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Guest
यहाँ आने के बाद पहली बार मेरे होठों पर मुस्कान आई थी। कैसे-कैसे ढोंग है यहाँ... हूं... ब्रह्म राक्षस।
अगर मैं डॉक्टर न होता तो उसे देखने का फैसला कभी ना करता, पर मैं उन देहातियो के दिमाग से भुत-प्रेत का भ्रम उतार देना चाहता था।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“बेटा जरा संभल कर... ब्रह्म राक्षस किसी के वश का रोग नहीं होता – उसे तो अगिया बेताल ही भगा सकता है... उन्हें टाल देना।”
“अरे दादी - मैं सब जानता हूँ।” मैंने मजाक में कहा।
“क्या... तू सब जानता है...।”
वह आश्चर्य से मुझे देखती रही और मैं सीधा बाहर के कमरे में जा पहुंचा। वह युवती बैठी-बैठी झूम रही थी। जैसे ही मैं वहाँ पहुंचा उसने जोरों के साथ किलकारी मारी और मुझे घूर-घूर कर देखने लगी। उसने अपने आपको छुड़ाने का प्रयास किया मगर देहातियों ने उसे कस कर थामा हुआ था।
एक बूढा मेरे पावों में गिर पड़ा।
“चाहे जो ले लो... मगर मेरी बेटी की जान बचा दो... वरना मैं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहूँगा। हम बड़ी उम्मीद लेकर आपके यहाँ आये है।”
“उठो...।” मैंने डांटकर कहा।
वह एकदम सकपका कर उठ बैठा।
“क्या बात है?” मैंने पूछा
“क्या बताऊँ साहब... मेरी बेटी पर ब्रह्म राक्षस सवार हो गया है... देखो तो क्या हालात बना दी है उसने...।”
“तुमने उसे क्यों पकड़ रखा है? उसे छोड़ दो...।”
“अरे नहीं साहब... यह तो काट खाने को दौड़ती है।”
“मैं कहता हूँ – उसे छोड़ दो।”
युवती को छोड़ दिया गया। कमान से छूटे तीर की तरह वह मुझ पर झपटी... मुझे इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी। उसने किलकारी मारी और मुझे इतना जबरदस्त धक्का दिया कि मैं फर्श पर गिर पड़ा। मैं एकदम घबरा गया।
वह मेरे सीने पर चढ़ गई।
अगर मैं डॉक्टर न होता तो उसे देखने का फैसला कभी ना करता, पर मैं उन देहातियो के दिमाग से भुत-प्रेत का भ्रम उतार देना चाहता था।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“बेटा जरा संभल कर... ब्रह्म राक्षस किसी के वश का रोग नहीं होता – उसे तो अगिया बेताल ही भगा सकता है... उन्हें टाल देना।”
“अरे दादी - मैं सब जानता हूँ।” मैंने मजाक में कहा।
“क्या... तू सब जानता है...।”
वह आश्चर्य से मुझे देखती रही और मैं सीधा बाहर के कमरे में जा पहुंचा। वह युवती बैठी-बैठी झूम रही थी। जैसे ही मैं वहाँ पहुंचा उसने जोरों के साथ किलकारी मारी और मुझे घूर-घूर कर देखने लगी। उसने अपने आपको छुड़ाने का प्रयास किया मगर देहातियों ने उसे कस कर थामा हुआ था।
एक बूढा मेरे पावों में गिर पड़ा।
“चाहे जो ले लो... मगर मेरी बेटी की जान बचा दो... वरना मैं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहूँगा। हम बड़ी उम्मीद लेकर आपके यहाँ आये है।”
“उठो...।” मैंने डांटकर कहा।
वह एकदम सकपका कर उठ बैठा।
“क्या बात है?” मैंने पूछा
“क्या बताऊँ साहब... मेरी बेटी पर ब्रह्म राक्षस सवार हो गया है... देखो तो क्या हालात बना दी है उसने...।”
“तुमने उसे क्यों पकड़ रखा है? उसे छोड़ दो...।”
“अरे नहीं साहब... यह तो काट खाने को दौड़ती है।”
“मैं कहता हूँ – उसे छोड़ दो।”
युवती को छोड़ दिया गया। कमान से छूटे तीर की तरह वह मुझ पर झपटी... मुझे इसकी जरा भी उम्मीद नहीं थी। उसने किलकारी मारी और मुझे इतना जबरदस्त धक्का दिया कि मैं फर्श पर गिर पड़ा। मैं एकदम घबरा गया।
वह मेरे सीने पर चढ़ गई।