• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Fantasy मोहिनी

मोहिनी की जुबानी यह नयी खबर सुनकर मेरी अक्ल दंग रह गयी। मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मेरे ससुर साहब, जो देखने में अत्यन्त सभ्य और समाज सेवक नज़र आते हें, भीतर से इस प्रकार गहरे और छुपे रूस्तम भी हो सकते हैं। मोहिनी मेरा सवाल सुनकर मुस्कराती हुई खड़ी हो गयी और कमर पर हाथ रखकर प्रेमिका के समान बोली –

“हाँ राज! रजनी उसी युवती का नाम है जो पिछले दो वर्ष से तुम्हारे ससुर की बाहें गरम किए हुए हैं। बड़ी ही हसीन और अच्छे जिस्म वाली है। तुम्हारे ससुर साहब के पास आने से पहले एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने रजनी को तुम्हारे ससुर साहब से मिलाया था। बाद में तुम्हारे ससुर साहब ने अपनी बेपनाह दौलत का प्रदर्शन किया तो रजनी पके हुए आम की तरह उनके आगोश में आ गयी। उन्होंने रजनी को छिपे तौर पर यही एक खूबसूरत बंगले में रखा हुआ है, जिसका ज्ञान मजिस्ट्रेट को नहीं है। जिस दिन भी उसे पता चल गया कि तुम्हारे ससुर ने दोस्ती की आड़ में शिकार खेला है, उसी दिन दोनों में ठन जाएगी। उनकी यह दुखती रग ठेकेदार के हाथ लगी गयी

“वैसे यह वास्तविकता है कि रजनी बड़ी जानदार औरत है। सच कहती हूँ राज, यदि तुम भी एक बार देख लो तो मोहित होकर रह जाओ। तुम्हें अपनी कमला तो याद है न। वही जिसने तुम्हारे साथ एक रात गुजारी थी, फिर मेरे कहने पर तुमने उसे चौपाटी पर ले जाकर मार डाला था। तुम्हें कमला बहुत पसन्द थी न। पर यदि तुम रजनी को देख लो तो कमला का हल्का-सा साया भी तुम्हारे निकट नहीं भटक सकता। क्या विचार है राज, मिलोगे रजनी से?”

और कोई अवसर होता तो संभव था मोहिनी की जुबानी रजनी की सुन्दरता की प्रशंसा सुनकर मैं बेचैन हो जाता परन्तु यहाँ मामला डॉली के डैडी का था। मुझे विश्वास था कि डॉली या उसकी माँ को यदि हालात का पता चल जाता तो घर में एक कयामत आ जाती। उनके घर की शांति समाप्त हो जाती। इसलिए मैं कुछ देर तक हालात के नये रुख पर गौर करता रहा, फिर बोला – “मोहिनी! क्या तुम ऐसा चक्कर नहीं चला सकती कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे?”

“तुम कोई बात कहो और मैं न मानूँ, भला यह कैसे सम्भव है। पर मेरी मानो तो कुछ दिनों तक इस चक्कर को और चलने दो। मुझे विश्वास है कि रजनी अधिक दिनों तक तुम्हारे ससुर के साथ नहीं रह सकती। जिस दिन भी उसे तुम्हारे ससुर से अधिक मोटा आसामी मिल गया, वह उसके साथ छूमंतर हो जाएगी।”

“परन्तु इस बीच में तो वह डॉली के पिता से लाखों की रकम हथिया लेगी।” मैंने गंभीरता से कहा।

“तुम्हें इसकी चिन्ता क्यों?” मोहिनी ने शोखी अदा से कहा। “तुम्हारे ससुर ने इतनी सारी दौलत भला कौन सी ईमानदारी पर जमा की है। तुम जो यह ठाट-बाट देख रहे हो, यह सब धोखे और फरेब से बटोरी हुई दौलत का चमत्कार है। यदि रजनी इसमें से कुछ लेती है तो क्या हर्ज है? कभी तुम भी ऐसी आँखों पर पानी की तरह...।”

“उन बातों को छोड़ो...।” मैंने जल्दी से मोहिनी की बात काटकर कहा। “यहाँ मामला डॉली और उसकी माँ का है। मैं चाहता हूँ कि रजनी का काँटा बीच से जितनी जल्दी हो सके निकल जाए।”

“उफ्फ! तुम तो बहुत डरते हो। मैं उस मजिस्ट्रेट को वास्तविकता बता दूँगी। उसके बाद क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह से जानते हो। वह खुद ही तुम्हारे ससुर से निपट लेगा।”

“परन्तु इस प्रकार तो बात बढ़ जाने का डर है।”

“इससे भी कोई सरल उपाय बताऊँ?” मोहिनी ने होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा। “तुम रजनी से दोस्ती क्यों नहीं कर लेते? बड़ी जानदार चीज है, फिर मैं ऐसे हालात पैदा कर दूँगी कि वह तुम्हारे ससुर से उकताकर तुम्हारी ओर झुक जाएगी।”

“क्या तुम गंभीरता-पूर्वक इस विषय पर सोचते हुए कोई विकल्प नहीं खोज सकती।” मैंने मोहिनी को शरारत के मूड में पाया तो कड़े स्वर में कहा।

“बस तुम्हारी यही अदा तो मुझे भाती है। इतनी जल्दी बुरा मान गये राज।” मोहिनी ने गंभीरता से कहा। “तुम्हें छेड़ने में बड़ा मजा आता है।”

“यह दिल्लगी की बात नहीं है मोहिनी। बल्कि डॉली की माँ के भविष्य और उनके घर की शांति का प्रश्न है।”

“ठीक है राज!” मोहिनी बोली। “मुझे डॉली और उसकी माँ से हमदर्दी है इसलिए तो मैंने तुम्हारे ससुर का यह भेद तुम्हें बता दिया। यदि तुम चाहो तो मैं रजनी का चक्कर खत्म कर सकती हूँ। परन्तु क्या यह उचित न होगा कि तुम्हारे ससुर को अपने किए कि थोड़ी बहुत सजा भी मिल जाये? इस प्रकार वह भविष्य में अपनी पत्नी को दोबारा धोखा देने की नहीं सोचेंगे।”

“नहीं! यह उचित नहीं है।” मैंने कहा। कोई ऐसा रास्ता खोजो कि सब कुछ सरलता-पूर्वक समाप्त हो जाए।”

“यदि यह तुम्हारी आज्ञा है तो मैं ऐसा ही करूँगी। परन्तु अगर तुम आज्ञा दो कि मैं कम से कम तुम्हारे ससुर साहब को ठीक कर सकूँ...? कुछ शर्मिन्दगी का अहसास तो होने दो राज। विश्वास करो मैं उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगी। न ही उनको वास्तविकता का पता चल सकेगा।”

“मैं तुम्हें इस बात की आज्ञा भी इसी शर्त पर दे रहा हूँ कि यह बात सीमा से अधिक न बढ़ने पाए।”

मोहिनी को समझाने-बुझाने के बाद मैंने उठकर मुँह-हाथ धोया फिर नाश्ते के लिये बाहर आ गया जहाँ घर के बाकी लोग भी मौजूद थे। डॉली पिछली रात की घटना के कारण उदास नज़र आ रही थी। उसकी माँ का चेहरा सपाट था, परन्तु मेरे ससुर साहब के चेहरे पर इस समय भी प्रसन्नता के भाव झलक रहे थे।

मोहिनी की एकत्रित की हुई खबरों की रोशनी में मैंने अपने ससुर को गौर से देखा तो न जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह बेहद गहरा आदमी हो। बहरहाल मैंने नाश्ता किया फिर उठकर दोबारा अपने कमरे में आ गया। थोड़ी देर के बाद डॉली भी आ गयी। आते ही उसने फिर मुझसे अखबार वाली खबर के सम्बन्ध में जिरह शुरू कर दी।

“क्या आपने मोहिनी से इस सिलसिले में कोई पूछताछ की है?”

“हाँ!” मैंने झूठ बोला। “उसे इस सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं है।”

“मुझ रह-रहकर मरने वाले के बाल-बच्चों का विचार सता रहा है। न जाने उन बेचारों का क्या होगा?”

“मेरा विचार है कि तुम्हारे डैडी उनकी सहायता अवश्य करेंगे।”

“दौलत से क्या होगा? मरने वाला दोबारा जिन्दा तो नहीं हो सकेगा।”

डॉली अभी तक दु:खी नज़र आ रही थी। मैं सोच रहा था कि अच्छा हुआ मैंने उसे रात की घटना नहीं बतायी, वरना सम्भव था कि मुझसे भी नाराज हो जाती। इसलिए मैंने वार्ता का विषय बदलने के लिये वापस बम्बई चलने का जिक्र छेड़ दिया। डॉली ने वापसी का नाम सुना तो बड़े प्यार से मेरी गर्दन में बाहें डालकर बोली –

“क्या यह नहीं हो सकता राज कि अब हम यहीं रहें?”

“मगर बम्बई के कारोबार का क्या होगा?”

“वहाँ हम अपना कोई दूसरा आदमी देखभाल के लिये भेज देंगे।”

“हो तो सकता है, मगर मैं यहाँ यूँ पड़े रहना भी उचित नहीं समझता।”

“मैं अपने डैडी से इस विषय में बात कर चुकी हूँ।” डॉली ने मेरे और निकट आते हुए कहा। “डैडी का कहना है कि वह आपको यहीं कारोबार करा देंगे। और उनका विचार है कि प्लास्टिक सर्जरी के बाद आपके हाथ की बदसूरती सरलता-पूर्वक दूर हो जाएगी।”

व्यक्तिगत रूप से मेरा भी यही विचार था कि अभी कुछ दिनों डॉली के यहाँ और रुका जाए। इसलिए कि अभी मुझे उस पण्डित से दो-दो हाथ करने थे, जो मेरी मोहिनी को अपना गुलाम बनाना चाहता था। इसलिए मैंने डॉली को खुश करने के लिये कह दिया कि मुझे उसकी बात मंजूर है। परन्तु उसकी शर्त यही होगी कि मेरा कारोबार अलग हो जाये।

डॉली प्रसन्नता से झूमती हुई उठकर बाहर चली गयी। नि:सन्देह वह अपने माता-पिता को मेरे निर्णय से आगाह करने गयी थी।
 
दिन का खाना खाने के बाद मैं आराम करने के लिये लेट गया। शाम को पाँच बजे जागा तो मौसम बड़ा खुशगवार था। डॉली ने मुस्कराती नजरों से मेरे जागने पर स्वागत किया। मुझे खुशी थी कि डॉली का स्वास्थ्य अब ठीक होता जा रहा था और मोहिनी के सिलसिले में अब उसकी उलझन भी समाप्त हो गयी थी। मोहिनी का ख्याल मस्तिष्क में उभरा तो मैंने कनखियों से अपने सिर की ओर देखा, परन्तु मेरा दिल धक से रह गया। मोहिनी उस समय मेरे सिर पर मौजूद नहीं थी। मेरी चिन्ता बढ़ने लगी, मेरे दिल में हजारों सन्देह जाग उठे। साधारण हालात में यदि वह अनुपस्थित होती तो मुझे इतनी चिन्ता नहीं होती, परन्तु वर्तमान परिस्थिति मेरे लिये शोचनीय थी।

मोहिनी ने मुझे बताया था कि जो पण्डित उसे गुलाम बनाने के चक्कर में है, उसे अपने उद्देश्य में सफल होने के लिये एक सौ दिन तक जाप करना होगा। मैंने मोहिनी के बयान की रोशनी में जो हिसाब लगाया था, उस हिसाब से अभी पण्डित को जाप पूरा करने में चौदह-पन्द्रह दिन बाकी थे। परन्तु मोहिनी की अनुपस्थिति ने मुझे बेचैन कर दिया। मैं सोचने लगा कि कहीं मेरा हिसाब गलत तो नहीं है? कहीं पण्डित अपने उद्देश्य में सफल तो नहीं हो गया? कहीं मोहिनी पण्डित के अधिकार में तो नहीं चली गयी? यदि ऐसा हुआ तो बहुत बुरा होगा। मोहिनी ने मुझे उस पण्डित के सम्बन्ध में कुछ न बताकर मूर्खता की थी। न जाने अब वह किस हाल में होगी? मुझसे कभी मिल सकेगी या नहीं।

मेरा मस्तिष्क बुरी तरह उलझ रहा था। मुझे मोहिनी पर बहुत क्रोध आ रहा था। वह यदि चाहती तो जाने से पहले मुझे आगाह भी कर सकती थी। फिर उसने ऐसा क्यों नहीं किया। डॉली ने मेरे चेहरे के भावों को अचानक बदलते हुए देखा तो हैरान होकर बोली –

“क्या बात है राज? आप अचानक गंभीर क्यों हो गये?”

“कुछ नहीं!” मैंने जल्दी से बात बनाते हुए कहा। “यूँ ही जरा अपने कारोबार के बारे में सोच रहा था।”

डॉली के साथ खाने के कमरे में जाकर मैंने शाम की चाय पी। मेज पर डॉली के माता-पिता भी उपस्थित थे। इधर-उधर की औपचारिक बातों का सिलसिला भी चल रहा था, परन्तु मैं केवल हूँ-हाँ करके बात टाल रहा था। वास्तव में मेरा ज़हन उस समय भी मोहिनी की गुमशुदगी से परेशान हो रहा था। चाय पीकर मैं नित्य के समान लॉन में जाने के बजाय कमरे में आ गया। डॉली अपनी माँ के साथ पड़ोस में चली गयी थी।

रात के आठ बजे तो मेरी चिन्ता और बढ़ गयी। मेरी दशा उस समय दमे के उस रोगी से अलग न थी, जिसे खुली हवा में रखने की बजाय कमरे में बन्द कर दिया गया हो। मोहिनी की अनुपस्थिति को तीन घण्टे से अधिक हो चुके थे। डॉली भी पड़ोस से अभी तक वापस नहीं आयी थी। मैंने उठकर टहलना शुरू कर दिया, पर अभी मुझे टहलते हुए अधिक देर नहीं गुजरी थी कि अचानक मुझे यह ख्याल आया कि मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ गयी है।

मैंने कल्पना की दुनिया में सिर की ओर देखा तो वास्तव में मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी। उसके होंठों की अर्थहीन मुस्कराहट देखकर मैंने क्रोध से कहा –

“तुम कहाँ चली गयी थीं? तुम्हारी अनुपस्थिति ने मुझे अत्यन्त उलझन में डाल दिया था; और तुम मुस्करा रही हो। बिना कुछ कहे-सुने कहाँ चली गयी थीं?”

“मुझे दु:ख है राज कि तुम्हें मेरी खातिर परेशान होना पड़ा।” मोहिनी ने बड़े शोख अन्दाज में जवाब दिया। फिर अपने कानों को छूते हुए कहा। “लो वायदा करती हूँ कि भविष्य में तुमसे कहे बिना कहीं नहीं जाऊँगी।”

“परन्तु तुम अब तक हाँ थी?” मैंने कुछ नरमी से पूछा।

“मैं जरा रजनी के सिर पर चली गयी थी और अब फिर जा रही हूँ। तुम्हारी चिन्ता के विचार से वापस आ गयी थी।”

“तुमने अभी तक उस पंडित के सम्बन्ध में कुछ नहीं बताया?”

‘‘उसका जाप पूरा होने में अभी पूरे चौदह दिन बाकी हैं, इसलिए तुम चिन्ता मत करो।” मोहिनी ने मुस्कराते हुए कहा। “आज मैं तुम्हें एक बड़ा ही मनोरंजक ड्रामा दिखाना चाहती हूँ। तुम तैयार होकर ठीक नौ बजे ड्राइंग रूम में पहुँच जाना। वहाँ तुम्हारे ससुर साहब और मजिस्ट्रेट साहब भी मौजूद होंगे, जो अभी तक रजनी के सिलसिले में ठण्डी आहें भरते रहते हैं।”

“मोहिनी!” मैंने कुछ सोचकर तेजी से कहा। “तुम मुझसे वायदा कर चुकी हो कि कोई ऐसी बात नहीं होगी जिससे डॉली के पिता पर कोई आँच आ सके।”

“मैं अपने वायदे पर स्थिर रहूँगी राज! परन्तु इस समय तुम इससे अधिक और कुछ न पूछना, वरना खेल का सारा मजा जाता रहेगा। अच्छा अब मैं जा रही हूँ। तुम नौ बजे ड्राइंग रूम में जरूर चले जाना।” फिर इससे पहले कि मैं मोहिनी से कुछ और पूछता, किसी छलावे की तरह मेरे सिर से फुदकते हुए उतर गयी।

मैंने घड़ी पर नज़र डाली तो सवा आठ बज रहे थे। एक बार फिर मुझे मोहिनी पर ताव आने लगा। वह मुझे पेश आने वाले हालात के बारे में कुछ बताए बिना मिनटों में उड़न छू हो गयी थी। यूँ मुझे इस बात पर पूर्ण विश्वास था कि मोहिनी अपने वायदे से फिर नहीं सकती, फिर भी मुझे चिन्ता थी कि देखें वह रजनी के सिलसिले में क्या गुल खिलाती है।

मजिस्ट्रेट साहब, जिनका नाम साबिर अली था, डॉली के पिता के पुराने दोस्तों में से थे। अक्सर वह मेरे ससुर से मिलने आते रहते थे, परन्तु यह बात शायद उनके फरिश्तों को भी नहीं मालूम थी कि मेरे ससुर ने दोस्ती और दौलत की आड़ लेकर उनकी रखैल रजनी बाला को अपने अधिकार में कर रखा है।

आधे घण्टे तक मैं अपने बेडरूम में रहा, फिर कपड़े बदलकर ड्राइंग रूम में पहुँचा जहाँ मेरे सास-ससुर और डॉली के अतिरिक्त साबिर अली विराजमान थे। मैंने दिल पर पत्थर रखते हुए उन्हें सलाम किया, फिर डॉली के बराबर वाले सोफे पर बैठ गया।

साबिर अली अपनी धुआंधार तकरीर में मग्न थे कि घड़ियाल ने नौ बजाए और ठीक उसी समय बाहर की आवाज सुनकर न जाने क्यों मेरा दिल धड़कने लगा।

“बाहर कोई आया है शायद।” मेरी सास ने कहा।

“मैं देखती हूँ जाकर।” डॉली यह कहते हुए उठी ही थी कि मुझे ड्राइंग-रूम के दरवाजे पर इतनी हसीन औरत नज़र आयी कि कुछ क्षणों के लिये मैं उसके रूप की लहरों में गुम होकर रह गया। फिर जो मैंने ससुर और साबिर अली पर नज़र डाली तो उन दोनों के चेहरे भी धुआँ हो रहे थे। डॉली और उसकी माँ भी द्वार पर खड़ी औरत को आश्चर्यचकित निगाहों से देख रही थी।

मुझे यह समझने में किसी प्रकार की कठिनाई पेश नहीं आयी कि वह औरत रजनी के अलावा और कोई नहीं हो सकती। दरवाजे के बीच जमी खड़ी वह साबिर अली को खूंखार नजरों से घूरे जा रही थी।
 
“कहिए बहन, आपको किससे मिलना है?” मेरी पत्नी ने सोफे पर उठते हुए बड़े आदरपूर्वक स्वर में पूछा, परन्तु उसका उत्तर जिस बेहूदे अन्दाज में मिला वह मेरे लिये अजूबा था।

“शटअप! मैं तुमसे बात करना अपनी तौहीन समझती हूँ।” रजनी ने डॉली से कहा। फिर वह दोबारा साबिर अली को खतरनाक निगाहों से देखने लगी, जिनकी गंजी खोपड़ी पर पसीने के बेशुमार कतरे रोशनी में चमकते नज़र आ रहे थे। मैंने अपने ससुर साहब की ओर देखा। उनकी स्थिति भी दयनीय थी। चेहरे पर हवाईयाँ उड़ रही थीं। डॉली सोच रही थी कि वह औरत कौन है? एक बार रजनी ने मेरे ससुर साहब की ओर देखा तो उन्होंने इस तरह दोनों हाथ जोड़ दिए जैसे कहना चाहते हों –

“रजनी! तुम्हें भगवान का वास्ता, मेरी इज्जत का ख्याल रखना।”

मैं उस सिच्युएशन पर दिल ही दिल में हँस रहा था कि रजनी ने बिगड़े हुए तेवर से साबिर अली को सम्बोधित किया।

“अन्धों की तरह आँखें फाड़े मेरी सूरत क्या देख रहा है, धोखेबाज! मुझे पता चल गया है कि आजकल तू सुल्ताना के चक्कर में है, इसलिए तूने मुझे ठुकरा दिया। लेकिन मेरा नाम भी रजनी है। तेरा अभी गैरतदार औरतों से वास्ता नहीं पड़ा। मैं तुझे बताऊँगी गैरत क्या चीज होती है।”

“क... क्या मतलब?” मजिस्ट्रेट साहब की हवा खराब हो गयी। “म... मैं नहीं... ज... जानता... कि तुम... तुम कौन हो।” साबिर अली ने हकलाते हुए जवाब दिया। उनकी हालत देखने योग्य थी।

“देवी जी! मेरा विचार है कि आप किसी गलत स्थान पर तशरीफ ले आयी हैं।” मेरे ससुर ने भयभीत स्वर में रजनी को सम्बोधित किया। उनके दोनों हाथ अब भी एक-दूसरे हाथ से चिपके हुए थे। भाव कुछ ऐसा ही था जैसे कि हाथ जोड़कर रजनी से अपनी इज्जत का भरम कायम रखने की प्रार्थना कर रहे हों।

रजनी ने मेरे ससुर साहब की बात सुनी तो आग-बबूला होकर बोली –

“ओय, हरामी देवी के बच्चे! अगर तू बीच में आया तो तेरी इज्जत भी खाक में मिलाकर रख दूँगी। बेहतर है अपनी जुबान बंद रख। क्या तेरे पास भी कुछ कहने को है?”

मेरे ससुर रजनी का जवाब सुनकर भीगी बिल्ली की तरह अपनी जगह दुबककर रह गये। साबिर अली लगातार बगलें झाँकने में लगे थे। डॉली और उसकी माँ पर तो जैसे हैरत के पहाड़ टूट पड़े थे। वे दोनों अपनी-अपनी जगह साँस रोके खड़ी थीं। शरारत सूझी तो मैंने साबिर अली को सम्बोधित करके गंभीरता से कहा– “श्रीमान जी! यह आखिर क्या माजरा है? एक अजनबी औरत आपको बुरा-भला कह रही है लेकिन आपके कानों में जूं तक नहीं रेंगती।”

साबिर अली की गैरत को जोश आ गया। एकदम उठ खड़े हुए और कड़ककर बोले– “ओये, खबरदार औरत! अब जो तूने उल्टी-सीधी बकवास की तो बंद करवा दूँगा।”

“बन्द कराएगा तू!” रजनी अचानक हत्थे से उखड़ गयी। आगे बढ़कर उसने साबिर अली का गिरेबान थामा, फिर एक हाथ से सेण्डिल उतारी और शुरू हो गयी।

मौके की नजाकत समझकर सभी बौखला गये। मेरे ससुर ने उठकर बीच-बचाव करने की कोशिश की तो रजनी ने दो-चार हाथ उन्हें भी जड़ दिए। साबिर अली की तो अच्छी-खासी दुर्गति बना दी थी। कुछ देर तक तो मैं दूर खड़ा यह तमाशा देखता रहा, फिर आगे बढ़कर रजनी का हाथ थाम लिया। रजनी ने एक पल के लिये मुझे भी खा जाने वाली नजरों से देखा। फिर कुछ कोमल स्वर में बोली– “तुम मेरे रास्ते में आने की कोशिश न करो। यह दो जिंदगियों का मामला है समझे।”

“बुरी बात है देवी जी!” मैंने उसे समझाते हुए कहा। “यदि आपको साबिर अली साहब से कोई शिकायत है तो उसे दूर करने के और भी बहुत सारे उपाय है। औरत होकर यूँ हाथा-पाई करना आप पर कुछ अच्छा नहीं लगता।”

“ठीक है!” रजनी ने नफरत से कहा, फिर साबिर अली को हिकारत से देखकर बोली। “इस समय तो मैं जा रही हूँ, लेकिन इतना याद रखना कि मैं तुझे इज्जत के साथ जिन्दा न रहने दूँगी। सारी मजिस्ट्रेटी अगर झाड़कर न रख दूँ तो रजनी मत कहना।”

रजनी के जाने के कुछ देर बाद साबिर अली भी कपड़ों की गर्द झाड़ते और रजनी को पागल घोषित करते हुए रूखसत हो गये। मेरे ससुर की हालत काबिले रहम थी। यह बात उनके फरिश्तों को भी समझ में न आ सकी थी कि हालात ने एकदम किस तरह पलटा खाया। पत्नी के साथ सोच में गुम जब वह भी बेडरूम में चले गये तो मैं डॉली के साथ अपने कमरे में आया। उस समय मेरा दिल कर रहा था कि मैं खूब जोर-जोर से हलक फाड़कर कह-कहा लगाऊँ लेकिन डॉली के विचार से चुप रहा।

दूसरी सुबह मेरी आँख खुली तो मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी। डॉली कमरे में नहीं थी इसलिए मैंने मोहिनी को सम्बोधित किया –

“रजनी को तुमने कहाँ छोड़ा? मेरा मतलब है कि अब वह होश में आ जाने के बाद मेरे ससुर से अपने सम्बन्ध समाप्त करेगी?”

“हाँ! मैंने उसके ज़हन में यह बात अच्छी तरह बिठा दी है कि तुम्हारे ससुर उसे किसी लम्बे चक्कर में फँसवा देना चाहते हैं। लिहाजा उससे दूर रहना चाहिए।”

“कहीं साबिर अली उसे तंग न करे। एक मजिस्ट्रेट की हैसियत से वह अगर चाहे तो रजनी को सैकड़ों उल्टे-सीधे आरोपों में फँसा सकता है।”

“राज!” मोहिनी ने इस बात पर मुझे शोख नजरों से घूरते हुए मुस्कराकर कहा। “आखिर तुम्हें रजनी से अचानक इतनी हमदर्दी कैसे पैदा हो गयी? मुझे दाल में कुछ काला नज़र आ रहा है।”

“तुम्हारा अनुमान गलत नहीं है।” मैंने दिल के हाथों मजबूर होकर बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा– “सुनो! जी चाहता है कि एक बार रजनी से अकेले में मिला जाए। क्या तुम मेरे लिये उसे...”

“क्यों नहीं। आज रात ही चलो मेरे साथ। मुझे विश्वास है कि तुम उसके निकट से भरपूर आनन्द पाओगे।”

डॉली मुझे नाश्ते के लिये बुलाने आ गयी। इसलिए मैं खामोशी के साथ उठकर उसके साथ चला गया। रजनी की कल्पना मात्र से ही मेरा दिल खुशी से झूम उठा। दिन भर मैं रजनी के हसीन विचारों में गुम रहा। रात आयी तो मैंने कपड़े तब्दील किए और जेब में नोटों की गड्डियाँ भरकर रजनी से मिलने रवाना हो गया।

मोहिनी मेरी बेचैनी देखकर मुस्करा रही थी और मुझे रास्ते भर छेड़ती रही। मेरे अनुमान के विरुद्ध रजनी ने बड़े तपाक से मेरा स्वागत किया। उसका निवास शहर से दूर एक खामोश और सुनसान बंगले में था। घर में सब ऐशो-आराम का सामान मौजूद था। उच्चकोटि की नग्न तस्वीरें दीवारों पर टंगी हुई थी। वह किसी महारानी की तरह वहाँ रह रही थी। मुझे अपने ससुर पर बड़ा रहम आया।

“जब से मैंने तुम्हें देखा है, मैं अपने काबू से बाहर हूँ। मुझे सारी बात मालूम है, लेकिन मैं तुम्हारी खुशी के लिये अपनी सारी दौलत बरबाद कर सकता हूँ।” मैंने मुस्कराते हुए उस समय कहा जबकि रजनी मुझे अपने ड्राइंगरूम में ले जाकर बैठा चुकी थी। वह एक अदा के साथ उठी और मेरे निकट आकर बैठ गयी। हम दोनों देर तक बातें करते रहे।
 
मैं अपने तौर पर यही समझ रहा था कि वह सब मोहिनी की मेहरबानी के कारण हो रहा है लेकिन बाद में मुझे पता चला कि रजनी का स्वभाव मात्र कारोबारी था। जब मैंने उसे नोटों की झलक दिखाई तो वह मुझ पर आवश्यकता से अधिक मेहरबान हो गयी। मुझे रजनी से कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ना था। इसलिए मैं उसके पास लगभग तीन घंटे रुका और उसके वैशाल से लुत्फ उठाकर वापिस लौट आया।

रास्ते में मुझे मोहिनी ने कहा – “तुमने मेरे बारे में क्या सोचा है राज?”

“मैं हर कीमत पर तुम्हें उस पण्डित से छुटकारा दिलाने के लिये तैयार हूँ। तुम मुझे वह स्थान दिखा दो जहाँ बैठकर वह जाप कर रहा है।”

“लेकिन तुम मण्डप में प्रवेश कैसे करोगे?”

“इसकी चिन्ता मत करो। तुम्हारे लिये मैं आग के दरिया में कूद सकता हूँ।”

“भावुक बनने से काम नहीं चलेगा। हमें कोई दूसरा उपाय सोचना होगा।” मोहिनी ने गंभीरता से कहा। फिर कुछ सोचकर बोली, “मेरी मानो तो पहले तुम इस सिलसिले में किसी पण्डित या मौलवी से मिलो। संभव है उसके पास कोई हल हो।”

“क्या तुम किसी पण्डित या मौलवी का पता बता सकती हो ?” मैंने बेसब्री से पूछा।

“मैं एक मलंग को जानती हूँ। इसी शहर में पुरानी बस्ती में रहता है। मेरा विचार है राज, वह बहुत पहुँचा हुआ है। यदि वह चाहे तो हमारी सहायता कर सकता है।”

“ठीक है! मैं कल ही उससे मिलूँगा।” मैंने निर्णयात्मक स्वर में कहा।
 
उस रात मैं केवल मोहिनी को पंडित से मुक्ति दिलाने के विषय में सोचता रहा, जो मोहिनी के अनुसार एक जटिल और कठिन काम था। डॉली ने देर से घर पहुँचने का कारण पूछा तो मैं यह कहकर टाल गया कि एक पुराने परिचित से मिलने के इरादे से चला गया था। मोहिनी भी मेरी तरह रात भर अपने विचारों में गुम रही। दूसरी सुबह मैंने सारे कामों से छुटकारा पाकर कपड़े बदले और मलंग बाबा से मिलने चल पड़ा।

पुरानी बस्ती नगर से लगभग छः मील दूर थी। यहाँ अधिकतर मजदूर दल के लोग आबाद थे। मुझे मलंग का मकान खोजने में अधिक कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा था। बाहर से वह मकान कुछ सलीके से नजर आया लेकिन जब मैंने मलंग के कमरे में कदम रखा तो मेरा जी मिचलाने लगा। वहाँ उस समय मलंग के अतिरिक्त तीन आदमी मौजूद थे जो अपनी जरूरत के तहत मिलने आये थे। मलंग एक फटे पुराने कम्बल पर आलथी-पालथी मारे बैठा हाथ में चरस की चिलम लिये लम्बे-लम्बे कश ले रहा था। उसके जिस्म पर जो कपड़े थे, वह भी गंदे तथा सैकड़ों पैबन्द लगे थे। गले में उसने खासे मोटे दानों वाली माला डाल रखी थी। सिर पर एक मैली-कुचैली टोपी थी। कमरे में चरस की बदबू बसी हुई थी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें चरस पीने की अधिकता के कारण अंगारों के समान सुर्ख हो रही थी। मैं दिल पर काबू करके एक ओर बैठ गया।

मैं खामोश बैठा उसकी एक-एक हरकत का जायजा ले रहा था। डेढ़ घंटे बाद कमरा खाली हुआ तो उसने अपनी सुर्ख आँखें मेरे चेहरे पर गाढ़ दी फिर अत्यंत असभ्य स्थिर में बोला-

“चल सामने आ जा! अब तेरी बारी है।”

चरस की बदबू के कारण मेरा ज़हन चकरा रहा था। मलंग ने बेहूदगी से संबोधित किया तो मेरे तेवर भी बिगड़ने लगे। परन्तु इससे पहले कि मैं आपे से बाहर होता, मोहिनी ने मेरे कानों में ठंडे रहने की हिदायत की। इसलिए मैं धीरे से खिसक कर निकट हो गया। जो अब अपने लिये नयी चिलम भरने में व्यस्त हो गया।

चिलम सुलगाकर दो-तीन लम्बे-लम्बे दम लगाने के बाद उसने मेरी ओर देखते हुए जोरदार ठहाका लगाया।

“अँधेरी रात का मुसाफिर– सोकर– तारे टिमटिमा रहे हैं बेटा।”

“मलंग बाबा...!” मैंने दिल पर पत्थर रखते हुए उसे संबोधित किया, “मैं एक जरुरी काम के सिलसिले में हाज़िर हुआ हूँ।”

“गैर हाज़िर...!” मलंग हलक फाड़कर हँसा फिर बड़ी राजदारी से बोला– “मछली फाँसने की बँधी में अगर केंचुए न हो तो ऊँचा शिकार नहीं मारा जा सकता। चल काली कलकत्ते वाली, मेरा मन्तर न जाये खाली। अलख निरंजन।”

मलंग की बेहूदा बकवास सुनकर मेरा दिल परेशान हो उठा परन्तु विवशता के कारण बैठा रहा। उसने एकदम कहा और फिर लाल-लाल आँखों को नचाता हुआ बोला– “दम लगाएगा बेटा ?”

“धन्यवाद!” मैंने उकताए हुए स्वर में कहा– “मुझे चरस और गांजे से कभी कोई रूचि नहीं रही। मैं यहाँ आपसे मदद की उम्मीद लेकर आया हूँ।”

“कैसी मदद ?”

“मेरे सिर पर मोहिनी विराजती है और वह खतरे में है, मिटने वाली है।”

“बकवास कर रहा है। जो वस्तु न दिखे वह मिटने वाली है। लपक लाल झंडे वाले और दे साले को डुबकी। हा...हा...हा...”

“मलंग बाब, क्या तुम मेरी सहायता नहीं कर सकते ?” मैंने पहलू बदलकर सवाल किया। मेरी सहनशक्ति अब जवाब देने लगी थी, परन्तु मैं मात्र मोहिनी के लिये वहाँ रुका हुआ था।

“सहायता...सहायता... रहे नाम साईं का...” मलंग ने चिलम का एक दम लगाते हुए कहा– “समुद्र सूख जाये तो मछलियाँ वृक्ष पर चढ़ने के बजाय तड़प-तड़प कर मर जाती हैं, नाव के पेंदे में छेद हो जाये तो तुम क्या करोगे ?”

“क्या मैं चला जाऊँ ?” मैंने इस बार कुछ झल्लाते हुए स्वर में पूछा।

मलंग मेरे प्रश्न पर हँसा फिर अचानक उसके चेहरे पर गंभीरता छा गयी– उसने लाल-लाल निगाहें पूरे कमरे में कुछ इस प्रकार से घुमाई कि जैसे अदृश्य रहस्यमय आत्माओं को देख रहा हो फिर मुझे कड़ी निगाहों से देखते हुए बोला– “काले बादल घिर जाएँ तो सूरज की चमक कम पड़ जाती है। क्या समझे जानेमन ? लगे दम मिटे गम। अलख निरंजन!”

मैं उसे अधिक सहन नहीं कर सकता था। पहले तो चरस की दुर्गन्ध से मेरा दिमाग फटा जाता था। उस पर मलंग की उल्टी-सीधी बातों ने मेरे मस्तिष्क को गंध कर दिया। मैं तेजी से उठ खड़ा हुआ और मलंग को नफरत से देखकर बोला–

“मैंने तुम्हारे विषय में जो कुछ सुना था वह महज बकवास थी। तुम यकीनन कोई रंगे सियार हो।”

“रंगा सियार... जूतों का हार... कलेजे के आर पार...” मलंग गजबनाक स्वर में बोला, “...चला जा... भाग साले आँधी आ रही है।”

मैंने मलंग पर आखिरी दृष्टि डाली और फिर दाँत पीसता हुआ मकान से बाहर आ गया। मुझे मोहिनी पर अत्यंत क्रोध आ रहा था जिसने मुझे उस बेहूदा मलंग से मिलने का सुझाव दिया था। खुली हवा में आकर मैंने इत्मिनान की साँस ली फिर कल्पना की दुनिया में मोहिनी की ओर देख कर बोला- “यह तुमने किस मूर्ख आदमी से मिलने का सुझाव दिया था ?”

“राज! मलंग ने जो बातें कहीं हैं वह अर्थहीन अवश्य लग रही हैं परन्तु उनका कुछ अलग अर्थ भी हो सकता है जिसे समझने में मैं असमर्थ हूँ। मेरा ज्ञान उसके ज्ञान से अलग है। शायद मलंग को हमारी सहायता करना मंजूर न हो, इसलिए उसने उल्टी-सीधी बातें की हो।”

“नर्क में झोंको मलंग को। अब मुझे यह बताओ कि वह पंडित मुझे कहाँ मिलेगा जो तुम्हें अपने अधिकार में करने के सपने देख रहा है।”

“परंतु तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे। यह बहुत कठिन काम है।” मोहिनी के स्वर में मायूसी झलक रही थी।

“हर मुश्किल आसान हो सकती है राजष्य में लगन होनी चाहिए– मैं इस पर विश्वास रखता हूँ। तुम मुझे उस पंडित का पता बता दो फिर देखो मैं क्या करता हूँ ?”

मैं उस समय भावनाओं की धारा में बह रहा था। मोहिनी ने पहले तो पंडित का पता बताने में आनाकानी की परन्तु जब मैंने बहुत जिद की तो उसने मुझे उस पंडित के बारे में सबकुछ बता दिया। मैंने सोचा जो कल होना है वह आज ही क्यों न हो जाये। मैं और कुछ सोचे-समझे बिना सीधा मरघट की ओर चल पड़ा जहाँ मोहिनी के कथानुसार पंडित अपने जाप में मग्न था।

पर मैं देख रहा था कि मोहिनी मेरी इच्छा से खुश नहीं है। उसके हसीन चेहरे पर उलझनों की तहें और उभर आई थीं। उसकी आँखों में निराशा और मायूसी के भाव थे। मोहिनी जैसी रहस्यमय शक्ति पंडित के उस खतरनाक जाप से भयभीत थी। उस मण्डप में मोहिनी भी दाखिल नहीं हो सकती थी तो फिर मैं क्या था। परन्तु उस समय मेरे ऊपर दीवानगी छायी हुई थी। मैं हर मूल्य पर पंडित को ठिकाने लगाने का फैसला कर चुका था। अब मोहिनी से जुदाई की कल्पना मात्र ही मुझे खाये जा रही थी।

मैं और मोहिनी दोनों अपने विचारों में गुम थे। आबादी से दूर निकल अब मैं मरघट वाले वीरान रास्ते पर पहुँचा तो मोहिनी ने एक ठण्डी आह भरकर मुझसे कहा–

“राज, मेरी बात मानो तो यहीं से वापस चले जाओ!”

“क्यों ?” मैंने रूठ जाने वाले भाव से पूछा, “क्या तुम इतनी निराश हो ?”

“हाँ! तुम पंडित के मण्डप में दाखिल नहीं हो सकते और जब तक वह मण्डप के भीतर है संसार की कोई शक्ति उसे नुकसान नहीं पहुँचा सकती।”

“मगर मुझे कोशिश तो करने दो। मरदूद पंडित को मण्डप से बाहर निकालने के लिये अपनी आखिरी कोशिश तो कर लूँ।”

“बहुत कठिन है राज।” मोहिनी ने मायूसी भरे स्वर में कहा, “पंडित का जाप पूरा होने में अब केवल आठ-दस दिन बाकि रह गए हैं। अब वह अपने मण्डप से निकलने की मूर्खता कभी नहीं कर सकता।”

“खैर, जो कुछ होगा देखा जायेगा!” मैं लापरवाही से बोला।

मैंने महसूस किया कि मोहिनी टकटकी बाँधे मुझे बेबस भरी नजरों से तक रही है। फिर उठकर खड़ी हो गयी और मेरे सिर पर चहलकदमी करने लगी। ज्यों-ज्यों मरघट निकट आता जा रहा था मोहिनी की चिंता बढ़ती जा रही थी। जब मैं मरघट से एक फलांग के फासले पर पहुँचा तो मोहिनी ने एक बार फिर मुझे मेरे प्रयास से रोकने की चेष्टा की।

“राज, तुम मेरे लिये अपने आपको खतरे में न डालो! मैं विश्वास के साथ कुछ नहीं कह सकती परन्तु इतना अवश्य जानती हूँ कि यदि तुम अपने उद्देश्य में नाकाम हुए और पंडित ने अपना जाप पूरा कर लिया तो...”

“तो क्या होगा ?”

मोहिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी थी इसलिए मैंने बेचैनी से पूछा।

“तो...!” मोहिनी ने मेरी आँखों में आँखें डालकर दर्द भरे स्वर में जवाब दिया, “तुम बर्बाद हो सकते हो। तुम्हारे ऊपर ऐसी तबाही आ सकती है जिसका अनुमान तुम इस समय नहीं लगा सकते।”

“मुझे सब मंजूर है इन्क। परन्तु अब मैं तुम्हें जुदा करने की शक्ति अपने भीतर नहीं पाता। तुम दिल की बातें जानती हो और तुम्हें मालूम होगा कि यह मैं किसी लालच से नहीं कह रहा हूँ।”

“मैं जानती हूँ राज। मेरे प्यारे राज।” मोहिनी की आँखें भीग गयीं। मैंने महसूस करते हुए देखा उसकी डब-डबाई आँखों में प्रेम के बेशुमार दीपक जल उठे थे। वह मुझे उसी प्रकार देखती रही फिर भर्रायी आवाज में बोली, “राज मैं सोचती हूँ मैंने तुम पर बहुत अत्याचार किये हैं। मुझे अत्यंत दुःख है। मुझे शर्मिंदगी है कि तुम्हें मेरे कारण से अपना एक हाथ गँवाना पड़ा।”

“कुछ मत सोचो मेरी जान।” मैंने बेचैन होते हुए कहा, “तुम्हारे लिये मैं अपनी जान भी कुर्बान कर सकता हूँ।”

“पर पहले तो तुम ऐसे न थे। पहले तो तुम मुझसे अधिक नाराज रहा करते थे। मुझसे बोलते भी नहीं थे। यह तुम्हें अचानक क्या हो गया ?”

“पहले मैंने तुम्हें समझा ही न था। लेकिन अब मोहिनी मुझे मालूम है कि तुम मुझसे मोहब्बत करती हो। हालाँकि लोग तुम्हें प्राप्त करने के लिये क्या-क्या न करते होंगे।”
 
“ओह राज... इतना प्रेम मत दिखाओ!” मोहिनी ने अपनी आँखें धीरे से बंद कर ली। उसकी भीगी-भीगी पलकें न जाने क्यों काँप उठी थी, “काश ... काश मैं डॉली होती और बस तुम्हारी होती और कोई मेरी तलब न करता और मैं सब कुछ होते हुए मजबूर न होती।”

मैंने मोहिनी की बातें सुनकर मरघट की ओर अपनी गति तेज कर दी। रास्ता मेरा देखा-भाला था। रामदयाल की माँ के क्रिया-कर्म के समय मैं उस ओर जा चुका था। परन्तु वहाँ मुझे वह मरदूद पंडित कहीं नजर नहीं आया। मोहिनी लगातार उलझी हुई महसूस हो रही थी। मैं मरघट तक पहुँच गया। मैंने पहली बार मोहिनी के चेहरे पर भय देखा।

“यहाँ तो कोई पंडित-पुजारी दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा है।” मैंने मोहिनी को संबोधित किया तो उसने अपनी आँखें खोल दी। एक पल तक वह मुझे हसरत भरी निगाहों से देखती रही। फिर भर्राई आवाज में बोली, “राज, अब भी समय है मेरी बात मान लो!”

“असम्भव!” मैंने मोहिनी की बात का जवाब देते हुए ठोस स्वर में कहा, “अब जो भी होगा देखा जायेगा। परन्तु एक बार कदम आगे बढ़ाकर पीछे हट जाना मर्दों का काम नहीं। तुम मुझे पंडित तक पहुँचा दो। फिर मैं उसे मण्डप से बाहर निकालने का कोई न कोई तरीका अवश्य खोज लूँगा।”

मोहिनी ने कोई जवाब न दिया। कुछ क्षणों तक वह खामोश रही फिर ऊँगली से एक ओर संकेत करते हुए बोली-

“यह जो सामने मंदिर दिख रहा है, उसके पीछे झाड़ियाँ हैं। उन झाड़ियों के पीछे तुम्हें वह बैठा हुआ मिल जायेगा।”

मोहिनी का संकेत पाकर मैं बायीं ओर चल पड़ा। मंदिर विलुप्त सुनसान पड़ा था। मंदिर से कोई बीस गज दूर घनी झाड़ियाँ मौजूद थी। मैं कदम बढ़ाता झाड़ियों के निकट पहुँचा फिर एक लम्बा चक्कर काटकर दूसरी तरफ आया और फिर अचानक मेरी आँखों से नफरत की चिंगारियाँ उठने लगी।

मैं झाड़ियों के किनारे ठिठक कर रुक गया। मेरी निगाहें उस पंडित पर जमकर रह गयी जो बरगद के एक बड़े पेड़ के नीचे आलथी-पालथी मारे बैठा आँख बंद किये अपने ध्यान में मग्न था। पंडित के शरीर पर मात्र एक लंगोटी थी। उलझी हुई दाढ़ी के बाल उसके चौड़े सीने पर सहरा रहे थे। शरीर की बनावट के हिसाब से वह एक अच्छा-खासा हट्टा-कट्टा आदमी था। पूरे जिस्म पर उसने भभूत मल रखी थी। जिस स्थान पर बैठा यह जाप कर रहा था वहाँ से चार गज के फासले पर चारों ओर चूने का दायरा खिंचा हुआ था। मैं अपने स्थान पर खड़ा खूनी निगाहों से घूर रहा था। फिर मैंने महसूस करते हुए मोहिनी पर नजर डाली तो बेचैन हो गया।

मोहिनी जो कुछ देर पहले कन्धारी अनार की तरह लाल सुर्ख हो रही थी। उस समय बिल्कुल पीली नजर आ रही थी। उसकी आँखों में वीरानी छायी हुई थी और चेहरे पर दहशत बरस रही थी। मोहिनी में यह परिवर्तन किस प्रकार आ गया। यह बात मेरे लिये आश्चर्यजनक थी। वह उस समय मुझे बरसों की बीमार नजर आ रही थी और फटी-फटी निगाहों से पंडित को घूरे जा रही थी।

“मोहिनी, सुनो!” मैंने उससे धीमे स्वर में कहा, “क्या यही वह नीच पंडित है जो तुम्हें प्राप्त करने के सपने देख रहा है ?”

“हाँ!” मोहिनी ने चौंकते हुए जवाब दिया, “वापिस चलो राज! मुझे इस बात का विश्वास है कि तुम इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे। बेकार की आफत तुम्हारा भाग्य बन जायेगी।”

“मोहिनी, मौत की कड़वाहट मुझे तुम्हारी जुदाई से अधिक प्यारी है!” मैंने होंठ चबाकर जवाब दिया फिर पंडित की ओर बढ़ा और मण्डप से थोड़ी दूरी पर रुक गया। पंडित आँखें बंद किये अपने आप में मग्न था। उसे कदापित वहाँ मेरी उपस्थिति का पता नहीं था।

कुछ पल के बाद मैंने उसे कड़े स्वर में ललकारते हुए कहा, “ओह कमीने आँखें खोल और देख तेरी मौत तेरे सिर पर खड़ी है।”

पंडित ने हड़बड़ाकर आँखे खोल दी। जैसे कच्ची नींद में कोई भयानक सपना देख कर डर गया हो। परन्तु उसकी यह हालत एक पल में बदल गयी। जल्दी ही वह संतुष्ट नजर आने लगा। उसके होंठ लगातर हिल रहे थे। मैं समझ गया कि वह अपने मन्तर के जाप में लगा हुआ है।

मैंने एक बार फिर उसे ललकारते हुए कहा– “कमीने, मेरी ओर आँखें फाड़े क्या देख रहा है ? यह तू क्या कर रहा है ? तू अपने प्रयास में सफल नहीं हो सकता! मैं अभी तुझे बताता हूँ।”

पण्डित ने मेरी ओर खूंखार आँखों से देखा। इस बार भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके होंठ तेजी से हिल रहे थे। जैसे वह मेरे हस्तक्षेप को भूलने के लिये अपने मस्तिष्क को जाप में लगा रहा हो और मैं उसे किसी न किसी तरह उसके ध्यान में विघ्न डालना चाहता था।

मैं कुछ देर तक उसके जवाब का इंतजार करता रहा फिर एक युक्ति मेरे मस्तिष्क में आई। मैंने लपक कर जमीन से एक बड़ा पत्थर उठाया और हाथ फेरते हुए बिगड़े तेवर में बोला– “सीधी तरह सीधे रास्ते पर आता है या पत्थर मार कर तेरा भेजा फोड़ दूँ।”

उत्तर में पंडित की आँखों की धुरी और गहरी हो गयी। उसने सीधा हाथ उठाकर जोर जोर से झटकना शुरू कर दिया वह हाथ झटक-झटक कर मुझे वहाँ से भाग जाने का संकेत कर रहा था।

मुझे उसकी यह हरकत बहुत बुरी लगी। इसलिए मैंने पत्थर को हाथ में तोला। पूरी शक्ति से उसे पंडित के सिर का निशाना लेकर फेंक मारा। परन्तु दूसरे ही पल में उस पत्थर का जो अंजाम हुआ उसे देखकर मैं हैरान रह गया। मण्डप के अंदर दाखिल होते ही भारी पत्थर मोम की तरह पिघलकर पानी-पानी हो गया। पंडित के होंठों पर उभरने वाली मुस्कुराहट ने मेरे जूनून को और भी भड़का दिया। मैं मण्डप के भीतर दाखिल होने के इरादे से आगे बढ़ा ही था कि मोहिनी ने मुझे रोकते हुए कहा-

“राज, उस रेखा को पार करने की मूर्खता मत करना वरना जलकर भस्म हो जाओगे!”

“हुश!” मैं मोहिनी को जोश में टालते हुए कहा फिर दोबारा आगे बढ़ने लगा।

मैंने तय कर लिया था कि मण्डप में दाखिल होते ही पण्डित से दो-दो हाथ कर लूँगा। परन्तु जैसे ही मैंने मण्डप में अपना पहला कदम रखा मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने मुझे पकड़कर झिंझोड़ दिया हो। मैं अपने दोनों कन्धों और गर्दन पर किसी अनदेखी शक्ति की गिरफ्त महसूस कर रहा था।

फिर अचानक मेरे कानों से भयानक आवाजें टकराने लगी। यूँ जैसे सैकड़ों परिंदे मुझ पर टूट पड़े हों। मैंने कल्पना की दुनिया में अपने सिर पर नजर डाली तो मोहिनी वहाँ मौजूद न थी। शायद वह मण्डप में मुझे दाखिल होता देखकर ही मेरे सिर से खिसक गयी थी। मैंने अपने आप पर काबू पाया और उछलकर चूने की लकीर से बाहर निकल आया। दूसरे ही पल वह भयानक शक्ति वाले हाथ और आवाजों का अस्तित्व समाप्त हो गया। मेरा सारा शरीर पसीने से सराबोर हो रहा था। मैं आश्चर्य से आँखें फाड़े उस पंडित को देख रहा था जो अपने आप में पूरे विश्वास के साथ मग्न था।

अचानक मुझे महसूस हुआ जैसे मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ गयी हो। मेरा अनुमान गलत नहीं था। मैं मोहिनी को दोबारा अपने सिर पर देख रहा था। उस वक्त वह बेहद घबराई हुई नजर आ रही थी। उसका नन्हा सा अस्तित्व किसी तिनके की तरह काँप रहा था। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थी। मोहिनी को इस हालत में देखकर मुझे दोबारा गुस्सा उस पण्डित पर आ गया जो मुझसे मेरी मोहिनी को छीन लेना चाहता था।

अतः एक बार फिर मुझ पर जूनून का दौरा पड़ गया। मैं निकट पड़े हुए पत्थर को उठा-उठा कर पण्डित की ओर फेंकने लगा परन्तु पण्डित मेरे हर वार से सुरक्षित था। पत्थर मण्डप में पहुँचते ही पिघलकर गिर जाता। जब मैं थककर हाँफने लगा तो मोहिनी ने मुझसे कहा–

“राज, छोड़ो! अब घर चलो। मैंने तुम्हें पहले ही मना किया था परन्तु तुम नहीं मानते। बेकार क्यों अपने आपको परेशान कर रहे हो। जब तक पंडित अपने मण्डप के भीतर है, संसार की कोई शक्ति भी उसका बाल-बाँका नहीं कर सकती। इसलिए कि उसे बहुत दिन गुजर चुके हैं और बहुत हिम्मत वाले पुजारी ही मुझे पाने के लिये ऐसा खतरनाक जाप करते हैं। यह पुजारी भी पुराना और अनुभव वाला है। इसमें सहनशक्ति बहुत है। यह जाप में मग्न रहेगा, चाहें तुम इसे कितना भी परेशान करना चाहो।”

“परन्तु यदि इस कमीने को मण्डप से बाहर न निकाला गया तो अवश्य यह अपने नापाक उद्देश्य में सफल हो जायेगा।” मैंने झल्लाए हुए स्वर में कहा, “क्या तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें इस कमीने के कब्जे में जाने दूँ।”

“ऐसी बातें क्यों करते हो राज ?” मोहिनी ने उदासी से कहा, “मैं तो स्वयं असमर्थ होकर रह गयी हूँ।”

“फिर तुम्हारा क्या सुझाव है ?” मैंने कोमल स्वर में पूछा तो मोहिनी रुआँसी होकर बोली–

जल्दबाजी से काम न लो राज। अभी उसका जाप पूरा होने में आठ-दस दिन बाकि है। इस बीच में कोई ऐसा उपाय सोचो जो उचित हो।

“तुम्हारे कहने पर तो मैं उस चरसी मलंग से मिल चुका हूँ लेकिन क्या प्राप्त हुआ ?”

“इस समय तो तुम घर वापस चलो राज। इस बला से मुक्ति पाने के लिये कोई न कोई युक्ति तो करनी ही पड़ेगी।”

मैंने मोहिनी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। परन्तु वास्तविकता मुझ पर प्रकट हो गयी थी कि जब तक पंडित अपने मण्डप में मौजदू है उसे कोई किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचा सकता और मण्डप में दाखिल होना अपनी मौत को दावत देने के बराबर था। इसलिए मैंने हट्टे-कट्टे पंडित को घृणात्मक दृष्टि से देखा फिर असफल होकर घर की तरफ पलट पड़ा। पंडित के मुकाबले में स्वयं को बेबस महसूस करके मैं बड़ा कष्ट महसूस कर रहा था। मेरा दिल डूबा जा रहा था। मेरे लिये एक-एक पल बड़ा महत्वपूर्ण था।

मैं लम्बे-लम्बे डग भरता और अंदर ही अंदर सुलगता हुआ घर की तरफ लौट रहा था। मोहिनी बड़े उदास अंदाज में मेरे सिर पर बालों के बीच खामोश बैठी न जाने किस सोच में डूबी थी। आधे घंटे हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई फिर अनायास मैंने मोहिनी को तेजी से उठकर खड़े होते हुए देखा। उसकी वीरान निगाहों में मुझे एक अजीब चमक नजर आई। मेरे कुछ पूछने से पहले ही मोहिनी ने कहा– “राज, एक युक्ति समझ में आई है! तुम यदि इस पर अमल करो तो शायद हमें उस पंडित से छुटकारा मिल जाये।”

“जल्दी बताओ!” मैंने जल्दी से पूछा, “तुम्हें पता नहीं कि मुझ पर क्या गुजर रही है।”

“तुम्हें रामदयाल की माँ से मिलने वाले पंडितों में से एक पंडित भगवान प्रसाद से मिलना होगा। वह यदि तुम्हारी सहायता के लिये तैयार हो जाएँ तो तुम इस पंडित को मण्डप से बाहर निकाल सकते हो। उसके बाद मैं खुद उसे ठिकाने लगा दूँगी।”

“क्या तुम्हें आशा है कि भगवान प्रसाद मेरी सहायता करने के लिये तैयार हो जायेगा ?”
 
“कोशिश करके देखने में क्या हर्ज है।” मोहिनी बोली, “एक बार वह भी मुझे प्राप्त करने के सपने देख चुका है। परन्तु मैंने ठीक समय पर उसका दिमाग पलट दिया था।”

“क्या उसके पास ऐसी कोई शक्ति है जो पंडित को मण्डप से बाहर आने पर मजबूर कर सकती है।”

“मैं विश्वास के साथ कुछ नहीं कह सकती राज। परन्तु एक मन्तर का तोड़ दूसरा मन्तर ही कर सकता है। मुझे यह बात पता है कि भगवान प्रसाद काले जादू का विशेषज्ञ है। सम्भव है वह कोई ऐसा जादू चलाये जो पंडित को मण्डप से बाहर आने पर मजबूर कर दे।”

मोहिनी के चेहरे पर आशा की किरण देखकर मैंने सोचा कि पंडित भगवान प्रसाद को भी देख लिया जाये। मैं समय गँवाए बिना उसी समय मोहिनी के साथ भगवान प्रसाद के घर की तरफ रवाना हो गया। मोहिनी के उस सुझाव ने किसी हद तक मेरी चिंताओं तथा उलझनों को समाप्त कर दिया था परन्तु न जाने क्यों उसकी जुदाई का विचार अब भी मेरे मस्तिष्क को जैसे शुष्क कर रहा था जबकि मोहिनी के ही कारण मैं अपना एक हाथ गँवा बैठा था। परन्तु उसके बावजूद यदि मैं चाहता भी तो उसके उपकारों का बदला नहीं चुका सकता था। मोहिनी मेरे शरीर का अंग बन चुकी थी। वह मेरी आवश्यकता थी।

मैं अपने विचारों में खोया-खोया तेज कदमों से चलता हुआ आधे घंटे बाद अपनी मंजिल पर पहुँच गया। पंडितों की बस्ती में भगवान प्रसाद का मकान ठीक बीच में उपस्थित था। मकान क्या था अच्छी-खासी हवेली थी।

मैंने दरवाजे पर दस्तक दी और बेचैन निगाहों से किसी के आने का इंतजार करता रहा। दो मिनट बाद जिस व्यक्ति ने दरवाजा खोला, वह मेरे विचार से भगवान प्रसाद के अलावा कोई दूसरा नहीं हो सकता था। मैं उसे एक-दो बार रामदयाल की माँ के साथ भी देख चुका था। फिर भी अपने विचार की पुष्टि के लिये मैंने उससे पूछा– “महाशय, क्या आपका ही नाम पंडित भगवान प्रसाद है ?”

दोहरे बदन और लम्बे कद वाले पंडित ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया। एक मिनट तक वह मुझे तीखी नजरों से घूरता रहा फिर उसके चेहरे पर बिखरी हुई कठोरता कम होने लगी।

“यदि मेरा अनुमान गलत नहीं है तो मैं तुम्हें पहले भी कहीं देख चुका हूँ।” पंडित ने मेरा चेहरा गौर से देखते हुए कहा, “कहीं तुम रामदयाल के मित्र राज तो नहीं हो ?”

“हाँ महाराज, मैं वही हूँ!” मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए भगवान प्रसाद से कहा।

“क्या मेरे स्थान पर आने का कोई विशेष कारण है ?”

“हाँ महाराज, मैं आवश्यकता के लिये ही आपके चरणों में पहुँचा हूँ। मुझे आशा है कि आप मुझे निराश नहीं करेंगे।”

“भीतर आ जाओ।”

मैं पंडित भगवान प्रसाद के साथ हवेली में प्रविष्ट हो गया। बड़े कमरे में पहुँचकर जहाँ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थान-स्थान पर मौजूद थी। भगवान प्रसाद एक आसन पर बैठ गया। फिर उसने मुझे बैठने के लिये संकेत किया। मैं ख़ामोशी से एक मूढ़े पर बैठ गया। मेरा दिल धड़क रहा था। मैं ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि भगवान प्रसाद मेरी सहायता के लिये तैयार हो जाये।

कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। इस बीच में भगवान प्रसाद बराबर मेरी तरफ देखे जा रहा था। मैंने अपनी तरफ से पहल नहीं की थी। दो मिनट बाद भगवान प्रसाद ने चुप्पी को तोड़ते हुए कहा-

“तुमने अभी तक यह नहीं बताया कि मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूँ ?”

“महाराज...!” मैंने डरते-डरते कहा, “पहले मुझे वचन दीजिये कि आप मेरी सहायता अवश्य करेंगे।”

“यह बच्चों वाली बात हुई बेटा। पहले मुझे यह बताओ कि तुम क्या चाहते हो। यदि मेरे बस में हुआ तो मैं तुम्हारी सहायता अवश्य करूँगा ?”

मैंने एक भयभीत दृष्टि भगवान प्रसाद के चेहरे पर डाली फिर अपने आने का कारण बयान कर दिया। परंतु इस बात को मैंने छिपाये रखा कि उस पंडित को मण्डप से बाहर क्यों निकालना चाहता हूँ। मोहिनी का उल्लेख भी मैंने उचित नहीं समझा।

भगवान प्रसाद ने मेरी बात बड़े गौर से सुनी। एक क्षण तक कुछ समझने वाले भाव में मेरे जिस्म को तोलता रहा फिर कुछ उलझे हुए स्वर में पूछा-

“क्या तुम मुझे यह नहीं बताओगे कि तुम उस महा पण्डित को मण्डप से बाहर क्यों लाना चाहते हो ?”

“यह लम्बी कहानी है महाराज।” मैंने बात बनाने की चेष्टा की, “आप बस केवल इतना जान लें कि वह महा पंडित मुझे हानि पहुँचाने की चेष्टा कर रहा है। यदि वह अपना जाप पूरा करने में सफल हो गया तो मैं बर्बाद हो जाऊँगा।”

भगवान प्रसाद अभी तक मेरे चेहरे पर अर्थ पूर्ण दृष्टि डाले हुए था। मेरी बात समाप्त हुई तो उसने एक बार छत की ओर नजर उठाई फिर अपनी आँखें बंद कर ली। दस मिनट तक वह उसी प्रकार आँखे बंद किये बैठा रहा फिर उसने आँखें खोली तो उसके होंठो पर रहस्यमय मुस्कुराहट खिल रही थी।

मुझे मुस्कुराती नजरों से देखकर बोला– “बच्चा, क्या तुम जानते हो कि जो जाप कर रहा था उस पंडित का नाम त्रिवेणी था। कैसा जाप कर रहा है ?”

“हाँ महाराज...!” मैंने जल्दी से जवाब दिया, “वह मेरे दिल का चैन बर्बाद करना चाहता है।”

“तुम्हारे दिल का चैन...?” भगवान प्रसाद ने आश्चर्य से कहा, “क्या तुम भी मोहिनी के सपने देख रहे हो ?”

मैं कोई जवाब देने ही वाला था कि मोहिनी ने मुझे सम्बोधित करते हुए कहा- “राज, अब इससे कुछ छिपाना बेकार है। तुम इससे साफ-साफ कह दो। मेरे सिलसिले में केवल इतना ही बताना कि कभी-कभी मैं अपनी इच्छा से तुम्हारे सिर पर आ जाती हूँ और त्रिवेणी के सम्बन्ध में भी तुम्हें मेरी जुबानी पता चली।”

मोहिनी के सुझाव पर मैंने भगवान प्रसाद के सामने सब कुछ खोलकर रख दिया। मेरी बात सुनकर उसके चेहरे पर उलझन और परेशानी के मिले-जुले भाव पैदा हो गए। उसकी आँखों से ऐसा लग रहा था जैसे उसे मेरी बात पर विश्वास न हुआ था। वह मुँह फाड़े मुझे देख रहा था। कुछ समय बाद वह बोला।

“राज, क्या तुम सच कह रहे हो कि मोहिनी तुम्हारे सिर पर आती है ? तुम जानते हो कि मोहिनी कौन है ? क्यों मुझसे मजाक करते हो ?”

“मैं आपसे मजाक नहीं कर रहा हूँ महाराज। मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसे आप सच समझें और मेरी कठिनाई का कोई न कोई रास्ता ढूँढें।” मैंने कहा।

“बालक, मोहिनी का नाम लेते हो! मोहिनी के सम्बन्ध में कुछ सुना भी है। मोहिनी को प्राप्त करने वाले बड़े भाग्यवान होते हैं। मोहिनी की शक्ति जानते हो ?” पंडित ने व्यंग्य कसा।
 
ठीक उसी समय मोहिनी ने मेरे कान में एक बात कही। इसलिए मैंने बेधड़क जवाब दिया- “महाराज, मेरी बात का विश्वास करो! मैं सब कुछ जानता हूँ। इस समय भी वह मेरे सिर पर विराजमान है।”

“बालक, क्या तुम इसका कोई प्रमाण दे सकते हो ? बताओ तो भला कैसी है मोहिनी ?” भगवान प्रसाद ने कहकहा लगाते हुए कहा। मगर उसकी निगाहों में अभी तक अन्धविश्वास था।

“आप किस प्रकार का प्रमाण चाहते हैं महाराज ?” मैंने मोहिनी के संकेत पर भगवान प्रसाद से पूछा।

“सुनो राज, मोहिनी एक ऐसी रहस्यमय और महान शक्ति का नाम है जिसे अपनाने के लिये राजष्य को बड़े-बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। त्रिवेणी भी उसी शक्ति के कारण मण्डप में धुनि जमाये बैठा है। फिर मैं कैसे विश्वास करूँ कि जो कुछ तुम कह रहे हो वह सच है ?”

“महाराज, मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसका एक-एक शब्द सच है!” मैंने मोहिनी के कहे हुए वाक्य को दोहराते हुए कहा– “आपको यदि मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो इस बात का वचन देना होगा। यदि परीक्षा में मैं खरा उतरा तो आप त्रिवेणी को उसके मण्डप से बाहर निकलने में मेरी सहायता अवश्य करेंगे।”

“पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दो। मुझे बताओ कि मोहिनी किस रूप में तुम्हारे सिर पर आती है।” भगवान प्रसाद ने गंभीरता से पूछा।

“क्यों नहीं महाराज!” इस बार मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “मोहिनी का रूप स्वर्ग की अप्सराओं जैसा है। उसकी सुंदरता का कोई जवाब नहीं है। सच मानिये तो वह सुंदरता की देवी है।”

“तुमने कभी उसे भोजन करते हुए देखा है ?”

“देखा है महाराज।” मैं बोला, “मोहिनी अपने अस्तित्व को जिन्दा रखने के लिये इन्सानी खून पीती है और...”

“और... इस समय वह तुम्हारे सिर पर विराजमान है।” भगवान प्रसाद अब बहुत गंभीर हो गया।

“क्या आपको अब भी मेरी बात पर विश्वास नहीं है ?” मैंने चिढ़कर पूछा।

“विश्वास का केवल एक ही उपाय है राज। यदि मोहिनी सुंदर नारी के रूप में तुम्हारे सिर पर मौजूद है तो उससे कहो कि वह मुझे अपनी शक्ति का कोई खेल दिखाए।”

मेरा जवाब सुनने से पहले ही मोहिनी किसी छलावे की तरह फुदक कर मेरे सिर से उतर गयी। भगवान प्रसाद मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या जवाब दूँ। मोहिनी के सिर से उतर जाने के कारण मैं कुछ चिंतित हो गया था। परन्तु मेरी चिंता अधिक देरी तक कायम न रह सकी। भगवान प्रसाद रवैये में अचानक तब्दीली आ गयी।

अचानक वह यूँ प्रफुल्लित नजर आने लगा जैसे उसे संसार का सबसे बड़ा खजाना मिल गया हो। उसकी आँखें फटी हुई थी। शब्द उसके मुँह से न निकल पा रहे थे। वह टूटे-फूटे शब्दों में कह रहा था।

“राज! तुम तो महान हो... मुझे क्षमा कर दो, राज! मैंने तुम्हें गलत समझा था। मोहिनी तुम्हारे पास आती है। तुम सबसे भाग्यशाली आदमी हो। मुझे बताओ राज कि मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूँ। मैं तुम्हारे लिये सबकुछ करने को तैयार हूँ। परन्तु तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा।” भगवान प्रसाद का स्वर अचानक बदल गया।

“वह क्या ?” मैंने पूछा।

“अभी तुम केवल मुझे वचन दे दो।” भगवान प्रसाद ने मुस्कुरा कर कहा, “जब तुम अपने काम में सफल हो जाओगे फिर मैं तुम्हें अपना काम बताऊँगा।”\

“मुझे मंजूर है महाराज।” मैंने बिना कुछ सोचे-समझे वादा कर लिया।

“तुम यही पधारो, मैं अभी वापस लौटता हूँ।”

भगवान प्रसाद तेजी से उठकर भीतर चला गया तो मैंने इत्मिनान भरी साँस ली। मोहिनी अभी तक वापस नहीं आई थी। यूँ मेरा अनुमान यही था कि वह इस समय भगवान प्रसाद के सिर पर होगी और उसे मेरी सहायता करने पर तैयार किया होगा। अब मुझे आशा की एक किरण फूटती नजर आ रही थी। मैं उस द्वार पर दृष्टि जमाये बैठा रहा जिस द्वार से होकर भगवान प्रसाद भीतर गया था।

कुछ देर बाद वह दोबारा कमरे में दाखिल हुआ। उसका चेहरा उस समय भी किसी भीतरी ख़ुशी के कारण कुंदन की तरह दमक रहा था। जिस समय वह अपने आसन पर बैठा ठीक उसी समय मोहिनी दोबारा मेरे सिर पर आ गयी। मैंने कनखियों से मोहिनी की ओर देखा तो वह भी खुश दिखाई दे रही थी। शायद उसे भी अपने बचाव की आशा हो चली थी।

उसी के संकेत पर मैंने भगवान प्रसाद को संबोधित किया, “महाराज यदि तुम त्रिवेणी को उसके मण्डप से बाहर निकालने का कोई उपाय कर दो तो मैं जीवन भर तुम्हारा आभारी रहूँगा। उसके बदले जो कुछ भी मुझसे हो सकेगा मैं तुम्हारे लिये अवश्य करूँगा।”

“तुम भाग्य के धनी हो राज। जो बिना किसी जाप के मोहिनी जैसी शक्ति को प्राप्त कर लिया।” भगवान प्रसाद ने गंभीरता से कहा, “मैं तुम्हारी सहायता अवश्य करूँगा परन्तु उसके लिये तुम्हें अभी एक सप्ताह और प्रतीक्षा करनी होगी।”

“एक सप्ताह... ?” मैंने चिंता भरे स्वर में कहा तो भगवान प्रसाद बोला–

“कोई चिंता न करो राज। मुझे अच्छी प्रकार ज्ञात है कि त्रिवेणी का जाप केवल आठ-नौ दिन का रह गया है परन्तु तुम्हें मैं जो वस्तु अर्पित करना चाहता हूँ उसके लिये अभी समय पूरा नहीं है। तुम्हें एक हफ्ते तक अभी और प्रतीक्षा करनी होगी।”

“कोई ऐसा उपाय नहीं है महाराज कि त्रिवेणी को एक-दो दिन में ही मण्डप से बाहर देख सकूँ ?”

“मैं जानता हूँ कि तुम मोहिनी के कारण बहुत व्याकुल हो। परन्तु तुम्हें धीरज से काम लेना होगा।”

“क्या मैं त्रिवेणी को उसके इरादों से रोकने में सफल हो जाऊँगा ?”

“कल क्या होने वाला है, यह केवल परमात्मा ही जानता है। पर मुझे विश्वास है कि तुम त्रिवेणी को मण्डप से बाहर निकालने में सफल हो जाओगे परन्तु...” अचानक भगवान प्रसाद के चेहरे पर उदासी छा गयी, “परन्तु यदि ऐसा नहीं हुआ तो...”

भगवान प्रसाद अपना वाक्य अधूरा छोड़कर बेचैन हो मुझे देखने लगा। उसके चेहरे पर एक भाव आता था और एक जाता था। वह किसी गहरे सोच में डूबा हुआ था। इसलिए मैंने बेचैनी से पूछा– “यदि मैं सफल न हुआ तो क्या होगा महाराज ?”

“तुम्हारा कुछ नहीं होगा पर...” भगवान प्रसाद ने एक बार फिर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

दूसरे ही पल वह बात बदलकर बोला– “अभी तुम जाओ राज। आज से ठीक सात दिन बाद पूर्णमासी की रात होगी। तुम उस रात ठीक बारह बजे मेरे पास आ जाना। मैं तुम्हें एक ऐसी वस्तु दूँगा जिसकी शक्ति त्रिवेणी को उसके मण्डप से अवश्य बाहर घसीट लाएगी।”

भगवान प्रसाद ने जिस समय यह कहा था उस समय भी उसकी नजरों में एक अजीब सी उलझन थी लेकिन मैंने जानबूझकर उसे छेड़ना उचित नहीं समझा और उठकर ख़ामोशी से बाहर आ गया।

पंडितों की उस बस्ती को पार करके जब मैं अपने निवास की ओर चला तो मोहिनी ने मुझसे कहा– “भगवान प्रसाद तुम्हारी सहायता अवश्य करेगा। हो सकता है कि वह जो वस्तु तुम्हें दे वह हमारी चिंताओं में अंत का कारण बन सके।”
 
“क्या तुम मेरे सिर से उतरकर उसके सिर पर चली गयी थी ?”

“हाँ!” मोहिनी ने इस बार मुस्कुराते हुए कहा, “जानते हो वह त्रिवेणी का मामला निपटाने के बाद तुमसे क्या काम लेना चाहता है ? तुम भगवान प्रसाद को नहीं जानते। वह बहुत मक्कार और धूर्त आदमी है। उसका काटा हुआ पानी नहीं माँगता। परन्तु तुमसे वह किसी धोखे से काम नहीं लेगा इसलिए कि वह एक पुराने खजाने का भेद जानने के चक्कर में है इसी कारण से उसने मुझे भी अपने अधिकार में करने के सपने देखे थे।”

“जहन्नुम में गया खजाना।” मैंने बेदिली से कहा, “तुम यह बताओ भगवान प्रसाद कुछ कहते-कहते रुक क्यों गया था ? यदि यह वास्तव में काले जादू का विशेषज्ञ है तो फिर उसे चिंता किस बात की है ?”

“जल्दी क्या है ? पूर्णमासी की रात आ जाने दो। जो बात होगी वह सामने आ जायेगी।”

“क्या तुम्हें भी इसका पता नहीं है ?” मैंने मोहिनी से चुभता हुआ सवाल किया। न जाने क्यों मुझे यह संदेह हो रहा था कि मोहिनी भगवान प्रसाद की उलझन का कारण जानती है परन्तु मुझसे वह छिपाकर रखना चाहती है।

एक-दो बार जब मैंने अपने प्रश्न को घुमा-फिराकर पूछा तो वह मुझे टाल गयी फिर जब मैंने अधिक जिद की तो मोहिनी ने कहा–

“सुनो, अब जबकि तुम नहीं मानते हो तो सुनो मैं तुमसे कुछ छिपाकर नहीं रखना चाहती। मुझे नहीं पता कि त्रिवेणी का अंजाम क्या होगा परन्तु मुझे मालूम है कि यदि भगवान प्रसाद का काला जादू भी बेकार सिद्ध हुआ तो बात बिगड़ जायेगी। मुझे तुमसे दूर होना ही पड़ेगा।”

“बात बिगड़ने से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ? साफ-साफ कहो।”

“राज, मैं नहीं चाहती कि तुम्हारे ऊपर कोई आँच आये। परन्तु काले जादू की यह विशेषता है कि वह असफल होने के बाद अवश्य पलटता है और या तो जादू करवाने वाले को मौत के घाट उतार देता है या फिर उस व्यक्ति की बर्बादी का कारण बन जाता है जो जादू करता है।”

“तो तुम यह कहना चाहती हो कि त्रिवेणी के बच जाने में मेरे या भगवान प्रसाद में से किसी एक की तबाही निश्चित है ?”

“राज!” मोहिनी भर्राये हुए स्वर में बोली, “क्या यह सम्भव नहीं कि तुम मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो और स्वयं को इन बखेड़ों में मत डालो।”

मैंने महसूस किया कि उसके सुंदर नेत्रों में आँसू हैं। उसका स्वर भी दर्द भरा था। मेरा जी भर आया।

मैंने निर्णयात्मक स्वर में कहा- “मोहिनी, यदि तुम मुझे अपना सच्चा हमदर्द और दोस्त समझती हो तो ईश्वर के लिये अब यह बात जुबान पर मत लाना। यदि मेरे भाग्य में बर्बादी लिख चुकी है तो त्रिवेणी की राह छोड़ दूँ तब भी नहीं बच सकूँगा और यदि मेरे ऊपर भाग्य की कृपा है तो त्रिवेणी तथा उसकी समस्त रहस्यमय शक्तियाँ मिलकर भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।”

मोहिनी ने भीगी पलकों से मेरी ओर देखा। उन आँखों में आभार के अतिरिक्त मोहब्बत के बेपनाह जज्बे मौजूद थे। रास्ते भर हमारे बीच फिर कोई बात नहीं हुई। मोहिनी आलथी-पालथी मारे दुखी और परेशान बैठी थी। दूसरी ओर मैंने अटल निर्णय कर लिया था कि मोहिनी के लिये हर चीज कुर्बान कर दूँगा। अपने विचारों में उलझा हुआ मैं घर पहुँचा तो डॉली ने मुझे एक नया समाचार सुनाया।

“कुछ सुना आपने कि रजनी पर क्या बीती ?”

“क्या हुआ ?” मैंने लापरवाही से बिस्तर पर ढेर होते हुए पूछा।

“साबिर अली जी ने उसे स्मगलिंग के चक्कर में फँसा दिया। आज सुबह पुलिस ने रजनी के घर पर छापा मारकर उसे गिरफ्तार कर लिया। बहुत सारी स्मगलिंग की हुई वस्तुएँ भी मिली। परन्तु डैडी का विचार है कि साबिर अली जी ने अपने उस रोज के अपमान का बदला लेने के लिये रजनी के चारों ओर जाल बुना है।”

“तुम्हारे डैडी को आखिर रजनी से इस कदर हमदर्दी क्यों है ?” मैं जल्दी से कह गया। फिर मुझे ख्याल आया कि मुझे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए– “मेरा मतलब है कि रजनी जाने या साबिर अली जी। हमें क्या आवश्यकता पड़ी है कि दूसरों के मामले में दखल दें।”

“कुछ भी नहीं, परन्तु साबिर अली जी को एक औरत के साथ ऐसी ओछी हरकत नहीं करनी चाहिए थी।” डॉली ने बुरा सा मुँह बनाकर कहा, “मेरा तो विचार है कि उस दिन भी रजनी ने अकारण उन पर कीचड़ नहीं उछाला होगा। दाल में अवश्य कुछ काला होगा।”

“हो सकता है। वैसे मुझे तुम्हारा यह मजिस्ट्रेट भी कोई अच्छा आदमी नहीं लगता।” मैंने डॉली की हाँ में हाँ मिलाते हुए जवाब दिया। फिर राजदारी के से अंदाज में पूछा, “क्या तुम्हें वास्तव में बहुत हमदर्दी महसूस हो रही है ?”

“होनी भी चाहिए।” डॉली ने तेजी से कहा, “साबिर अली जी ने उसे जिस आरोप में फँसाने की चेष्टा की है यदि वह सच साबित हो गया तो बेचारी का जीवन तबाह हो जायेगा।”

“यदि कहो तो मैं रजनी को बचाने की कोशिश करूँ ?”

मैंने यह बात न जाने किस तरह और किस भाव में कही थी कि डॉली ने पलटकर मेरे चेहरे को गौर से देखा फिर जैसे रजनी के साथ उसकी तमाम हमदर्दियाँ अचानक ख़त्म हो गयी हो।

वह भवें चढ़ाकर बोली– “आपको क्या जरूरत है उसे बचाने की ? वह जाने और साबिर अली जी। आप आराम से कपड़े बदलकर लेटिये। मैं अभी आपके लिये कॉफी बनाकर लाती हूँ।”

डॉली चली गयी तो मैं एक बार फिर त्रिवेणी के बारे में सोचने लगा जो मोहिनी को मुझसे छीन लेने के लिये जाप कर रहा था। मोहिनी भी अपने विचारों में ग़ुम थी इसलिए मैंने उसे छेड़ना उचित नहीं समझा।

डॉली ने कॉफी लाकर दी तो मैंने अपने बोझिल मनोमस्तिष्क को आराम देने के लिये जल्दी-जल्दी दो-चार लम्बे घूँट लिये। फिर कॉफी समाप्त करके लेट गया। डॉली से मैंने कह दिया था कि यदि मैं स्वयं न जागूँ तो दोपहर के भोजन पर मुझे जगाने की चेष्टा न करे।

पंडित भगवान प्रसाद से मिले मुझे चार दिन हो चुके थे। मैंने यह चार दिन बड़े उलझन से गुजारे। मोहिनी इस बीच बराबर मेरा ढाँढस बँधाती रही। परन्तु मुझे किसी पल भी चैन नसीब न था। हर समय यही चिंता रहती कि यदि त्रिवेणी अपने उद्देश्य में सफल हो गया तो मेरा क्या होगा ?

मोहिनी का जुदाई का समय निकट होता जा रहा था और उससे मेरा प्रेम दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा था। अक्सर रात को जब वह मेरे सिर पर सोती तो मैं जागता रहता। मैं उसे हसरत भरी निगाहों से देखता रहता। इस चार दिनों में मोहिनी बेहद झटक गयी थी। स्वयं मेरा भी यही हाल था कि किसी काम में दिल न लगता था। भूख-प्यास का होश न रहता बस हर समय यही चिंता रहती कि देखे आने वाले क्षण मेरे लिये क्या गुल खिलाते हैं। मेरे मनप्रिय वस्तु, मेरी जिंदगी मुझसे जुदा होने वाली थी।

डॉली और उसके माता पिता से अपनी हालत छिपाने के लिये मैं नित्य प्रातः काल ही केवल चाय पीकर मित्रों से मिलने का बहाना करके चला जाता और रात के भोजन के बाद लौटता। डॉली के माता-पिता को तो कोई ख्याल न हुआ कि मेरा कार्यक्रम अचानक क्यों बदल गया। अलबत्ता डॉली के कान अवश्य खड़े हो गए।

चार दिन तक तो डॉली चुप रही परन्तु पाँचवे दिन जब मैं रात गए वापिस आया और अपने बेडरूम में प्रविष्ट हुआ तो डॉली मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। जब तक मैं कपड़े बदलता रहा। वह मुझसे हँस-हँसकर बातें करती रही।
 
परन्तु जब मैं बिस्तर पर बैठ गया तो डॉली मेरे निकट आकर बड़े प्यार से बोली– “क्या बात है, आप आजकल अधिकतर घर से बाहर ही रहते हैं ?”

“कोई खास बात नहीं।” मैंने टालते हुए जवाब दिया, “कुछ मित्र है उनसे मिलने चला जाता हूँ। समय अच्छा कट जाता है।”

“ऐसा भी क्या कि इंसान मुँह अँधेरे का निकला रात ढले वापिस आये। भगवान न करे आपको कोई चिंता तो नहीं है।”

“चिंता कैसी ?”

“खाइये मेरे सिर की सौगंध।”

मैंने डॉली को हर प्रकार से टालना चाहा परन्तु जब उसने किसी प्रकार भी मेरी बात नहीं मानी तो मैंने मोहिनी के संकेत पर उसे विस्तारपूर्वक अपनी चिंता का कारण बता डाला।

डॉली मेरी बातें सुनकर गंभीर हो गयी। जब तक मैं सारी बातें बताता रहा वह आश्चर्य से मुझे तकती रही। मैं खामोश हुआ तो बोली–

“क्या आपको पूरी आशा है कि आप मोहिनी को उस पंडित से छुटकारा दिलाने में सफल हो जायेंगे ?”

“विचार तो है। आगे भाग्य में जो लिखा है वही होगा।”

“काले जादू इत्यादि का खेल बुरा होता है।” डॉली ने मुझे समझाते हुए कहा, “कहीं ऐसा न हो कि मोहिनी को एक मुसीबत से बचाते-बचाते आप स्वयं किसी बड़ी मुसीबत में फँस जाएँ।”

“सब कुछ सम्भव है डॉली।” मैंने बड़े धैर्य के साथ उत्तर दिया, “लेकिन अब चाहे जो भी हो, मैं मोहिनी को अवश्य उस कमीने पंडित से छुटकारा दिलाकर ही रहूँगा। उसके लिये चाहे मुझ पर जो भी विपदा आये, मैं भोगूँगा।”

“क्या आपको मेरा कोई ख्याल नहीं है ?”

“है क्यों नहीं! परन्तु मोहिनी मेरी देवी है। उसके उपकारों को भूला भी तो नहीं जा सकता। यदि उसने मेरी सहायता न की होती और मुझे पैसे वाला न बनाया होता तो मैं तुम्हें भी कभी प्राप्त नहीं कर पाता।”

“और अन्य अवसरों पर उसी मोहिनी ने आपके साथ ऐसी हरकतें भी की हैं जो अत्यंत घिनावनी थी।” डॉली ने दृष्टि नीचे किये हुए कहा फिर अचानक तेज स्वर में बोली, “आप यह क्यों भूल जाते हैं कि उसी मोहिनी के कारण से आपका एक हाथ भी बेकार हुआ है।”

“मुझे सब कुछ मालूम है परन्तु उसके बावजूद मैं मोहिनी को हर कीमत पर पंडित के चंगुल से बचाने की कोशिश करूँगा। चाहे इसके लिये हमें अपनी जान क्यों न गँवानी पड़े।”

“अर्थात मोहिनी आपको मुझसे अधिक प्यारी है ?” डॉली के चेहरे पर व्यंग्य के भाव पैदा हो गए।

“मूर्खता की बात क्यों करती हो डॉली ?” मैं झल्ला कर बोला, “मोहिनी मात्र एक काल्पनिक अस्तित्व है जिसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं। तुम्हें इस सिलसिले में किसी गलत विचार को अपने मस्तिष्क में जगह नहीं देनी चाहिए।”

डॉली को कदाचित इस उत्तर की आशा नहीं थी। उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था और एक रंग जा रहा था। उसकी झील सी आँखों में शिकायत भरी हुई थी। मुझे आशा नहीं थी कि डॉली मोहिनी से मेरी हमदर्दी को गलत रंग देगी और मुफ़्त बैठे बिठाए मेरी चिंताओं में बढ़ोतरी करेगी।

बहरहाल जब मैंने उसके तेवर बदले देखे तो बुरा लगा। मैं खुश्क स्वर में बोला– “मेरा तो विचार था कि तुम पढ़ी-लिखी हो। तुम एक आजाद विचारों की लड़की भी हो। परन्तु पता चला कि स्वार्थ की भावना का शिक्षा से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।”

“मुझे इस बात का एहसास मात्र पहली बार सता रहा है कि आप मेरे मुकाबले पर किसी और को प्राथमिकता दे सकते हैं।” डॉली ने होंठ चबाते हुए जले-कटे स्वर में जवाब दिया तो मैं और भड़क उठा।

“तुम जो चाहो सोचती रहो परन्तु मैं मोहिनी की सहायता अवश्य करूँगा।”

डॉली ने बड़े क्रोध में मुँह खोला। वह निःसंदेह कोई कठोर बात को कहना चाहती थी परन्तु फिर न जाने किस सम्भावना के अंतर्गत उसने अपने होंठ सख्ती से भींच लिये। मुझे अपरिचित दृष्टि से देखती हुई वह तेजी से उठी और लम्बे-लम्बे कदम उठाती कमरे के बाहर चली गयी। उसके जाने के बाद मैंने इत्मिनान की साँस ली और फिर मोहिनी के सम्बंध में सोचने लगा। मैं कुछ इस कदर मोहिनी के कारण परेशान था कि मुझे डॉली के नाराज होने का भी कोई ख्याल न रहा। पर डॉली के बिगड़ कर चले जाने के बाद मोहिनी जो मेरी और डॉली की तमाम बात सुन चुकी थी, उदास लहजे में बोली– “राज, तुम्हें मेरे कारण डॉली को नाराज नहीं करना चाहिए था। तुम सोच भी नहीं सकते वह तुमसे किस कदर प्रेम करती है।”

“यदि उसे मुझसे मोहब्बत होती तो वह तुम्हारी सहायता करने से भी कभी मना न करती।” मैंने झल्लाकर कहा।

“अरे, इस कदर भावुक न बनो राज! तुम्हें डॉली की भावनाओं की कदर करनी चाहिए।”
 
Back
Top