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Horror अगिया बेताल

कल्लू- अब हो गई गलती तो क्या बच्चे की जान लोगी ?

नही नही तुम्हारा ये ६ इंच का बच्चा मेरी इस बच्ची (अपने हाथ को कल्लू मेहतर के उस हाथ पर रख के दबाते हुए जो उसकी चूत पर था) की जान ले तो कोई बात नही |है न? रूठते हुए कल्लू की पत्नी बोली |

कल्लू की पत्नी-चलो मैं थूक हाथ में ले के लण्ड पर लगा देती हूँ, लेकिन मुँह में ले के चूसूंगी नही |

कल्लू-अरे यार ये सभी लोग करते हैं, अच्छा चूसोगी नही तो चूसने तो दोगी न ?

अब मैं बेचैन हो गया था और सोचने लगा की क्या करना चाहिए |

तभी कल्लू की पत्नी बोली हाँ चूसो न किसने मना किया है ?

अच्छा जी, मज़ा लेने को तो तैयार बैठी हो पर मज़ा देने को नही | ये तरीका सही नही है |

समझो कल्लू;मुँह में लेने पर उबकाई आती है | अजीब सा कसैला स्वाद आता है तुम्हारे निकलते हुए रस का | तुम्हारे धक्कों के कारण गले में खराश

भी हो जाती है | जब टाइम होता है तब मै ट्राई तो करती ही हूँ न ? | बोलो चुसती हूँ की नही?

हाँ वैसे तो चुसती हो |

अभी टाइम नही है हमारे पास | हमारे पास बस एक घंटा है | इस एक घंटे में मुझे करवा के सोना भी है मुझे नींद भी आ रही है वरना सारी गड़बड़ हो जाएगी |

अरे चिंता मत कर जान.......... यह कहते हुए कल्लू मेहतर ने हाथ पीछे ले जा कर अपनी पत्नी की ब्रा उतार फेंकी| बस थोड़ी देर की बात है बोल तो

पटा के तेरी मॉम को चोद दूँ फिर उसके बाद उसे भी यही बुला लेंगे फिर तीनो घर में गद्देदार बिस्तर पर चुदाई का मज़ा लूटेंगे |

देखो मुझे ये सब ठीक नही लगता | कहीं माँ और बेटी एक ही मर्द से करवा सकती हैं क्या?

क्यों नही अगर मर्द में इतनी ताकत हो की दोनो औरतों को संतुष्ट कर सके ?

तुम अकेले मुझे तो ठीक से संभाल नही पाते | १० बार में से कम से कम ८ बार तो मै ही जीतती हूँ | यानी तुम कंट्रोल नही कर पाते और मुझसे पहले झड़ जाते हो |

लेकिन चूस के तेरा काम भी तो कर देता हूँ न |

जो मज़ा अंदर डलवा के एक साथ झड़ने में है वो चुसवा के झड़ने में कहाँ ? जिस दिन तू मेरे साथ मेरी चूत में झड़ता है उस दिन की तो बात ही क्या ? चल पहले बेटी को खिला माँ की बाद में सोचना............. यह कहते हुए कल्लू की पत्नी अपनी पैंटी को उतार देती है और अपने हाथ पर थूक कर वो थूक कल्लू मेहतर के लण्ड पर मल देती है | ऐसा कई बार करने के बाद कल्लू मेहतर का लण्ड थूक के कारण चमकने लगता है और पूरी तरह से कड़क होकर अपने काम के लिए तैयार हो जाता है |

अब कल्लू की पत्नी लेट जाती है और कल्लू मेहतर को बोलती है ......चल जल्दी से अंदर तक जीभ डाल कर अच्छी तरह गीला कर दे |

कल्लू मेहतर उठ कर अपनी पत्नी की दोनों टांगों के बीच आ जाता है और टांगों को कंधे पर रखते हुए ऐसे झुकता है की उसका मुँह अपनी पत्नी की चुत के ठीक सामने आ जाता है | जीभ निकाल कर कल्लू मेहतर भाग्नासे को जीभ से धीरे धीरे सहलाता है | यह सिलसिला करीब दो मिनट तक चलता है

उसके बाद कल्लू की पत्नी दोनों हाथों से कल्लू मेहतर का सर पकड़ कर पूरी ताकत से अपनी चुत पर दबाते हुए अपनी कमर को ऊपर की तरफ उछालते हुए जोर से सित्कारती है......... ऊऊऊऊऊऊउफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़ साले खा जा | चूस जोर से नही हो तो बुला ले अपने बाप को भी | मेरी माँ की लेने चला था | तू और तेरा बाप दोनों पहले मुझे तो संभाल लो | आआआअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह खा जा आज इस चूत को | बहुत परेशान करती है ये |

इधर कल्लू मेहतर बिना कुछ बोले गूँ गूँ करता हुआ अपनी पत्नी की चूत चाटते जा रहा था | करीब १० मिनट चाटने के बाद वो उठा और बोला साली मैने इतनी देर चाटा तो तुझे एक मिनट ही सही लेकिन चूसना तो पड़ेगा ही ? यह कहते हुए कल्लू मेहतर ने अपने लण्ड का सूपाड़ा उस के होठों पर रख दिया |

कल्लू की पत्नी अपना मुँह दूसरी और घुमाने लगी तभी कल्लू मेहतर ने एक हाथ से उसकी एक चूची को बहुत जोर से मसल दिया | दर्द के मारे कल्लू की पत्नी का मुँह खुला आआआआआआआआआआआईईईईईईईईईईईई माआआआआआआआआआआआआआआआ और शायद कल्लू मेहतर इसी की फिराक में था | उसने पीछे से उसका सर पकड़ा और अपने लण्ड को उसके मुँह के अंदर ठेल दिया | लण्ड ज्यादा नही लेकिन सुपाड़ा और उसके पीछे का लगभग एक ईंच का हिस्सा कल्लू की पत्नी के मुँह में घुस चुका था |
 
कल्लू की पत्नी छूटने की पूरी कोशिश कर रही थी लेकिन उसका सर कल्लू मेहतर के कब्जे में था और अब तक उसने लण्ड को मुँह में अंदर बाहर करना शुरू कर दिया था | कल्लू मेहतर के चेहरे को देख के ही इस बात का एहसास हो रहा था की वो इस वक्त एक ऐसा आनंद प्राप्त कर रहा है

जिसका ब्यान शब्दों में नही किया जा सकता उसके लिए तो किसी लड़की से लण्ड चुसवा कर महसूस ही करना पड़ेगा | अपनी पत्नी का मुँह चोदते

हुए कल्लू मेहतर बड़बड़ा रहा था.............. आह चूस मेरी जान आज सारा रस ले ले मेरी रानी ओह कमला |

इधर कल्लू की पत्नी गूंऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ गुंऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ करते हुए मजबूरी में ही सही लेकिन कल्लू मेहतर का लण्ड चुसे जा रही थी | लेकिन उसने जैसे ही कमला शब्द कल्लू मेहतर के मुँह से सुना मानो उसमे कहाँ से ताकत आ गई और उसने पूरी जोर से धक्का लगा कर कल्लू मेहतर को अपने ऊपर से हटाया और जैसे ही कल्लू मेहतर का लण्ड उसके मुँह से बाहर निकला वो बोली तुझे कसम है आज सच बता ?

कल्लू मेहतर सकपका गया | उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था लेकिन बात तो मुँह से निकल गई थी | क्या बताऊँ?

मुझे पूरा शक है की तू मेरी मम्मी के साथ भी....

...............

ये तू क्या कह रही है ? पागल हो गई है क्या |

फिर तूने मेरी मम्मी का नाम कैसे लिया ?

अरे यार कमला इस दुनिया में केवल तेरी मम्मी का नाम है क्या ? कोई और नही हो सकती?

मतलब कोई है जरूर ये तो तुने मान लिया |

अब कल्लू मेहतर फँस चुका था ! सुन, ये बातें हम चुदाई के बाद भी कर सकते हैं | क्या बोलती है ?

कल्लू की पत्नी भी गर्म तो हो ही चुकी थी सो तैयार हो गई | चल ठीक है ..............कहते हुए कल्लू की पत्नी ने खोले हुए सारे कपड़ों का एक गट्ठर सा बनाया और उसे अपनी कमर के नीचे रख दिया | फिर दोनों टांगों को फैला कर लेट गई | इस बीच कल्लू मेहतर उसकी दोनों टांगों के बीच आ गया और उस की जांघे अपनी दोनों जाँघों पर रख लण्ड के सुपाड़े को चूत की दरार पर रगड़ने लगा |
 
अभी उसने दो चार बार ही रगड़ा होगा की कल्लू की पत्नी ने अपने हाथ से चूत की फाँकों को फैला दिया और बोली ...............यार अब घुसा दे , टाइम ज्यादा नही है अपने पास | अब मुझे तेरे लण्ड के धक्कों की ज़रूरत है | कल्लू भी लण्ड चुसाई के कारण अपने चरम के निकट पहुँच चुका था सो उसे भी अब चूत मारने की जरूरत महसूस होने लगी थी | कुल मिला कर उन दोनों बैचैन थे चुदाई के लिए |

कल्लू मेहतर बोला ये ले संभाल मेरे छोटू की चोट अपनी मुनिया पर और यह कहते हुए कल्लू मेहतर ने चूत के छेद पर लण्ड का सुपाड़ा टिका कर एक हल्का लेकिन लम्बा धक्का दिया या यूँ कहें की लगभग ३० सेकेण्ड का समय ले के बिना रुके एक ही धीमी रफ्तार से लण्ड को चूत में तब तक पेलते गया जब तक उसका लण्ड जड़ तक पत्नी की चूत में दाखिल नहीं हो गया |

इस दौरान कल्लू की पत्नी के मुँह से आनन्दातिरेक चीख निकल गई .........आआआआआआआऐईईईईईईईईईईईई ऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊ हाआआआआआआआआय्य्य्य्य तेरा इस तरह घुसाना ही मुझे तेरा दीवाना बना देता है रे कल्लू | और कल्लू की पत्नी अपनी दोनों टांगें कल्लू मेहतर की कमर में लपेट देती है |

सुन कल्लू की जान ...... यह कहते हुए कल्लू मेहतर उसी तरह धीरे से लण्ड को चूत से बाहर निकाल लेता है केवल सुपाड़े को छोड़ कर |

अरे कल्लू मेहतर तेरा सुपाड़ा तो फुल पिचक रहा है | मतलब तू अब कुछ देर का ही मेहमान है| आज फिर मुझे मुँह से ही करेगा क्या ?

नही कल्लू की रानी, टाईम देख काफ़ी टाइम हो गया हैइसीलिए तो बोल रहा हूँ की मैं तुझे चोदता हूँ और साथ में तू अपने हाथ से अपना भगनासा रगड़ | इस तरह हम दोनों एक साथ झड़ जाएँगे |

चल ठीक है अब तू पैसेंजर से सुपरफास्ट बन और लगा हुमच कर धक्के |

ये ले मेरी जान और ये कहते हुए एक ज़ोरदार धक्के के साथ कल्लू मेहतर ने पूरा लण्ड पत्नी की चूत में पैबस्त कर दिया और लगा धक्के लगाने |

कल्लू की पत्नी और कल्लू मेहतर की कमर के टकराने से थप थप थपा थप की आवाज़, चूत में लण्ड अंदर बाहर होने से फच फच फचर फचर फचा फच की आवाजें और कल्लू की पत्नी और कल्लू मेहतर की बहकी हुई सिस्कारियां और आनंद में डूबी हुई आवाजें.......... आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मेरे बालम मार ले, ले ले सारा मज़ा, चोद दे अपनी रानी को, फाड़ डाल साली चूत को | अरे मम्मी से ज्यादा मज़ा

मुझमे है उसे छोड़ और मुझे चोद मेरे बालम | बहुत परेशान करती है साली चूत ; ठंडी कर दे इसकी गर्मी मेरे राजा और कल्लू मेहतर हंह हंह हूँ हूँ

आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ये ले साली चूस ले सारा रस | इतनी टाईट कैसे है रे इतना चुदने के बाद भी | अरे चूस लिया रे साली ले ले मेरा रस अपनी चूत में आआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह मैं गया रे मादरचोद तेरी माँ की चूत मारूं |

कल्लू की पत्नी भी अब आने वाली थी लेकिन कल्लू मेहतर के सुपाड़े के फूलने पिचकने के कारण उसे महसूस हो गया था की अब वो झड़ेगा तो वो

बोली ..........अरे कल्लू अंदर मत झड़ना | जल्दी बाहर निकाल |

अरे तेरी माँ की; साली थोड़ी हल्दी ले लेना | मज़ा किरकिरा मत कर और ये कहते हुए कल्लू मेहतर ने एक ज़ोरदार धक्का अंदर ठेला और लण्ड जड़ तक चूत में डाल कर झड़ने लगा आआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह अरे साली ले ले सारा रस और उसके लण्ड से पहली पिचकारी छूटी और उसकी पत्नी की बच्चेदानी पर पड़ी |

उसकी गर्मी और गुदगुदाहट ने कल्लू की पत्नी को भी झड़ने पर मजबूर कर दिया | ऊऊऊऊऊऊऊऊऊईईईईईईईईईईईईईई मैं भी आई मेरे बालम आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह भर दे मेरी चूत को अपने लण्ड के रस से | तभी कल्लू मेहतर के लण्ड से दूसरी पिचकारी छूटी | इस तरह कल्लू मेहतर के लण्ड ने पांच पिचकारियाँ छोडीं और हर पिचकारी के साथ कल्लू मेहतर और कल्लू की पत्नी दोनों झटका खाते हुए एक दूसरे को इस तरह जकड़ लेते मानो उन दोनों के बीच हवा भी पास नही हो सकती | दोनों झड़ने के बाद निश्चल पड़े रहे
 
उनकी गरमा गर्म चुदाई देख कर मेरा सारा शरीर पसीने से तर बतर हो चुका था और बुरी तरह तप रहा था तभी मुझे याद आया कि मैं यहाँ क्या करने आया था

ठीक दहलीज़ के सामने मैंने बेताल वाली खोपड़ी गाड़ दी। अब बेताल ने उस घर को बाँध लिया था। अपना काम ख़त्म करके मैं खिसक गया और निकट ही वट वृक्ष के नीचे बैठ गया।

……………………………….

अँधेरी रात थी।

आसमान सूना-सूना लग रहा था।

रात के तीसरे पहर मेहतर के घर में चीख पुकार का शोर मचा। आतंक में डूबा रुदन शुरू हुआ और मैंने मेहतर को बाहर निकलते देखा। वह जल्दी-जल्दी पड़ोसियों के मकान की तरफ जा रहा था, मैंने दौड़कर अँधेरी राह पर उसका रास्ता रोक लिया।

“अलख निरंजन...।” मैंने जोर से कहा।

वह एकदम डर गया। अन्धेरे में मेरी खौफनाक आकृति किसी को भी दहशत में डाल सकती थी, वह काँपता हुआ पीछे हटा।

“तेरा नाम कल्लू मेहतर है ?”

“हां...हां...।”

“और तेरी बीवी गर्भवती है क्यों...?”

“हाँ...।उसका पेट गुब्बारे की तरह फूलता जा रहा है... मुझ पर रहम करो... आप कोई अन्तर्यामी लगते हो...?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“औघड़ बाबा सब ठीक कर देगा... एक जुगत लड़ानी होगी।”

“क्या ?”

“मेरे साथ आ।”

वह मेरे पीछे-पीछे आ गया, मैं उसे वटवृक्ष के पीछे झाड़ी-झंकार में ले गया। वह बहुत डरा हुआ था, पर सम्मोहित सा मेरे पीछे आ गया। उसने भागने का प्रयास नहीं किया।

“औघड़ बाबा ! मेरी बीवी की जान बचा दो।”

“बच जाएगी... लेकिन तेरे घर का विनाश मुझे नजर आ रहा है।”

“बाबा...कोई उपाय नहीं।”

“उपाय है...मगर तेरा हौसला नहीं।”

“अपनी बीवी के लिए जान भी दे सकता हूँ।”

“यह बात है तो सुन। तेर घर में जो भूत घुसे हैं, मैं उन्हें बाँधकर रखता हूँ... तुझे एक काम करना होगा।”

“क्या ?”

“गढ़ी में एक शमशेर सिंह नाम का आदमी रहता है...रहता है न...।”

“हाँ...।”

“वह तेरी सुंदर बीवी पर बुरी निगाह रखता है... और यह काम उसी ने किया है।”

“हे भगवान् – मैं क्या करूँ... वह तो बड़ा जालिम है।”

“उस जालिम पर मैं उलटा भूत मार दूंगा और तेरा घर विनाश लीला से बच जाएगा, लेकिन तुझे एक काम करना होगा।”

“क्या ?”

“जब तक शमशेर गढ़ी के भीतर है, तब तक उस पर भूत असर नहीं डाल सकता, तुझे यह पता करना होगा की गढ़ी से बाहर वह कब निकलता है और कहां-कहां जाता है। तुझे बड़ी सावधानी से इसका पता निकालना होगा। किसी को कानो कान खबर न लगे... और तेरे घर में जो कुछ हो रहा है उसका किसी से जिक्र न करना... बोल यह काम कर सकेगा ?”

“कर लूंगा... यह कोई मुश्किल काम नहीं।”

“अब जाकर घर के लोगों को शांत कर तेरी बीवी को कुछ नहीं होगा, और सुन...तुझे लिखना आता है।”

“थोड़ा-थोड़ा।”

“तो तू जो कुछ मालूम करे वह कागज़ में लिखकर वटवृक्ष की जड़ में छोड़ता रह... रोज रात को तुझे यह काम करना है... आ मैं बताता हूँ कहाँ पर कागज़ छोड़ना है।”

मैंने उसे कागज़ छोड़ने की जगह बताई और उसे रुखसत किया। अब मैंने पास के जंगल की शरण ली।

जब तक मुझे सारी रिपोर्ट नहीं मिल गई तब तक मैं उसी कस्बे के आस-पास भटकता रहा, मैंने अपने आपको लोगों की निगाह से बचा कर रखा – क्योंकि ठाकुर के कुत्ते मेरी गन्ध सूंघते फिर रहे थे।

आखिर मुझे एक विशेष जानकारी मिली, मेरा काम बन गया था। शमशेर सिंह एक अय्याश आदमी था और हर दूसरे-तीसरे रोज एक सुंदर वैश्या के यहाँ जाता था, आधी रात तक वहीं रहता था।

इस वैश्या का नाम कमला बाई था और यह उसी कसबे में रहती थी, कमला बाई के कोठे पर नाच गाना भी होता था और वह ठाकुरों की चहेती थी। शमशेर उस पर दिलो जान से फ़िदा था।
 
रात्रि के तीन बज रहे थे।

आसमान पर उतर आया चाँद थकान से चूर हो गया लगता था और वह आसमान से पलायन करने की तैयारी कर रहा था। उसकी चांदनी फीकी-फीकी लग रही थी।

कमला बाई एक घंटा पहले सोई थी, आज उसके यहां खासी रकम आई थी – यह रकम एक नई लौंडी की नथ उतरवाई की थी, जिसे विक्रमगंज के एक साहूकार ने भेंट किया था। काफी रात गए यह सौदा हो पाया था। इस सौदे में गढ़ी के ठाकुर ने भाग नहीं लिया था। कमला बाई काफी रात गए तक ठाकुर का इंतज़ार करती रही थी।

इस समय वह थकी हारी सो गई थी, और उसे इसकी जरा भी खबर नहीं थी की मैं उसके कमरे में मंडरा रहा हूं। मेरी चमकीली आँखें उसके उफनते यौवन को निहार रही थी, एक वैश्या होते हुए भी न जाने कैसे उसने अपने रूप यौवन को संभाल कर रखा था।

उसकी आयु छब्बीस साल से अधिक नहीं लगती थी।

मैंने कमरा भीतर से बंद कर लिया था और आनन्दित होकर उसके यौवन का रसपान कर रहा था, मुर्दा चांदनी खिड़की के रास्ते झाँक रही थी। मुझे खिड़की पर बेताल के मौजूद होने का आभास हुआ, जो मेरे हुक्म की राह देख रहा था।

अचानक मैंने अपना कार्य शुरू किया।

बेताल ने उसे बिस्तरे से उठाया और धम्म के साथ फर्श पर पटक दिया। एक हलकी चीख के साथ उसकी आंख खुल गई, फिर वह बौखलाकर चारों तरफ देखने लगी।

भागकर उसने रौशनी जलाई।

उस वक़्त मैं उसके बिस्तर पर लेटा था।

उसने आश्चर्य से मुझे देखा और फिर भय से उसके नेत्र फैलते चले गये।

“शोर न मचाना कमला बाई।” मैंने कहा।

उसने चीखना चाहा, तभी वह आश्चर्यजनक ढंग से जमीन छोड़ती चली गई, उसकी चीख गले में ही अटककर रह गई। वह एकदम छत से उलटी लटक गई, उसका पेटीकोट सर की तरफ आ गया और उसके गले से नाना प्रकार की आवाजें निकलने लगी।

मैं जंगली की तरह उसे घूर रहा था।

कुछ क्षण बाद ही वह अचेत हो गई।

दूसरी बार जब उसे होश आया तो उसने अपने को जंगली झाड़ियों से घिरे एक कुन्ज में पाया।

“बोलो... अब क्या इरादा है ?” मैंने पूछा।

वह भयभीत सी मेरे पैरों में गिरकर रोने लगी।

“इससे तेरा काम नहीं बनेगा... तुझे मेरा कहा मानना होगा।”

वह सबकुछ करने के लिए तैयार हो गई।

“किसी को कुछ बताया तो ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।”

“न...मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगी।” उसकी आँखों में आंसू आ गए।

“तो बता शमशेर तेरे पास कब आता है?”

“वह इस हफ्ते नहीं आया।”

“कब आएगा ?”

“पता नहीं... क्यों नहीं आ रहा है... वह तो दूसरे तीसरे रोज आ जाता था।”

“तुझे उसे जल्दी अपने पास बुलाना होगा...चाहे जो बहाना लड़ा।”

“ठ...ठीक है।”

“मैं हर रात तीन बजे तेरे पास आउंगा... तू मुझे पसंद आ गई है।”

मैं खोखली हंसी हंसा।

“आप जो कहें मुझे सब मंजूर है।”

“ठीक है... अब तो सुबह हो रही है, कल रात आउंगा...और शमशेर के दावतनामे का इंतज़ार कर, समझी।”

“जी...जी।”

“मेरी चेतावनी याद है न ?”

“है...।”

“मुझसे भागने की कोशिश न करना।”

वह चुप रही।

मैंने उसे वापिस अपने कोठे पर लौट जाने का हुक्म दिया।
 
दूसरे दिन रात को जब मैं कमला बाई के कोठे पर पहुँचा और मुख्य द्वार को खटखटाया तो शायद कमला बाई मेरे ही इंतजार मे थी उसने तुरंत द्वार खोला और मुझे अपने सामने देख उसके चेहरे पर डर के भाव आ गये

मैने अपने दोनों हाथों से उसके गालों को सहलाया और प्यार से बोला कि घबरा मत कमला बाई आज तो बस मैं तेरी लेने आया हूँ

मेरी बात सुनते ही उसके चेहरे पर राहत के भाव आ गये और मुस्कुरा कर बोली

कमला बाई - तुम अंदर चलिए मैं द्वार बंद करके आती हूँ

मैं वहाँ से कमला बाई के बेड रूम मे आ कर बिस्तर पर बैठ गया....थोड़ी ही देर मे कमला बाई भी बाहर का दरवाजा बंद कर के वही आ गयी...मैं उसको देखने लगा.

कमला बाई—अब ऐसे क्या देख रहे हैं.... ? लेनी नही है क्या मेरी ... ?

मैं —तुम्हारी लेने ही तो आया हूँ… पर तुम हो कि दे ही नही रही

कमला बाई—ज़्यादा नाटक मत करो...तुम्हारी सब नौटंकी समझती हू...तुम क्या समझते हो कि मैं ये नही जानती कि तुम मेरी लेने के लिए मरे जा रहे हो...

मैं —जब जानती हो तो फिर अपनी देती क्यो नही…?

कमला बाई—तुम्हे अपनी देने ही तो आई हू यहाँ…चलो अब जल्दी से कर दो पूरी की पूरी नंगी मुझे..और पटक के ले लो अपनी इस रांड़ की बुर…इससे पहले की कोई आ जाए…नंगी कर के चोद लो अपनी इस बाँदी को..

मैने कमला बाई को बिस्तर मे लिटा दिया…और खुद भी उसकी बगल मे लेट गया और कुछ देर तक उसके चेहरे को देखने के बाद मैने अपने होठ उसके होंठो से चिपका दिए और उसके होंठो का मधुर रस चूसने लगा.. साथ ही मेरा एक हाथ उसकी चुचियो पर पहुँच गया और ब्लाउस के उपर से ही उसकी चुचि को दबाने लगा हल्के हाथो से…

चुचि दबाए जाने और होठ चूसने से कमला बाई भी गरम होने लग गयी और फिर उसने अपनी आँखे बंद कर ली लेकिन कहा कुछ नही …

मैं ज़ोर ज़ोर से उसकी दोनो चुचियो को बारी बारी से मीज़ने लगा जैसे कि आटा गूँथते हैं ठीक वैसे ही. मसलने लगा.

कमला बाई—आआअहह…..सस्स्शह….उउउफफफ्फ़……राज्जा धीरीईए….थोड़ाआ धीरे दबाओ…..दर्द होता हाईईईई….आअहह,…इतनी ज़ोर से नहियीई…..आअहह

मैं —मस्त दूध हैं रानी …तुम्हारे

कमला बाई—मुझे चोदते समय रानी मत बोलो…मुझे बुर चोदि..या बुर मारी बोलो…

मैं (चुचि दबाते हुए)—क्यो तुम्हें ये नाम अच्छे लगते हैं….?

कमला बाई—आआअहह……ह्म्‍म्म्मम….तुम्हारे मूह से सुनना अच्छा लगता है अपने लिए बुरमरी..बुर्चोदि…रांड़

मैं —क्या होता है इसका मतलब….?

कमला बाई—आअहह….….आअहह…बुर मारी मतलब जिसकी बुर मारी जा चुकी हो….बुर्चोदि मतलब जिसकी बुर चुद चुकी हो और रांड़ मतलब जिसको सब ने चोदा हो…

मैं —तीनो मे से क्या नाम पसंद है तुमको…?

कमला बाई—सब के लंड से चुदि बुर वाली..

मैं —मतलब कि आज तुम मुझ को अपनी बुर देने के मूड मे हो …?

कमला बाई—ह्म्‍म्म्म

मैं —फिर वही ह्म…क्लियर और डीटेल मे बोलो….मुझ को सिर्फ़ बुर की भाषा ही समझ मे आती है…मैं बुर लेने और बुर मे लंड पेलने के अलावा कुछ नही जानता…गचक के खाना और हचक के पेलना, बस यही तो दो मन पसंद काम हैं मेरे…अब बताओ…

कमला बाई—बता तो दिया कि मैं तुमसे अपनी…बुर्र्रर चुदवाने ही तो आई हूँ तुम्हारे पास……

मैं —बिल्कुल सही किया तुमने…मेरा भी बहुत मन कर रहा था तुम्हारी बुर लेने का…तुम्हारी बुर मे तो मैं कल से लंड घुसेड कर चोदना चाहता था..

कमला बाई—आज आ गयी गयी हू ना तुम्हारे पास अपनी बुर देने….तो जी भर लो मेरी बुर मे लंड घुसेड लो…जितना लंड पेलना है घुसेड कर मेरी बुर् मे..उतना चोद लो… लंड घुसा दो आज अपनी रांड़ की बुर मे…जब तक कोई नही आ जाता तब तक बिना रुके चोदते रहो मेरी बुर को खूब ज़ोर ज़ोर से…आज फाड़ के चिथड़ा कर देना अपनी इस रान्ड की बुर को चोद चोद कर…

मैं —चलो अब अपनी बुर चोदि को नंगी करने का टाइम आ गया है….वैसे भी तुम मुझे नंगी ज़्यादा अच्छी लगोगी
 
कमला बाई—तो कर दो ना मुझे जल्दी से नंगी….मैं भी तो पूरी तरह से नंगी होना चाहती हूँ….करो ना मुझे नंगी ..मैं बिल्कुल नंगी होना चाहती हूँ आज…

मैं — पूरी नंगी कर के ही बुर चोदने मे मज़ा आता है

कमला बाई—तुम ठीक कहते हो राजा….अब तुम जब भी यहाँ आना तो मुझे ज़रूर नंगी किया करना अपने हाथो से….फिर खूब चोदा करना अपनी इस रांड़ की बुर को…चाहो तो मुझे अपनी रखैल बना लो….बनाओगे ना अपनी कमला बाई को अपनी रखैल…? बताओ ना, …बनाओगे ना मुझे अपनी रखैल…? बोलो ना…

मैं —हां, कमला बाई आज से बल्कि अभी से ही तुम मेरी रखैल हो…और तुम भी मुझे कभी भी चोदने से, दूध दबाने से या फिर नंगी करने से कभी नही रोकोगि…चाहे मैं कभी भी, कही भी , किसी के भी सामने तुम को नंगी कर के चोदु..तुम मना नही करोगी…

कमला बाई—हां राजा, मैं तुमसे वादा करती हूँ..मैं कभी तुम्हे मना नही करूँगी….चाहे जिसके सामने नंगी कर के मेरी बुर मे लंड घुसेड देना,,,..मैं कोई विरोध नही करूँगी और ना ही रोकूंगी तुम्हे…अब जल्दी से नंगी करो ना मुझे…

कमला बाई की इतनी गरम बाते सुन कर मुझसे अब रुकना बहुत मुश्किल हो गया तो मैने एक एक कर के उसके सारे कपड़े उतार कर उसको पूरी नंगी कर दिया….उसकी झान्ट वाली बुर मेरे सामने आ गयी नंगी हो जाने पर…

मैं —वाउ…मेरी कमला बाईरखैल..नंगी बहुत मस्त लगती है

कमला बाई—मेरे राजा…मुझे मस्त होना है तुझसे चुद चुद के….बोलो ना …करोगे ना अपनी इस रांड़ की चुदाई…?

मैं —हां मेरी जान, ये दीवाना तेरी बुर मे लंड पेल पेल कर तुझे ज़रूर चोदेगा..

कमला बाई—तो फिर लंड घुसेड दो ना जल्दी से अपनी कमला बाई की बुर मे

कमला बाई ने अपने दोनो पैर उपर उठा लिए तो मैं उसकी जाँघो के बीच मे आ गया और उसकी बुर को चाटने लगा…बुर मे मूह लगते ही उसने अपने दोनो पैर फैला दिए जिससे मैं अच्छे से उसकी बर को चाट सकु…

कमला बाई—आआहह….बहुत मज़ा आ रहा है राजा….ऐसे ही..ओह्ह्ह….और चाटो अपनी कमला बाई की बुर को…खूब ज़ोर ज़ोर से चाटो मेरी बुर…साथ मे मेरे दूध भी कस कस के दबाते जाओ….अब बहुत मन कर रहा है खूब ज़ोर ज़ोर से अपने दूध दबवाने का….दबाओ ना बालम मेरे दूध खूब कस कस के…

मैने कमला बाई की बुर चूस्ते हुए उसके दोनो दूध पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से बारी बारी से मसल्ने लगा…जिससे फुल चुदासी हो कर कमला बाई की बुर गीली हो गयी…और दूध मसले जाने से लाल पड़ गये.

कमला बाई—आआहह…राज्ज्ज्जा..ऐसे ही दबाते रहो मेरे दूध…मुझे चोद चोद कर अपने बच्चे की माँ बना दो…

मैं —क्या मस्त फूली हुई बुर है मेरी रंडी की..

कमला बाई—आआअहह….ये क्या कर रहे हो राजा….बहुत मज़ा आ रहा है….आआआआहह…और चूसो मेरी बुर को….ऐसे ही

मैं —रानी मैं तुम्हे चोदने के लिए हर दिन आया करूँगा…और तुम मुझसे चुदवा चुदवा के मस्त होती रहना..

कमला बाई—आअहह…और ज़ोर ज़ोर से खिचो मेरी बुर के दाने को…आहह….बहुत मज़ा आ रहा है….हां, मैं हर तरह से मज़ा लेने को तैयार हूँ……तुम मुझे चोद चोद कर मस्त हो जाना और मैं हर हाल मे तुम्हे खुश करती रहूंगी…

मैं उसकी बुर के दाने को लगातार खूब ज़ोर ज़ोर से खिचे जा रहा था….कमला बाई ये मज़ा बर्दास्त नही कर पाई और ज़ोर ज़ोर से झड़ने लगी….उसकी बुर से पानी निकल कर बाहर टपकने लगा….

मैं —देखा जानू आया ना मज़ा

कमला बाई(शरमाते हुए)—धत्त बेशरम…

मैं —तो क्या हुआ..? तुम की दोनो जाँघो के बीच मे ही असली मज़ा है

कमला बाई—अब मैं भी तुम्हारा लंड चुसुन्गि…घुसेड दो अपना लंड मेरे मूह मे..

मैं भी अपने भी कपड़े निकाल कर नंगा हो गया..…..मेरा खड़ा लंड देख कर कमला बाई की आँखो मे चमक आ गयी..वो अपने मूह मे मेरे लंड का सुपाडा भर के चूसने लगी.

मैं —क्या हुआ..? अब पियो ना मेरा लंड..

कमला बाई का सिर पकड़ कर मैं लंड उसके मूह मे डालने लगा…लेकिन वो लंड के सुपाडे से ज़्यादा अंदर नही ले पाई…बहुत कोशिश के बाद भी मादरचोद घुसा ही नही…अब अगर ज़बरदस्ती धक्का मार के घुसेड़ता तो शायद कमला बाई का मूह ही फट जाता…इसलिए जितना गया उतने हिस्से को ही वो चूसने लगी.

पहले तो उसे उबकाई जैसी आई परंतु धीरे धीरे उसे लंड चूसना अच्छा लगने लगा…मैने उसे 69 मुद्रा मे अपने उपर कर लिया और उसकी बुर को चूसने लगा…कुछ देर तक चूसने के बाद वो दुबारा स्खलित हो गयी लेकिन उसने लंड को पीना जारी रखा….तो मैं भी उसकी बुर को चूस्ता रहा….जब वह पुनः गरम हो गयी तो मैने घोड़ी बना दिया और उसके पीछे आ गया.
 
मैं —कमला बाई अब तुम चुदने वाली हो…तैयार हो ना अपनी बुर मे मेरा लंड डलवाने को…?

कमला बाई—ह्म….डाल दो…पूछो मत…

मैने कमला बाई को डॉगी स्टाइल मे कर के उसके पीछे आ कर लंड को बुर के छेद मे सेट कर के एक तगड़ा झटका जड़ दिया….इतनी देर से बुर चूसने से वह गीली हो गयी थी और निकलते काम रस की वजह से चिकनाहट भी पर्याप्त थी कमला बाई की बुर मे..जिससे लंड का सुपाडा बुर के छेद को फैलाते हुए खच्च से अंदर घुस गया.

कमला बाई—आअहह…माआआअ….राज्ज्जा बहुत मोटाआ हाीइ तुम्हाराआ…

मैं —कुछ नही कमला बाई..बस थोड़ा सा दर्द होगा…वैसे भी तुम पहले ही कितने लंड ले चुकी हो अपनी बुर मे..,…

कमला बाई—तुम्हारा है ही इतना मोटा कि ऐसा लगता है जैसे पहली बार चुद रही हू असली लंड से..

मैं —कुछ नही होगा….बस तुम अपना मूह बंद रखना..आवाज़ मत करना…

कमला बाई—रूको..मुझे मूह मे कपड़ा भर लेने दो..

फिर कमला बाई ने अपने मूह के अंदर चादर का किनारा भर लिया जिससे आवाज़ ना हो ज़्यादा…..मैने बार बार दर्द देने की बजाए एक ही बार मे लंड ठूँसने का सोच कर उसकी एक चुचि को पकड़ लिया कस के और दे दनादन तीन चार लंबे लंबे धक्के उसकी बुर मे पेल दिए….लंड बुर को ककड़ी की तरह चीरता फाड़ता हुआ उसकी बच्चेदानी मे समा गया

लगभग दस मिनिट बाद लगातार लंड अंदर बाहर होते रहने और चुचि दबाए जाने से उसका दर्द कुछ कम हुआ और कुछ कुछ मज़ा आने लगा तो उसने स्वतः ही अपनी गान्ड को पीछे धकेलना स्टार्ट कर दिया…ये देख कर मैं समझ गया कि कमला बाई की बुर अब सरपट लंड खाने को तैयार हो कर बिल्कुल चिकनी रोड बन चुकी है.

मैं —अब दर्द कैसा है कमली जान…?

कमला बाई—आअहह...अब थोड़ा ठीक लग रहा है...

मैं —मस्त टाइट बुर है मेरी बुर्चोदि कमला बाई की..

कमला बाई—आअहह.....ऐसे ही चोदते रहो धीरे धीरे मुझे ....आअहह...उफफफफफफफफफ्फ़....अब अच्छा लग रहा है.. ऐसा लग रहा है जैसे कि आज मेरी तुम्हारे साथ फिर से नथ उतराई हुई हो और मैं पहली बार चुद रही हूँ....आअहह

मैने चोदने की स्पीड बढ़ा दी…और तगड़े धक्के पेलने लगा कमला बाई की बुर मे…एक हाथ से उसकी चुचि भी ज़ोर ज़ोर से मसलता जा रहा था...

कमला बाई—आआहहह......राजा ऐसे ही खूब कस कस के पेलो मुझे.....बहुत मज़ा आ रहा है.....इतना मज़ा...आहह...ऐसा लगता है कि तुम्हारा ये लंड मेरी बुर के साथ साथ मेरा पेट भी फाड़ देगा .....और चोदो..फाड़ दो बुर को...आअहह.....आज बहुत दिन बाद असली मज़ा मिला है मुझे बुर चुदाने का.....ऊऊहह...उफफफफ्फ़...माआअ

मैं —अब तो तुम पूरी बुर्चोदि बन चुकी हो कमला बाई….मेरी बुर्चोदि…

कमला बाई—आअहह…..जो मन करे वो बना दो मुझे….चाहे बुर्चोदि बनाओ..चाहे बुरमारी….तो चाहे भोसड़ी बुलाओ…

मैं —तो फिर ठीक है…आज से मैं तुम को ‘भोसड़ी’ के नाम से ही बुलाया करूँगा…मेरे लंड की भोसड़ी

कमला बाई—आअहह….हान्णन्न्, ठीक हाीइ….आज से मेरा नाम भोसड़ी है…..आहह…और कस कस के चोदो मेरी बुर को…आअ और बना डालो आज अपनी भोसड़ी का भोसड़ा… बना दो अपनी भोसड़ी की बुर को भोसड़ा राज्ज्जा….आहह…

मैं कमला बाई की ऐसी गरमा गरम बाते सुन कर फुल स्पीड मे बुर मे लंड ठोकने लगा…कमला बाई हर धक्के पर गिर जाती थी… कुछ देर ऐसे ही चोदने के बाद मैने उसको चित्त कर के लिटाया और उसके दोनो पैरो को उपर उठा कर उसके उपर बैठ गया और लंड को उपर उठ आई बुर मे एक धक्के मे ही जड़ तक घुसेड कर चोदने लगा..

कमला बाई—आअहह……बहुत मज़ा आ रहा है राज्ज्जा…..सच मे तुम जादूगर हो……लगता है कि तुम यही रुक जाओ और रात दिन मुझे पूरी नंगी कर के ऐसे ही चोदते रहो…..आअहह…मैं झड़ने वाली हूँ राज्ज्जा….खूब ज़ोर ज़ोर से चोदो मुझे..

मैं अब फुल स्पीड मे उसकी बुर चोदने लगा और भोसड़ी की बुर को भोसड़ा बनाने मे लगा रहा…कुछ ही धक्को मे कमला बाई की बुर ने पानी फेंक दिया…लेकिन दनादन धक्के पेलता रहा….

मैने कमला बाई को बेड पर सीधा लिटा दिया ..और ज़ोर ज़ोर से चोदने लगा….लगभग और आधा घंटा चोदने के बाद मैं उसकी बुर के अंदर ही पिचकारियाँ छोड़ने लगा….अपनी बच्चेदानी मे गरम गरम लावा गिरते महसूस कर के कमला बाई भी झड़ने लगी और मुझसे ज़ोर से चिपक गयी…

हम दोनो हान्फते हुए एक दूसरे से चिपक कर ऐसे नंगे ही लेटे रहे

उसके बाद एक बार और उसकी चुदाई करके मैं अपने स्थान पर आ गया
 
इस प्रकार मैंने उस वैश्या को अपने अधिकार में कर लिया। मैं रोज रात गए उसके पास पहुँचता, अपनी प्यास बुझाता और खासी रकम निकालकर चला आता। वह खूब पैसे वाली थी।

मैं उस पर आतंक बनकर छाया हुआ था।

एक दिन उसने बताया कि उसने शमशेर सिंह को दावतनामा दे दिया हैऔर उसने स्वीकार कर लिया है। मैं उससे निपटने की तैयारी करने लगा। शमशेर ने दो रोज बाद आने का वचन दिया था और दो रोज बाद आधी रात के समय...

नशे में शमशेर... अपनी गठीली देह को हिलाता कमला बाई के कोठे से बाहर निकला। प्रांगण में एक पुराने ढंग की फिटिन खड़ी थी, कोचवान बहुत समय पहले नजदीक के एक ठेके में गया था और अब वह लौटकर आया तो मेरी लोहे की मूठ वाली लाठी का शिकार बन गया – मैंने चुपचाप उसका बेहोश जिस्म फिटिन के भीतर डाला और वहीं बैठे-बैठे उसके वस्त्र पहन लिए। उसके बाद इत्मीनान से कोचवान की जगह बैठ गया।

प्रांगण में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। कमला बाई उस रात अकेली थी, कोठे में और कोई नहीं था।

कमला बाई का एक मकान और था... उसने आज रात सभी को वहां भेज दिया था और स्वयं तबियत खराब होने का बहाना बना लिया था।

शमशेर के समय का नाजुक दौर तब शुरू हुआ, जब वह लड़खड़ाता हुआ फिटिन में सवार हुआ। वह इतनी पिए हुए था की बैठते ही लंबा हो गया... और बड़बड़ाते हुए मुझे चलने के लिए कहा।

मैंने दो घोड़ों वाली फिटिन गाड़ी को आगे बढाया और कुछ देर में ही तीखी हवा के कारण शमशेर का नशा इतना गहरा हो गया की उसके नेत्र मुंद गये।

फिटिन को मैं उस ढलुवा सड़क पर ले गया जो कस्बे से बाहर जाती थी। उसे इतनी सुध नहीं थी, सुध तब आई जब मैंने उसके सर पर पानी को बाल्टी उड़ेल दी। पर तब तक शमशेर के हाथ-पांव बांध चुका था और उसकी बन्दूक मेरे हाथ में थी।

उसने अपने आपको एक खण्डहर में पडा पाया...

वह कुछ देर तक आंखें फाड़-फाड़ कर मुझे देखता रहा फिर उसने बौखलाकर अपने शरीर को देखा।

“नहीं पहचाना...।” मैंने अपना जबड़ा खोला – “मेरा नाम रोहताश है।”

“र...रोहताश...हरामजादे तेरी यह मजाल।”

मैंने उसके बाल पकडे और नाक पर एक घूंसा जड़ दिया। उसका दांत टूटकर बाहर आ गया और नाक मुँह से खून बहने लगा।

“क...कमीने...जरा मेरे हाथ-पांव तो खोल...।”

“नशा उतर गया क्या...।” मैंने कहा – “तेरी यह ख्वाहिश भी पूरी किये देता हूं। मैं बेहोश और मजबूर आदमी पर वार नहीं करता... आज गढ़ी का पहला बड़ा शिकार तू मेरे हाथ आया...मुझे याद आ रहा है.... उस रात तू ही मशाल लिए मेरे मकान को जलाने को आया था... उस रात तू भाग गया... परन्तु अब गढ़ी वाले जान बचा सकते हों तो बचा लें।”

मैंने इत्मीनान के साथ उसके हाथ-पांव खोल दिए।

“तुझे अपनी बहादुरी दिखाने का मौक़ा दे रहा हूँ....भागना चाहे तो भाग ले... और मुझ पर वार करना चाहे तो खुली छूट है।“

उसने आव देखा न ताव देखा और मुझ पर छलांग लगा दी, पर मुझ तक पहुँचने से पहले ही वह बीच में इस प्रकार गिरा जैसे ठोकर खाकर गिरा हो।

मैं हंसता हुआ पत्थर पर बैठ गया।

वह दूसरी बार हमलावर हुआ – इस बार अगिया बेताल ने उसे जोरदार पटकी दी। वह चीख पड़ा, थोड़ी देर बाद वह भयभीत हो गया, शायद वह मेरी बैतालिक शक्ति से परिचित हो गया।

उसने भागना चाहा परन्तु उसका यह इरादा भी पूरा नहीं हुआ। उसके बाद वह जमीन पर पड़ा लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा।

“अब तो तुझे फिर से बाँध दूँ।” मैंने कहा – “क्योंकि आज मैं तुझे उसी तरह जिन्दा जलाना चाहता हूँ – जैसे तूने और तेरे आदमियों ने मुझे जिन्दा जलाने का प्रयास किया था.... आग में जलने से क्या मजा आता है यह तो तुझे मालूम होना ही चाहिये...उसके बाद तेरा भुना हुआ मांस खा लूँगा और तेरी हड्डियाँ ठाकुर को भेज दूंगा...।”

“न...नहीं.......म....मुझे मत मारो....।” वह गिड़गिड़ाया।

“बड़ा डरपोक है रे तू...।”

“म...मुझे माफ़ कर दो...।”

“अच्छा – तो मेरा कहा मानेगा...।”

“हाँ – तुम जो कहोगे, मैं करने के लिए तैयार हूँ।”

“तो बेटे – यह बता ठाकुर की गढ़ी में भैरव ने जो हंडिया गाड़ रखी है... वह कहां-कहां गड़ी है ?”

वह चुप हो गया।

“नहीं बोलेगा – बेताल इसे ज़िंदा जला दो।”

आग का एक गोला शमशेर के पास प्रकट हुआ और उसे अपनी जिन्दगी चिता बनती नजर आई।

ब...बताता हूं...।” वह फटे-फटे स्वर में बोला।

उसके बाद वह बताने लगा।

आग का गोला अब भी उसके समीप थिरक रहा था।
 
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