हारे जीवन में नहीं आयी थी, तुम सिर्फ मेरे और मेरे थे। मगर अब तुम बदलते जा रहे हो। मैं यदि चाहूँ तो तुमको अपनी शक्ति से अपने अधिकार में कर सकती हूँ। परन्तु न जाने क्यों हर बार मुझे तुम्हारी प्यारी-प्यारी बातों पर रहम आ जाता है।”

“यह तुम्हारा ख्याल मात्र है। वरना मैं अब भी तुम्हारे विरुद्ध नहीं हूँ।” मैंने मोहिनी को थोड़ा गरम देखा तो नरमी से जवाब दिया।

“बस रहने दो राज! मैं खूब जानती हूँ कि तुम कितने पानी में हो।” मोहिनी ने क्रोध से कहा। “रहा मेरी शक्ति का विषय तो तुम तमाम उम्र उसका भेद नहीं पा सकते। अभी तुम पूरी तरह कायल ही कहाँ हुए हो। अभी तुमने देखा ही क्या है?”

मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। बस खामोश बैठा सोचता रहा कि मोहिनी को किस प्रकार ठण्डा किया जाए। समय और वातावरण को देखते हुए मोहिनी को खुश करना मेरे लिये आवश्यक था। मैं अपने ख्यालों में गुम था और उधर मोहिनी ने खड़े होकर मेरे सिर पर गुस्से के आलम में चहल कदमी शुरू कर दी थी। काफी देर तक हम दोनों अपने-अपने ख्यालों में गुम रहें। अचानक मैंने मोहिनी को चौंकते हुए देखा। जैसे उसे कोई खास बात याद आ गयी हो। उसकी आँखें मेरे चेहरे पर जम गयीं। वह मुँह से झाग उड़ाते हुए बोली –

“राज! मैं तुमसे वादा जरूर कर चुकी हूँ कि डॉली को जान से नहीं मारूँगी, परन्तु अब उसे अपनी हरकतों पर जरूर पछताना पड़ेगा। उसे अपनी हरकतों का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।” उसकी जहरीली फुँकार सुनकर मैं दहल गया।

“ले... लेकिन डॉली ने अब क्या किया है...?” मैंने परेशान होकर पूछा।

“उसका इल्म तो तुम्हें स्वयं हो जाएगा।” मोहिनी ने चोट खाई हुई किसी जहरीली छिपकली की तरह बल खाकर कहा। फिर बड़ी फुर्ती के साथ रेंगती हुई मेरे सिर से उतर गयी।

मोहिनी के अन्तिम शब्दों का क्या अर्थ है। उसके जाने के उपरांत भी मैं कुछ क्षणों तक अपने स्थान पर किसी मूर्ति की भांति स्थिर खड़ा सोचता रहा। फिर तीव्रता से लपकता हुआ मिले हुए कमरे में गया ताकि डॉली को इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक समझाकर सावधान रहने का सुझाव दे सकूँ। परन्तु दूसरे कमरे में कदम रखते ही मैं एकदम से ठिठककर रुक गया। मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गईं। मेरे होश-ओ-हवास जवाब दे गये। कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और डॉली कमरे में मौजूद नहीं थी।

अब क्या होगा...?

डॉली के कमरे का दरवाजा खुला देखकर मैं बौखला गया। मेरे हवास जवाब दे गये। मैं पत्थर की किसी बेजान मूर्ति की तरह खड़ा खाली-खाली नजरों से देखता रहा। वहाँ की हर वस्तु मुझे घूमती नज़र आ रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे भरे बाजार में किसी ने मेरी जेब काट ली हो। डॉली मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी थी। उसकी अचानक अनुपस्थिति ने मेरे सोचने-समझने की तमाम शक्तियों को समाप्त कर दिया था। वह अचानक कहाँ चली गयी? क्यों चली गयी? किस काम ने उसे जाने पर मजबूर किया था?
 
न जाने कितने प्रश्न मेरे मनो-मस्तिष्क में गड्ड-मड्ड हो रहे थे। कुछ क्षणों तक मैं चुपचाप स्थिर खड़ा डॉली के सम्बन्ध में विचार करता रहा। फिर मोहिनी के अन्तिम अल्फाज मेरे दिलो-दिमाग में उभर आए। उसने रवानगी से पहले कहा था कि डॉली को अपनी हरकतों का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा। फिर अचानक यह ख्याल आया कि कहीं डॉली मुझे मोहिनी के साथ बातचीत में लीन देखकर दोबारा ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में न चली गयी हो।

निःसंदेह ऐसा ही हुआ होगा। मेरे दिल ने गवाही दी। मैंने लपककर डॉली वाले कमरे का दरवाजा अन्दर से बंद किया, फिर दौड़ता हुआ दूसरे कमरे में पहुँचा और उसे लॉक करके तेजी से नीचे उतर गया। होटल से बाहर आकर मैंने टैक्सी पकड़ी और ख्वाजा की दरगाह की ओर चल पड़ा। ज्यों-ज्यों दरगाह निकट आती जा रही थी, मेरी बेचैनी भी उसी के साथ बढ़ती जा रही थी। मैं डॉली को जल्दी-जल्दी पा लेने के लिये बेचैन था और ईश्वर से जाने क्या-क्या विनती कर रहा था। मोहिनी के वचन के अनुसार मुझे इस बात का तो किसी सीमा तक विश्वास था कि वह डॉली को जान से नहीं मारेगी, परन्तु यह ख्याल भी सताता रहा कि ईश्वर जाने वह डॉली को किस मुसीबत में उलझा दे।

होटल के कमरे में मेरे सिर से उतरते समय मोहिनी के तेवर बेहद खतरनाक थे और जब मोहिनी के तेवर खराब होते थे तो उस समय क्या-क्या कयामत टूट पड़ती थी। इसका मुझे पूरा अनुमान था।

“और तेज चलाओ दोस्त, मुझे बेहद जरूरी काम है।” मैंने टैक्सी ड्राइवर से कहा तो वह शुष्क स्वर में बोला –

“यदि आपको बहुत जल्दी है तो आप कोई और टैक्सी देख लें। मैं चालीस की गति से अधिक तेज चलाने का आदी नहीं हूँ।”

टैक्सी ड्राइवर का उत्तर सुनकर मुझे सख्त क्रोध आया। उस समय एक टैक्सी को छोड़कर दूसरी पकड़ने में चूँकि समय जाया होता इसलिए मैं खून का घूँट पीकर रह गया। फिर दस मिनट बाद मैं खुशी से यूँ उछला जैसे मुझे कारून का खजाना मिल गया हो। डॉली मेरे लिये किसी कारून के खजाने से कम न थी।

जब मेरी नज़र अचानक उस पर पड़ी तो मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो मेरे मृत शरीर में जीवन की लहर आ गयी हो।

“बस यहीं रोक लो।” मैंने ड्राइवर का कंधा पकड़कर तीव्रता से कहा।

टैक्सी ड्राइवर ने उखड़े हुए अंदाज से मुझे देखा और टैक्सी रोक दी। टैक्सी का दरवाजा खोलकर मैं जल्दी से नीचे उतरा। दस का नोट ड्राइवर की गोद में फेंका और बाकी रकम लिये बिना डॉली की ओर बढ़ने लगा जो फुटपाथ पर मुझसे तीस चालीस कदम आगे चल रही थी।

मैं लपककर उसके पास पहुँचा और उसका हाथ पकड़ता हुआ स्नेहिल स्वर में बोला – “विधाता का लाख करम है तुम मुझे मिल गयी। कितना डरा दिया था तुमने मुझे।”

“डॉली ने एक पल के लिये ठहरकर मुझे देखा। वह बोली कुछ नहीं सिर्फ मुस्करा दी। एक सहज और निश्छल मुस्कान। फिर पुनः चल पड़ी। मैं उसके पीछे चलने लगा।

“मुझे बताए बिना तुम होटल से क्यों निकली?” उसके साथ-साथ चलते हुए मैंने शिकायत की। “तुम्हें कुछ अहसास भी है कि इस बीच मुझ पर क्या गुजरी? भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि तुम मुझे मिल गयी।”

“जी!” डॉली ने मुझे रुककर देखा फिर मुस्करा दी।

“तुम्हें मुझसे पूछे बिना इस प्रकार होटल से नहीं आना चाहिए था।” मैंने संतोष भरी साँस खींचते हुए कहा। “इतनी देर जो कुछ मुझ पर बीती है वह मेरा दिल ही जानता है।

“मैं आपका उद्देश्य समझ रही हूँ।” डॉली ने मुस्कराते हुए जवाब दिया। वह मेरे निकट पहुँचते ही रुक चुकी थी।

“विश्वास करो डॉली। तुम्हें सकुशल पाकर मुझे इस कदर खुशी हुई कि मैं बता नहीं सकता।”

“अच्छा!” डॉली ने मेरी आँखों में झाँकते हुए उत्तर दिया।

“क्यों, क्या तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं आया?” मैंने कुछ गंभीर होते हुए पूछा।

“अभी आपने मुझे डॉली कहकर सम्बोधित किया था।” इस बार डॉली ने कुछ ऐसे अपरिचित अंदाज में कहा कि मैं पल भर के लिये सिटपिटाकर रह गया। फिर इस विचार से कि संभव है उसने यूँ ही मजाक किया हो। मैंने हँसकर कहा –

“आओ वापस होटल चलते हैं। यहाँ खड़े-खड़े बातें करना उचित नहीं।”

“देखने में तो तुम काफी शरीफ खानदान के आदमी लगते हो।” डॉली कुछ और गंभीर हो गयी।
 
“देखने में तो तुम काफी शरीफ खानदान के आदमी लगते हो।” डॉली कुछ और गंभीर हो गयी।

“बहुत अच्छे...!” मैं एकदम से हँसते हुए बोला। “यानि कि मजाक के लिये तुम्हें यही मौका मिला था।”

तभी एक खाली टैक्सी गुजरी। मैंने डॉली का जवाब सुनने के बजाए आगे बढ़कर टैक्सी को रोका। फिर डॉली से कहा – “आओ बैठो!”

“ऐ मिस्टर, लगता है तुम इस समय होश में नहीं हो।” डॉली का स्वर एकाएक कठोर हो गया।

“प्लीज डॉली, इस समय मैं वैसे ही बहुत परेशान हूँ। मुझे और अधिक परेशान मत करो।”

मैंने इतना कहकर डॉली का हाथ थामने की चेष्टा की तो वह एकदम आगबबूला हो गयी। उसने एक झटके से अपना हाथ छुड़ाया फिर अगले ही पल उसने ऐसा झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद किया कि मैं चकरा कर रह गया। इससे पहले कि मैं डॉली के व्यवहार के उस आश्चर्यजनक रवैये पर कुछ सोच सकता वह क्रोध में लाल होकर गुर्राई।

“तूने मुझे क्या बाजारू औरत समझ रखा है कमीने।”

“डॉली, ईश्वर के लिये...!”

‘बकवास बंद कर आवारा, बदमाश, कमीने!” डॉली ने चीखकर कहा तो मेरे रहे-सहे हवास उड़कर रह गये।

मैं डॉली को आश्चर्य भरी दृष्टि से देख रहा था। उसके चेहरे पर पैदा होने वाली कठोरता मेरे लिये आश्चर्यजनक थी। उसकी नजरों में मेरे लिये अत्यंत घृणा उत्पन्न हो गयी थी। मारे क्रोध के उसके जिस्म का सारा खून उसकी आँखों और चेहरे पर सिमट आया था। मैं अभी कुछ सोचने-समझने के योग्य भी नहीं हो पाया था कि दो-चार राहगीर जिन्होंने डॉली को तमाचा मारते देख लिया था, हमारे चारों ओर इकट्ठे हो गये थे। टैक्सी ड्राइवर भी उतरकर मेरी तरफ बढ़ रहा था। मेरी समझ में न आया कि क्या करूँ और क्या न करूँ।

मैं इसी कशमकश में फँसा हुआ था कि डॉली तड़पकर बोली।

“हरामजादे, मेरी सूरत क्या घूर रहा है? दफा हो जा यहाँ से वरना पुलिस के हवाले कर दूँगी।”

अचानक मेरी छठी इन्द्री जाग गयी। मेरे ज़हन में मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व उभर आया। इसमें जरूर मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व का दखल था। अब वह डॉली के सिर पर सवार हो चुकी थी। यह सोचकर तो मैंने यही उचित विचार किया कि यहाँ से खिसक जाऊँ। कहीं बात और न खराब हो जाए। इसलिए मैंने डॉली पर एक उदास नज़र डाली और वापसी के इरादे से पलटने लगा।

परन्तु एक साहब ने जो मुझे बड़ी कड़ी नजरों से घूर रहे थे, आगे बढ़कर मेरा बाजू थाम लिया और बिगड़े हुए स्वर में बोले –

“शरम नहीं आती तुमको, यूँ सरेआम यह बेहूदगी करते हुए।”

उस ताने को कौन बर्दाश्त कर सकता था। मुझे डॉली से कोई गिला नहीं था। इसलिए कि उसने जो कुछ किया था वह मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व की आश्चर्यजनक शक्तियों के वशीभूत किया था। लेकिन किसी तीसरे व्यक्ति का पति-पत्नी के निजी मामले में यूँ हस्तक्षेप करना मेरे लिये असहनीय था। जी में तो आया कि जिस व्यक्ति ने मेरा बाजू थामा था उसे ऐसा दण्ड दूँ कि वह अपने तमाम जीवन भर याद रखे। परन्तु मुझे बड़े धीरज से काम लेना पड़ा। मैंने उन श्रीमान जी को घूरते हुए कोमल स्वर में कहा।

“आप गलत समझ रहे हैं। यह औरत मेरी पत्नी है परन्तु मानसिक सन्तुलन खो देने के कारण मुझे पहचान नहीं रही है।”

अपरिचित मेरे उत्तर पर कुछ नरम पड़ा, परन्तु जब उसने मेरे बयान की पुष्टि के लिये डॉली की ओर देखा तो वह क्रोधित हो उठी।

“यह आदमी सरासर झूठ बोल रहा है। इसने बहुत से आदमियों को देखकर पैंतरा बदल लिया है, वरना वास्तविकता यह है कि आज से पहले मैंने इस सूरत के आदमी की शक्ल नहीं देखी।”

डॉली का उत्तर सुनकर दो-चार और लोग भी उसकी हिमायत में तंज झाड़कर मेरे पीछे पड़ गये। मेरे पास अब केवल इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि मैं खामोशी और सहनशक्ति से काम लूँ। चूँकि मैं अपने साथ डॉली को भीड़ के लिये तमाशा बनते नहीं देख सकता था इसलिए मैंने डॉली के उत्तर में कोई सफाई पेश नहीं की।

मुझे उस सफाई की क्या सजा मिली, इसे कहते हुए मैं काँप उठता हूँ। बहरहाल संक्षेप में यह अवश्य बता दूँ कि राहगीरों ने डॉली की हिमायत में दिल खोलकर मुझे पीटा, फिर मुझे पकड़कर थाने तक पहुँचा दिया जहाँ पुलिसवालों ने रही-सही भी पूरी कर दी। वह रात मुझे लोहे की सलाखों के पीछे गुजारनी पड़ी।

दूसरी सुबह मैंने थानेदार के सामने हाथ-पाँव जोड़कर बड़ी कठिनाइयों से अपना पीछा छुड़ाया। पीछा छुड़ाने के बदले मुझे थानेदार को एक मोटी रकम देनी पड़ी। डॉली की अनुपस्थित में यूँ भी थानेदार के पास मुझे हवालात में बन्द रखने का कोई कारण नहीं था। इसलिए वह मुँह माँगी रकम मिल जाने के बाद खुशी से मुझे रिहा करने को तैयार हो गया। रिपोर्ट में उसने क्या दर्ज किया इसका मुझे पता नहीं।

पुलिस के चंगुल से छुटकारा पाकर मैं सीधा अपने होटल वापस आया। मेरा हुलिया कैसा था, यह कहने की आवश्यकता नहीं। मैंने स्नान करके कपड़े बदले फिर मुर्दों की तरह अपने बिस्तर पर ढेर हो गया और डॉली के बारे में सोचने लगा। न जाने उसकी यह रात कहाँ गुजरी होगी? न जाने इस समय वह कहाँ होगी? इंन्का ने उसे जाने किन-किन दुखों के सामने ला खड़ा किया होगा।

मैं मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व के बारे में उलझता रहा। मोहिनी जो मेरे लिये एक मुसीबत बनती जा रही थी। ऐसी मुसीबत जिससे बचने का मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। यदि बात केवल मेरे तक ही सीमित रहती तो मैं उससे टकरा जाता, परन्तु यह कल्पना ही मेरे लिये भयंकर थी कि मोहिनी डॉली के सिर पर सवार हो चुकी है।

डॉली ने जिस प्रकार से भरी-पूरी सड़क पर मुझे थप्पड़ मारा था। उसमें निःसंदेह मोहिनी की शरारत का समावेश था। मैं अपनी उस बेइज्जती को भी भूल जाने के लिये तैयार था। यदि डॉली मेरे साथ चली आती। परन्तु वह अपने होश-ओ-हवास में कहाँ थी। उसके मासूम ज़हन में तो मोहिनी का कब्जा हो चुका था। मोहिनी, जिसने डॉली को न जाने रात कहाँ और किस स्थिति में गुजारने पर मजबूर किया होगा।

मेरी मासूम और बेगुनाह डॉली, मेरा दिल तड़प उठा। मैं अब डॉली को कहाँ तलाश करूँ और किस तरह लोगों को बताऊँ कि मेरे भाग्य ने मेरे साथ कैसा भयानक मजाक किया है। मैं कितना बेबस और मजबूर इन्सान हूँ। मैं मोहिनी से मिल भी नहीं सकता था कि उससे दया की भीख माँग लेता। मोहिनी तो अपनी इच्छा की स्वामिनी थी। यह उसकी इच्छा पर निर्भर था कि वह कब मेरे सिर पर सवार हो जाए, कब नहीं।
 
मेरी बेबसी का अनुमान लगाइए। दुनिया में बहुत कम लोगों का ऐसे हादसों से पाला पड़ा होगा। मैं तो अपना दुःख किसी को कह भी नहीं सकता था। किसको मालूम था कि मैं एक कैदी हूँ। मोहिनी का कैदी। देखने में मैं स्वतंत्र था। गुलामों से बदतर मैं अपने को कहाँ तलाश करूँ? मेरी अपनी पत्नी, मेरी उपस्थिति में गैरों के साथ है। मैं किस प्रकार उसे इस गुनाह से मुक्ति दिला सकता था जिसमें वह मेरे कारण फँसी हुई थी। मेरा दिल डॉली की जुदाई पर खून के आँसू रो रहा था। डॉली जिसने मेरे संग कभी सुख और सुकून के दिन नहीं गुजारे थे और अब महज मोहिनी से मुक्ति दिलाने की खातिर स्वयं एक भंवर में फँस गयी थी। दिल्ली जैसे महानगर में डॉली को खोज निकालना मेरे लिये असम्भव था।

काफी देर तक मैं बेचैन रहा। फिर दिल न माना तो मैं होटल से दोबारा बाहर निकला। एक टैक्सी पकड़ी और डॉली की खोज में दिल्ली की सड़कों पर घूमने लगा। टैक्सी ड्राइवर मुझे अजीब दृष्टि से देखता रहा। परन्तु मुझे कोई परवाह न थी। होती भी तो क्यों जबकि इस समय मेरा मस्तिष्क केवल डॉली की वापसी के विषय में उलझा हुआ था। मैं आँखें फाड़े सड़क पर हर लड़की को घूर रहा था। कभी दायें कभी बायें।

“साहब, आपको जाना कहाँ है?” टैक्सी ड्राइवर ने पूछा।

“जहन्नुम।” तीसरी बार जब ड्राइवर ने यही सवाल पूछा तो मैं झल्ला गया।

“तो फिर आप कोई और टैक्सी पकड़ लो।” ड्राइवर मुझे घूरकर बोला। “मेरा अभी जहन्नुम जाने का कोई इरादा नहीं है।”

मैंने दूसरी टैक्सी ले ली। मैं सारा दिन दीवानों की तरह दिल्ली की सड़कों पर डॉली को तलाश करता रहा। मेरी दहशत हर पल बढ़ती जा रही थी। मेरा दिल अन्दर ही अन्दर रो रहा था। रह-रहकर मुझे यही ख्याल आता था कि ईश्वर जाने डॉली किस मुसीबत में फँसी होगी। न जाने मोहिनी ने उसे किस गुनाह में फँसा दिया था।

मोहिनी ने अपने मनहूस अस्तित्व बरकरार रखने के लिये उसे कहीं मार ही न डाला हो। मेरी निगाहों के सामने धुंध सी फैल गयी और मुझे यूँ महसूस होने लगा जैसे डॉली, मेरी वफादार डॉली मुर्दा पड़ी है और मोहिनी उसके शरीर से लहू की एक-एक बूँद अपने अस्तित्व में घोल रही है। जैसे डॉली का जिस्म पीला हो रहा हो। इस भयानक कल्पना ने मेरे जिस्म को कँपा दिया। मैं बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रोने लगा।

टैक्सी ड्राइवर ने मेरे रोने का कारण पूछा तो मैंने एक संबंधी की मौत का बहाना करके टाल दिया।

रात दस बजे मैं थका-हारा किसी लुटे हुए मुसाफिर की तरह होटल पहुँचा तो मेरा शरीर फोड़े की तरह दुख रहा था। रोते-रोते मेरी आँखें सूज गयीं थीं। बेसुध होकर मैं अपने बिस्तर पर गिर पड़ा। दिन भर की लगातार भाग-दौड़ और नाना प्रकार की कठिनाइयों के विचार ने मेरे मस्तिष्क को बेकार कर दिया था। कब मेरे ऊपर से बेहोशी उतरी और कब मैं दुनिया की चिन्ताओं से बेखबर हुआ, मुझे कुछ याद नहीं।

जब मेरी आँख खुली तो मेरे सिर पर चुभन महसूस हो रही थी। मैं घबराकर उठ बैठा। दीवार घड़ी पर नज़र जमी तो उस समय रात के दो बज रहे थे। डॉली की अनुपरिस्थति ने मुझे एक बार फिर तड़पा दिया। मेरी आँखें डबडबाने लगीं। सिर में चुभन का अहसास तीव्र होता जा रहा था, जिसे तुरंत अपने दिमाग का भारीपन समझकर मैं भूल गया था। परन्तु फिर अचानक मैं चौंक पड़ा। क्रोध के कारण मेरे खून की रफ्तार तेज हो गयी। हाथों की उंगलियाँ भिंच गयीं। जैसे मैं किसी का गला घोंटना चाहता हूँ।

मेरी इस प्रकार की स्थिति का कारण थी मोहिनी, जो इस समय दोबारा मेरे सिर पर आ चुकी थी। मैं उसे अपने सिर पर चहलकदमी करते हुए महसूस कर रहा था। उसके होंठों पर बड़ी रहस्यमय मुस्कराहट खेल रही थी। वह बार-बार कनखियों से मुझे देखती फिर नजरें फेरकर मटक-मटककर चहलकदमी शुरू कर देती। यूँ जैसे उसे मेरी बेचैनी, मेरे दुख से कोई विशेष आनन्द मिल हो रहा हो, जैसे वह मेरे हाल पर खुश थी।

“तुम...।” मैं क्रोध में दीवाना होकर मोहिनी से भयानक अंदाज में मुखातिब हुआ। परन्तु उससे आगे कुछ न कह सका। शब्द हलक में फँसकर रह गये थे।

“कहो राज, तुम कहते-कहते रुक क्यों गये?” मोहिनी ने जहरीले स्वर में पूछा।

मैं चीख उठा – “मोहिनी, तुम जालिम हो! नागिन हो, छिपकली चुड़ैल हो।” मैं क्रोध में उसे न जाने किन-किन नामों से सम्बोधित करता रहा
 
लेकिन वह बड़े इत्मिनान से मुस्कराती रही। फिर जब मैं खामोश हुआ तो उसने बड़ी अदा से अपने नाजुक कूल्हों पर हाथ रख ऊपर की ओर देखते हुए कहा।

“खामोश क्यों हो गये? बोलते रहो! गुस्से में तुम बहुत अच्छे लगते हो।”

“कमीनी, जादूगरनी! बता मुझे कि मेरी डॉली कहाँ है?” मैं दोबारा चिल्लाया।

“धीरे बोलो राज! यदि होटल वालों ने तुम्हारी चीख-पुकार सुन ली तो तुम्हें पागल समझकर होटल से बाहर निकाल देंगें।”

“डॉली कहाँ है? भगवान के लिये मुझे डॉली का पता बता दो?” मैंने दोनों हाथों से अपने बाल नोंचते हुए कहा। इस समय मैं चीखा नहीं था। मेरे स्वर में प्रार्थना थी।

“घबरा गये? चिन्ता की क्या बात है? डॉली बहुत आराम से है।” मोहिनी ने मुझे बच्चों की तरह पुचकारा। “मैं जिस समय उसके सिर से उतरी थी, वह नरम-नरम गद्दे पर बड़े आराम से सो रही थी।”

“मगर वह है कहाँ?” मैंने बेबसी भरे स्वर में अपने होंठ काटे।

“वह बहुत याद आ रही है?” मोहिनी ने अपने होंठों पर जुबान फेरकर चटखारा लेते हुए कहा। “उसे मैं उसके असली पति के पास छोड़कर आयी हूँ।”

“क्या मतलब? क्या कहा तुमने?” मेरा मस्तिष्क चकराकर रह गया। मोहिनी के शब्द पिघले हुए शीशे की मानिन्द मेरे कानों में उतरते चले गये थे। “यह तुम क्या कह रही हो मोहिनी? क्या मेरे सब्र और बर्दाश्त की परीक्षा ले रही हो?” मैंने टूटते स्वर में कहा।

“विश्वास करो राज! वह अपने वास्तविक पति के साथ बेहद प्रसन्न है और पिछली रात उन्होंने अपनी बड़ी धूमधाम के साथ...।”

“मोहिनी...!” मैं इतनी जोर से चिल्लाया कि मेरी आवाज बैठ गयी। हलक में जैसे गियर लग गयी हो। यदि मेरे अधिकार में होता तो मैं उस वक्त मोहिनी को बड़ी बेदर्दी से कुत्ते की मौत मार डालता। उसके जिस्म को लाखों टुकड़ों में बदल देता लेकिन मोहिनी के सामने मैं बेबस था, लाचार था। मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व को केवल महसूस किया जा सकता था। मैं अपनी बेबसी पर तड़प उठा। परन्तु मोहिनी की मुस्कराहट में कोई कमी नहीं आयी।

अधिक जोर से चिल्लाने के कारण मुझ पर खाँसी का दौरा पड़ गया। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा कलेजा फट जाएगा। परन्तु मोहिनी को मेरी दशा से कोई हमदर्दी नहीं थी। खाँसी के दौरे में कमी आयी तो मोहिनी ने मेरी आँखों में आँखें डालकर बड़े रोमांटिक अन्दाज में एक अंगड़ाई लेकर कहा – “राज! काश कि तुम देख सकते कि पिछली रात डॉली अपने नये साथी के साथ कितनी प्रसन्न थी। दोनों यूँ एक-दूसरे में समाए जा रहे थे जैसे मैंने पहली बार तुम्हें और कमला को देखा था। बड़ा ही भावुक दृश्य था।”

“मोहिनी, ईश्वर के लिये मुझ पर दया करो!” मैं सिसक पड़ा। फिर किसी भिखारी की तरह मोहिनी के सामने झोली फैलाकर बोला। “मैं वादा करता हूँ मोहिनी, तुम्हें वचन देता हूँ कि जीवन भर तुम्हारा बेदाग गुलाम बना रहूँगा। जो तुम कहोगी, वही करूँगा। लेकिन भगवान के लिये डॉली पर दया करो। उसे मुझसे मिला दो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा।”

मोहिनी मेरा जवाब सुनकर कहकहा लगाने लगी। कहकहे की आवाज मुझे बहुत रहस्यमय लगी। फिर एकदम गंभीर होते हुए बोली।

“सुनो मिस्टर राज! यदि मैं डॉली को वापिस न लाऊँ, तब भी तुम मेरे गुलाम बने रहोगे। मेरी इच्छा के विरूद्ध तुम साँस लेने की जुर्रत नहीं कर सकते। यह और बात है कि तुम पर अत्याचार करते हुए मुझे ख्याल आ जाता है। वरना तुमने मेरी असीम शक्तियाँ को अपनी आँखों से देखा है। तुमने देख ही लिया कि डॉली किस प्रकार अपनी याददाश्त को एकदम भूल चुकी है और क्या देखना चाहते हो तुम?”

“मैं सब कुछ मानता हूँ लेकिन डॉली...।”

“डॉली को कुछ दिनों तक अपने किए का खामियाजा भुगतना ही होगा।” मोहिनी ने मेरी बात काटते हुए निर्भयात्मक स्वर में कहा। “उसने मुझे तुमसे जुदा करने के लिये दरगाह का रुख करके मुझे दुःख पहुँचाने की चेष्टा की थी। मुझे अचानक ही उसका ध्यान आ गया और मैंने उसे रास्ते में ही जाकर रोक लिया।”

“मोहिनी!” मैंने पश्चाताप भरे स्वर में कहा। “क्या तुम मेरी खातिर भी डॉली की किसी गलती को क्षमा नहीं कर सकोगी?”

“तुम्हारी खातिर मैंने आज तक क्या कुछ नहीं किया। मगर तुमने उसका क्या बदला दिया?” मोहिनी ने खूंखार नजरों से घूरते हुए कहा। “डॉली का भाग्य अच्छा है जो मैं तुमसे कुछ वादे कर चुकी थी, वरना कल मैं उसका खून करने से तनिक भी नहीं हिचकती।” मोहिनी कहती रही और मैं भीतर ही भीतर खौलता रहा।

“अब मुझे डॉली को अहसास दिलाने दो कि वह क्या है और मैं क्या हूँ?”

“दया करो मोहिनी! मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ।” मैंने याचना भरी नजरों से मोहिनी को देखकर गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में कहा तो वह नरम आवाज में बोली –

“सच्चे दिल से कह रहे हो?”

“विश्वास करो मोहिनी! भगवान के लिये मुझे क्षमा कर दो!”

“नहीं! तुम झूठ बोल रहे हो।” मोहिनी ने इठलाकर कहा।

“मैं इस समय झूठ नहीं बोल सकता। तुम्हें पता है कि मैं डॉली से कितना प्रेम करता हूँ।”

“वह तो मुझे पता है। अच्छा तो मैं तुम्हें एक शर्त पर डॉली का पता बता सकती हूँ।”

“मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है।” मैं जल्दी से बोला।

“तुम जल्दबाजी का प्रदर्शन नहीं करोगे।”

“कभी नहीं।! तुम जैसा कहोगी, मैं वैसा ही करूँगा।”

“अच्छा तो सुनो।” मोहिनी ने अपने होंठों पर जुबान फेरते हुए कहा। “कल रात ही बारह बजे एडवर्ड पार्क के पश्चिमी दरवाजे पर आ जाना। डॉली तुम्हें वहीं मिल जाएगी; लेकिन इतना ध्यान रखना कि तुम समय से पहले वहाँ नहीं पहुँच पाओगे।”

“मुझे मंजूर है।” मैंने धड़कते दिल से जवाब दिया।

“दूसरी बात यह है कि तुम इस बार डॉली को समझा देना कि वह भविष्य में मेरे सम्बन्ध में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करे। वरना सम्भव है कि मैं अपने तमाम वादे भूलकर उसे ठिकाने लगा दूँ।”

“तुम चिन्ता मत करो, मैं उसे सब समझा दूँगा।”
 
“ठीक है! अब तुम आराम करो। मैं वापिस डॉली के सिर पर जा रही हूँ। यदि मेरी गैरहाजिरी में उसकी आँख खुल गयी तो हालात बिगड़ने का अंदेशा है।”

“मोहिनी!” मैंने डरते-डरते कहा। “क्या तुम कल रात के बजाए दोपहर में मुझे मिलने की आज्ञा नहीं दे सकती?”

“रात का समय अधिक उचित है राज।” मोहिनी ने रहस्यमय स्वर में कहा- “तुमसे जैसा कह दिया, वही ठीक है। फिर रात में एक विशेष बात भी है जो बाद में तुम्हें पता चल जाएगी।”

मोहिनी से बहस करना बेकार था। मैं दिल पर पत्थर रखकर चुप रहा। यूँ भी मोहिनी मुझे डॉली से मिलवाने का वायदा कर चुकी थी इसलिए मैंने अधिक जिद नहीं की।

कुछ देर बाद मोहिनी रेंगती हुई मेरे सिर से उतर गयी तो मेरा मस्तिष्क फिर डॉली में उलझ गया। मोहिनी ने डॉली के सम्बन्ध में जो बातें मुझे बतायीं थीं उसे याद करके मेरा खून खौल उठा। मैं काँटों पर डोल रहा था और सोच रहा था कि डॉली की प्राप्ति के बाद उस व्यक्ति को सदा के लिये दुनिया से रुखसत कर दूँगा जिसने मोहिनी द्वारा पैदा किए हुए हालात से लाभ उठाकर मेरी डॉली के जिस्म को नापाक किया है।

आह, डॉली! वह बुरी तरह बेबस थी। जो उसके साथ हो रहा था उसे उसकी कोई खबर न थी। मोहिनी की रूहानी शक्तियों ने मानसिक तौर पर उसे बिल्कुल बेकार कर दिया था। जिसका तमाशा मैं खुद अपनी आँखों से देख चुका था और बन चुका था।

रात का बाकी हिस्सा मैंने जागकर गुजारा। सुबह नित्य-क्रिया से अवकाश पाकर मैं फिर अपने विचारों में गुम हो गया। मेरा दिल चाह रहा था कि समय को पर लग जाएँ और वह घड़ी जल्दी ही आ जाए जब मुझे डॉली को प्राप्त करने के लिये जाना था। परन्तु आज तो जैसे समय थम-थमकर बड़ी धीमी गति से गुजर रहा था। मेरे लिये एक-एक पल काटना दूभर हो रहा था। मोहिनी ने डॉली को मुझसे दूर करके इस बात का आभास दिलाया था कि मेरे लिये डॉली के बिना एक पल गुजारना कितना कष्टदायक है।

डॉली की जुदाई मेरे लिये असहनीय थी परन्तु उसके साथ मैं मोहिनी के सम्बन्ध में सोच रहा था। मोहिनी के सम्बन्ध में कुछ सोचना और गौर करना बेकार था। अब मुझे विश्वास हो चुका कि संसार की कोई ताकत उसे पराजित नहीं कर सकती। उसमें तमाम गंदी आत्माएँ समा गयी हैं। वह कोई बहुत बड़ी जादूगरनी है। वह एक ऐसा तिलिस्म है जिसका कोई जोड़ नहीं। उसने मुझे ऐसे दलदल में धकेल दिया था, जिसमें बेचारगी से हाथ-पाँव मारने के सिवा और मैं कुछ न कर सकता था। मैं उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिये विवश था। मोहिनी से छुटकारा पाने की हर कोशिश बेकार हो चुकी थी। डॉली के साथ पेश आए हालातों ने तो मेरा रहा-सहा साहस भी तोड़ दिया था।

शाम आयी तो मेरी बेचैनी और बढ़ गयी। मैंने किस तरह तड़प-तड़प कर समय काटा था, मेरा दिल ही जानता था। फिर जब रात के साढ़े ग्यारह बजे तो मेरे दिल की धड़कनें और तेज हो गयीं। मैंने होटल के बाहर आकर एडवर्ड पार्क के लिये टैक्सी पकड़ी और अपनी मंजिल के लिये रवाना हो गया। ड्राइवर को मैंने एडवर्ड पार्क का हवाला इसलिए नहीं दिया कि वह न जाने मेरे बारे में क्या सोच बैठे। इसी कारण मैंने उसे एडवर्ड पार्क से एक फर्लांग पहले ही छोड़ दिया और स्वंय पैदल चल पड़ा। बारह बजने में अभी पन्द्रह मिनट शेष थे। मैंने यह पन्द्रह मिनट भी किसी न किसी तरह गुजारे। फिर ठीक बारह बजे पार्क के पश्चिम दरवाजे से पार्क के अन्दर प्रविष्ट हुआ।

उस समय पार्क धुप्प अंधेरे में डूबा हुआ था। हर तरफ सन्नाटा और रहस्यमय खामोशी छाई हुई थी। कुछ पल तक एक जगह डटकर इधर-उधर की आहट लेता रहा। उस खामोशी को देखकर मुझे अनुमान हुआ कि कहीं मोहिनी ने मुझे फरेब न दिया हो। इतनी रात गये एडवर्ड पार्क में डॉली की उपस्थिति का भला क्या कारण हो सकता है। लेकिन मैं मोहिनी के रहस्यमय कारनामों पर गौर कर ही रहा था कि अचानक खामोश वातावरण के तारे टूट गये। मुझे किसी औरत की सिसकने की आवाज सुनायी दी। जो मेरे बाईं ओर वाली झाड़ियों से उभर रही थी। मैं चौंककर उसी दिशा में देखने लगा। वह डॉली की आवाज थी। मैं इस आवाज को न पहचानता तो और कौन पहचानता।

“छोड़ दो, भगवान के लिये मुझे छोड़ दो! आह... ब... बचाओ...!” वह चीख-चिल्ला रही थी।

“खामोश!” किसी पुरुष का खतरनाक स्वर सुनायी दिया। “शोर मचाने की कोशिश की तो गर्दन काटकर रख दूँगा।”

मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे सरे बाजार किसी ने मुझे नंगा कर दिया हो। उन आवाजों को सुनने के बाद मेरे ऊपर दीवानगी सवार हो गयी। फिर भी मैं सावधानीपूर्वक लपकता हुआ उन झाड़ियों तक पहुँच गया और फिर मेरी मनहूस निगाहों ने जो दृश्य देखा, वह मेरे लिये सहन करने के काबिल न था। मेरे ऊपर खून सवार हो गया। दूसरे ही पल मैंने भयानक अंदाज में आगे बढ़कर उस व्यक्ति को दबोच लिया, जो मेरी डॉली को अपनी हवस का निवाला बनाना चाह रहा था।

मैंने एक ही झटके में उसे उठाकर एक ओर गिरा दिया। फिर अचानक उसकी छाती पर चढ़ बैठा। कुछ देर तक तो मशीनी अंदाज में उसके चेहरे पर मुक्के और थप्पड़ मारता रहा। फिर मैंने उसका गला दबोच लिया और उसे पूरी शक्ति से दबाने लगा। मैं उस समय तक अपने पकड़ को तंग करता रहा जब तक अजनबी ने मेरे नीचे तड़प-तड़पकर दम न तोड़ दिया।

उसके बाद मैं उठा और एक भरपूर ठोकर उस लाश के मुँह पर मारकर डॉली की ओर लपका जो अब तक सहमी-सिमटी नीचे पड़ी थी।

“त... तुम कौन हो?” डॉली ने मुझे निकट आते देखा तो हकलाकर बोली।

“डरो नहीं डॉली! मैं हूँ तुम्हारा राज।”

“राज...!” डॉली मेरी आवाज पहचानकर झपटकर उठी और मेरे चौड़े सीने से लगकर सिसकने लगी। मैंने उसके मासूम दिल की सहमी-सहमी धड़कनों को महसूस किया।

“चिन्ता मत करो डॉली! मेरी आत्मा मेरी जान।”

मैंने डॉली को अपने आगोश में लेकर दिलासा देते हुए कहा – “मैंने उस कमीने इन्सान को मार डाला है। अब वह तुम्हारा कुछ न बिगाड़ सकेगा।”

डॉली ने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। वह लगातार मेरे सीने से लिपटी हुई सिसक रही थी। मेरा अब वहाँ रुकना किसी तरह भी उचित नहीं था। मैंने उसके अस्त-व्यस्त लिबास को ठीक किया और फिर उसे लेकर पार्क से बाहर आ गया। होटल पहुँचने तक रास्ते भर डॉली मेरे समझाने-बुझाने के बावजूद सिसकती रही। उसने मेरी किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया था।

होटल पहुँचकर मैंने बड़ी कठिनाई से डॉली को फ्रेश होने के लिये राजी किया। उसके कपड़े चेंज कराए। उसने मेरा कहा मान तो लिया लेकिन वह अभी तक स्तब्धता की स्थिति में थी। मैं उसकी हालत को महसूस कर रहा था। इसलिए मैंने बड़ी नरमी से सम्बोधित करते हुए कहा।

“डॉली, मेरी जान! जो कुछ हो चुका है उसे भूल जाओ। भगवान की कसम मैं तुमसे बिल्कुल भी नाराज नहीं हूँ और फिर इसमें तुम्हारा कोई कसूर नहीं।”

“राज!” डॉली ने सिसककर कातर भाव से मुझे देखा, फिर मुझसे लिपटकर उसने दोबारा सिसकना शुरू कर दिया। डॉली की सिसकियाँ मेरे दिल को छलनी किए देती थी। वह उस समय जिस पीड़ा और संताप में घिरी हुई थी वह मैं ही जानता था। सम्भव था कि मेरी हमदर्दी भी उस समय उसके जख्मी दिल पर मरहम का काम न कर पाती। मैंने उससे आगे बात नहीं की और उसे अपने आगोश में छिपाकर लेट गया।

प्रातःकाल जब डॉली जागी तो उसकी हालत पिछली रात की अपेक्षा किसी हद तक ठीक हो चुकी थी। मैंने स्नेह भरी मुस्कराहट के साथ उसे गुड मॉर्निंग कहा और यूँ हँसने बोलने लगा जैसे कोई बात ही न हुई हो। मेरी कोशिश यही थी कि डॉली इन बातों को भूल जाए मगर मैं महसूस कर रहा था कि वह मानसिक तौर पर किसी उलझन में फँसी हुई है। दोपहर खाने के बाद हम आराम करने के लिये लेटे तो डॉली ने मुझसे पूछ ही लिया –

“म... मैं कल रात एडवर्ड पार्क कैसे पहुँच गयी थी राज? और वह आदमी...?”

“गलती मेरी थी जो मैंने उस पर इस हद तक भरोसा किया।” मैंने जल्दी से डॉली की बात काटकर कहा। “कल रात तुम मेरे साथ ही वहाँ गयी थी। क्या तुम्हें कुछ भी याद नहीं?”

“नहीं!” डॉली ने एक आह भरते हुए जबाव दिया। “मुझे कुछ याद नहीं। कुछ भी याद नहीं कि मैं आपके साथ कहाँ गयी थी। लेकिन मेरा ख्याल है कि मैं शाम को दरगाह जाने के इरादे से निकली थी। उस वक्त आप दूसरे कमरे में थे और मैं...।”

“ईश्वर के लिये अपने मस्तिष्क को मत उलझाओ।” मैंने डॉली को बड़े प्यार से समझाया। “जो कुछ हो चुका है उसे भूल जाओ।”
 
डॉली मेरे समझाने-बुझाने पर खामोश हो गयी, परन्तु उसके चेहरे से उलझन के भाव न गये। मैं महसूस कर रहा था कि उस समय वह क्या याद करने की कोशिश कर रही थी। मोहिनी की शक्ति ने उसकी याद्दाश्त को बीच से काटकर घटना चक्र के ताने-बाने में एक रुकावट पैदा कर दी थी। वह उन टूटी हुई कड़ियों को जोड़ने में बुरी तरह नाकाम रही थी और यही उसकी उलझन का कारण बन गयी थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे किस प्रकार तसल्ली दूं। इन परिस्थितियों ने मुझे भी परेशान कर दिया था। रात को जो कुछ मैंने अपनी नजरों से देखा था, उसे भुला देना मेरे वश में नहीं था।

मोहिनी के लिये मेरे दिलो-दिमाग में एक नफरत का तूफान बन गया था। इसके साथ ही डॉली की हालत भी चिन्ताजनक थी। अतः मैंने यही फैसला किया कि डॉली को लेकर दिल्ली से चला जाऊँ। शोलापुर की घटनाओं का विवरण समाचार-पत्रों में पढ़कर मैं निश्चिंत हो चुका था कि मैनेजर की हत्या की जिम्मेदारी किसी तरह भी डॉली पर साबित नहीं होती और न ही कल्लन खां के बदले हुए बयान पर अखबारों में कोई हंगामा मचा था। इसलिए दिल्ली रुकने की वजह भी नहीं थी। बम्बई पहुँचकर मुझे मैनेजर की मौत के सम्बन्ध में अपने स्टाफ को भी समझाना था। मैंने डॉली से वापस जाने के बारे में पूछा तो वह फौरन ही तैयार हो गयी।

अगले रोज मैंने प्रोग्राम के अनुसार फ्लाइट की दो सीटें बुक करायीं और डॉली के साथ वापस बम्बई आ गया। ऑफिस पहुँचा तो मैनेजर की मौत के सम्बन्ध में चिमगोइयाँ हो रही थीं। मैंने दफ्तर पहुँचते ही स्टॉफ के लिये दो रोज की छुट्टी का ऐलान किया। मैनेजर के घरवालों से मिलकर मैंने दिली सदमे का इजहार किया और मैनेजर की सेवा के उपलक्ष्य में उन्हें एक लम्बी रकम दे डाली जिसे थोड़े से पशो-पेश के बाद मैनेजर के बूढ़े बाप ने स्वीकार कर लिया।

इस तमाम अरसे में एक पल के लिये भी मैं मोहिनी को अपने मस्तिष्क से निकाल न सका। उसकी खौफनाक कल्पना मुझे आतंकित किए हुए थी। उसने एडवर्ड पार्क में एक बार फिर मुझे और डॉली को अपनी शक्ति का परिचय दिया था। नाम मात्र में दखल देने की सजा कितनी भयानक हो सकती है यह मैं स्वयं देख चुका था।

जिस वक्त मैं मैनेजर के घर से वापिस आया उस वक्त भी मेरे ज़हन में मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व उलझा हुआ था। एडवर्ड पार्क में पेश आने वाली घटना को दो राज बीत चुके थे लेकिन मोहिनी का कहीं पता नहीं था। इस घटना से पहले कभी वह इतनी देर तक मेरे सिर से गायब नहीं रही थी। जहाँ तक एडवर्ड पार्क की घटना का प्रश्न था, मोहिनी ने ड्रामा इसलिए खेला था ताकि मैं जज्बात को काबू में न रखकर उस अजनबी का खून कर डालूँ ताकि उसे अपने अस्तित्व को जिन्दा रखने के लिये इन्सानी लहू प्राप्त हो सके। मेरे हाथों एक और कत्ल हो चुका था। कत्ल के बाद एक कत्ल। कभी न खत्म होने वाला खूनी सिलसिला, मासूम इन्सानों की जान लेना और मोहिनी की खिदमत करना, अब मेरा फर्ज बन गया था। मुझे मालूम था इस बार भी मोहिनी अपने नापाक उद्देश्य में मायूस नहीं हुई थी लेकिन अब उसकी अनुपस्थिति मेरे लिये रहस्यमय बनी हुई थी। मैं सोच रहा था कि कहीं वह मुझे और डॉली को फिर से किसी नयी मुसीबत में दो-चार करने की फिराक में तो नहीं है।

मैं इन्ही प्रश्नों और उलझनों में फँसा था कि मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मोहिनी मेरे सिर पर आ गयी है। मेरा अनुमान गलत नहीं था। मैं अपने मस्तिष्क के काल्पनिक दायरे में मोहिनी को देख रहा था। उसके चेहरे की शिकस्तगी और होंठों की सुर्खी इस तरह इस बात को दर्शा को रही थी कि उसने इन्सानी खून छककर पिया है। पहले भी मैं उसे खून पीने के बाद इस हालत में देख चुका था। लेकिन आज जिन नजरों से वह मुझे देख रही थी, उनमें शोखी और शरारत के साथ-साथ व्यंग भी छिपा था, जिसे महसूस करके मेरा खून खौल उठा। मैंने इतनी सख्ती से अपने होंठ दाँतों तले दबाए कि खून की गर्दिश थमकर रह गयी। दूसरी तरफ मोहिनी मुझे निरन्तर व्यंग्यपूर्ण अन्दाज में घूर रही थी। चन्द क्षणों तक वह मुझे टकटकी बाँधे देखती रही थी, फिर पालथी मारकर बैठ गयी और एक लम्बी जम्हाई लेकर बोली –

“राज, मुझे मालूम है कि तुम मुझसे बहुत ज्यादा नाराज हो!”

मैं खामोश रहा तो उसने होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा – “मैं जानती हूँ तुम्हारे दिल पर क्या गुजर रही है। मगर मैंने जो कुछ किया वह जरूरी था। डॉली अब कभी तुम्हारे और मेरे बीच आने का साहस नहीं करेगी। तुम भी इतने बेगैरत नहीं हो कि दोबारा इस मंजर को देखने की इच्छा करो। यूँ भी तुम वचन दे चुके हो कि मेरी इच्छा के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाओगे। याद है तुमने होटल में गिड़गिड़ाकर मुझसे क्षमा माँगी थी।”

मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। क्रोध के मारे मेरा बुरा हाल था। मैं महसूस कर रहा था जैसे मेरे शरीर का तमाम खून सिमटकर मेरे चेहरे पर आ गया हो। मोहिनी के शब्दों में छिपे हुए तीर नश्तर की तरह मेरा कलेजा छलनी कर रहे थे लेकिन मैं बहुत कुछ चाहने के बावजूद सब्र करने पर मजबूर था। मोहिनी ने मेरी असलियत को महसूस किया तो बड़े चुभते हुए लहजे में बोली –

“राज! डॉली से शादी से पहले तुमने भी तो बहुत सारी लड़कियों को बरबाद किया था। अगर तुम्हारी शरारतों का पता उनमें से किसी के शौहर को हो जाए तो क्या तुमने सोचा है उसके दिल पर क्या गुजरेगी?”

“मोहिनी!” मेरे सब्र का पैमाना छलक गया। “तुम डॉली की बाजारू औरतों से तुलना कर रही हो। मैंने अब बहुत सह लिया। अगर तुमने दोबारा इस तरह की हरकत की तो खून-खराबा हो जाएगा।”

“खून-खराबा तो हो चुका है।” मोहिनी ने कुटिलता से कहा। “तुमसे बहुत सी बातें करने को जी चाहता है लेकिन इस वक्त मैं कुछ देर आराम करना चाहती हूँ।” मोहिनी ने लापरवाही से जवाब दिया। फिर पाँव फैलाकर कमर सीधी कर ली।

“सुनो मोहिनी! आज मैं तुमसे एक आखिरी फैसला करना चाहता हूँ।” मैंने होंठ काटते हुए सम्बोधित किया।
 
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