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Guest
वह एक अनूठी रात थी....।
आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीके की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह फैली हुई थी, फिर भी यह एक भयावह होलनाक रात थी।
ऐसी उजली-रोशन रात और ऐसी भयावह..?
जब दिलों पर बहशत हो। अगले पल की खबर ने हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर का मौसम तो उसी वक्त अच्छा लगता है....जब इन्सान के भीतर का मौसम महका हुआ हो। उसके मन-मस्तिष्क में सुकून हो..... ।
दूर क्षितिज तक फैल रेगिस्तान...किसी मोटे कालीन की तरह बिछी रेत। हौले-हौले बहमी हुई ठण्डी हवा। किसी हसी मनमोहक चेहरे की तरह चमकता हुआ उज्जवल चांद, लेकिन मंत्र-मुग्ध कर देने वाली रात से सम्मोहित होने वाला यहां कोई नहीं था।
नमीरा थी.....लेकिन उसे अपना होश नहीं था।
उस पर जो जुल्म हुआ था, उस पर वह हैरतजदा थी। गुमसुम थी। यह अचानक क्या से क्या हो गयाथा। उसकी एक दिन की बच्ची को उससे छीन लिया गया था और उसे एक तेज रफ्तार ऊंट पर डालकर रेगिस्तान में अकेला छोड़ दिया गया था। उस नन्हीं-सी जान से क्या अपराध हो गया था।
खुद उसे भी यही सजा दी गई थी।
ऊंट तेजी से भागा जा रहा था और उसे अपने आपको सम्भालना मुश्किल हो रहा था। उसकी अपनी हाली ठीक नहीं थी। आज ही तो उसने एक बच्ची को जन्म दिया था । अत्यधिक कमजोरी थी...ऐसी औरत का तो बहुत ख्याल रखा जाता है. लेकिन रोशन राय ने उस पर जुल्म की इन्तहा कर दी थी। बच्ची तो उससे छीनी ही थी.....उसे भी हवेली से निकाल बाहर किया था।
आखिर उसका क्या दोष था?
दोष तो था। वह एक गरीब की बेटी थी। हवेली के इकलौते वारिस से शादी की थी और अब उसने एक लड़की को जन्म दे दिया था। अपराध-ही-अपराध थे....कसूर-ही-कसूर थे उसके । प्रसव पीड़ा सु गुजरी थी वह। अब ऊंट की तेज रफ्तारी ने उसे और भी निढाल कर दिया था। उसकी आंखें धुंधलाई जा रही थीं। दिमाग पर गुब्बार-सा छा रहा था। यही महसूस हो रहा था उसे जैसे वो रेत के अन्दर धंसी जा रही हो। ऊंटट ककी दुम से बंधी घन्टी की टन टन धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही थी।
फिर कुछ देर बाद उसे होश न रहा कि वह कहां है और किस हाल में है।
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आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीके की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह फैली हुई थी, फिर भी यह एक भयावह होलनाक रात थी।
ऐसी उजली-रोशन रात और ऐसी भयावह..?
जब दिलों पर बहशत हो। अगले पल की खबर ने हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर का मौसम तो उसी वक्त अच्छा लगता है....जब इन्सान के भीतर का मौसम महका हुआ हो। उसके मन-मस्तिष्क में सुकून हो..... ।
दूर क्षितिज तक फैल रेगिस्तान...किसी मोटे कालीन की तरह बिछी रेत। हौले-हौले बहमी हुई ठण्डी हवा। किसी हसी मनमोहक चेहरे की तरह चमकता हुआ उज्जवल चांद, लेकिन मंत्र-मुग्ध कर देने वाली रात से सम्मोहित होने वाला यहां कोई नहीं था।
नमीरा थी.....लेकिन उसे अपना होश नहीं था।
उस पर जो जुल्म हुआ था, उस पर वह हैरतजदा थी। गुमसुम थी। यह अचानक क्या से क्या हो गयाथा। उसकी एक दिन की बच्ची को उससे छीन लिया गया था और उसे एक तेज रफ्तार ऊंट पर डालकर रेगिस्तान में अकेला छोड़ दिया गया था। उस नन्हीं-सी जान से क्या अपराध हो गया था।
खुद उसे भी यही सजा दी गई थी।
ऊंट तेजी से भागा जा रहा था और उसे अपने आपको सम्भालना मुश्किल हो रहा था। उसकी अपनी हाली ठीक नहीं थी। आज ही तो उसने एक बच्ची को जन्म दिया था । अत्यधिक कमजोरी थी...ऐसी औरत का तो बहुत ख्याल रखा जाता है. लेकिन रोशन राय ने उस पर जुल्म की इन्तहा कर दी थी। बच्ची तो उससे छीनी ही थी.....उसे भी हवेली से निकाल बाहर किया था।
आखिर उसका क्या दोष था?
दोष तो था। वह एक गरीब की बेटी थी। हवेली के इकलौते वारिस से शादी की थी और अब उसने एक लड़की को जन्म दे दिया था। अपराध-ही-अपराध थे....कसूर-ही-कसूर थे उसके । प्रसव पीड़ा सु गुजरी थी वह। अब ऊंट की तेज रफ्तारी ने उसे और भी निढाल कर दिया था। उसकी आंखें धुंधलाई जा रही थीं। दिमाग पर गुब्बार-सा छा रहा था। यही महसूस हो रहा था उसे जैसे वो रेत के अन्दर धंसी जा रही हो। ऊंटट ककी दुम से बंधी घन्टी की टन टन धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही थी।
फिर कुछ देर बाद उसे होश न रहा कि वह कहां है और किस हाल में है।
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