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Horror आसुरी शक्तियां

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"तुम्हें नहीं पता? कैसे मर्द हो? कहते हैं कि जब किसी लड़की को मर्द की हवस भरी निगाहें और वासना से कांपते हाथ छूने लग जायें, तब वह अपनी उम्र से पहले ही बड़ी हो जाती है। ऐसे ही मैं भी हो गई थी… एक अंग्रेज़ टीचर थे मेरे। उन्हें मैं पसंद थी तो अक्सर पढ़ाने के बहाने वे अपने घर बुला लिया करते थे और फिर अपनी निगाहों और हाथों से मुझे वह गंदे-गंदे स्पर्श देते थे। मुझे उनसे घिन आती थी और मैं वहां नहीं जाना चाहती थी— लेकिन मेरे घर वाले मुझे जबरन भेजते थे। वे ग़ुलाम लोग थे, मना करने की औकात ही नहीं थी… पर मुझे वह सब इतना बुरा लगता था कि मैं घर आ कर उल्टी करती थी, रोती थी… लेकिन किसी को मुझ पर तरस नहीं आता था।

अगले दिन मुझे फिर भेज दिया जाता। मेरी पढ़ाई का जिम्मा भी वही अंग्रेज लिये था तो पढ़ाई भी नहीं छुड़ाई जा सकती थी। फिर जब उस आदमी ने अपनी निगाहों और हाथों के इस्तेमाल से मुझे भोगने लायक जवान कर लिया तो मुझ पर चढ़ने लगा। मुझे उसकी वजह से मर्द ज़ात से ही नफ़रत हो गई और कोई वाकई भी मुझ पर तरस खाता था, तो मैं उस पर भरोसा नहीं कर पाती थी। कई साल यह झेलती रही मैं यह… बारहवीं तक की पढ़ाई भी हो गई, लेकिन फिर भी पीछा न छूटा उससे… फिर वह मेरे साथ नशे में मार-पीट भी करने लगा। एक दिन मुझे गुस्सा आ गया और मैंने एक पीतल का वास उसके सर पर दे मारा। वह तो मारा गया लेकिन बाद में मुझे भी पकड़ लिया गया… और जानते हो, वह लोग कितने सुअर थे।

उन्होंने मुझे कानून के हवाले नहीं किया, बल्कि ख़ुद ही एक तहखाने में बिना कपड़ों के क़ैद कर दिया… जहां मैं ठंड खाते मौत से लड़ती थी। वे मुझे कुछ खाने को भी नहीं देते थे और मेरे साथ वही सब करते थे जो वह हरामी करता था… बल्कि उससे ज्यादा वहशियाना तरीके से करते थे… और तब तक करते रहते, जब तक मैं बेहोश न हो जाती।" वह धीरे-धीरे याद करते और बातों के बीच छोटे-छोटे वक्फे लेते बोलती रही और सचिन ने बीच में कुछ इसलिये न टोका या पूछा कि उसकी लय बनी रहे।

"और फिर… होश में आने के बाद क्या होता?" जब अंतिम रूप से निशा को चुप होते देखा तो सचिन ने मुंह खोला।

"तो मैंने उन सबको मार डाला और आज़ाद हो गई… जब वे मेरे साथ दरिंदगी करते थे, तो तिल-तिल मरते मैं रोज़ भगवान से मांगती थी कि मुझे एक बार इतनी ताक़त दे दें कि मैं उन हरामजादों का वध कर सकूं… और मैंने कर दिया।"

"मतलब भगवान ने तुम्हें वह शक्ति दे दी?"

"पता नहीं… पता नहीं किसने दे दी, पर हां, मुझमें इतनी शक्ति आ तो गई कि मैं उन्हें मार सकी और वहां से आज़ाद हो सकी।"

"मतलब तुम्हें नहीं पता कि वह शक्ति तुम्हें किसने दी?"

"नहीं… मुझे जिस क़ैदखाने में डाला गया था, वहां पहले से एक काली छाया रहती थी, जो जब-तब मुझे दिखती थी और जब मैं उसके पास जाने की कोशिश करती तो ग़ायब हो जाती। जब वे दरिंदे मुझे नोचने आते तो वह रोशनदान पर जा चिपकती और वहां से देखती रहती। उसे वे लोग नहीं देख पाते, लेकिन मैं देखती थी और वह मुझे देखती थी… बस कुछ बोलती नहीं थी, न मेरी किसी बात का जवाब देती थी। फिर तीसरे दिन जब मैं भूख और कमज़ोरी से मर रही थी… तब उसने मेरे कान में हवा की तरह फुसफुसा कर कहा था कि जो तुम मांगती थी वह तुम्हें मिल गया। मुझे नहीं पता, न उसने बताया कि वह मुझे उसने दिया या भगवान ने दिया… बस उस दिन मैंने महसूस किया कि मुझे वाकई वह शक्ति मिल गई थी, जो चाहिये थी और मैंने काली की तरह उन दुष्टों का नाश कर दिया और आज़ाद हो गई।"

"और यहां कैसे आ गई?"

"भटकते हुए… मुझे भटकने का बहुत शौक है… खास कर चांदनी रातों में। मैं बस कहीं की कहीं पहुंच जाती हूँ लेकिन बस इन पहाड़ों की सीमा में ही।"

"वैसे यह बात कब की है, जब तुम्हारे साथ यह सब हुआ?"

"मुझे नहीं याद… तब अंग्रेज ही हमारे मालिक थे और वही हमारे जीने मरने के फैसले करते थे।" उसके शब्द बता रहे थे कि वह आज़ादी से पहले की बात कर रही थी।

"और तब से तुम बस ऐसे ही भटक रही हो?"

"हां… बस जिससे दोस्ती हो जाती है, उसके पास रुक जाती हूँ। जैसे निशा से हो गई तो उसके पास रुक गई… अब मुझे लगता है कि तुमसे हो गई है तो कल तुम्हारे पास रुक जाउंगी… तुम्हें मेरे रुकने से एतराज़ तो नहीं होगा?"

"क्या— नन-नहीं… मुझे क्या एतराज़ होगा। जैसा तुम्हें अच्छा लगे।"

"अच्छा, मेरा हास्टल आ गया। अब मैं चलती हूँ।"

"ज़रूर… और हां, निशा से मेरी हैलो बोलना।"

वह मुस्कराते हुए हास्टल के गेट की तरफ़ बढ़ गई और सचिन कल की तरह ही सीधे निकलता चला गया।

आज की बातों से उसे पक्का यक़ीन हो गया कि वह पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से ही जूझ रही थी, लेकिन दो बातें समझ से परे थीं… पहली कि रात को वह किस तकनीक से उसके पास आई और फिर चली भी गई कि उसे अहसास तक न हो पाया और दूसरी कि किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित रोगी सामान्य अवस्था में दिन के होशो हवास वाले समय में अपने मूल व्यक्तित्व में रहता है और किसी खास समय में ही दूसरी पर्सनैलिटी में शिफ्ट होता है, जो निशा के केस में रात का वक़्त होना चाहिये था क्योंकि दिन में तो उसे अपनी पढ़ाई के साथ सोशल लाईफ भी फेस करनी होती थी— लेकिन यहां उल्टा हो रहा था कि वह दिन में अपने आप में नहीं थी और रात में पूरी तरह होशोहवास में थी… ऐसा कैसे था?

बाकी बचे दिन को उसने इसी गुत्थी को सुलझाने में गुज़ारा। नेट पर भी सर्च कर के इस बारे में काफी कुछ पढ़ा, वीडियो देखे— लेकिन किसी ठोस नतीजे पर न पहुंच सका… और रात को फिर अपनी कल वाली ड्यूटी पर लग गया।

आज उसने दूर से नज़र रखने की ज़रूरत न समझी थी क्योंकि निशा से मतलब भर पहचान हो चुकी थी… तो सीधे हास्टल के पीछे ही पहुंच गया था और मैदान की तरफ़ वाले कोने से सट कर खड़ा हो गया था कि दोनों तरफ़ नज़र रख सके। धीरे-धीरे प्रतीक्षा के पल लंबे होने लगे तो सिग्रेट की तलब लगने लगी— लेकिन वहां सिग्रेट भी नहीं पी सकता था कि फिर उसे दूर से देखा जा सकता।

खड़े-खड़े घंटा भर गुज़र गया और वह उक्ताने लगा, लेकिन देवी के दर्शन न हुए… और फिर ठीक सर पर, बाउंड्री वाल के ऊपर उसे सरसराहट महसूस हुई तो सर स्वमेव ही ऊपर उठ गई।

पहले देखा था, तो ऊपर तारों भरा आकाश था, इस बार देखा तो जैसे कोई स्याह कपड़ों का गुच्छा सा था जो सर के इतने पास पहुंच चुका था कि बचना असंभव था। उसे संभालने के लिये हाथ ऊपर किये, लेकिन हाथों से किसी चीज़ का स्पर्श न हुआ— अलबत्ता ऐसा ज़रूर लगा कि उस पर भारी भरकम सी कोई अदृश्य सी चीज़ लाद दी गई हो और उसके वज़न को झेल न पाने के चलते वह भरभरा कर ढेर हो गया हो। दिमाग़ कुछ पल के लिये संज्ञाशून्य हो गया— लेकिन शरीर में पैदा हुई छटपटाहट जल्दी ही उसे फिर होश में ले आई और दम घुटता सा लगा। उसने जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलाये— स्पर्श तो फिर किसी चीज़ का न हुआ, लेकिन ऐसा लगा जैसे कोई चीज़ ऊपर से हट गई हो और अब वह सांस भी ले सकता है और देख भी सकता है।

लेकिन देख कर एकदम से सर चकरा गया कि वह किसी अंधेरी जगह था— अभी चंद सेकेंड पहले तो वह हास्टल की बाउंड्री के कोने से सटा खड़ा था, जहां दो तरफ़ वह दूर तक देख सकता था— लेकिन यहां तो किसी तरफ़ कुछ दिख ही नहीं रहा था और हवा में मौजूद घुटन बता रही थी कि वह कोई बंद जगह थी। ऐसा कैसे हो सकता था— यह किसी तरह संभव नहीं था… उसके शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गये।

फिर कान तक किसी के सिसकने की आवाज़ पहुंची तो दूसरा झटका लगा… अब यह क्या था? उसने आँखें अंधेरे में गड़ाईं— वे जब अंधेरे की थोड़ी अभ्यस्त हुईं तो एक जगह दीवार में बड़ी हल्की दरारें दिखीं। उसने जल्दी से खड़े हो कर ज़मीन टटोलते क़दम बढ़ाए और उस जगह पहुंच कर देखा— तो वह सड़ती लकड़ी का दरवाज़ा निकला, जो इतना मोटा तो था कि काफी सड़ चुकने के बाद भी बरक़रार था। अच्छी बात थी कि उसमें ताला या बाहर से सांकल नहीं लगी थी, तो वह उसे खोल कर बाहर निकल सका।
 
बाहर निकलते ही एक बार फिर चकराया… अब बाहर आकाश से आती देखने लायक रोशनी मौजूद थी। आसपास स्याह पेड़ और उनका घनत्व बता रहा था कि वह आबादी में तो नहीं था और आबादी के बाहर ऐसा कोई निर्माण बस एक ही जगह थी— जिसका ख़्याल आते ही उसके शरीर ने भरभरा कर पसीना छोड़ दिया और धड़कनें डूबने लगीं। उसने इधर-उधर देखा, दोनों तरफ़ बंद दरवाज़े और बीच में यह बाल्कनी जैसी जगह, जहां आदमक़द घास खड़ी थी। वह नन्हें खां की कोठी के दूसरे मजले पर था। कई बार उसने देखा था इस जगह को, लेकिन हमेशा बाहर से और वह भी दिन में… इस जगह का इतना ख़ौफ था कि कोई दिन में भी अंदर घुसने का साहस नहीं करता था और वह रात के इस वक़्त अंदर मौजूद था— इस ख़्याल से ही वह एकदम सुन्न हो गया।

यह नाकाबिले यक़ीन था— इस जगह से निशा का हास्टल एक किलोमीटर से कम दूर नहीं था, और बस कुछ सेकेंड में वह वहां से यहां पहुंच गया था, वह भी कोठी के अंदर और वह भी ऊपर ऐसी जगह— जहां से बाहर निकलने के लिये उसे पहले अंदर जाना पड़ता, फिर एक बंद कोठरी में घुस कर सीढ़ियों के सहारे नीचे कोठरी में उतरना पड़ता और वहां मुख्य हॉल से गुज़र कर एक कमरा पार करके तब बाहर निकल पाता। उसकी सारी वैज्ञानिक बुद्धि उन पलों में हवा हो गई… उसे एक सिंगल साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन न समझ आ पाई, इस चमत्कार की। उल्टा अब दिमाग़ ने निशा की सुपर पॉवर को स्वीकार कर लिया तो दिल दिमाग़ पर एकदम से इतनी दहशत सवार हो गई कि कोठी के अंदर घुस कर फिर बाहर निकलने लायक हिम्मत ही न हुई।

पहले जो कानों तक सिसकने की आवाज़ पहुंची थी, वह अब किसी बच्चे के रोने की आवाज़ में बदल चुकी थी और वह शायद नीचे से आ रही थी। थोड़ी देर के लिये उसका दिमाग़ उलझा ज़रूर, लेकिन फिर याद आ गया कि परसों रात बद्री की ठेकी पर लोकेश ने चंदन का किस्सा बताया था, जिसमें वह इसी कोठी में होश में आया था और उसके पास ही एक बच्चा बैठा रो रहा था। अब वही सब उसके साथ रिपीट हो रहा था और यह सोच के उसकी हालत खराब हुई जा रही थी। अंदर जाने की हिम्मत तो थी नहीं— मन कर रहा था कि वहीं से कूद जाये, चाहे भले हाथ-पांव टूट जायें।

यह तो फिर गनीमत थी कि हवा शांत थी— वर्ना वह जगह ऐसी थी कि वहां अंदर घुसी हवा जब फंस-फंस कर बाहर निकलती थी तो लगता था जैसे कोई राक्षस सांस ले रहा हो, या कई आत्माएं मिल कर सरगोशियां कर रही हों।

अनायास ही जेब की तरफ़ गये हाथ से मोबाइल टकराया तो एकदम से दिमाग़ चला कि घर फोन करके सबको यहां बुला लेता है… उसने जल्दी से फोन निकाला और ऑन किया— पर यह देख कर मुंह से गाली निकल कर रह गई कि फोन में नेटवर्क ही नहीं था। इधर वैसे भी नेटवर्क काफी कमज़ोर था— फिर जंगल में तो क्या ही काम करता… अब?

तभी उसने महसूस किया कि रोते हुए बच्चे की आवाज़ नज़दीक आ रही हो और वापस उसके रोंगटे खड़े हो गये। ऐसा लगा जैसे वह बच्चा रोते हुए ऊपर आ रहा हो। उसने बेचैनी से इधर-उधर देखा, लेकिन मुक्ति की आस किधर से भी न दिखी। अभी तो उसे यहीं नहीं पता था कि सीढ़ियों का रास्ता उसके किस तरफ़ वाली कोठरी में था। उसके आगे-पीछे पांच-छः फुट ऊंची सूखी घास ज़रूर खड़ी थी, लेकिन वह इतनी घनी नहीं थी कि दोनों तरफ़ के दरवाज़े देखे न जा सकें।

रोने की आवाज़ नज़दीक आती गई और एक 'चर्रर्र' की खरोंचती हुई आवाज़ के साथ एक तरफ़ का दरवाज़ा खुल गया— यह उसके दूसरे तरफ़ वाली कोठरी थी, एक तरफ़ वाली से तो ख़ुद ही बरामद हुआ था। दरवाज़े की चौखट पर एक बच्चे का साया दिखा जो घुटनों के बल चल रहा था। वैसे न भी पता चल पाता पर उसके रोने की आवाज़ उसका पता दे रही थी। सचिन का हाल यह था कि दिल हलक में आ कर निकल भागने पर उतारू हो गया था, शरीर फिर से पसीना-पसीना हो गया और टांगें इतनी बेजान हो गईं कि उसका वज़न संभाल पाने में भी असमर्थ लगने लगीं।

बच्चा दरवाज़ा पार करके वहीं थम गया और बैठ कर रोने लगा। हालांकि अंधेरे और ओट से मिलते साये में होने के चलते वह इतना स्पष्ट तो नहीं दिख रहा था— साये की तरह ही दिख रहा था, लेकिन आवाज़ से अपनी मौजूदगी दरशा रहा था और दहशत में जमे जा रहे सचिन की आँखें लगातार उसी पर जमी थीं।

"मम-मुझे जाने दो… प्लीज मुझे जाने दो।" सचिन खुश्क गले के साथ मरी-मरी आवाज़ में गिड़गिड़ाने लगा— लेकिन स्वर ऐसा था कि जैसे बोलते ही न बन रहा हो।

पहले तो बच्चे का रोना न थमा, लेकिन सचिन जब लगातार गिड़गिड़ाता रहा, तब वह चुप हो कर सचिन को देखने लगा… उसे चुप देख कर सचिन भी चुप हो गया और एकदम से वातावरण में निस्तब्धता हावी हो गई। सचिन को लगा था कि वह बच्चा कुछ तो करेगा— क्योंकि उसकी समझ में इतना तो आ ही गया था कि वह कोई वास्तविक बच्चा नहीं था… तो वह उसकी अगली प्रतिक्रिया का सामना करने के लिये जूझ रहा था… और तभी वह बच्चा हंस पड़ा। हंसी ऐसी थी, जैसे वह सचिन का उपहास उड़ा रहा हो। उस अंधेरे सन्नाटे में, उस भुतही जगह, उस बच्चे की ऐसी हंसी भयावह थी… जो सचिन की धड़कनें रोकती सी लगी। फिर उसे लगा कि हंसने के साथ ही बच्चे का आकार बढ़ता जा रहा हो।

उसे लोकेश की बताई चंदन वाली घटना याद आई और वह अब बिना देर किये सीधे अधटूटी रेलिंग से होता नीचे कूद गया। इससे ज्यादा और बर्दाश्त कर पाने की ताक़त उसमें नहीं बची थी।

नीचे बजरी वाला दलान सा था, जहां घास और बेतरतीब पौधे ज़रूर झाड़-झंखाड़ की शक्ल में मौजूद थे— लेकिन इतने नहीं थे कि उसके गिरते शरीर को सहारा दे सकते। गिरने के साथ ही जाने कैसे वह असंतुलित हो गया था और पैर तिरछा ज़मीन से टकराने के कारण पीछे ही उलट गया था। कूल्हे और सर दोनों ज़मीन से जा टकराये और कुछ पल के लिये सुन्न हो गये। क़रीब तेरह-चौदह फुट की ऊंचाई से कूदने का झटका था— शरीर हिल कर रह गया था।

सर को लगी चोट ने कुछ पल के लिये उसे सुन्न ज़रूर कर दिया, लेकिन जल्दी ही किसी की आवाज़ ने उसे उस संज्ञाशून्यता से बाहर खींच लिया। कोई जैसे उसका नाम लेकर पुकार रहा था और पलकों की झिरी पर अब रोशनी भी पड़ने लगी थी। इतनी जल्दी ऐसी वीरान जगह कौन मददगार पहुंच गया— इस ख़्याल ने उसे वापस करंट सा लगाया था और वह शरीर में उठती दर्द की लहरों के बावजूद चिंहुकते हुए उठ बैठा। अब जो मंजर सामने था, वह फिर उसके लिये नाकाबिले यक़ीन था… वह खाली-खाली आँखों से ऐसे सामने देखने लगा, जैसे दिमाग़ी संतुलन ही खो बैठा हो। वह किसी पक्के फर्श वाले गलियारे में था— जहां छत में लगा एक बल्ब प्रकाश पैदा कर रहा था, और उस रोशनी में वह देख सकता था कि उसके पास ही निशा झुकी उसे देख रही थी।

"तुम ठीक तो हो… क्या हुआ तुम्हें?" उसने आवाज़ धीमी रखते हुए पूछा।

"मम-मैं कहां हूँ?" कुछ वक्फे बाद उसके होंठ हिले।

"मेरे हास्टल में… अभी तो बाहर से आये मेरे साथ और फिर एकदम गिर पड़े। क्या हो गया?" उसने चिंताजनक दृष्टि से सचिन को देखा और सचिन को लगा ही नहीं कि वह झूठ बोल रही थी, जबकि उसकी बात का कोई मतलब ही नहीं था… जो उसने अनुभव किया था, वह एकदम अलग था।

"कुछ नहीं— मैं यहां क्यों आया?" शरीर में उठती दर्द की लहरों को दरकिनार करते वह खड़ा हुआ— कूल्हे की हालत अभी भी ऐसी थी कि क़दम बढ़ाने में जान निकल रही थी।

"हास्टल की छत पर चलने के लिये, ताकि हम वहां 'वह' कर सकें… जो तुमने कल करने को कहा था। ऊपर कोई झांकने तक नहीं आता।"

"यहां और लड़कियां नहीं हैं?" उसने गलियारे के दूसरे बंद दरवाज़ों को देखते हुए पूछा।

"हैं, पर सब डरती हैं न मुझसे, तो रात के इस वक़्त कोई नहीं आयेगा ऊपर।"

"यह बदबू कैसी आ रही है?" उसने 'सूं-सूं' करते नाक सिकोड़ते हुए पूछा— अजीब सी सड़ांध फैली हुई थी वहां।

"कहां… कुछ भी तो नहीं है। तुम्हें वहम हो रहा है शायद। ऐसी कोई बदबू होती तो यह बाकी लड़कियां कंपलेंट न करतीं।"

"मुझे घर जाना है।" एकदम से उसने इस सिलसिले से निजात पाने की सोची।

"अब तुम मुझे नाराज़ करोगे क्या… मैंने तो कल ही करने को कहा था, तुमने कहा कि कल करेंगे… मैंने दिन भर इंतज़ार किया, अब तुम पीछे नहीं हट सकते। थोड़ी देर तो लगेगी— कर लो, फिर चले जाना। मैं कौन सा तुम्हें रात भर के लिये रोक रही हूँ।" वह आँखें तरेरती हुई बोली और उसके पीछे हो गई— जिसका मतलब था कि उसे आगे चलना ही चलना है।

वैसे शायद वह मना कर देता— जान छुड़ा कर भाग लेता, लेकिन अब वह उसकी स्प्रिट पॉवर देख चुका था तो इतना समझ सकता था कि उसकी मर्ज़ी का अब कोई रोल नहीं था। वह अगर उसे चलाना चाह रही थी, तो चलना ही था। वे गलियारे के अंतिम सिरे पर पहुंचे, जहां सीढ़ियां थीं— तो उसने ऊपर चढ़ने को कहा और सचिन को भले पैर उठाने में भयंकर दर्द का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन अब आदेश था तो चढ़ना ही था। उधर वह सड़ी सी बदबू और ज्यादा थी, तो उसने सांस रोक ली और ऊपर चढ़ने लगा।

सीढियों के अंत में एक दरवाज़ा था जो बंद था, लेकिन ताला नहीं लगा था तो खोला जा सकता था। निशा के कहने पर सचिन ने बेलन हटाते उसे खोला और बदबू का एक नज़दीकी झोंका उसकी नाक तक पहुंचा। इस बार उसे जेब से रुमाल निकाल कर नाक पर रखना पड़ा।

"मुझे लगा था कि यहां कोई नहीं होता इस वक़्त— पर यहां पहले ही कोई सो रहा है।" निशा ने छत पर एक किनारे की तरफ़ उंगली उठाई तो सचिन को भी उस तरफ़ देखना पड़ा।

वहां कोई चादर ओढ़े लेटा था… कमाल यह था कि आसपास वही सड़ी सी बदबू फैली हुई थी और कोई इतनी बदबू में भी वहां सो रहा था।

"जाओ उसे उठाओ और भगाओ यहां से।" निशा पीछे से गुर्राती हुई बोली।

"मम-मैं—"

"हां, तुम नहीं तो क्या मैं… एक बार उसे उठाओ, फिर मुझे यहां देख कर ख़ुद ही भाग जायेगा। जाओ।" इस बार वह घुड़कती हुई बोली और सचिन को न चाहते हुए भी आगे बढ़ना पड़ा।

इस वक़्त डर से ज्यादा बदबू हावी थी उसकी मनोदशा पर और दिमाग़ किसी हद तक झुंझलाहट का शिकार हो गया था। वह उस सोये हुए बंदे तक पहुंच कर उसे जूते की नोक से टटोलते हुए बोला— "ऐ-ऐ— कौन है— उठो यहां से।"

लेकिन सामने से कोई प्रतिक्रिया न मिली… उसने फिर जेब टटोली तो मोबाईल मौजूद था। उसने मोबाईल निकाल कर देखा— इस बार नेटवर्क मौजूद थे लेकिन अब फौरन कॉल करने की हालत में नहीं था। उसने सीधे टॉर्च ऑन की और रोशनी में उस लेटे हुए को देखा— गंदी सी चादर थी तन पे और लगता था कि बदबू उसी के पास से आ रही थी। उसने फिर पैर से टहोका लेकिन लगा ही नहीं कि वह कोई ज़िंदा बंदा था… उसकी धड़कनें फिर बेतरतीब होने लगीं। उसने झुक कर एक कोने से चादर पकड़ी और खींच कर अलग कर दी।

फिर उसे चौंक कर पीछे हट जाना पड़ा… बड़ी मुश्किल से उसने अपनी चीख़ रोकी।
 
वह कोई लाश ही थी, जो चित पड़ी थी, यानि चेहरा आसमान की तरफ़ था। उसकी सड़ती हुई हालत बता रही थी कि वह पच्चीस-छब्बीस दिन पुरानी लाश थी जो अब बुरी तरह बदबू मार रही थी… और सबसे ख़तरनाक बात यह थी कि वह लाश किसी और की नहीं, बल्कि निशा की थी— जिसका चेहरा खराब होना शुरु हो चुका था, लेकिन अभी भी वह पहचानी जाने लायक थी।

उसने हौलते हुए पीछे देखा तो वहां कोई नहीं था— जो उसे यहां तक लेकर आई थी, अब लापता थी। छत पर कोई नहीं था… वह एकदम से भाग खड़ा हुआ। पिंडलियों में जान तो बची नहीं थी, सीढ़ियों पर संतुलन बनाने में कामयाब न रहा और ढहते हुए नीचे लुढ़क गया। कहां गिरा, कहां चोट लगी और क्या अंजाम हुआ— कुछ पता नहीं… सबकुछ जैसे अंधेरे में खो गया।

और तीन दिन बाद शाम ढलने से ठीक पहले जब वह जंगल वाली बाग़ की तरफ़ भटक रहा था तो उसे लोकेश मिल गया— जो उसे देखते ही पुकारते हुए उसकी तरफ़ लपक लिया था।

"अबे सुन-सुन… नेगी। किधर है बे— न गांव में दरसन हो रहे न ठेकी पर आ रहा रात को। अबे मुंबई से छुट्टी मनाने आया था न इधर… तो यह कौन सी छुट्टी है बे कि हम दोस्तों के लिये ही टाईम नहीं मिल रहा।" नज़दीक आते हुए वह शिकायत भरे लहजे में बोला।

"कुछ नहीं… बस कहीं बाहर गया था।" सचिन ने जैसे जान बचाई।

"झूठ मत बोल गांडू… तेरे छोटे भाई से पूछा था तो बोला कि घर पर पड़ा रहता है आजकल और रात को पता नहीं किधर निकल जाता है। अब तू धिरकिट दे रहा है कि कहीं बाहर चला गया था— क्या बे?"

"करना क्या है तुझे?"

"अबे करना क्या का क्या मतलब… दोस्त हैं तेरे। तू तो उस चुड़ैल को शीशे में उतारने की चुनौती लिये था न बे और जब दो दिन पहले उसकी पच्चीस-तीस दिन पुरानी लाश बरामद हो गई हास्टल की छत से— तो साले ख़ुद ही मुंह चुरा लिया। आ के मानता न कि तू गलत था उसके मामले में। वह चुड़ैल ही थी जिसे हम सब रात को भटकते देखते थे— क्योंकि असली निशा तो कभी की मर चुकी थी।"

"ठीक है— मै ग़लत था। आत्मा होती है, भूत-प्रेत, चुड़ैल, पिशाच सब होते हैं। अब ठीक है?" वह बेजारी से बोला जैसे पीछा छुड़ाना चाह रहा हो।

"हां, तो यह बात सबके बीच माननी थी न, जहां चुनौती दी थी कि वह लड़की किसी साइक्लॉजिकल प्राब्लम की शिकार है और तू उसकी प्राब्लम समझ के रहेगा… समझ में आई?"

"क्या?"

"उसकी साइक्लॉजिकल प्राब्लम?" लोकेश ने उपहास उड़ाने वाले भाव से कहा।

"हां… आई समझ।"

"अच्छा— क्या?"

"तुझे जानना है न कि रात को मैं किधर भटक रहा होता हूँ… तो चल उधर ही चलते हैं। फिर बताता हूँ कि उसकी साइक्लॉजिकल प्राब्लम क्या थी।" सचिन उसे उकसाते हुए बोला और जंगल की तरफ़ रुख़ करते आगे बढ़ लिया।

"उधर किधर— जंगल में?" लोकेश हैरान हुआ।

"हां… क्यों फट गई?" अब सचिन ने उसकी हंसी उड़ाई।

"अजी घंटा… वह चुड़ैल जब थी तब ज़रूर डर लगता था लेकिन अब जबसे निशा की लाश बरामद हो गई है, वह तो ग़ायब ही हो गई है। तो अब हम भी अपने डर से मुक्त हो गये हैं… चल, जंगल ही सही।" लोकेश ने सीना फुला के दिखाया और उसके पीछे ही बढ़ लिया।

"जानना चाहता है, उसकी साइक्लॉजिकल प्राब्लम के बारे में— तो सुन… उसकी साइक्लॉजिकल प्राब्लम का नाम है रंजना।"

"रंजना— अब यह रंजना कौन है?"

"रंजना अल्मोड़ा की एक लड़की है, जो चार भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। उसके पिता एक अंग्रेज अफसर के यहां काम करते थे।"

"अंग्रेज़ अफसर… अल्मोड़ा में अभी भी अंग्रेज अफसर पाये जाते हैं क्या?"

"तू बस चुपचाप सुनता रह… बात तेरी समझ में सबसे आखिर में आयेगी— लेकिन पहले सुनना ज़रूरी है। हां तो मैं कह रहा था कि रंजना पढ़ने-लिखने में अच्छी थी तो उस अंग्रेज अफसर का एक मित्र, जो टीचर था— उसने रंजना की पढ़ाई-लिखाई अपने जिम्मे ले ली और उसे अपने वाले स्कूल में ही दाखिला नहीं दिलाया, बल्कि स्कूल टाईम के बाद घर बुला कर भी पढ़ाने लगा…" तत्पश्चात, वह उसे बड़े इत्मीनान से वह सब कहानी उसे सुनाता चला गया जो निशा ने रंजना के रूप में उसे सुनाई थी।

जब वह कहानी ख़त्म हुई तो लोकेश ने पाया कि वे चलते-चलते नन्हें खां की कोठी के नज़दीक पहुंच चुके थे और यह अहसास होते ही वह थम गया।

"अबे यह कहां ले आया साले— यह तो हम नन्हें खां की कोठी के पास आ गये।"

"क्यों— अब फटने लगी… अभी तो बड़ा शेर हो रहा था। जानना चाहता है कि मैं कहां रहता हूँ आजकल— तो यहीं रहता हूँ मैं आजकल। अब चल साले— तुझे दिखाता हूँ कुछ।"

"नहीं-नहीं-नहीं… मुझे कुछ नहीं देखना… और सुन, इस मनहूस जगह तो हम तब भी नहीं आते थे जब निशा का अता-पता नहीं था कोई। तू मर जा के साले— मैं जा रहा हूँ।" लोकेश ने कलपते हुए कहा और पलट लिया— लेकिन दो क़दम भी न चल पाया होगा कि सचिन ने लपक के उसका एक पैर पकड़ कर खींच लिया और वह ज़मीन पर पहुंच गया।

फिर वह लाख दुहाई देता रहा, गिड़गिड़ाता रहा और सचिन को गालियां देता रहा— लेकिन सचिन उसे पकड़ कर बिना कोई रहम दिखाये भावशून्य सा बस खींचता रहा। अपनी ताक़त भर लोकेश ने ख़ुद को छुड़ाने की कोशिश की थी, लेकिन उन पलों में उसने महसूस किया था कि सचिन में कोई अविश्वसनीय शक्ति आ समाई थी, जिसके सामने लोकेश की ताक़त कुछ थी ही नहीं। उसकी पकड़ ऐसी थी, जैसे लोकेश की पिंडली पर कोई लोहे का शिकंजा आ फंसा हो।

उनके वहां पहुंचने तक सूर्यास्त हो चुका था और आकाश के पश्चिमी छोर पर फैली लालिमा के साथ रोशनी अब कम होने लगी थी— लेकिन फिर भी इतनी रोशनी तो थी कि आसपास देखा जा सकता। सचिन उसे खींचता हुआ कोठी के सड़ कर अधटूटी हालत में पहुंच चुके दरवाज़े से भीतर घुसा और एक कमरा पार करके उस बीच वाले हॉल में ले आया, जिसकी आधी से ज्यादा छत ढह चुकी थी और जो हिस्सा ढहने से बचा था— वहां कोई बेजान सा पड़ा था। उनके वहां पहुंचने से मची हलचल से भी उस पर कोई असर न पड़ा था और वह वैसे ही निश्चल पड़ा रहा था। एक बात और थी जिसने समझ में आते ही लोकेश के रोंगटे खड़े कर दिये कि उस पड़े हुए शख़्स के शरीर पर वही कपड़े थे, जो सचिन पहने था और उसके पास से हल्की-हल्की दुर्गन्ध सी उठ रही थी।

"तुझे जानना था कि मैं कहां रहता हूँ… तो सुन… यहीं रहता हूँ मैं इसके साथ। हम ढेरों बातें करते हैं, इधर ही खेलते हैं और मस्त रहते हैं।" सचिन ने हंसते हुए कहा।

"कौन है यह?" लोकेश ने भयभीत होते हुए पूछा।

"ख़ुद देख ले— तू जानता है इसे।"

लोकेश ने खड़े होने की कोशिश तो नहीं की, बस बच्चे की तरह घुटनों के बल चलते उस शख़्स की तरफ़ बढ़ने लगा जो अभी भी बिना हिले-ढुले पड़ा था। उसका चेहरा परली तरफ़ ढुलका हुआ था तो दूर से समझ में नहीं आ रहा था लेकिन नज़दीक होने पर वह उसे पहचाना लगने लगा और साथ ही उसकी धड़कनें अनियंत्रित होने लगी। हालांकि वह दुर्गन्ध उसे बुरी तरह बेचैन कर रही थी लेकिन उसमें पैदा दिलचस्पी अब उसे बिना चेहरा देखे बाज़ नहीं रहने देने वाली थी।

पास पहुंचते ही चेहरा पूरी तरह नज़र में आ गया, भले वह उसे एक साइड से देख पा रहा हो, लेकिन पहचान सकता था और इसी बात ने उसकी धड़कनों की रफ्तार और बेतरतीब कर दी, शरीर पसीने से चिपचिपा गया और खुश्क हो गई हलक में कांटे गड़ने लगे। उसने कांपते हाथ से उसका चेहरा पकड़ कर अपनी तरफ किया तो उसके हलक से घुटी-घुटी चीख़ निकल गई। वह सचिन था, जो कि मर चुका था और जो लाश की हालत थी, वह बताती थी कि उसे मरे दो दिन से तो ऊपर ही हो चुके थे और लाश अब फूलने लगी थी।

उसने थर-थर कांपते हुए चेहरा वापस उधर घुमाया जिधर सचिन खड़ा था— लेकिन अब वहां कोई नहीं था… और उसी पल में अंदर की तरफ़ हवा का एक तेज़ झोंका घुसा था जो वापस जब बंद दरवाज़ों और दरारों से निकला तो ऐसी आवाज़ें आईं जैसे कई आत्माएं ज़ोर-ज़ोर से सरगोशियां कर रही हों। वह पसीने से नहा गया और उठ कर भाग जाना चाहता था— लेकिन उसी पल में सर के ऊपर आहट सी महसूस हुई… देखा तो संघनित रूप में स्याह अंधेरा ही उस पर गिरा पड़ रहा था। उसने बचने के लिये हड़बड़ा कर हाथ उठाये जैसे उस अंधेरे को रोक लेना चाहता हो, लेकिन यह संभव न हुआ… भले उस अंधेरे ने उसे कोई भौतिक स्पर्श न दिया, लेकिन वह उस पर हावी होता चला गया और उसके आगोश में समा कर लोकेश के लिये भी अंधेरे के सिवा कुछ बाकी न रहा।लेखक की अन्य किताबें

गॉड्स एग्ज़िस्टेंस

यह किताब मूलतः धर्म, ईश्वर और इस ग्रह पर इंसान के अवतरण को तर्क की कसौटी पर परखने और इस पृथ्वी से बाहर हमारे लिये क्या-क्या संभावनायें हो सकती हैं— इस विषय पर है. इंसान ने पृथ्वी पर किस तरह जीवन शुरू किया, और किस तरह आगे बढ़ते हुये समाज बसाये और किस तरह इंसानों के बीच धर्मों की ज़रुरत महसूस हुई और उसने उन भगवानों, खुदाओं और आस्थाओं को जन्म दिया जो आज के उपलब्ध ज्ञान और तर्क के आगे धराशायी हो जाती हैं।

हम जिस दुनिया को जानते हैं, देखते हैं, वो थ्री डायमेंशनल है और इससे बाहर हम कुछ नहीं समझ सकते जबकि इससे बाहर ढेरों तरह की संभावनायें हो सकती हैं और यह यूनिवर्स सेल्फ मेड है या इसे किसी ने बनाया है— यह जानने का हमारे पास कोई साधन नहीं, लेकिन कई संभावनायें हैं जिन्हें हम टटोल सकते हैं।

और कैसा हो कि अगर यह मान लिया जाये कि वाकई कोई है जिसने एक प्रोग्राम की तरह इसे डिजाइन किया है तो वह तमाम तरह की आस्थाओं से परे विज्ञान और टेक्नॉलोजी के नज़रिये से वह कैसा हो सकता है?
 
जिहादी परिंदे

दया शंकर दूबे आज की पोर्न एडिक्ट पीढ़ी की नुमाइन्दगी करने वाला एक आम शख्स था जिसे अगर सामान्य भाषा में सेक्स बीमार कहा जाये तो गलत नहीं होगा।

क्या आपने आसपास कोई ऐसा किरदार देखा है जो एक तरह से सेक्स बीमार हो। जिसके लिये कोई भी, कैसी भी औरत एक लजीज दोप्याजे गोश्त की हांडी से ज्यादा और कुछ नहीं... औरत का हर अंग जिसमें एक उत्तेजना पैदा करता हो... कंसंट्रेट करते-करते जिसने अपनी कल्पनायें इतनी जीवंत कर ली हों कि वह दुनिया की किसी भी लड़की औरत के साथ एक आभासी संसर्ग में भी वैसा ही मजा पा लेता हो जैसा कोई इंसान हकीकत के संसर्ग में पायेगा।

इस कहानी का किरदार एक ऐसा ही शख्स दया शंकर दूबे है जो लखनऊ का रहने वाला एक आम इंसान है लेकिन जिसकी उन्मुक्त यौनेच्छायें उसे भारत से अमेरिका ले जाती हैं और अमेरिका में दो औरतें उसे ऐसी साजिश के गहरे भंवर में फंसा देती हैं जहां से उसका निकलना लगभग असंभव हो जाता है।

लखनऊ से ले कर अमेरिका और योरप तक उसे वह सारा रोमांच, वह सारा सुख मिलता है, जिसका वह भूखा था, जिसके लिये वह किसी भी हद तक जा सकता था, लेकिन यह सब उस परिणति की कीमत थी जिसकी देहरी पर अंततः उसे पहुंचना पड़ा।

एक छोटी सी नौकरी से उसके नये जीवन का जो सिलसिला शुरू होता है वह पैसे और प्रॉपर्टी के लिये बुनी गयी साजिश को पार करते हुए उसे एक जिहादी नेटवर्क के साथ जोड़ कर अंततः मौत के गहरे कुएं में धकेल कर ही ख़त्म होता है।

हम हर शख्स को नैतिकता के तराजू पर नहीं तौल सकते... कुछ लोगों के लिये इसकी कोई वर्जना नहीं होती, उन्हें वह सब ही आकर्षित करता है जो अनैतिक हो, अतिवाद हो, अपरिमार्जित हो... जो जिंदगी को अपने ही उन्मुक्त अंदाज़ में जीना चाहते हों, जहाँ कोई बंदिश न हो... दया शंकर दूबे एक ऐसा ही शख्स था।
 
गिद्धभोज

'गिद्धभोज' कोई एक कहानी नहीं है, बल्कि पच्चीस कहानियों का संगम है। यह वे कहानियां हैं जो सीधे हमसे जुड़ी हैं, हमारे आसपास मौजूद माहौल से जुड़ी हैं— हमारी परेशानियों, हमारी जड़ विचारधाराओं, हमारे भूत और हमारे भविष्य से जुड़ी हैं। हर कहानी हमें झकझोरती है, एक सीख देती है, यह हम पे निर्भर करता है कि हम इनसे क्या सीख पाते हैं।

'गिद्धभोज' दो सेक्शन में है— पहले सेक्शन में जो कहानियां हैं वे मुख्य हैं, जबकि दूसरे सेक्शन में जो कहानियां हैं यह वे कहानियां हैं जो मैंने कभी न कभी सोशल मीडिया पर लिखी हैं लेकिन आपको इधर-उधर किसी और के नाम से भी नाचती मिल सकती हैं। उन्हें इस संग्रह में इसलिये शामिल किया गया है ताकि उन्हें एक जायज पहचान मिल सके।

मुख्य कहानियों में 'गिद्धभोज' है जो 'अन्नदाता' के भारी भरकम मगर खोखले विशेषण से नवाजे गये एक ऐसे किसान की कहानी है जो भुखमरी के कगार पर है और अपना जीवन खत्म कर लेने पर उतारू है लेकिन किस्मत उसे एक मौका देती है जहां उसे एक मुश्किल चयन करना पड़ता है कि वह एक मसीहा बन जाये या एक साधारण इंसान और वो साधारण इंसान ही बनना मंजूर करता है। 'अपराधबोध' एक ऐसे युवा की कहानी है जो सोशल मीडिया के भ्रामक प्रचार-प्रसार से भ्रमित, दिशाहीन हो कर अपने भविष्य से खिलवाड़ करता एक हत्यारा बन जाता है लेकिन उसका अपराधबोध उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता।

'सुर्खाब' मुस्लिम मआशरे में मौजूद लैंगिक भेदभाव को दर्शाती एक ऐसी कहानी है जहां एक लड़की अपने हक और बराबरी के मौके पाने के लिये लगातार जूझते हुए अपना घर तक छोड़ने पर मजबूर हो जाती है। 'अधूरी आजादी' इसी दौर के उस संघर्ष की कहानी है जहां पश्चिम की अंधाधुंध नकल के चक्कर में सामने दिखती पश्चिमी आजादी और अपने सेक्स प्रतिबंधित भारतीय समाज की वर्जनाओं के द्वंद्व में फंसी युवा पीढ़ी अपनी यौन कुंठाओं को तृप्त करने के पीछे छोटी-छोटी बच्चियों के शिकार से भी गुरेज नहीं कर रही।

'बदकिरदार' चरित्र से जुड़ी आकांक्षाओं और वर्जनाओं को ढोती हर उस औरत की दास्तान है जो अपने हिस्से का शायद एक पल भी अपनी इच्छा से नहीं जी पाती और यह चरित्र आधारित दमन उसे विद्रोह पर उकसा कर अंततः अपने मन की कर लेने पर मजबूर कर देता है। 'दो बूँद पानी' लगातार कम होते पानी के पीछे होने वाले उस संघर्ष की कहानी है जहां एक वक्त ऐसा भी आता है कि पानी की एक बूंद भी बेशकीमती हो जाती है और हम सभी को अंत पंत यह नर्क भोगना ही है। 'गर्म गोश्त का शौकीन' पैसे और पॉवर के गुरूर में सर से पांव तक डूबे उस शख्स की कहानी है जिसके लिये हर जनाना बदन बस एक 'योनि' ही है, इससे इतर कुछ नहीं।

मधुरिमा' पचास साल की एक ऐसी बेवा की कहानी है जिसने अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद अपनी उन अधूरी फैंटेसीज को जी लेना चाहा था, जो उसकी ज़िंदगी को देखते बस एक सपना भर थीं। 'जंगल का आदमी' हर उस मूल मानव की दास्तान है जो अपनी जमीन और जंगल को बचाने के लिये विकास के नाम पर खड़े हुए पूंजीवादी सिस्टम से टकरा रहा है। 'पगली' जाति और धर्म आधारित जड़ आस्थाओं के खिलाफ जाती एक ऐसी प्रेम कथा है जहां रूढ़ियों से जकड़ी मशीनें इंसानी रिश्तों की अहमियत समझने की जगह उसे खत्म कर देने पर उतारू हैं।

'जामुन की छाँव' उस दौर की कथा है जहां बेशुमार बढ़ती आबादी की जरूरतों के मद्देनजर हरियाली की बलि लेते-लेते हम अपने इको सिस्टम को ही वेंटिलेटर पर पहुंचा देते हैं। 'आकर्षण' कलर बायसनेस को ले कर रची एक कथा है जिसमें एक सांवली लड़की इस सामाजिक पूर्वाग्रह को खुद पर झेलते इस तरह बड़ी होती है कि अपनी ख्वाहिशें दर्शाने के लिये भी उसे दूसरों से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। 'खामोश बगावत' संविधान प्रदत्त उस सुविधा का एक ऐसा पहलू है, जिसकी तरफ बहुत कम लोग देखते हैं कि कैसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई खुद उसी विकार से संक्रमित हो रही है।

‘इद्दत एक व्यथा' इस्लामिक मान्यताओं में से एक मान्यता के उस स्याह पहलू को दर्शाती है जहां एक औरत के लिये इम्तिहान ही इम्तिहान हैं तो मर्दों के लिये इसी मरहले पर एक रत्ती आजमाईश नहीं। यह अप्रासंगिक हो चुके रिवाजों को संशोधित करने के लिये की जाने वाली लड़ाई है जो औरत को अकेले लड़नी पड़ती है। 'गुमराह' आज की उस युवा पीढ़ी के लिये एक आइना है जो अपनी आजाद जिंदगी और सुविधाभोगी प्रवृत्ति के चलते, नैतिक अनैतिक की बहस में पड़े बगैर हर कदम उठा लेने पर उतारू है, फिर चाहे वो कदम उसके भविष्य को बर्बाद कर देने वाला हो या उसे मौत के मुंह तक ले जाने वाला हो।

इनफिनिटी:

द साइकिल ऑफ़ सिविलाइजेशन

यह कहानी है ग्रैडिअस नाम के एक ऐसे ग्रह की जो हमारी ही दुनिया के समरूप है, जहाँ वे इंसान हैं जिनकी पहचान कैथियंस के रूप में होती है। वे हमारे जैसे न हो कर भी हमारे ही जैसे हैं। उनकी दुनिया में भी धर्म और विज्ञान का सतत वैचारिक संघर्ष है। उनकी भी ठीक पृथ्वी जैसी ही मत मान्यतायें हैं... कि यह दुनिया, यह यूनिवर्सल सिस्टम किसी बेंडौरह या एलाह जैसी ईश्वरीय शक्ति ने बनाया है और उसने क्रिस्टोफर और एडविना के रूप में दो कैथियंस ग्रैडिअस पर भेजे थे जिनसे समस्त कैथियंस का जन्म हुआ।

लोग उसी ईश्वरीय शक्ति की इच्छानुसार कर्म करने पर मजबूर हैं लेकिन उसने अच्छाई और बुराई चुनने की छूट दे रखी है और उसी आधार पर कयामत के दिन सबका फैसला करके उन्हें हैवियन यानि स्वर्ग का सुख या शुबूगा यानि नर्क की सजा दी जायेगी। उनके बीच भी अलग-अलग धर्म हैं जैसे इस्लाम के समकक्ष फरायम, हिंदुत्व के समकक्ष वेयराइज्म, क्रिशचैनिटी के समकक्ष निब्रसिज्म या बुद्ध, महावीर, मुहम्मद, ईसा, मूसा, इब्राहीम, नूह के समकक्ष वूडो, वांगटी, थास्बट, बबूसा, रूजा, माइल, लूआ जैसे पैगम्बर और एलाह, बैंडोरह जैसे अलग-अलग मान्यताओं में अलग-अलग संबोधन वाला ईश्वर।

उनमें हममें एक फर्क है कि हम अभी विकास से विनाश की ओर अग्रसर अपने अंत तक पहुंचने के सफर में हैं और वे हमसे कई सौ साल आगे उस प्वाइंट तक पहुंच चुके हैं जहाँ उन्होंने तरक्की तो बहुत कर ली है लेकिन ठीक इंसानी तर्ज़ पर विकास और तकनीक की भूख के चलते अपनी खूबसूरत दुनिया को विनाश की कगार पर पहुंचा दिया है और अब ग्रैडिअस पर कैथियंस के सर्वाइवल की कोई कंडीशन नहीं बची और वे किसी नये ठिकाने की तलाश में हैं।

जूनियर जिगोलो

जब सब उम्मीदें खो जायें, जब सारे सपने टूट जायें, जब हर वादा और भरोसा छल साबित हो और हालात यह बन जायें कि हाथ को रोजगार तो क्या दो पैसे कमाने के मौकों में भी अपार संघर्ष करना पड़े, तो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और भ्रामक प्रचार के सहारे बनाये भ्रम देर सवेर टूटते ही हैं और धीरे-धीरे छंटता है वह कुहासा जिसने एक इंसान के अंदर की इंसानियत भी इस हद तक सीमित कर दी थी कि एक दिन खुद से भी शर्मिंदा होना पड़े।

जूनियर जिगोलो एक ऐसे ही वक्त के मारे इंसान की कहानी है जिसकी दुनिया कुछ और थी मगर हकीकत के तूफानी थपेड़ों ने उसे उस जमीन पर ला पटका था जहां खुद या परिवार को खिलाने के लिये दो वक्त का खाना भी तय नहीं था कि मिलेगा या नहीं। ऐसे में खुदकुशी या समझौते के सिवा तीसरा कोई विकल्प नहीं बचता और वह मजबूरन समझौते के विकल्प को चुनता है और एक ऐसी दुनिया में कदम रखता है जहां अब तक औरतों का एकाधिकार समझा जाता था और वह मर्द वेश्याओं के बाजार में उतर कर अपनी पहचान बनाने की कोशिश करता है।

लेकिन यह उतना सहज और सरल नहीं था जितना बाहर से दिखता है। धंधा कोई भी हो, उसके सकारात्मक के साथ नकारात्मक पहलू होते ही हैं और उसे कदम-कदम पर इन संघर्षों से जूझना पड़ता है। आर्थिक मंदी और कोरोना आपदा ने जहां दुनिया के तमामतर लोगों के लिये हालात बेहद मुश्किल किये थे, उन्हें कंगाल कर के दो वक्त के खाने का भी मोहताज कर दिया था और बड़े पैमाने पर लोग खुदकुशी कर रहे थे... वहीं एक वर्ग ऐसा भी था जिसे इस आपदा में लूटने, पैसे बनाने के बहुतेरे मौके मिले थे और उनका जीवन स्तर पहले के मुकाबले बेहतर हो गया था और उन्हीं के बीच जिस्मफरोशी के इस बाजार की गुंजाइश बेतहाशा बढ़ गयी थी।

शारीरिक जरूरतों के मारे सिर्फ मर्द ही नहीं होते बल्कि औरतें भी होती हैं, दोनों की परिस्थितियों में फर्क भी हो सकता है और वे समान भी हो सकती हैं लेकिन यह तय है कि अब अपनी इच्छाओं का दमन कर के वे सक्षम औरतें घुट-घुट कर जीना नहीं चाहतीं और उन्होंने खरीद कर वह खुशी हासिल कर लेने की कला सीख ली है और उनकी जरूरतों के मद्देनजर एक आर्गेनाईज्ड बाजार भी खड़ा हो गया है जहां हर बड़े शहर में स्पा, पार्लर, डिस्कोथेक, क्लब, काॅफी हाऊस जैसी जगहें हो गयीं हैं या सरोजनी नगर, कमला नगर मार्केट, पालिका बाजार, लाजपत नगर, जनकपुरी डिस्ट्रिक्ट सेंटर जैसी कई ओपन मार्केट मौजूद हैं, यहां बाकायदा जिगोलो ट्रेनर, कोऑर्डिनेटर, एंजेसीज और कंपनी तक अपनी हिस्सेदारी के लिये मौजूद हैं और एक तयशुदा कमीशन पर नये-नये लड़के यह काम धड़ल्ले से कर रहे हैं।

इन हालात से गुजरते वह शख्स न सिर्फ एक नई अनजानी दुनिया से दो चार होता है बल्कि धीरे-धीरे उसके पाले वे भ्रम भी दूर होते हैं जो धर्म को सिरमौर रखते उसने बना लिये थे लेकिन यह रास्ते आसान नहीं थे। अपनी आत्मग्लानी और अपराधबोध से जूझता वह अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश करता है तो एक के बाद एक समस्याओं में फंसता चला जाता है जो उसके लिये एक बड़ी लंबी और भयानक रात जैसी साबित होती हैं लेकिन वह हार नहीं मानता और उजाले की देहरी तक पहुंच कर एक नये सूरज का सामना करके ही दम लेता है जहां अपने अंदर का सब मैल निकाल कर अब वह एक बेहतर इंसान बन चुका था जिसका धर्म सिर्फ इंसानियत थी।
 
मिरोव चैप्टर 1

सोचिये कि एक दिन आप नींद से जागते हैं और पाते हैं कि आप उस दुनिया में ही नहीं हैं जो आपने सोने से पहले छोड़ी थी तो आपको क्या महसूस होगा... सन दो हजार बत्तीस की एक दोपहर न्युयार्क के मैनहट्टन में एक सड़क के किनारे पड़ी बेंच पर जागे एडगर वैलेंस के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था।

वह जिस जगह को और जिस दुनिया को देख रहा था वह उसने पहले कभी नहीं देखी थी, जबकि वह अपने आईडी कार्ड के हिसाब से न्युयार्क में रहने वाला एक अमेरिकी था... उसे यह नहीं याद था कि वह अब कौन था लेकिन धीरे-धीरे उसे यह जरूर याद आता है कि वह तो भारत के एक गांव का रहने वाला था और वह भी उस वक्त का जब मुगलिया सल्तनत का दौर था और अकबर का बेटा जहांगीर तख्त नशीन था।

उसे न सामने दिखती चीजों से कोई जान पहचान थी और न ही खुद की योग्यताओं का पता था लेकिन फिर भी सबकुछ उसे ऐसा लगता था जैसे वह हर बात का आदी रहा हो जबकि उसके दौर में तो न यह आधुनिक कपड़े पहनने वाले लोग थे, न गाड़ियां और न उस तरह की इमारतें। उसने कभी तलवार भी न उठाई थी मगर उसका शरीर मार्शल आर्ट का एक्सपर्ट था।

उसके घर में जो लड़की खुद को उसकी बीवी बताती थी, उसे कभी उसने देखा ही नहीं था… उसके लिये एकाएक सबकुछ बदल गया था, उसका देश, उसकी जमीन, उसके लोग और यहां तक कि उसका अपना शरीर और जेंडर भी... फिर कुछ इत्तेफ़ाक़ों के जरिये वर्तमान जीवन का कुछ हिस्सा उसे याद आता भी है तो कई ऐसे लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं जिनका दावा था कि उसने न सिर्फ उनके सिंडीकेट के एक मुखिया को खत्म किया था बल्कि उनके टेन बिलियन डॉलर भी पार किये थे... जबकि वह पूरी तरह श्योर था कि उसने कभी उन लोगों को देखा तक नहीं था।

इतना कम नहीं था कि उसे अपने बीते दौर का एक पेचीदा सवाल और उलझा देता है कि दुनिया भर से लूटा गया कुछ बेशकीमती जवाहरात और कलाकृतियों पर आधारित एक ऐसा खजाना भी उसकी जानकारी में कहीं दफन हुआ था जिसके पीछे न सिर्फ डच, फ्रांसीसी और ब्रिटिश सिपाही और जासूस पड़े थे बल्कि कुछ चीनियों के साथ भी उसी के पीछे उसकी सांठगांठ हुई थी लेकिन जिनके पीछे उसे मौत के मुंह में पहुंचना पड़ा था।

अब उस खजाने का जिक्र तक कहीं नहीं मिलता और न ही इतिहास में ऐसा कोई जिक्र मिलता है कि किसी के हाथ ऐसा कुछ लगा हो... हां— फ्रांस, ब्रिटेन के कुछ दस्तावेजों से इस बात का पता तो चलता है कि ऐसा कोई खजाना उस वक्त जिक्र में था लेकिन उन्होंने उसे बस अफवाह माना था। तो सवाल यह था कि अगर वह किसी के हाथ नहीं लगा तो उसे अभी भी वहीं होना चाहिये जहां उसे छोड़ा गया था... और इत्तेफाक से वह जगह उसे याद थी। उसे उस जगह का वो मालिक भी याद था जो खुद को उस तिलस्म का दरोगा कहता था जहां वह खज़ाना दफ़न था और खुद अपनी उम्र दो सौ साल की बताता था।

लेकिन उसका चार सौ साल बाद जागना और उस दौर की एक अफवाह को सच साबित करना उन सरकारों के भी कान खड़े कर देता है जो उस पर अपना दावा जताते थे और फिर एक लंबी जद्दोजहद शुरू हो जाती है उसे हासिल करने की... लेकिन जहां वह बेशकीमती खजाना मौजूद था, वहां तो अब किसी और की हुकूमत थी और हुकूमत भी ऐसी वैसी नहीं बल्कि ऐसे लोगों की जो खुद दुनिया भर में लूटमार ही करते फिरते थे। साथ ही कई ऐसे सवाल अब वजूद में आ गये थे जो तब उन लोगों की समझ में नहीं आये थे लेकिन अब की आधुनिक दुनिया को देख कर कहा जा सकता था कि वे चीजें और वह जगह उस दौर में होने ही नहीं चाहिये थे लेकिन थे और क्यों थे, इसका कोई भी जवाब वहां किसी के पास नहीं था।
 
मिरोव चैप्टर 2

केविन के रूप में अचानक एक ऐसा आदमी नज़र में आता है जो सौ साल पहले किसी इनक्वायरी पर निकला था, लेकिन ग़ायब हो जाता है और लगभग सौ साल बाद प्रकट होता है, जबकि उसके हिसाब से उसने चार दिन का वक्त ही कहीं गुमशुदगी में गुजारा था... अब ऐसा कैसे था, यह समझने के लिये सेटी (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस) सिंथिया के नेतृत्व में एंशेन्ट एस्ट्रोनॉट थ्योरिस्ट के कुछ लोगों को मिला कर एक मिशन लांच करती है और वे केविन को ले कर एलियन एक्टिविटीज के सबूत खोजने वापस कुमाऊँ की घाटियों में पहुंचते हैं।

एमसाना की डूबी रकम की रिकवरी के लिये एवलिन के बनाये दबाव के रियेक्शन में वह अमेरिकी ताकतवर लॉबी एकदम पलटवार करते एमसाना और मथायस के खिलाफ एक्शन शुरू करवा देती है और एमसाना से एक सीधी जंग शुरू हो जाती है जिसमें जंग का मैदान न्यूयार्क शहर बनता है और इस जंग का खात्मा भी एक ऐसी एंटिटी के दखल से होता है जो इस दुनिया की तो नहीं थी— और जो उन्हें भविष्य के खतरों के प्रति सचेत करने की कोशिश कर रही थी।

बेनवॉ कार्प्स वालों ने एक दूसरे मिरोव फ्रेंको के रूप में अपना खुद का एक एडगर तैयार कर लिया था, जो उन्हें शकराल की घाटी तक पहुंचा सकता था और वे एमसाना से अमेरिकियों की जंग छिड़ने के साथ ही अपनी टीम भारत के लिये रवाना तो कर देते हैं— मगर खुद इस जंग की बड़ी कीमत चुकाते हैं, जबकि एवलिन लाख कोशिश के बावजूद अमेरिकन गवर्नमेंट के हत्थे नहीं आती और एडगर समेत अपनी उस टीम को अमेरिका से निकाल ले जाती है जिसे शकराल पहुंचना था।

करीब चार सौ साल बाद एक ऐसा इवेंट फ्रांस सरकार की नज़र में आता है, जहां वे धरोहरें बेची जा रही थीं जिन्हें चुरा कर कभी शकराल ले जाया गया था और तब से वे दुनिया की नज़रों से छुपी रही थीं... और यह सब सामने आता है एक खरीदार की हत्या से, जिसके बाद वे इंग्लैंड और नीदरलैंड के साथ मिल कर एक संयुक्त मिशन लांच करते हैं जो इन नीलामियों के कर्ता-धर्ता का पता लगायें और उनसे अपनी चीज़ें वापस हासिल करें। इस व्यक्ति के तार भी भारत और नार्थ कुमाऊँ से जुड़ते हैं और उनकी टीम को भारत की यात्रा करनी पड़ती है।

मीडियम में छपे एक आर्टिकल से गंगा, राणा और सारंग के साथ शकराल की सारी स्टोरी दुनिया की नज़र में आ जाती है और तब भारत को भी इसमें दिलचस्पी लेनी पड़ती है, लेकिन उनकी जानकारी के हिसाब से नार्थ कुमाऊँ में न ही शकराल नाम की कोई जगह थी और न ही उनकी जानकारी में सारंग नाम का ऐसा कोई आदमी था, जो सैकड़ों साल जिंदा रहा हो, लेकिन जब उन घाटियों में इतने लोग दिलचस्पी ले रहे थे तो वे पीछे नहीं हट सकते थे और वे भी एक मिशन लांच करते हैं— इन बातों की सच्चाई परखने के लिये।

अब नार्थ उत्तराखंड में वे पांच अलग-अलग पार्टियां पहुंचती हैं और सही डेस्टिनेशन की तलाश में भटकते एक दूसरे से भिड़ती रहती हैं, लेकिन उनके सफ़र का खात्मा जहां होता है, वहां यह दुनिया ही खत्म थी और वहीं से शुरुआत होती है एक ऐसी नई दुनिया की, जो उनकी कल्पनाओं से भी परे थी। जिसके बारे में उन्होंने किसी वैज्ञानिक के मुंह से भी कभी ऐसा कुछ नहीं सुना था और जिसे ठीक से समझने के लिये उन्हें खुद भी ट्रांसफार्म होना पड़ता है।
 
मिरोव चैप्टर 3

वे सारे एक अलग यूनिवर्स में पहुंच तो गये थे लेकिन यह दुनिया उनकी देखी, जानी, समझी दुनिया से बिलकुल उलट थी, जो उनकी कल्पना से भी परे थी और चूंकि उनके दिमागों के लिये वह सब ऐसी नई चीज़ें थीं, जो उनके दिमागों की प्रोसेसिंग क्षमताओं से बाहर थीं तो वे उन चीज़ों को जाने-पहचाने खाके में फिट कर के देखते थे— जबकि हकीक़त में वे कुछ और होती थीं, जिसे वे ठीक से समझ ही नहीं सकते थे और इस वजह से भी वे कई बार ज़बर्दस्त धोखा खाते हैं। सच यह था कि उनका दिमाग़ उन्हें जो भी दिखा रहा होता था, वह जितना सच होता था— उतना ही काल्पनिक भी होता था।

उस यूनिवर्स में कोई स्पेस नहीं था, मगर असीम दूरियां ज्यों की त्यों थीं और उन्हें उनके अपने यूनिवर्स की तरह इन दूरियों को तय करने के लिये वैसे साधनों की ज़रूरत नहीं थी, जो वह जानते थे बल्कि वहां तो पृथ्वी वासियों के हिसाब से पलक झपकते ही वे दूरियों को तय कर लेते थे। उस पूरे यूनिवर्स में अलग-अलग पॉकेट बने हुए थे और लगभग हर पॉकेट में कोई न कोई प्रजाति अपना वर्चस्व कायम किये थी लेकिन पस्कियन, ग्रेवोर्स और स्कैंडीज के रूप में वहां तीन प्रजातियां ऐसी भी थीं, जो कुल मिला कर आधे से ज्यादा यूनिवर्स को कब्ज़ाये थीं और आपस में एक दूसरे की कट्टर प्रतिद्वंद्वी थीं।

उन सबके बीच एक छोटे पॉकेट में एक ऐसी प्रजाति एड्रियूसिनॉस भी थी, जो वैज्ञानिक तौर पर सबसे ज्यादा तरक्कीशुदा थी। वे बाकियों से बहुत आगे का ज्ञान रखते थे... उन्हें अपने उस यूनिवर्स में खामी लगती थी और वे इस डिजाइन को और बेहतर करना चाहते थे। इस सिलसिले में उन्होंने सालों के जतन से एक ऐसा कॉस्मिक इंजन तैयार किया था जो उनके यूनिवर्स को रीडिजाइन कर सकता था, लेकिन परीक्षण के दौरान पता चलता है कि वह शैडो यूनिवर्स को कोलैप्स कर सकता था। इसी एक्सपेरिमेंट की वजह से उस शैडो यूनिवर्स में तीस करोड़ लाईट ईयर्स में फैला ‘द बूटीस वायड’ बना था।

यह जान कर वे इस त्रुटि को दूर करने में जुट जाते हैं, लेकिन इस एक्सपेरिमेंट की वजह से इस कॉस्मिक इंजन की ख़बर पस्कियन, ग्रेवोर्स और स्कैंडीज को भी हो जाती है और वे पहले तो यूनिवर्स को रीडिजाइन करने के ही खिलाफ थे, फिर यह होता भी तो वे इसे अपने हिसाब से डिजाइन करना चाहते थे... इसी बिना पर तीनों आपसी प्रतिद्वंदिता भुला कर एक साथ एड्रियूसिनॉस पर हमला कर देते हैं। उनके बीच उनके अपने यूनिवर्स के इतिहास का सबसे भयानक युद्ध होता है, जहां वैज्ञानिक तरक्की में सबसे आगे होने के बावजूद भी वे तीनों प्रतिद्वंद्वियों की संयुक्त ताक़त के आगे हार जाते हैं और उन्हें पूरी तरह तबाह कर दिया जाता है।

लेकिन अपनी निश्चित हार देख कर वे उस कॉस्मिक इंजन को चार हिस्सों में तोड़ देते हैं, ताकि वह असेंबल हो कर ही एक्टिव हो सके और उन चार हिस्सों को अपने यूनिवर्स के चार बीहड़ और सबसे ख़तरनाक इलाकों में छुपा देते हैं... तब उन्हें उम्मीद होती है कि एक दिन वे फिर संवरेंगे, वापसी करेंगे और रीयूनाइट हो कर दुबारा अपने अधूरे काम को पूरा करेंगे। उन्हें तबाह कर चुकने के बाद पस्कियन, ग्रेवोर्स और स्कैंडीज उन पार्ट्स की तलाश में निकलते हैं और एक-एक पार्ट हासिल करने में कामयाब रहते हैं— लेकिन इस तरह वह किसी एक के काम का नहीं था और तीनों कभी एक मंच पर आना नहीं चाहते थे इस मकसद के लिये कि किसी तरह उस चौथे पार्ट को भी हासिल किया जाये और किसी एक के हिसाब से यूनिवर्स को रीडिजाइन किया जाये।

एक लंबी शांति के बाद वे इन पार्ट्स को एक दूसरे से हासिल करने की कोशिश शुरू करते हैं, जिनमें स्कैंडीज और ग्रेवोर्स का लक्ष्य तो अपने हिसाब से यूनिवर्स को डिजाइन करना था, जबकि पस्कियन इसलिये उस कॉस्मिक इंजन को हासिल करना चाहते थे क्योंकि वे यूनिवर्स में कोई बदलाव नहीं चाहते थे और इसकी वजह से इंसानों वाला यूनिवर्स भी कोलैप्स हो जाता जो उन्हें मंजूर नहीं था... तो वे उन इंसानों की मदद इसीलिये चाहते थे कि वे उस यूनिवर्स में अनएक्सपेक्टेड और अनकनेक्टेड जीव थे जो उन बाकी पार्ट्स को हासिल करने में कारगर साबित हो सकते थे।

लेकिन जब आँखों का देखा सबकुछ सच नहीं था और दिमाग़ काफी कुछ अपनी तरफ से गढ़ा व्यू उन्हें दिखाता था— तो क्या गारंटी थी कि उनके कान जो कुछ सुन रहे थे और दिमाग़ जो समझ पा रहा था, वह उतना ही रियल था जितना उन्हें लग रहा था। उसमें भी तो काफी कुछ भ्रम और छलावा साबित होने की गुंजाइश थी... और अंत-पंत सच भी यही तो साबित हुआ था।
 
सर्वाइवर्स ऑफ़ अर्थ

कहानी है उस दौर की जब हम इंसानों ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते-करते उसे प्रतिक्रिया देने, पलटवार करने पर मजबूर कर दिया था और प्रकृति जब अपनी पर आती है तो इंसान जैसी ताकतवर प्रजाति का भी उसके सामने कुछ भी नहीं।

कहानी के केंद्र में चार लोग हैं जो दुनिया के चार अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। एक राजस्थान भारत का रहने वाला विनोद है— जो अपने आप से संघर्ष कर रहा है। उसे डिग्री हासिल करने के बाद जिंदगी की हकीकत से सामना करने के बाद अब अफसोस है कि उसने अपनी ऊर्जा अन्न हासिल करने के पीछे क्यों न लगाई, बजाय ज्ञान हासिल करने के… और वह पश्चाताप करने के लिये मां और बहनों के जिस्मों से गुजर कर उसके पेट तक पहुंचते अन्न को त्याग कर चल देता है जिंदगी के संघर्षों का सामना करने।

दूसरी ऑकलैंड न्यूजीलैण्ड में पैदा होने वाली एमिली है— जिसे न सिर्फ दूसरे कहते हैं बल्कि खुद उसने भी स्वीकार कर रखा है कि वह मन्हूस है। उसकी ईश्वर में कोई आस्था नहीं थी और न ही वह किस्मत को मानती थी लेकिन कभी इस पहेली को सुलझा नहीं पाई थी कि क्यों कोई अदृश्य शक्ति जैसे लगातार उस पर नजर रखती है और उसके बनते काम भी बिगाड़ देती है। वह इतनी मन्हूस थी कि मरने की कोशिशों में भी इस तरह नाकाम हुई थी कि जिंदगी में सजा के तौर पर उसका खामियाजा भुगतना पड़ा था। कभी अमीर कारोबारी रहा पिता उसकी वजह से होने वाले नुकसानों की भरपाई करते-करते कंगाली की कगार पे पहुंच गया था तो उसने एमिली को घर से ही निकाल दिया था और अब वह आस्ट्रेलिया और आसपास के छोटे-छोटे देशों में रोजी रोटी के पीछे भटकती फिर रही थी लेकिन बुरे इत्तेफाक कहीं भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे।

तीसरा है माली में रहने वाला सावो— जो कभी नाईजर नदी के किनारे बसे एक खुशहाल कबीले में रहा करता था लेकिन बदलते मौसम ने उसे ऐसे ठिकाने लगाया था कि अब उसके लिये दाने-दाने के पीछे संघर्ष था और जो थोड़ा बहुत उसे मिल भी रहा था, उसकी जड़ में उसकी बहन थी, जिसके लिये उसने मान लिया था कि बहन पेट से बड़ी नहीं हो सकती। वह उस जमीन पर था जहाँ कोई फसल नहीं थी और जो आयतित खाद्यान्न पर निर्भर था लेकिन बदलते मौसम ने पूरी दुनिया में ऐसी तबाही फैला रखी थी कि खाद्यान्न उत्पादक देश भी अब बेबस हो गये थे और नतीजे में वे देश जो आयतित खाद्यान्न पर निर्भर थे, एक-एक दाने के लिये खूनी संघर्ष कर रहे थे। सावो भी बहन और अमेरिकी बेस के सहारे जो कुछ पा रहा था, वह इसी संघर्ष के हत्थे चढ़ जाता है और उसे फिर चल देना पड़ता है किसी नयी जमीन की तरफ।

चौथा कैरेक्टर है इजाबेल— जो कैनेडा की रहने वाली है और जहाँ एक तरफ तीन चौथाई दुनिया संघर्षों में फंसी थी, वहीं वह उन चंद लोगों में थी जिनके लिये इस बर्बादी में भी बेहतरी थी। इजाबेल हद दर्जे की कन्फ्यूज्ड कैरेक्टर है जो लड़कों की जिंदगी भी जीना चाहती है लेकिन अपने स्त्रीत्व से भी मुक्त नहीं होना चाहती और अंततः एक दोहरी जिंदगी जीती है। जहाँ निजी पलों में वह एक लड़की होती है, वहीं बाहरी दुनिया में वह एक लड़का होती है। उसके लिये अगर कोई चीज बुरी थी तो वह था मौसम… कनाडा ऊपरी ग्लोब पर होने की वजह से बेशुमार चक्रवाती तूफानों की चपेट में रहता है और बढ़ता समुद्री जलस्तर जहाँ बाकी दुनिया के तटीय शहरों को निगल रहा था— वहीं उसके शहर को भी उसने आधा कर दिया था और एक चक्रवाती तूफान के साथ जिस दिन पूरी तरह गर्क कर देने पर उतारू था। वह शहर छोड़ कर चल तो देती है लेकिन बदनसीबी ऐसी कि कुछ ऐसे लोगों के चक्कर में फंस जाती है जो मानव अंगों के व्यापारी थे।

चारों अपने-अपने सफर में हैं कि तभी प्रकृति अपना तांडव शुरू करती है और नव निर्माण से पूर्व के विध्वंस का सिलसिला शुरू हो जाता है। वह विध्वंस जो जमीनों को उखाड़ देता है, पहाड़ों को तोड़ देता है और समुद्रों को उबाल देता है। कुदरत हर निर्माण को ध्वस्त कर देती है और पृथ्वी एक प्रलय को आत्मसात कर के जैसे अपनी पिछली केंचुली को उतार कर एक नये रूप का वरण करती है।

यह चारों किरदार किस तरह मौत से लगातार जूझते और संघर्ष करते इंसानी जींस को इस कयामत से गुजार कर अगले दौर में ले जाते हैं और नयी पीढ़ी की बुनियाद रखते हैं… यह जानने के लिये आपको इस कहानी के साथ जीना पड़ेगा।
 
जिस हिसाब से दुनिया में बेतहाशा भीड़ बढ़ रही है... कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है... लोग प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध उपभोग करके उन्हें खत्म कर रहे हैं... और लगातार अपने लिये स्पेस बढ़ाते हुए बाकी सभी क्रीचर्स के लिये जगह और मौके सीमित करते जा रहे हैं, जिनसे हमारा इको सिस्टम प्रभावित हो सकता है... तो ऐसे में एक दिन कुदरत भी कोई मौका निकाल कर बदला लेने पर उतर आये तो?

अपने देश को देखिये... देश के लोगों को देखिये... क्या इन्हें एक नागरिक के तौर पर अपनी भूमिका की समझ है? क्या एक इंसान के तौर पर अपनी प्राथमिकताओं का पता है इन्हें? आपको व्यवस्था वैसी ही मिलती है जैसे आप होते हैं और अगर आप खुद ही समझदार और जागरूक नहीं हैं— तो यह तय है कि आपको सिस्टम भी वैसा ही लापरवाह मिलेगा।

ऐसी हालत में कोई डेडली वायरस इनवेशन हो तो? फिर वह वायरस नेचुरल हो या बायोवेपन... उससे ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था उस अटैक को संभाल पायेगी? क्या हमारे द्वारा चुनी गयी सरकारों ने हमें वह सिस्टम दिया है जो किसी मेडिकल इमर्जेंसी को संभाल सके? शायद नहीं... कल्पना कीजिये कि ऐसे ही किसी विश्वव्यापी वायरस संक्रमण के सामने हमारी व्यवस्था कैसी लचर साबित होगी और करोड़ों लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त होंगे।

सीआरएन फोर्टी फाईव ऐसे ही एक विश्वव्यापी संक्रमण की कहानी है— जिसका शिकार हो कर दुनिया की तीन चौथाई आबादी खत्म हो गयी थी और गिने-चुने विकसित देशों को छोड़ कर सभी देशों की व्यवस्थायें इस त्रासदी के आगे दम तोड़ गयी थीं और त्रासदी से उबरने के बाद भी सभी सिस्टम कोलैप्स हो जाने की वजह से ऐसी अराजकता फैली थी कि लाखों सर्वाइव करने वाले लोग फिर भी मारे गये थे... और बचे खुचे लोगों में करोड़ों की भीड़ तो वह थी जो इस संक्रमण का शिकार हो कर अपनी मेमोरी पूरी तरह खो चुकी थी और ताजे पैदा हुए बच्चे जैसी हो गयी थी।

यह वह मौका था जिसने उन सभी दबंग, बाहुबली और ताकतवर लोगों के लिये संभावनाओं के द्वार खोल दिये थे जो इस त्रासदी के बाद भी अपनी ताकत सहेजे रखने में कामयाब रहे थे। उन्होंने व्यवस्थाओं को अपने हाथ में लेकर उनकी सूरत बदल दी... देशों के बजाय ढेरों टैरेट्रीज खड़ी हो गयीं और उन्होंने बची खुची आबादियों को नियंत्रित कर लिया।

लेकिन क्या यह व्यवस्थायें भी हमेशा कायम रह सकती थीं... एक न एक दिन तो कहीं न कहीं बगावत का बिगुल फूंका जाना तय था और यह कहानी एक ऐसी ही बगावत की है, जो दुनिया को वापस पहले जैसा बना देने की कूवत तो रखती है... लेकिन सभी पिछली गलतियों से सबक लेकर एकदम नये रूप में... उस रूप में जो प्रकृति के साथ संतुलन बना कर चल सके और बाकी सभी क्रीचर्स के सह-अस्तित्व को पूरा सम्मान देते हुए उन्हें उनके हिस्से का स्पेस और मौके उपलब्ध करा सके और एक नया एडवांस डेमोक्रेटिक सिस्टम स्थापित कर सके।
 
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