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Guest
मोहिनी की जुबानी यह नयी खबर सुनकर मेरी अक्ल दंग रह गयी। मैं कभी सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मेरे ससुर साहब, जो देखने में अत्यन्त सभ्य और समाज सेवक नज़र आते हें, भीतर से इस प्रकार गहरे और छुपे रूस्तम भी हो सकते हैं। मोहिनी मेरा सवाल सुनकर मुस्कराती हुई खड़ी हो गयी और कमर पर हाथ रखकर प्रेमिका के समान बोली –
“हाँ राज! रजनी उसी युवती का नाम है जो पिछले दो वर्ष से तुम्हारे ससुर की बाहें गरम किए हुए हैं। बड़ी ही हसीन और अच्छे जिस्म वाली है। तुम्हारे ससुर साहब के पास आने से पहले एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने रजनी को तुम्हारे ससुर साहब से मिलाया था। बाद में तुम्हारे ससुर साहब ने अपनी बेपनाह दौलत का प्रदर्शन किया तो रजनी पके हुए आम की तरह उनके आगोश में आ गयी। उन्होंने रजनी को छिपे तौर पर यही एक खूबसूरत बंगले में रखा हुआ है, जिसका ज्ञान मजिस्ट्रेट को नहीं है। जिस दिन भी उसे पता चल गया कि तुम्हारे ससुर ने दोस्ती की आड़ में शिकार खेला है, उसी दिन दोनों में ठन जाएगी। उनकी यह दुखती रग ठेकेदार के हाथ लगी गयी
“वैसे यह वास्तविकता है कि रजनी बड़ी जानदार औरत है। सच कहती हूँ राज, यदि तुम भी एक बार देख लो तो मोहित होकर रह जाओ। तुम्हें अपनी कमला तो याद है न। वही जिसने तुम्हारे साथ एक रात गुजारी थी, फिर मेरे कहने पर तुमने उसे चौपाटी पर ले जाकर मार डाला था। तुम्हें कमला बहुत पसन्द थी न। पर यदि तुम रजनी को देख लो तो कमला का हल्का-सा साया भी तुम्हारे निकट नहीं भटक सकता। क्या विचार है राज, मिलोगे रजनी से?”
और कोई अवसर होता तो संभव था मोहिनी की जुबानी रजनी की सुन्दरता की प्रशंसा सुनकर मैं बेचैन हो जाता परन्तु यहाँ मामला डॉली के डैडी का था। मुझे विश्वास था कि डॉली या उसकी माँ को यदि हालात का पता चल जाता तो घर में एक कयामत आ जाती। उनके घर की शांति समाप्त हो जाती। इसलिए मैं कुछ देर तक हालात के नये रुख पर गौर करता रहा, फिर बोला – “मोहिनी! क्या तुम ऐसा चक्कर नहीं चला सकती कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे?”
“तुम कोई बात कहो और मैं न मानूँ, भला यह कैसे सम्भव है। पर मेरी मानो तो कुछ दिनों तक इस चक्कर को और चलने दो। मुझे विश्वास है कि रजनी अधिक दिनों तक तुम्हारे ससुर के साथ नहीं रह सकती। जिस दिन भी उसे तुम्हारे ससुर से अधिक मोटा आसामी मिल गया, वह उसके साथ छूमंतर हो जाएगी।”
“परन्तु इस बीच में तो वह डॉली के पिता से लाखों की रकम हथिया लेगी।” मैंने गंभीरता से कहा।
“तुम्हें इसकी चिन्ता क्यों?” मोहिनी ने शोखी अदा से कहा। “तुम्हारे ससुर ने इतनी सारी दौलत भला कौन सी ईमानदारी पर जमा की है। तुम जो यह ठाट-बाट देख रहे हो, यह सब धोखे और फरेब से बटोरी हुई दौलत का चमत्कार है। यदि रजनी इसमें से कुछ लेती है तो क्या हर्ज है? कभी तुम भी ऐसी आँखों पर पानी की तरह...।”
“उन बातों को छोड़ो...।” मैंने जल्दी से मोहिनी की बात काटकर कहा। “यहाँ मामला डॉली और उसकी माँ का है। मैं चाहता हूँ कि रजनी का काँटा बीच से जितनी जल्दी हो सके निकल जाए।”
“उफ्फ! तुम तो बहुत डरते हो। मैं उस मजिस्ट्रेट को वास्तविकता बता दूँगी। उसके बाद क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह से जानते हो। वह खुद ही तुम्हारे ससुर से निपट लेगा।”
“परन्तु इस प्रकार तो बात बढ़ जाने का डर है।”
“इससे भी कोई सरल उपाय बताऊँ?” मोहिनी ने होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा। “तुम रजनी से दोस्ती क्यों नहीं कर लेते? बड़ी जानदार चीज है, फिर मैं ऐसे हालात पैदा कर दूँगी कि वह तुम्हारे ससुर से उकताकर तुम्हारी ओर झुक जाएगी।”
“क्या तुम गंभीरता-पूर्वक इस विषय पर सोचते हुए कोई विकल्प नहीं खोज सकती।” मैंने मोहिनी को शरारत के मूड में पाया तो कड़े स्वर में कहा।
“बस तुम्हारी यही अदा तो मुझे भाती है। इतनी जल्दी बुरा मान गये राज।” मोहिनी ने गंभीरता से कहा। “तुम्हें छेड़ने में बड़ा मजा आता है।”
“यह दिल्लगी की बात नहीं है मोहिनी। बल्कि डॉली की माँ के भविष्य और उनके घर की शांति का प्रश्न है।”
“ठीक है राज!” मोहिनी बोली। “मुझे डॉली और उसकी माँ से हमदर्दी है इसलिए तो मैंने तुम्हारे ससुर का यह भेद तुम्हें बता दिया। यदि तुम चाहो तो मैं रजनी का चक्कर खत्म कर सकती हूँ। परन्तु क्या यह उचित न होगा कि तुम्हारे ससुर को अपने किए कि थोड़ी बहुत सजा भी मिल जाये? इस प्रकार वह भविष्य में अपनी पत्नी को दोबारा धोखा देने की नहीं सोचेंगे।”
“नहीं! यह उचित नहीं है।” मैंने कहा। कोई ऐसा रास्ता खोजो कि सब कुछ सरलता-पूर्वक समाप्त हो जाए।”
“यदि यह तुम्हारी आज्ञा है तो मैं ऐसा ही करूँगी। परन्तु अगर तुम आज्ञा दो कि मैं कम से कम तुम्हारे ससुर साहब को ठीक कर सकूँ...? कुछ शर्मिन्दगी का अहसास तो होने दो राज। विश्वास करो मैं उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगी। न ही उनको वास्तविकता का पता चल सकेगा।”
“मैं तुम्हें इस बात की आज्ञा भी इसी शर्त पर दे रहा हूँ कि यह बात सीमा से अधिक न बढ़ने पाए।”
मोहिनी को समझाने-बुझाने के बाद मैंने उठकर मुँह-हाथ धोया फिर नाश्ते के लिये बाहर आ गया जहाँ घर के बाकी लोग भी मौजूद थे। डॉली पिछली रात की घटना के कारण उदास नज़र आ रही थी। उसकी माँ का चेहरा सपाट था, परन्तु मेरे ससुर साहब के चेहरे पर इस समय भी प्रसन्नता के भाव झलक रहे थे।
मोहिनी की एकत्रित की हुई खबरों की रोशनी में मैंने अपने ससुर को गौर से देखा तो न जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह बेहद गहरा आदमी हो। बहरहाल मैंने नाश्ता किया फिर उठकर दोबारा अपने कमरे में आ गया। थोड़ी देर के बाद डॉली भी आ गयी। आते ही उसने फिर मुझसे अखबार वाली खबर के सम्बन्ध में जिरह शुरू कर दी।
“क्या आपने मोहिनी से इस सिलसिले में कोई पूछताछ की है?”
“हाँ!” मैंने झूठ बोला। “उसे इस सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं है।”
“मुझ रह-रहकर मरने वाले के बाल-बच्चों का विचार सता रहा है। न जाने उन बेचारों का क्या होगा?”
“मेरा विचार है कि तुम्हारे डैडी उनकी सहायता अवश्य करेंगे।”
“दौलत से क्या होगा? मरने वाला दोबारा जिन्दा तो नहीं हो सकेगा।”
डॉली अभी तक दु:खी नज़र आ रही थी। मैं सोच रहा था कि अच्छा हुआ मैंने उसे रात की घटना नहीं बतायी, वरना सम्भव था कि मुझसे भी नाराज हो जाती। इसलिए मैंने वार्ता का विषय बदलने के लिये वापस बम्बई चलने का जिक्र छेड़ दिया। डॉली ने वापसी का नाम सुना तो बड़े प्यार से मेरी गर्दन में बाहें डालकर बोली –
“क्या यह नहीं हो सकता राज कि अब हम यहीं रहें?”
“मगर बम्बई के कारोबार का क्या होगा?”
“वहाँ हम अपना कोई दूसरा आदमी देखभाल के लिये भेज देंगे।”
“हो तो सकता है, मगर मैं यहाँ यूँ पड़े रहना भी उचित नहीं समझता।”
“मैं अपने डैडी से इस विषय में बात कर चुकी हूँ।” डॉली ने मेरे और निकट आते हुए कहा। “डैडी का कहना है कि वह आपको यहीं कारोबार करा देंगे। और उनका विचार है कि प्लास्टिक सर्जरी के बाद आपके हाथ की बदसूरती सरलता-पूर्वक दूर हो जाएगी।”
व्यक्तिगत रूप से मेरा भी यही विचार था कि अभी कुछ दिनों डॉली के यहाँ और रुका जाए। इसलिए कि अभी मुझे उस पण्डित से दो-दो हाथ करने थे, जो मेरी मोहिनी को अपना गुलाम बनाना चाहता था। इसलिए मैंने डॉली को खुश करने के लिये कह दिया कि मुझे उसकी बात मंजूर है। परन्तु उसकी शर्त यही होगी कि मेरा कारोबार अलग हो जाये।
डॉली प्रसन्नता से झूमती हुई उठकर बाहर चली गयी। नि:सन्देह वह अपने माता-पिता को मेरे निर्णय से आगाह करने गयी थी।
“हाँ राज! रजनी उसी युवती का नाम है जो पिछले दो वर्ष से तुम्हारे ससुर की बाहें गरम किए हुए हैं। बड़ी ही हसीन और अच्छे जिस्म वाली है। तुम्हारे ससुर साहब के पास आने से पहले एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने रजनी को तुम्हारे ससुर साहब से मिलाया था। बाद में तुम्हारे ससुर साहब ने अपनी बेपनाह दौलत का प्रदर्शन किया तो रजनी पके हुए आम की तरह उनके आगोश में आ गयी। उन्होंने रजनी को छिपे तौर पर यही एक खूबसूरत बंगले में रखा हुआ है, जिसका ज्ञान मजिस्ट्रेट को नहीं है। जिस दिन भी उसे पता चल गया कि तुम्हारे ससुर ने दोस्ती की आड़ में शिकार खेला है, उसी दिन दोनों में ठन जाएगी। उनकी यह दुखती रग ठेकेदार के हाथ लगी गयी
“वैसे यह वास्तविकता है कि रजनी बड़ी जानदार औरत है। सच कहती हूँ राज, यदि तुम भी एक बार देख लो तो मोहित होकर रह जाओ। तुम्हें अपनी कमला तो याद है न। वही जिसने तुम्हारे साथ एक रात गुजारी थी, फिर मेरे कहने पर तुमने उसे चौपाटी पर ले जाकर मार डाला था। तुम्हें कमला बहुत पसन्द थी न। पर यदि तुम रजनी को देख लो तो कमला का हल्का-सा साया भी तुम्हारे निकट नहीं भटक सकता। क्या विचार है राज, मिलोगे रजनी से?”
और कोई अवसर होता तो संभव था मोहिनी की जुबानी रजनी की सुन्दरता की प्रशंसा सुनकर मैं बेचैन हो जाता परन्तु यहाँ मामला डॉली के डैडी का था। मुझे विश्वास था कि डॉली या उसकी माँ को यदि हालात का पता चल जाता तो घर में एक कयामत आ जाती। उनके घर की शांति समाप्त हो जाती। इसलिए मैं कुछ देर तक हालात के नये रुख पर गौर करता रहा, फिर बोला – “मोहिनी! क्या तुम ऐसा चक्कर नहीं चला सकती कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे?”
“तुम कोई बात कहो और मैं न मानूँ, भला यह कैसे सम्भव है। पर मेरी मानो तो कुछ दिनों तक इस चक्कर को और चलने दो। मुझे विश्वास है कि रजनी अधिक दिनों तक तुम्हारे ससुर के साथ नहीं रह सकती। जिस दिन भी उसे तुम्हारे ससुर से अधिक मोटा आसामी मिल गया, वह उसके साथ छूमंतर हो जाएगी।”
“परन्तु इस बीच में तो वह डॉली के पिता से लाखों की रकम हथिया लेगी।” मैंने गंभीरता से कहा।
“तुम्हें इसकी चिन्ता क्यों?” मोहिनी ने शोखी अदा से कहा। “तुम्हारे ससुर ने इतनी सारी दौलत भला कौन सी ईमानदारी पर जमा की है। तुम जो यह ठाट-बाट देख रहे हो, यह सब धोखे और फरेब से बटोरी हुई दौलत का चमत्कार है। यदि रजनी इसमें से कुछ लेती है तो क्या हर्ज है? कभी तुम भी ऐसी आँखों पर पानी की तरह...।”
“उन बातों को छोड़ो...।” मैंने जल्दी से मोहिनी की बात काटकर कहा। “यहाँ मामला डॉली और उसकी माँ का है। मैं चाहता हूँ कि रजनी का काँटा बीच से जितनी जल्दी हो सके निकल जाए।”
“उफ्फ! तुम तो बहुत डरते हो। मैं उस मजिस्ट्रेट को वास्तविकता बता दूँगी। उसके बाद क्या होगा, यह तुम अच्छी तरह से जानते हो। वह खुद ही तुम्हारे ससुर से निपट लेगा।”
“परन्तु इस प्रकार तो बात बढ़ जाने का डर है।”
“इससे भी कोई सरल उपाय बताऊँ?” मोहिनी ने होंठों ही होंठों में मुस्कराते हुए कहा। “तुम रजनी से दोस्ती क्यों नहीं कर लेते? बड़ी जानदार चीज है, फिर मैं ऐसे हालात पैदा कर दूँगी कि वह तुम्हारे ससुर से उकताकर तुम्हारी ओर झुक जाएगी।”
“क्या तुम गंभीरता-पूर्वक इस विषय पर सोचते हुए कोई विकल्प नहीं खोज सकती।” मैंने मोहिनी को शरारत के मूड में पाया तो कड़े स्वर में कहा।
“बस तुम्हारी यही अदा तो मुझे भाती है। इतनी जल्दी बुरा मान गये राज।” मोहिनी ने गंभीरता से कहा। “तुम्हें छेड़ने में बड़ा मजा आता है।”
“यह दिल्लगी की बात नहीं है मोहिनी। बल्कि डॉली की माँ के भविष्य और उनके घर की शांति का प्रश्न है।”
“ठीक है राज!” मोहिनी बोली। “मुझे डॉली और उसकी माँ से हमदर्दी है इसलिए तो मैंने तुम्हारे ससुर का यह भेद तुम्हें बता दिया। यदि तुम चाहो तो मैं रजनी का चक्कर खत्म कर सकती हूँ। परन्तु क्या यह उचित न होगा कि तुम्हारे ससुर को अपने किए कि थोड़ी बहुत सजा भी मिल जाये? इस प्रकार वह भविष्य में अपनी पत्नी को दोबारा धोखा देने की नहीं सोचेंगे।”
“नहीं! यह उचित नहीं है।” मैंने कहा। कोई ऐसा रास्ता खोजो कि सब कुछ सरलता-पूर्वक समाप्त हो जाए।”
“यदि यह तुम्हारी आज्ञा है तो मैं ऐसा ही करूँगी। परन्तु अगर तुम आज्ञा दो कि मैं कम से कम तुम्हारे ससुर साहब को ठीक कर सकूँ...? कुछ शर्मिन्दगी का अहसास तो होने दो राज। विश्वास करो मैं उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगी। न ही उनको वास्तविकता का पता चल सकेगा।”
“मैं तुम्हें इस बात की आज्ञा भी इसी शर्त पर दे रहा हूँ कि यह बात सीमा से अधिक न बढ़ने पाए।”
मोहिनी को समझाने-बुझाने के बाद मैंने उठकर मुँह-हाथ धोया फिर नाश्ते के लिये बाहर आ गया जहाँ घर के बाकी लोग भी मौजूद थे। डॉली पिछली रात की घटना के कारण उदास नज़र आ रही थी। उसकी माँ का चेहरा सपाट था, परन्तु मेरे ससुर साहब के चेहरे पर इस समय भी प्रसन्नता के भाव झलक रहे थे।
मोहिनी की एकत्रित की हुई खबरों की रोशनी में मैंने अपने ससुर को गौर से देखा तो न जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह बेहद गहरा आदमी हो। बहरहाल मैंने नाश्ता किया फिर उठकर दोबारा अपने कमरे में आ गया। थोड़ी देर के बाद डॉली भी आ गयी। आते ही उसने फिर मुझसे अखबार वाली खबर के सम्बन्ध में जिरह शुरू कर दी।
“क्या आपने मोहिनी से इस सिलसिले में कोई पूछताछ की है?”
“हाँ!” मैंने झूठ बोला। “उसे इस सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं है।”
“मुझ रह-रहकर मरने वाले के बाल-बच्चों का विचार सता रहा है। न जाने उन बेचारों का क्या होगा?”
“मेरा विचार है कि तुम्हारे डैडी उनकी सहायता अवश्य करेंगे।”
“दौलत से क्या होगा? मरने वाला दोबारा जिन्दा तो नहीं हो सकेगा।”
डॉली अभी तक दु:खी नज़र आ रही थी। मैं सोच रहा था कि अच्छा हुआ मैंने उसे रात की घटना नहीं बतायी, वरना सम्भव था कि मुझसे भी नाराज हो जाती। इसलिए मैंने वार्ता का विषय बदलने के लिये वापस बम्बई चलने का जिक्र छेड़ दिया। डॉली ने वापसी का नाम सुना तो बड़े प्यार से मेरी गर्दन में बाहें डालकर बोली –
“क्या यह नहीं हो सकता राज कि अब हम यहीं रहें?”
“मगर बम्बई के कारोबार का क्या होगा?”
“वहाँ हम अपना कोई दूसरा आदमी देखभाल के लिये भेज देंगे।”
“हो तो सकता है, मगर मैं यहाँ यूँ पड़े रहना भी उचित नहीं समझता।”
“मैं अपने डैडी से इस विषय में बात कर चुकी हूँ।” डॉली ने मेरे और निकट आते हुए कहा। “डैडी का कहना है कि वह आपको यहीं कारोबार करा देंगे। और उनका विचार है कि प्लास्टिक सर्जरी के बाद आपके हाथ की बदसूरती सरलता-पूर्वक दूर हो जाएगी।”
व्यक्तिगत रूप से मेरा भी यही विचार था कि अभी कुछ दिनों डॉली के यहाँ और रुका जाए। इसलिए कि अभी मुझे उस पण्डित से दो-दो हाथ करने थे, जो मेरी मोहिनी को अपना गुलाम बनाना चाहता था। इसलिए मैंने डॉली को खुश करने के लिये कह दिया कि मुझे उसकी बात मंजूर है। परन्तु उसकी शर्त यही होगी कि मेरा कारोबार अलग हो जाये।
डॉली प्रसन्नता से झूमती हुई उठकर बाहर चली गयी। नि:सन्देह वह अपने माता-पिता को मेरे निर्णय से आगाह करने गयी थी।