• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror आसुरी शक्तियां

"मैं जिस कंपनी में काम करता हूं, वह इधर एक रिसार्ट बना रही है— उसी की तैयारियों के सिलसिले में आया हूं तो फिलहाल कुछ महीने इधर ही रहना है। अभी अकेला ही हूं लेकिन आगे और भी लोग आयेंगे। बात क्या है?" जानते-बूझते भी और ज्यादा समझने की गरज से उसने पूछा।

"वह जगह ठीक नहीं साहब— रात को मेंशन के अंदर जाने कौन-कौन सी भूतिया हरकतें होती हैं। कोई नहीं जान पाया, बस इतना ही पता है कि अगर कोई रात को अंदर रुक गया तो या सुबह मरा बरामद होगा या ऐसा।" कहने वाले ने सामने खाली कुल्हड़ से चाय सुड़कते पागल की तरफ इशारा किया।

"यह रोज़वेल मेशन में रात को रुका था?" राज ने हैरानी से उस पागल को देखा।

"जी— वर्ना यह भी आपकी ही तरह पढ़ा-लिखा शहरी बंदा था जो आपकी ही तरह किसी काम से इधर आया था। मेंशन की तरफ जाते वक्त यह भी यहां चाय पीने रुका था— मैंने मना किया था कि अगर वहां ठहरना ही है तो रात को अंदर के बजाय बाहर ठहरना, लेकिन बाबू पढ़ा-लिखा था, भूत-प्रेत, आत्मा, चुड़ैल वगैरह पर यकीन नहीं करता था तो रात अंदर ही रुका। फिर अगले दिन इसी हालत में बरामद हुआ था।" चाय वाले ने बताया।

"अगर इतनी ही प्राब्लम है उस जगह में, तो उसे बंद क्यों नहीं कर देता प्रशासन?" राज की भवें सिकुड़ीं।

"प्रशासन को क्या पड़ी है साहब... ठाकुर साहब चाहें तो बंद कर सकते हैं लेकिन उन्हें भी क्या पड़ी है। लोग आ के रुकते हैं तो इस बहाने उसकी कदर भी होती रहती है, वर्ना तो अब तक उनकी प्रापर्टी खंडहर बन चुकी होती।" साथ बैठे युवक ने बताया।

"कौन ठाकुर साहब?"

"जिनके पुरखों की छोड़ी वह जगह है... पहले कभी पिकनिक, या शिकार या मेहमानों के मनोरंजन के लिये आते रहते थे लेकिन फिर दसियों साल के लिये वह जगह वीरान पड़ी रही, जिस दौरान मौजूदा ठाकुर साहब विलायत में रहते थे। फिर जब वह यहां आ के बसे और इस प्रापर्टी की सुध ली, तब तक वहां जाने कौन सी असुरी शक्तियों का वास हो चुका था कि फिर वहां हादसे होने लगे और मशहूर हो गया कि वह जगह आसेबी है।"

"जब मशहूर ही हो गया तो लोग क्यों रुकते हैं वहां?"

"जगह बड़ी अच्छी है साहब... उधर ऊंचाई के आखिर में थोड़ी मैदानी जगह है, जिसे बाग की तरह संवारा गया है। वहीं एक झील है जिसका हुस्न अलग ही है। फिर वहां जो भी ख़तरा है, वह रात को मेंशन के अंदर रुकने पर है। दिन में कैसा भी कोई ख़तरा नहीं और रात के लिये ठाकुर साहब की तरफ से ही दो बड़े कैम्प लगा रखे गये हैं जहां रात गुजारी जा सकती है। तो क्या है न साहब आउटिंग और एडवेंचर के शौकीन लड़के-लड़कियों के ग्रुप आते रहते हैं। शूटिंग वाले भी आते हैं तो ऐसी मुर्दा जगह भी नहीं है। इसका इंतज़ाम एक खेम सिंह नाम के आदमी के हाथ रहता है जो मेंशन का केयर-टेकर है। लोग चाहते हैं तो घरेलू कामकाज के लिये नौकर-नौकरानी का भी इंतज़ाम कर देता है लेकिन वे रात को उधर नहीं रुकते।"

"क्या इसने कभी कुछ नहीं बताया कि रात को मेंशन में इसने क्या झेला था?" कहते हुए राज ने गर्दन से उस पागल की तरफ इशारा किया।

"होश में आये तब न बताये— बस दिखता होश में है, लेकिन होता नहीं।" कहने वाले ने तरस खाने वाले भाव से कहा।

एक पल को उसके दिमाग़ में आया था कि वह उस पागल से बात करे लेकिन उसकी आंखों से होशमंदी के आसार न नज़र आते थे तो टाल दिया। चाय पी कर उसने खाली कुल्हड़ वहीं रखे गंदे से डस्टबिन रूपी कनस्तर में डाला और उठ खड़ा हुआ।

"एक सिग्रेट दे दो चाचा और पैसे बताओ।" उसने चाय वाले से सम्बोधित होते हुए कहा।

जो ब्रांड वह पीता था, वह यहां मिलना नहीं था तो जो भी उपलब्ध था, उसी से काम चला लेना था। सिग्रेट लेकर उसने वहीं खड़े-खड़े सुलगाई और एक कश लेते हुए वॉलेट निकाल कर पैसे देने लगा।

"वहां रुक ही रहे हैं तो रात अंदर मत गुजारियेगा साहब।" चाय वाले ने चेतावनी भरे अंदाज़ में कहा।

उसने सहमति में सर हिला दिया— हालांकि अभी इस बारे में उसने कोई निर्णय लिया नहीं था।

पैसे दे कर उसने बैकपैक पीठ पर लादा और बैग उठा कर उस राह चल पड़ा, जिधर वह रोज़वेल मेंशन था। वक्त पांच के आसपास ही हुआ था लेकिन शाम के घिरने के आसार नज़र आने लगे थे। वैसे भी पहाड़ों में शामें जल्दी घिरती हैं— एक फ़िक्र यही थी कि अंधेरे के पांव पसारने से पहले वह मेंशन तक पहुंच जाये।

वैसे पर्यटन के नज़रिये से फलती जगहों पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में कुछ न कुछ साधन मौजूद रहते हैं, लेकिन इत्तेफाक था कि उसके लिये कोई इंतज़ाम न हो सका था और वह आधे घंटे की पद यात्रा करके इस तिराहे तक पहुंचा था और पता नहीं अब मेंशन तक पहुंचने में कितने क़दम जमीन और नापनी पड़ेगी। जिस पगडंडी पर चल रहा था, वह कच्ची होते हुए भी इतनी चौड़ी तो थी कि दो छोटी गाड़ियां क्रास हो सकतीं और उसके दोनों तरफ पेड़ लगे थे जिनकी घनेरी छांव में शाम थोड़ा पहले ही गहरा जाती थी।

चलते-चलते बीस मिनट बाद उसे उस जगह के दर्शन हुए जिसे रोज़वेल मेंशन के नाम से जाना जाता था।

आसपास एक करीने से संवारा गया ख़ूबसूरत बाग़ था जिसमें कई तरह के पेड़ थे, जानवरों की आकृति में तराशी गई झाड़ियां थीं, आवारा जानवरों से बचाने लायक इंतज़ाम के साथ फूलदार पौधे और झाड़ थे, बीच-बीच में छोटी-छोटी नहर टाईप नालियों से अटैच कई छोटे पूल दिख रहे थे। हालांकि फव्वारे भी थे लेकिन बंद पड़े थे और इस बाग के पार एक पुराने जमाने की बनी इमारत दिख रही थी, जिसे रंग-रोगन के सहारे नया बनाये रखने की कोशिश की गई थी लेकिन शैली से उसके पुराने होने का पता चल रहा था... और इस पूरे इलाके को एक कंटीली बाड़ वाली चारदीवारी से घेरा गया था।

मेंशन के अगले हिस्से में ही दो सफेद रंग की बड़ी सी छोलदारियां दिख रही थीं और उन्हीं के पास खड़ा एक शख़्स दिख रहा था, जो जैसे उसी का इंतज़ार कर रहा था।

पास पहुंचने पर वह ज्यादा कायदे से दिखा— दरम्याने कद और इकहरे शरीर वाला साधारण शक्ल-सूरत का आम सा पहाड़ी व्यक्ति था जिसने गर्म पजामे और शर्ट के रूप में कपड़े भी साधारण ही पहन रखे थे... यह मेंशन का वही केयरटेकर खेम सिंह था।

"क्या साहब— इतनी देर लगा दी। मैं निकलने ही वाला था।" वह राज के नज़दीक पहुंचते ही शिकायत भरे स्वर में बोला।

"कोई सवारी ही न मिली जो जल्दी ले आती... क्या करता भई? घंटे भर से ऊपर हो गया पैदल चलते।" राज ने मुंह बनाते हुए कहा।

"खैर, अब आ गये हैं तो मैं चलता हूं साहब... यहां बैठने लेटने का सब इंतज़ाम बाहर ही मौजूद है। मुझे लगा था कि आपको खाने की ज़रूरत होगी तो अंदर किचन में बना के रख दिया है। यह रही चाबी... यह मेन चाबी है, अंदर चार बेडरूम हैं और सभी के लिये यह एक मास्टर-की है। आप चाहें तो नहा-धो कर फ्रेश हो लीजिये— पानी गर्म किया था जो शायद अब तक आधा ठंडा हो चुका हो। फिर खा-पी कर बाहर आ जाइयेगा। यहां इस कैम्प में आपके सोने का इंतज़ाम कर दिया है। किसी नौकर की ज़रूरत हो तो बता दीजिये, कल अरेंज कर देंगे और स्टे के हिसाब से जो राशन लगे, बता दीजियेगा तो कल ला देंगे।" खेम सिंह ने मशीनी भाव से जैसे रटे-रटाये शब्द दोहराये।

"वैसे यहां ही क्यों सोना है— अंदर क्यों नहीं सो सकता?" राज ने उसकी आँखों में झांका।

"आपको पता नहीं?" उसकी आंखों में आश्चर्य उतर आया।

"क्या?" राज ने भंवें उचकाईं।

"मम-मेरा मतलब है कि जो रोज़वेल मेंशन को लेकर बातें होती हैं। मुझे सच में नहीं पता कि वाकई ऐसा कुछ है या नहीं पर अगर बात डर या ख़तरे की है तो रिस्क क्यों उठाया जाये? इसीलिये ठाकुर साहब ने बाहर यह इंतज़ाम करवा रखा है... यहां कोई ख़तरा नहीं है किसी भी तरह का। आप आराम से सोइये रात को। मेंशन के अंदर भी रात गहराने तक तो कोई ख़तरा नहीं है... आप आराम से खा-पी कर बाहर सोने आ सकते हैं।" खेम सिंह ने कुछ अटकते और कुछ निगाहें चुराते बताया।

"और रात गहराने के बाद क्या ख़तरा है?" राज ने उसे घूरा।

"वव-वह... लोग अफवाहें उड़ाते हैं कि यहां असुरी शक्तियां वास करती हैं जो रात होने के साथ जाग जाती हैं— ऐसे में अंदर रुकना ठीक नहीं।" उसने थूक गटकने के साथ बताया।

"अफवाह ही हैं न... सच्चाई तो नहीं है। फिर क्यों डरना— मैं तो अंदर ही सोऊंगा।" राज ने लापरवाही से कहा।

"क्या फायदा रिस्क लेने का साहब— बेवजह डर की वजह से नींद ही खराब हो सकती है।" उसके चेहरे पर भय की रेखायें फैल गईं।

"देखा जायेगा।" राज ने कंधे उचकाये।

"आप अकेले ही हैं— मुझे तो बताया गया था कि कई लोग आने वाले हैं।" उसने फिर अटकते हुए पूछा।

"हां, लेकिन फिलहाल तो मैं अकेला ही आया हूं।"

"तो मैं जाऊं साहब।"

"हां जाओ... सुबह टाईम पर आ जाना, मुझे ज़रूरत पड़ेगी कई चीज़ों की।"

"ठीक है— लेकिन एक रिक्वेस्ट है साहब। बाहर ही सोइयेगा... हमें सच में नहीं पता कि रात में मेंशन के अंदर क्या होता है लेकिन कुछ रात अंदर गुज़ारने की जिद पर अड़े लोगों के साथ हादसे हो चुके हैं तो आपको मना कर रहा हूं कि आप बेजा ज़िद न पालें।" उसने जाते-जाते मुड़ कर दबे स्वर में कहा।

"ठीक है यार— अब जाओ भी।" राज ने उक्ताये भाव से कहा और इमारत की तरफ बढ़ लिया।

कुछ पल खेम सिंह वहीं खड़ा चिंतित दृष्टि से उसकी पीठ देखता रहा, फिर अफसोस में सर हिलाते वापस मुड़ गया।
 
राज इमारत के मुख्य दरवाज़े को खोल कर अंदर आ गया।

अभी बाहर सूरज भले किसी पहाड़ के पीछे पर्दा कर गया हो मगर देखने लायक पर्याप्त रोशनी थी तो उसने सामान एक तरफ़ डालते इधर-उधर दिखते स्विच बोर्ड पर उंगलियां चलाते बत्तियां जला ली थीं कि अंधेरा गहराये भी तो माहौल में फ़र्क न पड़े। फिर अंदर के बैठके, हॉल से गुज़र कर पीछे आ गया।

बाहर अभी देखने लायक रोशनी थी तो देख सकता था कि मेंशन के फ्रंट की तरफ़ भले काफ़ी चौड़ाई में संवरा हुआ बाग़ हो, लेकिन दायें-बायें भी उसी का सिलसिला था, जिसकी चौड़ाई कम थी और वह पीछे घसियाले मैदान की तरफ़ ख़त्म हो रहा था, जहां दो तो बड़े आखरोट के पेड़ थे और कुछ ढलान उतर के एक प्यालेनुमा झील थी जिसमें एकदम साफ़ पानी भरा हुआ था। उसके एक सिरे पर कुछ फूल भी खिले दिख रहे थे तो बीच में कुछ बत्तखें भी तैरती दिख रही थीं। फिर दूर एक हरियाले पहाड़ की उतरती ढलान दिख रही थी और भले वहां से दिख न रही हो पर अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि इस जगह और उस पहाड़ के बीच खाई होनी चाहिये थी।

इसमें कोई शक नहीं कि काफी मनमोहक जगह थी और आउटिंग के परपज से किसी को भी पसंद आने वाली जगह थी और शायद यही वजह थी कि भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक बातों के फैलने के बावजूद इस जगह का क्रेज बना हुआ था।

●●

नहा कर, किचन में मौजूद खाना खा कर और पूरी तरह दिन की गतिविधियों से निपट कर वह वहीं एक बेडरूम में आ लेटा था।

रोज़वेल मेंशन में क़दम रखे उसे तीन घंटे हो चुके थे लेकिन इस बीच एक अकेला क्षण भी ऐसा नहीं गुज़रा था कि उसे यह लगा होता कि यहां रुकना ठीक नहीं। सबकुछ सामान्य ही था। मेंशन की बाहरी बनावट भले पुरातन कालीन थी लेकिन अंदर से उसे नये ज़माने की तर्ज पर काफी संवारा गया था और नये डिजाइन के फर्नीचर, सजावट और पेंट वगैरह से बिलकुल नहीं कहा जा सकता था कि वह भवन सौ साल से ज्यादा पुराना था।

दो बेडरूम नीचे थे और दो ऊपर थे, बाकी ड्राइंग रूम, डायनिंग रूम, हॉल, स्टोर वगैरह थे लेकिन वह ऊपर नहीं गया था। अब पिछले एक घंटे से बेड पर लेटा फोन पर यामिनी के साथ व्हाट्सअप पर अटक-अटक के चलते नेट के साथ बात कर रहा था। नेटवर्क टूटने की वजह से वायस कॉलिंग की दो कोशिशें नाकाम रही थीं तो बातचीत के लिये यही तरीका बचता था। यह भी था कि खाना एक चोट रह जाये लेकिन बातचीत नहीं रहनी चाहिये क्योंकि बिना बात किये तो न उधर उसे नींद आनी थी और न इधर राज को।

वह कोई जिद्दी स्वभाव का नहीं था कि ज़बर्दस्ती का नायकवाद दिखाने के चक्कर में पड़ जाये कि सबने मना किया है रात को अंदर रुकने से, तो वह ज़रूर ही अंदर रुकेगा— अंदर घुसते वक्त दिमाग़ में यही था कि नहा धो कर, खा पी कर, फाईनली वह रात बाहर कैम्प में ही गुज़ारेगा।
 
ऐसा नहीं था कि इसके पीछे किसी भूत-प्रेत जैसे कारण को वह तवज्जो दे रहा हो, बल्कि ख़ुद को किसी उलझन में न फंसाने की इच्छा ही मुख्य वजह थी, क्योंकि वैज्ञानिक सोच का होने के चलते ऐसी बकवास पर तो कभी कान उसने दिये न थे, बस यही था कि अक्सर लोग अपनी ग़ैरकानूनी गतिविधियों को परवान चढ़ाने और सबकी नज़र से बचाने के लिये इन सब चीज़ों का इस्तेमाल करते हैं... तो अगर रोज़वेल मेंशन में भी ऐसा ही कुछ हो रहा था तो कम से कम वह उन तमाशों में इनवॉल्व होने से ख़ुद को बचा सके।

पर यहां इतने वक़्त में चलते-फिरते उसे ऐसा कुछ लगा नहीं कि कुछ छुपे हुए लोग यह षटराग फैला कर इस जगह का कोई ग़ैरकानूनी इस्तेमाल कर रहे हो सकते हैं— तो उसकी यह झिझक भी निकल गई थी कि वह यहां नहीं सो सकता। आखिरी बात दिमाग़ में यही थी कि यामिनी से बात करते जब नींद का अहसास होने लगेगा तो बाहर जा कर कैम्प में सो जायेगा। यह बिस्तर पर पड़े-पड़े शरीर में पैदा हुई एक तरह की काहिली ही तो थी, वर्ना जो वह फोन पर लिख-लिख के बातें कर रहा था, वह बातें तो बाहर कैम्प में लेट कर भी हो सकती थीं।

यूं ही बात करते-करते ग्यारह बज गये और शाम को पदयात्रा के कारण शरीर में आई थकन दिमाग़ को नींद की तरफ ठेलने लगी। उसने फाईनली यामिनी को 'बाय' कहा और फोन उंगलियों से फिसल जाने दिया।

मन में आया कि उठ कर सोने के लिये बाहर चला जाये, लेकिन नींद का गलबा ऐसा था कि वैसे ही शिथिल पड़े-पड़े, 'अभी उठता हूं' सोचते हुए भी होशमंदी का झरोखा बंद हो गया और दिमाग़ सीधे नींद की शरण में पहुंच गया।

कब तक नींद की कैफियत में रहा— यह अंदाज़ा होना मुश्किल था, लेकिन फिर कुछ आवाज़ों ने नींद में ऐसा खलल डाला कि नींद की वादी में निर्बाध चलते खुशनुमा ख्वाब में एक डिस्टर्बेंस पैदा हो गया, जिसने अंततः उसके दिमाग़ को नींद की वादी से बाहर खींच लिया।

दिमाग़ धीरे-धीरे उन आवाज़ों पर एकाग्र हुआ तो मानस-पटल पर चलते दृश्य सिमटते चले गये और एक अंधेरा उसकी जगह लेता गया, जहां कुछ आवाज़ें उसे अपनी तरफ आकर्षित कर रही थीं। उन आवाज़ों का दामन थामें वह नींद की जकड़न को तोड़ता बेदार हो गया और सनसनाते दिमाग़ को काबू में करने की कोशिश करते सोचने लगा कि माजरा क्या था?

लेकिन समझ में आने लायक कुछ था ही नहीं... अब कोई आवाज़ नहीं थी। वह तन्हा उस बेडरूम में पड़ा था और ट्यूबलाईट वैसे ही रोशन थी, जैसी सोते वक्त छोड़ी थी। एकदम से तो कोई अनपेक्षित हरकत न समझ में आई, जो उसके जागने का कारण बनी होती।

उसने सर झटकते सोचा कि कहीं न कहीं उसके मन में पैदा हुई यह फांस, कि लोगों ने उसे अंदर सोने से रोका था— ही अवचेतन में फंसी रह गई होगी, जिसने उसे इस तरह जगा दिया।

क्या अब उसे यहां से निकल कर बाहर जाना चाहिये?

उसके दिल ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी... उसने पास पड़े मोबाईल को उठा कर टाईम देखा तो तीन बज रहे थे। अगर अब तक वह सुकून से सोता रहा था तो बाकी बची रात भी सोता रह सकता था— फिर बाहर जाने की क्या जरूरत थी?

दिमाग़ में नींद के असरात अभी ख़त्म नहीं हुए थे— उसने फिर सोने के लिये आँखें बंद कर लीं।

लेकिन अभी कुछ वक़्त ही गुज़रा था और वह नींद की देहरी पर ही पहुंचा रहा होगा कि फिर आवाज़ों ने उसे वापस खींच लिया।

इस बार चूंकि नींद में नहीं था तो साफ़ समझ में आया कि कोई दरवाज़ा पीट रहा था। यह समझ में आते ही वह बुरी तरह चिंहुक कर उठ बैठा... दिमाग़ में मौजूद नींद एकदम फना हो गई।

भला इतनी रात गये कौन दरवाज़ा पीट रहा है? और दरवाज़ा भी कौन सा?

कुछ पल दरवाज़ा पीटे जाने के बाद फिर पहले की तरह सन्नाटा छा गया। वह जिस बेडरूम में था, उसका दरवाज़ा तो बंद था, लेकिन उसे नहीं पीटा जा रहा था। फिर क्या बाहर वाले दरवाज़े को कोई पीट रहा था— लेकिन कौन? भला इस जगह रात के इस वक़्त कौन भटका मुसाफिर आया हो सकता है?

वह उठ कर बेडरूम के दरवाज़े के पास पहुंचा और कान लगा कर बाहर की आवाज़ें सुनने की कोशिश की... लेकिन कोई भी आवाज़ नहीं थी कि वह किसी के बाहर होने का अंदाज़ा ही लगाता। उसने दरवाज़ा थोड़ा खोल कर बाहर झांका— कहीं कुछ नहीं था।

वह दरवाज़ा पूरी तरह खोलता बाहर निकल आया।

बीच हॉल में पहुंच कर वह अंदाजा लगाने की कोशिश करने लगा कि कौन सा दरवाज़ा पीटा गया था। कुछ पल अनिश्चित सा वहीं खड़ा रहा— फिर बाहरी दरवाज़े की तरफ बढ़ा ही था कि दरवाज़ा पीटने की आवाज़ फिर उभरी और वह ठिठक गया। नहीं— यह आवाज़ बाहरी दरवाज़े के पीटे जाने की नहीं थी, बल्कि कहीं पीछे की तरफ़ से आई थी।

वह तेज़ गति से उस तरफ बढ़ा तो उसके वहां पहुंचने तक आवाज़ फिर शांत हो गई लेकिन उसके लिये अब समझ पाना मुश्किल नहीं था कि यह कौन सा दरवाज़ा पीटा जा रहा था।

यह शायद स्टोर रूम था— पहले जायजे के लिये घर में फिरने के वक़्त उसने देखा तो था लेकिन उसे खोलने की ज़रूरत न समझी थी।

"कौन है?" उसने धड़कते दिल से पूछा— आवाज़ में कमज़ोरी साफ़ ज़ाहिर हो रही थी, क्योंकि एक अकेले बंद घर में किसी और की मौजूदगी किसी को भी डरा सकती थी।

पलट के दरवाज़ा पीटे जाने की उम्मीद कर रहा था लेकिन कोई प्रतिक्रिया न मिली। उसने दिल मज़बूत करके ज्यादा ठहरे स्वर में फिर अपना सवाल दोहराया... लेकिन पलट के कोई जवाब न आया।

वह अगले कई पल इस उम्मीद में बुत बना खड़ा रहा कि कोई दरवाज़े के पीछे से बोलेगा या दरवाज़ा वापस पीटेगा लेकिन ऐसी कोई प्रतिक्रिया फिर न हुई और ख़ौफ और आशंका से उसका दिल धाड़-धाड़ पसलियों में ठोकर मारता रहा।

उसकी नज़र दरवाज़े के बेलन पर गई जो बाहर से ही बंद था लेकिन उसमें ताला नहीं लगा था। कुछ अटकते हुए उसने दरवाज़े से कान सटाये कि दूसरी तरफ़ की आहटों को सुन सके, लेकिन ऐसा कुछ था ही नहीं जो उसके सुनने में आता। दो से तीन मिनट यूं ही गुज़र गये लेकिन कोई भी न आवाज़ हुई और न ही ऐसी कोई हरकत, जो उसके लिये ग़ैर-मुतवक्को होती।

अंततः उसने दरवाज़ा खोल कर देखने की ठानी और पीछे हटते, बेलन खींच कर दरवाज़ा खोल दिया।

लेकिन यह देख कर उसकी बुद्धि हवा हो गई कि उस दरवाज़े के पीछे कुछ था ही नहीं— सिर्फ प्लास्टर की हुई दीवार ही थी जैसी उस दरवाज़े के आसपास दिख रही थी। ऐसा लगाता था जैसे सीधी सपाट दीवार में ही चौखट फिट करके उसमें दरवाज़ा लगा दिया गया हो।

फिर उस दरवाज़े को दूसरी तरफ़ से कौन पीट रहा था?

एकदम उसके शरीर ने पसीना छोड़ दिया— दिल इस तेज़ी से धड़कने लगा जैसे तमाम उम्र की धड़कनें इसी उम्र में पूरी कर लेगा। हलक शुष्क हो गया और पिंडलियों में थरथराहट पैदा हो गई। इस दरवाज़े तक पहुंचने में उसने साफ़ महसूस किया था कि उसे ही पीटा जा रहा था, क्योंकि पीछे की तरफ़ जाते उस कॉरीडोर में और कोई दरवाज़ा था ही नहीं... लेकिन अगर उसके पीछे सिवा दीवार के कुछ था ही नहीं तो यह नामुमकिन था कि उसे कोई पीटता। फिर ऐसा किस वजह से हुआ? कौन सा साइंटिफिक रीजन इस घटना पर अप्लाई किया जा सकता था।

पैरानार्मल लगने वाली हर एक्टिविटी पर उसे इसी तरह सोचने समझने की आदत थी, क्योंकि उसे इस बात पर अपने होने जितना यक़ीन था कि दुनिया में पैरानार्मल, सुपरनैचुरल जैसा कुछ नहीं होता, बल्कि ऐसा जिस चीज़ से भी ज़ाहिर होता है, उसके पीछे कुछ ठोस वैज्ञानिक कारण होते हैं... तो इस दीवार में बने दरवाज़े के दूसरी तरफ़ से पीटे जाने के भला क्या वैज्ञानिक कारण हो सकते थे? और इस तरह दीवार में दरवाज़ा बनाने का मतलब ही क्या था जिसका कोई औचित्य न हो।

कुछ भी न समझ में आया— कुछ भी पल्ले न पड़ा। दिमाग़ रह-रह कर उन बातों की तरफ भागता रहा, जिन्हें हमेशा ठुकराते आया था।

कांपते हाथों से उसने दरवाज़ा वापस भिड़ाया और पहले की तरह बेलन फंसा दिया। फिर एकदम से कमज़ोर लगने लगी टांगों पर लड़खड़ाती सी हालत में वापस बढ़ चला।

वह कॉरीडोर उस मुख्य हाल में खुलता था जहां बैठका था— और वह उस कॉरीडोर के हॉल की तरफ खुलने वाले सिरे पर पहुंचा ही था कि दरवाज़ा फिर पीटा जाने लगा।

उसकी धड़कनें रुकते-रुकते बचीं।

उसने थरथराती पिंडलियों पर किसी तरह ख़ुद को संभालते कंधे पर से गर्दन घुमाते आतंकित निगाहों से पीछे की तरफ़ देखा— आवाज़ें बिला शक उसी दरवाज़े को पीटे जाने की थीं, बल्कि पीटे जाने की वजह से वह उसे हिलते हुए भी साफ़ देख सकता था। देख कर तो यही लगता था कि वह किसी कमरे का दरवाज़ा था और अंदर से कोई उसे बुरी तरह पीट रहा था, जबकि अभी वह देख के हटा था कि ऐसा कुछ नहीं था, बल्कि दरवाज़े के पीछे ठोस दीवार थी और वहां किसी के भी होने की संभावना ही नहीं थी।

उसकी हिम्मत जवाब दे गई।

लगभग गिरने-पड़ने की हालत में वह बाहर खुलने वाले दरवाज़े की तरफ़ भागा।
 
वहां पहुंच कर याद आया कि उसे तो लॉक किया था और फिर बेडरूम का दरवाज़ा खोलने के चक्कर में की-रिंग में दोनों चाबी होने की वजह से यहां से वह चाबी निकाल ले गया था। दहशत इस तरह हावी हो रही थी कि किसी भी तरह यहां से निकल जाना चाहता था लेकिन अब वापस होने की मजबूरी थी।

कांपते क़दमों से वह वापस हुआ और लगभग भागने की हालत में उस बेडरूम तक पहुंचा, जहां सो रहा था। चाबी दरवाज़े में फंसी थी, यह देख कर उसकी जान में जान आई। चाबी निकालने के साथ ही उसने बेड पर पड़ा अपना मोबाईल भी उठा लिया।

फिर उसी तरह जल्दी-जल्दी वापस मुख्य द्वार तक पहुंचा और उसे खोला। किसी तरह भी वह इस मेंशन से अब बाहर हो जाना चाहता था। दरवाज़े में निकलने भर की दरार बनते ही वह लपक कर बाहर हो गया और उसे वापस भिड़ा कर, चाबी से लॉक करने के बाद सीना मसलते लंबी-लंबी सांसें लेने लगा।

फिर सामने नज़र गई तो आंखें फटी की फटी रह गईं।

यह वह जगह तो नहीं थी जहां वह आया था... न वहां कोई फ्रंट कम्पाउंड था, न कैम्प लगे थे, न बाग़ थे... वहां कुछ भी ऐसा नहीं था जो उसने आते वक़्त देखा था।

बल्कि अब उसके चारों तरफ अजीब अंदाज में हिलते हुए विशाल और घने दरख्तों वाला जंगल था जो गहरे काले अंधेरे में डूबा हुआ था... हालांकि ऐसा नहीं था कि वहां रोशनी नहीं थी, बल्कि आसमान पर एक तरफ झुकता हुआ पूरा चांद मौजूद था, जिसकी चमक में एक खून सी सुर्खी सम्मिलित थी। ऐसा लगता था कि उसकी चांदनी उन पेड़ों की मुंडेरों तक ही सीमित थी और नीचे आने के लिये कोई गुंजाइश नहीं थी, जिस वजह से नीचे हर तरफ़ कालिख से आत्मसात पेड़ ही दिख रहे थे।

यह जगह एकदम बदल कैसे गई— वह यहां कैसे आ गया? दिमाग़ चारों खाने चित हो गया और बमुश्किल संभलने की हालत में आया दिल वापस ज़ोर-ज़ोर से बेतरतीब धड़कने लगा।

फिर उसने डरते-डरते अपने पीछे देखा।

रोज़वेल मेंशन भी अब वह नहीं रहा था, जिसमें वह घुसा था बल्कि उसकी जगह अब वह एक डरावने खंडहर की शक्ल अख्तियार कर चुका था— जिसमें वापस घुसने लायक कलेजा उसके पास नहीं था।

दहशत अपनी जगह हावी थी, लेकिन अपनी हालत पर उसकी रुलाई फूट पड़ी... थरथराती पिंडलियों ने एकदम उसका वज़न संभालने से इनकार कर दिया और वह भरभरा कर वहीं ढेर हो गया। पड़े-पड़े उसने कांपते हाथ में फंसे मोबाईल की तरफ़ आखिरी उम्मीद में देखा— लेकिन अब उसमें भी कोई नेटवर्क नहीं था।

जाने कितनी देर तक वह यूं ही पड़ा रहा।

अपनी हालत पर उसकी रुलाई छूट रही थी... काश उसने लोगों की बात मान ली होती। खामाखाह की बहादुरी दिखाने के चक्कर में न पड़ा होता। सारा ज्ञान, सारी तार्किकता, सारा वैज्ञानिक चिंतन एक पल में हवा हो गया था और अब सोच रहा था कि किसी भी पल में कोई असुरी शक्ति उसे एक कष्टदायक मृत्यु के फंदे में खींच ले जायेगी।

कितनी देर भला वह ऐसे हालात में अपने जीवन के लिये संघर्ष कर सकता था?

दिमाग़ हारने लगा, धड़कनें डूबने लगीं और कहीं न कहीं उसने हथियार डाल दिये। उसे कहीं से भी नहीं लगा कि वह इस जगह, ऐसे माहौल में किसी भूत, प्रेत, आत्मा, चुड़ैल से सामना कर पाने की हालत में था। मन के किसी कोने में उसने अपनी नियति को स्वीकार कर ही लिया कि अब उसके लिये वापसी या ज़िंदगी के दरवाज़े बंद हो चुके थे।

उसे लग रहा था कि अब किसी भी पल में उसके आसपास कुछ अप्रत्याशित होगा जो उसे मौत की तरफ एक क़दम और धकेल देगा।

वह कमज़ोर पड़ती धड़कनों के साथ रोज़वेल मेंशन की तरफ़ से होने वाली किसी अगली हरकत का इंतज़ार करता रहा।

लेकिन यूं ही बस वक्त बीतता चला गया— हुआ कुछ नहीं।

धीरे-धीरे उसका हारा हुआ दिल-दिमाग़ मज़बूत होने लगा। किसी अगली घटना के इंतज़ार में दिमाग़ में बढ़ते स्नायुविक तनाव ने उसे उठ कर उन चीज़ों का सामना करने की हिम्मत दी।

आंसुओं से गीले हो चुके गाल और आँखें पोंछता वह उठ खड़ा हुआ। मोबाईल जेब के हवाले किया और आसपास देखने लगा। कहीं कोई हरकत नहीं थी— हर तरफ एक सन्नाटा खिंचा हुआ था लेकिन फिर भी जाने क्यों उसे लग रहा था जैसे कोई उसके आसपास सांस ले रहा हो।

वह कुछ क़दम अब खंडहर हो चुके रोज़वेल मेंशन से दूर हट आया और दूर से उस इमारत को देखने लगा।

जो इमारत उसने देखी थी, वह दो मंजिला थी जबकि यह खंडहर तीन मंजिला था और ऊपर के कई हिस्से जैसे ढह रहे थे। जहां उसने दरवाज़े-खिड़कियां देखे थे, वहां अब स्याह खलायें नज़र आ रही थीं और लगता था कि दरवाज़े और खिड़कियां तो कभी के सड़ कर खत्म हो चुके थे।

कुछ भी हो, पर वापस अंदर जाने लायक हिम्मत वह फिर भी ख़ुद में न पैदा कर पाया।

बाहर ही बाहर उसने उस खंडहर का चक्कर काटा तो यही समझ में आया कि जो भी बदला था, वह इस तरह बदला था जैसे वह दो तीन सौ साल पीछे के वक़्त मेें पहुंच गया हो, न कि उस जगह से हट कर किसी और जगह जा पहुंचा हो। आसपास वैसा ही जंगल दिख रहा था जैसा सामने की तरफ था और पीछे जिधर झील थी, वह भी वैसे ही मौजूद थी, जैसी उसने देखी थी— बस पेड़ों की लोकेशन और तादाद में फ़र्क आ गया था, साथ ही झील के आसपास की जो घसियाली ज़मीन उसने देखी थी, वहां अब बेतरतीब झाड़ उगे दिख रहे थे। झील के पार उसी पहाड़ का चांदनी से नहाया साया भी मौजूद था, जिसे उसने गुज़री शाम को देखा था।

अब ख़ौफ की मनःस्थिति से निकल कर उसके दिमाग़ ने काम करना शुरू किया तो समझ में आया कि वह रोज़वेल मेंशन से निकल कर किसी और जगह नहीं पहुंच गया था, बल्कि उसी जगह मौजूद था, लेकिन वक़्त का पहिया रिवर्स हो गया और वह 2021 से एकदम दो तीन सौ साल पीछे पहुंच गया था।

लेकिन भला ऐसा कैसे संभव था?

अभी तक कोई ऐसी साइंटिफिक थ्योरी तो सामने आई नहीं थी कि इस तरह वक्त में पीछे जाना मुमकिन होता। फिर आखिर किस तरीके से वह ऐसा कर पाया था, या उसके साथ ऐसा हो पाया था... उसने तो किसी तरह की कोई समय-यात्रा भी नहीं महसूस की।

अपने सिवा उसे वहां किसी और की मौजूदगी महसूस नहीं हो रही थी तो डर भी कम हो रहा था और उसकी जगह लेती उलझन अब बढ़ती जा रही थी।

जो भी था आखिर वह कैसे था?

एक बार फिर वह सामने की तरफ़ आया और इस नज़रिये से उस जगह को देखने लगा कि वह कुछ सौ साल पहले कैसी रही होगी। जब वहां कोई रिहायश ही नहीं थी तो देख-रेख का अभाव होना अवश्यंभावी था। उसी एतबार से बेतरतीब झाड़ियां उगी हुई थीं और घास भी काफ़ी बढ़ी हुई थी। उस जगह कोई बड़ा पेड़ नहीं था तो कहा जा सकता था कि यह उस खंडहर के कभी जीवंत इमारत रहने के दौर में सामने का प्रांगण रहा होगा जो अब अपने कुदरती रूप की तरफ़ वापस लौट आया था।

अगर यहां रिहायश थी तो यहां तक आने का रास्ता भी होना चाहिये था... उसने खोजबीन की दृष्टि से ज़मीन तलाशी तो रास्ते के सबूत मिले जो जंगल में घुस गया था और अब इस्तेमाल न होने की वजह से जैसे प्रकृति का ही हिस्सा बन गया था। क्या वह इस जगह से निकल कर किसी सभ्य आबादी की तरफ़ जा सकता था? जाने की गुंजाइश तो ज़रूर थी, लेकिन कम से कम इस वक़्त ऐसी कोशिश ख़तरनाक हो सकती थी... जंगल तो जंगल ठहरा, क्या पता किस तरह के ख़तरे वहां मौजूद हों।

निराश मन से वह प्रांगण में मौजूद एक छोटे फूलदार पेड़ के आसपास बने चबूतरे पर आ बैठा और इस जगह के बारे में सोचने लगा।

जिस समय में भी वह था— शायद उससे काफी पहले इस इमारत को किसी राजा या अंग्रेजों ने ही अय्याशगाह या शिकारगाह के रूप में बनवाया होगा, जहां वे पिकनिक, मनोरंजन या शिकार वगैरह के लिये आते होंगे। चूंकि इस हिमालयन रीजन में भूकंप भी काफी आते हैं तो हो सकता है कि ऐसे ही किसी भूकंप में यह शिकारगाह ढह गई हो, या इस तरफ से उन लोगों का आना-जाना ख़त्म हो गया हो तो देख-रेख के अभाव में यह जगह प्रकृति का हिस्सा बनती चली गई हो।

फिर रोज़वेल के मौजूदा वंशज के किसी पुरखे के हाथ यह जगह आई होगी तो इस खंडहर को गिरा कर वह नई रोज़वेल मेंशन की इमारत बनाई गई होगी और उस हिसाब से आसपास के एरिये को संवारा गया होगा। बदलते वक़्त में यह जंगल भी खत्म हुआ होगा और आबादी बढ़ने पर लोग भी आसपास बसे होंगे— जिस आबादी को उसने वर्तमान में देखा था।
 
यानि वह रोज़वेल मेंशन के मौजूदा भवन के निर्माण से पहले के वक़्त में था और चूंकि उसे बने सौ साल से ऊपर हो चुके थे तो वह उससे तो पहले ही के दौर में था लेकिन कितना पहले था— इसका अंदाजा लगा पाना फ़िलहाल उसके लिये नामुमकिन था, क्योंकि खंडहर तो पता नहीं कितने पीछे से मौजूद रहे होंगे।

नींद तो अब खैर क्या आती— वह बस सुबह का इंतज़ार ही कर सकता था।

वक़्त देखने के लिये उसने फोन वापस जेब से निकाला लेकिन अब उसे ऑन किया तो पता चला कि उस पर बस रोशनी ही हो रही थी, कोई वॉलपेपर न था, न और कोई विजेट— बस सफ़ेद रोशनी थी जैसे उसकी डिस्प्ले ही चली गई हो। उसने बार-बार ऑन-ऑफ किया लेकिन उसकी स्थिति में कोई फ़र्क न पड़ा। फिर स्विच ऑफ करके ऑन किया तो भी डिस्प्ले जस की तस रही... यानि कुल मिला कर वह भी अब उसका साथ छोड़ चुका था।

कुछ देर झुंझलाये अंदाज़ में फोन को देखता रहा, फिर बुझा कर जेब में रख लिया।

अपनी बेबसी पर आँखें फिर गीली हो गईं।

भूत-प्रेत अपनी जगह एक ख़ौफ का कारण हो सकते थे, जिनका सामना करके वह सर्वाइव कर सकता था या मारा जा सकता था, लेकिन इस तरह की परिस्थिति तो उसके ख्वाबों-ख़्याल में भी नहीं थी, जो उसके दिमाग़ में इससे निकलने का कोई भी उपाय मौजूद होता।

धीरे-धीरे ख़ौफ की हालत से पार हुआ तो फिर झपकियां आने लगीं।

लेकिन एक समस्या थी कि वह इस वक़्त खुले में था और शरीर पर भले गर्म टीशर्ट और लोअर थी, लेकिन फिर भी वहां मौजूद ठंड के एतबार से नाकाफी थी। अब ऐसे में वहां चबूतरे की कच्ची ज़मीन पर लेट कर सो जाना तो बेहद मुश्किल काम था... फिर भी बैठे-बैठे झूमने से बेहतर था कि सिकुड़ के पड़ रहता।

कुछ देर की ज़हनी कशमकश से जूझने के बाद वह पड़ ही रहा और हाथ-पांव इस तरह समेट लिये कि लगभग गठरी बन गया। ज़मीन की ठंड ने एकदम से अपना अहसास कराते उसे झुरझुरी लेने पर मजबूर कर दिया। कुछ देर वह इस ठंड से ज़रूर जूझा होगा लेकिन थोड़ी वक़्त गुज़ारी में दिमाग़ ने वह उनींदी कैफियत वापस पा ली और फिर उसे झपकियां अपनी गोद में झुलाने लगीं।

ऐसी ही किसी झपकी ने उसे मुकम्मल तौर पर अपने आगोश में समेट लिया और होश से उसका नाता टूट गया।

फिर बचा-खुचा वक़्त कैसे गुजरा— पता नहीं।

लेकिन एक वक़्त वह भी आया जब ऐसा अहसास हुआ जैसे उसे किसी ने हिलाया हो और दिमाग़ ने फौरन प्रतिक्रिया देते उसे नींद के आगोश से बाहर धकेल दिया।

उसने एकदम आँखें खोल कर देखा— कौन था?

एकदम से तो धुंधला सा दिखा लेकिन फिर फोकस साफ़ हुआ तो दिखा कि कुछ कपड़े उसके पास खड़े थे और उसे हिला रहे थे।

कपड़े खड़े थे!

उसने हैरानी से उन कपड़ों को देखा... वे सिर्फ खड़े ही नहीं थे बल्कि इस तरह फूले हुए भी थे कि जैसे कोई इंसानी शरीर उनके भीतर घुसा हो। यह कुछ ऐसा था जैसे कोई इंसान उसके सामने वह कपड़े पहने खड़ा हो लेकिन उसे वह इंसान न दिखाई दे कर सिर्फ कपड़े दिखाई दे रहे हों और कपड़ों के अंदर हांड़-मांस के शरीर के बजाय खाली जगह दिख रही हो, जैसे कपड़े के अंदर हवा भरी हो।

उसकी हैरत भरी सिसकारी निकल गई।

उसने आसपास देखा तो दिन निकल आया था और सूरज भले उस जगह से न दिख रहा हो लेकिन आसपास फैली दिन की रोशनी एक उजले दिन का पता दे रही थी।

फिर वह कपड़े कुछ गुंगियाए... ऐसा लगा जैसे कुछ भंवरे कान के आसपास भनभनाये हों। फिर उसके शरीर में एक दहशत भरी सिहरन दौड़ी।

वह घिघियाए हुए शब्दों से कुछ बोला जो उसके ही पल्ले न पड़ा कि वह क्या बोल गया। कपड़े फिर उसकी तरफ बढ़े तो वह छिटक कर दूर हट गया। अजीब नज़ारा था— डर भी लग रहा था और गहरी उलझन भी हो रही थी।

तभी ऐसा लगा जैसे फोन बजा हो।

उसने जल्दी से फोन निकाला तो उसकी स्क्रीन रोशन थी लेकिन पहले की ही तरह। फोन बज नहीं रहा था बल्कि वाईब्रेट कर रहा था। उसे लगा कि भले डिस्प्ले खराब हो गई हो लेकिन बटन तो काम करने चाहिये— और यही सोच कर उसने अंदाजतन अंगूठा चलाते कॉल रिसीव की। यह देख कर उसकी जान में जान आई कि कॉल वाकई रिसीव हो गई।

"हलो-हलो— कौन बोल रहा है... हलो, मेरी आवाज़ आ रही है क्या... तुम कौन बोल रहे हो? यामिनी हो क्या... हलो... हलो..."

वह पागलों की तरह बोलता रहा लेकिन उधर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिली और जो आवाज़ दूसरी तरफ से आई भी, वह शब्द तो नहीं थे बल्कि भंवरों की तरह भनभनाहट भर थी, जिससे कुछ भी नहीं समझा जा सकता था।

उसकी बात करने की कोशिश कारगर न रही तो एकदम तेज़ झुंझलाहट सर पे सवार हो गई और उसने ग़ुस्से से फोन ज़मीन पर पटक दिया।

उसके सामने जो कपड़े मौजूद थे, उन्होंने लपक के फोन उठा लिया और उसकी तरफ बढ़े।

उसे कुछ और न समझ में आया तो वह पलट के भाग लिया।

भागने के लिये उसने तेज़ी से प्रकृति का हिस्सा बनते उसी रास्ते का चयन किया था, जिसे उसने सोने से पहले देखा था। भले उस पर बेतरतीब घास और झाड़-झंखाड़ उग आये हों लेकिन उसका अस्तित्व बना हुआ था जिससे वह यह फैसला ले सकता था कि उसे किधर जाना था।

थोड़ा आगे आ कर उसने पलट कर पीछे देखा तो कपड़े उसके पीछे नहीं आ रहे थे। देख कर उसे तसल्ली हुई और वह धीरे-धीरे चलने लगा।

वैसे भी उसे इस रास्ते से गुज़र के इस जंगल से गुज़रना ही था।

अंदाजतन वह बीस मिनट चला होगा, जब ऐसी जगह पहुंच गया जहां वह रास्ता दो भागों में बंट गया था। उसे याद आया कि कल इसी रास्ते से हो कर तो वह गुज़रा था और उसने यहां चाय पी थी।

जहां चाय पी थी, उस टपरी की जगह अब उसे लकड़ी का एक ठुंठ दिख रहा था, जहां वैसे ही कुछ कपड़े खड़े थे जैसे कपड़ों से वह जान छुड़ा कर भागा था... लेकिन चूंकि उसे देखते ही उन कपड़ों ने कोई प्रतिक्रिया न दी तो उसने भागने की कोशिश न की। उधर देखा जहां कल ओक का पेड़ था— वह वैसे ही मौजूद था और उसे घेरने वाला कच्चा चबूतरा भी।

बाकी सब तो उसके पल्ले पड़ रहा था लेकिन यह बिना शरीर के चलते-फिरते कपड़े क़तई उसकी समझ से बाहर थे। अगर यह भूत-प्रेत या आत्मा वगैरह भी थे तो भी उसके लिये ऐसा कोई ख़तरा तो नहीं लगते थे... लेकिन फिर उन कपड़ों को उससे बोलने में क्या समस्या थी जो वे बोलने के बजाय भंवरे की तरह भनभना रहे थे।

एक जगह खड़े सोचते उसकी नज़र वहीं ठुंठ के पास रखे एक कुल्हड़ पर पड़ी, जिसमें चाय नजर आ रही थी। उसे देख कर आश्चर्य मिश्रित खुशी हुई कि यहां इस दौर में भी चाय मौजूद थी।

उसने लपक कर वह कुल्हड़ उठा लिया— कुल्हड़ उठाया तो पास ही पड़ी एक सुलगती सिग्रेट पर भी नज़र चली गई। उसकी तलब जाग उठी और उसने सिग्रेट भी उठा ली। एक बार पलट कर ठुंठ के पास खड़े उन कपड़ों को देखा कि वे उसे रोकेंगे या पकड़ने दौड़ेंगे लेकिन वे चुपचाप वैसे ही खड़े रहे... अलबत्ता उनके आसपास भंवरों की भनभनाहट जरूर तेज़ हो गई थी।

भाड़ में जायें सब।

उसने ग़ुस्से से सोचते सर झटका और उसी ओक के पेड़ वाले चबूतरे पर आ बैठा। चुपचाप यह सोचते चाय पीने के साथ सिग्रेट के कश लगाने लगा कि आखिर वह जिस दौर में भी था, वहां इंसान तो होने चाहिये थे। यह चाय या सिग्रेट इंसानी शगल और उसकी मौजूदगी का ही सबूत तो थे... तो आखिर वे दिख क्यों नहीं रहे? अगर यह कपड़े असल में इंसान ही थे, जिन्हें किसी वजह से वह देख नहीं पा रहा तो भी कम से कम उसे देख कर उन्हें बोलना तो चाहिये था, इंसानों की तरह— यह भंवरों की तरह भनभनाने की भला क्या तुक थी?

सोचते-सोचते उसने महसूस किया कि उसका सर चकराने लगा था तो उसने कुल्हड़ रख दिया और उंगलियों में फंसी सिग्रेट भी पास ही रख दी— लेकिन रख के हटा ही था कि सर जोर से चकराया और वहीं लुढ़क गया। फिर एकदम से ऐसा लगा जैसे सबकुछ उल्टा हुआ जा रहा हो। जैसे आसमान उसके पैरों की तरफ़ और ज़मीन उसके सर की तरफ़ जाने लगी हो... उसने हड़बड़ा कर एडजस्ट होने के लिये ख़ुद ही उल्टा होने की कोशिश की और सर के बल खड़े होना चाहा... लेकिन ऐसी कोई प्रैक्टिस तो थी नहीं कि ऐसा कर ही पाता तो चबूतरे से होते नीचे लुढ़क गया।

झुंझलाहट में मुंह से एक गाली निकली और वैसी ही हालत में पड़े हुए घूमती हुई दुनिया को देखता रहा जैसे उसके ठहरने का इंतज़ार कर रहा हो।

और वह ठहरी भी— पता नहीं किस एंगल को ठहरी थी लेकिन जिस भी एंगल को ठहरी थी, अब उसके हिसाब से वह खड़ा हो सकता था।

वह खड़ा हुआ, वापस कुल्हड़ और सिग्रेट उठाई और फिर चबूतरे पर बैठ कर सिग्रेट के कश लगाते चाय के घूंट लेने लगा।

●●
 
पहाड़ों की एक सुहानी सुबह अपना सफ़र शुरू कर चुकी थी, हल्का-फुल्का कोहरा जो था भी, तो वह जल्दी ही छंट गया था और निखरी-निखरी धूप के दर्शन होने लगे थे। लोग अपने रोजमर्रा के कामों में लग चुके थे और रोज़वेल मेंशन की तरफ जाते रास्ते पर पड़ने वाले तिराहे पर मौजूद चाय की टपरी आबाद हो चुकी थी।

चाय वाले काका उस वक्त नीचे ही खड़े थे जब उन्हें रात के कपड़ों में बदहवास सा राज उस ओर आता चमका था। उस घड़ी टपरी पर दो और ग्राहक भी मौजूद थे जो चाय के कुल्हड़ संभाले आपस में बातें कर रहे थे। काके की प्रतिक्रिया नोट करके वे भी राज की तरफ देखने लगे थे। जो अब वहां पहुंच कर अजीब से अंदाज में उन्हें देखने लगा था। उसकी आँखों से होशमंदी के आसार न नज़र आते थे— ऐसा लगता था जैसे वह अपने आप में ही नहीं है।

"क्या हुआ साहब जी— सब ठीक तो है?" काके ने अपनी तरफ़ से पूछने की कोशिश की।

लेकिन राज ने जैसे सुना ही नहीं... उसने लपक कर वहां पड़े एक कुल्हड़ को उठा लिया, फिर पास ही ऐसे हाथ चलाया जैसे ज़मीन से कुछ उठाया हो, जबकि वहां कुछ था ही नहीं। उन्होंने हैरानी से एक दूसरे को देखा और दिमाग़ में आई बात जुबान पर लाने से न रोक सके।

"यह पागल हो गये हैं क्या?" एक ग्राहक ने कहा।

"पता नहीं— कल शाम तो आये थे अकेले ही रोज़वेल मेंशन में ठहरने के लिये।" राज को चिंताजनक दृष्टि से देखते चाय वाले काके ने बताया।

"अरे! तो कहीं रात अंदर तो न गुजार लिये?" दूसरे ग्राहक ने हैरानी से कहा।

"पता नहीं— हालत देख कर तो यही लग रहा है।" काके ने अफसोस से सर हिलाते हुए कहा।

उधर राज उस ओक वाले चबूतरे पर जा बैठा था और इस तरह खाली कुल्हड़ को होंठों से लगाते सुड़कने लगा था जैसे चाय के घूंट ले रहा हो। बीच-बीच में खाली उंगलियों को होंठों से सटा कर ऐसे सांस खींचता था जैसे सिग्रेट का कश ले रहा हो, जबकि उंगलियों में था कुछ नहीं।

फिर कुछ पल बाद वह कुल्हड़ रख के उल्टा खड़ा होने की कोशिश करने लगा, जिसमें नाकाम रहा और लुढ़क कर नीचे गिर गया। चेहरे पर दिखती झुंझलाहट के साथ होंठों से कुछ अनर्गल से शब्द खारिज हुए। कुछ क्षण वैसे ही पड़ा रहा, फिर उठ कर वापस बैठ गया और कुल्हड़ उठा कर अपनी समझ में वापस चाय पीने और सिग्रेट के कश लगाने लगा।

"गये यह भी।" चाय वाले काके ने मत्थे पर हाथ मारते हुए कहा।

तभी सामने बैठा राज कुछ सतर्क होता दिखा और उठ कर खड़ा हो गया। उसकी निगाहों का पीछा करके उन लोगों ने उस रोज़वेल वाले रास्ते की तरफ देखा तो तेज़-तेज़ क़दमों से खेम सिंह इसी तरफ़ आता दिखा।

जब वह एकदम नज़दीक आ गया तो राज पलट कर भाग खड़ा हुआ।

"अरे-अरे, साहब-साहब... सुनिये तो सही... रुक जाइये।" खेम सिंह पीछे चिल्लाता रह गया।

"क्या हुआ क्या है आखिर?" एक चाय पीने वाले ने खेम सिंह के नज़दीक आने पर पूछा।

"पता नहीं— कल शाम समझा के तो गया था कि बाहर कैम्प में ही सोइयेगा और सुबह मिले भी बाहर ही... लेकिन कैम्प के बजाय बाहर ही पड़े थे। मैंने उठाया तो ऐसी ही हालत थी। मेरी बात समझ नहीं पा रहे और ख़ुद पता नहीं किस भाषा में बोल रहे हैं। उसी टाईम इनकी वाईफ का फोन आ गया तो उनसे भी पता नहीं किस ज़बान में बात की और फोन पटक दिया। वह तो कहो कि मिट्टी पर पटके जाने की वजह से फोन टूटा नहीं... मेम साहब अभी भी लाईन पर हैं और किसी भी तरह बात कराने को कह रही हैं लेकिन कैसे करायें... यह साहब तो मुझे देखते ही भाग ले रहे हैं।" खेम सिंह परेशान स्वर में बोला।

"रात अंदर ही तो नहीं गुज़ारे? पता चला हो कि जब कांड हो चुका हो तब बाहर आये हों, लेकिन तब तक होश से नाता ही टूट चुका हो।" चाय वाले काके ने उलझन से खेम सिंह को देखा।

"अब तो ऐसा ही लग रहा है।" खेम सिंह ने सर हिलाया।‘

"तो उनकी मैडम को बता दो पूरी बात... आगे फिर वे लोग जानें।" एक ग्राहक ने कंधे उचकाते हुए कहा।

खेम सिंह ने सहमति सूचक ढंग से सर हिलाया और फोन कान से लगा कर खराब नेटवर्क की वजह से टूटते शब्दों के साथ ही सही पर यामिनी को पूरी बात बताने लगा।

(समाप्त)
 
नाईट वॉकर

"देख भाई— अपन न, यह भूत-वूत कुछ न मानते। आत्मा जैसा कुछ न होता। तो जो मर्ज़ी हो बक लो— हमको घंटा कुछ फ़र्क न पड़ता।" सचिन ने स्प्राईट की बोतल का ढक्कन खोलते हुए कहा और उसे दारू भरे गिलास में मिलाने लगा।

"यक़ीन तो कभी हमको भी न हुआ— लेकिन इस मामले में अपना दिमाग़ चल जाता है।" प्रदीप ने चखने में हाथ मारते हुए कहा।

"हरकतें तो साली की ऐसी ही हैं… हम भी देखे हैं उसे कई बार रात को भटकते। एकाध बार मन में आया कि गिरा लें उधर ही, लेकिन नज़र मिलते ही पीछे हटना पड़ा। लड़की डरे तब हम शेर हैं— लेकिन उसकी आँखें देख कर तो हमको ही डर लग गया।" बद्री ने सिग्रेट का गहरा कश खींचने के बाद धुआं बाकी तीनों पर छोड़ा।

"फट्टू हो बे तुम सब… यह कहो न कि उसे गिराने की हिम्मत नहीं है। साली रात-रात आत्मा की तरह भटकती रहती है… देखे फटती है सबकी, गिराओगे कहां से।" लोकेश ने अपने गिलास से एक लंबा घूंट भरा और उन्हें चिढ़ाते हुए बोला।

"काहे तुर्रम खां— तुम्हारी नहीं फटती?" सचिन ने आँखें तरेरते उसे देखा।

"फटे तब, जब ऐसा कोई इरादा हो… हमने कभी उसको गिराने-लिटाने के बारे में सोचा ही नहीं… हे हे हे हे हे।" लोकेश उसे मिडिल फिंगर दिखाते हंसने लगा।

"काहे… खड़ा नहीं होता क्या बे?" बद्री ने ताना मारा।

"घंटा… मैं औरत को इज्ज़त की नज़र से देखता हूँ। तुम लोगों की तरह घटिया सोच नहीं है मेरी कि अकेली फिरती लड़की दिखी तो उसे गिराने लिटाने के बारे में सोचने लगूं।" लोकेश ने मुंह बनाया।

"अच्छा— हमको पता ही नहीं था कि हमारे मध्य एक महापुरुष बिराजे हुए हैं… और भो… के, पिछले साल जो छेदी के खोखे में वह ननके की लौंडिया लिटाये थे, वह कन्या पूजन कर रहे थे मादर—" प्रदीप ने उसका उपहास उड़ाते हुए गाली के साथ अपनी बात पूरी की।

"अबे वह तो— वह तो खुदय बुलाई थी न हमको। चुल उसी को मची थी, तो हमारा दोष काहे।" लोकेश ने भन्नाए स्वर में कहा।

"नहीं तू इज्जत की बात कर रहा न— तो उसकी भी इज्जत कर लेता। काहे गोपिया लिया था उसे छेदी के खोखे में। बेट्टा… नानी के आगे ननकौरे का हाल मत बताबे, हमको सब पता है कित्ते शरीफ हो साले।" बद्री ने फिर कश लेकर उसी के मुंह पर धुआं छोड़ा।

"ठीक है, जो हैं सो हैं… पर वह होस्टल वाली को देख के कभी ऐसे विचार नहीं आये तो नहीं आये। अब हम तो इसे शराफत ही कहेंगे न।" लोकेश ने गिलास से एक लंबा घूंट लिया और आँख बंद करके जैसे उसे फील करने लगा।

"वैसे यह लड़की हमेशा से ऐसे ही रात को भटकते दिखती है क्या?" सचिन ने प्रदीप से पूछा।

"हमेशा बोले तो— अबे यह होस्टल है, घर नहीं है उसका। अभी महीना भर पहले तो आई है इधर… वॉचमैन से पूछा था, तो बोला मेंटल है— दिन दहाड़े भी ऊटपटांग हरकते करती है। वयसे रात को इस तरह बाहर निकलना अलाउड नहीं उधर किसी को— पर यह चारदीवारी फांद के निकल जाती और भटक कर वापस भी आ जाती।"

"डर भी नहीं लगता उसे कि खूबसूरत है, इधर नाम की तो आबादी है, आगे जंगल है… कोई कांड हो जायेगा उसके साथ।" सचिन ने अपने गिलास से एक घूंट मारा।

"डर उसे क्या लगेगा बे— उससे लोगों को लगता है। अब फिर से भौंके हम, तब पता चलेगा तुम्हें कि चीज़ क्या है साली। तो सुन… क़रीब बीस दिन पहले जाने आलम की बकरी गायब हुई थी, उसे ढूंढते ससुरा जंगल की तरफ़ चला गया कि उधर न भटक गई हो। जानते हो क्या देखा उसने… रात के ग्यारह बजे, हर तरफ़ सन्नाटा और अंधेरा… और यह साली जामुन के पेड़ पर बैठी उसे देख रही थी। झक सफ़ेद कपड़े पहने चमक रही थी, मुंह पर खून लगा था और जब अलमवा से नज़र मिली तो हंसने लगी चुड़ैल जैसी। तब जो भागा है अलमवा वहां से, तो सीधे घर आयके रुका है। इतना डर गया था ससुरा कि दो दिन बुखार रहा है उसे। उसका तो कहना है कि उसकी बकरी भी इहे चुड़ैल का निवाला बनी है।" प्रदीप ने पूरे एक्सप्रेशन दिखाते वह घटना सुनाई।

"उसके हास्टल न गया शिकायत करने?" सचिन ने जिज्ञासावश पूछा।

"गया— वार्डन मैडम ने उसको बुलाया सामने और पूछा। साफ मुकर गई साली— बोली वह तो रात को अपने कमरे में थी।"

"सीसीटीवी नहीं लगे उधर?"

"अबे पगलाये हो का… गरीबन वाला तो हास्टल है, बिल्डिंग साली जर्जर हो रही, पता नहीं कब ढह जाये और सीसीटीवी लगायेंगे।"

"हो सकता है कि कुछ ग़लतफहमी हुई हो जाने आलम को। वह रात में टहलती है, यह तो सबको पता है… देखा ही होगा कभी जाने आलम ने भी उसे, तो कुछ भ्रम पैदा करने वाला दिखा होगा उसे, तो उसने मान लिया कि वही होगी।" सचिन ने अपना दिमाग़ लगाया।

"भय्ये, एक दिन की बात नहीं है, तीन बार और ऐसे ही वारदात हो चुकीं लोगन की देखा-देखी। चलो दूसरा किस्सा सुनाते हैं तुमको… अभी पंद्रह दिन पहले एक रात समझो कि घन-घन घोर, घटा घनघोरा वाला हाल था। मतलब काली रात, बादल यौं साला गरज बरस रहे कि धरती बुड़ाय देंगे। बिजली रानी कड़क-कड़क के मेहरारू लोगन का चिपकने का अवसर सुलभ कराने में लगी रहंय। अयसा हाल था ब्रो, कि घर से निकलने वाली हालत नहीं थी। सब दुबक रहे अप्पन घरा में चुम्मार के। मौसम का शबाब ढलते-ढलते समझो कि रात अधियाय गई होगी। तब अचानक बदलू धोबी के दुआरे कुत्ते भौंकय लगे। बदलूवा पहिले तो इग्नोर किया, फिर जब कुत्ते चुपै न, तब उठ के देखय गवा। पता चला कि उकरे घर के तरे जो मंड़य्या डाल रखे हैं बेचन— वहां कोई बैठा कुछ खाय रहा था। अब बदलू का पहिले तो पल्ले न पड़ा माजरा— थोड़ा नंघीचे जाय के देखिस है जो भाय… तो फट के हाथ में आय गई। ये हे चुड़ैल बयठी एक कुत्ता मारे खाय रही रहै। बदलू जो उल्टे पैर भगा है तो सुबह दिन चढ़े ही दर्शन दिये है फिर।" बद्री ने सिहरते हुए दूसरा किस्सा सुनाया।

"फिर हास्टल गये शिकायत करने?"

"हां, बदलुवा चार-छः जने लयके पहुंचा रहै— लेकिन फिर वा साफ मुकर गई। वॉचमैन से पुछाई हुई, वह साला अपनी कुठरिया मा दुबका पड़ा रहै। इतना खराब तो मौसम रहय— कौन ड्यूटी निभाता यार जाग के।"

"और वह कुत्ता— उसका क्या हुआ?"

"कुत्ते का क्या होता— आधा खाया पड़ा था मंड़य्या में। बदलू का ही हटा के जंगल में फेंकना पड़ा।"

"और फिर आगे… दो घटनाएं और हुईं?" सचिन की दिलचस्पी बढ़ रही थी।

"हां जी… तबहैं तो कह रहे न कि अब साला सबको लगने लगा है कि हय यह ससुरी चुड़ैल ही।" बद्री ने एक सांस में उसे गाली बकी, दूसरी सांस में अपनी सलामती के लिये भगवान को याद किया और फिर अंतिम सुट्टा मार के सिग्रेट वहीं फेंक दी।

"अब तीसरा किस्सा हमसे सुनो बे… दस दिन पहले का।" लोकेश अपना पैग चुसकता हुआ बोला— "अब बारिश का सीजन है तो मौसम तो नरम-गरम रहता ही है। उस रात भी बादल बदली थे, आठ बजे आंधी भी आई थी और आसार बारिश वाले ही थे। हालांकि हुई नहीं थी— लेकिन आसार थे तो जल्दी ही लोग घर दुबक गये थे। वह मेंहदी का लड़का है न छोटा वाला— उल्ला। हिम्मत पुर में कहीं काम करता है, तो लौटते-लौटते दस बज जाते हैं… वह लौट रहा था कि पुलिया पर अकेली यह बैठी दिखी। अब उल्ला इसके कांड जानता था तो डर गया— उसने सोचा कि आँख बचा के सीधे निकल जाये तो बिना उसकी तरफ़ देखे, साइकल भगाई। पुलिया पार कर के जब ससुरा इधर आय गया, तब सोचा देखें पीछे कि क्या कर रही… और भय्ये, जब पीछे मुड़ा तो जानते हो क्या देखा?"

"क्या?" सचिन की धड़कनें बढ़ीं।

"चुड़ैल वहां पुलिया पर नहीं थी… बल्कि उल्ला की साइकिल के कैरियर पर बैठी थी और ख़ून सने दांत निकाले हंस रही थी। बेचारा उल्ला… साइकिल छोड़ के वहीं रोने गिड़गिड़ाने लगा। माफी मांगने लगा, जान की भीख मांगने लगा और यह साली चुड़ैल… उल्ला की साइकिल ले के ही भाग गई।" लोकेश ने आगे बताया तो सचिन की हंसी छूट गई।

"चुड़ैल को साइकिल का क्या काम… जानबूझकर हरकत की होगी इस लड़की ने। क्या नाम क्या है इसका?"

"निशा— निशा सोनकर।"

"अच्छा… अयसे किसी की साइकिल पर तुम बैठ सकते हो कि उसको पता ही न चले। बोलो बोलो… उल्ला उससे दूर से गुज़रा था, और साइकिल की रफ्तार अच्छी-खासी तेज़ थी। अगर वह उठ कर पीछे दौड़ती, उछल कर कैरियर पर बैठती तो उल्ला जान जाता… लेकिन उसको तो पता ही न चला कि वह कब पीछे आ बैठी।"

"और भागी अयसे नहीं थी— दरअसल उसी टेम बेहटा बाबू बाईक से उधर आ रहे थे, तो उनकी बाईक की रोशनी देख के उसको ख़तरा लगा होगा, तो चली गई। बाद में उल्ला की साइकिल खंती में मिली थी।"

"मतलब चुड़ैल को आदमी से ख़तरा लगा और वह भाग गई।" सचिन को फिर हंसी आ गई।

"अबे हंसो मत यार— बात समझो। रात में प्रेतात्मा की तरह भटकती किसी को भी दिख जाती है। एक बार यहां दिखेगी तो अगली बार वहां दिखेगी। समझ में नहीं आता कि इतनी जल्दी जगह कैसे बदलती है… लेकिन जब अपना कोई शो दिखाती है, जयसे अलमवा को दिखाया, जयसे बदलू को दिखाया— तो महाराज अकेल्लय दिखाती है। तब कौनो और आ टपका तो शो कैंसिल। इसीलिये उल्ला बच गया, वर्ना तीन दिन से पहले बुखार न उतरता।"

"अरे अगर आत्मा या चुड़ैल है तो उसे क्या फर्क पड़ता है कि उसे एक देख रहा या दस… कुछ खुराफाती दिमाग़ की होगी, कुछ ट्रिक्स आती होंगी तो बस उसी के सहारे भौकाल बनाये है।"

"चौथी घटना सुनोगे— ख्याल बदल जायेगा।" बद्री ने एक घूंट ले कर सचिन का कंधा थपथपाया।

"हां तो लगे हाथ वह भी सुना दो।"

"नन्हें खां की कोठी गये हो कभी… जंगल के बीच है, साला छत पर तक आदमी जितनी घास उगी है। हवा अंदर घुस के जब बाहर निकलती है तो अयसे लगता है कि जयसे सैकड़ों आत्माएं चीख रही हैं। आदमी दिन में न अंदर घुसे उसमें— रात में तो या पागल घुसे या खुदकुशी का शौकीन। खंडहर हो चुकी है और उधर सिवा भूतों के कोई नहीं होता। तनिक कल्पना करो कि अगर तुमको रात में उधर छोड़ दिया जाये तो का हाल होगा तुम्हारा… खड़े-खड़े दिल बैठ जायेगा। अभी चार दिन पहले रात को चंदन सोया तो घर पे, लेकिन किसी बच्चे के रोने से उसकी नींद जब खुली तो उसी कोठी में। तब उसको नहीं पता था कि कहां है… बस लगा कि किसी जर्जर घर में है और वहां एक बच्चा पास बैठा रो रहा है। मतलब सोच तो यार— आदमी अपने घर की छत पर सोये और आँख खुले तो किसी वीरान जगह, जहां बस एक बच्चा पास बैठा रो रहा हो तो का हालत होगी आदमी की।"

"क्या हुई चंदन की हालत?"

"मूत दिया पजामे में पहले तो… फिर लगा कि ज़रूर किसी ने बेहोश करके कहीं ला डाला है और उस बच्चे को भी वहीं डाला है तो रहम आ गया बच्चे पर और भय्या बच्चे को बैठ कर चुपाने लगे। अब बच्चा चुपा तो सही, और चुपते-चुपते खिलखिला कर हंसने भी लगा… लेकिन साला हाथ भर का बच्चा रोने से हंसने की प्रक्रिया के दौरान ही पूरा आदमी बन गया और चंदन के जो पसीने छूटे हैं, तो उठ कर भागते ही बन पड़ा। हाथ-पैर में जान नहीं बची थी लेकिन जयसे-तयसे गिरते-पड़ते जब हुवां से बाहर आया हय, तब पता चला कि ऊ तो नन्हें खां की कोठी थी… और यह देख के तो साला वहीं बेहोश होय गया।"

"जान बच गई?"

"हां, जान तो बच गई… एकाध घंटे बाद होश वापस बहाल हुए तो भय्या चीखते हुए घर भागे और घर की देहरी पर आय के जो गिरे हैं तो फिर घर वाले ही उठा के अंदर ले गये हैं।"

"इसमें वह लड़की— निशा— निशा सोनकर कहां से फिट हुई?" सचिन के पल्ले न पड़ा।

"सुबह जब चंदनवा कई लठैत लेकर नन्हें खां की कोठी पहुंचा चेक करय— तो वहां और कुछ तो न मिला, लेकिन एक पायल मिल गई, और चूंकि सबको पहले से शक था निशा पर तो सब सीधे हास्टल पहुंचे। तब तो वह कॉलेज गई थी— दुई घंटा बाद आई, तब उससे पूछा गया तो मान लिहिस कि वह पायल उसी की थी। अब वह पहुंची कैसे वहां तो कुछ बताई न पाई— बस येहे कहती रही कि कुछ दिन पहले खो गई थी। तो अब तुम बताओ कि उसकी पायल वहां कयसे पहुंची, जहां साला दिन दहाड़े कोई मर्द न जाय और उकी पायल पहुंच गई।"

"मुझे लगता है कि वह किसी साइक्लॉजिकल प्राब्लम की शिकार है, जिसकी वजह से वह रात को भटकने निकल पड़ती है। इधर गंवई आबादी है, जहां लगभग सारे ही लोग अंधविश्वास से भरे हैं… तो जहां किसी पढ़ी-लिखी शहरी आबादी में उसे ख़तरा हो सकता था, वहीं यहां उसे आत्मा चुड़ैल समझ के लोग ख़ुद ही उससे डरते हैं। मुझे नहीं लगता कि इनमें से एक भी घटना वैसे हुई होगी, जैसे बताई गई… कुछ इन चारों को भ्रम हुए होंगे और कुछ उन्होंने मनघड़ंत किस्सा गढ़ लिया होगा और हो गई सबके पास एक चुड़ैल की कहानी।" सब बातें सुनने के बाद सचिन अपना निष्कर्ष सुनाते हुए बोला।
 
बाकी तीनों उसे ऐसी नज़रों से देखने लगे जैसे ज़बान से गाली देते न बन रहा हो तो आँखों से ही कसर पूरी किये ले रहे हों… आखिर उनकी धारणा पर यह नादानी का ठप्पा जो लगता दिख रहा था।

"मतलब हम सब चूतिये हैं… तुम साले थोड़ा पढ़-लिख लिये, हुवां मुंबई में जा कर रहने लगे तो तुमको हमारे ज्ञान पर संदेह होने लगा।" आखिर बद्री ने साईड में थूकते हुए मुंह खोला।

"देखो, मैं ऐसा नहीं कह रहा… आदमी किसी चीज़ के बारे में जब पहले से मान ले तो ऐसा होता है कि उसे उससे रिलेटेड भ्रम होने लगते हैं। आज के ज़माने में कौन इन सब बातों पर यक़ीन करता है यार— अब तो गांव-खेड़े वाले भी होशियार होने लगे हैं इन सब मामलों में।" सचिन अपना पैग ख़त्म करते हुए बोला और फिर तख्त पर पड़े पैकेट से एक सिग्रेट निकाल कर सुलगाने लगा।

"यह देख बाड़ू—" प्रदीप ने अपने फोन पर गूगल सर्च का रिजल्ट उसे दिखाया— "दुनिया की दस सबसे कामयाब हॉरर फिल्में। दसों अंग्रेजी हैं बेटा, हॉलिवुड वालों ने बनाई है… बनाने वाले, देखने वाले सब ज्यादातर वह अंग्रेज हैं जो विज्ञान हमसे तुमसे ज्यादा समझते हैं… और इन सब फिल्मों में है क्या— भूत-प्रेत, चुड़ैल, आत्मा। ई लोग नहीं मानते तो यह फिल्मों में कयसे सब मान लेते हैं, देख लेते हैं, मनोरंजन कर लेते हैं।"

"मेरे भाई, वे तो जुरासिक पार्क, गॉडजिला और किंगकांग जैसी फिल्में भी बना और देख लेते हैं… तो सिर्फ उनके पीछे हम यह मान लें कि यह सब चीज़ें होती हैं? हुए होंगे करोड़ों साल पहले डायनासोर पर अभी तो नहीं हैं न, वे वर्तमान में दिखा रहे हैं… तो हम मान लें कि वे इस दुनिया में मौजूद हैं।"

"अबे कहां की बात कहां ले के चले गये ज्ञानी के चो… वह सब शुद्ध मनोरंजन के लिये बनाया देखा जाता है और यह भूत-प्रेत मानने वाले हर जगह मिल जायेंगे तो उनकी तुलना इन डायनासोर चिम्पैजी या एलियन से करने लगोगे क्या।"

पहले लगा था सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है, फिर बहस होने लगी और वे प्रतिद्वंद्वी हो गये। शहर से लगी यह एक बाहरी गंवई आबादी थी, जिसके आगे वन क्षेत्र शुरु हो जाता था। बाहरी सिरे पर मौजूद एक कॉलेज से सम्बंधित जर्जर अवस्था वाला एक आरक्षित हास्टल उस तरफ़ मौजूद था और उस हास्टल में रहने आई एक लड़की उनकी चर्चा का विषय थी, जिसके बारे में उन तीन लोगों का मत था कि या तो वह ख़ुद कोई आत्मा या चुड़ैल है, या फिर उस पर किसी आत्मा ने कब्ज़ा कर रखा है और उसके सहारे वह रातों को शिकार करती है— जबकि तीन के मुकाबले सचिन का कहना था कि वह ज़रूर किसी मनोवैज्ञानिक समस्या की शिकार है, जिसे इलाज की ज़रूरत है और वे सब उसे चुड़ैल बनाये पड़े हैं।

यह गांव के उत्तरी छोर पर स्थित लकड़ी की ठेकी थी, जो बद्री के बाप की थी और रात में वहां बद्री ही रुकता था तो अक्सर उन चार-पांच दोस्तों का जमघट देर रात तक वहां लगा रहता था। पहले कभी सचिन उस जमघट का नियमित हिस्सा होता था लेकिन साल भर पहले उसकी मुंबई में नौकरी लग गई थी तो उसका रिश्ता इस चठियाबाजी से टूट गया था। आज ही वह पंद्रह दिन की छुट्टी पर गांव आया था और रात की पहली ही जमघट में निशा नाम की उस लड़की की चर्चा छिड़ गई थी, जिसने उस पूरी आबादी को दहशत में डाल रखा था।

ग्यारह बजे तक वे बहस करते रहे और अंत में बात इस पर ख़त्म हुई कि अगर उस लड़की में समस्या नहीं है तो सचिन उससे दोस्ती करे और उसे इलाज के लिये प्रेरित कर के दिखाये… सचिन को भी इस बात के लिये अंततः राज़ी होना पड़ा— जबकि साल भर के दौरान मुंबई में उसने पहले ही एक गर्लफ्रेंड बना रखी थी और उसका अक्सर फ्री टाईम उसी के साथ गुज़रता था। अब उसे कुछ वक़्त के लिये दरकिनार करके सचिन को सारा फोकस निशा पर रखना था और महफ़िल तमाम होने से पहले ही उसने हामी भी भर दी थी।

अगले दिन से वह उस लड़की की खोजबीन में लग गया… जब वह हास्टल से कॉलेज के लिये निकली तो लोकेश और प्रदीप ने दूर से उसकी पहचान करा दी। अब आगे जो भी करना था, वह उसे ही करना था। उसने निशा की वापसी का समय भी पता कर लिया और उसी समय में कॉलेज के पास पहुंच गया कि निशा निकले और वह उसे कैच कर ले।

एक बजे वह निकली और बाकी लड़कियों के साथ उधर मौजूद ई-रिक्शा के झुंड की तरफ़ बढ़ी— सचिन लपकते हुए उस तक पहुंच गया।

"एक्सक्यूज मी मिस।" उसने नज़दीक पहुंचते पुकारा तो लड़की पलट कर उलझन से उसे देखने लगी— "मेरा नाम सचिन है, और मैं आपके हास्टल के पास ही रहता हूँ। क्या हम थोड़ी देर बात कर सकते हैं।"

प्रतिक्रिया में उसने लड़की की आँखों में एक अजीब सी चमक आती महसूस की— जिसे वह कोई जामा न पहना सका, किंतु प्रत्यक्षतः लड़की ने हिचकते हुए पूछा था— "किसलिये… मुझसे क्या बात करनी है?"

"बस ऐसे ही— अगर आप बुरा न मानें तो। देखिये, भरी पूरी आबाद जगह है, वह सामने पुलिस वाले भी मौजूद हैं— तो मुझे नहीं लगता कि आपको मुझसे कोई ख़तरा महसूस करना चाहिये। वैसे भी— मेरा कोई ग़लत इरादा नहीं है, बस आपसे बात ही करनी है, जिससे हो सकता है कि आप ही की मदद हो।"

"मेरी मदद— भला वह कैसे?" अब सचिन को उसकी आँखों में दिलचस्पी पैदा होते दिखी।

"अब वह तो हम बात करेंगे, तभी सामने आयेगा न… इफ यू डोंट माइंड।"

लड़की ने एक बार सर से पैर तक उसे देखा, फिर आसपास देख कर जैसे यह सुनिश्चित किया कि वे किन्हीं और नज़रों का केन्द्र नहीं थे— और रुख़ मोड़ कर सड़क किनारे उधर बढ़ ली, जिधर भीड़ नहीं थी। सचिन भी उसके पीछे ही उधर लपक लिया और उसके बराबर में चलने लगा।

"दस मिनट का वाकिंग डिस्टेंस है— हम पैदल बात करते हुए हास्टल तक चल सकते हैं। रास्ता भी कट जायेगा और हमारी बातें भी हो जायेंगी। रिक्शे के दस रुपये भी बच जायेंगे।"

"क्या बात करनी है आपको?" लड़की ने चलते-चलते फिर उसे ग़ौर से देखा… ख़ुद वह बीस के आसपास की इकहरे बदन की अच्छी लंबाई वाली लड़की थी, जिसके चेहरे में मासूमियत और सुंदरता का एक परफेक्ट कांबीनेशन मौजूद था और जो ब्लू जींस के ऊपर मल्टी कलर का लंबा काटन का कुर्ता पहन रखे थी— साथ ही गले में मफलर की तरह स्टोल भी लटका रखी थी और कुल मिलाकर काफ़ी आकर्षक लग रही थी।

"बस ऐसे ही कुछ… आपका नाम निशा है न, निशा सोनकर?"

"हां— क्या मेरे नाम में कोई प्राब्लम है?"

"अजी बिलकुल नहीं… मैं दरअसल इसी जगह का रहने वाला हूँ, लेकिन फिलहाल मुंबई सेटल्ड हूँ। दो हफ्तों की छुट्टी पर आया हूँ कल ही वापस… तो पता चला कि गांव में आपकी काफ़ी चर्चा हो रही है।"

"मेरी चर्चा? क्यों भला?"

"आपको पता है… अब इतनी भी मासूम मत बनिये। कल रात हम चार दोस्त आपस में आपके बारे में बात कर रहे थे, तब मुझे उन्हीं से आपके बारे में पता चला। मुझे लगता है कि गांव में सभी आपको कोई आत्मा या चुड़ैल टाईप मानते हैं और फिलहाल तो डरते हैं, लेकिन कोई भरोसा नहीं कि कब हिंसक हो जायें।"

"मतलब?" निशा ने चौंक कर उसे देखा।

"मतलब कि आपको शायद ग्रामीण भारत की मेंटेलिटी का अंदाज़ा नहीं। योरप वाले जैसे किसी दौर में विच हंटिंग करते थे— फिर समझदार हो गये, लेकिन हमारे यहां समझदार होने में अभी सौ पचास साल वैसे ही लग जाने हैं, तो एक ज़माने से विच हंटिंग चल रही है। किसी साइक्लॉजिकल प्राब्लम से जूझती महिला को डायन, चुड़ैल बता कर लिंच कर देते हैं। सोशल मीडिया पर देखी हों शायद आपने ऐसी खबरें। अब फिलहाल इधर गांव में भी आपको लेकर ऐसी ही धारणा बन रही है कि आप भी ऐसी ही कोई डायन चुड़ैल हैं… तो लिंच किये जाने का ख़तरा तो आपके लिये भी है।"

"कितनी रूडली कह रहे मुझे लिंच करने की बात… आपको लगता है कि मैं कोई डायन या चुड़ैल हूँ?"

"नहीं… लेकिन मेरे जैसे लोग यहां गिनती के होंगे जो इस बात को ठुकराने का साहस कर सकें। आप चलते हुए आसपास दिखते लोगों की नज़रों को टटोलिये… सब दायें-बायें से आपको टटोल रहे हैं। अभी इन निगाहों में एक उलझन है, एक डर है— कहा नहीं जा सकता कि कब गुस्सा और हिंसा उतर आये।"

"तो ऐसे में मुझे क्या करना चाहिये?"

"आपको अपने पैरेंट्स से बात करनी चाहिये। किसी साइकियाट्रिस्ट से कंसल्ट करना चाहिये और ट्रीटमेंट लेना चाहिये। हो सकता है कि आपको ऐसी कोई समस्या हो जिसके चलते आपका अपने होशो हवास से नाता टूट जाता हो और फिर वह हरकतें कर जाती हों, जिनकी वजह से लोगों की यह धारणा बनी कि आप कोई आत्मा, डायन, चुड़ैल वगैरह हैं।"

"थैंक्स… मैं इस बारे में सोचूंगी।"

"वैसे हास्टल में तो शेयरिंग रूम होते हैं, तो और भी तो लड़कियां साथ रहती होंगी न आपके। वे नहीं बतातीं कुछ आपको?"

"शुरु में जब आई थी, तब थीं दो… फिर उन्होंने रूम चेंज कर लिया। अब कोई नहीं है मेरे रूम में… उन्होंने बताया नहीं, पर मुझे पता है कि वे भी डरती हैं। बल्कि हास्टल और यहां क्लास तक में सारी लड़कियां मुझसे डरती हैं। कोई मुझसे दोस्ती तो दूर, बात तक नहीं करता।" कुछ देर की ख़ामोशी के बाद उसने मायूसी से कहा।

"फिर भी आपको लगा नहीं कि आपको कोई समस्या है और आपको उसके इलाज की ज़रूरत है?"

"मुझे ख़ुद को पता नहीं चलता कुछ… मुझे तो ऐसा लगता है कि मैं सोने के बाद सीधे सुबह ही उठती हूँ और जहां सोती हूँ, वहीं उठती हूँ। रहा इलाज तो मेरे माँ-बाप इतने समर्थ नहीं कि मेरा ऐसा इलाज करा सकें… आरक्षण के सहारे तो मेरी पढ़ाई ही हो पा रही।"

सचिन ने कोशिश की थी कि वह खुल कर उससे इस बारे में बात करे लेकिन उसने अनमने भाव से बस उतनी ही बात ठीक ढंग से की, और आगे जैसे टालने वाले भाव से छोटे-छोटे जवाब देती रही, जिनसे सचिन को और कुछ तो न पता चला— वह इस बात का निर्धारण भी न कर पाया कि निशा की समस्या शुरु कब से हुई थी… और चलते-चलते निशा का हास्टल भी आ गया।

"देखो… अगर तुम किसी साइकियाट्रिस्ट के पास जाने लायक हालत में नहीं, तो भी तुम्हें एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत है जो तुम पर पूरा ट्रस्ट करे। जिसे इन बातों की समझ हो और जो तुम्हारी मदद कर सके।"

"मेरे कालेज और हास्टल में बस लड़कियां ही हैं और वे सब मुझसे डरती हैं— ऐसे में ऐसा कोई दोस्त कहां से लाऊं?"

"दोस्त तो मैं भी हो सकता हूँ— अगर तुम पसंद करो तो… मैं एटलिस्ट दो हफ्ते तक तो हूँ। इस बीच जितनी मदद हो सकेगी, ज़रूर करूंगा।" उसने मौके को भुनाने में देर न की और तत्काल स्वंय को पेश कर दिया।

"आपको मेरी इतनी फ़िक्र क्यों है?"

"क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरी जानकारी में किसी लड़की के साथ ऐसा कोई बुरा हादसा हो, जिसकी मदद करके मैं उसे बचा सकता होऊं। इससे ज्यादा और कोई ख्वाहिश नहीं— जिसे लेकर आपको सचेत होना पड़े या डरना पड़े।"

उसने होंठों से तो कोई जवाब नहीं दिया— लेकिन एक मनमोहक मुस्कान और आँखों से ज़रूर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। फिर रास्ता अलग करके वह हास्टल के गेट की तरफ़ बढ़ गई और सचिन सीधा निकलता चला गया।

रात को जब फिर जमघट लगी तो आज की सफलता के बखान के बाद, और एक हल्का पैग हलक से उतारने के बाद वह ख़ुद ही वहां से हट गया कि अगर दिन मेें वह नार्मल निशा से परिचय तक पहुंच गया है— तो रात में भी उसे निशा के एब्नार्मल रूप में उसके सामने जाना चाहिये। इससे उसे निशा के केस को समझने में मदद भी मिलेगी और शायद वह लोगों का डर भी कुछ हद तक कम कर सके— जो रात में उसे देखे ख़ौफ खाते हैं। प्रदीप, लोकेश और बद्री उसे रोकते ही रह गये कि रात में वह कुछ और होती है और उसके लिये ख़तरा हो सकता है— लेकिन उसका कहना था कि यही धारणा तो उसे तोड़नी है और बिना रात में मिले यह टूटने से रही।

अब रात का वक़्त— अगस्त के अंतिम हफ्ते की एक स्याह रात… बारिश के उत्तरार्ध का मौसम। आकाश पर कृष्ण पक्ष का कमज़ोर सा चांद सितारों के बीच अपनी मज़बूत उपस्थिति ज़रूर दर्ज करा रहा था, लेकिन उसकी चांदनी धरा को पूरी तरह अपने आगोश में लेकर प्रकाशित कर देने में अपर्याप्त थी। सीली-सीली हवा कहीं दूर की बारिश का संदेश ला रही थी और आकाश के पूर्वी किनारे पर बादलों की जमघट भी एक इशारा दे रही थी कि वे अगर हवा संग उधर बह आये तो धरती सींचने से भी पीछे न हटेंगे।

दस बज चुके थे… गंवई आबादी देखते सन्नाटा अपने राजा होने की घोषणा करने लगा था। दूर दक्षिण-पूर्व में शहर की रोशनी की चमक आकाश पर प्रतिबिम्बित होती दिख रही थी। उस तरफ़ तो छुटपुट रोशनियों के मध्य अंधकार ने अपनी बांहें पसार रखी थीं और पश्चिमोत्तर के पार्श्व में तो स्याही से लिपटा जंगल अपनी डरावनी उपस्थिति बनाये हुए था। उस तरफ़ तो एक प्रकाश बिंदु तक न मौजूद था— मर्द जाते डरे… और सुना था कि अक्सर निशा भटकते हुए उसी ओर चली जाती थी। फिर पता नहीं कितनी रात गये लौटती थी और इस बीच चार बार वह आबादी में अपनी मौजूदगी ऐसी दर्ज करा चुकी थी कि उसके दम पर ही एक अच्छी-खासी दहशत खड़ी हो गई थी।

वैसे भी ग्रामीण आबादी देखते हुए यह वक़्त काफ़ी था, लोगों को घरों में समेट देने के लिये— फिर निशा की दहशत अब सोने पर सुहागा जैसा प्रभाव पैदा कर रही थी। जिन्हें कहीं बाहर से या शहर में चलते काम धंधे निपटा कर वापस लौटना होता था, अब वे भी दस बजे से पहले ही लौट आते थे और दस बजे के बाद आवारा कुत्तों के सिवा गलियों में कोई नज़र न आता था।

वह कुछ गलियों को पार कर के उस मैदान की तरफ़ निकल आया था, जिधर से उस जर्जर हास्टल को देखा जा सकता था, जो आबादी के पश्चिमी सिरे की तरफ़ मौजूद था और उधर आगे बस गिनती के चार घर मौजूद थे, या खेत। मैदान के किनारे अशोक के पेड़ लगे थे— उनके गिर्द गोल घेरे वाला चबूतरे बने थे, जहां कूल्हे टिका कर वह हास्टल पर नज़र बनाये रख सकता था। वहां से हास्टल के तीन तरफ़ नज़र रखी जा सकती थी और अगर अब तक वह बाहर निकल न गई होगी तो उसे वह निकलते कैच कर सकता था। सामने की तरफ़ तो वॉचमैन रहता था तो उधर से निशा के निकलने की संभावना नहीं थी। बिलकुल विपरीत दिशा में, यानि मैदान के दूसरी तरफ़ घनी बसावट थी, और हास्टल की बाउंड्री से लगे घर मौजूद थे तो उधर से बाहर निकलने की संभावना न्यूनतम थी। वह या तो पीछे खेतों की तरफ़ निकलती होगी, या इसी मैदान की तरफ़… और जहां वह खड़ा था, वहां से दोनों जगहें उसकी नज़र में थीं।

उसे यक़ीन था कि सामना होने पर वह अजीब सी मनोदशा के साथ बहकी-बहकी बात करेगी— क्योंकि तब वह अपने आप में ही नहीं होगी। ऐसी हालत में वह किस तरह के जवाब देगी, यह देखना दिलचस्प रहेगा। इससे उसे अंदाज़ा हो सकेगा कि अपनी उस दिमाग़ी हालत में वह क्या फील करती है। शायद इसी तरह कोई बंद गांठ खुले— उसके व्यक्तित्व का कोई ऐसा पेंच सामने आये, जिसने उसमें इस तरह का डिसऑर्डर पैदा किया है।
 
खड़े-खड़े घंटा बीत गया— और उसने तीन सिग्रेटें फूंक डाली, लेकिन अंधेरे में डूबी खड़ी हास्टल की इमारत की तरफ़ कोई हलचल पकड़ में न आई। सामने की तरफ़ एक मरियल सा पीला बल्ब जल रहा था और अपनी सामर्थ्य भर अंधेरे से लड़ रहा था, लेकिन साईड में या पीछे अंधेरा ही था। उसके एक पेड़ के नीचे जमने के वक़्त कुछ खिड़कियां रोशनी का पता दे रही थीं— लेकिन धीरे-धीरे वे सभी रोशनियां अंधेरे में खोती चली गई थीं और अब माहौल देखते आधी रात सरीखा माहौल हो गया था। आबादी की तरफ़ भले कुछ श्वान सक्रिय अवस्था में रात के पन्ने पर अपनी गतिविधियां दर्ज करा रहे हों लेकिन बाहरी वीराने में तो एक हलचल न थी… बस यदा-कदा कुत्तों के भौंकने का शोर ज़रूर हवा के परों पर सवार हो कर दूर तक तैर जाता था।

ग्यारह बजे उसे हलचल होती दिखी— ऐसा लगा कि हास्टल के पीछे की बाउंड्री की तरफ़ कोई साया चढ़ा और बाहर को कूदा हो और उसकी धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली।

वह साया खेतों की तरफ़ गया था… सचिन, जो तीसरी-चौथी सिग्रेट जलाने ही वाला था, उसे वापस जेब में पहुंचाते तेज़ क़दमों से उस तरफ़ बढ़ लिया। अब उस तरफ़ तो जो चार-पांच मकान थे, उनकी ओट थी, जो खेत थे, उनमें कहीं-कहीं खड़ी फसल ओट का काम कर सकती थी, पेड़ ओट बन सकते थे— लेकिन उसे तो मैदान पार करना था तो उसे दूर से कोई भी देख सकता था। वह भी देख सकती थी, जिसके चक्कर में वह जा रहा था— शायद देख भी लिया हो। वह निशा थी या नहीं— सचिन के लिये समझ पाना मुश्किल था, लेकिन उम्मीद थी कि वही होगी। वह उसे खेतों की तरफ़ जाते दिखी— लेकिन समस्या यही थी कि वह बार-बार किसी ओट में हो कर ग़ायब हो जाती और फिर कहीं और चमकती।

जब तक वह उन खेतों तक पहुंच पाया— निशा ग़ायब हो चुकी थी।

"शिट— शिट।" वह हाथ झटकता झल्लाया।

अपना प्लान उसे फेल होता लगा— अगर वह उसे पा ही नहीं पायेगा तो बात कैसे करेगा? वापसी तो पता नहीं किस तरफ़ से और कब करे— पूरी रात तो जागरण करना उसके बस का नहीं था। वह निशा को खोजने के चक्कर में खेतों में दस मिनट तक इधर-उधर हुआ, लेकिन वह न नज़र आई… और दस मिनट बाद वह नज़र आई भी तो उसी मैदान को पार करके जंगल की तरफ़ जाते, जिधर से वह ख़ुद उधर आया था। उसे समझ में ही न आया कि वह इधर से उधर कब और कैसे पहुंच गई।

लेकिन अब सोचने में समय गंवाता तो वह फिर निकल जाती… इसलिये अंधाधुंध भाग लिया। अब आगे जाते निशा के साये ने उसे पीछे आते देखा या नहीं, यह तो तय न हो सका— लेकिन जब वह आधे मैदान तक पहुंच पाया था कि वह एक पेड़ की ओट में हो कर ग़ायब हो गई। ऐसा बस इसी स्थिति में संभव था कि वह पेड़ के पीछे छुप जाये— क्योंकि उधर आगे फिर खाली जगह थी, जिसके बाद एक आयताकार बगिया थी और उसके पार जंगल। तो ग़ायब होने से पहले वह गैप पार करना पड़ता और तब वह नज़र में वापस आ जाती… लेकिन जब वह उस पेड़ के पीछे पहुंचा तो चकरा गया— क्योंकि वह वहां नहीं थी। वह कहीं नहीं थी। इतनी जल्दी न वह वहां से बगिया तक का गैप पार कर सकती थी और न नज़र में आये बग़ैर इधर-उधर के कतारबद्ध खड़े दूसरे पेड़ों तक पहुंच सकती थी।

"कहां चली गई?" वह आश्चर्य से भरा बड़बड़ाया और अंधेरे में आँखें गड़ाये इधर-उधर देखने लगा।

जब कहीं भी उसके आसार न दिखे तो वह वापस उसी चबूतरे पर आ बैठा, जहां बैठ कर इंतज़ार के लम्हे बिताये थे। वापस शर्ट की पॉकेट से सिग्रेट निकाली और उसे सुलगा कर फूंकने लगा।

"मुझे भी दो न बीड़ी।" सहसा पास ही से उभरी जनाना आवाज़ ने जैसे उसे करंट सा झटका दिया और वह उछल कर रह गया— दिल किसी नन्हीं चिड़िया के बच्चे की तरह कांप कर रह गया।

उसने उछलते हुए गर्दन मोड़ी थी, तो उसे अपने पहलू में बैठे पाया था… यक़ीन कर पाना मुश्किल था कि वह उसके इतने पास आ कर बैठ गई थी और वह इस बात को महसूस तक न कर पाया था। हां, वह निशा ही थी— उसी जींस और कुर्ते में, जिसमें उसे दिन में देखा था। कुछ भी तो नहीं बदला था— सिवा उसकी आँखों की चमक के। दिन में वे बुझी-बुझी और गुमसुम सी थीं और इस वक़्त बिल्ली की तरह चमक रही थीं। उन आँखों में झांकते कुछ पल के लिये वह जड़ सा हो गया— दिमाग़ में बद्री के उदगार गूंजने लगे।

"मुझे भी दो न… बीड़ी।" वह फिर बोली तो सचिन की चेतना पर चोट सी पड़ी और वह एक झुरझुरी सी लेता अपने आप में लौटा।

"बीड़ी नहीं है— सिग्रेट है।" उसने सिग्रेट निशा की तरफ़ बढ़ा दी, जिसने सिग्रेट पकड़ने और कश मारने में कोई समय न लिया।

"मुझे बीड़ी ही लगती है, थोड़ी खुश्बू वाली… फैफड़ों को गर्माहट तो वैसी ही देती है।"

"तुम मुझे जानती हो?" ख़ुद को संभाल पाया तो अपने उद्देश्य की तरफ़ ध्यान गया।

"हां शायद… तुम इसी जगह रहते हो और कहीं बाहर नौकरी करते हो। आजकल दो हफ्तों की छुट्टी पर घर आये हो, और नाम… शायद सचिन है।"

"अरे वाह… तुम्हें तो सब याद है, मुझे लगा कि भूल गई होगी। तुम्हें याद है कि हम पहले कहां मिले थे?"

"हम पहले कभी नहीं मिले… मुझे रंजना ने बताया था तुम्हारे बारे में। तुम्हारी शक्ल और दिलचस्पी भी बताई थी, तो मुझे लगा कि वही होगे… और कौन बेवकूफ होगा जो एक चुड़ैल के लिये रात काली करेगा। बाकी लोग तो मुझे देखे ख़ौफ खाते हैं।"

"रंजना… यह रंजना कौन है?"

"मेरी सहेली है… तुम उसी से मिले थे।"

"पर मैं तो तुमसे मिला था और तुम रंजना नहीं बल्कि निशा हो— निशा सोनकर।"

"नहीं— निशा मैं हूँ।"

"अच्छा ओके-ओके— तुम निशा हो और वह रंजना है। वैसे यह बताओ कि रात को तुम इस तरह क्यों भटकती फिरती हो… हास्टल से चोरों की तरह बाहर निकल के।"

"मुझे रात में टहलना अच्छा लगता है— खास कर चांदनी रातों में। चोरों की तरह मजबूरी में निकलना पड़ता है। वह वॉचमैन सामने से निकलने नहीं देगा। अलाउड नहीं है न किसी लड़की को इस तरह रात में निकलना… और मेरी आदत है इस तरह टहलना तो मजबूरी में ऐसे ही निकलना पड़ता है।"

"तुम्हें पता है कि लोग तुम्हारे इस तरह भटकने को किस नज़र से देखते हैं… वे तुमको कोई डायन चुड़ैल समझते हैं।"

"हां, जानती हूँ… तभी मुझसे डरते हैं। मेरे पास नहीं आते, मुझे देखते ही भाग खड़े होते हैं।"

"अब ऐसी हालत में देख के तो कोई भी डर जायेगा।"

"तुम तो नहीं डरे।"

"क्योंकि मैं तुम्हें कोई आत्मा या चुड़ैल नहीं समझता… वैसे तुम्हें डर नहीं लगता?"

"किस बात का डर?"

"जवान हो, ख़ूबसूरत हो, रात को कहीं भी पहुंच जाती हो… कोई भी आदमी पकड़ कर गिरा ले… मतलब समझ रही हो न?"

"काश।"

"क्या काश?"

"कोई मर्द गिरा ले… यही तो चाहती हूँ मैं, मुझे तो वह सब करते अच्छा लगता है… लेकिन कोई गिराता ही नहीं, उल्टा सब ख़ुद ही भाग लेते हैं और मैं तरस के रह जाती हूँ। तुम नहीं डरे, तो तुम करोगे क्या— बहुत दिन हो गये किये, अब बहुत दिल कर रहा है।" निशा ने आखिरी कश के साथ सिग्रेट परे उछाल दी और सचिन पर झुकते धुआं उसके चेहरे पर उड़ेल दिया।

"क्या… ठीक है, ठीक है लेकिन अभी नहीं। अभी तो हमारी दोस्ती हुई है… कर लेंगे कल परसों। देखो मैं तुमसे नहीं डरा, तो तुम्हें भी मुझसे दोस्तों की तरह बात करनी चाहिये। जो मैं पूछूं, वह बताना चाहिये— ताकि हम एक दूसरे पर और भरोसा कर सकें। या तुम मुझसे कुछ पूछना चाहो तो पूछ सकती हो— मैं कुछ नहीं छुपाऊंगा।"

"मुझे कुछ नहीं जानना।" उसने मुंह बनाते अरूचि जताई।

"ठीक है— लेकिन मुझे तो जानना है, तो चलो तुम्हीं बता दो।"

"क्या?"

"यह इस तरह रातों को भटकने की आदत तुम्हें कब से लगी?"

"टहलने की… मुझे याद नहीं। मम्मी बताती है कि बचपन में भी कभी-कभार मैं उठ कर रातों को टहलने लगती थी। तब इतना पता नहीं चलता था क्योंकि नींद में होती थी… फिर बड़े हो कर ख़ुद से ही अच्छा लगने लगा, रात में टहलना। फिर रात में ही लड़के और आदमी भी मिल जाते थे जो अकेली देख के गिरा लेते थे और ख़ुद भी मजा लेते थे तो मुझे भी मज़ा देते थे।"

"तुम्हें वह सब बुरा नहीं लगता— जान कर मुझे अजीब लग रहा है… शायद मैंने अब तक ऐसी लड़की देखी नहीं, जो यह खुल के एक्सेप्ट कर ले। खैर… अपने बारे में बताओ कुछ… मसलन परिवार के बारे में, दोस्तों के बारे में या अपने शौकों के बारे में। कहां से हो और यहां कब आई?"

"मेरे पापा एक सरकारी विभाग में चपरासी हैं। हम बनबसा के रहने वाले हैं तो सबसे नज़दीक यही जगह थी, जहां पढ़ने घर से बाहर भेजा जा सकता था। दोस्त कोई नहीं है— पहले कभी थीं कुछ सहेलियां, लेकिन फिर सबको लगता था कि मैं नार्मल नहीं हूँ तो उन्होंने दूरी बना ली। एक लड़का था, जिसने मुझे अपने बदन से मज़ा लेना सिखाया— लेकिन उसका एक्सीडेंट हो गया तो वह चला गया भगवान के पास।"

"और घर में कौन-कौन है?"

"मम्मी है, पापा हैं, एक छोटा भाई है और एक बड़ा भाई है।"

"कोई शौक भी रखती हो?"

"सिवा पढ़ने के और कुछ नहीं… वैसे गाने सुनना पसंद है, थोड़ी बहुत फिल्में भी देख लेती हूँ, कभी फुर्सत मिलती है तो।"

"लास्ट फिल्म कब देखी?"

"दो महीने पहले… नाम याद नहीं, आयुष्मान खुराना की थी कोई।"

"कभी तुम्हारे साथ कोई हादसा हुआ है… कुछ भी, जो नार्मल न हो, थोड़ा अलग हो और जिससे तुम बहुत डर गई हो या अपसेट हो गई हो?" अपने सबसे मुख्य सवाल पर आते उसने निशा की आँखों में देखा और वह सोच में पड़ गई।

"हां… अभी कुछ दिन पहले… यहां जब रहने आई थी, उसके दूसरे दिन ही।" वह याद करते हुए बोली।

"क्या… याद करके बताओ।"

"कालेज की एक लड़की थी— जिसे मारने की कोशिश की गई थी और ऐसा कालेज की ही किसी दूसरी लड़की ने किया था तो पुलिस ने सभी लड़कियों को रोक लिया था। वह लड़की रात तक होश में आ पाई थी— लेकिन उसका कहना था कि वह उसे धकेलने वाली लड़की की सूरत ही नहीं देख पाई थी। तो शक के दायरे में तो उस वक़्त उस जगह मौजूद सभी लड़कियां थीं, जिनमें मैं भी एक थी— लेकिन चूंकि वह किसी एक का नाम नहीं बता पाई थी तो सभी को छोड़ना पड़ा था। तब हास्टल वापस आते मुझे साढ़े दस बज गये थे। कोई सवारी भी नहीं मिली तो पैदल ही चली आई थी। थोड़ा डर भी था लेकिन लूटे जाने को तो मना ही नहीं था तो ऐसा डर भी नहीं था कि किसी की मदद लेती। सड़क तक सब ठीक था, लेकिन हास्टल की तरफ़ एकदम सन्नाटा था।

तो उधर हास्टल से पहले सड़क के इस साईड जो छप्पर वाला मकान है, उसके बाहर एक औरत बैठी रो रही थी और उसे कई कुत्ते घेरे हुए थे। मुझे अजीब लगा तो मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ, वह इस तरह क्यों रो रही है… उसने कहा कि घर में कोई बीमार पड़ा है और उसके पास दवा इलाज के नाम पर एक पैसा नहीं। मुझे उस पर तरस आया तो मैंने पूछ लिया कि क्या हुआ है उसे— तो वह मुझे घर के अंदर ले गई दिखाने, जहां कोई चादर ओढ़े पड़ा था। वहीं एक ढिबरी भी जल रही थी जिसकी रोशनी में देखा जा सकता था कि वह हिल तक नहीं रहा था। मैंने उसे हिलाया तो चादर उसके चेहरे से हट गई और मैंने देखा कि यह वही औरत थी, जो बाहर बैठा रो रही थी और वह ज़िंदा भी नहीं थी। अब जब मैंने पलट के देखा तो वहां कोई और था ही नहीं, बस बाहर कुत्ते बैठे रो रहे थे। मैं बुरी तरह डर गई— और वहां से भाग ली। बाद में कई दिन तक इस बात से अपसेट रही।"

"किसी को बताया इस बारे में?"

"हां, वार्डन मैम को भी और उन लड़कियों को भी, जो साथ रह रही थीं, लेकिन किसी ने यक़ीन ही नहीं किया। सबने मना कर दिया कि मैं यह सब बकवास किसी से न करूं… जबकि अगले दिन वाकई उस औरत की लाश मिली थी और उसे मारा गया था।"

"कहीं उन सबको यह शक तो नहीं हो गया था कि तुमने ही मारा होगा उसे?"

"नहीं… मेरी काया देखते कौन यक़ीन करता कि उसे मैं मार पाऊंगी… कितनी तगड़ी तो थी वह… बस सबको यही लगा कि मैं शायद कुत्तों को वहां रोते देख चेक करने गई होउंगी और वहां मुझे वह लाश दिखी होगी… बाकी सब मैंने अपने दिमाग़ से ही बना लिया।"

"लेकिन बाद में तो उन्होंने भी मान ही लिया होगा— आखिर जब तुम्हें कोई आत्मा या चुड़ैल मानने लगे तो फिर तो मार ही सकती थी।" बोलते वक़्त उसकी दृष्टि हास्टल की तरफ़ चली गई थी, जिसके आगे वह हादसे वाला घर होना था— उसने देखा हुआ था उस घर और औरत को, बस अभी उसका नाम नहीं याद आ रहा था… वह अकेली ही रहती थी और मजदूरी करती थी।

निशा की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया न आई तो उसने गर्दन घुमाई और उसे फिर सन्न रह जाना पड़ा। वहां कोई था ही नहीं… वह कब उसके पास से उठी और कब उठ कर वहां से हट गई— उसे ज़रा सा भी अहसास न हो सका था। फिर निशा की तरफ़ से नज़र हटाये उसे मुश्किल से सात-आठ सेकेंड हुए होंगे— इतने कम वक़्त में भला वह कैसे ग़ायब हो सकती थी, जबकि वहां से नज़दीकी पेड़ भी बीस मीटर की दूरी पर था। वह उठ कर उसे पुकारता इधर-उधर देखने लगा— लेकिन वह कहीं दिखी ही नहीं, न कहीं से प्रतिक्रिया दी। अब उसका दिमाग़ चकराने लगा… क्योंकि यह इंसानी क्षमता से बाहर की बात थी। इसका कोई सही जवाब उसके पल्ले न पड़ा कि आखिर कैसे वह इस तरह उसके पहलू में पहुंच गई थी और कैसे ग़ायब हो गई?

कुछ देर की नाकामी के बाद उसे वहां से खिसक लेते ही बना। घर वालों ने ऐसे भुतहे माहौल में देर तक घर से बाहर रहने पर क्लास ली, वह अलग मसला था— लेकिन इन्हीं बातों की वजह से देर तक सोते भी न बना और जब देर से सोया तो उठा भी तब, जब घड़ी की सुइयां ग्यारह बजा रही थीं।

निशा के छूटने के समय आज फिर वह गेट पर मौजूद था और जैसे ही वह बाहर दिखी— सचिन ने उसकी तरफ़ लपकने में देर नहीं की।

"हाय… कल तुम बिना कुछ कहे ग़ायब हो गई।"

"आप… फिर आ गये… अब फिर मुझे पैदल चलायेंगे।"

"तुम्हारी मर्ज़ी हो तो चल लो— वर्ना हम ई-रिक्शा में भी चल सकते हैं, लेकिन उसमें शायद तुम्हें ड्राईवर के सामने बात करना पसंद न आये।"

"एक बात बताइये— आप रोज़ क्या हमको यहीं भेटाएंगे और ऐसे ही पैदल चलवायेंगे?"

"हर्गिज़ नहीं… बस दो चार दिन, फिर शायद ज़रूरत न रहे। दरअसल आपकी मदद करने के बहाने मुझे भी एक केस स्टडी करने को मिल रहा है, जो मेरी नौकरी के सिलसिले में मेरे काम आ सकता है… तो बस, दो चार दिन की तकलीफ समझ कर बर्दाश्त कर लीजिये। शायद इससे आपको भी थोड़ी मदद मिल जाये।"

"चलिये… मुझे कैसे मदद मिलेगी?" उसने कौतहूल से सचिन को देखा।

"वही जो किसी साइकियाट्रिस्ट से मिल सकती थी, बस मैं दवाएं देने के लिये एलिजबल नहीं। एनी वे, आपने बताया नहीं कि कल आप बिना कुछ बोले ग़ायब हो गईं?"

"ग़ायब कहां हो गई… आपके सामने ही तो हास्टल गई थी। हां, आपकी बात का जवाब नहीं दिया था— वह इसलिये कि मैं लड़कों पर जल्दी भरोसा नहीं कर पाती। मुझे वक़्त लगता है किसी पर भरोसा करने में।"

"मेरी किस बात का जवाब नहीं दिया था आपने?" अब वह ख़ुद कन्फ्यूज्ड हुआ।

"अरे आप दोस्ती के लिये कह रहे थे न— कल दोपहर में दोस्ती की ख्वाहिश जता रहे थे और आज दोपहर तक भूल भी गये।"

"दोपहर… लेकिन मैं तो रात की बात पूछ रहा था। हम रात में मिले थे न, वह मैदान किनारे जो पेड़ खड़े हैं वहां… तब तो हममें दोस्ती भी हो गई थी। कितनी तो बातें की थी हमने, तुमने अपने बारे में काफी कुछ बताया था।" उसे यही समझ में आया कि रात की बातें शायद वह याद नहीं रख पाती।

"अरे मैं कब मिली रात को आपसे… खामखाह।" उसने नाराज़गी जताते अप्रिय स्वर में कहा— "और क्या बता दिया आपको मैंने अपने बारे में। क्या जानते हैं आप मेरे बारे में?"

अब पहले तो वह झिझका, फिर कल रात जो उसने बताया था, वह सब वापस कह सुनाया— लेकिन निशा के चेहरे से लगा नहीं कि उसे कुछ याद आ पाया हो।

"नहीं… वह सब निशा की बातें हैं, मेरी नहीं।" पूरी बात सुनने के बाद उसने इनकार में सर हिलाया।

"और तुम रंजना हो?"

"हां— यह भी उसने बताया होगा।"

"ज़ाहिर है… तो मतलब मुझे तुम्हारे बारे में कुछ नहीं पता। ठीक है… तो ऐसा करो, कि थोड़ा तुम भी अपने बारे में बताओ न कुछ… वही सब बातें, जो निशा ने बताईं।" सचिन समझने वाले भाव से सर हिलाता हुआ बोला— यह उसे स्पिलिट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का केस लगा, जहां वह निशा और रंजना के रूप में दोहरा जीवन जी रही थी।

"मैं… मैं तो अल्मोड़ा की हूँ, वहीं मेरे माता-पिता हुआ करते थे। मैं वहीं पली-बढ़ी और पढ़ाई भी की। मेरे तीन भाई-बहन और थे लेकिन मैं सबसे बड़ी थी तो जल्दी ही जवान हो गई थी।"

"जल्दी जवान हो गई थी मतलब… यह जल्दी कैसे जवान होते हैं?"
 
Back
Top