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वक्त ने बहुत तेजी से करवट ली ।समय का स्थ..अपनी द्रुतगति से दौड़ता रहा। समय बीतता गया। दिन–महीने और साल। यूं ही खुशी-खुशी दस साल बीत गये। वक्त बीतने का किसी को अहसास ही नहीं हुआ। हिना देखते-ही-देखते बड़ी हो गई थी।उसे अग पन्द्रहवां साल लगने को था। वह क्या से क्या हो गई थी। उसकी आंखों में सितारे भरे थे...चेहरे पर चांद रोशन था और बदन जैसे चांदनी में नहाया हुआ था। वह तो वैसे ही बड़ी सुन्दर थी... । अब तो जैसे कयामत हो गई थी। जिधर से गुजरती बहारें बिखर जातीं। जब वह इन्टर कालेज में थी! जब वह अपनी गाड़ी से उतर कर कालेज के गेट में दाखिल होती, एक हंगामा उठता. हर तरफ शोर मच जाता।
- "वो देखो.हिना आ गई।"
लड़कियां उस पर इस तरह गिरतीं, जैसे 'शमा पर 'परवाने' गिरते हैं |हिना जितनी हसीन थी, अन्दर से उतनी ही मासूम थीं उसकी सूरत ही भोली-भाली नहीं थी...दिल भी भोला भाला था। उसे अपने सौंदर्य-अपने यौवन पर नाज न था. ना उसे बड़े बाप की बेटी होने का घमण्ड था ।वह हर लड़की से बेतकल्लुफ हो जाती थीं बेबाकी से बात करती थी, अगर उसे अहसास हो जाता कि कोई लड़की उसे हसरत से देख रही है...बात करना चाहती है, लेकिन झिझक रही है, तो ऐसी लड़की से वह खुद आगे बढ़कर बात कर लेती थी ।फिर लड़कियां उसकी दीवानी क्यों न होती। सारी लड़कियां ही तो उस पर जान देती थीं। पूरा गर्ल्स कालेज उस पर फिदा था। लड़कियां तो लड़कियां, कालेज की लैक्चरार भी उसक तरफ आकर्षित थीं। वे पढ़ाते-पढ़ाते उसके चेहरे में खो जाती थीं और समीर राय तो जैसे देखकर जीता था। नफीसा बेगम उस पर 'सदके वारी' जाती थी।हिना को आये दस साल बीत गये थे लेकिन समीर राय ने अभी तक शादी नहीं की थी।
मां चाहती थी कि वह मायरा से शादी कर ले...समीर मायरा को पसन्द नहीं करता था। वह हवेली आ जाती तो समीर राय उसके साथ वक्त भी गुजार लिया करता थां लेकिन नफीसा बेगम जब भी उपयुक्त अवसर देखकर उससे शादी का जिक्र करती तो...समीर किसी नये घोड़े की तर विदक जाता था। मां, जिद्द करती तो वह हाथ जोड़कर बैठ जाता था।
"अम्मी..मुझे माफ कर दो। मुझसे इन्कार करा कर...क्यों मुझे गुनहागार बनाती हैं। अम्मी, आप तो मेरी जन्नत हैं..मेरे हाथ से क्यों निकलना चाहती हैं....।" वह अनुनयपूर्ण लहजे में कहता ।
"मैं कब कहती हूं कि तू इंकार कर...मैं कब चाहती हूं कि गुनाह का अहसास तुझे कचोटे...।" नफीसा बेगम भी बहस पर उतर आती-"तू आखिर कब तक अकेला रहेगा?"
"मैं अकेला कब हूं, मां... । आप हैं मेरे साथ...हिना है हमारे पास...।"
"मैं कब तक जिन्दा रहूंगी... । मैं सोचती हूं. मेरे बाद कौन करेगा तेरी शादी...कौन करेगा तेरी फिक्र...।" नफीसा बेगम सचमुच ही चिन्तित हो उठती ।
"लेकिन मुझे तो इस हवेली में एक दुल्हन चाहिये...।" मां अधिकारपूर्ण जिद्द पर उतर आती।
"अम्मी जान..मैं अब बूढ़ा हो गया हूं..।" वह एकदम पैंतरा बदलता।
"लो..अब कर लो बात।" मां का मुंह बन जाता-
"सुन लो यह नया बहाना। शादी न करने के सौ बहाने बना लो..मगर खबरदार अपने आपको बूढा मत कहना!"
"क्यों मां..?" वह चकित-सा मां की सूरत देखता।"तू खुद को बूढ़ा कहेगा, जिसकी उम्र चालीस इक्तालीस है...तो फिर मैं खुद को क्या कहूंगी। देख, मैं तो खुद को बूढी कहने से रही-"नफीसा बेगम ने खिन्नता दर्शाई ।यूं यह संजीदा बात प्रायः मसखरेपन की नजर हो जाती और यह मसखरापन समीर राय बीते कई बरसों से कर रहा था। वह अपनी मां की इस संजीदा ख्वाहिश को ऐसे ही हंस कर टाल जाता लेकिन मायरा ने यह बात शायद अपने दिल पर लिख ली थी। उसकी चाहत भी छिपी नहीं रही थी। उसने भी अब तक शादी नहीं की थी।
जब भी उसकी शादी की बात चलती...उसकी आंखें में आंसू भर आते ।
“मा..मैं शादी नहीं करूंगी...।'' उसका जवाब होता। आखिर मैं तुझे कब तक बिठाये रखू।"
मां दुख से कहती-"किसकी आस लिए बैठी है तू.?"
"मां, मुझे किसी की आस नहीं। बस, मैंने नहीं करनी शादी...अगर आपने जबरदस्ती की अम्मी जान, तो खुदा की कसम मैं जहर ख लूंगी...।" वह खुद को संभालते एकदम आंसू पोंछ लेती, जैसे जहर खाने का पुख्ता इरादा रखती हो ।समीर राय को मायरा के इस निरन्तर इंकार का अहसास था..लेकिन वह क्या करता? उसके पास अपना कुछ नहीं था..वह तो सब कुछ नमीरा के नाम कर चुका था। वह बिल्कुल खाली झोली था...वह किसी से शादी करके उसे क्या देता।उसे तो बस सिर्फ अपनी हिना की फिक्र थी।हिना ही अब उसकी जिन्दगी थी। हिना को देखकर उसकी आंखों के चिराग रोशन होते थे। हिना उसकी आंखों का नूर थी... उसके दिल का सुकून थी हिना ही थी जो हर पल उसकी सोचों में रहती थी जब उन रहस्यमय हस्तियों ने हिना पर दोबारा कब्जा करना चाहा तो वह भीतर से कांप कर रह गया। हालांकि वक्ती तौर पर उसने उन पर विजय पा ली थी, लेकिन हर वक्त का धड़का उसके साथ लग गया था। उसने फौरन रोशनगढ़ी छोड़ने का फैसला कर लिया। वह हिना के साथ स्थाई रूप से मुम्बई आ गया। यहां आकर उसने बांद्रा वाला अपना बंगला आबाद किया। छांट-छांट कर नौकर रखे...सुरक्षा के
उत्कृष्ट प्रबन्ध किए। हिना का एक अच्छे स्कूल में एडमिशन कराया...और वह स्वयं हिना को स्कूल छोड़ने व लेने जाता था ।नफीसा बेगम का रोशनगढ़ी में रहना जरूरी था। हवेली खाली छोड़ी जा सकती थी ना जमींदारी। जमीनों और जायदाद के सौ झगड़े थे...उन्हें देखने वाला भी कोई चाहिये था |बहरहाल, हिना एक बार जो रोशनगढ़ी से आई थी तो फिर पलट कर हवेली नहीं गई थी। हां, नफीसा बेगम जरूर आती-जाती रहती थी।यूं दस साल इस तरह बीत गये, जैसे दस माह हों, दस दिन हों, दस
घन्टे हों।
बहुत पहले...लगभग दस ससाल पहले तांत्रिका और भविष्यवक्ता अरूणिमा ने हिना के बारे में समीर से कहा था कि-'इस लड़की पर इसका पन्द्रहवां साल बहुत भारी होगा...।'उसने बस इतना ही कहा था..यह नहीं बताया था कि क्या होगा। उसके बाद भी अरूणिमा से कई मुलाकातें हुई थी, लेकिन इस सिलसिले में उस ‘पहुंची हुई ने न कुछ और बतारया था और न ही समीर राय ने उससे कुछ पूछा था ।अरूणिमा की यह भविष्यवाणी आई...गई ही हो गई थी और अब वह कयामत का साल आ पहुंचा था। अरूणिमा की वह भविष्यवाणी तो समीर राय के दिमाग से उतर गई थी। कोई नहीं जानता था..ना किसी के जहन में था यह पन्द्रहवां साल इस हसीन लड़की पर क्या कयामत ढायेगा ।समीर राय हिना का बर्थ-डे बड़ी धूमधाम से मनाया करता था ।हिना की बीसियों सहेलियों के साथ नफीसा बेगम और मायरा इस फंक्शन में जरूर शामिल होती थीं। खानदान के दूसरे लोग भी आते थे।हिना की पन्द्रहवीं सालगिरह ज्यादा दूर न थी कि-एक दिन क्या हुआ? यह जन्मदिन से बहुत पहले की बात है। मेथ' का पीरियड था। मैडम...पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी प्राब्लम' का हल समझा रही थी कि क्लास-रूम के दरवाजे पर एकदम शोर-सा हुआ। कोई लड़की, 'सांप-सांप' कहती हुई भागी।और जब सांप की आवाज हिना के कानों में पड़ी तो उसकी अवस्था एकदम बदल गई। उसके बदन में जैसे एक करंट-सा दौड़ गया। वह जैसे बेअख्तयार ही अपनी सीट से उठी और मैडम से बाहर जाने की अनुमति लिए बिना...दौड़ती हुई क्लास रूम से बाहर निकल गई।उसने जल्दी ही बरामदे में जाती हुई लड़की को जा लिया। उसने उस लड़की के साथ भागते हुए पूछा-"क्या हुआ...? मुझे बताओ..? कहां है सांप ?"
"वह, उधन लाइग्ररी में... ।'' उस लड़की ने बताया।"तुम कहां जा रही हो?" हिना ने पूछा।
"मैं प्रिन्सिपल को बताने जा रही हूं...। वह बोली तो हिना ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया और उसे लाइब्रेरी की तरफ घसीटते हुए बोली-"आओ, मेरे साथ...।
"फिर जब वह लाइब्रेरी में पहुंची तो अच्छा खासा हंगामा मचा हुआ था, लड़कियां दरवाजे पर खड़ी चीख रही थीं। आहिस्ता-आहिस्ता यह खबर हर क्लास तक पहुंच गई कि लाइब्रेरी में सांप निकल आया है। देखते-ही-देखते बहुत-सी लड़कियां लाइब्रेरी के सामने इकट्ठा हो गई। कहां है सांप, मुझे बताओ... I' हिना लाइब्रेरी में घुसते हुए बोली ।
“तुम क्या करोगी। प्रिन्सिपल मैडम को आने दो। आफिस से किसी मर्द को बुलाओ...।
" कई लड़कियों ने उसे रोका।'अरे, हटो...।" हिना ने झटका देकर लड़कियों को परे किया और अंदर घुस गई |लाइब्रेरी में इस वक्त कोई नहीं था। लाइब्रेरियन भी अन्दर मौजूद न थी। लाइब्रेरी के दरवाजे से विभिन्न आवाजें आ रही थीं। सांप उपन्यासों वाले शेल्फ के पीछे था। कोई कह रहा था-"मेज पर था...।
"कोई कह रहा था-"नहीं, कुर्सी के नीचे था।
"जितने मुंह उतनी बातें' वाली स्थिति थी।हिना ने लाइब्रेरी के मध्य में खड़े होकर जायजा लिया। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे, वह गहरे-गहरे सांव ले रही थी और उसकी आंखों में एक खास चमक-सी बढ़ती जा रही थी। वह अपनी गर्दन को कुछ इस तरह धीरे-धीरे घुमा रही थी..जैसे किताबों व शैल्फों में छिपे हुये सांप को देखने की कोशिश कर रही हो ।फिर 'वो' उसे अचानक ही नजर आ गया। वो सांप...हिना के अंदर आते ही एक शैल्फ के पीछे से बाहर निकल आया था और फर्श पर तेजी से रेंगता हुआ उसी की तरफ बढ़ रहा था |
दरवाजे पर खड़ी लड़कियों की नजरें हिना की तरफ बढ़ते हुए सांप पर पड़ी तो सबकी चीखें निकल गई। वे ऊंची आवाज में कह रही थीं-"हिना..भागकर वापिस आ जाओ...निकल आओ बाहर...सांप तुम्हें काट लेगा। लेकिन हिना को अब कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। सांप को देखकर उस पर तो जैसे कोई जुनून छा गया था। अचानक ही उसका बचपन उसके सामने आ गया था वह लाल ईटों वाले फर्श पर दौड़ती फिर रही थी और छोटे-बड़े सांप उसके आस-पास घूम रहे थे। वह जिस सांप को चाहती हाथ में पकड़ लेती।यह तो था उसका बचपन। उसे किसी सांप से भला क्या खौफ आना थांउसकी निगाहें सांप पर टिकी हुई थीं। सांप रेंगते-रेंगते रुक गया। उसने अपना रुख बदल कर कुण्डली बनाई और फन फैलाकर हिना को देखने लगा। वो अब हिना से चंद कदम के फासले पर था ।हिना ने गुस्से से उसकी तरफ देखा...बेअख्तयार उसकी तरफ बढ़ी व फिर डांटकर उससे बोली-"शर्म नहीं आती...लड़कियों को डराता है... वो एक काले रंग का चमकदार, दो-ढाई फुट का आम-सा सांप था, न जाने कहां से भटकता हुआ इधर आ निकला था। हिना को देखकर वो झूमने लगा था।
- "वो देखो.हिना आ गई।"
लड़कियां उस पर इस तरह गिरतीं, जैसे 'शमा पर 'परवाने' गिरते हैं |हिना जितनी हसीन थी, अन्दर से उतनी ही मासूम थीं उसकी सूरत ही भोली-भाली नहीं थी...दिल भी भोला भाला था। उसे अपने सौंदर्य-अपने यौवन पर नाज न था. ना उसे बड़े बाप की बेटी होने का घमण्ड था ।वह हर लड़की से बेतकल्लुफ हो जाती थीं बेबाकी से बात करती थी, अगर उसे अहसास हो जाता कि कोई लड़की उसे हसरत से देख रही है...बात करना चाहती है, लेकिन झिझक रही है, तो ऐसी लड़की से वह खुद आगे बढ़कर बात कर लेती थी ।फिर लड़कियां उसकी दीवानी क्यों न होती। सारी लड़कियां ही तो उस पर जान देती थीं। पूरा गर्ल्स कालेज उस पर फिदा था। लड़कियां तो लड़कियां, कालेज की लैक्चरार भी उसक तरफ आकर्षित थीं। वे पढ़ाते-पढ़ाते उसके चेहरे में खो जाती थीं और समीर राय तो जैसे देखकर जीता था। नफीसा बेगम उस पर 'सदके वारी' जाती थी।हिना को आये दस साल बीत गये थे लेकिन समीर राय ने अभी तक शादी नहीं की थी।
मां चाहती थी कि वह मायरा से शादी कर ले...समीर मायरा को पसन्द नहीं करता था। वह हवेली आ जाती तो समीर राय उसके साथ वक्त भी गुजार लिया करता थां लेकिन नफीसा बेगम जब भी उपयुक्त अवसर देखकर उससे शादी का जिक्र करती तो...समीर किसी नये घोड़े की तर विदक जाता था। मां, जिद्द करती तो वह हाथ जोड़कर बैठ जाता था।
"अम्मी..मुझे माफ कर दो। मुझसे इन्कार करा कर...क्यों मुझे गुनहागार बनाती हैं। अम्मी, आप तो मेरी जन्नत हैं..मेरे हाथ से क्यों निकलना चाहती हैं....।" वह अनुनयपूर्ण लहजे में कहता ।
"मैं कब कहती हूं कि तू इंकार कर...मैं कब चाहती हूं कि गुनाह का अहसास तुझे कचोटे...।" नफीसा बेगम भी बहस पर उतर आती-"तू आखिर कब तक अकेला रहेगा?"
"मैं अकेला कब हूं, मां... । आप हैं मेरे साथ...हिना है हमारे पास...।"
"मैं कब तक जिन्दा रहूंगी... । मैं सोचती हूं. मेरे बाद कौन करेगा तेरी शादी...कौन करेगा तेरी फिक्र...।" नफीसा बेगम सचमुच ही चिन्तित हो उठती ।
"लेकिन मुझे तो इस हवेली में एक दुल्हन चाहिये...।" मां अधिकारपूर्ण जिद्द पर उतर आती।
"अम्मी जान..मैं अब बूढ़ा हो गया हूं..।" वह एकदम पैंतरा बदलता।
"लो..अब कर लो बात।" मां का मुंह बन जाता-
"सुन लो यह नया बहाना। शादी न करने के सौ बहाने बना लो..मगर खबरदार अपने आपको बूढा मत कहना!"
"क्यों मां..?" वह चकित-सा मां की सूरत देखता।"तू खुद को बूढ़ा कहेगा, जिसकी उम्र चालीस इक्तालीस है...तो फिर मैं खुद को क्या कहूंगी। देख, मैं तो खुद को बूढी कहने से रही-"नफीसा बेगम ने खिन्नता दर्शाई ।यूं यह संजीदा बात प्रायः मसखरेपन की नजर हो जाती और यह मसखरापन समीर राय बीते कई बरसों से कर रहा था। वह अपनी मां की इस संजीदा ख्वाहिश को ऐसे ही हंस कर टाल जाता लेकिन मायरा ने यह बात शायद अपने दिल पर लिख ली थी। उसकी चाहत भी छिपी नहीं रही थी। उसने भी अब तक शादी नहीं की थी।
जब भी उसकी शादी की बात चलती...उसकी आंखें में आंसू भर आते ।
“मा..मैं शादी नहीं करूंगी...।'' उसका जवाब होता। आखिर मैं तुझे कब तक बिठाये रखू।"
मां दुख से कहती-"किसकी आस लिए बैठी है तू.?"
"मां, मुझे किसी की आस नहीं। बस, मैंने नहीं करनी शादी...अगर आपने जबरदस्ती की अम्मी जान, तो खुदा की कसम मैं जहर ख लूंगी...।" वह खुद को संभालते एकदम आंसू पोंछ लेती, जैसे जहर खाने का पुख्ता इरादा रखती हो ।समीर राय को मायरा के इस निरन्तर इंकार का अहसास था..लेकिन वह क्या करता? उसके पास अपना कुछ नहीं था..वह तो सब कुछ नमीरा के नाम कर चुका था। वह बिल्कुल खाली झोली था...वह किसी से शादी करके उसे क्या देता।उसे तो बस सिर्फ अपनी हिना की फिक्र थी।हिना ही अब उसकी जिन्दगी थी। हिना को देखकर उसकी आंखों के चिराग रोशन होते थे। हिना उसकी आंखों का नूर थी... उसके दिल का सुकून थी हिना ही थी जो हर पल उसकी सोचों में रहती थी जब उन रहस्यमय हस्तियों ने हिना पर दोबारा कब्जा करना चाहा तो वह भीतर से कांप कर रह गया। हालांकि वक्ती तौर पर उसने उन पर विजय पा ली थी, लेकिन हर वक्त का धड़का उसके साथ लग गया था। उसने फौरन रोशनगढ़ी छोड़ने का फैसला कर लिया। वह हिना के साथ स्थाई रूप से मुम्बई आ गया। यहां आकर उसने बांद्रा वाला अपना बंगला आबाद किया। छांट-छांट कर नौकर रखे...सुरक्षा के
उत्कृष्ट प्रबन्ध किए। हिना का एक अच्छे स्कूल में एडमिशन कराया...और वह स्वयं हिना को स्कूल छोड़ने व लेने जाता था ।नफीसा बेगम का रोशनगढ़ी में रहना जरूरी था। हवेली खाली छोड़ी जा सकती थी ना जमींदारी। जमीनों और जायदाद के सौ झगड़े थे...उन्हें देखने वाला भी कोई चाहिये था |बहरहाल, हिना एक बार जो रोशनगढ़ी से आई थी तो फिर पलट कर हवेली नहीं गई थी। हां, नफीसा बेगम जरूर आती-जाती रहती थी।यूं दस साल इस तरह बीत गये, जैसे दस माह हों, दस दिन हों, दस
घन्टे हों।
बहुत पहले...लगभग दस ससाल पहले तांत्रिका और भविष्यवक्ता अरूणिमा ने हिना के बारे में समीर से कहा था कि-'इस लड़की पर इसका पन्द्रहवां साल बहुत भारी होगा...।'उसने बस इतना ही कहा था..यह नहीं बताया था कि क्या होगा। उसके बाद भी अरूणिमा से कई मुलाकातें हुई थी, लेकिन इस सिलसिले में उस ‘पहुंची हुई ने न कुछ और बतारया था और न ही समीर राय ने उससे कुछ पूछा था ।अरूणिमा की यह भविष्यवाणी आई...गई ही हो गई थी और अब वह कयामत का साल आ पहुंचा था। अरूणिमा की वह भविष्यवाणी तो समीर राय के दिमाग से उतर गई थी। कोई नहीं जानता था..ना किसी के जहन में था यह पन्द्रहवां साल इस हसीन लड़की पर क्या कयामत ढायेगा ।समीर राय हिना का बर्थ-डे बड़ी धूमधाम से मनाया करता था ।हिना की बीसियों सहेलियों के साथ नफीसा बेगम और मायरा इस फंक्शन में जरूर शामिल होती थीं। खानदान के दूसरे लोग भी आते थे।हिना की पन्द्रहवीं सालगिरह ज्यादा दूर न थी कि-एक दिन क्या हुआ? यह जन्मदिन से बहुत पहले की बात है। मेथ' का पीरियड था। मैडम...पूर्ण एकाग्रता के साथ किसी प्राब्लम' का हल समझा रही थी कि क्लास-रूम के दरवाजे पर एकदम शोर-सा हुआ। कोई लड़की, 'सांप-सांप' कहती हुई भागी।और जब सांप की आवाज हिना के कानों में पड़ी तो उसकी अवस्था एकदम बदल गई। उसके बदन में जैसे एक करंट-सा दौड़ गया। वह जैसे बेअख्तयार ही अपनी सीट से उठी और मैडम से बाहर जाने की अनुमति लिए बिना...दौड़ती हुई क्लास रूम से बाहर निकल गई।उसने जल्दी ही बरामदे में जाती हुई लड़की को जा लिया। उसने उस लड़की के साथ भागते हुए पूछा-"क्या हुआ...? मुझे बताओ..? कहां है सांप ?"
"वह, उधन लाइग्ररी में... ।'' उस लड़की ने बताया।"तुम कहां जा रही हो?" हिना ने पूछा।
"मैं प्रिन्सिपल को बताने जा रही हूं...। वह बोली तो हिना ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया और उसे लाइब्रेरी की तरफ घसीटते हुए बोली-"आओ, मेरे साथ...।
"फिर जब वह लाइब्रेरी में पहुंची तो अच्छा खासा हंगामा मचा हुआ था, लड़कियां दरवाजे पर खड़ी चीख रही थीं। आहिस्ता-आहिस्ता यह खबर हर क्लास तक पहुंच गई कि लाइब्रेरी में सांप निकल आया है। देखते-ही-देखते बहुत-सी लड़कियां लाइब्रेरी के सामने इकट्ठा हो गई। कहां है सांप, मुझे बताओ... I' हिना लाइब्रेरी में घुसते हुए बोली ।
“तुम क्या करोगी। प्रिन्सिपल मैडम को आने दो। आफिस से किसी मर्द को बुलाओ...।
" कई लड़कियों ने उसे रोका।'अरे, हटो...।" हिना ने झटका देकर लड़कियों को परे किया और अंदर घुस गई |लाइब्रेरी में इस वक्त कोई नहीं था। लाइब्रेरियन भी अन्दर मौजूद न थी। लाइब्रेरी के दरवाजे से विभिन्न आवाजें आ रही थीं। सांप उपन्यासों वाले शेल्फ के पीछे था। कोई कह रहा था-"मेज पर था...।
"कोई कह रहा था-"नहीं, कुर्सी के नीचे था।
"जितने मुंह उतनी बातें' वाली स्थिति थी।हिना ने लाइब्रेरी के मध्य में खड़े होकर जायजा लिया। उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे, वह गहरे-गहरे सांव ले रही थी और उसकी आंखों में एक खास चमक-सी बढ़ती जा रही थी। वह अपनी गर्दन को कुछ इस तरह धीरे-धीरे घुमा रही थी..जैसे किताबों व शैल्फों में छिपे हुये सांप को देखने की कोशिश कर रही हो ।फिर 'वो' उसे अचानक ही नजर आ गया। वो सांप...हिना के अंदर आते ही एक शैल्फ के पीछे से बाहर निकल आया था और फर्श पर तेजी से रेंगता हुआ उसी की तरफ बढ़ रहा था |
दरवाजे पर खड़ी लड़कियों की नजरें हिना की तरफ बढ़ते हुए सांप पर पड़ी तो सबकी चीखें निकल गई। वे ऊंची आवाज में कह रही थीं-"हिना..भागकर वापिस आ जाओ...निकल आओ बाहर...सांप तुम्हें काट लेगा। लेकिन हिना को अब कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। सांप को देखकर उस पर तो जैसे कोई जुनून छा गया था। अचानक ही उसका बचपन उसके सामने आ गया था वह लाल ईटों वाले फर्श पर दौड़ती फिर रही थी और छोटे-बड़े सांप उसके आस-पास घूम रहे थे। वह जिस सांप को चाहती हाथ में पकड़ लेती।यह तो था उसका बचपन। उसे किसी सांप से भला क्या खौफ आना थांउसकी निगाहें सांप पर टिकी हुई थीं। सांप रेंगते-रेंगते रुक गया। उसने अपना रुख बदल कर कुण्डली बनाई और फन फैलाकर हिना को देखने लगा। वो अब हिना से चंद कदम के फासले पर था ।हिना ने गुस्से से उसकी तरफ देखा...बेअख्तयार उसकी तरफ बढ़ी व फिर डांटकर उससे बोली-"शर्म नहीं आती...लड़कियों को डराता है... वो एक काले रंग का चमकदार, दो-ढाई फुट का आम-सा सांप था, न जाने कहां से भटकता हुआ इधर आ निकला था। हिना को देखकर वो झूमने लगा था।