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Fantasy मोहिनी

लेकिन यह देखकर मुझे एक धक्का सा लगा कि कुल पाँच वीर मेरी मदद के लिए तैयार थे। शेष का कहीं पता न था और इससे पहले कि मेरे पाँचों वीर हरि आनन्द पर हमला करते योगानन्द ने घृणा से मेरे दायरे में थूक दिया।

उसके थूकते ही मेरे कदम ज़मीन पर लड़खड़ा गए जैसे ज़मीन मेरा बोझ संभालने से इनकार कर रही हो और मेरे बोझ से धरती का कलंक पाक-साफ़ कर देना चाहती हो।

योगानन्द ने उसी ओर एक तेज फूँक मारी और जैसे आग का ज्वालामुखी मुझ पर झड़ पड़ा हो। मेरे पाँचों वीर दहाड़े मार-मारकर भयानक चीखों के साथ आग में दहक रहे थे। मैं चंद क्षणों के लिए एकदम स्तब्ध होकर रह गया।

योगानन्द की आवाज़ गरज उठी- “अपराधी, मुझे इन लौंडों से धमकाता है। देख लिया इनका अंजाम। अब बोल तेरे पास क्या सामान है ?”

मैंने दोबारा माला के दानों पर हाथ घुमाया लेकिन अब कोई मदद को नहीं आया। पाँचों वीर भी जलकर खाक हो चुके थे। फिर भी मैंने अपने इरादे को दृढ़ बनाते हुए खुद को संभाला और योगानन्द को संबोधित किया।

“महाराज, आप निरर्थक हमारे झगड़े के बीच पड़ रहे हो। निश्चय ही आप बड़े तपस्वी हैं लेकिन आपको यह शोभा नहीं देता।”

“हरि आनन्द मेरी शरण में है और शरणागत की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। अरे, तू अब भी मेरी छाँव में आ जा। तू और हरि मिलकर बलवान हाथी बन सकते हो जिस पर भगवान शंकर सवारी करेंगे।”

“यह कभी नहीं हो सकता। अब हम दोनों में से एक ही रहेगा।” मैंने बिफरे हुए स्वर में कहा।

“अच्छा! तो फिर अपने सामान का करिश्मा दिखा। मुझसे मुक़ाबला किए बिना तू मेरे शरणागत को स्पर्श भी नहीं कर सकता, तू अपनी शक्तियाँ कभी का खो चुका है बालक। तुझे याद नहीं तूने कितने पाप किए हैं। देख तेरे कुछ और दुश्मन यहाँ हैं।”

अब मैंने देखा कि योगानन्द के हाथ उठाते ही जमाल का मुस्कुराता चेहरा नज़र आया। देखते ही देखते जिन्न के आँखों में अंगारे दहकने लगे।

“राज, महाराज की बात मान लो!” मोहिनी ने पंजे गड़ाकर कहा।

“चुप रह डरपोक चुहिया, तूने कभी दिलेरी भी दिखायी है। तेरी हैसियत भी देख ली मैंने। तू एक कीड़े से अधिक कुछ हैसियत नहीं रखती। जब से तेरा साया मेरे सिर पर पड़ा, मुझे क्या मिला। शिकस्त ही शिकस्त। चल भाग जा! मुझसे दूर हो जा।” मैं मोहिनी पर चीख पड़ा।

“राज!” मोहिनी की आँखों में मैंने पहली बार आँसू छलकते देखें।

“आज कोई मेरे साथ न रहा। कहाँ है तू कुलवन्त ? कहाँ है प्रेम लाल ? कहाँ है साधु जगदेव ? कहाँ हो कल्पना ? कोई नहीं है। कोई नहीं सुनता। तुम सबने मुझे धोखा दिया। मैं इसी दिन के लिए अपनी ज़िंदा लाश ढोता रहा और यह घटिया दर्जे का तपस्वी...थू। मैं तुम सब पर लानत भेजता हूँ। तुमने हमेशा मुझे धोखा दिया। मुझे ज़िंदा आग में जलाया; लेकिन मैं मरते दम तक अपनी कसम निभाऊँगा। देखो, मैं मर रहा हूँ! मेरी लाश चील-कौवों को खिला देना।”

मुझे कुछ भी याद नहीं था कि मैं क्या-क्या चिल्ला रहा था। किसी ने मेरी पुकार नहीं सुनी तो मैंने गले से माला नोच डाली और उसे कुचल दिया। हिस्सार टूट गया और फिर असंख्य लात-घूँसे मुझ पर बरसने लगे। मैं पागलों की तरह उनसे लड़ रहा था। वह फौलादी ताक़त रखने वाले जिन्न थे।

हरि आनन्द तो मुझे कहीं नज़र ही नहीं आ रहा था। मैं उसको चीख-चीखकर गालियाँ दे रहा था। मार खा-खाकर भी उससे मुक़ाबला कर रहा था और फिर अचानक मैंने मोहिनी का रौद्ररूप देखा। उसका आकार बढ़ने लगा। बुलंद और बुलंद। उसकी जीभ बाहर निकल आई। लम्बी और लम्बी। और फिर एक धमाके के साथ वह मेरे सिर से कूद गयी।

उसके बाद मुझे कुछ होश नहीं रहा कि क्या हुआ।
 
न जाने कितना अरसा बीत गया। मैं बेसुध पड़ा रहा। कभी-कभार कराहकर आँखें खोलता तो अपने आपको स्ट्रेचर जैसी चीज़ पर लदा पाता। लोग मुझे उठाए चल रहे थे। जाने कहाँ से कहाँ। जख्मों से जिस्म भरा था और मौत से जूझ रहा था। कभी मैं अपने को किसी जंगल में रुका पाता। मेरे इर्द-गिर्द कुछ लोग होते तो कभी लोगों का यह काफिला इस तरह मुझे ले चलता जैसे शमशान घाट के लिए मुर्दा ढोया जा रहा हो।

न जाने कहाँ से कहाँ लोगों के चेहरे बदलते रहते। पता नहीं कौन थे और क्यों मेरी लाश ढो रहे थे। मेरा जनाजा इतने सारे लोगों के कंधे पर सवार होकर इस तरह धूमधाम से निकलेगा ऐसा तो कभी सोचा भी न था। नगर-नगर, डगर-डगर, बस्ती-बस्ती, गाँव-गाँव। कभी कंधों पर तो कभी ट्रेन में। कभी बस में मुझे छोड़े जाते। तो कभी पैदल लोगों का काफिला पगडंडियों पर चल रहा होता। कभी मैं अपने को नदी के किनारे पाता तो कभी रात किसी खंडहर मे बीतती।

और एक दिन मैंने अपने को मैसूर के उन वादी में पाया जहाँ कुलवन्त रहा करती थी। परंतु वहाँ कोई न था। कोई मेरा दुःख पूछने न आया। मोहिनी भी मेरे पास नहीं थी। फिर कुछ लोग आए और मुझे उठाकर चल दिए।

जख्मों की पीड़ा से तड़प-तड़प जाना, बेहोश हो जाना। ट्रेन में जब मैं पड़ा रहता तो लोग मुझसे दूर ही रहते और कोई मेरे क़रीब आकर देखता भी तो नाक में रुमाल रख कर मेरे मुँह में ज़बरदस्ती खुराक डाली जाती ताकि मैं ज़िंदा रह सकूँ।

न जाने कितने दिन या कितने महीने या कितने बरस तक मैं इसी तरह घिसटता रहा। मुझे ढोने वाले बदलते रहें। फिर मेरे सामने एक भयावह जंगल था जहाँ कुछ वहशी कबाइली मुझे ढोकर ले जा रहे थे।

तीर कमानों से लैस नंग-धड़ंग जंगली मुझे उठाए ले जा रहे थे। आगे उनका सरदार था जिनके हाथ में नेजा चमक रहा था और बर्फपोश पहाड़ियों का सिलसिला प्रारंभ हो गया। एक पहाड़ से दूसरा पहाड़। चीड़ और देवदार के वृक्षों की चोटियाँ। वहशी मुझे लेकर चलते रहे।

फिर इसी काफिले ने मुझे एक पर्वत की चोटी पर छोड़ दिया। वहाँ मुझे एककुटी नज़र आई। कुटी से बाहर एक साधु तप कर रहा था। बिल्कुल नंग-धड़ंग साधु। उसकी जटायें नंगे सीने पर लोट रही थीं। एक तरफ़ त्रिशूल गढ़ा था और वह आँखें मूँदे था।

मैं वहाँ पड़ा रहा, न जाने कितने दिन, कितनी रातें। ठंडी हवाएँ बर्फ की तरह नश्तर चुभाती। साधु पत्थर की मूर्ति की तरह अडिग थें और एक दिन उसने आँखें खोल दी। उसने पहले मुझे हैरत से देखा फिर उसके होंठ पर मुस्कुराहट दौड़ गयी।

“क्यों रे बालक!” उसका स्वर कानों में पड़ा। “तेरा घमंड टूट गया और तू अपने इस दुर्गंध युक्त शव को कहाँ-कहाँ ढोता रहेगा ? तू तो बड़ा बलवान था। एक सौ एक महात्माओं का वरदान तुझे प्राप्त था। तूने उनकी शक्तियाँ पैरों तले कुचलकर नष्ट कर दीं। उनका मान तोड़ दिया। अब यहाँ क्यों आया है ?”

मैं क्या जवाब देता। मेरे मुँह से आवाज़ भी नहीं निकल सकती थी। लेकिन मैं मौत से भीख माँग रहा था ताकि मुझे इस कष्ट से छुटकारा मिल जाए जो मैं भोग रहा था।

“मुझे तेरी हालत पर तरस आता है। मृत्यु तो अपने समय पर आती है बालक। एक यही चीज़ इंसान के बस की बात नहीं है। जीवन मृत्यु का स्वामी परमात्मा है; और तुझे तो अभी एक लम्बी यात्रा तय करनी है। जानता है, तू यहाँ क्यों आया ? तुझे यहाँ लाने वाली मोहिनी देवी है। तूने खुद इतनी बड़ी शक्ति को खोया है; और अब वह किसी का ग़ुलाम नहीं बन सकती। कोई भी जाप अब मोहिनी देवी को प्राप्त नहीं कर सकता। वह चाहती तो तू मौत के मुँह में पड़ा यूँ ही तड़पता रहता। उससे अब तेरा रिश्ता ही क्या रह गया था। वह तेरे हुक्म की पाबंद नहीं रही थी।

साधु ने आकाश की तरफ़ घूरते हुए कहा। “हाँ मोहिनी, अब तू शक्तिमान है। तूने उन ऋषियों का घमंड तोड़ दिया। उनका श्राप नष्ट हो गया। एक सौ एक तपस्वी थे। उन्होंने काली को मजबूर कर दिया था। सदियाँ बीत गयी, तू कष्ट भोगती रही। अब तो तुझे आज़ादी मिल गयी। अब तुझे कौन प्राप्त कर सकता है।”

साधु की बातें बड़ी अजीब थीं। मोहिनी जिसे मैंने एक अर्से से नहीं देखा था क्या वह मेरी सड़ी गली लाश ढो रही थी। हाँ, वह मोहिनी की ही शक्ति हो सकती है। उसी का प्रताप है जो मैं इतना लम्बा सफ़र तय करता रहा और जीवित रहा।

मोहिनी ने मुझे मरने नहीं दिया था। क्यों ? उसने कहा था वह मुझसे प्यार करती है। कैसा प्यार था यह ? दर्द से मेरा अस्तित्व कराह उठा। मैं आख़िरी बार मोहिनी को देखना चाहता था।

“बालक! मेरा समय अब निकट आ गया है। तू बड़ा भाग्यवान है जो मोहिनी देवी तुझ पर मेहरबान है। वह तुझे जीवित देखना चाहती है इसलिए वह तुझे यहाँ तक लायी है। उसने तुझे जीवनदान देने के लिए कई स्थानों का भ्रमण किया है। बड़े-बड़े हकीमों, साधु-संतों, तीर्थों की तुझे यात्रा कराई, पर तुझे कोई जीवनदान न दे सका।

और तुझे जीवनदान तभी मिल सकता था बालक, जब कोई महापुरुष तुझे अपना जीवनदान कर दे। स्वयं मृत्यु को स्वीकार कर ले। और मोहिनी को मैंने वचन दिया था कि यदि उन साधुओं का मान भंग कर दिया, यदि श्राप उसके सिर से उतर गया तो मैं अपने प्राणों की आहुति देकर उसका स्वागत करूँगा।

“बालक, मोहिनी चाहती तो कोई और भी इच्छा प्रकट कर सकती थी। वह अपने लिए कुछ भी माँग सकती थी परंतु अपने लिए कुछ भी नहीं माँगा। माँगा है तुम्हारा जीवन। लेकिन तेरा जीवन तभी बच सकता है जब कोई अपना जीवन त्याग दे।”

मैं सुन तो सब रहा था लेकिन बोल नहीं पा रहा था। मेरे अंदर इतनी शक्ति ही कहाँ थी जो मैं ज़बान हिला पाता।

“यहीं से तेरे नए जीवन का प्रारंभ होना है बालक। अगर तूने संयम और साहस से काम लिया तो मोहिनी देवी ज़रूर तुझे इसी जन्म में दर्शन देगी। जा तुझे जीवन दान देता हूँ। पाप का मार्ग त्याग दे।”

साधु ने हाथ उठाया और मेरे शरीर में बिजली सा करेंट दौड़ने लगा। मेरी सारी पीड़ा समाप्त होती जा रही थी और लहू में गर्माहट आ गयी थी। एक जान मुझमें पड़ती जा रही थी। यह कैसा अचम्भा था। किंतु अचम्भे मेरे जीवन में कोई नई वस्तु नहीं थे।

मैंने हाथ हिलाए। उँगलियों को हरकत दी। मुझे ख़ुशी हुई कि मेरी उँगलियाँ हरकत कर रही थीं। मुझे कष्टों से छुटकारा मिल गया था।
 
फिर साधु ने मेरे कंठ में कोई पेय टपकाया। उसके बाद साधु ने मेरे तीन चक्कर लगाए फिर कुटिया की तरफ़ बढ़ गया। मैं उठकर बैठ गया। मेरे शरीर में अब लेशमात्र भी पीड़ा नहीं थी। मैं उठकर खड़ा हो गया। अब मेरी समझ में नहीं आता था कि क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। मुझे तो यह भी नहीं मालूम था कि यह जगह कौन सी है। बर्फपोश चोटियाँ, आकाश बातें करती नज़र आ रही थीं। थोड़ी-थोड़ी बर्फ़ इस चोटी पर भी थी। नीचे चीड़ के तिकोने वृक्षों की वादियाँ थीं। ऊपर बर्फ़ की छत ओढ़े देवदार थे।उस वक्त मन में एक ही विचार आया। चलकर कुटिया में साधु को प्रणाम किया जाए जिसने मुझे जीवन दान दिया था।

मैं कुटिया में प्रविष्ट हो गया। साधु मृगछाला पर चित्त पड़ा था। मैं उसके चरणों के पास बैठ गया ।

“महाराज, आपने अपने प्राणों की आहुति देकर मुझ पापी को जीवनदान दिया है। ऐसा आपने क्यों किया महाराज ? मुझे मर क्यों नहीं जाने दिया। मैं तो धरती का एक बोझ हूँ।”

“बालक!” साधु की आवाज़ मुझे दूर से आती सुनाई दी। “हिमालय की बर्फीली चोटियाँ मुझे कैलाश की ओर बुला रही हैं। शिव शंकर भंडारी ने मुझे याद किया है। मैं उनके चरणों में जा रहा हूँ। जहाँ से मेरी परलोक यात्रा प्रारंभ हो जाएगी। सुन बालक! मोहिनी देवी के दर्शन के पहले कभी इंसानों की बस्ती में मत लौटना। तू दरवाज़े पर खड़ा है। जहाँ से मोहिनी देवी के दर्शन हो सकते हैं। सुदूर उत्तर की ओर पहाड़ों को पार करके एक जंगल में जाना। यह जादूगरों का जंगल है, जहाँ जाने वाला इंसान कभी लौटकर नहीं आता। मोहिनी देवी तुझे वहाँ बुला रही है। तू वहाँ अवश्य जाना। यह विलक्षण यात्रा तुझे तीन लोकों का ज्ञान कराएगी। तेरा तप संपूर्ण होगा। और मोहिनी देवी के दर्शन के बाद जब तू पृथ्वी के प्राणियों में लौटेगा तो तू एक महापुरुष होगा। तेरे सारे पाप धूल जाएँगे। याद रख बालक, यहाँ से सौ कोस दूर वह जगह है। कामा गारू जंगल का मार्ग पूछते जाना। भिक्षुक तुम्हें मार्ग दिखाएँगे जंगल के वासी तेरा स्वागत करेंगे। अच्छा बालक, अब मैं यात्रा पर प्रस्थान करता हूँ। मेरा तप पूरा हुआ। मेरा समय भी संपूर्ण हो चुका।”

उसकी आवाज़ दूर किसी घाटी में डूबती चली गयी और मैं स्तब्ध सा उसके चरणों में बैठा था।

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मेरे ज़ख़्म सूख गए थे और मेरा शरीर हल्का हो गया था। पंद्रह रोज़ उस कुटिया में बिताए तब मैं संपूर्ण रूप से स्वस्थ हो पाया। जंगली मेरी सेवा किया करते थे। उन्होंने ही साधु की अंतिम क्रिया की थी और अब मैं अकेला कुटिया में साधु के स्थान पर रह रहा था।

जंगलियों की भाषा मेरे समझ में नहीं आती थी परंतु संकेतों से काफ़ी कुछ समझ लेता था। फिर मैंने साधु की बात मानकर एक सुबह प्रस्थान किया और कुटी छोड़ दी।

मोहिनी कभी मेरी बांदी थी, मेरी कनीज थी, मेरे इशारों पर नाचती थी परंतु अब मेरे दूर की चीज़ थी और मैंने निश्चय कर लिया था कि साक्षात मोहिनी देवी के दर्शन करना ही अब मेरे जीवन का एक मात्र उद्देश्य रह गया है।

मैं उत्तर की ओर चल पड़ा। बर्फपोश पहाड़ियों को पार करता हुआ। जगह-जगह बौद्ध-भिक्षु मुझे मिलते। मैं उनसे मार्ग पूछता। बौद्ध-भिक्षु ने मेरा हर जगह स्वागत किया। मैं उनकी कई बस्तियों से गुजरा और अब मुझे मालूम हो चुका था कि मैं तिब्बत की पहाड़ियाँ नाप रहा हूँ। मैं जादूगरों के कामागारू जंगल की तरफ़ बढ़ रहा था। बड़ी कठिन यात्रा थी। पाँव में छाले पड़ गए थे परंतु मैं चलता ही रहा। रास्ते में कुछ हादसे भी हुए। एक बार पहाड़ी लुटेरों ने मुझे घेर लिया तो कुछ गंजे सिर वालों ने मेरी जान बचाई।

वे लोग आदरपूर्वक मुझे अपने मठ में ले गए। अब मैं मार्ग की भाषाएँ समझ-बोल लेता था। मेरे ज्ञान का भंडार बढ़ता ही जा रहा था।

जड़ी-बूटियों के सेवन ने मेरे शरीर में नई ज़िंदगी फूँक दी थी। मैं एक ही लगन लिए पहाड़ों को पार करता रहा। रास्ते में जंगली कबीले भी पड़े। वहाँ भी मेरा स्वागत हुआ।

उबड़-खाबड़ रास्ते, बीयावान जंगल। सफ़र और सफ़र। रात-दिन का सफ़र। मुझे रास्ते में बताया गया कि कामागारू रहस्यमय दुनिया है। वहाँ बड़े-बड़े बलवान और शक्ति के स्वामी हैं जो मोहिनी देवी के दर्शन को गए हैं परंतु लौटकर नहीं आए और वहीं के होकर रह गए। इन्द्र सभा जैसी सुंदर अप्सराएँ हैं जो मोहिनी देवी की दासियाँ हैं। वह लोग जो वहाँ पहले से ही आसन जमाए हैं, मेरे मार्ग में बाधक बनेंगे। मुझे जगह-जगह समझाया गया कि मैं वापस लौट जाऊँ परंतु मैं हूँ जिद्दी स्वभाव का। जो ठान लेता हूँ उससे कोई डिगा नहीं सकता।

और एक दिन वह भी आया जब अनगिनत मुसीबतों को झेलता हुआ मैं कामागारू जंगल के किनारे खड़ा था। आगे घना जंगल था। एक भिक्षु मुझे वहाँ तक छोड़कर वापस लौट गया था। मैंने धड़कते दिल से पगडंडी में कदम रखा और चल पड़ा। फिर रात घिर आई थी और मैं बुरी तरह थका हुआ था। एक उपयुक्त स्थान देखकर मैं वहाँ लेट गया। मैंने रात भर वहाँ आराम करने का फ़ैसला किया और तय किया कि भोर होने पर अपना सफ़र शुरू करूँगा।

थकान के कारण मुझे शीघ्र ही नींद आ गयी।

थोड़ी देर गुजरी थी कि अचानक शेर के दहाड़ने की आवाज़ सुनाई दी जिससे मैं जाग गया। मेरे शरीर में भय की सिहरन दौड़ गयी। कहीं शेर मेरे निकट ही न आ जाए और मेरी गंध पाकर मुझे चीड़-फाड़कर खा जाए।

मैं देर तक भयभीत रहा परंतु वह दरिंदा समीप नहीं आया। उसने अपना रुख़ बदल लिया था परंतु मैं सो न सका। सारी रात आँखों में काटी। रात भर दरिंदे दहाड़ते रहे। मैं एक पल के लिए आँख बंद न कर सका। सुबह होते ही मैंने अपना सफ़र फिर शुरू कर दिया।

मैं अभी तक भिक्षु के बताई पगडंडी पर चल रहा था। जंगल मीलों दूर तक फैला था। उसके ओर छोर का कहीं पता न था और मुझे यह मालूम था कि उस जंगल में मेरी मंज़िल कहाँ है।

पगडंडी पर सफ़र करते हुए मुझे सात दिन गुज़र गए। मेरे वस्त्र झाड़-झंकारों से उलझकर तार-तार हो चुके थे। दाढ़ी और जटाएँ तो पहले से ही बढ़ी हुई थी। भूख बहुत सताती थी क्योंकि जंगल के फल से पूरी तरह पेट नहीं भरते थे। मैं झरनों और सोतों के पानी से ज़िंदा था लेकिन इन बातों की मुझे अधिक चिंता नहीं रहती थी। मुझे तो बस जादूगरों के उस दुनिया में पहुँचने की धुन थी।

आठवें दिन मैं एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ हर तरफ़ प्रकाश था। वहाँ वृक्षों की भी कमी थी, झाड़-झंकार भी नहीं थे। एक खुली वादी थी। घने जंगल में वृक्षों के कारण अमूमन अंधेरा छाया रहता था लेकिन यहाँ उस तरह अंधेरा नहीं था।
 
शाम का अंधेरा छाने लगा और आसमान पर तारें चमकने लगे। किसी आबादी के आसार मिलने की उम्मीद बँधने लगी। थोड़ी दूर चलने के बाद मैं बिल्कुल खुली वादी में आ गया। वृक्षों का सिलसिला अब समाप्त हो गया था। सामने एक समतल मैदान था।

मैदान देखकर मेरा दिल धड़कने लगा। मैदान में रोशनी के धमाके नज़र आए जैसे वहाँ आग के अलाव रोशन हो। अंधेरे में वह रोशनी दहशतनाक लग रही थी। निश्चय ही वहाँ आबादी होगी।

मैंने अपनी रफ्तार और तेज कर दी। मैं शीघ्र ही आबादी में पहुँच जाना चाहता था। रोशनियों के निकट पहुँचा तो अजीब मंजर देखा। मैदान में अनेक कद्दावर पुतले खड़े थे जिनके निकट कई जगह बड़े-बड़े आग के अलाव रोशन थे। मैं एक पुतले के पीछे छिपकर मैदान का जायजा लेने लगा।

हर अलाव के गिर्द पुतले ठीक सामने लम्बी जटाओं और पास में एक सुंदर नग्न स्त्री मौजूद थी। आग की रोशनी में लड़कियों के जिस्म सुर्ख नज़र आ रहे थे। हर आदमी आग में कुछ चीज़ डालता और आग भड़क उठती। फिर देखते ही देखते आग तेज हो गयी।

उस समय तमाम लड़कियाँ आग के सामने दंडवत गिर गईं। अभी मैं यह दृश्य देख ही रहा था कि अचानक मेरे निकट एक हौलनाक कहकहा गूँज उठा और मैं काँप गया।

मेरे दाएँ-बाएँ चार-पाँच भयानक चेहरों वाले इंसान मुझे घेरे खड़े थे। उनकी कटोरे की तरह बड़ी-बड़ी खौफनाक सुर्ख आँखें थीं। बड़े-बड़े सफ़ेद दाँत बाहर निकले हुए थे। भय से मेरी चीख निकल गयी। जाने क्यों उस वक्त मैं एक साधारण हैसियत का इंसान बनकर रह गया था।वह भयानक आवाज़ें निकालते हुए मेरी तरफ़ बढ़े और मुझे मेरे बाज़ू से पकड़कर घसीटने लगे। मैंने अपने शरीर की संपूर्ण शक्ति लगाकर अपने को उनकी गिरफ्त से छुड़ाना चाहा किंतु उनकी फौलादी शक्ति के सामने मेरी शक्ति कुछ न थी। वह मुझे बुरी तरह घसीटते हुए काफ़ी दूर तक ले गए। और एक बड़े घर के सामने जाकर रुक गए।

उनमें से एक व्यक्ति अंदर गया बाकी मुझे पकड़े हुए बाहर खड़े रहे। कुछ ही क्षण में अंदर गया इंसान बाहर निकला और मुझे अंदर ले चलने का संकेत किया गया।

अंदर अजीब क़िस्म का मंजर था। सामने एक भीमकाय नंग-धड़ंग साधु बैठा था। सिर की जटाएँ और दाढ़ी के घने लम्बे बाल उसके सीने पर फैले हुए थे। मैंने ध्यानपूर्वक उसे देखा। उसकी आँखें अंगारों की तरह चमक रही थीं। उसके बावजूद वह ग्रान्डोल साधु एक पहुँची हुई चीज़ मालूम होती थी।

अंदर रोशनी फैली हुई थी। रोशनी कहाँ से आ रही थी इसका पता नहीं चल रहा था। दीवारों में इंसानी और जानवरों की खोपड़ियाँ टँगी थी। ज़मीन पर पुआल बिछा हुआ था। कोने में एक मेज और मिट्टी के तरह-तरह के बर्तन रखे हुए थे।

साधु ने अपनी गर्जन भरी आवाज़ में कहा- ”तू यहाँ क्यों आया है ?”

“मैं इधर से गुज़र रहा था। यह लोग मुझे यहाँ पकड़ लाए। मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि मेरा कसूर क्या है ?” मैंने कहा।

साधु ने हिकारत से कहा– “तुझे मालूम नहीं, यहाँ अजनबियों का आना सख़्त मना है। और अगर भूल से भी कोई आ जाए तो उसकी सजा जानता है ?”

“मैं यहाँ खुद नहीं आया। बुलाया गया हूँ।”

“बुलाया गया है ? किसने बुलाया और कहाँ जाना है ?”

“यहाँ कहीं मोहिनी देवी का मंदिर है। मैं वहीं जा रहा हूँ।” मोहिनी का नाम सुनकर वह चौंका।

“तो तू वहाँ क्यों जाना चाहता है ?”

“यह तो मुझे खुद नहीं मालूम कि वहाँ जाकर करना क्या है। बस मोहिनी देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए थे और मुझे अपनी मंज़िल का पता बताया था।” मैंने उससे झूठ बोला।

“हूँ!” वह नफ़रत से कठोर स्वर में बोला। “सच-सच बता तुझे किसने भेजा है ?”

“मैं सच-सच कह रहा हूँ। खुद मोहिनी देवी की आज्ञा पर मैं यहाँ आया हूँ।”

“क्या तू सच बोल रहा है ?”

“तुम तो पहुँचे हुए साधु हो। क्या सच और झूठ भी नहीं पहचान सकते ?”

वह चौंककर खड़ा हो गया। कुछ पल तक मुझे घूरता रहा फिर अपने स्थान से मुड़ा। पीछे एक दरवाज़ा था। उसने दरवाज़ा खोला और अंदर प्रविष्ट हो गया। चंद क्षणों बाद वह वापस लौटा और नम्र स्वर में बोला-

“देवी मुझे क्षमा करें! मुझसे बड़ी भूल हुई जो तेरे दास को कष्ट उठाना पड़ा।”

उसके संकेत से ख़तरनाक शक्लों के इंसान बाहर चले गए। उसने किसी जानवर का सींग उठाया और उस पर कुछ पढ़ना शुरू किया।

चंद क्षण गुजरे थे कि बाहर के दरवाज़े से एक बेहद हसीन जवान लड़की अंदर प्रविष्ट हुई। वह लड़की मुझे देखकर चौंकी। लड़की को देखकर मेरा दिमाग़ भिन्ना उठा। वह सिर से पाँव तक नंगी थी। भरा-भरा जिस्म था, चौथा चकला सीना, उभरे गुदाज, ठोस पिंड, भारी-भारी कूल्हे, रानों और पिंडलियों की चमकती हुई चिकनी-चिकनी मछलियाँ। उसकी आयु भी कुछ अधिक नहीं थी। सुनहरे बाल हवा में लहरा रहे थे। शरीर के ख़ास हिस्से में रंगीन धारियों की कलाकारी थी। लड़की ने मुझे आश्चर्य से देखा।
 
साधु ने परिचय कराया– “यह मेरी बेटी सुनीता है। मोहिनी देवी की पुजारिन है।”

मोहिनी देवी की पुजारिन सुनकर मैंने अदब से सिर झुकाया। फिर वह सुनीता से संबोधित हुआ– “बेटी, इनके लिए कुछ ले आओ! यह मेहमान है।”

वह अंदर गयी और एक तश्तरी में फल ले आई। और मिट्टी के प्याले में ठंडा शर्बत मेरे सामने रख दिया। भूख से आँतें मरोड़ खा रही थी। मैंने साधु से आज्ञा लेकर फल खाए और एक ही साँस में शर्बत पी गया। शर्बत पीते ही थकान खत्म हो गयी। दम ताज़ा हो गया। इस दौरान मेरी नज़रें सुनीता की तरफ़ मटकती रही।

सुनीता भी मेरी तरफ़ देख रही थी। साधु ने मुझे आराम करने की हिदायत दी। मैं साधु की आज्ञा पर पुआल पर ही लेट गया। लेटते ही गहरी नींद की आगोश में चला गया।

न जाने कब तक मैं सोता रहा।फिर एकाएक आँख खुली। मैं जाग उठा। अंदर दिन की रोशनी फैली हुई थी। रात गुजरने का अहसास ही नहीं हुआ था।

मैंने लेटे-लेटे कमरे का जायजा लिया। वृक्षों से काटी गयी लकड़ियों से दीवार बनाई गयी थी। दीवार के अंदरूनी हिस्से में मिट्टी का प्लास्टर हुआ था जिससे दीवार मज़बूत मालूम होती थी। छत भी लकड़ियों और पत्तों की बनी हुई थी।

फिर मुझे साधु के संबंध में ख़्याल आया। वह कौन व्यक्ति हैं और यहाँ किस उद्देश्य से रहता है। जानवरों-इंसानों की खोपड़ियों से इसका क्या संबंध है। पहले वह कठोरता से पेश आया था फिर उसने मेरा भरपूर स्वागत किया। मुझे इसका पता लगाना चाहिए।

मैं अभी सोच रहा था कि सुनीता अपनी तमामतर बिजलियों को गिराती कमरे में जलवागीर हुई। उसके लबों पर दिलकश मुस्कराहट थी।

रात मैं भूख और थकान के कारण सुनीता के सुंदरता का अनुमान नहीं लगा सका था। दिन के उजाले में उसका हुस्न निखरा हुआ था।

उसके गोरे जिस्म पर रंगीन धारियाँ सुंदर लग रही थीं। नयन कक्ष बड़े खूबसूरत थे। भरी-भरी मांसल देह थी। सम्मोहित कर देने वाली आँखें थी जो अपनी तरफ़ खींच रही थी। ऐसा सुडौल गुदाज जिस्म था कि बाहों में भर लेने को जी चाहता था।

मुझे अपनी अय्याशियाँ याद आने लगी। एक मुद्दत हो गयी थी जब से मैंने स्त्री के सौंदर्य से किनाराकशी कर ली थी। और जब मैं इस पथ पर चला था तो मेरे मन में मोहिनी ही मोहिनी थी। मोहिनी का नशा था। लेकिन यह नशा भी कुछ कम न था।

मैं सुनीता से कुछ सुन लेने के मंसूबे बनाने लगा। लेकिन एक चोर मेरे मन में खटक रहा था। जिस साधु ने मुझे प्राण दान दिया था उसने मुझे यह सीख भी दी थी कि मैं पाप से दूर रहूँ। परस्त्रीगमन भी पाप ही था।

सुनीता मेरे पास बैठ गयी तो साँसें धड़कनों में फँसने लगी।

“रात को किसी प्रकार का कष्ट तो नहीं हुआ ?” सुनीता ने पूछा।

“यहाँ कष्ट का अहसास कहाँ होता है ?” मैंने उत्तर दिया।

सुनीता के गुदाज बदन में ऐसी महक थी कि इंसान पागल हो जाए। ऐसी महक में भावनाओं पर क़ाबू पाना मुश्किल हो जाता है। यही कैफियत मेरी थी। मेरे खून की गर्दिश तेज होने लगी। मैं बर्दाश्त के बाहर होता जा रहा था। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ।

सुनीता ने आश्चर्य से कहा- “क्या मेरा तुम्हारे समीप आना अच्छा नहीं लगा ?”

मैंने उसकी तरफ़ देखे बिना कहा- “मुझमें बराबरी का साहस नहीं है। तुम धूप हो तो मैं छाँव हूँ। और छवि की जगह धूप के क़दमों में होती है। धूप न हो तो छाँव भी नहीं होती।”

“नहीं, यहाँ कोई धूप नहीं! कोई छाँव नहीं। सब बराबर की हैसियत रखते हैं।”

“लेकिन मैं यहाँ एक अजनबी हूँ।”

वह शायद अधिक बातें करती परंतु उसी समय साधु आ गया।

मैंने सिर झुकाकर अभिवादन किया। उसने हाथ के इशारे से बैठने के लिए कहा। तन्हाई में सुनीता से मेरी बातचीत से संभव था कि उसे अच्छा न लगा हो। लेकिन उसके चेहरे से ऐसा कुछ प्रकट नहीं होता था।

साहस बटोरकर मैंने उससे उसका नाम और पता पूछ ही लिया। और फिर अपने आगमन का उद्देश्य भी सुना दिया।
 
“मेरा नाम गोरखनाथ है। यही मेरा स्थान है और मैं मोहिनी देवी का सेवक हूँ। मोहिनी देवी ने मुझे बड़ा ऊँचा स्थान दिया है। मुझे यहाँ आने वालों के किस्मत का फ़ैसला करने के लिए छोड़ा है। बड़ी-बड़ी शक्ति रखने वाले भी यहाँ मेरे फ़ैसले के सामने सिर नवाते है। अगर वह मेरी आज्ञा का उल्लंघन करते हैं तो मोहिनी देवी के कहर से नहीं बच पाते। लोग यहाँ मोहिनी देवी के दर्शन को आते हैं क्योंकि मोहिनी देवी के दर्शन उपरांत कोई शक्ति शेष नहीं रह जाती है।

“अब तुम भी इसी इरादे को लेकर आए हो लेकिन तुम वह पहले मेहमान हो जिसके लिए मोहिनी देवी ने खुद मुझे हुक्म दिया है कि तुम्हें उनके पास पहुँचा दूँ।

“लेकिन तुम्हें जिन मुसीबतों से गुजरना पड़ेगा उसके लिए तुम्हें यहाँ परीक्षा देनी पड़ेगी। तभी मैं तुम्हें आगे जाने की आज्ञा दूँगा। बोलो, क्या तुम परीक्षा देने के लिए तैयार हो ?”

“हाँ, मैं तैयार हूँ! मैं अपने प्राण तक दे सकता हूँ।” मैंने जोश में कहा।

“तो फिर आओ मेरे साथ, समय बहुत कम है।”

वह मुझे लेकर बाहर निकला। थोड़ी दूर चलकर एक ऐसी जगह ले आया जहाँ दो-तीन झोंपड़ियाँ थी, मध्य भाग में पत्थरों का एक चबूतरा बना था। गोरखनाथ ने ताली बजाई। उसी क्षण सामने झोंपड़ी में से एक साँवले रंग की जवान नग्न शरीर की लड़की बरादम हुई। मैंने लड़की की तरफ़ सरसरी दृष्टि से देखा। गोरखनाथ लड़की के पास गया उसके कान में धीरे से कुछ कहा। लड़की तुरंत अंदर गयी और एक बड़ा सा प्याला, एक तेज धार का हथियार और एक टोकरी लेकर आई।

लड़की ने तीनों चीज़ें चबूतरे पर रख दी। फिर लड़की ने तीनों चीज़ों पर से ढकना उठाया तो सफ़ेद रंग का मोटा, पाँच फीट लम्बा साँप लहराता हुआ बाहर निकला। साँप को देखकर मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। गोरखनाथ ने हथियार उठाया और दूसरे हाथ से साँप का फन पकड़कर प्याले के मध्य रखा और साँप का फन काट दिया। साँप के खून की धार प्याले में गिरी। जब साँप के जिस्म से खून निकल चुका तो लड़की को संकेत से अपने क़रीब बुलाया। साँप के खून से भरा प्याला लड़की के सीने से लगाकर कुछ पढ़ने लगा जो साफ़ तौर से सुनाई नहीं पड़ रहा था।अब जो मंजर देखने वाला था उसे देखकर मैं काँप उठा।

गोरखनाथ ने तेज धार वाला हथियार लड़की के सीने में घोंप दिया। खून का फव्वारा निकलकर प्याले में गिरने लगा। प्यारा खून से लबालब भर गया। लड़की ने उफ तक नहीं की। बड़ी साहसी लड़की थी। वह निढाल होकर चबूतरे पर लेट गयी। गोरखनाथ ने कुछ मंतर पढ़कर खून भरे प्याले पर फूँक मारी और मुझे पेश किया।

“देवी के नाम का जाम पियो।”

इस पेशकश से मेरा दिमाग़ फटने लगा। मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि साँप और इंसान का मिश्रित खून पीने को मिलेगा। लेकिन मोहिनी मेरे दिलों दिमाग़ पर छाई थी। मेरा जीवन उसी का दान दिया था। उसके प्रति समर्पित था।

मैंने काँपते हाथ से प्याला थामा। मोहिनी देवी के दर्शन के लिए अगर यह कोई शर्त थी तो मैं तैयार था। मैंने प्याला होंठों से लगा लिया और आँखें बंद करके खून के घूँट उतारने लगा। साँस रुकी हुई महसूस हो रही थी। जिस्म काँप रहा था और मैंने चंद क्षणों में प्याला खाली कर दिया। ज़ोर की मितली आने लगी। पर उबकाई आने से पहले ही मैंने मुँह पर हाथ रख लिया। वह क्षण भी गुज़र गया।

मैंने गोरखनाथ की ओर देखा। उसका चेहरा ख़ुशी से खिल रहा था।

“शाबाश! तुमने बहुत साहस से काम लिया। आओ मेरे साथ।”

उसने साँप के कटे हुए सिर का बाकी हिस्सा उठाया और चल दिया। मैं भी उसके पीछे-पीछे चलने लगा। मेरा सिर चकरा रहा था पर मैं ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता था।

गोरखनाथ के घर के सामने आग जल रही थी। सुनीता हम लोगों को देखकर बाहर निकली और गोरखनाथ के हाथ से साँप लेकर चली गयी। मैं भी गोरखनाथ के साथ-साथ झोंपड़ी में प्रविष्ट हो गया और पुआल पर बैठ गया। सुनीता ने उस समय साँप को मेज़ पर रखा। छूरे से उसके टुकड़े-टुकड़े किए और एक लोहे की सीख में पिरोकर बाहर निकाली। फिर आग पर सीख रख दी। चंद क्षणों बाद साँप के माँस के जलने की सड़ांध फैली। बदबू नथनों में पहुँची तो साँस लेना दुर्भर हो गया। ज़ोरदार खाँसी आ गयी। मैं स्तब्ध बना यह दृश्य देख रहा था। जब साँप का माँस भुन चुका तो उसकी सीख मेरे पास आई। गोरखनाथ के हुक्म पर उसने मुझे सीख थमा दी।

“लो इसे खा लो! देवी का प्रसाद है। और जो संकट तुम पर आने वाले हैं उनसे सुरक्षित रहोगे।”

मुझे झुरझुरी सी आ गयी। मैंने सोचा इनकार कर दूँ किंतु इसका साहस अब कहाँ रहा था। मैंने खुद पर क़ाबू रखकर खाने की हिम्मत पैदा की और साँप की भुनी हुई बोटियाँ निगलने लगा। बोटियाँ हलक में अटकती लेकिन जबरन करके उन्हें हलक से नीचे उतार लिया।

जो अंदर गया था वह भी बाहर आने को तैयार था। हज़म करना बर्दाश्त के बाहर था। मैंने झटपट पानी पिया और पुआल पर लेट गया। आँखें बंद करके करवटें बलदने लगा। न जाने कितना समय बिता और मैं करवटें बदल-बदल कर पेट में जो कुछ था उसे हज़म करता रहा।
 
रात हो गयी और जब रात का कुछ हिस्सा गुज़र गया तो एक साया सा अंदर दाख़िल हुआ। गौर से देखने के बाद पता चला कि वह सुनीता थी। वह मेरे क़रीब आकर बैठ गयी। उसके जिस्म के लम्स से मेरे जिस्म में सरसराहट होने लगी।

मैंने जबरन आँखें बंद कर लीं। सुनीता भी मेरे पहलू में लेट गयी और मेरे बालों भरे सीने पर हाथ फेरने लगी। वह अपना चेहरा मेरे चेहरे के क़रीब ले आई। उसकी साँस मेरे साँसों से टकराने लगी। उसके सीने की धड़कनों से जाहिर हो रहा था कि वह जज्बात से मचली हुई थी। वह मेरे जिस्म पर हाथ फेरने लगी। उसकी साँसें निरंतर तेज होती जा रही थी। मेरे सीने में आग लग रही थी। मैं भी उसे अपने आगोश में समेटने के लिए बेताब हो गया।

अचानक एक झटका सा लगा और मुझे उस साधु का चेहरा नज़र आने लगा जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर मोहिनी देवी के लिए मुझे जीवन दान दिया था। सारा जीवन तो पाप करता रहा। अब मैं परीक्षा की घड़ियों से गुज़र रहा हूँ। मुझे लगा जैसे मोहिनी मुझे देख रही है, क्रोध भरी दृष्टि से। मैं एकदम से करवट बदलकर उठा और बाहर आ गया। बाहर ठंडी हवाओं ने दिमाग़ को राहत प्रदान की और वह सारी रात मैंने कशमकश में गुजारी।

सुबह गोरखनाथ मुझे लेकर ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ एक बड़े कढ़ाव के नीचे तेज आग धधक रही थी और कढ़ाव का तेल उबल रहा था। गोरखनाथ ने कढ़ाव के समीप मुझे खड़ा किया और मेरी परीक्षा लेने लगा।

सबसे पहले प्रश्न किया- “क्या तुम मोहिनी देवी के सच्चे पुजारी हो ?”

मैंने सिर हिलाकर जवाब दिया- “जी हाँ!”

“तो तुम मोहिनी देवी के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ा सकोगे ?”

मैंने ख़ुशी से कहा- “मोहिनी देवी के लिए मैं दिलों जान से हाज़िर हूँ।”

गोरखनाथ ने जलते हुए तेल में हाथ डालकर मेरे शरीर पर उछाल दिए। जैसे ही तेल के कतरे मेरे शरीर पर पड़े मैं उछल पड़ा। जिस जगह तेल गिरा था तेज जलन हो रही थी लेकिन मैंने साहस से काम लिया और उफ तक न की।

गोरखनाथ ने मुझे संबोधित करके कहा- “बालक, मोहिनी देवी के लिए तुम्हें इस कढ़ाव में छलांग लगाकर अपने प्राणों की बलि देनी होगी।”

यह सुनते ही दिल धक्क से रह गया। मौत, वह कष्टदायक मौत। मैं सोचने लगा। इनकार की गुंजाइश कहाँ थी और फिर मैं तो यूँ भी मरा हुआ आदमी था।

मेरी नज़रों के सामने मोहिनी का हसीन चेहरा घूमने लगा। उस वक्त वह बहुत दिलकश लग रही थी। मैंने मोहिनी पर कुर्बान होने का साहस पैदा किया।

“बालक, तेरी क्या इच्छा है ?” गोरखनाथ का स्वर सुनाई दिया।

“महाराज, मैं ख़ुशी से तैयार हूँ!”

गोरखनाथ ने मुझसे कढ़ाव में छलांग लगाने के लिए संकेत किया। उस वक्त तो बस मैंने मरने का फ़ैसला कर लिया। मौत से भला क्या खौफ था। जाने कितनी बार मौत से मुक़ाबला हो चुका था। मौत वह भी मोहिनी के लिए।

मैंने आँखें मूँदकर उबलते हुए कढ़ाव में छलांग लगा दी। दूसरे क्षण मेरा शरीर जल-भूनकर कबाब बन जाता कि कढ़ाव का तेल बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था। जैसे मैं पानी में तैर रहा हूँ। मैंने आँखें फाड़कर गोरखनाथ की तरफ़ देखा। गोरखनाथ ने मुझे बाहर आने का संकेत दिया और मुझे सीने से लगा लिया।

“इसका अर्थ यह हुआ कि मुझे विश्वास हो गया कि तुम ही वह सच्चे महापुरुष हो...।”

गोरखनाथ के स्वर में मेरे प्रति बड़ा सम्मान था। “और अब वह समय आ गया है जब काले बादल छँट गए हैं। मोहिनी देवी अपने मंदिर में सशरीर प्रकट हो गयी हैं। हाँ, सचमुच वह दिन आ गया है।”

गोरखनाथ ख़ुशी से गदगद हो रहा था। “कितनी सदियाँ बीत गयी, कुछ याद नहीं। यहाँ इस धरती पर खुद मेरा तीसरा जन्म है। मेरी जाति के लोग यहीं मरते खपते रहे हैं। मोहिनी देवी की राह तकते रहे हैं लेकिन वह समय नहीं आया। मेरा यह जीवन धन्य है जो तुम आ गए।
 
“तुम्हीं हो वह महापुरुष जिसने एक सौ एक साधुओं का मान तोड़ा था। वे साधु जो हिमालय की गोद में तप कर रहे थे। मोहिनी देवी से पराजित होकर उन्होंने घोर तपस्या की। और महाकाली का वरदान प्राप्त करके मोहिनी को महारानी से बांदी बना दिया। एक ऐसी बांदी जो कभी अपने मंदिर में नहीं लौट सकती थी। मोहिनी देवी का शरीर उसी मंदिर में क़ैद होकर रह गया और आत्मा भटकती रही। सदियाँ बीत गयी लोग पुजारी मोहिनी को बांदी बनाते रहे। उसे खिलौने की तरह नचाते रहे और वह भटकती रही, इधर से उधर। इंसानी लहू उसका अस्तित्व ज़िंदा रख सकती थी। लेकिन मोहिनी देवी ने कहा था एक दिन वह ज़रूर आएगी। तब तक कोई उसके शरीर के दर्शन नहीं करने पाए। कोई स्पर्श न करने पाए और हम यहाँ तब से अब तक दीवार बनकर खड़े हैं।

“यदि कोई मोहिनी देवी के शरीर का दर्शन कर लेता तो मोहिनी सदैव के लिए उसी की होकर रह जाती। फिर उसे कोई भी दूसरा व्यक्ति जाप करके प्राप्त न कर सकता। और अब जो इंसान सबसे पहले मोहिनी देवी का दर्शन करेगा, वह तुम होगे। यात्रा के लिए तैयार हो जाओ महाराज। मैं तुम्हें वहाँ ले चलूँगा। अब हमारे मार्ग में कोई रुकावट नहीं आएगी।”

मैं खामोशी से यह सब सुन रहा था।

“क्या हमें आगे भी यात्रा करनी होगी ?”

“हाँ महाराज! पहाड़ों के दामन में एक पुरानी कौम की रियासत आबाद है। वे लोग सारे संसार से बिल्कुल अलग-थलग हैं। वे किसी भी अजनबी को अपने रियासत में देखना भी पसंद नहीं करते। और जो अजनबी वहाँ तक पहुँच जाता है, वह आज तक ज़िंदा वापस नहीं लौटा। मुझे उस रियासत में राज-पुरोहित का दर्जा हासिल है। उनकी भाषा भी तुम्हें सीखनी होगी। रियासत में जो जाति आबाद है वह लड़ाकू कौम है। यह कौम सुदूर पश्चिम से यहाँ आई थी। उन्होंने तिब्बत के मार्ग से यहाँ प्रवेश किया। उनके पीछे एक ख़ूनी फ़ौज़ लगी थी। पहाड़ी रास्तों में चलते हुए उनके बहुत से सैनिक मारे गए। उनमें से चंद लोग बचे थे जो हिमालय के पहाड़ों में बरसों तक भटकते रहे। बताते हैं कि उनके सरदार ने मोहिनी देवी के दर्शन किए थे। और मोहिनी देवी ने उन्हें शरण दी थी। इन लोगों ने मार्ग में कई तप करते हुए साधुओं की हत्या की थी। वे इन्हीं पहाड़ियों में भटक-भटक कर मर जाते अगर मोहिनी देवी ने उन्हें शरण न दी होती। तभी से यह कौम वहाँ आबाद हो गयी। और उसी घटना के कारण साधु-संत मोहिनी से रुष्ट हो गए।

“एक सौ एक साधुओं ने हिमालय में तप किया। मोहिनी देवी के पुजारी भी हिमालय में आबाद थे। परंतु जीत आख़िर एक सौ एक साधुओं की हुई और मोहिनी देवी को श्राप मिल गया। फिर मोहिनी देवी का शरीर मंदिर में ही क़ैद हो गया और उसकी आत्मा भटकती रही। यह मंदिर एक ऐसी जगह है जहाँ आग के पहाड़ हैं। बर्फपोश चोटियों पर मंदिर कहीं छिपा है और पहाड़ों के दामन में एक वहशी कौम आबाद है परंतु तलहटी में बसी रियासत की महारानी पहाड़ों की रानी से खौफ खाती है और पहाड़ों की रानी कौन है, कोई नहीं जानता। बस जैसे-जैसे तुम इस यात्रा पर चलते रहोगे सब ज्ञान तुम्हें प्राप्त होता रहेगा। मुझे मोहिनी ने स्वप्न में दर्शन दिए थे और हुक्म दिया था कि तुम्हें वहाँ पहुँचा दूँ लेकिन मेरे लिए यह भी आवश्यक था कि तुम्हारी परीक्षा लूँ। परीक्षा में तुम संपूर्ण उतरे। तो ऐ महाराज, कल सुबह हम यात्रा पर प्रस्थान करेंगे।”

मैंने आगे कुछ न पूछा। वह सारे रहस्य जो समय के गर्त में दबे थे निकट भविष्य में खुलकर सामने आने वाले थे।

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यात्रा बड़ी विहंगम थी। गोरखनाथ ने यात्रा के लिए जो सवारी चुनी थी वह एक काला सांड था। कद में छोटा परंतु बड़ा ही फुर्तीला और शक्तिशाली था। हम दोनों उसी सांड पर बैठे थे। मुझे हैरत होती थी कि वह सांड इतने ग्रान्डिल व्यक्ति को बर्दाश्त कर रहा है। ऊपर से मेरा बोझ भी लदा था। सामान के नाम पर बस एक पोटली थी। गोरखनाथ के हाथ में एक त्रिशूल था जिस पर एक निशान लहरा रहा था। रास्ते में जितनी भी वहशी कौमें पड़ी सबने गोरखनाथ का स्वागत किया।

उस क्षेत्र में गोरखनाथ का बड़ा सम्मान था। वह एक बड़े जादूगर की हैसियत रखता था। रास्ते में किस-किस तरह की मुसीबतें आई इसका मैं वर्णन करके अपनी आपबीती को लम्बा नहीं करना चाहता क्योंकि यदि उस रहस्यमय प्रदेश के प्रत्येक भू-भाग पर एक पुस्तक लिखी जाए तो वह भी कम होगी। शक्तिशाली सांड हमें पहाड़ी रास्तों पर ढोता रहा। रास्ते में बहुत से लामा मिले, साधु-संत मिले और मेरा ध्यान-ज्ञान बढ़ता रहा। एक मठ में हमने कई दिन विश्राम किया जहाँ मुझे कुछ पुरानी पुस्तकों के अध्ययन का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। मैं यहाँ की भाषाएँ भी सीख रहा था। विशेषकर उस रियासत में बोली जाने वाली भाषा मुझे गोरखनाथ सिखाता रहा। कई एक पहाड़ी दरों में बंद मार्गों को गोरखनाथ ने अपने जादू के तिलिस्म से खोला था। और मेरी समझ में यह बात आती रही कि उस जगह तक किसी इंसान का पहुँचना क्यों असंभव है।

हम कभी बर्फपोश पहाड़ों से गुजरते तो कभी पहाड़ों की तलहटी हमारा मार्ग होती। खाने-पीने की कोई विशेष परेशानी हमारे सामने नहीं आई। रास्ते में फल-फूल और जड़ी-बूटियों का सेवन, पहाड़ी स्रोतों का निर्मल जल। इन सबके सेवन से मेरे भीतर एक नई शक्ति का अंकुर फूटता जा रहा था। हम एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल तय करते रहे। रात-दिन और समय का तो कोई हिसाब नहीं परंतु एक मोटे हिसाब से हमें वहाँ पहुँचने में छः माह अवश्य लगे होंगे। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि निरंतर पहाड़ों में छः माह तक यात्रा करते-करते किसी आदमी का क्या हाल हो सकता है।

एक जगह मैंने गोरखनाथ से पूछा-

“महाराज, अगर कभी आपको तुरंत ही रियासत में पहुँचना पड़े तो क्या इतना ही समय लगेगा ?”

गोरखनाथ ने भेद भरी मुस्कान से मेरी तरफ़ देखा। “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं! हालाँकि मैं अपनी इच्छा से ही साल दो साल में एकाध बार वहाँ पहुँचता हूँ। फिर भी देवी की कृपा हो तो यह फासला मेरे लिए चंद घंटों का हो जाता है लेकिन तुम अभी आम मनुष्य हो। वह शक्तियाँ तुम्हें प्राप्त नहीं है इसलिए तुम्हें उतना ही समय लगेगा जितना कि एक साधारण आदमी को लगना चाहिए।”

फिर हम एक तैराई में पहुँचे जो दूर से एक भरी झील का टुकड़ा मालूम होती थी। कदाचित यह स्थान तिब्बत या चीन का कोई भू-भाग था। हरी-भरी झील का दूर से दिखने वाला यह टुकड़ा बाद में हरियाली में बदल गया। शाम का वक्त था और बस्ती में धुआँ उठ रहा था।

तराई में उस तरह पहाड़ों की ऊँची-ऊँची चोटियाँ थी जिन पर बर्फ़ लदी थीं और एकाध पहाड़ ऐसा भी था जिससे धुआँ निकलता दिखायी पड़ता था। गोरखनाथ ने मुझे बताया कि वहीं आग के पहाड़ हैं और उन्हीं पहाड़ियों में कहीं मोहिनी देवी का मंदिर है लेकिन वहाँ मंदिर का कोई निशान तक नज़र न आता था। बल्कि वे पहाड़ियाँ बड़ी खौफनाक मालूम होती थीं। मेरी समझ में नहीं आता था कि अगर हम वहाँ पहुँच भी गए तो मोहिनी देवी का मंदिर किस तरह तलाश करेंगे। लेकिन इस बारे में मैंने गोरखनाथ से कोई पूछताछ नहीं की।

जब हम रियासत में दाख़िल हुए तो सीमा पर ही हमारा स्वागत किया गया। वे लोग कद-काठी में लम्बे-चौड़े थे, रंगत से एकदम गोरे-चिट्टे और खूबसूरत थे। चीनी या तिब्बती चेहरे नहीं थे बल्कि वह जाति तो पहाड़ों में बसी जातियों से बिल्कुल ही अलग नज़र आती थी।

एक छोटी सी घुड़सवार टुकड़ी थी जिसने गोरखनाथ को बाकायदा अपने परंपरा के अनुसार सलामी दी और एक बूढ़े व्यक्ति ने आगे बढ़कर हमारा स्वागत किया।

“यह राज-ज्योतिषी सरमोन हैं।” गोरखनाथ ने मुझे बताया।

फिर गोरखनाथ उनकी भाषा में बात करने लगा। वह भाषा भी अब मेरे लिए अजनबी न थी।

“कदाचित यह वही अतिथि है।” सरमोन ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा। “जिसके लिए पहाड़ों की रानी ने हमारे पास फरमान भेजा था और हम प्रतीक्षा कर रहे थे। क्या नाम बताया इनका ?”

“कुँवर राज ठाकुर ?” गोरखनाथ ने परिचय कराया तो सरमोन मेरे सामने अदब से झुक गया।

“सरमोन, राज ज्योतिषी आपका स्वागत करता है, ऐ कुँवर!”

मैंने भी उसी अंदाज़ में सिर झुकाकर उसका उत्तर दिया।
 
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