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Fantasy मोहिनी

मैंने मोहिनी को टटोलने के ख़्याल से कहा।

“क्या विचार है ?”

“मैं तुम्हारी आँखों में देख रही थी। अपनी आँखों में मुझे कुछ नज़र नहीं आता।” मोहिनी ने उकताए हुए ऊँचे स्वर में उत्तर दिया।

तालियों का शोर थमता ही न था। जिम और जीन भी दाद देने वालों में सम्मिलित थे। इसके बाद सुलेमान ने दो-तीन करतब और दिखाए। उन्होंने अब तक मुझे कोई चैलेंज नहीं किया था, इसलिए मैं अब तक अपनी सीट पर ख़ामोश बैठा पहलू बदल रहा था।

अचानक स्पार्टा ने मुझसे पूछे बिना एक ऐलान कर दिया। वह कह रहा था-

“प्रिय दर्शकों, यहाँ हिन्दुस्तान के एक जादूगर गैबी इल्म के माहिर मिस्टर अमित ठाकुर मौजूद हैं। उन्होंने पहले भी एक बार इस तमाशे में हिस्सा लिया था और अपनी असाधारण शक्तियों से हमें चौंका दिया था।

“मैंने अपने उस्ताद से उनका ज़िक्र किया है। मेरे उस्ताद और मैं, दोनों इस बात के इच्छुक हैं कि वे स्टेज पर तशरीफ लाए और अपने बहुत से करतबों से हमारा मनोरंजन करें।

“मेरे उस्ताद सुलेमान उन्हें चैलेंज का इरादा भी रखते हैं। अगर मिस्टर अमित ठाकुर भी चैलेंज सुनकर ख़ुशी से स्वीकार करें।”

स्पार्टा के इस भाषण के बाद हॉल में चारों तरफ़ निगाहें दौड़ने लगी। जिम और जीन मुझे उकसाने लगे।

“अमित ठाकुर! जाओ, हमें यक़ीन है कि तुम कुछ बातें जो हमारी समझ में नहीं आ रही है, उसे ज़रूर समझाने की कोशिश करोगे।”

मैं हिचकता रहा। जीन विनय करने लगी। अलबत्ता सारा अब संतुष्ट नज़र आ रही थी। स्पार्टा बार-बार मुझे दावत दे रहा था। आख़िर बहुत देर कशमकश के बाद मैं उठा और स्टेज पर जाकर खड़ा हो गया।

मैंने स्पार्टा के हाथ से माइक ले लिया और दर्शकों से संबोधित हुआ-

“मैं जादूगर या गैबी शक्तियों का स्वामी नहीं हूँ। न ही मेरा इरादा इन दो फनकारों से मुक़ाबला करने का है। स्पार्टा की इच्छा थी अख़बारों में किसी मुक़ाबले का ऐलान किया जाए। मैंने इनकार कर दिया था कि मैं कोई पेशेवर जादूगर नहीं हूँ।”

धीरे-धीरे मैंने अपने स्वर में ज़ोर पैदा कर लिया और स्वयं कोई प्रदर्शन दिखाने की बजाय सुलेमान और स्पार्टा से अनुरोध किया कि वे खुद कोई कारनामा दिखाए। अगर उनका कोई तोड़ संभव हुआ तो जवाब देने की कोशिश की जाएगी। साथ ही मैंने मोहिनी को मुस्तैद रहने का संकेत किया।

मेरी बातों का दर्शकों पर अच्छा प्रभाव पड़ा और सब लोगों की आँखें स्टेज पर केंद्रित हो गयी।

सुलेमान ने मेरे भाषण के बाद सिर झुकाते हुए इजाज़त ली फिर एकटक गंभीर होकर मुझे घूरने लगा। उसने अपना पंजा मेरी तरफ़ करके कुछ पढ़ना शुरू कर दिया।

मैं इत्मीनान से खड़ा मुस्कराता रहा। स्टेज से मैंने जीन और सारा पर एक नज़र डाली। जीन की आँखों में हैरत थी और सारा की आँखों में भय झलक रहा था। सारा से नज़र बचाते हुए मैंने जीन को आँख का इशारा किया।

“राज ? संभालो!” मोहिनी ने मुझे चौंका दिया।

मैंने स्टेज की तरफ़ नजर दौड़ाई तो वहाँ धुआँ ही धुआँ नज़र आ रहा था। ऐसा धुआँ जिसमें स्टेज की हर चीज़ साफ़ नज़र आ सके। उस धुएँ से स्टेज पर बिजली की कौंध लपकी और फिर उसी क्षण स्पार्टा दर्शकों की तरफ़ देखकर ऊँचे स्वर में बोला-

“उपस्थित सज्जनों! आपको मालूम है यह कौन है ? यह हब्शी फराओन, तूता खामन का वफ़ादार ग़ुलाम सहवान है। कुछ देर पहले इसकी ममी मिश्र के एक अज्ञात पिरामिड में बेहरकत पड़ी थी। अब मेरे उस्ताद सुलेमान के हुक्म पर ज़िंदा सूरत में मौजूद है। मिस्टर अमित ठाकुर से प्रार्थना करता हूँ कि साहवान को दोबारा उसी तरह मिश्र के अज्ञात पिरामिड के सफ़र में रवाना कर दें।”

“राज! आज्ञा हो तो मैं इस जादूगर को ही ममी बना दूँ।” मोहिनी होंठ चबाते हुए ग़ुस्से से बोली।

“नहीं!” मैंने मोहिनी को मना किया। फिर दर्शकों से संबोधित होकर बोला- “मैं स्पार्टा और सुलेमान के इस फन में महारथ का कायल हूँ। लेकिन किसी ममी से उलझना और उसे यंत्रणा देना उचित नहीं है। ये सदियों से शांति की नींद सो रहे हैं उन्हें यंत्रणा देना मेरे सिद्धांत के विरुद्ध है। मैं क्षमा चाहता हूँ।”

स्पार्टा ने मेरा उत्तर सुनकर बड़े गर्व विजेता की तरह अपना हाथ उठाया तो हॉल तालियों से गूँज उठी।

फिर बूढ़े सुलेमान ने एक कलाबाजी दिखायी और अपना सिर ज़मीन पर पटका। उसकी इस हरकत के साथ ही स्टेज पर पुनः धुआँ फैलने लगा और हब्सी धुएँ में ग़ायब हो गया।

हाल में लोबान की महक दौड़ गयी। दो-तीन रौशनियाँ पहले ही बुझा दी गयीं।

उसके बाद स्पार्टा ने दूसरा करतब दिखाया। इस बार बहुत ही खूबसूरत औरत स्टेज पर प्रकट हुई।

वह सुलेमान के एक अमल से निश्चल हो गयी। सुलेमान ने उस पर तलवार से हमला किया। तलवार ने उस पर कई गंभीर प्रहार किये। एक कोड़ा लेकर उसे बुरी तरह मारा। मगर वह टस से मस न हुई। सुलेमान के संकेत पर दूसरे ही क्षण वह हरकत में आ गयी।

स्पार्टा ने दर्शकों को संबोधित करते हुए मुझे इस बात की दावत दी कि मैं दोबारा उस औरत को पुतले की शक्ल में तब्दील कर दूँ।

मोहिनी ने स्पार्टा का चैलेंज स्वीकार करना चाहा लेकिन मैंने उसे फिर मना कर दिया। मैंने दोबारा क्षमा माँग ली। स्पार्टा के चेहरे पर विजेताओं की चमक-दमक उठी।

हाल में से किसी ने मुझ पर फब्ती कसी।

“अमित ठाकुर, वापस आ जाओ! तुम्हारे बस का रोग नहीं है।”

मैंने देखा सारा तिलमिलाई हुई थी। जिम बुत बना बैठा था और जीन के होंठों पर भय युक्त सी मुस्कराहट थी।

हाल में स्पार्टा को जबरदस्त जादूगर घोषित किया जा रहा था। मोहिनी तैश की हालत में थी। मैंने कल्पना के झरोखे में देखा कि उसकी आँखें खौफनाक हो गयी थीं।

“राज, तुम्हारे दिल में क्या है ? क्या तुम पागल हो गए हो ? तुमने आख़िर सोचा क्या है ? क्या मेरी बात का बुरा मान गए ?”

“फ़िक्र न करो मेरी गुलबदन!” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। “मैं तुम्हें मायूस नहीं करूँगा।”
 
दर्शकों की बेचैनी अब समाप्त सी हो रही थी। बहुत से लोग मुझे कोई पागल समझ रहे थे। स्पार्टा विजय की ख़ुशी में उछल-कूद मचा रहा था। वह अपने दोनों हाथ हवा में लहरा रहा था। यह हंगामा खत्म हुआ तो स्पार्टा ने तीसरा मुक़ाबला शुरू करने का ऐलान किया।

सुलेमान के हाथों में कई खंजर दे दिए गए। उसी वक्त स्पार्टा की आवाज़ गूँजी। “उपस्थित सज्जनों! मैं आपसे विनती करता हूँ कि जब तक हमारा प्रदर्शन समाप्त न हो जाए किसी प्रकार की आवाज़ अपने मुँह से न निकालें। विशेष रूप से महिलाओं से मेरी प्रार्थना है कि वे पूर्ण सहयोग दें।”

जैसे ही स्पार्टा की बात खत्म हुई सुलेमान ने ज़ोर से एक खंजर पर्दे पर मारा। पर्दा चर से फट गया। कदाचित उसका तात्पर्य यह दिखाने का था कि खंजर की धार कितनी तेज है। फिर उसने उसी खंजर का निशाना किया और उसे स्पार्टा के सीने में पेवस्त कर दिया।

स्पार्टा धड़ाम से गिर पड़ा।

सुलेमान ने इसी पर बस नहीं किया और दूसरों खंजरों से एक-एक करके कई वार किये। स्पार्टा का जिस्म लहूलुहान हो गया और उसकी गर्दन एक तरफ़ को लुढ़क गयी।

सुलेमान को जैसे फिर होश आया। वह चीखने-चिल्लाने और दहाड़ने लगा। उसने चीख-चीख कर आसमान सिर पर उठा लिया।

दर्शक स्तब्ध थे।

हॉल में सुई सी नोंक का सा सन्नाटा छा गया।

स्पार्टा का खून स्टेज पर बिखरा हुआ था। उसकी गर्दन लटक गयी थी। फिर सुलेमान ने ताली बजाई। पीछे से तमारा बरामद हुई। स्पार्टा की यह हालत देखकर उसकी चीख निकल गयी और उसने सुलेमान का गिरेबान पकड़ लिया।

बूढ़े जादूगर ने उसे पूरी शक्ति से ढकेल दिया। वह स्पार्टा के बेजान शरीर पर गिर पड़ी। बूढ़ा धीरे-धीरे स्पार्टा के नज़दीक आया और उसे गौर से देखने लगा।

उसने तमारा को इशारा किया कि वह खंजर स्पार्टा के जिस्म से निकाल ले।

तमारा ने बूढ़े के हुक्म की तामील करते हुए एक-एक करके सारे खंजर स्पार्टा के जिस्म से निकालने शुरू कर दिए। जब सारे खंजर निकाले जा चुके तो बूढ़े ने एक लम्बा काला पर्दा स्पार्टा के जिस्म पर डाल दिया। हॉल की रौशनियाँ बुझा दी गईं और बूढ़े की गजबनाक आवाज़ फिजा में गूँजी।

जब वह ख़ामोश हुआ तो हॉल दोबारा रोशन कर दिया गया। स्पार्टा की लाश वैसी की वैसी पड़ी थी।

मैं भी एक कोने में खड़ा हुआ। वह सारा तमाशा देख रहा था। बूढ़े सुलेमान के मुँह से शब्द खत्म होने पर काले पर्दे ने हरकत की और वह ऊपर उठने लगा। एक हाथ ऊँचाई पर जाकर लम्बे पर्दे से ढकी लाश ठहर गयी और उसने मजमे की तरफ़ रुख़ करना शुरू किया।

वह स्टेज से नीचे उतर गयी और लोगों के दरम्यान से गुजरने लगी। औरतों का भय से बुरा हाल हो गया था। लाश वहाँ से गुजरती हुई दोबारा स्टेज पर आई और ज़मीन पर टिक गयी।

सुलेमान ने तमारा को संकेत किया कि वह पर्दा हटा दे। तमारा ने झिझकते-झिझकते पर्दा हटा दिया।

स्पार्टा सही सलामत मौजूद था। वह एक अंगड़ाई लेकर उठा और उसने दर्शकों की तरफ़ दृष्टि डाली। हॉल में एक शोर शराबा हो गया था।

लगभग पाँच मिनट तक तालियाँ बजाते और शोर मचाते रहे- फिर दर्शक शांत हुए तो स्पार्टा ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा।

“यह मेरे उस्ताद के असाधारण करिश्मों में से एक था। इसके बाद मैं अमित ठाकुर से कोई प्रार्थना नहीं करूँगा। वे हमारे मेहमान हैं इसलिए मैं उन्हें शर्मिंदा नहीं करना चाहता। हाँ, अगर वे अपने तौर पर, अपनी इच्छा से कोई प्रदर्शन करें तो मुझे बहुत खुशी होगी।”

“राज!” मोहिनी क्रोधित स्वर में बोली। “यह दो टके का मदारी तुम्हारा अपमान कर रहा है और तुम चुप खड़े हो।”

मैं मोहिनी की बात सुनकर गंभीरता से आगे बढ़ा और दर्शकों को संबोधित करके कहा-

“उपस्थित सज्जनों! आपने स्पार्टा और उसके उस्ताद सुलेमान के आश्चर्यजनक करिश्में देखे। मैं इन करिश्मों के बारे में कुछ कहना नहीं चाहता। सुलेमान ने जो प्रदर्शन किया है वह सराहनीय है। मिस्टर स्पार्टा ने मुझे शर्मिंदगी से बचाने के लिए जो शब्द कहे हैं मैं उसे स्वीकार करता हूँ। मैंने आपकी दिलचस्पी देख लिए। यह कमाल है इसलिए अब मुझे भी कुछ करना चाहिए।

फिर मैंने स्टेज से जीन को संबोधित किया। “क्यों जीन, अब कुछ हो जाए ?”

“हाँ, हाँ अमित ठाकुर! शुरू कर दो।” जीन की बजाय जिम ने कहा।

सारा के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला था। मोहिनी मेरा संकेत पाकर पहले ही रेंग चुकी थी। मैंने उपस्थित समूह की तरफ़ देखकर कहा।

“मैं प्रार्थना करता हूँ कि कोई महिला स्टेज पर तशरीफ लाए ताकि मैं मिस्टर स्पार्टा के चैलेंज का जवाब दे सकूँ। मैं उस आदरणीय महिला को पूरी सुरक्षा की गारंटी देता हूँ।”

कुछ क्षणों तक किसी महिला ने अपने सीट से उठने का साहस नहीं किया। स्पार्टा के अंतिम दर्शन ने महिलाओं को बुरी तरह भयभीत कर दिया था। शायद उनमें से कोई ख़तरा मोल लेना नहीं चाहती थी।

कुछ देर तक हॉल में सन्नाटा छाया रहा। फिर मैंने स्वयं एक दुबली-पतली लड़की को संकेत किया। वह शर्माने लगी लेकिन मेरे अनुरोध से स्टेज पर आ गयी। दर्शकों ने उस लड़की का साहस देखकर तालियाँ बजाई।

उसका नाम सोजी था।

मैंने प्रेम भरी नज़रों से उसे देखा और उसकी पीठ ठोक कर उसका साहस बढ़ाया। सोजी के स्टेज पर आने के बाद मैं किसी माहिर बाजीगर की तरह उछल-कूद करता रहा और अपने हाथ-पैर फेंकता रहा।

मैंने हिन्दुस्तानी तांत्रिकों के अंदाज़ में ऊल-जलूल हरकतें करनी शुरू कर दीं जिसका मुझे गहरा अनुभव था। फिर मैंने जिम और सारा की तरफ देखा और पूछा।

“इजाज़त है ? ठीक है!” मैंने कहा और सोजी को संबोधित किया। “तुम जान गयी हो कि मैं कौन हूँ। मैं अमित ठाकुर हूँ। मैं तुम्हें हुक्म देता हूँ कि सच्चे दिल से मोहिनी देवी का नाम लो और आगे बढ़कर इस घायल स्पार्टा को अपनी उँगली पर उड़ाने की कोशिश करो।”

दुबली-पतली सोजी असाधारण तेजी से आगे बढ़ी। स्पार्टा व्यंग्यपूर्ण खड़ा मुस्कुरा रहा था लेकिन उस वक्त वह भी दंग रह गया जब सोजी ने उसे अपने एक हाथ से उठाकर हवा में सिर से ऊँचा उछाल दिया और जब वह गिरने लगा तो उसे एक उँगली पर संभाल लिया।

लड़की का हाथ ऊँचा उठा था और स्पार्टा उसकी उँगली पर हवा में ठहरा हुआ था।
 
हजूम को साँप सूंघ गया था। सबकी आँखें हैरत से फटी की फटी रह गयी। ऐसा अजूबा करिश्मा उन्होंने आज तक न देखा था, न सुना था। लड़की के ऊँचे उठे हाथ की सिर्फ़ एक उँगली पर भीमकाय स्पार्टा चारों खाने चित्त पड़ा हुआ था।

मैंने सुलेमान को संबोधित किया।

“उस्ताद महोदय! क्या आप इस लड़की की तरह मुझे या स्पार्टा को अपनी उँगली पर उठाने की जहमत गंवारा करेंगे ?”

“यह फन का कमाल है। मैं तुम्हें दाद देता हूँ।” उसने खूबसूरती से मुझे टाल दिया। जीन, सारा और जिम उछल-उछलकर मुझे मुबारकबाद दे रहे थे। जीन की आँखें आश्चर्य से फटी हुई थी। सारे हॉल में सनसनी दौड़ गयी।

“मिस्टर स्पार्टा!” मैंने उसे संबोधित किया। “क्या तुम इतने मजबूर हो गए हो कि एक कमज़ोर लड़की की उँगली से नीचे नहीं आ सकते ?”

स्पार्टा बुरी तरह मचल रहा था। लेकिन वह उस मज़बूत उँगली से छुटकारा पाने में असमर्थ था।

उसका उस्ताद सुलेमान भी परेशान था। स्पार्टा बेहद भयभीत था। किंतु फिर भी हार स्वीकार करने को तैयार नज़र नहीं आ रहा था। मैंने सुलेमान को दोबारा ललकारा। वह लड़की सोजी इस तरह खड़ी थी जैसे उसकी उँगली पर खिलौना हो।

धीरे-धीरे हॉल में सरगोशियाँ उभरने लगीं। फिर कहकहे। लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो रहा था।

इस हंगामे से मुझे बहुत आनंद महसूस हो रहा था। मैं अपनी हँसी न रोक सका। सुलेमान और उसके पूरे दल पर स्तब्धता छाई थी। स्पार्टा जब खूब उछल-कूद मचा चुका तो मैंने सुलेमान की तरफ़ देखा।

“क्या ख़्याल है ?” मैंने पूछा।

सुलेमान ने मुझे संकेत किया और मैंने लड़की को हुक्म दिया। “अच्छी लड़की, प्यारी सोजी! तुम थक तो नहीं गयी ?”

“नहीं, मैं इसे सारे हॉल में घुमा सकती हूँ। इसमें वज़न ही कितना है। एक हल्के फूल जैसा।” सोजी ने उत्तर दिया।

“तो फिर जरा अपनी शक्ति तो दिखाओ।”

सोजी अपनी उँगली पर स्पार्टा को टाँगें हुए बड़े आराम से स्टेज की सीढ़ियों से नीचे उतरी और हॉल का एक चक्कर लगाकर वापस आ गयी। वह एक दिलचस्प तफरीह साबित हुई। लोगों ने अपनी सीटों से खड़े होकर स्पार्टा से दिल्लगी की जो नीचे उतरने की कोशिश में अब भी अपने हाथ-पैर फेंक रहा था।

“अच्छा, अब इसे नीचे उतार दो! बेचारा थक गया होगा।” मैंने कहा।

लड़की ने एक झटके से स्पार्टा को ज़मीन पर पटक दिया। वह एक चीख मारकर उठा और मेरे पास आकर मेरी पीठ ठोंकने लगा।

मोहिनी वापिस मेरे सिर पर आ गयी थी और हॉल में तालियों की कर्णभेदी गड़गड़ाहट गूँज रही थी।

“लेडिज एन्ड जेंटिलमैन!” मैं स्टेज के मध्य आकर बोला- “उस्ताद सुलेमान और उनके शागिर्द के दिलों की भड़ास शायद न निकली हो। अभी तो मैं भी स्वयं इस तमाशे से कुछ अधिक संतुष्ट नहीं हूँ। मैं सुलेमान जैसे बड़े उस्ताद को एक क्षण में अपने आदेश के पालन पर मजबूर कर सकता हूँ। मेरा ख़्याल है कि उसके बाद इस शो की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी।”

“यह असंभव है ?” स्पार्टा चीखा। “उस्ताद सुलेमान जबरदस्त शक्तियों के स्वामी हैं।”

“इन्हें यक़ीनन नाकामी होगी।” सुलेमान ने मेरी तरफ़ संकेत करते हुए कहा। “मैं इन्हें इसकी आज्ञा देता हूँ।”

मैंने चुटकी बजायी- “मैं सेकेंडों की देर नहीं लूँगा।”

मेरे यह कहते ही मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी और देखते ही देखते उस्ताद सुलेमान स्वयं सम्मोहित सी स्थिति में हो गया और गर्दन झुकाकर मेरे सामने खड़ा हो गया।

स्पार्टा आश्चर्य में मेरा मुँह ताकने लगा।

जब मोहिनी किसी के सिर पर चली जाए तो क्या होगा। मैंने जो चाहा वह सुलेमान से करवाया। उसका बड़ा अपमान हुआ।
 
मैंने उसे स्टेज पर मुर्गा बना दिया। स्पार्टा के गाल पर तमाचे जड़वाए। मैंने उसके शागिर्द के मुँह पर थूकने के लिए उसे मजबूर कर दिया। मैंने उसे कुत्ते की तरह भौंकने का आदेश दिया। वह अलग-अलग मुद्राओं में कुत्तों की हरकतें करता हुआ स्टेज पर भौंकता फिरता रहा। फिर वह बिल्ली की तरह म्याऊँ-म्याऊँ बोला। उसने ऊपरी वस्त्र उतार दिए। मेरे संकेत पर जोर-ज़ोर से रोने लगा।

उस रात क्या-क्या न हुआ। कमबख्त स्पार्टा मुझे कई बार परेशान कर चुका था। उसे कर्जा तो चुकाना ही था। जीन बुरी तरह प्रभावित हो गयी थी।

मैंने सुलेमान को हुक्म दिया कि वह उसके पैरों में पड़कर माफ़ी माँगे और यह स्वीकार करें कि उसने हार स्वीकार कर ली है।

बूढ़ा सुलेमान जीन के क़दमों में जाकर झुक गया और गिड़गिड़ाकर माफ़ी माँगने लगा।

जब वह स्टेज पर वापस पहुँचा तो मैं नीचे उतर आया। उसी वक्त पर्दा गिरा दिया गया। दर्शक तालियाँ बजाते और शोर मचाते हुए उठे।

मेरे गिर्द तमाम लोगों का जमघट लग गया। मैं बड़ी मुश्किल से रास्ता बनाते हुए वहाँ से निकला। जीन ने मजबूती से मेरा बाज़ू पकड़ लिया था। सारा की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। हम लोग जब बाहर आए तो ऑटोग्राफ का सिलसिला शुरू हो गया।

जिम मुझे तुरंत गाड़ी में ले गया। मुझे याद है कि उस वक्त एक हिन्दुस्तान नौजवान मसूद मेरे पास आया था। मैंने उसे जल्दी में अपने होटल का पता दिया था। बड़ी मुश्किल से हमारी गाड़ी वहाँ से खिसकी।

हम लोग सारा के घर की तरफ़ रवाना हो गये। रास्ते भर जीन मेरी शक्ल देखती रही जैसे मैं कोई अजूबा हूँ।
 
हम लोग सारा के घर की तरफ़ रवाना हो गये। रास्ते भर जीन मेरी शक्ल देखती रही जैसे मैं कोई अजूबा हूँ।

मैं यही चाहता था। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। जीन को मोहिनी के जरिए प्राप्त किया जा सकता था मगर इसमें कोई मज़ा नहीं था। क्योंकि ऐसी सूरत में हमेशा ऐसा मालूम होता था जैसे किसी सोई हुई लड़की से सपने में बातें हो रही हों या बेहोश लड़की दीवानगी में हरकतें कर ही हो।

वह लुफ्त जो होश में था, वह मदहोश में कहाँ।

दुर्भाग्य से सारा और जिम की उपस्थिति में इस शोला बदन जीन से कोई बातचीत नहीं हो पा रही थी। मेरा मन उससे दिल की दो बातें करने के लिए मचला जा रहा था।

सारा के घर मैंने हल्का सा डिनर किया और जल्दी ही लंदन के अमीरों के क्लब की तरफ़ रवाना हो गए।

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हाँ तो मैं लंदन की बातों में यह सिलसिला शुरू करता हूँ।

ग्रेट ब्रिटेन का सबसे खूबसूरत शहर लंदनजिसके बीचोंबीच टेम्स बहती है और रातें बड़ी खूबसूरत होती है।

उसी शहर में मोहिनी मेरे साथ थी। और जब मोहिनी मेरे साथ थी तो दुनिया की हर ऐशो आराम मेरे पास थी।

अपनी हंगामा भरी ज़िंदगी के कर्बनाक दिनों की याद बेवक़ूफ़ी थी। माजी हर इंसान के दिमाग़ की तहों में गड्ड-मड्ड होता रहता है। लेकिन जिसका माजी बहुत बुरा दर्दनाक और दहशतअंगेज होता है उसे चाहिए कि वह माजी को भूल जाए। अन्यथा एक तड़पे उसका सारी ज़िंदगी पीछा करती रहेगी। वह उम्र से पहले ही थक जाएगा और जज्बाती भँवर उसे अपने शिकंजे से बाहर न निकलने देगा।

मैंने ज़िंदगी में बहुत से लोग देखे हैं लेकिन अपने से बुरा अतीत किसी का न पाया। उस अतीत से पीछा छुड़ाने के लिए ही मैं लंदन चला आया था।

हंगामों से मैं थक गया था। लेकिन यह बात तो मुझे बहुत वक्त गुजरने के बाद मालूम चली कि जहाँ मोहिनी होगी, वहाँ हंगामें होंगे। और मेरी मजबूरी देखिए कि इस हंगामा फितना से मोहब्बत करता था।

उस छिपकली से, उस जहरीली से जो इंसानी लहू पीती थी। जो अदृश्य थी, जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता था। वह मेरी बैसाखी बनकर रह गयी थी। जब मोहिनी मेरे पास न होती तो मैं अपने को खाली-खाली महसूस करता था। जैसे वह मेरे शरीर का ही कोई हिस्सा हो। मेरे रगों में गर्दिश करने वाले लहू की गर्मी हो।

किन्हीं आवारा लम्हों में दिल में यह ख़्याल भी आता कि क्या कभी इस मोहिनी को मैं सशरीर प्राप्त नहीं कर सकता था। हमारे बीच यूं ही जन्म-जन्मांतर का फासला बना रहेगा।

एक बार मैं इस बारे में खुद मोहिनी से ही पूछ रहा था। किंतु उसका उत्तर हमेशा यही होता था कि यह ख़्याल मैं दिल से निकाल दूँ क्योंकि उसका कोई शरीर है ही नहीं।

लंदन से वापसी के लिए मैंने टिकट बुक करा ली थी। और मैं चाहता था कि जितने दिन बचे हैं मस्ती से काट लूँ। उसके बाद तो हिन्दुस्तान की सरजमीं पर कदम रखते ही मेरे सामने ख़तरे ही ख़तरे होंगे।

दो मौसम बीत चुके हैं और कल्पना ने सपने में आकर सूचना दे दी थी कि अब वह वक्त आ गया है जब हरि आनन्द से मैं बदला ले सकूँ। हरि आनन्द की याद आते ही मैं लंदन की सारी मस्ती भूल गया था।

तुर्की के जादूगर को सबक़ सिखाने के बाद मैंने सारा के घर डिनर किया था और फिर सारा को घर पर ही छोड़कर लंदन के अमीरों के क्लब की ओर रवाना हो गया। उस वक्त भी जीन मेरे मस्तिष्क में अंधड़ चला रही थी।

जीन वह लड़की थी जिसे जासूस जिम ने मेरे सामने पेश किया था।

मोहिनी मुझे देख-देखकर मुस्कुरा रही थी। वह मेरे सिर पर बालों के बिछौने में आलती-पालती मारी बैठी थी।

“राज, कभी-कभी मुझे बड़ी रकाबत महसूस होती है।”

मोहिनी ने मुझे टहोका दिया।

उसकी आवाज़ सिर्फ़ मैं ही सुन सकता था और दिल ही दिल में उससे बिना मुँह से शब्द निकाले बातें भी कर लिया करता था।

“कैसी रकाबत मोहिनी ?” मैंने आश्चर्य से पूछा।

“यह लड़कियाँ जो तुम्हारे इर्द-गिर्द मँडराती हैं और मेरे ही सामने तुम उनसे झूठी मोहब्बत का स्वाँग भरते हो।”

“तो तुम्हें जलन क्यों होती है ?”

“कसम से राज, तुम्हारा ख़्याल न होता तो मार डालती एक-एक को।”

“अंग्रेज़ों का खून कैसा लगता है ?”

“खून तो सब इंसानों का एक जैसा ही होता है। लेकिन गुदाज जिस्म वाली लड़कियों के खून में मज़ा ही कुछ और होता है। जहाँ तुम जा रहे हो, वहाँ तो बस...।”

“मोहिनी, जीन के बारे में कुछ बताओगी मुझे ?”

“हाँ राज, मैं तुम्हें यह सलाह देने वाली थी। तुम इस लड़की जीन के चक्कर में मत पड़ो। और वह जासूस जिम, मुझे वह आदमी भी पसंद नहीं।”

“वह क्यों भला ?”

“मैं जो भी कहती हूँ तुम्हारी भलाई के लिए कहती हूँ। यह लोग तुम से एक बड़ा ही ख़तरनाक काम लेना चाहते हैं। तुम्हारा उस पचड़े में पड़ना ठीक नहीं।”

“इसका थोड़ा-बहुत आभास तो मुझे जिम की बातों से हो गया था। वह किसी देश के ख़िलाफ़ मुझसे जासूसी करवाना चाहता है, यही न ? उसने कुछ कागजातों का भी हवाला दिया था। यही बात है न मोहिनी ?”

मोहिनी ने तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया अलबत्ता वह उठ खड़ी हुई और मेरे सिर पर चहल-कदमी करने लगी। ऐसा वह तभी करती थी जब वह किसी मसले पर गंभीरता से सोचती थी।

“नहीं राज, यह कुछ और ही मामला मालूम पड़ता है। जीन एक प्रोफ़ेसर की बेटी है और उसका पिता पाँच साल से लापता है। जिम को स्कार्ट लैंड यार्ड की पुलिस ने उसके पिता की खोजबीन पर नियुक्त किया था किंतु जिम असफल रहा।

वह केवल इतनी ही रिपोर्ट रखता है कि जीन का पिता आख़िरी बार काहिरा में देखा गया था। और जो व्यक्ति उन दिनों उनके साथ था वह किसी पागलखाने में पड़ा है। उससे पूछपाछ की बहुतेरी कोशिशें की जा चुकी है लेकिन वह पागल गूँगा-बहरा हो गया है। यही वह मसला है जिसे तुम्हारी जरिए सुलझाना चाहता है।”

“क्या जीन का पिता कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति है ?”

“हाँ, यूँ ही समझो!”

“और इन लोगों का ख़्याल होगा कि उनके किसी दुश्मन देश के जासूसों ने प्रोफ़ेसर का अपहरण कर लिया।”

“ऐसी ही बात है। जिम तुम्हारी मदद से एक आख़िरी बार कोशिश करना चाहता है और जीन को ख़ुश करके बहुत कुछ हासिल करने के सपने संजोए बैठा है।”

“क्या मतलब ?”
 
“जीन ने फ़ैसला किया है कि जब तक उसके पिता का पता नहीं चल जाता, न तो वह किसी से शादी करेगी और न किसी के इश्क़ में गिरफ़्तार होगी। इसलिए कहती हूँ कि उसका ख़्याल अपने दिमाग़ से निकाल दो।”

“तुम्हारे होते हुए भी ?”

“राज! मैं तुम्हारे दिल की बात समझती हूँ। तुम आज कल लड़कियों के मामले में मेरा सहयोग कब पा रहे हो। उससे तुम्हें जीन का शरीर तो प्राप्त हो जाएगा परंतु जीन का दिल तो न जीत सकोगे।

“जिम खुद उसे प्राप्त करना चाहता है क्योंकि उसके साथ अथाह दौलत भी हासिल हो सकती है। प्रोफ़ेसर की सारी सम्पत्ति उसकी इकलौती लड़की जीन को ही मिलेगी। खुद जीन का यही फ़ैसला है। उसके अलावा जिम को शोहरत अलग मिलेगी।”

“लेकिन मोहिनी, अगर यह काम मेरी मदद से होगा तो जीन तो मेरी ही होगी, न की जिम की।”

“जिम का ख़्याल है कि तुम इस मामले में उसके आड़े न आओगे और शायद हिन्दुस्तानी होने की वजह से जीन तुमसे प्रभावित न हो।”

“हूँ, तो यह बात है!”

“हाँ राज, यही बात है!” मोहिनी गंभीरता से बोली। “बोरिया बिस्तर समेटो और वापस हिन्दुस्तान चलो। वहाँ अभी तुम्हारे बहुत से काम बाकी हैं। इस चक्कर में पड़ गए तो महीनों लग जाएँगे।”

“ठीक है मोहिनी! तुम ठीक कहती हो। आख़िर मैं हरि आनन्द को कैसे भूल जाता हूँ। वह मेरे अतीत का नासूर है। लेकिन जीन भी मेरे हलक में काँटा बनकर खटकती रहेगी।”

मोहिनी से मैंने फिर कोई बात नहीं की।

लंदन के अमीरों का क्लब आ गया था। टैक्सी से उतरकर मैं सीधा क्लब में दाख़िल हुआ। हमेशा की तरह वहाँ मेरा स्वागत हुआ।

आरमा वहाँ थी और दूसरी बहुत सी सुंदरियाँ थीं जिनके तंग घेरे में मैं बैठा रहा परंतु उनमें से एक भी ऐसी नहीं थी जो जीन जैसी हो। जो चमक मैंने जीन के चेहरे पर देखी थी, वह उनमें से किसी के भी चेहरे पर नहीं थी।

मेरा दिल जल्दी ही वहाँ उकता गया और आरमा से तबियत ख़राब होने का बहाना करके मैं लौट आया।

होटल में आकर देर रात गए मुझे नींद नहीं आई। जबकि नन्हीं मोहिनी हाथों का तकिया बनाए बायीं करवट सो गयी थी। उसके धीमे-धीमे खर्राटे मेरे कानों में ताल-लय के साथ बजते रहें।

दूसरी सुबह जीन मुझसे होटल मिलने आई तो उसे देखकर एक हौल सा उठने लगा। वह गुलाब के ताज़ा फूल की तरह थी। परंतु उदासी की कोई पर्त ज़रूर उसके दिल में छिपी रहती थी। यह अलग बात थी कि उसका चेहरा ऐसा था कि उदासी उसकी ज़िंदगी में दूर-दूर तक नज़र नहीं आती थी।

जीन के साथ एक अधेड़ व्यक्ति भी था जो मेरे लिए कतई अजनबी था।

“यह डॉक्टर कीट सैमुअल है।” जीन ने उस व्यक्ति का परिचय कराया। “केलिफोर्निया में रहते हैं और वहाँ डॉक्टर कीट हड्डियों के सबसे बड़े विशेषज्ञ माने जाते हैं और डॉक्टर अंकल, यह मेरे दोस्त अमित ठाकुर हैं जिनके बारे में मैं आपको बहुत कुछ बता चुकी हूँ।”

मैंने जीन और डॉक्टर कीट दोनों का स्वागत किया। औपचारिक बातें होती रहीं। फिर जीन मुख्य विषय पर लौट आई।

“अमित ठाकुर, मैंने आपके हाथ के सिलसिले में कल ही इनसे बात की थी। एक सप्ताह के लिए डॉक्टर सैमुअल लंदन में ठहरे हुए हैं। इन्हें एक केस अटेंड करना है। कोई मेजर ऑपरेशन है। मैं चाहती हूँ कि एक बार आप अपना हाथ इन्हें चेक करा दो।”

मोहिनी अंगड़ाई लेकर जाग चुकी थी और डॉक्टर कीट का जायजा ले रही थी।

“हाथ का मामला मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा मिस जीन।”

लेकिन एक बार तो डॉक्टर अंकल को अवसर दीजिए। डॉक्टर सैमुअल मुझे अपनी बेटी के समान समझते हैं। यूँ बहुत व्यस्त ज़िंदगी है इनकी लेकिन व्यस्त ज़िंदगी के सामने मेरी पेशकश भी कम महत्व नहीं रखती।” जीन ने आग्रह किया।

“ओ जीन!” अब डॉक्टर बोला। “यह सब कुछ तुम मुझ पर छोड़ दो और मिस्टर कुँवर अमित ठाकुर। आपको भी इतनी जल्दी निराश नहीं होना चाहिए। आज विज्ञान इतना अधिक तरक्की कर चुका है कि इंसान नक़ली हाथ-पैर से भी काम कर सकता है।

“आपका तो सिर्फ़ एक हाथ का मसला है जबकि मैंने ऐसे ऑपरेशन भी किए हैं जिनके चारों हाथ-पैर जाते रहे थे। वे लोग आज चल फिर सकते हैं और हाथों से काम भी करते हैं।”

“राज! यह आदमी कोई छोटा-मोटा डॉक्टर नहीं है। इसके हैसियत के विशेषज्ञ दुनिया में इने-गिने ही हैं। इसे एक अवसर दो। जीन तुम्हारे लिए बहुत अच्छा अवसर लेकर आई है।” मोहिनी की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।

“लेकिन मोहिनी हमें वापस भी जाना है। हमारी सीट बुक हो चुकी है।” मैंने दिल ही दिल में मोहिनी से कहा।

“उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। चेक करने में देर कितनी लगती है। डॉक्टर सैमुअल चौबीस घंटों में तुम्हें अपनी रिपोर्ट दे देगा। उसके बाद ऑपरेशन की डेट हम एक-दो माह बाद की रख लेंगे।”

“लेकिन मोहिनी क्या हम एक-दो माह बाद यहाँ लौट सकेंगे ?”

“तुम कभी-कभी बहुत घटिया बातें कर जाते हो राज। जब मोहिनी तुम्हारे साथ है तो तुम दुनिया के कोने से कोने में कब नहीं पहुँच सकते और अगर न भी जाना चाहो, तो यह डॉक्टर का बच्चा खुद तुम्हारे क़दमों में दौड़ा चला आएगा।”

मोहिनी के चेहरे पर नाराज़गी के भाव देखकर मैंने अपने आपको संभाला।

जीन मुझसे कह रही थी- “आज ही आप डॉक्टर अंकल को वक्त क्यों नहीं दे देते ?”

“तुम कहती हो जीन तो मैं तैयार हूँ।”

जीन के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी।

“तो फिर अभी तैयार हो चलो। एक घंटे के भीतर-भीतर मैं तुम्हें फ्री कर दूँगी और शाम तक रिपोर्ट भी मिल जाएगी। क्यों अंकल ?”

“हाँ, इतना वक्त काफ़ी है!”

मैं उनको जलपान करवाने डायनिंग हॉल में ले आया। और उनके साथ चल पड़ा।

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बीच में दो दिन बाकी रह गए थे और मैं वापसी के लिए आवश्यक तैयारियों में लग गया था।

सारा मेरी अनुपस्थिति में ही होटल आ गयी थी और मैं जीन के साथ लंदन के सबसे शानदार बाजार सिकैडसी से घूम-फिरकर वापस लौटा तो सारा होटल में मेरा इंतज़ार कर रही थी।

वह उदासी को एक तस्वीर बना बैठी थी। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। फिर नाराज़गी भरे अंदाज़ में बोली-

“दिन भर कहाँ रहे अमित ? देखो, मैं कितनी देर से तुम्हारा यहाँ इंतज़ार कर रही हूँ।”

“यह शहर बहुत बड़ा है सारा। महीनों तक भी नहीं घूमा जा सकता। लेकिन आने से पहले कम से कम फ़ोन तो कर दिया होता।”

“फ़ोन किया तो था लेकिन तुम तो सवेरे से ही...।”

“आख़िर मेरे लिए इतनी बेकरारी क्यों सारा ? मैं तो तुम्हारे शहर में बस दो दिन का मेहमान हूँ। फिर मैं न जाने कहाँ हूँगा, जाने फिर कभी मिलें या न मिलें।”

“अमित, ऐसी दिल तोड़ने वाली बातें क्यों करते हो ? मैंने तो फ़ैसला किया है कि तुम्हारे साथ ही चलूँगी। चंद दिनों में अपनी सारी जागीर बेचकर जहाँ तुम रहोगे, वहाँ रहूँगी। चंद दिन हुए मैं भटक रही थी। तब तुम्हीं ने मुझे रास्ता दिखाया था और अब खुद ही मुझे भटकने के लिए छोड़े जा रहे हो। ऐसा क्यों अमित ? ऐसी भी क्या बेरुखी ?” सारा के नेत्र डबडबा आए।

“सारा!” मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखते हुए कहा। मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ कि मेरी अपनी भी कुछ विशेषताएँ हैं। मैं तुम्हारे हरे-भरे संसार में आग नहीं लगाना चाहता।

“हाँ सारा, मैं एक जीता-जागता आग हूँ। जिस पर भी मेरा साया पड़ा वह झुलस गया। जिस चमन का तुम खुशनुमा फूल हो वहाँ तुम्हें बहुत से बागबां मिल जाएँगे जो तुम्हारी राहों में सितारें बिछा देंगे और मैं तुम्हारे अंदर वह आत्मविश्वास भरकर जाना चाहता हूँ कि तुम कभी रास्ता न भटको।”

देर तक मैं सारा को समझाता रहा।

मैं उसे क्या बताता कि हिन्दुस्तान में किस तरह के ख़तरे मेरा इंतज़ार कर रही हैं। मैंने अपनी ज़िंदगी में आग लगती देखी थी जिसके धुएँ में मैं आज तक घुट रहा था।

डॉली और माला की कर्णनाक यादों से मेरा सीना छलनी हो रहा था। जब तक हरि आनन्द और उसके गिरोह के लोग ज़िंदा थे, मेरी ज़िंदगी बेमानी थी। उन लोगों के हाथ लम्बे थे और मैं अकेला था। बस यह छिपकली मेरे साथ थी।

लेकिन मोहिनी भी आनी-जानी चीज़ थी। कई बार उसने मुझ पर जुल्म ढाए थे। मेरा एक हाथ भी उसने तोड़ा था। एक बार उनसे मेरी आँख की रोशनी भी अपने नोकीले पंजों से छीनी थी। और मोहिनी उसकी ग़ुलाम हो जाती थी जो उसे जाप करके प्राप्त कर लेता था।

अपने मठ में छिपकर हरि आनन्द ने भी मोहिनी का जाप किया था और मोहिनी को मुझसे छीन लिया था। फिर उसने मुझ पर बड़े जुल्म ढाए थे। वह मेरी हस्ती ही मिटा देता अगर साधु जगदेव और कल्पना ने मेरी मदद न की होती।

कल्पना भी मेरे लिए एक रहस्यमय नारी थी। कभी मैं सोचता यह जगदेव का ही कोई रूप है या कुलवंत ने मेरी सहायता के लिए वह रूप धरा है परंतु कुलवंत ने इसे स्वीकार नहीं किया था और न ही मोहिनी उसके बारे में मुझे कुछ बता पाई थी।

एक बार फिर वह हंगामे मेरे सामने आने वाले थे। मेरी दोनों पत्नियों का हत्यारा जीवित था और खुला घूम रहा था। दो मौसमों तक काली ने उसे शरण दी हुई थी और उसका मैं कुछ न बिगाड़ सकता था। परंतु अब वह वक्त बीत चुका था।

बड़ी मुश्किल से मैंने सारा को समझा-बुझाकर रुखसत किया तो जीन का फ़ोन आया। जीन ने मुझे शुभ समाचार दिया था कि मेरा हाथ ठीक हो सकता है लेकिन उसके लिए मुझे दो माह तक अस्पताल में रहना पड़ेगा।

जीन चाहती थी कि मैं कैलिफोर्निया चला जाऊँ, डॉक्टर सैमुअल के साथ लेकिन मैंने सोचने का वक्त माँग लिया।

“मैंने कहा था न राज, डॉक्टर सैमुअल क़ाबिल आदमी है।” मोहिनी ने खिली हुई धूप की तरह मुस्कराते हुए कहा।

“हाथ अगर ठीक हो भी गया तो मेरी ज़िंदगी में क्या फ़र्क़ आ जाएगा मोहिनी ?”

“यह हाथ मेरी एक ग़लती से गया था राज और मैं भी इसे ठीक करने में लाचार हो गयी थी।”

“लेकिन मैंने तुम्हारी इस ग़लती को तो कभी का क्षमा कर दिया। खैर, यह सब हम बाद में देखेंगे। जीन मेरे लिए बहुत भाग-दौड़ कर रही है। कहीं ऐसा न हो कि बाद में मुझे भी उसके लिए भाग-दौड़ करनी पड़े।

“हम अब यूँ करेंगे कि फ़ौरन ही हरि आनन्द और उसके साथियों के साये से अपने मुल्क की धरती को पाक-साफ़ करके फिर सारी दुनिया घूमने निकल चलेंगे।”

“सारा और जीन जैसी लड़कियाँ मेरे साथ होंगी। उसके बाद अगर तुम मुझे जहन्नुम में भी जाने के लिए कहोगी तो इनकार नहीं करूँगा।”

मोहिनी मुझसे सहमत थी।

दो दिन किसी तरह बीते और फिर मैंने अचानक ही लंदन छोड़ दिया।

सिर्फ़ सारा ही जानती थी कि मैं लंदन से कहाँ गया हूँ और जीन के नाम मैंने एक खत छोड़ दिया था।

मैं अपने वतन वापस लौट रहा था और हवाई जहाज़ अंधेरी रात का सीना चीरते हुए पूरब की ओर बढ़ रहा था।

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बम्बई में शांताक्रुज इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर उतरते ही मैंने राहत की साँस ली। मैं कस्टम से बाहर निकला तो मेरी कोई मंजिल नहीं थी। एक अरसा बीत चुका था बम्बई छोड़े। बम्बई उतरते ही मुझे पुराने चेहरों की याद आई। सोचा मैसूर की पहाड़ियों में जाकर पहले कुलवंत से मिल लिया जाए लेकिन मेरे लिए यह जानना भी आवश्यक था कि हरि आनन्द इन दिनों कहाँ है और क्या कर रहा है ?

मोहिनी मेरे लिए ऐसी जानकारी जुटाने के लिए काफ़ी थी। मोहिनी ने मुझे बताया कि हरि आनन्द इन दिनों पूना में है। मैं एक दिन बम्बई में रुका और अगले दिन पूना के लिए रवाना हो गया तो अचानक रास्ते में ही मोहिनी ने बताया कि हरि आनन्द पूना छोड़ चुका है और मैसूर की तरफ़ जा रहा है।

“क्या उसे मेरे आगमन की खबर मिल गयी ?” मैंने मोहिनी से पूछा।

“कह नहीं सकती। लेकिन उसने अचानक ही पूना छोड़ा है। वरना तो वह वहाँ ऐश कर रहा था। त्रिवेणी की सारी सम्पति उसके कब्जे में थी। त्रिवेणी के चेले-चपाटे उसकी सेवा कर रहे थे और त्रिवेणी, वह नामुराद सड़कों पर अंधे-अपाहिज के रूप में भीख माँगा करता है।”

त्रिवेणी का ज़िक्र आते ही मुझे वह दिन याद आ गए जब मैं पूना में भीख माँगा करता था और त्रिवेणी ने मोहिनी का जाप करके उसे प्राप्त कर लिया था। मुझ पर लातादाद जुल्म तोड़े थे।

लेकिन मोहिनी को फिर से पाने के बाद मैंने भी उसे माफ़ नहीं किया था। उसकी आँखें फोड़ दी थी। घुटने तोड़ दिए थे और अब उसका हाल सुनकर मुझे ख़ुशी हुई। पूना पहुँचते ही मुझे कुलवंत याद आ गयी। कुलवंत एक ऐसी रूपसी थी जिसे मैंने इसी शहर में पाया था। वह मुझसे बेपनाह मोहब्बत करती थी। उसने मेरे लिए घर-बार छोड़ दिया था और फिर वही कुलवंत मैसूर के एक पहाड़ी में साधु प्रेम लाल की कुटिया में वैरागन बन गयी। साधु प्रेम लाल की शक्तियाँ उसे वरदान में मिली थी। वह उसी कुटी में तप कर रही थी।

मैं पूना में रुका तो त्रिवेणी का हाल देखने की ललक हुई और मोहिनी ने मुझे बताया कि वह रेस के मैदान के आस-पास कहीं मिल जाएगा।

मैं त्रिवेणी से एक-दो बातें भी करना चाहता था। मैं सीधा रेस के मैदान में पहुँचा।

हमेशा की तरह वह त्रिवेणी तक ले गयी जो एक जगह हाथ फैलाए बैठा था। जर्जर शरीर, हड्डियों का ढांचा निकल आया था। बाल बढ़े हुए थे, शरीर पर चिथड़े झूल रहे थे। वह दोनों आँखों से अंधा था और एक पहिएदार पटरे पर बैठा था। उसे देखकर तरस आता था।

मैंने ज़ेब से एक सौ का नोट निकालकर उसकी हथेली पर फेंक दिया।

त्रिवेणी ने करारे नोट को छू-छूकर देखा। शायद वह उसकी लम्बाई-चौड़ाई नाप कर अंदाज़ा लगाना चाहता था कि कितने का नोट है।”

“सौ का नोट है त्रिवेणी दास।” मैंने उसकी समस्या दूर कर दी।

उसके चेहरे पर भारी आश्चर्य था।

“भगवान तुझे और दे बेटा, मालामाल कर दे, सुखी रखे।”

मैं समझ गया कि उसने मेरी आवाज़ सुनकर पहचाना नहीं।

कुछ क्षण तक मैं चुपचाप उसकी दिलचस्पियाँ देखता रहा फिर बोला-”यहीं किसी जमाने में तुमने इसी जगह पर एक भिखारी को दस का नोट दिया था...।”

अब त्रिवेणी चौंक पड़ा। उसकी उंगलियाँ काँप गयी। नोट उसके हाथ से छूट गया।

“क...कौन हो तुम ?” वह फँसे-फँसे स्वर में बोला।

“मैं वही भिखारी कुँवर राज ठाकुर हूँ।”

त्रिवेणी के सिर पर तो जैसे बम फट गया था। उसका सारा शरीर सूखे पत्ते की तरह थर-थर काँपने लगा।

“डरो नहीं त्रिवेणी दास। भगवान ने तुम्हें तुम्हारे पापों की सजा दे दी। मैं तुमसे हरि आनन्द के बारे में पूछने आया था। एक जमाने में तो तुम भी उसी मठ के पुजारी रह चुके हो।”

“ह...हरि आनन्द।” वह काँप गया। “कुँवर साहब, मुझ पर दया करो!”

“दया ऊपर वाले के हाथ में है। मैं इस दुनिया में दया धर्म के लिए नहीं आया हूँ। यह सौ का नोट तुम्हें इसलिए दिया है कि तुम मुझे हरि आनन्द के बारे में बता सको। वह तुम्हारी सम्पत्ति पर कब्जा जमाए बैठा था।”

“अब वह मेरी सम्पत्ति कहाँ रही। मण्डल वालों की है। उन्होंने मुझ पर जरा भी तरस नहीं खाया। मैं तो अब बस एक भिखारी हूँ। मैं तो देख भी नहीं सकता, चल भी नहीं सकता कुँवर साहब! मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। हरि आनन्द वहाँ ज़रूर था। पर मुझे उसके बारे में कुछ नहीं मालूम।”

“त्रिवेणी तुम्हें यह तो मालूम होगा कि उनके छिपे हुए मठ कहाँ-कहाँ हैं ?”

“उनसे निपटना इतना आसान नहीं है कुँवर साहब।”

“मेरी बात का जवाब दो त्रिवेणी।” मैंने कठोर स्वर में कहा। “तुम जानते हो मैं किस तरह से निपट सकता हूँ।”

त्रिवेणी ने महामठ कलकत्ता के अलावा चार आश्रमों का पता और दिया और उनमें से एक मैसूर भी था। दूसरा बनारस में, तीसरा पटना में और चौथा इलाहाबाद में।

मैं जानता था कि मोहिनी इन मठों में नहीं जा सकती। परंतु मेरे पास मोहिनी के अलावा दूसरी शक्तियाँ भी थी। प्रेम लाल और साधु जगदेव का मुझे आशीर्वाद प्राप्त था।

उन लोगों की कुछ सम्पत्तियाँ बहुत से शहरों में फैली पड़ी थी। उनके सैकड़ों चेले-चपाटे थे जो ज़रूरत पड़ने पर हरि आनन्द की सहायता के लिए कूद सकते थे।

मैं ऐसे सारे ठिकाने तबाह कर देना चाहता था जहाँ हरि आनन्द को पनाह मिल सके। ताकि मैं जिस शहर से गुजरूँ वहाँ हरि आनन्द कदम न रख सके।

इसकी शुरुआत पूना से ही हो गयी।

मैंने रात का वक्त निश्चित किया और उस वक्त हल्ला बोल दिया जब हरि आनन्द के चेले मस्ती में सो रहे थे।

यह वही इमारत थी जहाँ त्रिवेणी रहा करता था और इस इमारत के चप्पे-चप्पे से मैं वाकिफ था। उस वक्त वहाँ कोई ऐसा बड़ा पुजारी नहीं था जो मेरा रास्ता रोक सके।

मोहिनी एक सिर से दूसरे सिर पर फुदकती रही और उन कमरों के दरवाज़े बंद होते रहे जहाँ हरि आनन्द के चेले मस्ती की नींद छान रहे थे।

इसके बाद मोहिनी दरबान के सिर पर चली गयी और दरबान ने बाकायदा पेट्रोल छिड़कने का काम शुरू कर दिया। कुछ ही देर बाद सारी इमारत शोलों से घिरी थी। और वर्करफ्तारी से इमारत से दूर होता जा रहा था।

मैंने रात की ट्रेन पकड़ी और पूना छोड़ दिया। ठीक उस वक्त जब मैं कम्पार्टमेंट में सोने की तैयारी कर रहा था मोहिनी रूपी छिपकली मेरे सिर पर सरसराने लगी और फिर मोहिनी इमारत खाक होने और अठारह आदमियों के मारे जाने का समाचार चटखारे ले लेकर सुनाती रही।

लेकिन मैसूर पहुँचने से पहले ही मोहिनी ने संकेत दिया कि हरि आनन्द वहाँ से भी चम्पत हो गया है।

“इसका मतलब यह हुआ मोहिनी कि उसे मेरे आगमन का पता चल चुका है।” मैंने बेचैनी से कहा। “और अब वह मुझसे जान बचाता हुआ भाग रहा है। लेकिन भागकर जाएगा कहाँ ? अभी तो मैं सिर्फ़ तुमसे ही काम ले रहा हूँ। देखना यह है कि यह आँख मिचौली और चूहे-बिल्ली का खेल कब तक चलता है।”

“लेकिन राज, पूना में हम जो कांड कर आए हैं उस से वे लोग सतर्क हो जाएँगे।”

“और मैं कब चाहता हूँ कि उनकी पीठ पर वार करूँ। मैं तो उसे भी ललकार मारूँगा। वे अपनी सारी फ़ौज़ अमले तैयार कर ले। और जब हमने ओखली में सिर दिया ही है तो मूसल से क्या घबराना।”

“उन्होंने मैसूर के मठ में ज़रूर आवश्यक तैयारियाँ कर ली होंगी।”

“मोहिनी क्या तुम उन मठों के बारे में कुछ नहीं बता सकती ?”

“नहीं मेरे आका, मैं तो उन्हें देख भी नहीं सकती। उनके इर्द-गिर्द एक हिस्सा बँधा होता है। हर मठ में काली की पूजा होती है इसलिए मैं वहाँ जा भी नहीं सकती। लेकिन राज, तुम बिना सोचे-समझे मठ में प्रविष्ट मत होना।”

“तू भी कभी-कभी बड़ी बुजदिली की बात करती है मोहिनी। कम से कम यह तो देख लिया कर कि तू किसके सिर पर बैठी है।”

“बड़ा गरूर है तुम्हें अपने सिर पर राज।”

“सब्र करो रानी मेरे सिर के मखमली बिछौने पर। इससे अच्छा बिस्तर तुम्हें मिलेगा कहाँ। अब अपनी बत्ती बंद करके सो जाओ चुपचाप।” मैंने सिर पर चपत जमाते हुए कहा।

मोहिनी हँसकर बोली- “क्या करें, नींद ही नहीं आ रही है।”

“तो फिर मेरे सीने में समा जाओ, नींद आ जाएगी।”

“काश कि ऐसा ही होता तो मैं सिरों में सिर क्यों टकराती रहती... ?” मोहिनी ने कहा और बायीं करवट लेट गयी।

फिर मैंने भी बर्थ पर आँख मूँद लीं।

रात बीत गयी।

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मैसूर पहुँचते ही मैंने एक होटल में कयाम किया और सारा दिन सफ़र की थकान मिटाता रहा। मेरा दुश्मन अब इस जगह नहीं था। इसलिए मुझे किसी प्रकार की जल्दी नहीं थी। मैं सोच समझकर ही उस मठ में कदम रखना चाहता था। मैं जानता था कि वहाँ मोहिनी मेरा साथ नहीं दे पाएगी।

मेरे लिए यह जानना ज़रूरी था कि वहाँ किस प्रकार के ख़तरे मेरा स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

वहाँ जाने के बाद मुझे कुलवंत की याद भी सताने लगी थी।

कुलवंत जो मैसूर की ही एक पहाड़ी पर तप कर रही थी। मेरी मुँहबोली बहन तरन्नुम उसके पास थी। उनके क़रीब आते ही मुझे उनकी याद सताने लगी।

दिन भर थकान मिटाने के बाद मैं शाम को घूमने निकला और फिर मैंने उस तरफ़ का रुख़ किया जिधर मठ था।

मैसूर के पूर्वी क्षेत्र में एक पहाड़ी टीकरे पर एक महलनुमा इमारत थी। जैसे ही मैंने उस तरफ़ कदम बढ़ाने चाहे मोहिनी के पंजों की तेज चुभन ने मुझे सचेत किया और मैं रुक गया।

“क्या बात है मोहिनी, तुम बेचैन क्यों हो ?”

“मैं जरा देर के लिए होटल घूमकर आना चाहती हूँ। राज, यहाँ मुझे कुछ गड़बड़ मालूम होती है। मैं खतरे के बादल मँडराती देख रही हूँ।”

“जाओ...!”

“लेकिन जब तक मैं लौटकर न आऊँ तुम यहीं पर रुके रहोगे।”

“ऐसा क्यों ?”

“यह मैं तुम्हें लौटकर बताऊँगी।”

मोहिनी ने छिपकली का रूप धारण किया और सरसराती हुई नीचे उतर गयी। मैं शहर से बाहर आ गया था और मेरे सामने एक दरिया था। दरिया का पुल मुझे नज़र आ रहा था। एक सड़क भी दिखायी दे रही थी जो बल खाती हुई उस पार की पहाड़ी पर चली गयी थी।

दूर पहाड़ी पर महल के कंगूरे भी मुझे नजर आ रहे थे। यहीं उन तांत्रिकों का छिपा हुआ मठ था जो हवा महल के नाम से जाना जाता था और जो आज तक मेरी नज़रों से पोशीदा था।

हालाँकि उस वक्त वहाँ हरि आनन्द नहीं था परंतु हरि आनन्द जैसे कई पापी थे। हरि आनन्द तो इन लोगों का आवाकोर था।

सड़क के नीचे उतरकर मैं दरिया के किनारे एक टीले पर जा बैठा और मोहिनी के लौट आने का इंतज़ार करता रहा। मोहिनी ने दस-पंद्रह मिनट से अधिक समय नहीं लिया जब वह एक धमाके के साथ मेरे सिर पर आ गयी।

खासी बेचैनी थी उसके चेहरे पर।

“क्या खबर लायी हो परकाला ?”

“राज, यह पुलिस तुम्हारे लिए सरगर्म हो चुकी है।”

“क्या मतलब ? मैंने अभी-अभी तो यहाँ कदम रखा है। और फिर मैंने यहाँ जुर्म ही क्या किया है ?”

“वे लोग तुम्हें किसी न किसी चक्कर में घेर लेने की तैयारी कर चुके हैं और इस वक्त सरकारी अमले से तुम्हारा उलझना ठीक नहीं है। उन्होंने होटल घेर लिया है और जिस कमरे में तुम ठहरे हो उसकी तलाशी ली जा रही है। वे तुम्हें पूना में हुए कांड का दोषी भी समझते हैं।”

“लेकिन इतनी जल्दी वह किस तरह होटल तक पहुँच गए ?” मैंने चौंककर पूछा।

“जिन लोगों के ख़िलाफ़ तुम जेहाद कर रहे हो, उनके साथ भी कुछ काले जादू के फितने है। और जिस तरह तुम यह जान लेते हो कि हरि आनन्द कहाँ है, उन्हें भी तुम्हारी मौजूदगी का इल्म हो जाता है। और यह तो तुम्हें पहले ही मालूम है कि सरकारी मशीनरी में उनका कितना दख़ल है।”

“मोहिनी, वह इधर का रुख़ भी कर सकते हैं ?”

“मेरा तो ख्याल है कि यहाँ भी पुलिस का ख़तरा मँडरा रहा है। इसलिए मैंने तुम्हें आगे बढ़ने से रोका था। हवा महल के इर्द-गिर्द का हिस्सार मैं भेद नहीं पा रही हूँ। परंतु मैंने एक पुलिस लारी को उस पहाड़ी पर गुजरते देखा है।”

अब मेरा आगे बढ़ना ख़तरे से खाली नहीं था। हरचंद की पुलिस मुझे जेल में नहीं रख सकती थी लेकिन उससे मेरे ख़िलाफ़ हवा गर्म हो जाती; और फिर देश की पुलिस मेरे लिए नाके बंदी कर सकती थी। पुलिस से जितना फासला बना रहे उतना बेहतर था।

मैंने मठ की ओर जाने का विचार स्थगित कर दिया और अब न ही मैं होटल लौट सकता था। मैंने तय किया कि मैं कुछ दिन कुलवन्त के पास रहकर वापस आऊँगा। तब तक पुलिस की सरगर्मियाँ भी कम हो जाएँगी। जब वे मुझे कहीं नहीं पाएँगे तो यह सोचकर चुप हो जाएँगे कि मैं मैसूर छोड़ चुका हूँ।

और फिर बिना कुछ अधिक सोचे मैंने यात्रा शुरू कर दी। जिस जगह कुलवन्त रहती थी वहाँ पहुँचना किसी इंसान के लिए बड़ी टेढ़ी खीर थी।

बयाबान पहाड़ियाँ, ख़तरनाक जंगल और काँटों भरे रास्ते। पगडंडियों के सहारे ही रास्ता तय करना होता था। उन पगडंडियों पर भी इंसान रास्ता भटक सकता था। भूल-भुलैया पहाड़ियों का यह जाल अंत तक समाप्त नहीं होता था।

पहले भी मैं यहाँ दो मर्तबा आ चुका था। उस वक्त भी मोहिनी मेरे साथ पथ प्रदर्शक के रूप में रही थी।

मैं चलता रहा इस थका देने वाली यात्रा पर। अपनी मंजिले तय करता रहा। खाने-पीने का कुछ साथ था नहीं इसलिए जंगल के फलों से गुजारा करना पड़ा। प्यास लगती तो मोहिनी मुझे झरने के पास ले जाती।

यूँ भी हमने ऐसा रास्ता चुन लिया था कि हमें भूख-प्यास का अधिक मुक़ाबला न करना पड़े।
 
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