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Guest
“तुम तो डॉक्टर हो, इतना अधिक निराश होने से बात नहीं बनेगी... आजकल तो आँखें कोई बड़ी समस्या नहीं। इंसान यदि जन्मजात अँधा न हो तो उसे नेत्र ज्योति दी जा सकती है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि लम्बी बेहोशी या बीमारी में कोई अंग काम करना बंद कर देता है पर वह अस्थाई होता है, परन्तु इलाज़ करने से हल निकल आता है। इस बारे में तुम तो मुझसे अधिक जानते होगे। मैं तो इतना जानता हूँ इसी प्रकार एक बार मेरा दायाँ हाथ बेकार हो गया था पर दो महीने बाद ठीक हो गया। हौसला छोड़ने से काम नहीं बनता।”
वह मुझे सान्त्वना देता रहा।
कुछ समय बाद उत्तेजना कम हुई और बुद्धि काबू में आई।
“हम आज ही सूरज गढ़ के लिए रवाना हो जाते है।”
“तुम मेरे साथ क्यों कष्ट कर रहे हो ?”
“यह कष्ट नहीं कर्त्तव्य है। आज की दुनिया में तो इश्वर भी इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने बन्दों को कर्त्तव्य निभाने का अवसर ही नहीं देता और जब देता है तो इंसान कर्त्तव्य भूल कर अपने स्वार्थ में डूबा रहता है या उसे अपने ही कामों से फुर्सत नहीं मिलती और वह नरक का भोगी बन जाता है। क्या जाने यह मेरी परीक्षा ही हो... क्या जाने तुम्हारे स्वर्गीय पिता की आत्मा ने मुझे तुम्हारी सहायता के लिए प्रेरित किया हो।”
“तुम बहुत अच्छे विचारों के आदमी मालूम पड़ते हो, काश कि मैं तुम्हें देख सकता।”
“देखने में मेरे पास कोई ख़ास बात नहीं। न मैं बांका छबीला नौजवान हूँ और न बड़ी दाढ़ी और लम्बी बाल वाला धर्मात्मा... मैं तो चेहरे से खूसट नजर आने वाला व्यक्ति हूँ... जिसके चेहरे पर दाढ़ी की जगह झाड़ी के सूखे तिनके है... और भद्दी मूंछे.... गाल पर बारूद से जल जाने के कारण धब्बा है और आँखे किसी क्रूर फौजी जनरल जैसी... शरीर पर खाकी पोशाक है... हाथ में बन्दूक... मेरा हुलिया एक डकैत से भी बदतर है... हाँ शारीर मजबूत अवश्य है, इसलिए जंगली जानवरों से नहीं डरता।”
“काफी दिलचस्प आदमी लगते हो।”
“हद से अधिक जानवर भी यही सोचते है, इसलिए पास भी नहीं फटकते... अच्छा तुम थोड़ी देर आराम करो, इतने मे मैं तैयारी करता हूँ।
मेरी पीठ के नीचे रबर के तकिये रख कर वह कहीं चला गया।
शाम को हमने यात्रा शुरू की और अगले दिन सूरजगढ़ पहुँच गए। मेरे बताये पते के अनुसार वह कस्बे में गया। इस बीच उसने मुझे कस्बे से बाहर ही छोड़े रखा।
जब वह लौटा तो बोला – “तुमने सच कहा। वह मकान जल कर राख हो गया है। कोई आदमी कुछ बताता ही नहीं। क्या सूरज गढ़ी के ठाकुर का इतना दबदबा है ?”
“मैं पहले ही कह चुका था।”
“न जाने तुम्हारी सौतेली मां का क्या हुआ... खैर... विक्रमगंज चलते है।वहीं थाना पड़ता है... वहाँ एक हाकिम से मेरी जान पहचान है। मैं नहीं चाहता की तुम्हें पुनः कोई चोट पहुंचे और रहा मेरा सवाल... तो मैं तब तक शिकार पर हाथ नहीं डालता जब तक उसकी ताकत का पूरा-पूरा हिसाब-किताब न लगा लूँ... मैं तो फौजी उसूलों पर चलता हूँ... वार सही जगह होनी चाहिये... फिर बड़े से बड़ा महारथी धराशाई हो जाता है।”
हम लोग विक्रमगंज की ओर चल पड़े। उसके पास अपनी जीप थी, जिसमे सभी जरूरी सामान हर समय रहता था। मेरे शरीर में हल्की-हल्की पीड़ा उस वक़्त भी थी।
हमने विक्रमगंज के थाने में रिपोर्ट लिखवाई। वे लोग गढ़ी वालों के खिलाफ कोई रिपोर्ट लिखने के लिए तैयार नहीं थे। परन्तु मेरे उस दोस्त ने फौजी रुआब दिखाया तो वे मान गए।
“अब मैं अपने उस हाकिम दोस्त से मिलूँगा –अरे हाँ... तुम यहीं तो रहते हो... मैं चाहता हूँ अब तुम आराम करो... यह दौड़धूप मैं कर लूंगा।
मैंने अपना पता बता दिया।
उस वक़्त मैं दो कमरों के एक सरकारी मकान में अकेला रहता था। अभी मैं यहाँ नया-नया आया था... नौकर नहीं रखा था... वहां मुझे बहुत कम लोग जानते थे। इन दिनों मैं पंद्रह रोज की छुट्टी पर था।
***
वह मुझे सान्त्वना देता रहा।
कुछ समय बाद उत्तेजना कम हुई और बुद्धि काबू में आई।
“हम आज ही सूरज गढ़ के लिए रवाना हो जाते है।”
“तुम मेरे साथ क्यों कष्ट कर रहे हो ?”
“यह कष्ट नहीं कर्त्तव्य है। आज की दुनिया में तो इश्वर भी इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने बन्दों को कर्त्तव्य निभाने का अवसर ही नहीं देता और जब देता है तो इंसान कर्त्तव्य भूल कर अपने स्वार्थ में डूबा रहता है या उसे अपने ही कामों से फुर्सत नहीं मिलती और वह नरक का भोगी बन जाता है। क्या जाने यह मेरी परीक्षा ही हो... क्या जाने तुम्हारे स्वर्गीय पिता की आत्मा ने मुझे तुम्हारी सहायता के लिए प्रेरित किया हो।”
“तुम बहुत अच्छे विचारों के आदमी मालूम पड़ते हो, काश कि मैं तुम्हें देख सकता।”
“देखने में मेरे पास कोई ख़ास बात नहीं। न मैं बांका छबीला नौजवान हूँ और न बड़ी दाढ़ी और लम्बी बाल वाला धर्मात्मा... मैं तो चेहरे से खूसट नजर आने वाला व्यक्ति हूँ... जिसके चेहरे पर दाढ़ी की जगह झाड़ी के सूखे तिनके है... और भद्दी मूंछे.... गाल पर बारूद से जल जाने के कारण धब्बा है और आँखे किसी क्रूर फौजी जनरल जैसी... शरीर पर खाकी पोशाक है... हाथ में बन्दूक... मेरा हुलिया एक डकैत से भी बदतर है... हाँ शारीर मजबूत अवश्य है, इसलिए जंगली जानवरों से नहीं डरता।”
“काफी दिलचस्प आदमी लगते हो।”
“हद से अधिक जानवर भी यही सोचते है, इसलिए पास भी नहीं फटकते... अच्छा तुम थोड़ी देर आराम करो, इतने मे मैं तैयारी करता हूँ।
मेरी पीठ के नीचे रबर के तकिये रख कर वह कहीं चला गया।
शाम को हमने यात्रा शुरू की और अगले दिन सूरजगढ़ पहुँच गए। मेरे बताये पते के अनुसार वह कस्बे में गया। इस बीच उसने मुझे कस्बे से बाहर ही छोड़े रखा।
जब वह लौटा तो बोला – “तुमने सच कहा। वह मकान जल कर राख हो गया है। कोई आदमी कुछ बताता ही नहीं। क्या सूरज गढ़ी के ठाकुर का इतना दबदबा है ?”
“मैं पहले ही कह चुका था।”
“न जाने तुम्हारी सौतेली मां का क्या हुआ... खैर... विक्रमगंज चलते है।वहीं थाना पड़ता है... वहाँ एक हाकिम से मेरी जान पहचान है। मैं नहीं चाहता की तुम्हें पुनः कोई चोट पहुंचे और रहा मेरा सवाल... तो मैं तब तक शिकार पर हाथ नहीं डालता जब तक उसकी ताकत का पूरा-पूरा हिसाब-किताब न लगा लूँ... मैं तो फौजी उसूलों पर चलता हूँ... वार सही जगह होनी चाहिये... फिर बड़े से बड़ा महारथी धराशाई हो जाता है।”
हम लोग विक्रमगंज की ओर चल पड़े। उसके पास अपनी जीप थी, जिसमे सभी जरूरी सामान हर समय रहता था। मेरे शरीर में हल्की-हल्की पीड़ा उस वक़्त भी थी।
हमने विक्रमगंज के थाने में रिपोर्ट लिखवाई। वे लोग गढ़ी वालों के खिलाफ कोई रिपोर्ट लिखने के लिए तैयार नहीं थे। परन्तु मेरे उस दोस्त ने फौजी रुआब दिखाया तो वे मान गए।
“अब मैं अपने उस हाकिम दोस्त से मिलूँगा –अरे हाँ... तुम यहीं तो रहते हो... मैं चाहता हूँ अब तुम आराम करो... यह दौड़धूप मैं कर लूंगा।
मैंने अपना पता बता दिया।
उस वक़्त मैं दो कमरों के एक सरकारी मकान में अकेला रहता था। अभी मैं यहाँ नया-नया आया था... नौकर नहीं रखा था... वहां मुझे बहुत कम लोग जानते थे। इन दिनों मैं पंद्रह रोज की छुट्टी पर था।
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