• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror आसुरी शक्तियां

सावरी

यह कहानी सौमित्र बनर्जी की आत्मकथा के रूप में लिखा एक ऐसा दस्तावेज है, जो अंत में एक रोमांचक मोड़ के साथ जब अपनी परिणति पर पहुंचता है तो इस कहानी के उस मुख्य पात्र को यह पता चल पाता है कि रियलिटी में वह अपने कमरे के अंदर अपने बेड पर सोता ही रहा था, लेकिन एक वर्चुअल दुनिया में उसने एक ऐसे रहस्यमयी शख़्स सौमित्र बनर्जी के जीवन के बारे में सबकुछ जान लिया था— जो एक अभिशप्त जीवन को जीते हुए उसी के ज़रिये अपने जीवन से मुक्ति पाता है।

कहानी में जो भी है, वह भले एक आभासी दुनिया में चलता है लेकिन कुछ अहम किरदारों का गुज़रा हुआ अतीत है— जिसमें क़दम-क़दम पर रहस्य और रोमांच की भरपूर डोज मौजूद है। सभी कैरेक्टर अपनी जगह होते तो वास्तविक हैं लेकिन वे रियलिटी में रहने के बजाय दिमाग़ के अंदर क्रियेट की गई एक वर्चुअल दुनिया में रहते हैं, जहां उनकी शक्तियां एक तरह से असीमित होती हैं।

यह एक ऐसे मैट्रिक्स की कहानी है, जो बाहर की हकीक़ी दुनिया में नहीं चलता, बल्कि दिमाग़ के अंदर बनाई गई ऐसी दुनिया में चलता है— जहां कहानी के मुख्य ताकतवर पात्र दूसरे किरदारों को उनकी मर्ज़ी के खिलाफ अपनी उस दुनिया में खींच लेते हैं, जहां वे उनके साथ रोमांस भी कर सकते हैं और उन्हें शारीरिक चोट भी पहुंचा सकते हैं। यहां तक कि वे उनकी जान भी ले सकते हैं।

अंग्रेज़ दम्पति के यहां पलते सौमित्र बनर्जी को उसके बीसवें बर्थडे की पार्टी कर के घर लौटने के दौरान एक रहस्मयी लड़की सावरी मिलती है, जो उसे उसके जन्म की हकीक़त बताती है। वह उसे उसके पिता के बारे में बताती है और खास उस दिन के लिये उसके पिता की तरफ़ से सुरक्षित की गयी डायरी तक उसे पहुंचाने में मदद करती है— जो उसके पिता सौमिक बनर्जी ने उसके लिये छोड़ी थी।

डायरी से उसे अपने पिता की हकीक़त पता चलती है कि वह कलकत्ते के एक रसूखदार परिवार से सम्बंधित था लेकिन अपने ऊलजलूल शौक के चलते परिवार से अलग हो गया था। उसने असम के अंदरूनी जंगलों में पाई जाने वाली एक मायावी शक्ति अगाशी को साधने में अपना जीवन ही दांव पर लगा दिया था और अपनी उस कोशिश के पीछे इस हाल में पहुंच गया था कि अब न ज़िंदों में ही रहा था न मुर्दों में।

उसके साथ अतीत में कुछ उसी के जैसे जुनूनी और काली शक्तियों को साधने के शौकीन लोगों ने, अगाशी को साधने की दिशा में एक ज़रूरी शक्ति पाने की गरज से अफ्रीका के गहरे अंधेरे जंगलों की यात्रा की थी, और उन आदमखोर आदिवासियों से वह ताक़त पाने की कोशिश में सौमिक बनर्जी के सिवा उसके सारे यात्री एक सहरअंगेज़ तजुर्बे के साथ मारे गये थे— लेकिन सौमिक वह ताक़त पाने में फिर भी कामयाब रहा था और अकेला ज़िंदा वापस लौटा था।

इसके बाद उसने असम के जंगलों की यात्रा की थी लेकिन वहां अगाशी की सत्ता चलती थी, जो वास्तविक दुनिया में कहीं थी ही नहीं। वह हज़ारों साल पहले मर चुकी एक ऐसी राजकुमारी थी जो एक अलग ही आयाम में रहती थी। उसके पास उन निशाचरों की एक बेहद खतरनाक सेना थी— जो उसके लिये लगातार शिकार लाते थे। वे सब शिकार इंसानों के ब्लड और फ्लेश पर पलते थे और इससे ही ताक़त हासिल करते थे और इसी तरह से वे ख़ुद को अमर बनाये हुए थे।

सौमिक उनसे लड़ने जाता है, अगाशी को साधने जाता है ताकि उसकी बेशुमार शक्तियां और अमरत्व हासिल कर सके… उसकी भरपूर कोशिश के बाद भी उसकी लड़ाई आधे-अधूरे में खत्म होती है। उसे अगाशी की शक्तियां तो नहीं मिलतीं, न ही अगाशी बाकी शिकारों की तरह उसे कंज्यूम कर पाती है— लेकिन उसे वह अमरत्व ज़रूर मिल जाता है, जो उसका एक लक्ष्य था… लेकिन उस अमरत्व के अभिशाप को जब सौमिक झेलता है तो उसे मुक्ति की ख्वाहिश पैदा हो जाती है और इसी ख्वाहिश के चलते उसने संयोग से पैदा हुए बेटे को अपने जीवन के अनुभवों से भरी डायरी के साथ कलकत्ते में सुरक्षित करता है।

अब वह वक़्त आ चुका था, जहां उसके बेटे सौमित्र को पिता का अधूरा काम पूरा करना था और अगाशी पर विजय हासिल करनी थी— और इसीलिये उसे अब असम के उन जंगलों में बुलाया जा रहा था। सावरी उसके पिता के दूत के तौर पर उसे बुलाने आई थी— लेकिन यह पूरा सच नहीं था। वह ख़ुद को इस तरह जाने के लिये तैयार नहीं कर पाता लेकिन रवानगी का वक़्त आने तक वह जैसे किसी जादू से तैयार हो जाता है— उसे अहसास नहीं हो पाता कि उसकी रवानगी में भी उसकी अपनी इच्छा का कोई रोल नहीं था बल्कि उसे कहीं और से तैयार किया गया था।

जब वह इस सफर पर निकलता है तब मलिंग के रूप में एक नये कैरेक्टर की एंट्री होती है, जो अपने चेलों के साथ उसे अपने सपनों में खींच लेता है और उसे मारने की कोशिश करता है। क़दम-क़दम पर उसकी तरफ़ से मिलती चुनौतियों के बीच सावरी लगातार उसकी मदद करती है और इन कोशिशों के अंजाम में उसे ख़ुद को साधने-संवारने के वह दुर्लभ मौके मिलते हैं कि वह अपने आप को अगाशी से मुकाबले के लिये तैयार कर पाता है।

अब असम के सफर पर आखिर किसने तैयार किया था उसे यूं अपनी ज़िंदगी दांव पर लगाने को? सावरी अगर वह नहीं थी, जो ख़ुद को जता रही थी तो फिर और कौन थी? और सौमित्र को अपने साथ ले जाने के पीछे उसका क्या मकसद था? मलिंग कौन था और भला वह सौमित्र की जान के पीछे क्यों पड़ा था? जो अगाशी वास्तविक दुनिया में थी ही नहीं, उसे जीतना भला कैसे संभव था? जहां वह थी, वहां बस उसी की मर्ज़ी चलती थी, वह उसी की बनाई आभासी दुनिया होती थी, जहां वह दूसरे वास्तविक दुनिया के लोगों को खींच कर कंज्यूम कर लेती थी— भला ऐसी शक्ति से कोई इंसान कैसे पार पा सकता था? सौमित्र के इस सफर का अंजाम क्या हुआ? क्या वह अगाशी जैसी ताक़त का सामना कर सका?
 
डेढ़ सयानी

डेढ़ सयानी— कहानी है एक ऐसी मजलूम लड़की एना की, जिसे करोड़ों की प्रापर्टी की मालकिन होने का अभिशाप तब से भुगतना पड़ा था जब उसने ठीक से होश भी नहीं संभाला था। हर तरह ज़ोर-ज़ुल्म और शोषण झेलते वह इस तरह बड़ी हुई थी कि कोई आत्मविश्वास और आत्मसम्मान उसमें बाकी न बचे और वह पिता की इच्छाओं के नाम पर एक कठपुतली जैसा जीवन गुज़ारती रहे... लेकिन फिर भी उसने बग़ावत की थी और हालात को अपने हिसाब से बदलने की कोशिश की थी।

अपनी तकदीर को बदलने और संवारने के लिये उसने डेविड नामी उस मस्तमौला मुंबईया छोकरे का सहारा लिया था जिसकी जिंदगी ही तीन पिलर्स पर टिकी थी... कुदरत से बेपनाह प्यार और अंतहीन यायावरी, दुनिया भर की औरतों को भोगने की अदम्य ख्वाहिश और दुनिया के हर अपराधी को उसके अंजाम तक पहुंचाने की सनक— जिसके चलते उसकी ज़िंदगी में हमेशा अनिश्चितता और हंगामा बना रहता था और उसे इस बात से कोई शिकायत नहीं थी।

लेकिन दोनों को जिस वागले से छीन कर यह आज़ादी हासिल करनी थी— वह न सिर्फ एक रसूख और पैसे वाला शख़्स था, बल्कि अपराधिक मनोवृत्ति वाला, हर तरह के अपराधों से लिप्त एक दबंग शख़्स भी था जिसके पॉलिटिकल कनेक्शंस भी ऐसे थे कि सरकार भी उस पर सीधे हाथ डालने से कतराती थी। जाहिर है कि ऐसे शख्स से अपनी आजादी हासिल कर पाना न एना के लिये आसान था और उससे पार पा पाना डेविड के लिये ही आसान था... मगर जब ठान लिया था तो करना ही था— आखिर उसकी रूह को तस्कीन देने वाली तीनों वजहें एक साथ वहां मौजूद थीं... गोवा का मनमोहक सौंदर्य, एना, एली और जीनिआ जैसी हसीनाओं का सान्निध्य और वागले के रूप में एक ऐसा सशक्त अपराधी, जो उसका भरपूर इम्तिहान लेने वाला था।

अब चूंकि #क्राइम_फिक्शन के हैशटैग के अंतर्गत लोकप्रिय साहित्य के पैटर्न पर कुछ खास किरदारों के साथ सीरीज की कहानियां भी प्रकाशित होनी हैं, तो 'डेढ़ सयानी' से जिस किरादर की शुरुआत होती है, थोड़ा परिचय उससे भी कर लिया जाना चाहिये। यह मुंबई में पला बढ़ा एक हैंडसम हंक डेविड के० फ्रांसिस है, जिसके पिता योरोपियन थे तो माँ महाराष्ट्रियन। एक रोड एक्सीडेंट में दोनों जान गंवा चुके हैं तो घर में कोई रोक-टोक करने वाला नहीं है। पिता के अच्छे-खासे बिजनेस को ठिकाने लगा कर पैसा इधर-उधर इस तरह से इनवेस्ट कर दिया है कि सालाना करोड़ से ऊपर रिटर्न मिलता रहे तो कमाई की कोई टेंशन नहीं— और बिना किसी बाधा या ज़िम्मेदारी के, इत्मीनान से अपने शौक पूरे कर सकता है।

अब शौक क्या हैं— बचपन से जासूसी किताबों और फिल्मों का ऐसा शौक लगा है कि ख़ुद को जेम्स बांड से कम नहीं समझता और उसी पैटर्न पर अपने जीवन को गुज़ारना चाहता है। उसका खब्त है कि वह अपने जीवनकाल में ज्यादा से ज्यादा अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचा दे। दूसरा शौक़ है लड़की का, एक नंबर का ठरकी है और दुनिया के हर हिस्से में पाई जाने वाली, हर नस्ल और वर्ग की लड़की को एक ही जीवन में भोग लेना चाहता है। तीसरा शौक है यायावरी का— पीछे कोई ज़िम्मेदारी नहीं तो क़दम एक जगह नहीं थमते, दुनिया के चप्पे-चप्पे को देख लेना चाहता है और सौंदर्यबोध ऐसा था कि वर्स्ट से वर्स्ट लोकेशन में भी एक अप्रतिम सौंदर्य को खोज लेता था।

अब क़ुदरत भी उसका साथ निभाने में पीछे नहीं थी— उसके मिज़ाज को देखते जैसे उसके क़दम जहां कहीं भी पड़ते थे, उसे किसी न किसी हसीन दोशेजा के दामन में समेट कर एक अदद लफड़ा अदा कर दिया जाता था और उसके भूखे मन को वह गिज़ा मयस्सर हो जाती थी, जिसका वह हमेशा से ख्वाहा था और वह उसी में रम जाता था। डेविड फ्रांसिस सीरीज के कथानकों में यह सभी तत्व अनिवार्य रूप से मिलेंगे।

वन मिसिंग डे

कभी-कभी इंसान के साथ यह हादसा भी हो जाता है कि किसी झटके या चोट से उसकी मेमोरी का एक छोटा सा हिस्सा ही ग़ायब हो जाये और मुश्किल यह हो कि उसी हिस्से में कुछ बहुत महत्वपूर्ण राज़ दफन हो गये हों। ऐसा ही एक हादसा समीर के साथ होता है जब वह पूरा एक दिन ही भूल जाता है और उस दिन की उसकी गतिविधियां भी कम हंगामाखेज नहीं थीं।

उसकी जान के पीछे ऐसे लोग पड़ गये थे जो उसकी औकात से ही बाहर के लोग थे और उसके लिये वह सारे अजनबी लोग थे... उनका जो सबसे अहम सवाल था, वह भी उसके लिये एक अबूझ पहेली था जिसका कोई जवाब उसके पास नहीं था और उसकी अज्ञानता उसके बड़े अहित का कारण बन रही थी।

उसके पास सिवा इसके कोई चारा नहीं था कि वह किसी तरह हर जानने वाले से उस भूले हुए दिन की बिखरी-बिखरी बातें इकट्ठा कर के उनकी एक सिक्वेंस बनाये और उस अहम पल को खोजने की कोशिश करे जिसमें सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब छुपा था... लेकिन क्या यह आसान था?

उसकी दिमाग़ी हालत से वह लोग तो अनजान थे, जिन्हें उससे अपने किसी सामान की रिकवरी करनी थी और समीर की अपनी कोशिशों में वह हर जगह अड़ंगा लगाने की कोशिश कर रहे थे, जिससे उसका काम मुश्किल से मुश्किल होता जा रहा था। उसे उन लोगों से अपनी जान भी बचानी थी और उस खोये हुए दिन से वह राज़ भी खोज निकालना था जो उसकी जान का बवाल बना हुआ था।
 
आतशीं

यह एक महागाथा है इंसान और जिन्नात के बीच बनी उस कहानी की, जो जाहिरी तौर पर आपको अलग और अनकनेक्टेड लग सकती है, लेकिन हकीक़त में दोनों के ही सिरे आपस में जुड़े हुए हैं। इंसान की बैकग्राउंड पख्तूनख्वा की है, जहां आप पख्तून पठानों की सामाजिक संरचना के साथ उनके आपसी संघर्ष और जिन्नातों के साथ उनके इंटरेक्शन के बारे में पढ़ेंगे और जिन्नातों की बैकग्राउंड पश्चिमी पाकिस्तान से लेकर तुर्कमेनिस्तान, सीरिया और ओमान के बीच रेगिस्तानी और सब्ज़ मगर बियाबान इलाकों में बसी उनकी चार अलग-अलग सल्तनतों की हैं, जो कभी एक बड़ा साम्राज्य थीं।

पख्तूनों के बारे में मोटा-मोटी जानकारी यह है कि इनके सरबानी, ग़रग़श्त, ख़रलानी और बैतानी नाम के चार गुट होते हैं और हर गुट के 18 से 38 तक कबीले और उपकबीले होते हैं। मौखिक परंपरा के हिसाब से समस्त पख्तूनों के मूल पिता कैस अब्दुल रशीद के चार बेटों के नाम से बने कबीलों से यह गुट वजूद में आये, जिनमें आगे चल कर ढेरों शाखायें बनीं। इनमें ज़मन (बेटे), ईमासी (पोते), ख़्वासी (पर पोते), ख़्वादी (पर-पर पोते) के रूप में परिवार बनता है जिसे कहोल कहा जाता है। कई कहोल आपस में मिल कर एक प्लारीना बनाते हैं और कई प्लारीना मिलने से एक खेल बनता है और कई खेल का समूह त्ताहर यानि एक कबीला बनता है। यह जानने की ज़रूरत इसलिये है कि कहानी में इन बातों का ज़िक्र आ सकता है।

कहानी के केंद्र में इन्हीं के बीच के सदाज़ोई, हमार, आफरीदी, ख़सूर कबीलों से सम्बंधित बग़रात, माहेपोरा, कांवाबील, शाहेलार नाम की जागीरों वाले चार परिवार हैं जो अलग-अलग चारों गुट से हैं और स्वात, अपर-लोअर दीर के बीच बसे हैं... और उनके बीच भी ज़बरदस्त अंतर्विरोध है, जहां जान ले लेना एक मामूली बात समझी जाती है और औरत जीतने लायक चीज़ समझी जाती है, जिससे अपना वक़ार (सम्मान) बढ़ाया जा सकता है।

ठीक इनकी तरह ही जिन्नातों की भी भले अलग-अलग छोटी-छोटी ढेरों आबादियां हैं जिन्हें मिला कर अतीत में ग्रेटर अल्तूनिया नाम की एक सल्तनत खड़ी की गई थी, जो एक कर्स (श्राप) के चलते रखआन, अरामिन, पंजशीर और क़ज़ार नाम की चार अलग-अलग टैरेट्रीज में बंट गई। अब हर टैरेट्री न सिर्फ आंतरिक संघर्षों में उलझी हुई है बल्कि चारों आपस में भी जूझ रही हैं। अब जिन्नातों के बारे में भी मोटा-मोटा जान लीजिये कि यह होते क्या हैं और इनकी संरचना कैसी होती है।

किंवदंतियों के अनुसार यह इंसानों से अलग एक एंटिटी होती है जो यूं तो इंसानों से अलग बियाबानों में रहती है, और ज्यादातर इबादत में रत् रहती है। इनकी ज़िंदगी, मौत और पारिवारिक संरचना भी हमारे जैसी हो सकती है। कहा जाता है कि इंसान ही मरने के एक से आठ हज़ार साल बाद जिन्न बन जाता है और एक अलग आयाम में वास करता है जो यूं तो हमारे साथ ही एग्जिस्ट करता है लेकिन हम उसे नहीं देख पाते। हालांकि इनके बहुत से लोग हमारे बीच इंसानी शक्लों में ही रहते हैं, लेकिन हम उन्हें नहीं जान पाते।

मूलतः यह चार कैटेगरी के होते हैं, जिनमें मुख्य प्रजाति इफरित होती है, यह जिन्न ठीक इंसानी तर्ज की सामाजिक संरचना रखते हैं और जिन्नातों से सम्बंधित जो भी कहानियां सुनी जाती हैं, वे इफरित जिन्नातों की ही होती हैं और प्रस्तुत कहानी में भी जो मूल जिन्नात हैं वे इसी कैटेगरी के हैं। इनके सिवा एक मरीद प्रजाति होती है... यह बड़े ताक़तवर और ख़तरनाक होते हैं, हवा में उड़ सकते हैं और इन्हें पानी के पास पाया जा सकता है। इनकी अवधारणा कुछ-कुछ पौराणिक यक्ष के जैसी ही है। इनके सिवा एक प्रजाति सिला भी होती है, इस प्रजाति में सिर्फ जिनी यानि महिला जिन्नात ही होती हैं। यह बेहद ख़ूबसूरत और आकर्षक होती हैं, उतनी ही बुद्धिमान भी... इन्हें यक्षिणी के सिमिलर रखा जा सकता है। जिन्नातों की चौथी मुख्य प्रजाति घूल होती है। यह गोश्तखोर और ख़तरनाक होते हैं और कब्रिस्तानों के आसपास पाये जाते हैं... आप तुलनात्मक रूप से इन्हें पिशाच समझ सकते हैं।

यह पूरा कांसेप्ट अरेबिक है और इस्लामिक मान्यताओं से जुड़ा है, इसके सच झूठ होने पर बहस हो सकती है, इसे अंधविश्वास भी कहा जा सकता है, लेकिन कहानी लिखने का उद्देश्य शुद्ध रूप से मनोरंजन होता है और प्रस्तुत कहानी भी ठीक इसी उद्देश्य से लिखी गई है। तो अगर आप तार्किकता और साइंटिफिक फैक्ट्स को साईड में रख कर मात्र मनोरंजन के उद्देश्य से कहानी को पढ़ेंगे, तो ही सही मायने में इसका आनंद ले पायेंगे।

इस कहानी के मूल में तीन प्रेम कहानियां हैं और उससे जुड़ा एक व्यापक संघर्ष है जिसकी जड़ में एक कर्स (श्राप) है। एक प्रेम कहानी वह है जो दो इंसानों के बीच है... एक प्रेम कहानी वह है जो दो जिन्नातों के बीच है और एक प्रेम कहानी वह है जिसमें एक इंसान और एक जिन्नात है... असली खेल इसी कहानी में है, क्योंकि यह एक ऐसी पेशेनगोई (भविष्यवाणी) पर टिकी है जिसके हिसाब से इन दो अलग-अलग दुनियाओं में चलता भीषण संघर्ष इसी की वजह से अपने अंजाम तक पहुंच कर खत्म होना था।

कहानी की बैकग्राउंड उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी है, जो पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक फैली है, और टाईमलाईन है जब अमेरिकी फौजों ने अफगानिस्तान छोड़ दिया था और देश के हर इलाके पर तालिबान का कब्ज़ा होता जा रहा था। स्वात, अफगान सीमा से लगा वह इलाका था, जहां तहरीक-ए-तालिबान के कई अलग-अलग गुट सक्रिय थे और पाकिस्तान आर्मी के साथ उनका लगातार संघर्ष होता रहता था। हालांकि इस इलाके में हावी टीटीपी वाले ही रहते हैं और फौज को अक्सर पीछे हटना पड़ता है। यह ग्रुप्स अफगानिस्तान वाले तालिबानियों से अलग होते हैं, और न सिर्फ इनके बीच आपस में झड़पें होती रहती हैं, बल्कि अफगानिस्तान वाले तालिबानियों से भी इनका संघर्ष चलता रहता है।

कहानी में इस्लामिक बैकग्राउंड के चलते उर्दू के शब्दों का भी अच्छा खासा प्रयोग किया जायेगा लेकिन कठिन शब्दों के हिंदी अर्थ ब्रैकेट में लिख दिये जायेंगे। कहानी का शीर्षक है आतशीं, जिसका अर्थ होता है आग से बना... दरअसल यह शब्द जिन्नात को रिप्रजेंट करता है, जिनके लिये कहा जाता है कि वे बिना धुएं की आग से बने होते हैं। अब चूंकि कहानी का मूल सब्जेक्ट यही प्रजाति है तो इसे दरशाने के लिये ही शीर्षक आतशीं दिया है।
 
बुत-ए-अस्वा

'बुत-ए-अस्वा' की कहानी वहां से शुरु होती है जहां से 'आतशीं' की कहानी ख़त्म हुई थी। पिछले भाग में आपने पढ़ा कि तीन अलग-अलग किरदार किस तरह अपनी प्रेम कहानियों को जीते हुए आगे बढ़ रहे थे—

'आतशीं' की कहानी शुरु हुई थी सफीर से, जो एक आर्मी कानवाय पर हुए हमले में फंस जाता है और अपनी भूतपूर्व प्रेमिका को उठा कर ले जाते देख अपहरणकर्ताओं के पीछे लग जाता है, लेकिन ख़ुद उनकी क़ैद में फंस जाता है और तब उसे चलता है कि उठाई गई लड़की रिमशा नहीं बल्कि उसकी दुश्मन जागीर की लड़की इल्मा थी, जो ख़ुद को सोशल मीडिया पर छुपा कर उसी से मुहब्बत करती थी। दोनों को अफगानिस्तान के सरहदी इलाके में ले जाया जाता है, जहां से उन्हें भागने का मौका तो मिलता है लेकिन इल्मा वापस पकड़ी जाती है और उसे पंजशीर में मौजूद एक तालिबान कमांडर ज़रगाम के पास बतौर रिश्वत भेज दिया जाता है। किसी समझौते की बिना पर सफीर को आज़ादी मिलती है लेकिन अब उसे इल्मा की मुहब्बत समझ में आ चुकी थी तो वह उसके कज़िन ओवैश के साथ उसे छुड़ाने पंजशीर जाता है और ज़रगाम के ठिकाने पर पहुंच भी जाता है।

'आतशीं' की दूसरी कहानी थी रय्यान की, जो उसी हमले से बचने के चक्कर में भटक कर एक जिन्नात लड़की गज़ल तक पहुंच जाता है और गज़ल से उसकी शादी करा दी जाती है। तब उसे पता चलता है कि यह पहले से तय था और हुकूमत पर काबिज़ ज़ालिम शाह आलम के पंजों से पंजशीर को छुड़ाने के लिये उसे ही कमान संभालनी थी। शाह आलम पहले उन दोनों को क़ैद करता है, लेकिन वे निकल भागते हैं तो वह गज़ल के पिता को क़ैद कर लेता है और अपने हत्यारे उनके पीछे लगा देता है। एक मायावी बाग़ में वे उन अजीब से मायावी बौनों का सामना करने के बाद उस जगह से निकल कर आगे बढ़ते हैं।

'आतशीं' की तीसरी कहानी उस जिन्नातों की सल्तनत के निर्वासित शहजादे आर्यन की थी, जो अपनी ही एक छिन चुकी रियासत की शहजादी मनाल के इश्क में उस तक पहुंचता है लेकिन पकड़ा जाता है। तब आज़ादी की शर्त पर उसे जिन्नातों के एक पवित्र शहर भेजा जाता है, जहां उसे शहजादी कज़ीमा को ज़हर देने के इल्जाम में फंसा दिया जाता है और उसे मनाल को बंधक बना कर वहां से भागना पड़ता है। रास्ते में वह एक घूल ओमार के हत्थे चढ़ जाते हैं जो उसके पिता ग़जावी और उसके खास साथी नज़ार से बदला लेना चाहता था और वह उन्हें बंधक बना कर अपनी सल्तनत वापस लेने की गरज से वहां पहुंचता है, जहां नज़ार को क़ैद रखा गया था।

बुत-ए-अस्वा में कहानी इससे आगे बढ़ती है... एक रहस्मयी बुत था, जो आकार-प्रकार के हिसाब से जाने किस तरह के जीव को रिप्रजेंट करता था, जिसे लेकर उस तक पहुंचे इंसानों का यह भी मत था कि वह कोई एलियन ऑब्जेक्ट हो सकता है— लेकिन उसमें यह कूवत थी कि वह की गई इच्छाएं पूरी कर सकता था और यह उसी का दिया वरदान था कि ग्रेटर अल्तूनिया नाम का वह जिन्नातों का विशाल साम्राज्य खड़ा हो पाया था… और उसी का यह श्राप भी था कि वह विशाल साम्राज्य आपसी संघर्ष में उलझ कर धीरे-धीरे खत्म हो रहा था।

एक तरफ वे जिन्नातों की हुकूमतें आपस में एक दूसरे के खून की प्यासी होकर लड़ मरने पर आमादा थीं और उनके बीच शाह आलम के रूप में वह ताक़तवर हस्ती उभर रही थी जो वापस उस बिखरी हुई सल्तनत को एक करके अपना परचम लहराना चाहता था— तो उसे रोकने के लिये इंसान और जिन्नात के बीच बनता वह गठबंधन भी अपना वजूद पा रहा था, जो स्वात की हरियाली से होते अफगानिस्तान के सहरा तक मिलती चुनौतियों से पार पाते हुए वहां पहुंच रहा था, जहां से सुधार की दिशा में एक अंतिम रास्ता जाता था— अतीत के उन दौर में, जहां से इस बिगाड़ की शुरुआत हुई थी।

उन पांच लोगों पर ही दारोमदार था, उस बुत से जुड़े श्राप को खत्म करने का और न सिर्फ उस साम्राज्य की खोई हुई खुशहाली वापस लाने का, बल्कि साथ ही उन्हें वर्तमान के उस बिगाड़ को भी दुरुस्त करना था, जो सीधे उनकी ज़िंदगी को प्रभावित कर रहा था और इस श्राप को खत्म करने के लिये उन्हें वक़्त में सदियों पीछे का सफर तय करना था— वे करते भी हैं… लेकिन वहां दूसरी मुसीबतें उनके इंतज़ार में तैयार बैठी थीं। क्या वे अपने मक़सद में कामयाब हो पायेंगे?

द ब्लडी कैसल

ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिये टेन मिलियन डॉलर की ईनामी रकम वाला एक रियलिटी शो 'द ब्लडी कैसल' लांच होता है जो हॉरर थीम पर होता है। यह शो सेशेल्स के एक निजी प्रापर्टी वाले हॉगर्ड आइलैंड पर आयोजित होता है जहां हांटेड प्लेस के तौर पर मशहूर किंग्समैन कैसल में कंटेस्टेंट्स को सात दिन और सात रातें गुजारनी होती है और जो भी कंटेस्टेंट सबसे बेहतर ढंग से सामने आने वाली हर चुनौती से लड़ेगा, उस हिसाब से उसे वोट मिलेंगे... सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विनर होगा।

'द ब्लडी कैसल' टीम, कैसल या आइलैंड के डरावने माहौल के सिवा भी अपनी तरफ से विज्ञान और तकनीक के इस्तेमाल के साथ उन्हें डराने की हर मुमकिन कोशिश करेगी कि उनकी हिम्मत का सख़्त इम्तिहान लिया जा सके। उनके हर पल को रिकार्ड करने के लिये कैसल समेत न सिर्फ़ पूरे आइलैंड पर बेशुमार कैमरे होंगे, बल्कि ड्रोन कैमरों की मदद भी ली जायेगी और उनकी सांसों पर भी कान बनाये रखने के लिये उनके गलों में एडवांस किस्म के रेडियो कॉलर पहनाये जायेंगे। उन कंटेस्टेंट्स से टीम कोई भी डायरेक्ट संवाद नहीं करेगी, न ही उन्हें किसी तरह की मदद उपलब्ध कराई जायेगी। कंटेस्टेंट्स को यह सात दिन अपने ढंग से बिताने के लिये पूरी छूट होगी और वे चाहें तो रेप और मर्डर तक कर सकते हैं।

शो के पहले सीजन के लिये भारत के अलग-अलग शहरों से आठ लोग चुने जाते हैं जो अलग-अलग फील्ड से थे। दिखने में यही लगता है कि उनका सलेक्शन रैंडमली हुआ है और वे सभी एक दूसरे से एकदम अनकनेक्टेड लोग थे। सारे नियम समझाने के बाद उन्हें आइलैंड पर पहुंचा दिया जाता है और उनका सफ़र शुरू होता है। उन्हें पहले दिन तो यह एक रियलिटी शो ही लगता है, जहां दिन से लेकर रात तक उन्हें डराने की हल्की-फुल्की कोशिश होती है... लेकिन अगले दिन से ही वे कनफ्यूज होने लगते हैं कि यह वाकई कोई शो था और उन्हें डराने वाली सारी कोशिशें मैनमेड एफर्ट्स थीं।

तीसरे दिन से वे वाक़ई डरना शुरू कर देते हैं और उन्हें अहसास होता है कि दरअसल वहां वाकई पैरानार्मल एक्टिविटीज हो रही थीं और 'द बल्डी कैसल' टीम का कैसल की बुरी शक्तियों से एक समझौता हुआ था। शो के नाम पर उनका शिकार बनाया जा रहा था और एंटरटेनमेंट के नाम पर उनकी दुर्दशा को बेचा जा रहा था। उन्हें यह भी अहसास होता है कि वे रैंडमली नहीं चुने गये, बल्कि उन्हें टार्गेट किया गया है और उनसे किसी तरह का बदला लेने के लिये यहां लाया गया है। वे भले दिखने में एक दूसरे से एकदम असम्बंधित हों, मगर अतीत में उनके बीच कोई ऐसा कॉमन पाप घटित हुआ है जिससे वे सब जुड़े हुए हैं और शो का आर्गेनाइज़र उसी पाप का शिकार हुआ है जो अब इतने यूनीक तरीके से उनसे बदला ले रहा है।

तीसरी रात जब एक कंटेस्टेंट की जान चली जाती है, तब उन्हें अपनी बातों पर यक़ीन हो जाता है कि वे सब यहां मरने के लिये छोड़े गये हैं। तब वे दिन भर आपस में चर्चा करते शाम को इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि आखिर वह कौन सा पाप था जिसके तार उन सबसे जुड़े हुए थे और तब उन्हें वह शख़्स नज़र आता है जिसके बदले का शिकार वे हो रहे थे। उन्हें यक़ीन हो जाता है कि वह जगह वाक़ई हांटेड थी और बदले के नाम पर उन्हें वहां मारने ही लाया गया था। उनकी तकलीफ, उनके संघर्ष और उनकी मौत को रिकार्ड करके शो के नाम पर पूरी दुनिया में बेचा जा रहा था। वे जिंदगी से नाउम्मीद हो जाते हैं, लेकिन उस जगह से निकलने या टीबीसी टीम से लड़ने की उनकी हर कोशिश नाकाम हो जाती है।

उनकी हर अगली रात कयामत साबित होती है और लगातार खौफ से जूझते सातवें दिन तक उनमें कई लोग मारे जाते हैं, लेकिन उनमें से किसी की भी जान सीधे शो वालों ने नहीं ली थी, बल्कि वे सभी अपनी ही वजहों से मारे गये थे... अब यहाँ सवाल उठता है कि क्या वाकई ऐसा ही था— जैसा उन्हें दिख रहा था, या फिर इस सारे तमाशे की जड़ में कुछ और था? क्या वाक़ई यह शो फेयर था या अपने किस्म का अनोखा बदला, जहां कोई अपने दुश्मनों को इस तरह खत्म भी कर रहा था और उन मौतों को करोड़ों में बेच भी रहा था? क्या था 'द ब्लडी कैसल' का सच?

वो लड़की भोली भाली सी

"वो लड़की भोली भाली सी" नाम सुन कर रोमांटिक कहानी लगती है, लेकिन ऐसा है नहीं... यह कहानी यूं तो थ्रिल, रोमांच और सस्पेंस से भरी है, लेकिन चूंकि पूरी कहानी एक ऐसी लड़की पर है जिसकी जिंदगी कहानी के दौरान एक सौ अस्सी डिग्री चेंज होती है, तो बस उसी बदलाव को इंगित करते हुए शीर्षक दिया गया है— वो लड़की भोली भाली सी। शुरुआत तो उसके भोलेपन और उसके शोषण से ही होती है लेकिन फिर मज़बूत होने के साथ वह बदलती चली जाती है।

अब कहानी चूंकि थोड़ी कांपलीकेटेड है तो शुरु करने से पहले सभी पाठकों के लिये कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है, जिससे आपको सभी सिरों को समझने में मदद मिलेगी।

सबसे पहली और मुख्य चीज़ यह है कि यह कहानी वेब सीरीज के परपज से लिखी गई है, तो इसके दृश्यों की सिक्वेंस भी उसी तरह से रखी गई है... हालांकि लिखने में नॉवल का फार्मेट ही इस्तेमाल किया गया है न कि स्क्रीनप्ले का, लेकिन फिर भी आपके लिये यह जानना ज़रूरी है कि कहानी कहने का तरीका क्या है, इसी से आप अलग-अलग टाईमलाईन में चलते दृश्यों को ठीक से समझ पायेंगे।

मूलतः कहानी तीन अलग-अलग टाईमलाईन में चलती है जिसमें दो हिस्से एकदम अनकनेक्टेड लग सकते हैं लेकिन ऐसा है नहीं और कहानी के अलग-अलग सभी सिरे कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए ही हैं। हर टाईमलाईन के साथ तारीख मेंशन की गई है, जिस पर पढ़ते वक़्त आपको खास ध्यान रखना है, अन्यथा आप बुरी तरह कनफ्यूज्ड हो जायेंगे।

अगर कहानी के मुख्य पात्रों की बात की जाये तो कहानी के केंद्र में एक फीमेल पात्र है, जिसके कई रूप हैं और कई नाम हैं, एक से ज्यादा शेड है। विकास अहलावत नाम का एक पुलिस इंस्पेक्टर है, जिसकी अपनी जिंदगी बीवी और उसके आशिक के बीच बुरी तरह उलझी हुई है, लेकिन प्रोफेशनली उसे एक ऐसे मर्डर केस को सॉल्व करना है— जिसमें बंद घर में मकतूल के आसपास मौजूद पाये गये लोगों में कोई भी अपराधी नहीं साबित होता और न उनसे हत्यारे तक पहुंचने में कोई मदद ही मिलती है।

एक क्राईम वर्ल्ड से रिलेटेड शख़्स संदीप चौरसिया है जिसके अतीत में बड़े पेंच हैं। आतिफ, अनिर्बान, सुनील और माधुरी नाम के किरायेदार हैं, और सलीम, दयाल और माया नाम के मेहमान— जिनकी मौजूदगी मगर बेखबरी में मकान मालकिन की हत्या हुई। एक तरफ़ कहानी वर्तमान से अतीत की तरफ़ जाती है, तो दूसरी तरफ़ अतीत से वर्तमान की तरफ़ आती है और इन दोनों ही टाईमलाईन में आगे-पीछे होते हुए ऐसे ही ढेरों कैरेक्टर्स अवतरित होते रहते हैं।

चूंकि कहानी वेब सीरीज के परपज से शुद्ध मनोरंजन के लिये लिखी गई है तो इसके किरदार रियलिस्टिक वर्ल्ड से जैसे के तैसे लिये गये हैं, उनसे बहुत ज्यादा नैतिकता की अपेक्षा न रखियेगा, वे देवता तुल्य नायक या देवी तुल्य नायिका की बाउंड्री से बाहर हैं और ज्यादातर किरदार ग्रे शेड के हैं। दूसरे, कहानी में कोई मैसेज नहीं है कि उसके नाम पर इसे जस्टीफाई किया जाये। बस मनोरंजन परोसने के नजरिये से लिखी गई कहानी है— तो इसे इसी उद्देश्य तक सीमित समझिये।

कहानी दो लाख से ऊपर वर्ड्स की है, इसे एक भाग में समेटना ठीक नहीं था, तो इसके दो पार्ट्स कर दिये हैं और कहानी का दूसरा पार्ट 'वो लड़की सयानी सी' भी इसी कहानी के साथ पब्लिश की गई है, ताकि पाठक को इंतज़ार न करना पड़े और वह एक साथ पूरी कहानी का आनंद ले सके।

वो लड़की सयानी सी

यह कहानी उस सिलसिले को आगे बढ़ाती है जो 'वो लड़की भोली भाली सी' से शुरु हुआ था और अपने अंजाम तक पहुंचती है। सुहाना या संदीप के अतीत में जो कुछ भी हुआ था, वह धीरे-धीरे विकास की इन्क्वायरी के ज़रिये सामने आता रहता है। उन दोनों की ज़िंदगी में ढेरों पेंच थे, ढेरों उलझनें थीं और उनमें सबा को उन सबसे डील करते हुए, एक सरकारी मिशन के तहत अपनी एक जगह बनानी थी— और जिसके लिये वह हर स्तर तक जाती है।

पिछले भाग में जहां कहानी तीन अलग टाईमलाईन में चली थी, वहीं इस भाग में कहानी दो अलग टाईमलाईन में चलती है और जहां सबा के सफ़र के साथ अतीत का एक कालखंड सामने आता रहता है, जहां वह शोषण से भरे बचपन से उबरते हुए एक ताक़तवर संगठन में घुसपैठ करती है और धीरे-धीरे शीर्ष तक पहुंचती है, जहां पहुंच कर उसे फिर एक मौका मिलता है, एक नये अवतार को ग्रहण करने का… वहीं वर्तमान में विकास की खोजबीन के साथ उस अतीत के उलझे हुए सिरे धीरे-धीरे खुलते रहते हैं और एक बिखरी-बिखरी सी कहानी परिपूर्णता लेते हुए सामने आती है।

उस गुमशुदा अतीत में कुछ ऐसा था, जिसने गोवा को अपने मज़बूत पंजों में जकड़े बादेस से मुक्ति तो दिला दी थी, लेकिन अपना वक़्त लेकर, संभलने के बाद वह फिर से खड़े होने की कोशिश करती है और उसके बचे हुए बागी सिपहसालारों को फिर उसके झंडे के नीचे आना पड़ता है। उसी गुमशुदा अतीत में एक बहुत बड़ी रकम भी गुम हुई थी, जिसका कोई पता ठिकाना नहीं था और अब जैसे वह सारे लोग उसी की तलाश में थे— जो उसके बारे में जानते थे। वे उस रकम के लिये किसी भी हद से गुज़रने को तैयार थे।

जो गोवा में होता है, वही अंतिम मोड़ पर दिल्ली में होता है और अतीत में आपस में असम्बंधित रहे विकास, टोनी, बब्बू, माया और आरज़ू सब एक दूसरे के सामने प्रतिद्वंदी के तौर पर आ खड़े होते हैं— जहां ख़ुद सर्वाईव करने के लिये दूसरे को खत्म करना ज़रूरी हो जाता है। अब सवाल यह था कि उस अंतिम दौर में कौन मरता है और कौन बचता है?

लिलिथियंस

कुछ अजीब सा नाम है न? समझना भी मुश्किल है कि इसका क्या मतलब हो सकता है और उस मतलब का इस कहानी से क्या ताल्लुक हो सकता है। चलिये, कहानी शुरु करने से पहले इस नाम को और इसके संदर्भ को समझ लेते हैं, ताकि आगे कहानी समझने में आसानी हो। इसके लिये हमें अब्राहमिक धर्मों के मूल कांसेप्ट में जा कर एक किरदार को जानना होगा, जिसका नाम लिलिथ है।

हममें से अधिकांश लोग शायद लिलिथ नाम के उस कैरेक्टर से परिचित न हों, जो मूल बाईबिल के हिसाब से आदम के साथ बनाई गई संसार की पहली नारी थी, लेकिन जो मर्द के नीचे नहीं, बल्कि ऊपर रहना चाहती थी और बजाय मर्द के अपना डॉमिनेंस चाहती थी। उसे एडम के डॉमिनेंस में रहना मंजूर नहीं था, और वह एडम को स्वर्ग में छोड़ पृथ्वी पर भाग आती है— जिसके बाद यहुवा एडम की पसली से ही ईव का सृजन करता है ताकि प्रतीकात्मक रूप से यह स्थापित हो सके कि नारी, नर से बनी है और नर के लिये बनी है, जिससे आगे चल कर मर्द की सत्ता को स्वीकारने में उसे कोई बाधा न आये। सारा संसार इस ईव को बाईबिल के हिसाब से ही पहली औरत मानता है।

लेकिन जैसा कि रिवाज़ है कि इस संसार में जहां हर तरह के लोग हैं— तो उस लिलिथ में विश्वास रखने वाले भी लोग हैं, फिर भले लिलिथ को ऐविल पॉवर या शैतान की संज्ञा क्यों न दी गई हो। जब दुनिया में सीधे शैतान को पूजने वाले समुदाय हो सकते हैं तो लिलिथ के वे उपासक भी हो सकते हैं, जो मानते हैं कि एक दिन लिलिथ अंधेरों से निकल कर आयेगी और सारे संसार पर हुकूमत करेगी। ऐसी ही मान्यता में विश्वास रखने वाले, और उसे देवी की तरह पूजने वाले एक कल्ट का नाम है "लिलिथियंस", जो इस कहानी के केंद्र में है। इस कल्ट के लोग एक मिशन पर हैं और पूरी कहानी उसी मिशन से जुड़े संघर्ष को उकेरती है।

इन लिलिथियंस की कमान संसार के कुछ ऐसे ताक़तवर लोगों के हाथ में है, जिन्हें सामान्यतः इलुमिनाती से जोड़ा जाता है और वे दुनिया के लगभग हर बड़े फैसले में शामिल रहते हैं। उनकी इस दुनिया और इस सृष्टि को लेकर अपनी ही एक अलग थ्योरी है, जिसके अकार्डिंग वे एक ऐसे समझौते से बंधे हैं, जिसके चलते उन्हें पूरी दुनिया के माहौल में किसी न किसी तरह उथल-पुथल मचाये रखनी है, जिससे उस हायर बीईंग को एनर्जी मिलती है, जो फीड करती है लोगों के लालच, डर, नफरत, क्रोध, खून-खराबे और मौतों से— और बदले में इस वर्ग को नवाज़ती है बेशुमार पैसे और ताक़त से। इस थ्योरी के हिसाब से हमारी औकात एक बैक्टीरिया भर की है और हम उस हायर बीईंग के शरीर में वैसे ही वास करते हैं, जैसे हमारे ख़ुद के शरीर में बैक्टीरिया और वायरस अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।

उस हायर बीईंग के साथ हुए उस समझौते के अनुसार उन्हें हर कुछ सालों में ऐसा कुछ करना है, जिसके चलते पूरी दुनिया प्रभावित हो, बड़े पैमाने पर केआस फैले, खास कर योरप के उन इलाकों में, जहां लोगों को अमूमन किसी तरह के संघर्ष से नहीं जूझना पड़ता है, बल्कि हैप्पीनेस इंडेक्स में जो अग्रणी रहते हैं और उस हायर बीईंग के हिसाब से वे उसके लिये सबसे ज्यादा यूज़लेस देश और लोग हैं। युद्ध या कोई बड़ा संक्रमण, कुछ भी उन्हें इस इलाके में चाहिये ही चाहिये और यह सब एक के बाद एक होता है और इसी कोशिश में एक संक्रमण कोरोना की तरह ही बेलगाम हो कर पूरे योरप को निगलना शुरु कर देता है— अब सवाल यह भी है कि पूरी तरह फैल कर भी यह बस योरप तक ही सीमित रहेगा या कोरोना की तरह ही पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा?

इस कहानी के केंद्र में सिर्फ लिलिथियंस ही नहीं हैं, बल्कि भारत के एक अमीर घराने में जन्मे दो भारतीय युवक आरव और अहान भी हैं, जो अनजाने में ही इस जानलेवा चक्कर में उलझते चले जाते हैं। वे दोनों भाई थे और जहां आरव पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद और पर्सनैलिटी के हिसाब से एक स्टार किड था, वहीं आरव एक कलात्मक रूचि वाला एवरेज शख़्स, जो अपने भाई की स्टार पर्सनैलिटी के हिसाब के नीचे दब के कहीं खो कर रह गया था और इस चीज़ ने उसमें एक हीनता पैदा कर दी थी, जिसकी वजह से उसके व्यक्तित्व में आई नकारात्मकता ने उसे घर वालों से और दूर कर दिया था।

आरव के लिये तो सबकुछ मयस्सर था, एक बढ़िया नौकरी के सिलसिले में वह स्वीडन जाता है और स्वीडन से ही उसकी ज़िंदगी में उथल-पुथल शुरु हो जाती है, जो उसे फिनलैंड ले जाती है, जहां आखिरकार वह ग़ायब हो जाता है और जब अरसे तक उसकी कोई ख़बर नहीं मिलती और उसकी वजह से माँ-बाप हलकान हो जाते हैं, तब न चाहते हुए भी अहान अपने भाई को वापस लाने की ज़िम्मेदारी अपने सर लेता है और निकल पड़ता है अपने उस भाई की खोज में, जिसने स्वीडन से फिनलैंड तक अपने पीछे ढेरों निशान छोड़े थे— जिन्हें ट्रेस करते अहान को धीरे-धीरे, टुकड़ों में पता चलता है कि उसके भाई के साथ क्या हुआ था और वह कहाँ-कहाँ से गुज़रा था।

इस खोज में जो उसके साथ होते हैं, वह उन्हें नहीं जानता, लेकिन उनकी मदद उसे बराबर मिलती रहती है— हालांकि वह यह ठीक से समझ भी नहीं पाता कि वे दोस्तों में थे या दुश्मनों में… और धीरे-धीरे चलते उसकी खोज के इस सफ़र का जहां अंत होता है— वहां से एक नये काल की शुरुआत हो रही थी, जो आगे पूरी दुनिया को हदसाने वाला था। अब सवाल यह है कि आरव के साथ आखिर क्या हुआ था, और वह कहां खो गया था? अहान उसकी तलाश में निकला तो था, लेकिन क्या वह उसके जीतेजी उससे मिल भी पाता है? क्या अंत होता है उसकी खोज का और कैसी शुरुआत थी उस अंत से जुड़ी जो आगे पूरी दुनिया के लिये आफत बनने वाली थी?

फेक कपल

आसिफ और अरीबा— कहानी के दो मुख्य किरदार, जो एक दूसरे से अजनबी थे, जो एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे और जिनके मिज़ाज और आदतें ज्यादातर एक दूसरे से अपोजिट थे… उनकी ज़िंदगी में एक मोड़ आता है जब उन्हें मुंबई जैसे महानगर में सिर्फ रहने की ग़रज से एक मनपसंद ठिकाना पाने के लिये आपस में एक समझौता करना पड़ता है— रहने की शर्त के मुताबिक ख़ुद को मियां-बीवी बताने का, दिखाने का, और ज़रूरत पड़े तो इस रिश्ते को साबित करने का।

लेकिन क्या यह कैसे भी आसान था? जब वे एक दूसरे से इतने अलग थे, उनके काम अलग थे, उनके सपने, उनके गोल अलग थे और उनके मिज़ाज अलग थे। कई मौकों पर उनके बीच झगड़ने तक की नौबत आ जाती— लेकिन यह झगड़े भी उन्हें हकीक़ी मियां-बीवी ही साबित करते। शायद ऐसे ही तो होते हैं असलियत के पति-पत्नी— एक दूसरे से अलग, मगर एक दूसरे के साथ निभाने की जद्दोजहद करते। वे असल में जितने अलग दिखने की कोशिश करते थे— उतने ही वे एक लगते थे।

दोनों की आर्थिक स्थिति भी अलग थी— आसिफ जहां एक निम्न वर्गीय परिवार से था, जिस पर इतनी ज़िम्मेदारियां लदी हुई थीं कि वह ख़ुद के बारे में सोचना ही भूल गया था, ख़ुद की जरूरतों को दरकिनार कर दिया था और एक लंबे अरसे से अच्छा बेटा और अच्छा भाई होने की जैसे अंतहीन जद्दोजहद में उलझा हुआ था— वहीं अरीबा एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती, एक अच्छे खाते-पीते मगर ऑर्थोडॉक्स टाईप घराने से ताल्लुक रखती थी, जहां लड़की होने का मतलब ज़रूरत भर पढ़ाई, फिर शादी और चूल्हे-चौके के इर्द-गिर्द सिमटी, पति की सेवा और बच्चों की परवरिश भर होता था और वह इस सोच के ही खिलाफ थी, और अपने घर-खानदान में सबसे अलग कुछ कर दिखाने के ख़ब्त से भरी थी।

किसी और के लिये शायद ऐसी सोच को ख़ब्त कहना ठीक न होता लेकिन अरीबा के लिये यही शब्द ठीक था… जो वह करना चाहती थी, वह उनके लिये भी नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता है जिन्हें फैमिली सपोर्ट मिलता है तो उसके लिये तो लगभग नामुमकिन ही था, जिसे बस एक साल का वक़्त और ज़रूरत भर पैसे दिये गये थे ख़ुद को साबित करने के— और वह भी कई शर्तो के साथ। उन शर्तों में एक शर्त वह भी थी, जिसे निभाने की मजबूरी में उसे आसिफ के साथ शादीशुदा होने का दिखावा करते, रहने के लिये वह जगह हासिल करनी पड़ रही थी जो उसके घर वालों के दिये क्राइटेरिया पर खरी उतरती थी। बात सिर्फ दो-चार दिन की होती तो भी आई-गई हो जाती लेकिन उसे तो एक अजनबी मर्द के साथ बाकायदा लंबे वक़्त तक रहना था— बतौर बीवी।

फिर यह कहां आसान था कि एक बेडरूम को शेयर करते, उन दोनों की भावनायें एक दूसरे के लिये अछूती रहतीं? दो अजनबियों का यूं साथ-साथ रहना, एक कमरे में रहना, कब तक उन्हें एक दूसरे से दूर रखता— वह भी ऐसी हालत में जब उनका कहीं और कोई कमिटमेंट भी न हो। यह तो आग और पेट्रोल के आसपास रह कर भी अप्रभावित रहने वाली बात होती, जो मुमकिन ही नहीं थी— न उनके लिये ही बहुत दूर तक और बहुत देर तक एक दूसरे के आकर्षण से मुक्त रह पाना मुमकिन था… लेकिन एक दूसरे की आग में जलने में भी कम अड़चनें कहाँ थीं?

ज़िंदगी ऐसे ही थोड़े सबकुछ आपको दे देती है, जो आपको चाहिये होता है— बल्कि हर अहम हासिल के बदले सख़्त इम्तिहान लेती है। अक्सर लोग नाकाम रहते हैं इन इम्तिहानों में— और अक्सर कामयाब भी होते हैं। उन दोनों की किस्मत में क्या था? नाकामी या कामयाबी? मिलना या बिछड़ना? यह जानने के लिये तो आपको इस हसीन सफ़र पर उनके साथ चलना होगा— उनके साथ जीना होगा। उनके हर तजुर्बे और हर अहसास में हिस्सेदारी करनी होगी, जहां बहुतेरी बातें आपके मन को गुदगुदायेंगी तो बहुतेरी बातें आपको क्षणिक तनाव भी देंगी।

फिर कहानी में इन दो किरदारों की ही ज़िंदगी नहीं उकेरी गई है, बल्कि और भी कई किरदार हैं, जिनके पास अपने तल्ख या खुशगवार तजुर्बे हैं, अपने किस्से हैं, जो कभी मुस्कुराने की वजह देते हैं तो कभी आँख नम करने की ताक़त भी रखते हैं। हर किरदार, जो इस कहानी का हिस्सा है— अपनी जगह अहम है। तो आइये, शुरू करते हैं इन सब किरदारों के साथ एक हसीन सफ़र।

इश्क़ अनलिमिटेड

'इश्क़ अनलिमिटेड' एक ऐसा कहानी संग्रह है जो रोमांस में डूबी दस कहानियों को अपने आप में समेटे है। कुछ कहानियां मुकम्मल हुए इश्क़ की दास्तान कहती हैं, तो कुछ ऐसी हैं जो अधूरी रह गई मुहब्बत के साथ मन में एक कसक छोड़ जाती हैं।

पहली कहानी 'इश्क़ दोबारा' बिछड़ने के बाईस साल बाद एक शादी में वापस टकराये एक कपल की कहानी है, जो उस इत्तेफाक पर अपना अतीत याद करते उसी दौर को जीने लगते हैं। दूसरी कहानी 'संय्या बेईमान', प्रेमिका द्वारा छोड़े गये ऐसे युवक की कहानी है, जो ख़ुद को साबित करने के लिये ग़लत रास्ता अख्तियार कर लेता है और उस पथ पर हर लड़की उसके लिये शिकार हो जाती है।

इस संग्रह की तीसरी कहानी है 'सात दिन का इश्क़', जो बताती है कि सपने देखने वाले प्रेमियों का जब विपरीत सच्चाई से सामना होता है तो कैसे उनका प्यार हवा हो जाता है और वे अलग रास्तों पर बढ़ जाते हैं। चौथी कहानी 'प्रेम में पड़ी लड़की' मोबाईल गेम के सहारे एक लड़के के चक्कर में पड़ गई लड़की की कहानी है, जो अपने प्रेमी के पास पहुंचने के लिये घर से भाग निकलती है, लेकिन उस तक पहुंचने से पहले ही उसकी ज़िंदगी में एक अलग रास्ते की गुंजाइश बन जाती है।

पांचवी कहानी है 'वह पहला सा इश्क़', जो एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसे कच्ची उम्र से ही एक लड़की से प्यार हो गया था और इत्तेफाक से पांच साल बाद वह उसे एक ऐसे सफ़र पर टकरा जाती है, जहां ख़राब हालात के चलते दोनों को एक जगह रुकना पड़ता है। छठी कहानी 'तुम वह तो नहीं' उस साहित्यप्रेमी युवक की दास्तान है, जिसे एक खास लम्हे में एक लड़की से प्यार हो जाता है और उसे पाने के लिये वह नैतिक-अनैतिक सभी रास्ते अख्तियार करता है, लेकिन जब हासिल कर पाता है तो पता चलता है कि वह लम्हा ही मात्र एक भ्रम था, जिसके भरोसे उसका इश्क़ टिका हुआ था।

इस कहानी संग्रह की सातवीं कहानी 'लिखे जो खत तुझे' उस 'पेन लवर' की कहानी है जो एक लेखक के शब्दों से ही प्रभावित हो उसे दिल दे बैठती है और हर हफ्ते उसे एक चिट्ठी लिखती है, लेकिन अंततः उसे यह भान होता है कि वह एक भ्रम में थी। आठवीं कहानी 'कसक' बिछड़ गये उस इश्क़ का फसाना है जहां जातिवाद से जकड़े समाज में मिल पाना मुमकिन ही नहीं था— लेकिन बिछड़ने के बाद भी प्रेमी न अपनी मुहब्बत भूलता है और न ही अपना फ़र्ज।

'बंसी वाला इश्क़' इस संग्रह की नवीं कहानी है जो सिर्फ बांसुरी की धुन सुन कर बांसुरी वाले के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की दास्तान है, जो एक बार इस इश्क़ में पड़ने के बाद फिर इस इश्क़ से उबर ही नहीं पाती। 'ऑनलाइन इश्क़' सिर्फ सोशल मीडिया के सहारे पनपी वह प्रेम कहानी है जहां एक मोड़ पर पहुंच कर लड़का एक भ्रम का शिकार हो कर अलग रास्ता पकड़ लेता है मगर लड़की वहीं टिकी रह जाती है और वहीं ख़त्म हो जाती है।

कहानी जंक्शन

वस्तुतः "कहानी जंक्शन" एक कहानी संग्रह है, जहां अलग-अलग सात कहानियों को आकार दिया गया है। इस कहानी संग्रह में सभी सात कहानियां किसी न किसी सामाजिक मुद्दे से जुड़ी हैं और सभी अंधेरे और अवसाद की स्थिति से निकाल कर रोशनी की ओर ले जाती हैं और एक उम्मीद की किरण जगाती हैं। यह मुद्दे हमारे आसपास के है, हमारे जानने वालों के हैं, हमारे घरों के हैं। जब पढ़ेंगे तो हर कहानी से आपको कोई जानी-पहचानी सी गंध आयेगी।

संग्रह की पहली कहानी 'बाग़ी लड़कियां’ है, जो दो ऐसी लड़कियों के अपने संघर्ष की दास्तान है, जिन्हें अपने आसपास सदियों से पनपता आ रहा पुरुष वर्चस्ववाद स्वीकार नहीं था। जो किसी मर्द के साये से इतर अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व, अपनी एक अलग पहचान गढ़ना चाहती थीं। अपने हर फैसले के पीछे उन्हें अपने ही लोगों का विरोध झेलना पड़ता है, लेकिन हर बाधा को पार करते वे आगे बढ़ती जाती हैं— मगर एक मकाम वह भी आता है, जहां सबकुछ अचीव कर लेने के बाद उन्हें अपने भविष्य को लेकर कोई ठोस निर्णय लेना था और वे फिर एक ऐसा निर्णय लेती हैं, जो उन्हें फिर सबके निशाने पर लाने वाला था।

दूसरी कहानी ‘अधूरी’ समाज में अपनी पहचान को लेकर जूझती एक लड़की की है, जिसमें एक अधूरापन मौजूद था और जिसकी वजह से वह एक सामान्य जीवन कभी नहीं जी पाती और उसे क़दम-क़दम पर उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। उसे एक उम्मीद दिखती भी है तो एक ऐसे आवारा लड़के में, जो अपने शौक और अपनी हरकतों को लेकर न सिर्फ ज़माने भर में बदनाम था, बल्कि जिसका कोई भविष्य भी नहीं था— लेकिन उसे यक़ीन था कि दुनिया में वही एक ऐसा इंसान है जो उसकी कमी को लेकर कभी उससे नफरत नहीं करेगा, कभी उसका तिरस्कार नहीं करेगा।

संग्रह की तीसरी कहानी है ‘उजले जीवन की स्याह सांझ’… यह एलीट वर्ग के उस एकाकीपन को रेखांकित करती है, जिससे अक्सर स्टेटस के पीछे पगलाए छोटे शहरों के अमीर लोगों को जूझना पड़ता है, जब उनके बच्चे तो एक कामयाब ज़िंदगी जीते किसी मेट्रो सिटी या विदेश में सेटल हो जाते हैं और उनके हिस्से जीवन के संध्याकाल में एकाकीपन आता है। यह कहानी ऐसे ही एकाकीपन के अभिशाप को भोगते एक ऐसे इंसान की है, जो अपनी नियति को बदलने की ठान लेता है और बचे हुए निरर्थक जीवन को गौरवपूर्ण ढंग से खत्म करने के लिये एक अलग ही रास्ता अख्तियार करता है।

‘अंधेरे से उजाले की ओर’ इस संग्रह की चौथी कहानी है, जो अपनी अपंगता के चलते निराशा और अवसाद में घिरे और पल-पल ख़ुद को खत्म करते, एक शख़्स के अंदर आने वाले उस बदलाव को दरशाती है— जिसकी ज़िंदगी में, अपनी ज़रूरत के मद्देनज़र, एक झूठ के सहारे घुसपैठ करने वाली लड़की ने ऐसी हलचल मचाई थी कि उसे अपने नकारात्मक विचारों से निकल कर दुनिया को सकारात्मक ढंग से जीने के लिये एक सही रास्ता मिल गया था और सही मायने में वह अपनी अपंगता को स्वीकार करके उसके साथ खुशी-खुशी जीना सीख पाया था।

‘कनेक्शन’ इस संग्रह की पांचवी कहानी है… यह कनेक्शन है इंटरनेट के सहारे जुड़े दो अजनबियों के बीच का, जो अपनी-अपनी जगह एक खालीपन से भरी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। वे उस ज़िंदगी को ठीक से स्वीकार नहीं कर पाते, उन्हें दस शिकायतें भी रहती हैं, लेकिन उनमें उसे बदलने का हौसला भी नहीं है, और वे बस ऐसे ही उसे जीते चले जाना चाहते हैं— लेकिन उनके बीच बने कनेक्शन से उन्हें अपने दर्द के साझा होने का अहसास होता है, एक दूसरे से थोड़ी प्रेरणा मिलती है उन्हें और ज़िंदगी में थोड़ा रस महसूस होता है। वे आखिर तक यह फिर भी तय नहीं कर पाते कि उनके इस जुड़ाव का भविष्य क्या है।

इस संग्रह की छठी कहानी है ‘मधुरिमा’, जो पचास साल की एक ऐसी औरत की कहानी है जिसने अपनी ज़िंदगी में बड़े दुख झेले थे, बड़ा संघर्ष किया था और हर मुश्किल से जूझते हुए अपनी सभी जिम्मेदारियां निभाने में कामयाब रही थी, लेकिन उन जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद अब वह अपनी ज़िंदगी को फिर से जीना चाहती है, अपनी दबी हुई अधूरी इच्छाओं को पूरा करना चाहती है, उन सपनों को अमली जामा पहनाना चाहती है जो उसने कभी देखे थे, और इसके लिये वह अकेली ही घर से निकल खड़ी होती है।

संग्रह की सातवीं और आखिरी कहानी है ‘मज़हबी कुफ्र’… वस्तुतः यह रूपकों के सहारे कही गई कथा है, जिसके ज़रिये एक संदेश देने की कोशिश की गई है कि असल में धर्म क्या है, इसका सार क्या है, इसे किस तरह लेना चाहिये और एक इंसान के तौर पर कैसा आचरण होना चाहिये— जो धर्म के सकारात्मक पहलू को दुनिया के सामने रखे, न कि उसे दूसरों की नज़र में एक नकारात्मक विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करे।डार्क टूरिज्म
 
वरुण ने एक गहरी सांस लेकर छोड़ते हुए बाकी चारों को देखा और फिर शाहज़ैन पर नज़र टिका दी— जो इस प्लान का अगुआ था।

"हम ठीक तो कर रहे हैं गाईज़— कहीं ऐसा न हो कि हमारी यह जुर्रत हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल बन जाये।" उसने बारी-बारी सबको देखा।

"इतने नर्वस क्यों हो रहे हो यार— पूरी दुनिया में डार्क टूरिज्म का चलन बढ़ रहा है, हर साल सितंबर से नवंबर तक हज़ारों लोग टूरिज्म के लिये ऐसी जगहों पर पहुंचते हैं जिन्हें हांटेड माना जाता है और एक्सपीरियेंस करते हैं कुछ पैरानार्मल एक्टिविटीज को।" शाहज़ैन ने उसका कंधा थपकते हुए कहा।

"वह भी ओरिजनल नहीं होती— उस जगह की व्यवस्था संभालने वाली कंपनी या टीम की होती है और जो कुछ ट्रिक्स और सिम्युलेशन की मदद से वह सब क्रियेट करती हैं जिन्हें लोग पैरानार्मल एक्टिविटीज समझ लेते हैं।" माहिरा ने समर्थन पाने वाली निगाहों से शाहज़ैन की तरफ़ देखा— जो उसका ब्वॉयफ्रेंड था।

"एग्जेक्टली— इतना क्यों डरना वरुण?"

वरुण ने नोमी और सिद्धार्थ की तरफ़ देखा लेकिन दोनों ने लापरवाही से कंधे उचका दिये। वह दोनों भी कपल थे और बस वरुण ही था जो अकेला था। उसका हालिया ब्रेकअप हुआ था और वह उससे उबरने की कोशिश में था। शाहज़ैन और सिद्धार्थ उसके टीममेट थे, जो खास इसी वजह से इस प्लान के लिये आगे बढ़े थे कि वे योरप की किसी दूर-दराज की जगह पर मौजूद किसी हांटेड टूरिस्ट डेस्टिनेशन पर चलें और तीन दिन का स्टे लेकर कुछ अलग फील करें— इससे सबका ध्यान बंटेगा और वरुण को भी उबरने में मदद मिलेगी… शाहज़ैन और सिद्धार्थ ने अपनी गर्लफ्रेंड्स नोमी और माहिरा को भी इस प्लान में शामिल कर लिया था।

वे लंदन में रहने वाले प्रवासी थे, वरुण जहां भारत से था, तो शाहज़ैन पाकिस्तान से और सिद्धार्थ बांग्लादेश से— जबकि शाहज़ैन की गर्लफ्रेंड माहिरा भी पाकिस्तानी मूल की थी, लेकिन नोमी एक भारतीय पिता और ब्रिटिश माँ की संतान थी। वे तीनों दोस्त थे और एक टीम थे— उनके साथ जुड़ने वाली लड़कियां अक्सर बदलती रहती थीं, लेकिन उनका याराना बना रहता था… अब वरुण का हालिया ब्रेकअप हुआ था, जिससे उबरने की कोशिश में उसने कुछ दिन के लिये लंदन से हटने की इच्छा जताई तो शाहज़ैन और सिद्धार्थ ने पहली बार डार्क टूरिज्म का प्लान बना लिया। कोई बहुत चुन कर उन्होंने इस जगह का चयन नहीं किया था— बस ऐसे ही डार्क टूरिज्म के बारे में पढ़ते हुए इस जगह के बारे में जाना और नीदरलैंड चले आये।

यह जगह ज़्वोले के पास ही मौजूद हूनहार्स्ट नामी कस्बे के उत्तर में स्थित एक छोटी सी बस्ती थी— जहां बस थोड़े-बहुत किसान ही रहते थे। इसी जगह एक फार्म हाऊस था, जिसे लेकर कई कहानियां प्रचलित थीं और स्थानीय निवासी उसे प्रेतबाधित मानते थे। अंतिम घटना कोई साल भर पहले हुई थी— लेकिन हांटेड डेस्टिनेशन के तौर पर उसे अब तक इस्तेमाल नहीं किया गया और संभवतः वे उस जगह के पहले ही ऐसे गेस्ट थे।

यह जगह किसी गेरिट वेसर के अधिकार में थी और डार्क टूरिज्म के नाम पर हाल ही में इसे उसी की तरफ़ से लिस्ट कराया गया था।

पास से गुज़रते एक युवक से गेरिट का पता पूछ कर पांचों उस तरफ़ बढ़ने लगे, जिधर बस्ती के सबसे पायेदार बाशिंदे का निवास लगता था। कम से कम उस लॉन वाले घर की हालत तो यही बताती थी। गेट पर वॉचमैन जैसा तो कोई नहीं था, लेकिन डोर बेल पुश करते ही एक युवक अंदर से निकल कर सामने आ खड़ा हुआ था। चूंकि उस फार्म हाऊस की ऑनलाइन बुकिंग उन्होंने कराई हुई थी तो अपना परिचय देते ही उस युवक ने उन्हें अंदर बुला कर ऑफिस जैसे दिखते बाहरी कमरे में बिठा दिया और ख़ुद मिस्टर गेरिट को बुलाने चला गया।

"अच्छी-भली ख़ूबसूरत सी तो जगह है… मुझे यहां कहीं हांटेड जैसा तो कुछ नहीं लगता।" शाहज़ैन ने वरुण को देखते हुए कहा।

"वाकई में— भुतहा जगह के रूप में हम जो इमेजिन करते हैं, वैसा यहां कुछ नहीं दिख रहा। कहीं खामखाह ही तो नहीं हम एडवेंचर के चक्कर में यहां चले आये… चार्ज भी कम नहीं हैं इनके। इतने में हम एम्स्टर्डम में भी तीन दिन गुज़ार सकते थे।" सिद्धार्थ ने भी आशंका जताई।

"हो सकता है कि कुछ हल्की-फुल्की पैरानार्मल एक्टिविटीज हुई हों कभी, जिनका फायदा उठाने के लिये गेरिट ने इसे डार्क टूरिज्म के तौर पर प्रचारित करना शुरु किया हो— जबकि असल में ऐसा कुछ हो ही न।" नोमी ने भी दोनों की बात से सहमति जताई।

"गाईज़… पहले हमें वह जगह देख तो लेनी चाहिये। हम पहले से ही सोचे डाल रहे कि वहां डराने वाला कुछ नहीं होगा। वरुण भी बेचारा सोचेगा कि पहले लड़की चोट दे गई, अब हांटेड डेस्टिनेशन भी चोट दे गया। कोई न वरुण… अच्छी खुली जगह है, भूत-प्रेत न हुए तो भी वक़्त अच्छा ही गुज़रेगा।" माहिरा ने पास बैठे वरुण की जांघ पर हाथ मारा।

"सच कहूं तो यह इन दोनों का आइडिया था… किसी भुतही जगह पिकनिक मनाने का ख़्याल मुझे कभी नहीं आने वाला था। मैं तो कहता हूँ कि न ही हो वहां कुछ तो ठीक है… जगह थोड़ी महंगी ज़रूर है, लेकिन है तो अच्छी ही। बस एक दिक्कत है।" वरुण ने अपने मन की बताई।

"और वह क्या?" लगभग सभी ने पूछा।

"इन दोनों को सेक्स की भी सुविधा है।" उसने दो टूक कह दिया— पहले तो चारों ने उसे घूरा, फिर उनकी हंसी छूट गई।

लेकिन इससे पहले कि इस बात का कुछ जवाब दिया जाता, वहां मिस्टर गेरिट आ गये। वे एक पचपन से साठ के मध्य के गंजी टांट वाले डच थे, जिनकी सेहत इस उम्र में भी काफी अच्छी थी और घर देखते उनकी जो अमीरी प्रिडिक्ट की जा सकती थी, वह उन्हें देख कर परिलक्षित नहीं होती थी— बल्कि शरीर से वे एक मेहनतकश किसान ज्यादा लगते थे।

"हलो यंगमैन— लेडीज… उम्मीद है कि यहां तक पहुंचने में आपको ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा होगा।" उन्होंने ऑफिस टेबल के पीछे मौजूद एग्जीक्यूटिव चेयर पर बैठते हुए कहा।

"अगर अपनी गाड़ी न हो तो ऐसी आउट एरिये की जगह तक पहुंचने में थोड़ी परेशानी तो होती ही है… पर खैर— च्वाइस हमारी थी तो इस बात की शिकायत करने का भी हक़ नहीं हमें।" शाहज़ैन ने बड़े विनम्र स्वर में कहा।

"अब तीन दिन के लिये एडी'ज फार्म हाउस आपके हवाले।" मिस्टर गेरिट ने टेबल की दराज से एक चाबी और पैम्फलेट निकाल कर उनके सामने रख दिया— "थोड़ी बहुत जानकारी चाहिये उस जगह के बारे में, तो इससे काम चला सकते हैं।"

"और अगर ज्यादा जानकारी चाहिये हो तो सर?" माहिरा ने पूछा।

"तो फिर तुम्हें उस जगह के बारे में मुझसे जानना होगा… वह जगह हमारी प्रापर्टी है तो सबसे ज्यादा जानकारी तो वेसर फैमिली का ही कोई दे सकता है।" बोलते वक़्त उनके होंठों पर तो हंसी आई, लेकिन चेहरे पर एक तनाव पैदा हो गया।

"तो आप ही बता दीजिये सर… कम से कम हमें कुछ वजह तो नज़र आये, उसे डार्क टूरिज्म के तौर पर लिस्ट कराने की— जो अभी तक नहीं दिखी।" सिद्धार्थ ने दिलचस्पी दिखाते हुए कहा।

"यहां कहां देख लिया तुम लोगों ने… वह जगह यहां से तीन मील दूर है। हालांकि यह तो सही है कि देखने से ऐसा कुछ नहीं लगेगा कि वह कोई हांटेड जगह हो, पर तजुर्बे तो ऐसा ही कहते हैं। दरअसल किसी टाईम में वहां उजाड़ जंगल जैसी जगह थी, और उसके बीच एक खंडहर पड़ा रेस्ट हाउस। रहता तो वहां कोई नहीं था लेकिन वह प्रापर्टी एम्स्टर्डम जा कर बस गये डेक्कर फैमिली की थी, जिनके पुरखे इस इलाके के लार्ड हुआ करते थे। उन्होंने कभी उसकी सुध लेने की कोशिश नहीं की, और कभी की अच्छी-खासी जगह जंगल और खंडहर में बदल गई। उस तरफ़ मेरे भी काफ़ी खेत हैं, तो मैंने उनसे बात की थी… अगर उनके लिये वह प्रापर्टी इतनी ही गैरज़रूरी है तो वह मुझे बेच दें। चार साल मना करने के बाद आखिरकार वे मान गये और दस साल पहले वह जगह मुझे बेच दी। मैंने वह जंगल साफ़ कराया… उस दौरान कई अजीब-अजीब बातें हुईं—"

"कैसी अजीब-अजीब?" सिद्धार्थ ने टोका।

"मसलन कोई पेड़ अपने आप गिर गया और उसके नीचे दब कर एक आदमी मर गया। या काटी हुई लकड़ी को इकट्ठा करते टाईम सांपों ने चार लोगों को काट लिया, जिनमें से एक की जान ही चली गई। काटने वालों में से एक पागल हो गया। उस दौरान वहां स्टे करने वाले बताते थे कि रात को बड़ी अजीबोगरीब आवाज़ें आती हैं, लेकिन रोशनी करके देखते हैं तो कुछ नहीं निकलता। बहरहाल, इस सबके बावजूद काम चलता रहा और भ्रम और सामान्य घटनाएं समझ कर इग्नोर करते रहे— इनमें कुछ पैरानार्मल है, तब इस बात की तरफ़ ध्यान ही नहीं गया। जिन जेसीबी ड्राईवर्स ने उस खंडहर को जमींदोज किया, उनमें से एक हार्ट अटैक से मर गया, जो हमारे लिये नार्मल था और दूसरा काम पूरा हो चुकने के बाद एक दिन ग़ायब हो गया, जो कभी न मिला। पूरे दो साल लग गये उस जगह को तैयार होने में… हर कुछ दिन के बाद ऐसी ही किसी न किसी वजह से काम बंद हो जाता था।

फिर वहां फार्म हाउस का निर्माण हुआ, तो तब भी ऐसी ही कुछ न कुछ घटनाएं होती रहीं— लेकिन पैरानार्मल एक्टिविटीज की तरफ़ हमारा ध्यान तब भी नहीं गया और एक बंदे की दिमाग़ी हालत बिगड़ने और एक मजदूर की मौत के साथ वह जगह रहने लायक बन गई। मैंने सोचा था कि उधर भी हम फार्मिंग करेंगे और कभी-कभार वहां रुक भी लिया करेंगे। तुम्हें जान कर ताज्जुब होगा कि वहां हम कभी कोई फसल काट ही न पाये। मतलब बुआई करते हैं, फसल होती है, लेकिन तैयार होने से पहले ही कुछ न कुछ ऐसा होता है कि वह पूरी तरह नष्ट हो जाती है और होता सब प्राकृतिक कारणों से ही है। पांच साल हम कोशिश करते रहे, लेकिन लगातार नुकसान और मेहनत जाया होते देख हमने वह ज़िद ही छोड़ दी और अब वह जगह वैसी ही पड़ी है।"

"कभी उस जगह रहने भी गये?" वरुण ने पूछा।

"हां, एक बार मैं अपनी पत्नी के साथ… एक बार एम्स्टर्डम में रहने वाला मेरा बेटा जब घर आया था, तब अपनी फैमिली के साथ रुका और एक बार मेरी बेटी ने भी अपने पति और बच्चे के साथ रुकने की कोशिश की थी। यह शुरुआती दौर की बात है, करीब आठ साल पहले की… तब वह जगह तैयार ही हुई थी।

"तब कुछ हुआ था?" माहिरा ने पूछा और वरुण की धड़कनें बढ़ीं।

"हां… तब तो हमें समझ में आ पाया कि वह जगह हांटेड है। दरअसल जब मैं और मेरी पत्नी रुके तो शाम होते ही हमें यह लगने लगा जैसे हम किसी और दुनिया में पहुंच गये हों। मतलब जो दिख रहा था, वह सच होते हुए भी सच नहीं था। जो मैंने एक्सपीरियेंस किया, वह शब्दों में समझाना मुश्किल है— हालांकि डराने वाला उसमें तब भी कुछ नहीं था। फिर रात होते-होते हमें वह नकलीपन परेशान करने लगा। मैंने उस दिन शाम से ही काफी पी रखी थी तो मुझे लग रहा था कि मुझे जो भी वहम हो रहे हैं, उनकी वजह मेरे हवासों पर सवार नशा है— लेकिन एलीन ने नहीं पी थी, उसे जल्दी ही यह बात समझ में आ गई और आधी रात को उसने मुझे वहां से निकलने पर मजबूर कर दिया।

फिर मैंने महसूस किया कि वह ख़ुद ही बदल गई है और हिंसक होने लगी है। जिस चीज़ की ज़िद उसने ख़ुद की थी, बाद में मुझे उसी से रोकने में पूरी ताक़त लगा दी… लेकिन नशे के बावजूद तब मुझे किसी गड़बड़ का अहसास हो चुका था, तो मैं उसे वहां से ले कर वापस लौट आया— भले इसके लिये हम दोनों को एक दूसरे के साथ हिंसा करनी पड़ी हो। बाद में हुआ यह कि वह कभी वापस सामान्य न हो सकी। ऐसा लगता था कि वह उसी दुनिया में फंसी रह गई हो, जिसे हम दोनों ने महसूस किया था। चार साल उसी हालत में रहने के बाद वह चल बसी।"

"इसके बावजूद आपका बेटा वहां अपनी फैमिली के साथ रहने चला गया?" शाहज़ैन ने दिलचस्पी से पूछा।

"वह इस घटना के हफ्ते भर की ही बात है, तब तो हम ठीक से समझ भी नहीं पाये थे। वह वैज्ञानिक सोच का आधुनिक इंसान है, इन सब बातों पर वैसे भी उसे यक़ीन नहीं था। वे शाम को ही वहां गये थे— लेकिन उन्हें भी रात को वही सब एक्सपीरियेंस हुआ और उसकी वाईफ का बिहैवियर अचानक इतना वायलेंट होने लगा कि ख़ुद उसी ने सर पर चोट दे कर उसे बेहोश कर दिया और मुझे फोन किया… तब मैं दर्जन भर लोगों को लेकर वहां पहुंचा और उसे वहां से निकाल कर लाया। मेरे ख्याल से उसकी बीवी बेहोश होने की वजह से और बाकी लोग हमारे वहां पहुंचने के चलते बच गये थे। वे अगले ही दिन एम्स्टर्डम वापस लौट गये थे और फिर कभी यहां आये भी तो वहां जाने के बारे में सोचा ही नहीं।"

"और इन दो घटनाओं को देखने के बाद भी आपकी बेटी वहां रुकने चली गई?"

"करीब छः महीने बाद… उसका हसबैंड एक पैरानार्मल एक्टिविटीज में दिलचस्पी रखने वाला शोधार्थी है, वह ही उसे ले गया था एक्सपेरिमेंट के लिये— लेकिन रात होते-होते जब हालात काबू से बाहर होने लगे तो बेटी ने मुझे फोन किया। उसका पति पागल हो चुका था— वह उसे और बेटे को ही मारने पर तुल गया था। मैं पहले ही इस आशंका से घिरा जाग रहा था और मैंने ही उसे कॉल करने को कहा था— तो मैं बिना देर दिये फौरन वहां आदमी ले कर पहुंच गया। किसी तरह दामाद को काबू में किया और सबको वापस लेकर आया। वे पेरिस में रह रहे थे— तो अगले ही दिन उन्हें पेरिस छोड़ आया, जहां उसके पति को नार्मल होने में तीन साल लग गये… लेकिन फिर भी वह बच तो गया। मेरी बीवी तो बच भी न सकी। इसके बाद हमने वहां रहने-रुकने से तौबा कर ली… अगले तीन साल खेती करने की नाकाम कोशिश और की, लेकिन फिर उससे भी हाथ खींच लिये।"

"मतलब तब से वह जगह ऐसी ही पड़ी है?"

"साल में तीन-चार बार आदमी ले जा कर साफ़-सफाई करा देता हूँ। अभी कल ही सब सफ़ाई कराई है तुम लोगों के आने की वजह से।"

"फिर उसके बाद कोई घटना नहीं हुई वहां?"

"हुई क्यों नहीं… दो साल पहले एक लेखक आया था, अपने बीवी और बेटी के साथ। उसने किसी से सुना था उस जगह के बारे में, और उसे ऐसी ही जगह रुकना पसंद था। उसने मुझसे महीने भर के लिये रुकने की जगह मांगी तो मैंने समझाया भी, लेकिन वह इन सब बातों को मेरा अंधविश्वास ठहरा कर मेरा मज़ाक उड़ाने लगा तो मैंने उसे वह जगह दे दी। मुझे रात को उसके फोन का इंतज़ार था… लेकिन उसका कोई फोन न आया। एक दिन हो गया, दो दिन हो गये… मुझे लगा कि शायद वाकई वह सही था। फिर भी उसकी ख़ैरियत पूछने के लिये मैंने फोन किया तो उसका फोन स्विच ऑफ था। तब मैं वहां गया देखने और मुझे वहां पूरी फैमिली मरी पड़ी मिली— उन्हें चाकुओं से गोदा गया था। पुलिस का कहना था कि वहां किसी लुटेरे घुसपैठिये ने घुसपैठ की होगी और उसने ही उन्हें मारा होगा, क्योंकि आत्माएं या भूत चुड़ैल तो किसी को इस तरह नहीं मारेंगे… पर मुझे लगता है कि उस लेखक ने पहले अपने परिवार को ख़त्म किया होगा और फिर ख़ुद को ख़त्म कर लिया होगा।"

"और भी कुछ है बताने को… या बस इतना ही?" सिद्धार्थ ने उत्सुकता से पूछा।

"पिछले साल एक लाश बरामद हुई थी फार्म हाउस से… कोई नहीं जानता कि वह कौन था, कब आया था वहां और क्या कर रहा था। मेरे लोग बस रुटीन सफ़ाई के लिये गये तो तीन दिन पुरानी लाश मिली। जिस्म पर चोट का कोई निशान नहीं था और बाद में पोस्टमार्टम में भी कोई कारण क्लियर नहीं हुआ कि कैसे वह दम घुटने की वजह से मर गया।"

"अच्छा सर… बुरा न मानियेगा, पर आपने उस जगह को डार्क टूरिज्म के लिये लिस्ट किया है, तो बिना ऐसी कहानियों के तो लोग उस जगह को हांटेड मानेंगे नहीं। आप बस इसीलिये यह सब सुना रहे हैं न हमें कि हम मन में डर और शक लेकर वहां जायें।" वरुण अनिश्चित से स्वर में बोला।

"मैंने उसे खरीदने में अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी थी… और उससे कभी एक धेला न कमा सका, तो अब जा कर जब डार्क टूरिज्म का ट्रेंड बना है तो बेटी ने ज़िद की थी कि मैं इसे डार्क टूरिज्म के तौर पर लिस्ट कर दूं। एटलिस्ट कुछ तो कमाई हो सकती है इस तरह… हां, यह सही है कि इसमें गेस्ट की जान का रिस्क हो सकता है, इसलिये कनसेंट की शर्त पहले ही पूरी करा ली है… और लोग जब ख़ुद की रिस्क पर ऐसे हांटेड प्लेस एक्सप्लोर कर रहे हैं, वहां स्टे कर रहे हैं तो मुझे नहीं लगता कि कोई गड़बड़ होने की सूरत में उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी हम पर डाली जा सकती है। आप हमारे पहले गेस्ट हैं, तो हमने जो भी वहां हुआ, वह आपके सामने रख दिया। आपको जगह पसंद नहीं है, या डर कर अपना इरादा बदल रहे हैं तो अपनी पचास पर्सेंट रकम वापस ले सकते हैं।"

"नहीं, डर नहीं रहे सर— बस मेरा दोस्त जानना चाहता है कि यह बस कहानियां ही हैं या इनमें कोई सच्चाई भी है… एक्चुअली हमने सुना है कि ऐसी जगहों का प्रबंधन जो संभालते हैं, वे कुछ मैनमेड ट्रिक्स की बदौलत गेस्ट को पैरानार्मल एक्टिविटीज का अनुभव कराते हैं।"

"देखो, इस तरह के डार्क टूरिज्म में दो तरह के डेस्टिनेशन आते हैं। एक वह, जो देखने में ही डरावनी जगहें हों, या जिनके साथ कुछ कहानियां जुड़ी हों, लेकिन हकीक़त में हो कुछ न और वहां उस जगह को मैनेज करने वाले अपनी ट्रिक्स इस्तेमाल करते हैं लोगों को वैसे एक्सपीरियेंस देने के लिये। दूसरे वह जगहें होती हैं जहां अतीत में कुछ बुरी घटनाएं हुई हों, और बाद में रहने वालों को कुछ बुरे अनुभव हुए हों और उस जगह को हांटेड मान लिया गया हो, चाहे वाकई में वहां कुछ भी न हो— बस अतीत में कोई ऐसी जानलेवा घटना ज़रूर हुई रही हो। तो लोग उन जगहों पर रुकते हैं, ऐसे कुछ अनुभवों की तलाश में… जो पता नहीं किसी को होते भी हैं या नहीं। यह मेरी जगह इन दोनों ही पैमानों से अलग है… इसीलिये मैंने सबकुछ क्लियर बता दिया। हमने इसे टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने का फैसला किया ज़रूर है, लेकिन अभी आपके साथ यह ट्रायल फेज में है। अगर आप लोगों के साथ कुछ बुरा होता है तो फिर हम आगे इसे हमेशा के लिये बंद कर देंगे।"

"अगर वह इतनी दूर है, तो हम वहां तक जायेंगे कैसे?" नोमी ने पूछा।

"डेरेन आप लोगों को वहां तक छोड़ आयेगा।" डेरेन शायद उसी युवक का नाम था, जो उन्हें अंदर लेकर आया था।

"बत्ती, पानी, मोबाइल कनेक्टिविटी की क्या पोजीशन है?" शाहज़ैन ने एक नज़र अपने साथियों पर डाल कर पूछा।

"कनेक्शन है, एमसीबी ऑन करते ही सप्लाई चालू हो जायेगी। पानी की सप्लाई पीछे नदी से है और मोबाइल नेटवर्क कमज़ोर है लेकिन टेक्स्ट या व्हाट्सअप मैसेज हो जाता है— थोड़ी बहुत कॉल भी।"

"ठीक है… तो फिलहाल हम रुक रहे हैं।" सिद्धार्थ ने खड़े होते हुए निर्णायक स्वर में कहा।

वरुण का चेहरा ऐसा हो रहा था, जैसे रो देगा… उसे यह फैसला डरा रहा था, लेकिन बाकी चारों के चेहरों पर छाई दृढ़ता उसे बोलने से रोक रही थी। सबने खड़े हो कर गेरिट से हाथ मिलाया और बाहर निकल आये। बाहर एक सिक्स सीटर के साथ वह युवक तैयार मिला, जो उन्हें लेकर उस फार्म हाउस के लिये रवाना हो गया।

उसने बड़े आराम से ड्राईव करते उन्हें पांच मिनट में 'एडी'ज फार्म हाउस पहुंचा दिया और फौरन ही वापस भी हो गया।

आसपास खेत खलिहान थे, लेकिन उनके बीच लगभग सौ एकड़ के घेरे में वह फार्म हाउस बना हुआ था— जिसकी बाकायदा बाउंड्री खींच कर हदबंदी की गई थी। हालांकि वह बाउंड्री वाल इतनी पुरानी हो चुकी थी कि जगह-जगह से उधड़ और टूट रही थी। देख कर लगता तो था कि ऊसकी मिस्टर गेरिट ने उसकी मरम्मत कराने की कोशिश की थी, लेकिन फिर आधे में ही छोड़ दिया था। बाउंड्री के अंदर कभी खेती की गई होगी, लेकिन अब तो हर तरफ़ बेतरतीब जंगली वनस्पति उगी दिख रही थी। जहां बाउंड्री के पास चारों तरफ़ पाईन, एल्म जैसे पेड़ों से घेराबंदी की गई थी, वहीं बीच-बीच में ओक, लिंडेन और बीच के पेड़ भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए थे। जगह-जगह डच ट्यूलिप, डेजी, बटरकप और पर्पल हीदर के पौधे और फूल भी दिखाई दे रहे थे।

फार्म हाउस के बीचो-बीच एक आधुनिक तर्ज का बंगला बना था, जिस तक मुख्य गेट से एक घुमावदार रास्ता ले जाता था। उस बंगले के इर्द-गिर्द भी एक लॉन था, जिसमें कुछ छोटे पेड़ और बाकी फूलदार पौधों और फैंसी झाड़ियों की भरमार थी। देख कर लगता था कि अगर उन्हें कायदे से संवारा जाता, तो लॉन काफ़ी ख़ूबसूरत लगता, लेकिन अभी तो सब ऐसे ही पड़ा था— शायद उनकी आमद की वजह से अंदर की साफ़ सफाई के साथ उन पौधों की भी थोड़ी छंटाई भर कर दी गई थी।

बंगले के पीछे एक छोटा तालाब सा था, जिस तक एक नदी आ कर गुज़र गई थी— शायद वह वाटर सप्लाई से लेकर खेती के लिये सिंचाई का मुख्य स्रोत थी।
 
बाहरी गेट पर कोई ताला नहीं था— अंदर पोर्टिको से एंट्री थी, जिस पर एक ताला लगा था। वहीं सप्लाई बॉक्स मौजूद था, जहां से एमसीबी गिराते ही इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई चालू हो गई थी।

"तो फाईनली— हम अपने डेस्टिनेशन पर हैं।" लिविंग रूम में पहुंचते ही शाहज़ैन सोफे पर पसरता हुआ बोला।

"यह जगह उतनी भी हॉरर नहीं है, जितनी हम सोच रहे थे और उतनी भी अच्छी नहीं है जितनी पहुंचते ही लगी थी।" सिद्धार्थ ने भी बैठते हुए कहा।

"जब हम फार्म हाउस से बाहर थे, तो दूर-दूर तक खेत दिख रहे थे, कुछ घर और कुछ लोग भी नज़र आ ही रहे थे और लग रहा था कि सबके बीच में हैं… लेकिन यहां आ कर कुछ नहीं दिखता, ऐसा लग रहा है कि हम कहीं जंगल में अकेले हैं— क्या डराने के लिये इतना काफ़ी नहीं?" वरुण ने सूखते होंठों पर ज़बान फेरी।

"वरुण… इतना नर्वस क्यों हो रहे हो यार— हम हैं न। वैसे तुम क्या वाक़ई भूत प्रेत पर यक़ीन रखते हो?" शाहज़ैन ने उसे खींच कर अपने पास बिठाया।

"नहीं… लेकिन फिर भी मैं इस तरह की जगहों से, सन्नाटे से और अंधेरे से डरता हूँ। यह बचपन से है… मैं आज तक इससे उबर नहीं पाया और अब क्या ही उबर पाऊंगा।"

"उबर जाओगे— अब तक तुमने इन सब चीज़ों का ठीक से सामना नहीं किया तो तुम्हारे अंदर एक स्वाभाविक डर मौजूद है, लेकिन अब तीन दिन जब तुम इस सबका सामना कर चुकोगे, तब तुम्हारा डर हमेशा के लिये निकल जायेगा।" सिद्धार्थ ने थम्स अप करते भरोसा जताया।

"और मैं ही निकल लिया तो?" वरुण ने उसे घूरा और दोनों लड़कियां हंस पड़ीं।

"तुम बस सेलीन को याद करते रहो, उसे याद करते तुम्हारे अंदर पैदा होने वाला ग़म और ग़ुस्सा तुम्हें इन सब ख़तरों से बचा ले जायेगा।"

"मैं पहली बार लाईफ में सीरियस हुआ था… मैंने तो अपने बच्चों के नाम तक सोच लिये थे।" सेलीन को याद करते वह फिर मायूस हो गया।

"कोई न वरुण— वह नाम इसके बाद वाली के साथ काम में आ जायेंगे। आखिर किसी लड़की या लड़के के चले जाने का मतलब ज़िंदगी की गाड़ी का थम जाना तो नहीं होता… एक जाता है तो दूसरा आ जाता है।" माहिरा ने हमदर्दी भरे लहजे में कहा।

दोपहर का वक़्त था, खाना वे ज़्वोले से खा कर ही चले थे तो थोड़ी देर के बाद उठ कर जगह देखने के लिये बाहर निकल आये। सबसे पहले उन्होंने आसपास उपलब्ध सूखी लकड़ी इकट्ठा करके लॉन में एक जगह डाल दी, कि रात में जलायेंगे— फिर घर से बाहर चले आये।

दोपहर उतार पर थी… आकाश एकदम साफ़ था और किनारे के आसमान पर दिखता सूरज अपनी तिरछी रश्मियों से ज़रूरी ऊष्मा प्रदान कर रहा था। देखने में भले वह जगह उजाड़ और वीरान सी हो, लेकिन उसमें भी एक सौंदर्य था। खास कर पीछे का एरिया तो दिन की रोशनी के हिसाब से काफ़ी ख़ूबसूरत था। किसी षोडसी की कमर सा कर्व लेती एक नदी थी जिससे निकल कर एक नाला सा ठीक पीछे मौजूद तालाब में पानी की आपूर्ति और ओवरफ्लो करने पर निकासी करता था। आसपास शंकुधारी लार्च के ढेरों पेड़ उस तालाब और नदी के सौंदर्य को और बढ़ा देते थे। तालाब में ही एक लकड़ी का प्लेटफार्म बना था, जिससे एक कश्ती भी बंधी हुई थी। उन्होंने कश्ती खोली और उसके सहारे तालाब से लेकर नदी के दोनों किनारे देख डाले जो फार्म हाउस की घेराबंदी के अंदर ही आते थे और लोहे की ग्रिल से बांधे गये थे।

इस सबमें सूरज एकदम किनारे पर पहुंच गया और रोशनी कम होने लगी तो वे वापस लौट आये। घर में घुसने के साथ ही उन्होंने अंदर बाहर की सारी बत्तियां जला दीं— यह बस एक एहतियाती क़दम था, कि ऐसी जगह उन्हें अंधेरे का सामना न करना पड़े और वे उस मानसिक दबाव से उबर सकें, जो मिस्टर गेरिट की बातों ने उन पर बनाया था।

"कुछ पका खा लें— रात में कोई प्राब्लम भी हो तो एटलिस्ट खाली पेट न इधर-उधर होना पड़े।" माहिरा ने अंदर घुसते ही राय दी।

"इतनी जल्दी… ऐसी भी क्या आफत है?" सिद्धार्थ ने किंचित आश्चर्य से उसे देखा।

"बाद में अगर वाकई हमें कुछ समस्या हुई तो?"

"कमऑन माहिरा— क्या समस्या होगी भला? लगता है तुम्हारे ऊपर मिस्टर गेरिट की बातों का गहरा असर हुआ है। ऐसा कुछ नहीं होता यार… वे इन सब कहानियों से इस जगह को बस एक जस्टिफिकेशन भर दे रहे थे। अपनी जगह को प्रमोट कर रहे थे।" शाहज़ैन ने माहिरा के कंधे पकड़ कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा।

"और वैसे भी… एक रात नहीं भी खायेंगे तो क्या आफत आ जायेगी।" नोमी ने भी लापरवाही जताई।

उन्होंने वहां मौजूद चार बेडरूम में से अपने लिये एक-एक बेडरूम का चयन किया और वापस लिविंग रूम में आ बैठे कि बातों से ही वक़्त गुज़ारा जाये। मनोरंजन का और कोई साधन तो था नहीं। टीवी था लेकिन डीटीएच सर्विस काम नहीं कर रही थी। उन्होंने मिस्टर गेरिट को मैसेज किया तो उधर से उनका रिप्लाई आया कि कंपलेंट कर रखी है, लेकिन पता नहीं कि टेक्नीशियन कब तक आयेगा। कमज़ोर नेटवर्क के चलते नेट कनेक्टिविटी भी नहीं थी तो आपस में बतियाने के सिवा और काम भी क्या था।

"वैसे हमने तो सोचा था कि बाहर बोनफायर जलायेंगे और उसके पास बैठ कर देर रात तक म्युज़िक सुनते हुए ड्रिंक एंड डांस करेंगे… तो हम यहां अंदर क्यों बैठे हैं?" शाहज़ैन ने सब पर दृष्टि फिराई।

"अंधेरा तो होने दो ठीक से ब्रो— फिलहाल तो यहीं महफ़िल जमा लेते हैं।" सिद्धार्थ ने जवाब दिया।

"अंधेरे में बाहर यह सब करना ठीक रहेगा?" वरुण ने बारी-बारी दोनों को देखा।

"अब इसे और अंधेरे की पड़ी है… अंधेरा किधर है भाई, हर तरफ़ तो लाइटें चकाचौंध कर रखी हमने।"

"छोड़ो इस फट्टू को यार… तुम बताओ, पहली बार दोस्तों के साथ लंदन से इतनी दूर आई हो। कैसा लग रहा है?" माहिरा ने नोमी से पूछा।

"अभी तक ऐसा कुछ तो तजुर्बा नहीं हुआ कि अच्छा या बुरा बताया जा सके। अब यह रात गुज़रे तो कल तक कुछ राय बनाते हैं। तुम कितने टूर कर चुकी हो अब तक?"

"एटलिस्ट दर्जन भर… हर टूर पर आसपास का कोई देश देखा है। वैसे इस बार वरुण के साथ यह ट्रेजेडी न हुई होती तो कैनेरी आइलैंड जाने का प्लान था— लेकिन फिर सेलीन ने साहब को झटका दे दिया तो इनका मन बहलाने और पहली बार ख़ुद भी ट्राई करने के लिये डार्क टूरिज्म के ऑप्शन पर चले गये।"

"और वरुण को ही सबसे ज्यादा प्राब्लम दिख रही डार्क टूरिज्म से।"

"अच्छा तो है, प्राब्लम हो रही, तभी तो इसका दिमाग़ उलझा रहेगा इस सबमें और जब यह टूर ओवर होगा तो मेमोरी में सेलीन के बजाय यह टूर ही होगा।"

"मैं तुम तीनों को देखती हूँ, जो एक ज़माने से टीम बने हुए हो तो जानते हो, मेरे दिमाग़ में क्या आता है… इनके देश भी काश आपस में ऐसे ही टीम होते।"

"एक्चुअली हमारी दोस्ती आज तक इसीलिये बरकरार है कि हम आपस में पालिटिकल नहीं होते। हम हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी और दुश्मन-दुश्मन अपने देशों की सरहदों के अंदर होते हैं… बाहर निकलते ही वह सब पीछे छूट जाता है।"

बात रष्ट्रीयता पर पहुंची तो बात से बात निकलती चली गई और उस मामले में सबके पास बताने को कुछ न कुछ था— तो इस बात का अहसास ही न हो सका कि बातों-बातों में कितना वक़्त गुज़र गया। फिर वरुण ने खाने का ध्यान दिलाया तो वे सभी किचन में पहुंच गये और जो साथ ले कर आये थे, मिल जुल कर उसे ही बनाने लगे। तब काम के साथ बातों का रुख़ उन घटनाओं की ओर मुड़ गया जो मिस्टर गेरिट ने इस जगह से सम्बंधित कही थीं… वे अपनी-अपनी दृष्टि से उन घटनाओं का आकलन करने लगे। शाहज़ैन जहां उन सब बातों को सिरे से खारिज कर रहा था, वहीं सिद्धार्थ का मानना था कि उनमें कुछ संयोग हो सकते हैं तो कुछ वहां रुकने वालों के भ्रम भी— जबकि वरुण को अभी भी संदेह था कि वे सब घटनाएं सत्य हो सकती थीं और मिस्टर गेरिट झूठ नहीं बोल रहे थे।

खाना बन गया तो थोड़ा रुक कर उन्होंने वहीं खा भी लिया और फिर लिविंग रूम में आ कर गपशप करने लगे।

"गाईज़… अब चलें बाहर आग जलाने और हलचल मचाने… यार लगे तो सही कि हम मस्ती करने आये हैं।" थोड़ी देर की बातचीत के बाद सिद्धार्थ ने आँखें चमकाते हुए कहा।

"यह करना ज़रूरी है क्या?" वरुण ने मुंह बनाया।

"फिर… दूसरा ऑप्शन है कि यहां और कुछ तो है नहीं करने को, तो अपने-अपने बेडरूम में बंद हो कर थोड़ा क्वालिटी टाईम बिताते हैं।" शाहज़ैन ने माहिरा की जांघ पर हाथ फेरी।

"वह तुम लोगों का गुज़रेगा— मेरे लिये क्वालिटी जैसा क्या है।" फिर उसके मुंह का ज़ायका खराब हो गया।

"अरे तो भाई— तू चाहता क्या है आखिर… हम तेरे साथ देर रात तक यहीं सड़ा सा मुंह बनाये बैठे रहें।" फिर सिद्धार्थ का मूड भी खराब हो गया।

"हां, अभी तो यही चाहता हूँ मैं।" तत्काल उसके चेहरे पर मुस्कराहट वापस लौटी और दोनों लड़के उसे गालियां देने लगे— लड़कियों की मौजूदगी की परवाह किये बग़ैर… दोनों लड़कियां भी हंसने लगीं।

"अच्छा एक बात बताओ… ऐसा लग रहा है कि हम घर के अंदर इतनी बत्तियां सरे शाम ही जलाये बैठे हैं, जबकि अभी बाहर की रोशनी मौजूद है। क्या मुझे ही ऐसा लग रहा है या तुम में से भी किसी को ऐसा लग रहा है।" सहसा नोमी ने छत और दीवार में लगे बल्ब और ट्यूबलाईट पर दृष्टि फिराते हुए कहा।

उसकी बात ने सभी का ध्यान इस तरफ़ खींचा… पहले तो किसी ने भी ग़ौर नहीं किया था कि ऐसा भी कुछ था, लेकिन अब एक ने कहा तो सबने ग़ौर किया कि था तो ऐसा ही। रोशनी के वे सोर्स तो पूरे सामर्थ्य से अपना कर्तव्य निभा रहे थे, लेकिन जाने क्यों उनका प्रकाश उतना प्रभावी नहीं था, बल्कि ऐसा लग रहा था कि जैसे उसमें बाहरी प्रकाश का भी समावेश हो और वह उस कृत्रिम प्रकाश पर हावी हो रहा हो।

"सचमुच, यह अजीब है।" सिद्धार्थ आँखें सिकोड़ते बुदबुदाया।

"मिस्टर गेरिट ने कहा था कि रात होते ही उन्हें लगा था कि वे किसी और दुनिया में पहुंच गये हों… कहीं यह उसी की पुनरावृत्ति तो नहीं।" वरुण का आत्मविश्वास सबसे पहले डगमगाया।

"तुम चुप रहो यार… समझने तो दो। हो सकता है कि यह लाइटें ही ऐसी हों, स्पेशल फीचर वाली। यह सब वही सेटअप हो, जिसके बारे में हमने पूछा था कि प्रबंधन संभालने वाले ख़ुद इन ट्रिक्स का इस्तेमाल करते हैं लोगों को पैरानार्मल एक्टिविटीज का एक्सपीरियेंस देने के लिये।" शाहज़ैन ने खीजते हुए कहा।

"अगर ऐसा है तो बाहर चल के देख लेते हैं… अब तो घना अंधेरा हो गया होगा। बाहर की लाइटें तो इस तरह धोखा नहीं दे सकतीं।" सिद्धार्थ ने आइडिया दिया।

"यह सही है… फिर वहीं आग जला कर बैठते भी हैं थोड़ा। बियर पीते हैं और म्युज़िक बजा कर थोड़ा डांस करते हैं। बेचारी, हमारे आसपास मौजूद आत्माएं भी तो मनोरंजन को तरसी होंगी… थोड़ा उन्हें भी तो मज़ा आना चाहिये।" नोमी ने उठते हुए कहा।

"तो फाईनली जब बाहर चल ही रहे हैं तो सामान भी ले लेते हैं।" सिद्धार्थ ने भी खड़े होते हुए कहा।

अब सामान क्या, किचन में भर रखी बियर की बोतलें ही लेनी थीं, म्युज़िक उनके फोन में था और आग तो बाहर ही जलानी थी… उन्होंने दो-दो बोतलें ली और बाहर की तरफ़ बढ़ लिये।

लेकिन जैसे ही बाहर क़दम रखा— उनकी खोपड़ियां हवा में नाच गईं। जितना आश्चर्य हुआ, उतनी ही उलझन भी और उसकी प्रतिक्रिया में दहशत भरी कई सर्द लहरें रीढ़ से गुज़र गईं। सामने जो नज़ारा उपलब्ध था— वह किसी भी एतबार से संभव ही नहीं था… सामने देख कर भी वे उस पर यक़ीन नहीं कर सकते थे।

उनकी घड़ियां, उनके मोबाइल बता रहे थे कि रात के दस बज चुके थे— उन्होंने यह वक़्त बातें करने के साथ खाना बनाने और खाने में गुज़ारा था… लेकिन बाहर अभी रात ही नहीं हुई थी। वहां सूर्यास्त के फौरन बाद का समय था। सूर्य भले दिखना बंद हो चुका हो, लेकिन क्षितिज के पश्चिमी छोर पर उसकी लालिमा बनी हुई थी और इतना प्रकाश अभी बाकी था कि वे हर तरफ़ दूर तक उपलब्ध दृश्य को वैसे ही देख सकते थे, जैसे दिन के प्रकाश में देखा जा सकता। इस रोशनी की वजह से ही उन्हें वह एलईडी बल्ब और ट्यूबलाईट की रोशनी हल्की लग रही थी और न वह कोई भ्रम था, न ही कोई ट्रिक… यह किसी इंसानी क्षमता से बाहर की बात थी, तो किसी भी इंसानी ट्रिक की संभावना ही ख़त्म हो जाती थी।

"यह क्या बवाल है।" सबसे पहले वरुण ही बोला— उसकी आवाज़ में कंपकपाहट मौजूद थी।

"यह वही वक़्त है जब हम लाइटें जला कर घर के अंदर पैक हुए थे… ऐसा लगता है जैसे वक़्त वहीं थमा रह गया और अंदर हम सोच रहे थे कि रात हो गई।" माहिरा ने डरी-सहमी आवाज़ में कहा।

"पागल हुई हो… ऐसा नहीं हो सकता कैसे भी। नेचर हमारे लिये अपने रूल्स तो नहीं चेंज कर देगी।" सिद्धार्थ ने सकपकाई आवाज़ में कहा।

"फिर यह क्या है सिड— यह वक़्त एक ही जगह क्यों थमा हुआ है या रात में शाम कैसे हो गई। घड़ी देखो, मोबाइल देखो… दस बज रहे हैं रात के। कहीं से लग रहा है कि यह रात है? एक आदमी को भ्रम हो सकता है, दो को हो सकता है… क्या हम पांचों सेम चीज़ नहीं देख रहे।" वरुण के अंदाज़ से लग रहा था कि वह बुरी तरह डर गया था।

"भाई, अगर यह पैरानार्मल एक्टिविटी है तो गज़ब है, ऐसी कोई स्प्रिट पॉवर हो सकती है भला जो समय को रोक दे… यह तो नामुमकिन सी बात है।" शाहज़ैन भी मंत्रमुग्ध से स्वर में बोला।

"मुमकिन है, नामुमकिन है, वह सब बाद की बात है… फिलहाल यह सोचो कि अगर हमारे सामने एक ऐसी चीज़ मौजूद है जो मिस्टर गेरिट की बात को वैरिफाई कर रही है, तो मतलब फिर वह सारी बातें सच थीं… और उस हिसाब से हम एक तरह के ट्रैप में फंस चुके हैं।"

"बात करो मिस्टर गेरिट से… उन्हें बताओ कि हम क्या देख रहे हैं।" नोमी ने सिद्धार्थ से कहा।
 
सिद्धार्थ ने मोबाईल निकाला और उसे अनलॉक किया… लेकिन अनलॉक होते ही स्क्रीन पर परछाइयां तैरती दिखीं… ऐसा लगा जैसे उसका कैमरा सेल्फी मोड में ऑन हुआ हो और उसका फ्रंट कैमरा उन परछाइयों को कैप्चर कर रहा हो— जबकि कैमरे के सामने तो वह ख़ुद था और यह दृश्य बाकी लोग भी देख सकते थे, जो देख भी रहे थे और देख कर भौंचक्के भी हो रहे थे। सिद्धार्थ ने उसे स्क्रीन से हटाने की हर कोशिश कर ली, लेकिन जैसे फोन ही हैंग हो गया हो। उसने फोन बंद किया तो स्क्रीन ऑफ हो गई— वापस ऑन करके अनलॉक किया तो फिर वही शुरू हो गया।

"यह क्या बवाल है यार… तुम लोग अपने-अपने फोन देखो।" सिद्धार्थ एकदम से घबरा गया।

और बाकियों ने जब अपने फोन निकाल कर चेक किये तो सबमें वही चीज़ मिली और किसी के भी फोन ने काम न किया। यह देख उनके हाथ-पैर फूल गये और ठंडे मौसम के बावजूद शरीर ने पसीना छोड़ दिया। उनका आत्मविश्वास हवा हो गया और सभी एकदम घबरा गये।

"मुझे ठीक नहीं लग रहा यार… हमें यहां आना ही नहीं चाहिये था। अगर डार्क टूरिज्म करना ही था तो किसी पहले से इस्तेमाल हो रही जगह पर जाना था, जहां हमसे पहले भी लोग रह चुके होते और सही सलामत रातें गुज़ार चुके होते। इस जगह यह पहला एफर्ट था और जगह के मालिक को ख़ुद नहीं पता कि इसका रिजल्ट क्या निकलना था। उसने हम पर ही ट्रायल कर लिया और हम यहां आ कर फंस गये।" वरुण एकदम रुआंसा हो गया।

"अभी फंस नहीं गये वरुण… हम वापस लौट सकते हैं अभी भी। एक बार इस जगह से निकल गये तो फिर यह शाम का वक़्त भी ख़त्म हो जायेगा।" सिद्धार्थ ने उसका हौसला बनाने की कोशिश की।

"चलो— निकलो यहां से। भाड़ में गया डार्क टूरिज्म।" शाहज़ैन ने भी फैसला सुनाया।

"हमारा सामान?" माहिरा ने टोका।

"अरे गोली मारो सामान को यार… अंदर जायेंगे तो पता नहीं और क्या तमाशा हो जाये। निकलो यहां से— सामान कल दिन में ले लेंगे।" वरुण ने उसे झिड़कते हुए कहा।

आखिर उन सबको भी वही समझ में आया और हाथ में थमी बियर की बोतलें वहीं डाल कर वे भाग खड़े हुए। हालांकि वे चल कर भी जा सकते थे, लेकिन पांचों ही इतना डर गये थे कि जल्द से जल्द वहां से निकल भागना चाहते थे।

अब एक समस्या यह थी कि वह जगह जंगल बनी हुई थी— दूर तक देख पाना संभव नहीं था। वह बंगला फार्म हाउस के मध्य में बना था और उस तक जो रास्ता मुख्य फाटक से जाता था, वह घुमावदार था और कई पेड़ों और झाड़ों से ऐसे घिरा था कि न बाहरी गेट से वह बंगला दिखता था और न ही बंगले से गेट… तो उन्हें बाहरी गेट दिख ही नहीं रहा था और जब वे एक बड़े झुरमुट को पार करके उधर पहुंचे, जिधर से उस गेट को देखा जा सकता था, तो उनके दिमाग़ फिर नाच गये— क्योंकि अब सामने वही बंगला था… और ऐसा लगता था, जैसे वे गेट की तरफ़ से बंगले की तरफ़ भागते हुए वहां तक पहुंचे हों।

"यह कैसे हो सकता है… यह नामुमकिन है। बंगला हमारे पीछे है, इधर तो गेट था।" नोमी ने चकराये हुए स्वर में कहा।

"नामुमकिन तो इस वक़्त शाम होना भी है नोमी… लेकिन हमें यह होते दिख रहा है। फिलहाल वापस चलो— हो सकता है कि गेट पीछे हो।" शाहज़ैन ने हांफते हुए जवाब दिया।

बिना देर किये वे वापस रुख़ करते भाग लिये… लेकिन जब वह ओट बना मोड़ पार कर के दूसरी तरफ़ पहुंचे तो यह देख उनके हौसले पस्त हो गये कि अब वह बंगला उधर दिख रहा था।

"हम ट्रैप हो गये हैं… यहां जो भी बवाल है, वह हमें निकलने नहीं देना चाहता। अब क्या करें।" वरुण ने उखड़ी सांसों के साथ कहा।

"कोई बात नहीं— गेट न सही, वह बाउंड्री वाल हमें यहां से दिख रही है। उसी से फांद के निकल चलते हैं— इतना तो हम चढ़ ही सकते हैं।" शाहज़ैन ने दूर दिखती बाउंड्री वाल की तरफ़ हाथ उठाया।

और वे बिना बहस किये उधर भाग लिये। थोड़ी देर तो अंधाधुंध भागते रहे— लेकिन फिर महसूस किया कि इतना भागने के बाद भी वह बाउंड्री वाल नज़दीक नहीं हो रही थी, बल्कि ऐसा लगता था जैसे इतना भाग चुकने के बाद भी उनसे उसकी दूरी उतनी की उतनी ही हो। जैसे वह जितना उसकी तरफ़ भागते, वह उतनी ही और आगे बढ़ जाती— या जैसे बस उन्हें यह लग रहा था कि वे भाग रहे हों, जबकि हकीक़त में ट्रेड मिल पर दौड़ने की तरह वे एक ही जगह रहते बस दौड़े जा रहे हों। यह समझ में आते ही वे उसी जगह थम गये और झुक कर हांफने लगे।

"नहीं हो सकता भाई… हम फंस चुके हैं।" वरुण कराहते हुए बोला।

"अभी निकलने का एक ऑप्शन और है— वह तालाब तक पहुंचती नदी।" शाहज़ैन ने ही फिर राह सुझाई।

और बिना न-नुकुर किये वे बंगले की तरफ़ बढ़ लिये। हालांकि इस बार उनकी गति भागने वाली नहीं थी, बल्कि वे बस तेज़ गति से चल भर रहे थे। अब उनमें वह उत्साह बचा ही नहीं था— जैसे मन हारने लगा था।

जैसे बाउंड्री वाल से उनकी दूरी भागने के बावजूद बरकरार रही थी, वैसे बंगले से न रही और वे बिल्कुल सही अंदाज़ में उस दूरी को कवर करते वहां तक पहुंच गये, लेकिन अंदर न गये— बल्कि पीछे ही चले आये और तालाब में मौजूद उस कश्ती में फिर सवार हो गये, जिससे एक चक्कर पहले भी लगा चुके थे। उन्होंने सोचा था कि नदी के सहारे वे उस ग्रिल से कवर फार्म हाउस की सीमा तक पहुंच जायेंगे तो उसी पर चढ़ कर बाहर निकल जायेंगे। वह दोनों किनारे भी उस तरफ़ मौजूद लार्च के पेड़ों के झुंड के पीछे छुपे थे और तालाब वाली जगह से नहीं दिखते थे।

पहले उस किनारे तक पहुंचने में जितना समय लिया था, फिर उतना ही लगा— लेकिन वे किनारे तक नहीं पहुंचे थे, बल्कि वापस उस तालाब तक पहुंचे थे… बिलकुल ऐसे, जैसे किनारे की तरफ़ से वापसी करते हुए वहां तक पहुंचे हों। यह भी उसी तरह का कुछ इल्यूज़न था, जैसा उन्होंने गेट तक पहुंचने की कोशिश में पाया था। वरुण, नोमी और माहिरा की हिम्मत जवाब दे गई थी, लेकिन सिद्धार्थ और शाहज़ैन ने फिर भी एक और कोशिश करने की ठानी— और इस बार दूसरे किनारे की तरफ़ कश्ती तैराई।

लेकिन नतीजा इस बार भी वही निकला… साथ ही एक बात और भी हुई, जिसने उन्हें और बुरी तरह नर्वस कर दिया। जो वक़्त पिछले साढ़े तीन घंटों से उसी जगह थमा था, वह उनके बाहर निकलते ही अपनी सामान्य गति से चला था और अब रोशनी कम होते-होते बिलकुल ख़त्म हो गई थी। जब वे दूसरी तरफ़ से भी नाकाम हो कर तालाब तक पहुंचे थे तो तेज़ी से अंधेरा घिरने लगा था और दूर की चीज़ें सब अंधकार से आत्मसात होने लगी थीं।

"मुझे नहीं लगता कि हम आज बाहर निकल पायेंगे… अब हम समझ सकते हैं कि उन सब लोगों के साथ क्या हुआ होगा जो यहां रुके थे।" शाहज़ैन ने पराजित स्वर में कहा।

"मेरे ख्याल से बंगले के अंदर ही चलते हैं— अंधेरे में और भी ख़तरे हो सकते हैं। अब फेस तो करना ही है, तो क्यों न अंदर चल के करें।" सिद्धार्थ ने भी हारी हुई आवाज़ में कहा।

किसी ने और कुछ न कहा और वे थके-थके क़दमों से बंगले की तरफ़ बढ़ लिये।

जैसे ही वे बंगले के पोर्टिको में पहुंचे, अचानक कोई ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा और सभी को इतना तेज़ स्नायुविक झटका महसूस हुआ कि कांप कर रह गये।

कुछ देर लगी समझने में कि वह आवाज़ कहां से आ रही थी… फिर सबसे पहले शाहज़ैन को ही समझ आया कि वह आवाज़ उसकी जेब से आ रही थी। उसने जेब से फोन निकाला तो स्क्रीन रोशन थी और उस पर एक काली आँखों वाला भुतहा चेहरा ठीक सामने देखते अजीब से अंदाज़ में हंस रहा था— जैसे वह उन्हें देख कर हंस रहा हो। उसे देखते वे सभी कुछ पल के लिये लकवाग्रस्त से हो गये— हाथ-पैरों में जान ही न बची और पिंडलियों में थरथराहट पैदा हो गई।

जब तक वे अपनी उस मनोदशा से उबर पाये, फोन स्क्रीन शांत हो गई और वह चेहरा वापस स्याही में खो गया।

"अंदर चलो— मेरा दिल बैठ रहा है।" नोमी ने झुरझुरी लेते हुए कहा।

वे अंदर आ गये और जहां पहले बैठे थे, वहीं आ कर निढाल से पड़ गये। सबके चेहरे फक् पड़े हुए थे और सबके चेहरों पर बस एक ही सवाल था— अब?

"हम यहां फंस चुके हैं।" कुछ देर की ख़ामोशी के बाद वरुण ने बुझे-बुझे स्वर में कहा।

"किसने फंसाया है हमें?" सिद्धार्थ ने उसे देखा।

"यहां मौजूद आत्माओं, स्प्रिट पॉवर या जो भी हो… कोई ताक़त तो है जो हमें इस तरह यहां रोक पाने में कामयाब है और वह नज़ारे दिखाने में सक्षम है, जो कहीं हैं ही नहीं।" इस बार जवाब देते वरुण कुछ खीज गया।

"किसलिये— कोई ऐसी शक्ति है भी तो क्या चाहिये उसे हमसे?" शाहज़ैन ने पूछा।

"मतलब?" वरुण उसे घूरने लगा।

"एक बात समझो वरुण… अब हमें यह तो एक्सेप्ट करना पड़ेगा कि पैरानार्मल जैसा कुछ होता है। हम साक्षात देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं— तो उसे ठुकराने का कोई मतलब नहीं… लेकिन यह सोचो कि इससे हमें दिक्कत क्या है? वे हमें कोई हॉरर शो दिखा कर डरा तो नहीं रहे… या फिजिकली हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश तो नहीं कर रहे, न उनकी तरफ़ से हमें जान का कोई ख़तरा दिख रहा। तो हमें परेशान ही क्यों होना है… ठीक है, हम आराम से अपना सोते हैं। हम क्यों टेंशन लें कि बाहर वक़्त थमा हुआ है या था, या हमें बाहर क्यों नहीं निकलने दिया जा रहा है… हमें पता है कि बाहर की वास्तविक दुनिया में इस वक़्त रात के ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे होंगे और सात-आठ घंटे बाद सुबह भी हो जायेगी। यह जो भी है, वह शाम ढलने के बाद शुरू हुआ है— दिन की रोशनी के साथ हो सकता है कि ख़त्म भी हो जाये। शायद रात में ही यह शक्तियां काम करती हों।" शाहज़ैन ने अपनी समझ से बात को समझने और समझाने की कोशिश की।

"एग्जेक्टली— हम क्यों डरने में लगे हुए हैं, जब हमें डराने या नुकसान पहुंचाने की कोई कोशिश नहीं हो रही। होने दो, अंदर-बाहर जो होता है… हम चुपचाप सो कर अपनी रात गुज़ारते हैं।" सिद्धार्थ ने भी चुटकी बजाई— जैसे उसे भी यही छुटकारा लग रहा हो।

"वे हमें सोने देंगे?" माहिरा ने संशक स्वर में पूछा।

"कौन वे— कोई नहीं है यहां। बस कुछ ट्रिकी चक्कर है जिसने हमारे लिये एक इल्यूज़न क्रियेट कर दिया है। हो सकता है कि इसकी भी कोई साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन हो, जो हम अभी नहीं सोच पा रहे। सुपर नेचुरल के बारे में न ही सोचो तो ही ठीक है— वह चीज़ हमें डर की तरफ़ और आगे ले जायेगी।"

"तो करें क्या?" वरुण ने सवालिया निगाहें शाहज़ैन और सिद्धार्थ पर टिकाईं।

"अपने-अपने कमरे में सोते हैं, और क्या? जब तक हमें डायरेक्ट डराने की या शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की जाती, तब तक हम अपने आप से क्यों डरने लग जायें।" उत्तर सिद्धार्थ ने दिया।

"तुम दोनों तो इन्हें साथ लेकर लेटोगे, मैं अकेला हूँ।" वरुण ने दांत किटकिटाए।

"तो… छोटे बच्चे हो कि अकेले रात में अपने कमरे में सोते डर लग रहा है तो साथ में मम्मी या नैनी चाहिये। कम ऑन वरुण, तू इतना फट्टू तो नहीं है। अपने डर से उबर और सो जा जाकर। मौजूदा हालात में इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं।" कहते हुए शाहज़ैन खड़ा हो गया तो उसे देख कर माहिरा भी खड़ी हो गई।

"शाज़ू ठीक कह रहा है वरुण… जब तक हमें किसी और तरह से डिस्टर्ब नहीं किया जाता, चुपचाप सो जाना ही ठीक है।" सिद्धार्थ भी खड़ा हो गया और उसके साथ ही नोमी भी खड़ी हो गई।

"अरे लेकिन… सोना ही है तो अलग-अलग बेडरूम में जा कर क्यों सोना, यहां भी तो सो सकते हो तुम लोग।" वरुण कलपा।

"इतने पैसे खर्च के यह जगह हासिल की है और यहां झुंड बना कर सोयें… ब्रो, खाली सोने बस तू आया है हम नहीं।" सिद्धार्थ ने तनाव के बावजूद दांत निकालते आँख मारी।

"अरे तो जो करना है, कर आओ— लेकिन सोने के लिये तो यहां आ जाओ। एटलिस्ट कुछ और बात बिगड़ती है तो एक दूसरे से हमें सपोर्ट रहेगा।"

"अच्छा मेरे भाई… देखते हैं। टिल देन, बबाय।" शाहज़ैन ने सिद्धार्थ को आँख मारते हुए कहा और दोनों ही लोग उन कमरों की तरफ़ बढ़ गये, जो उन्होंने अपने लिये चुने थे— उनके पीछे ही लड़कियां भी बढ़ गईं और वरुण वहीं बैठा उन्हें घूरता रहा।

उसे ग़ुस्सा तो बहुत तेज़ आया कि इस हाल में भी उन्हें सेक्स की सूझ रही थी, लेकिन कुछ बोलना ठीक नहीं था, तो ज़ब्त कर के वहीं पसर गया और इन बातों की तरफ़ से ध्यान हटाने के लिये सेलीन के बारे में सोचने लगा… जिसने डेढ़ साल चली रिलेशनशिप को सिर्फ इसलिये तोड़ दिया था कि उसे इजिप्ट जाना था और वरुण को उसके लिये मौका नहीं मिल पाया था, जिसके चलते वह टालता रहा था— तो सेलीन ने उससे ब्रेकअप करके एक ऐसे लड़के का हाथ पकड़ लिया था, जो उसे इजिप्ट घुमाने ले जा रहा था। ब्रेकअप की यह कोई वजह नहीं होनी चाहिये थी— लेकिन उसके केस में थी… उसे अपने दूसरे अलगावों की अपेक्षा यह ब्रेकअप ज्यादा इसलिये भी खला था कि वह अब सेटल होने के बारे में सोचने लगा था और सेलीन को लेकर सीरियस था।

सोचते-सोचते आधा घंटा गुज़र गया… रह-रह कर उसका ध्यान फिर वर्तमान की तरफ़ चला जाता कि वे अजीबोगरीब हालात में फंसे हुए थे, जिनसे पता नहीं निकलना हो भी पाता या नहीं। ख़ूब कोशिश करके भी नींद न आई तो आखिरकार मोबाइल निकाल कर देखने लगा। स्क्रीन ऑन करने पर फिर वही फ्रंट कैमरा ऑन हो जाता और परछाइयां सेल्फी लेने लगतीं— स्क्रीन ऑफ करने पर फोन शांत हो जाता। स्क्रीन पर कोई फंक्शन काम करता लग ही नहीं रहा था— पता नहीं पहले वालों से मिस्टर गेरिट ने, या मिस्टर गेरिट ने उनसे संपर्क कैसे स्थापित किया था। उसे तो कोई तरीका न सूझा— जब फोन ही काम नहीं कर रहा था तो। वह एक प्रेतवाधित जगह में थे, यह सच था लेकिन सिर्फ़ दिमाग़ी उलझन देने के सिवा और कुछ भी ऐसा नहीं हुआ था, जिससे उन्हें डर लगता, कोई चोट पहुंचती या जान का ख़तरा पैदा होता… तो इस बात से इतना परेशान होने की ज़रूरत भी क्यों थी?

जाने क्यों उसे लग रहा था कि बात बस उतनी भर नहीं थी, जितनी उन्हें दिख रही थी। अगर कोई ताक़त यहां हावी थी, तो वह सिर्फ़ उन्हें एक इल्यूज़न दिखाने तक तो सीमित नहीं रहने वाली थी— अगर ऐसा होता तो फ़िर यहां किसी की जान ही नहीं जानी थी, जबकि इस जगह कई लोग मारे जा चुके थे। कुछ तो था, जिसे वे मिस कर रहे थे।

फिर उसके दिमाग़ में एक फ्लैश हुआ— उसे एकदम से कुछ समझ में आया और वह हड़बड़ा कर उठ बैठा। पहले उन दोनों के कमरों की तरफ़ जाने की सोची— लेकिन फिर इरादा बदल कर बाहर की तरफ़ बढ़ लिया। मुख्य द्वार से पोर्टिको में आया और चैनल से बाहर हो कर लॉन के खुले हिस्से में आ गया।

बाहर कहीं कुछ नहीं बदला दिख रहा था— कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी। हर तरफ़ सन्नाटा और रात का अंधेरा काबिज था। उसने आकाश पर देखा— कुछ भी अजीब नहीं था… लेकिन यही तो अजीब था। वह अपना सर ठोंकता अंदर भागा और दोनों कमरों के बंद दरवाज़े पीटने लगा। उन्हें अंदर बंद हुए घंटा भर हुआ था— अभी गहरी नींद में जा भी न पाये होंगे कि दरवाज़े की पिटाई ने उन्हें चौंका दिया होगा। थोड़ी देर बाद दोनों दरवाज़े खुले तो शाहज़ैन जहां ऊपरी धड़ नग्न लिये प्रकट हुआ था— वहीं सिद्धार्थ केवल अंडरवियर में बाहर निकला था।

"क्या हो गया?" शाहज़ैन ने झुंझलाये भाव से उसे देखा।

"हम सो नहीं सकते— और अगर सो गये तो कभी इस ट्रैप से नहीं निकल सकते। हमें जागना होगा और उन सब बातों का सामना करना होगा— जिनका सामना यहां पहले रुकने वालों ने किया है। सभी मारे नहीं गये थे, बल्कि गेरिट फैमिली में सभी बच के वापस गये थे— भले उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा हो, या वे मेंटल डिस्टर्बेंस का शिकार हुए हों।" वरुण उखड़ी सांसों के साथ बोला।

"और यह सब तुम्हें अभी ख़ुद से समझ में आया या किसी आत्मा ने आ कर बता दिया।" सिद्धार्थ ने उसे घूर कर देखा।

"आओ, तुम्हें दिखाता हूँ… बिना देखे तुम्हें कुछ नहीं समझ में आयेगा।" वह शाहज़ैन का हाथ पकड़ते हुए बोला।

"अरे लेकिन— लेकिन—"

शाहज़ैन लेकिन-लेकिन करता रह गया और वरुण उसे पकड़े खीचता हुआ बाहर ले आया। यह देख कर कौतहूलवश सिद्धार्थ भी उसी हालत में बाहर चला आया— लेकिन उन्हें ऐसा कुछ न नज़र आया तो दोनों ही झुंझला गये।

"क्या है ऐसा यहां जो तुम इतना हाईपर हो रहे हो— कुछ भी तो नहीं है।" सिद्धार्थ ने वरुण की पीठ पर धौल जमाई।

"अबे आसमान देख— दिन की हल्की रोशनी अब भी मौजूद है, जैसे पूरी तरह रात ही न हो पाई हो। रात के साढ़े बारह बज गये हैं और चांद नदारद है, जबकि अब तक उसे कब का निकल चुका होना चाहिये था।" वरुण ने खीजे हुए अंदाज़ में कहा।

"मतलब क्या हुआ इस बात का?" दोनों के ही पल्ले न पड़ा।

"मतलब यह कि पहले की तरह फिर वक़्त थमा हुआ है। अंदर चलो और उन दोनों को भी बुला लो— फिर समझाता हूँ, वर्ना फिर उन्हें अलग से समझाना पड़ेगा… और कपड़े पहन लेना। फिलहाल इस रात में सोना हमारे नसीब में नहीं है।" वह ख़ुद ही अंदर बढ़ लिया।

और थोड़ी देर बाद फिर वे चारों आमने-सामने बैठे वरुण को घूर रहे थे।

"जो हम एक्सपीरियेंस कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि मिस्टर गेरिट ने जो कहा, वह सच था— फिर यहां रुकने वाले सभी ने परेशानियां झेलीं और कुछ ने जान भी गंवाईं— तो मतलब यहां उस तरह की एक्टिविटीज भी होती हैं जो नुकसान पहुंचाने वाली हों, या जानलेवा हों… लेकिन हम तो ऐसा कुछ नहीं फील कर रहे। किसी की समझ में आया कि ऐसा क्यों है?" बात पूरी करके उसने एक-एक चेहरे को देखा।

"क्यों है?" आखिर नोमी ने ही पूछा।

"क्योंकि यह स्प्रिट पॉवर सूरज डूबने के बाद सक्रिय होती हैं और रात बढ़ने के साथ ही ख़तरनाक होती जाती हैं। हमारे केस में फ़र्क यह हो गया कि रात हो ही नहीं पाई, इसलिये वे अभी तक हमारे लिये अपने ख़तरनाक रूप में सामने नहीं आ पाईं। रात क्यों नहीं हो पाई— क्योंकि इस जगह में शायद अपनी कुछ पॉवर है, जो बाहर के समय को उसी जगह रोक देती है… मतलब हमारे लिये— बाकी दुनिया तो अपने टाईम के हिसाब से आगे बढ़ रही होगी। यानि इसे ऐसे समझो कि हम एक अभिशप्त जगह पहुंचे— जहां कुछ पैरानार्मल प्रभाव मौजूद है। इसकी वजह से हम एक अलग रियलिटी में ट्रांसफर हो गये… मतलब हम अब अपनी दुनिया में होते हुए भी किसी और दुनिया में हैं… किसी और आयाम में। उस वास्तविक दुनिया में कोई हमारे आसपास होगा भी तो वह हमें देख सकता है— लेकिन हम उसे नहीं देख सकते। इसीलिये हमारे फोन ऐसे बिहैव कर रहे हैं, जबकि अपनी जगह वे सही फंक्शन कर रहे होंगे और वास्तविक दुनिया में कोई भी उन्हें उसी तरह देखेगा, जैसे वे काम करते हैं— लेकिन हम नहीं देख सकते, क्योंकि हमारे लिये रियलिटी ही बदल चुकी है।
 
समझो कि हम सूरज डूबते ही अंदर हो गये और बाहर वक़्त थम गया— क्योंकि यह घर उस रियलिटी से या तो वेल कनेक्टेड नहीं है, या किसी और रूप में कनेक्टेड है, जो हम नहीं समझ पा रहे। जब हम बाहर निकले तब वापस वह समय आगे बढ़ा और ठीक से रात हो पाने से पहले ही हम वापस अंदर आ गये, बाहर वक़्त फिर वक़्त रुक गया। अब इसे उनकी और हमारी घड़ी से समझो… जब पहले हम अंदर आये थे, तब मान लो दोनों की घड़ी में छः बजा था— फिर बाहर का वक़्त वहीं रुक गया और हमारा चलता रहा, साढ़े नौ-दस बजे हम फिर बाहर निकले, तब बाहर का वक़्त चला। हमने करीब घंटा या सवा घंटा बाहर वक़्त गुज़ारा, इतना ही वक़्त बाहर की घड़ी में आगे बढ़ा और शायद सवा सात-साढ़े सात का वक़्त हुआ, जबकि हमारी घड़ी में ग्यारह बज गये। हम अंदर आये तो बाहर वक़्त फिर रुक गया और अंदर जहां घंटा भर और गुज़रने के बाद हमारी घड़ी में बारह बज चुका है, वहीं बाहर की घड़ी में अभी आठ-साढ़े आठ ही बजे हैं।"

"तो… इससे क्या फ़र्क पड़ता है?" माहिरा को उसकी बात ठीक से पल्ले न पड़ी।

"इसीलिये अभी तक चांद नहीं निकला— इसीलिये बाहरी ताक़तें अभी अपने वर्स्ट रूप में हमारे सामने नहीं आ पाईं कि हम ख़तरा देख सकें।"

"तो अच्छा है कि ऐसा कुछ न ही हो… हम इत्मीनान से सो कर रात गुज़ार लेते हैं। दिन की रोशनी होते ही यह इल्यूज़न टूट जायेगा और हम फ्री हो जायेंगे।" नोमी ने उम्मीद भरी नज़रों से सिद्धार्थ को देखा।

"नहीं— यह नहीं होगा, बल्कि अगर कल की रोशनी होने तक हम अंदर ही रहे तो हम अपनी उस वास्तविक दुनिया में कभी नहीं लौट पायेंगे। मतलब अपने हिसाब से हम नार्मल ही रहेंगे, लेकिन बाहर की दुनिया के लोगों के लिये पागल हो चुके होंगे, जिन्हें दुनिया का कोई डॉक्टर ठीक नहीं कर सकता। मिस्टर गेरिट की वाईफ के साथ यही हुआ था।"

"तो… क्या करना चाहिये हमें?" सभी गहरी उलझन में पड़ गये।

"पहले प्राब्लम समझो, फिर सोल्यूशन डिस्कस करते हैं… हम इस रियलिटी में तीन तरह के टाईम जोन कैरी कर रहे हैं। एक जो वास्तविक दुनिया में चल रहा है, जहां आधी रात हो चुकी है। दूसरा जो इस घर के बाहर फार्म हाऊस में चल रहा है, जहां अब शायद साढ़े आठ बजे होंगे और तीसरा इस घर के अंदर जहां सिर्फ घड़ी की सुइयां आगे सरक रही हैं लेकिन वक़्त उसी जगह रुक जायेगा, जो हम बाहर छोड़ आये हैं। यानि असली दुनिया की सुबह होने में समझो कि सात-आठ घंटे बाकी हैं… तो यह सात-आठ घंटे हमें फार्म हाउस के टाईम जोन में गुज़ारने हैं, तभी हम सुबह की रोशनी में पहुंच पायेंगे, भले बाहर की घड़ी में तब रात के तीन या चार बजे ही दिख रहे हों। अगर हम अंदर आते हैं तो वक़्त रुक जायेगा और इसी तरह यह बचे हुए सात घंटे गुज़र गये और बाहरी वास्तविक दुनिया में सुबह हो गई… तो हम इसी रियलिटी में अटके रह जायेंगे। जैसे हमने बाहर निकलने की कोशिश में देखा। हो सकता है कि बाहर से मिस्टर गेरिट हमें लेने आ जायें, लेकिन वे हमें किसी और रूप में दिखेंगे, और तब हम शायद उनसे डरें या अपने लिये ख़तरा समझ कर उन पर हमला करें। वास्तविकता फिर शायद हमें कभी न दिखाई दे।"

"मतलब हम अंदर नहीं रुक सकते?" शाहज़ैन ने पूछा।

"नहीं… हमें बाहर रहना पड़ेगा और उन सब तमाशों को फेस करना पड़ेगा, उसी तरह हमें सुबह तक जाना है। तभी शायद हम इस रियलिटी से निकल पायें। अंदर रहेंगे तो वक़्त ही थमा रहेगा।"

"लेकिन मुझे अब भी दो बातें नहीं समझ में आ रहीं… हमने निकलने की कोशिश की, लेकिन निकल नहीं पाये जबकि गेरिट फैमिली के सभी लोग आधी रात को निकलने में कामयाब रहे। हमारे फोन सही फंक्शन नहीं कर रहे, जबकि उनके बेटे और बेटी की तरफ़ से उन्हें फोन या मैसेज गये… तो आखिर ऐसा क्यों है?" सिद्धार्थ ने सोचते हुए कहा।

"घंटा भर दिमाग़ खपाने के बाद मुझे इतनी बात समझ आ पाई… शायद एकाध घंटे बाद वह भी समझ आ पाये। फिलहाल बाहर चलो और बाहर वाली रात गहराने दो।" वरुण ने उठते हुए कहा और बाहर की तरफ़ बढ़ लिया।

वे चारों भी मरे-मरे क़दमों से बाहर निकल आये… बाहर रुकी हुई रात फिर चल पड़ी। अब बाहर रहना था, तो ऐसे ही खड़े या बैठे तो नहीं रह सकते थे। तो माहिरा के कहने पर वरुण और सिद्धार्थ वहीं शाम में इकट्ठा की लकड़ियों से आग जलाने लगे— तो बाकी तीनों लोग अंदर से कुर्सियां उठा लाये बैठने के लिये। पहली बार में बाहर लाई गई उपेक्षित पड़ी बियर की बोतलें भी वापस कब्ज़ा ली गईं और आग जला कर वे वहीं बैठने के बाद बियर पीने लगे।

"फाईनली करना हमें वही पड़ा, जो हमने सोचा था।" एक घूंट हलक में उतारने के बाद नोमी ने कहा।

"अभी भी म्यूज़िक और डांस मिसिंग है… लेकिन सच पूछो तो ऐसे माहौल में मेरी इतनी हिम्मत भी नहीं।" माहिरा ने झुरझुरी सी लेते हुए कहा।

"हम एक बात और मिस कर रहे हैं।" थोड़ी देर बाद सिद्धार्थ ने सबका ध्यान खींचा।

"क्या?" इस बार वरुण ने पूछा।

"मिस्टर गेरिट की बहू पजेस हुई, दामाद पजेस हुआ, लेकिन वे किसी की जान न ले पाये— जबकि बाद में रहने आये लेखक के साथ भी यही हुआ होगा और उसके बीवी-बच्चे उसके हाथों मारे गये… यानि इस बात की भी पूरी संभावना है कि हम में से कोई एक या दो लोग पजेस्ड हो जायें और बाकियों के लिये ख़तरा बन जायें— तो ऐसी सिच्युएशन में हमें क्या करना है?"

इस तरफ़ ध्यान जाते ही सब सहम गये और एक दूसरे का मुंह देखने लगे। किसी के पल्ले न पड़ा कि अगर ऐसा हुआ तो ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता है… क्या उन्हें एक दूसरे के खिलाफ़ हिंसा करनी पड़ सकती है?

"अगर हम यहीं बैठे एक दूसरे को बांध दें इस तरह कि हम कुछ कर ही न सकें— तब? आखिर यह सुपर नेचुरल्स ख़ुद तो कुछ करते नहीं, इंसानों को पजेस कर के, उनसे ही सबकुछ कराते हैं। तो अगर हम बंधे होंगे तो वे हमें पजेस कर भी लेते हैं तो हमारे ज़रिये भला क्या कर पायेंगे?" काफ़ी देर सोचने के बाद शाहज़ैन को एक उपाय सूझा।

"और अगर कुछ ऐसी सिच्युएशन बन गईं, जहां हमें भाग कर या लड़ कर जान बचाने की ज़रूरत हुई— तब? तब तो बंधे होने के चलते हम ख़ुद ही आसान शिकार हो जायेंगे।"

फिर वे निरुत्तर हो गये।

बियर चुसकते आधे घंटे की माथापच्ची के बाद भी वे किसी नतीजे पर न पहुंच सके कि आखिर वे ऐसी किसी मुसीबत से कैसे बच सकते हैं। इस बीच रात आगे सरकती रही और बड़ी धीमी गति से स्थितियों में बदलाव होता गया।

"गाईज़… मेरे ख़्याल से खेल शुरू हो चुका है।" सहसा वरुण एक तरफ़ नज़र टिकाते हुए बोला— "अब देखो सब तरफ़।"

सबने चौंकते हुए इधर-उधर देखा— चांद भी अब निकल आया था, लेकिन वैसा नहीं था जैसा अमूमन होता था, बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे वह रक्त स्नान करके निकला हो। फार्म हाउस के बाहर खड़े पेड़ हल्के-हल्के ऐसे हिलने लगे थे जैसे तेज़ हवा चल रही हो, जबकि हवा थमी हुई थी। साथ ही ज़मीन की तरफ़ तेजी से धुंध फैलने लगी थी और जो आसपास के पूरे फार्म हाउस को अपनी चपेट में लेती लग रही थी। दूर कुछ सरगोशियां भी गूंजने लगी थीं, जैसे कुछ लोग फुसफुसा कर बातें कर रहे हों— हालांकि वे आवाज़ें काफी दूर की लग रही थीं।

उनके रोंगटे खड़े हो गये और धड़कनें अनियंत्रित होने लगीं।

"अगर अब हम यहां से निकलने की कोशिश करें तो?" नोमी ने लरजती हुई आवाज़ में कहा।

"मुझे नहीं लगता कि अब हम आधे रास्ते भी पहुंच पायेंगे।" वरुण ने इनकार में सर हिलाया।

"कभी सोचा भी नहीं था कि हमें ऐसे हालात से भी दो चार होना पड़ेगा। हमेशा लगता था कि पैरानार्मल की बातें सब बकवास होती हैं… इनका कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है।" शाहज़ैन ने बुझे-बुझे स्वर में कहा।

"अगर हम में से कोई पजेस्ड हुआ, तो बाकियों को उसे रोकना पड़ेगा, लेकिन हम उसे क़ैद भी कहां करेंगे? अगर अंदर किया तो उस बंदे के लिये बाहर का वक़्त रुक जायेगा और वह उसी कंडीशन में रात पार कर जायेगा, फिर हो सकता है कि वह इसी रियलिटी में फंसा रह जाये।" सिद्धार्थ ने प्रश्नात्मक मुद्रा में शाहज़ैन और वरुण को देखा।

"बाहर ही रखना पड़ेगा… शायद सर पर चोट देकर बेहोश करना पड़े। हमें रस्सियों की ज़रूरत पड़ेगी। पहले ही प्रबंध कर लेते हैं।" शाहज़ैन ने खड़े होते हुए कहा।

उसका साथ देने के लिये सिद्धार्थ भी खड़ा हो गया— दोनों लड़कियों ने उठने का यत्न न किया। घर के अंदर उन्हें कम से कम वक़्त गुज़ारना था— वर्ना उनका और बाहर वालों का वक़्त अलग हो जाता। फिर भी पांच मिनट लग गये उन्हें किचन से रस्सी ढूंढने और बाहर आने में। उतनी देर तक बाहर मौजूद तीनों लोग अतिरिक्त तनाव से जूझते रहे और उन्हें बाहर आते देख तीनों ने राहत की सांस ली।

"अब हम पांच मिनट तुम लोगों से पीछे हो चुके हैं… हालांकि इतना वक़्त एडजस्ट किया जा सकता है।" शाहज़ैन ने रस्सी का बंडल आग के पास डालते हुए कहा।

"कोई आ रहा है?" उसी वक़्त माहिरा ने सिस्कारी भरी।

चारों बुरी तरह चौंक कर उधर मुड़े, जिधर वह देख रही थी… उधर बंगले की तरफ़ आया रास्ता था जो उसी पेड़-पौधों वाले झुंड से गुज़र कर सामने आता था। पहले उधर अंधेरा था, ज़मीन पर फैली धुंध थी और हिलते हुए पेड़ थे— लेकिन अब कोई सफेद सी चीज़ भी उनमें शामिल हो गई थी जो इसी ओर चली आ रही थी। उनके शरीर में फिर ख़ौफ से भरी सर्द लहरें गुज़रने लगीं और धड़कनों की तारतम्यता बिगड़ने लगी।

"कोई लड़की लगती है।" नोमी ने फुसफुसाहट भरे स्वर में कहा।

"लड़की… इस रियलिटी में लड़की होने की दूर-दूर तक भी कोई संभावना है? भूतनी कहो, चुड़ैल कहो, आत्मा कहो… लड़की होने की कोई तुक नहीं यहां।" वरुण ने डरे-डरे स्वर में कहा।

अब अगर इंसान को पहले से पता हो जाये कि सामने दिखने वाला इंसान नहीं, बल्कि कुछ और ही है तो हालत ख़राब हो जाना स्वाभाविक बात थी— फ़िर भले दिखने में सामने वाला कितना ही भला-भला सा हो। आने वाला जब थोड़ा और नज़दीक आ गया तब यह स्पष्ट हो गया कि वह कोई युवती ही थी, जिसने सफ़ेद गाउन पहन रखा था और गाउन भी ऐसा था, जैसे ख़ुद ही चमक छोड़ रहा हो। चेहरा तो स्पष्ट नहीं था— पर काया से उसके युवती होने का अंदाज़ा लगाया जा सकता था।

"कितनी अजीब बात है कि हम एक चुड़ैल या आत्मा को साक्षात देख रहे हैं।" माहिरा ने बुदबुदाते हुए कहा और शाहज़ैन से सट गई।

"क्या पता यह मिस्टर गेरिट हों… हम जिस कंडीशन में हैं, उसमें वास्तविक दुनिया की किसी भी चीज़ या इंसान को उसके एक्चुअल रूप में नहीं देख सकते… तो अगर हमारी ख़ैर ख़बर लेने वे वाक़ई आ भी जायेंगे तो हमें वे मिस्टर गेरिट के रूप में नहीं दिखेंगे— किसी और ही रूप में दिखेंगे।" सिद्धार्थ ने दिमाग़ लगाया।

"लेकिन वे इस रियलिटी को फेस भी कर चुके हैं और इससे निकल भी चुके हैं, तो इस वक़्त अकेले आने की हिम्मत तो नहीं कर सकते। पहले भी अपने बेटे और बेटी के परिवार को बचाने आये थे तो ढेरों लोगों को लेकर आये थे। यह वह नहीं हो सकते।" शाहज़ैन ने नकारात्मक रूप से गर्दन हिलाते हुए कहा।

वह युवती पास आते-आते और स्पष्ट होती गई… उसे देखते पांचों उम्मीद कर रहे थे कि वह डरावने चेहरे वाली कोई चुड़ैल होगी, जो पास आते ही उन्हें डराने के लिये अपने ख़ौफनाक रूप में आ जायेगी— लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। भले चांदनी सामान्य से अलग और लालिमा लिये हुए थी, लेकिन युवती के गेट तक पहुंच जाने पर वे देख सकते थे कि वह एक सुंदर सौम्य चेहरे वाली योरोपियन युवती थी, जिसके चेहरे पर कोई विकृति, कुरुपता, मुर्दनी या हिंसा जैसा कुछ नहीं था। कैसे भी नहीं लगता था कि वह एक ख़ूबसूरत युवती के रूप में इंसान नहीं थी। उसे देखते वे पांचों अंदर ही अंदर डरे और दुविधाग्रस्त थे— जबकि वह पूरी सहजता से उन्हें देखते एक मनमोहक मुस्कान के साथ गेट खोलती भीतर चली आई थी।

"हैलो फ्रेंड्स… उम्मीद है कि मैंने डिस्टर्ब नहीं किया आप लोगों को।" वह पास आते हुए बोली— आवाज़ में भी एक गरिमापूर्ण सौम्यता थी।

पहले तो उन्हें जवाब देते न बना… फिर उसने दोबारा पूछा तो उनकी चेतना पर चोट सी पड़ी और वे सकपकाते हुए जैसे होश में आये।

"नन-नहीं… आइये, बैठिये।" वरुण ने उसकी तरफ़ कुर्सी बढ़ाते हुए कहा और आभार जताते बैठ गई— अब उसके इतने पास आने और बैठने पर वे उसके पेट का उभार देख सकते थे, जो बताता था कि वह शायद गर्भवती थी।

"अब रातों को अच्छी-खासी ठंड होने लगी है— ऐसे में आग बड़ी राहत देती है।" वह दूर से हाथ सेंकती हुई बोली।

"जज-जी… आप?" सबकुछ जानते समझते भी शाहज़ैन ने चेहरे पर परिचय पाने वाले भाव उकेरे।

"मैं… एलीम हूँ— फ्राम हाईफा। आप लोग भी बैठ जाइये… यह आप लोगों के चेहरे इतने फक क्यों पड़े हुए हैं, क्या मैंने आपको डरा दिया है?"

"नन-नहीं तो… बस इतनी रात गये ऐसी जगह कोई लेडी सामने आ जायेगी, तो थोड़ा बहुत डर तो लगेगा ही।" सिद्धार्थ ने जबरन सहज होने का दिखावा किया और उसके सामने बैठ गया।

उसकी बात सुन कर वह हंसी तो ऐसा लगा जैसे शीशे के गिलास में बर्फ के टुकड़े खनखनाये हों। उसकी हंसी में कोई मुर्दनी नहीं थी, बल्कि एक ज़िंदादिली थी जो किसी मुर्दे में होनी मुश्किल थी— लेकिन इस जगह और इस माहौल में ज़िंदा इंसान की संभावना कितनी थी?

"यह चांदनी भी न… कभी कितनी रोमांटिक लगती थी, लेकिन आजकल बड़ी हॉरिबल लगने लगी है। ऐसा लगता है जैसे यह ब्लडी चांद किसी मुर्दों की बस्ती से हो कर आता है, ख़ून से नहाते हुए। क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता?" उसने इस बार बड़ी दिलचस्पी से नोमी और माहिरा को देखा।

"लगता है मैम… अभी हम भी यही बात कर रहे थे कि यह चांदनी कितनी अनरोमांटिक है।" वरुण ने भी बैठते हुए बात बनाई।

अब गिनती के हिसाब से कुर्सियां पांच ही थीं तो अगर एलीम बैठ गई थी तो वे सब नहीं बैठ सकते थे। ऐसे में शाहज़ैन भी बैठ गया और नोमी जहां सिद्धार्थ के पीछे खड़ी हो गई, वहीं माहिरा शाहज़ैन के पीछे खड़ी हो गई।

"आप अकेले लगते हैं इन कपल्स के बीच?" एलीम ने मुस्कुराते हुए वरुण को देखा।

"जी… मेरा हालिया ब्रेकअप हुआ है तो बस उसी से उबरने के लिये हम यहां टूर पर आये थे। आप यहीं कहीं रहती हैं?" वरुण ने झिझकते हुए पूछा।

"मैं… मैं तो यहीं रहती हूँ। मिस्टर गेरिट ने आप लोगों को शायद मेरे ही घर में मेहमान बना कर भेज दिया है। वह घटिया आदमी है— पैसों के लालच में कुछ भी झूठ बोल देता है। मैं सुबह अपनी मम्मी के यहां गई थी— अभी वहीं से लौटी हूँ।" उसकी आवाज़ में थोड़ा रोष उभर आया।

"क्या सच में… यह आपका घर है? लेकिन हमें अंदर तो कोई सामान भी नहीं मिला, जो इशारा करता कि यहां कोई रह रहा है।"

"दिन में कोई होगा नहीं तो उसने सब हटवा दिया होगा। वह ऐसा ही करता है… लेकिन कोई बात नहीं, मुझे आप लोगों से कोई शिकायत नहीं। आप लोग यहां रह सकते हैं।"

"सॉरी मैम… हमें नहीं पता था कि यह आपकी जगह है, तो हमने यूज़ कर ली। हम सुबह होते ही यहां से चले जायेंगे। वैसे आप यहां अकेले ही रहती हैं?"

"नहीं तो… मेरे पति और बेटी भी तो यहीं हैं। वह शायद आपको दिखे न हों… मिस्टर गेरिट बहुत ज़ालिम आदमी है तो उससे हम तीनों को डरना पड़ता है। अगर वह दिन में अपने आदमियों को ले कर आया होगा तो मेरे पति उससे डर कर उस पेड़ पर छुप गये होंगे। उन्हें ऐसी हालत में वहीं छुपना पसंद है… और मेरी बेटी अंदर कहीं किसी कैबिनेट या अटारी में छुप गई होगी। उन्हें उनकी मर्ज़ी के बग़ैर उस जगह से कोई नहीं निकाल सकता… लेकिन अब मैं आ गई हूँ तो वे मेरी आवाज़ पर बाहर ज़रूर आयेंगे।" उसकी बातें उलझाने वाली थीं— उसके संकेत पर वे बंगले के साइड लॉन में खड़े एक बीच के पेड़ की तरफ़ देखने लगे जो अपनी जगह खड़े-खड़े ऐसे हिल रहा था, जैसे उसे हिलाया जा रहा हो, जबकि हिलाने वाला वहां कोई नहीं था।

"कम ऑन हनी— आ भी जाओ अब… इनसे डरने की ज़रूरत नहीं है।" एलीम ने ऊंची आवाज़ में कहा तो प्रतिक्रियास्वरूप वह पेड़ और ज़ोर से ऐसे हिला जैसे ख़ुद से नाच गया हो— और एक सफ़ेद गठरी सी नीचे टपक पड़ी… जिसे देख कर एक बार फ़िर उन पांचों के शरीर में कई सर्द लहरें गुज़रीं और वे कांप कर रह गये।
 
गठरी घास पर पड़े-पड़े अकड़ने लगी और उसमें से पहले एक मुंह बरामद हुआ और फिर हाथ-पैर निकल आये… और कुछ दूर चौपाये की तरह चलने के बाद वह इंसानी आकार में ढलते खड़ा हो गया और उनकी तरफ़ बढ़ आया। वह चेहरे से पैंतीस के आसपास का लगता था, औसत कद-काठी थी, आँखों पर चश्मा चढ़ा था और होंठों की कोर से ख़ून की लकीर भी नीचे की तरफ़ बन रही थी। वह भी गौरवर्णीय ही था और रंगत व त्वचा में एलीम से ही मिलता-जुलता था। जिस तरह वह उनके सामने आया था, वह इंसानी संभावनाओं से बाहर था— लेकिन दिखावा वे दोनों ऐसे ही कर रहे थे, जैसे यह सब बिलकुल सामान्य बात हो।

"यह मेरे हसबैंड हैं— सैमुअल। इन्हें अपने जिस्म को तोड़ने-मरोड़ने की ऐसी कला आती है जो पूरे इजरायल में किसी और को नहीं आती।" उसने एक एक्सक्यूज देने की कोशिश की और उठ कर सैमुअल को खाली पड़ी कुर्सी पर बिठा लिया— "तुमने फ़िर अपनी जीभ काट ली है हनी। ब्लड आ रहा है… पोंछ लो।" फिर ख़ुद ही हाथ बढ़ा कर उसकी ठोढ़ी से खून पोंछ दिया, "इस बार मिस्टर गेरिट ने इन्हें हमारी जगह दी है। भले लोग दिखते हैं तो इनके साथ हम एक रात के लिये यह घर शेयर कर सकते हैं।"

"हां, मैं इन्हें काफी देर से देख रहा हूँ— लेकिन मुझे लग रहा था कि यह हमारे लिये ख़तरा हो सकते हैं, तो सामने आने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी।" सैमुअल नामी उस शख़्स ने खेद भरे स्वर में कहा और उन पांचों को लगा, जैसे वे दोनों उनका मज़ाक उड़ा रहे हों— वे ख़ुद को डरा बता रहे थे, जिनके डर से पांचों की हालत ख़राब हुई जा रही थी।

"अ-आप की बेटी?" वरुण ने हिचकते हुए पूछा कि इसी बहाने वे वहां से टलें और वे पांचों अपनी बातें कर सकें— जो उनके सीने में फंसी घुटन पैदा कर रही थीं।

"अरे हां, हमें लिआ को भी देखना चाहिये… वह बेचारी हमारा वेट कर रही होगी। आइये, आपको दिखाते हैं कि हमारी बेटी छुपने के लिये कैसे कोने चुनती है।" बेटी की तरफ़ ध्यानाकर्षण कराने पर वह खड़ी हो गई और उसे देख सैमुअल भी खड़ा हो गया।

"हम… अ-आप लोग देख आइये न… हम यहीं बैठे हैं तब तक।" सिद्धार्थ ने सकपकाते हुए कहा।

"अरे ऐसे कैसे… आप लोग हमारे मेहमान हैं और आपकी वजह से हमारी बेटी अंदर कहीं छुपी हुई है, तो आप हमारे साथ ऐसा कैसे बिहैव कर सकते हैं। आपको दिखा कर हमें उसे यक़ीन दिलाना पड़ेगा कि आप दुश्मन नहीं दोस्त हैं— तभी तो वह बाहर आयेगी।" सैमुअल ने पहली बार मुंह खोला तो अंदाज़ धमकी देने जैसा था।

संदेश साफ़ था कि उन्हें दोनों के साथ अंदर जाना था— मना करने का ऑप्शन नहीं था, वर्ना जो भूत-चुड़ैल इतने जेंटलमैन बने बात कर रहे थे, वे एकदम आपे से बाहर हो जाते। कसमसाते हुए वे दोनों के पीछे अंदर बढ़ लिये… लेकिन अंदर घुसते ही फिर उन्हें ज़ोर का झटका लगा और वे भौंचक्के से एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

सामने लिविंग रूम में सोफे पर एक व्यक्ति बैठा एक मैग्जीन के पन्ने पलट रहा था, जो उन्हें अंदर आते देख मैग्जीन से नज़र हटा कर उन्हें देखने लगा था। वह करीब चालीस की वय का कद्दावर शख़्स था, जिसने काला सूट पहन रखा था और सर पर हैट भी लगा रखी थी।

"ओह मिस्टर जेरर्ड… आप आ गये।" एलीम ने बड़ी खुशदिली से कहा।

"हां, बस अभी थोड़ी देर पहले ही आया… यह लोग कौन हैं?" उस व्यक्ति ने खोजी दृष्टि से पांचों को देखा।

"मिस्टर गेरिट ने इन्हें यह जगह दी है रहने के लिये— बिना इन्हें कुछ बताये कि यह जगह उनकी नहीं हमारी है। दोपहर में वह अपने आदमी लेकर आया होगा और हमारा सब सामान हटा गया कि इन भले लोगों को पता ही न चले कुछ हमारे बारे में।" उसे जवाब एलीम ने दिया।

"लल-लेकिन आप कब आये? हम तो बाहर ही बैठे थे, हमने तो आपको नहीं देखा।"

"मैं पीछे से नदी के ज़रिये आवाजाही करता हूँ।" उसने हल्की मुस्कराहट के साथ जवाब दिया।

"यह मिस्टर जेरर्ड हैं— यह भी हमारे साथ यहीं रहते हैं।" इस बार सैमुअल ने उस व्यक्ति के बारे में बताया— "और आप लोगों के बारे में हम बाद में जान लेंगे, पहले लिआ को देखना चाहिये।"

अब वे बेचारे क्या कहते— देखने में तो लगता था कि वे आम इंसान ही थे और सच ही बोल रहे थे। उस हिसाब से मिस्टर गेरिट ही सब तमाशों के ज़िम्मेदार लग रहे थे… लेकिन इतनी देर में जो वे भुगत चुके थे, उसे देखते हुए उन्हें यक़ीन था कि अब जो भी सामने था, वह इल्यूज़न था और किसी भी पल में ख़त्म हो सकता था। अच्छे-भले दिखते वे इंसान किसी भी पल में कुछ के कुछ हो सकते थे— और उन्हीं पलों का सामना करने के लिये वे ख़ुद को तैयार कर रहे थे।

उन्हें भी एलीम और सैमुअल के साथ लिआ की तलाश में घर में फिरना पड़ा— जबकि वे पहले ही यह देख चुके थे कि वहां कोई नहीं था… लेकिन अब उम्मीद थी कि किसी भी कोने खुदरे से उनकी वह बच्ची बरामद हो जायेगी… और हुआ भी यही। माँ-बाप की पुकार पर उस घर के ही स्टोर रूम में मौजूद बंद एक कबाड़ सी अलमारी से वह बरामद हुई और उन्हें सामने देख कर एकदम से सहम गई, जबकि हकीक़त में घर में बढ़ते लोगों को देख कर जान उन पांचों की सूखती जा रही थी। लिआ करीब ग्यारह-बारह वर्ष की बच्ची थी, जो एक गंदी सी फ्राक पहने थी।

"न बेटा— डरो मत… यह लोग हमारे दुश्मन नहीं है। बस इन्हें झूठ बोल कर यहां भेज दिया गया है। यह आज रात ही यहां हैं— कल चले जायेंगे।" एलीम ने उसके सर पर हाथ फिराते हुए कहा।

"सच में… आप लोग कल चले जायेंगे।" लिआ ने बड़ी मासूमियत से उन्हें देखा।

"अं… हं-हां… हम सुबह ही चले जायेंगे बेटा।" शाहज़ैन ने फीके से स्वर में कह तो दिया लेकिन मानस पटल पर एक बड़ा सा सवालिया निशान उभर कर रह गया कि क्या ऐसा वाक़ई हो पाने की कोई संभावना बची भी थी?

"देखा… यह भले लोग हैं बेटा। हमें इनकी वजह से कोई परेशानी नहीं होगी।" सैमुअल ने भी जैसे बच्ची को तसल्ली दी।

"मेरे ख़्याल से हमें बाहर जाना चाहिये— हम वहीं रात गुज़ार लेंगे, आप लोग आराम से अंदर रहिये।" बाहर के थमे वक़्त का ध्यान आते ही वरुण ने कहने में देर न की।

"अरे कोई नहीं… आप लोग रह सकते हैं अंदर ही। हमारे पास एक्स्ट्रा बेडरूम है।" जेरर्ड ने उसकी बात काटने में देर न की।

"हां, लेकिन हमें बाहर ही रुकना है— तो प्लीज, आप लोग हमें माफ कीजिये। हम वहीं रुकने आये थे और अब वहीं जा रहे हैं।" बड़ी हिम्मत करके सिद्धार्थ ने थोड़ी सख़्ती दिखाई।

"अच्छा ठीक है, नाराज़ क्यों होना। हम भी आपके साथ बाहर चल रहे हैं।" एलीम ने जैसे फौरन बात संभाली।

बहस होने या और ज्यादा हिम्मत दिखाने की ज़रूरत न पड़ी और वे बाहर की तरफ़ बढ़ आये… लेकिन बाहर एक और झटका उनका इंतज़ार कर रहा था। जो लॉन और कुर्सियां वे खाली छोड़ कर अंदर गये थे— वह अब खाली नहीं थीं, बल्कि वहां पांच लोग बैठे थे जिनमें दो जवान थे, एक अधेड़ था और एक पचास से ऊपर था। सभी स्थानीय थे और पुराने से सूट पहने हुए थे, जो उनकी कमज़ोर आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित करते थे। वे उन पांचों कुर्सियों पर बैठे आग ताप रहे थे और उन सबके पहुंचने पर उनकी तरफ़ आकर्षित हो गये थे।

"अरे… आप लोग भी आ गये। इनसे मिलिये— मिस्टर गेरिट ने इन लोगों से झूठ बोल कर, इन्हें मेहमान बना कर भेजा है और आज रात यह हमारे साथी हैं।" सामना होते ही सबसे पहले एलीम चहकी थी और वे पांचों जैसे सम्मान जताने के लिये खड़े हो गये थे।

"ओह… हमें लगा कि आप लोग ही यहां बैठे थे।" उनमें से एक ने बड़ी शिष्टता से कहा— "हम क्षमा चाहते हैं अगर हमारी वजह से आपको कोई असुविधा हुई हो।"

"अरे नहीं-नहीं— ऐसी कोई बात नहीं। आप लोग बैठिये… यह भले लोग हैं, इन्हें हमसे कोई समस्या नहीं है। हम मिल जुल कर यह रात गुज़ार सकते हैं। सैम… क्यों न तुम और मिस्टर जेरर्ड अंदर से और कुर्सियां निकाल लाओ, ताकि हम सब यहां बैठ सकें।"

"ज़रूर।" सैमुअल ने आज्ञाकारी पति की तरह कहा और जेरर्ड को लिये अंदर बढ़ गया।

एलीम ने रिक्वेस्ट करके उन पांचों को भी अंदर भेज दिया और सब मिल कर दस और कुर्सियां अंदर से उठा लाये। इस बीच एलीम ने उन पांचों के बारे में बता दिया कि वे पास में ही रहते थे और मजदूरी आदि करते थे और उनके नाम डान, स्टिन, रूबेन, नील्स और कोर्नेलिस थे। वे पांचों अंदर ही अंदर बुरी तरह नर्वस से बस दर्शक भर बने हुए सब देखते 'हूं-हां' करते रहे थे। जब सभी कुर्सियां आ गईं तो सभी आग के आसपास ही बैठ गये।

"तो आप लोगों के हिसाब से मिस्टर गेरिट ने हमें झूठ बोल कर यहां भेजा है?" आखिरकार हिम्मत करके शाहज़ैन ने बात शुरु की।

"हां, आफकोर्स… आप इन लोगों से पूछ सकते हैं। यह भी यहीं पास में रहते हैं और यह भी इस बात की गवाही देंगे कि गेरिट हमें हमारे घरों और ज़मीनों से भगाना चाहता है— जैसे दुनिया के बाकी पूंजीपति और पालिटिशंस करते हैं जंगलों और बियाबानों में रहने वालों के साथ। कभी उन्हें लोकल्स को हटा कर ज़मीन खोदनी रहती है, तो कभी कमाई के लिये कोई डेस्टिनेशन ड्वेलप करना रहता है। शिकार हमेशा लोकल्स ही होते हैं।" एलीम ने ही जवाब दिया।

"तो क्या आप लोग हमें मिस्टर गेरिट तक पहुंचा सकते हैं। हम सक्षम लोग हैं, मिस्टर गेरिट को फोर्स कर सकते हैं कि वे ऐसा न करें।" वरुण ने सूखे अधरों पर ज़बान फेरते हुए कहा।

"बिलकुल पहुंचा सकते हैं, बल्कि हम भी आपके साथ चलेंगे लेकिन अब इतनी रात गये वहां जाना ठीक नहीं। हम सुबह चलेंगे आप लोगों के साथ।" इस बार जवाब सैमुअल ने दिया।

"क्यों— रात को क्यों ठीक नहीं?" सिद्धार्थ ने पूछा।

"दरअसल यह इलाका पैरानार्मल एक्टिविटीज का केन्द्र है और रात होते ही इस जगह मरे लोगों की आत्माएं सक्रिय हो जाती हैं। अब पता नहीं कौन कब आक्रामक हो जाये और हम सबके लिये मुश्किल हो जाये।" जवाब तो जेरर्ड ने बड़े सहज स्वर में दिया, लेकिन उन्हें लगा जैसे ढंके-छुपे शब्दों में यह चेतावनी हो उन लोगों के लिये।

"और आप लोग उन मरे लोगों में से नहीं हैं— बल्कि ज़िंदा लोग हैं?" शाहज़ैन ने अजीब से अंदाज़ में कहा— जैसे पूछ न रहा हो, बल्कि ताना मार रहा हो।

"अरे! कमाल करते हैं आप… हम आपको किस एंगल से मरे लोग दिखते हैं? क्या मरे लोग हमारे जैसे डीसेंट और नार्मल दिखते हैं?" एलीन ने रूष्ट स्वर में कहा और उसे घूरने लगी।

"कमऑन— अब यह नौटंकी बंद कीजिये… हमें पता है कि सच क्या है। हम पागल थे जो पैरानार्मल एक्टिविटीज को एक्सपीरियेंस करने के लिये यहां चले आये… ठीक है, हो गया हमें एक्सपीरियेंस। अब और झेल पाने की हिम्मत नहीं है हमारी। हम यहां फंसे हुए हैं और बिना एक भी जान गंवाए यहां से जाना चाहते हैं। हमें जाने दीजिये।" वरुण कुछ जोश में आ कर खड़ा हो गया और हाथ जोड़ते हुए बोला।

"अरे क्या बात कर रहे आप… हम आपको क्या भूत-प्रेत लग रहे?" एलीम ने नाराज़गी भरे स्वर में कहा और बाकियों को देखा, जैसे उनसे समर्थन चाह रही हो— तो वे भी सब अप्रियता से उसे घूरने लगे।

"आप ऐसी बात कैसे कर सकते हैं?" सैमुअल ने सख़्त स्वर में कहा।

"क्यों— ग़लत क्या कह रहा है वह?" तभी नोमी गुर्रा उठी और सभी चौंक कर उसे देखने लगे।

चौंकने वाली बात उसका गुर्राना नहीं थी, बल्कि उसकी आवाज़ में आया बदलाव था— वह नोमी की आवाज़ नहीं थी, बल्कि उसके गले से निकली एक फटी हुई मर्दानी आवाज़ थी… जो बिलकुल अप्रत्याशित थी। जब सबने चौंक कर उसे देखा तो उसके चेहरे का रंग बदल चुका था, चेहरे पर नीली-नीली नसें उभर आई थीं और आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं। मुंह खुलने पर दिखा कि उसके दांत भी अजीब से हो चुके थे और अंदरूनी हिस्सा जैसे सड़ रहा था। अब बाकी लोगों पर जो भी असर हुआ हो लेकिन ख़ुद नोमी के साथी तो बुरी तरह घबरा गये। अपने में किसी के पजेस होने की कल्पना उन्होंने ज़रूर की थी, लेकिन इतने मुर्दों के बीच तो नहीं की थी। उनके हाथ-पैर फिर फूल गये और शरीर पसीने से चिपचिपा गया।

"तत-तुम कौन हो?" एलीन ने हकबकाते हुए कहा।
 
"मैं कोई भी हूँ लेकिन वह झूठ तो नहीं बोल रहा… तुम सब लोग मर चुके हो। तुम्हारी लाशें तक ज़मीन के अंदर सड़ चुकी हैं। तुम्हारी रूहें भटक रही हैं इस आयाम में… और तुम ख़ुद को ज़िंदा कहते हो।" नोमी ने फ़िर गुर्राते हुए उन सबको घूरा।

"नहीं— हम ज़िंदा हैं। हम मरे नहीं— हम ज़िंदा हैं।" प्रतिक्रिया में लिआ रुआंसी हो कर चिल्ला पड़ी।

"यह सच नहीं है… तुम मुझे धोखा नहीं दे सकती छोटी बच्ची। मैं बताती हूँ कि कौन कैसे मरा था— यह डान तब पेड़ के नीचे दब कर मर गया था जब यह गेरिट के दूसरे लोगों के साथ वहां पेड़ काट रहा था और यह स्टिन भी उसी जगह बाद में सांप के काटने से मारा गया था। तुम— मिस्टर रूबेन, तुम जेसीबी चलाते थे न और इसी जगह मौजूद मेरे खंडहर जैसे घर को गिराते वक़्त हार्ट अटैक का शिकार हो कर मरे थे। यह नील्स भी उस खंडहर को गिराने वालों में शामिल था लेकिन बाद में दुनिया की नज़र से गायब हो गया, जबकि यह इस घर के नीचे मौजूद एक सुरंग में फंस कर मारा गया था और यह कोर्नेलिस इस बंगले को बनाते वक़्त एक भारी लकड़ी के नीचे दब कर मारा गया था। कह दो कि यह झूठ है?" नोमी ने चुनौती देते उन पांचों को देखा— लेकिन पांचों बस कसमसा कर रह गये।

"तो यह सब वही हैं जिनके बारे में मिस्टर गेरिट ने हमें बताया था।" माहिरा के मुंह से निकला।

"हां— यह सैमुअल वही लेखक है जो गेरिट के मना करने पर भी अपनी ज़िद पर यहां रहने आया था और इसने अपने हाथों से इस एलीम और इस लिआ को चाकुओं से गोद डाला था और फिर ख़ुद को भी गोद लिया था… और यह जेरर्ड… अपने क्रिमिनल साथियों से बचता हुआ यहां आ छुपा था और मारे ख़ौफ के ख़ुद ही मर गया था।" इस बार बात ख़त्म करते हुए वह हंसी— हंसी भी ऐसी थी, जैसे उसके शरीर के अंदर कोई कराह रहा हो।

"तुम झूठ बोल रही हो— हम ज़िंदा हैं।" लिआ ने रोते हुए कहा और वहीं पड़ी एक लकड़ी उठा कर उस पर फेंक मारी।

इतने में क़यामत आ गई… नोमी का पहले से बिगड़ा चेहरा और बिगड़ गया। उसने वहशी जानवर की तरह गुर्राते हुए झपट्टा मारा और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता— उसने लिआ को दबोचते उसकी गर्दन में अपने दांत धंसा दिये। लिआ की एक मार्मिक चीख़ दूर तक सन्नाटे को भेदती दौड़ी और नोमी ने उसकी गर्दन का अच्छा-खासा मांस नोच डाला— जिससे भल-भल करता ख़ून उबलने लगा।

यह देख पहले तो सकते में आये लोगों में से एलीम और सैमुअल ने लिआ को नोमी से छुड़ाने की कोशिश की— फिर बाकी लोग जलती हुई लकड़ियों को हाथ में लेते नोमी पर टूट पड़े।

एकदम जड़ हो गये नोमी के साथियों की जड़ता नोमी पर हमला होते देख टूटी— वे हड़बड़ाते हुए उसे बचाने दौड़े तो उन्हें दूर झटक दिया गया। धकेले जाते वक़्त उन्होंने महसूस किया कि उन सब मुर्दों में ज़िंदों से कहीं ज्यादा ताक़त थी। शाहज़ैन, माहिरा और वरुण तो किसी तरह संभल गये मगर सिद्धार्थ ज़मीन पर लोट गया। तीनों फिर नोमी को बचाने के लिये उलझ पड़े, जो लिआ की गर्दन किसी जानवर की तरह भंभोड़े डाल रही थी, और लिआ अब उसकी पकड़ में झूल सी गई थी।

"छोड़ दो— छोड़ दो उसे… दूर हटो। दूर हटो।" फिर जब गरजता हुआ सिद्धार्थ खड़ा हुआ तो उसकी आवाज़, चेहरा और आँखें, सब बदल चुके थे और अब वह भी नोमी जैसी हालत में था।

किसी ने उसकी न सुनी और पलट कर कुछ लोग उस पर भी टूट पड़े। अब माहिरा, शाहज़ैन और वरुण के लिये बड़ी दुविधा हो गई— किसे बचायें, किससे बचें? जिसे नोमी मार रही थी, वो बच्ची ख़ुद मर चुकी थी पहले ही और अब नोमी और सिद्धार्थ भी ज़िंदों वाली हालत में तो नहीं थे… अभी भले लग रहा था कि वे पजेस्ड होने के बावजूद उनकी तरफ़ थे, लेकिन एक बार वे इन मुर्दों से पार पा गये तो फ़िर क्या उनके साथ सामान्य तरह से पेश आने वाले थे? ऐसा लग तो नहीं रहा था— ऐसा हो सकता तो फिर इस सब तमाशे की ज़रूरत ही क्या थी।

"यहां से भागो… अब वे दोनों भी उन्हीं के जैसे हो चुके हैं।" वरुण घबराये स्वर में बोला।

"भाग कर जायें कहां वरुण… अंदर तो यह भी आ जा सकते हैं और उस हालत में बाहर हमारे लिये वक़्त रुक जायेगा। तब इनके पास वक़्त ही वक़्त होगा हमें ख़त्म करने के लिये।" शाहज़ैन ने परेशान लहजे में जवाब दिया।

"यह लोग सब मिल कर नोमी और सिड को मार डालेंगे।" माहिरा भी रुआंसी हो गई।

"हम उन्हें नहीं बचा पायेंगे— वे हमसे कहीं ज्यादा ताक़तवर हैं।"

"फिर?"

"वह रस्सी उठाओ और भाग लो… फिलहाल हमारे लिये ख़ुद को बचाना ज्यादा ज़रूरी है। यह दोनों बच भी गये तो यह भी हमारे दुश्मन ही होंगे— जैसे इस सैमुअल ने अपनी बीवी और बेटी को मार डाला था।"

"लेकिन रस्सी किसलिये?"

"अभी हम में से और भी कोई पजेस हो सकता है। तब काम आयेगी।"

कुछ देर की झिझक और अपने साथियों को छोड़ भागने की नैतिक बाधा से जूझने के बाद अंततः वे इसी नतीजे पर पहुंचे कि यही सही था— और वे रस्सी उठा कर बाहर की तरफ़ भाग लिये। वहां से निकल सकते नहीं थे बिना दिन हुए— यह देख ही चुके थे तो कहीं और जाने का कोई मतलब नहीं था, बस वहां मौजूद जंगल में ही ख़ुद को छुपाना था। यह सोच कर पहले तो वे सामने के जंगल की तरफ़ ही भागे थे— लेकिन वहां हर तरफ़ धुंध फैली थी जो लगातार घनी होती जा रही थी। एक तो ज़मीन पर देखना मुश्किल था— दूसरे वे पेड़ जैसे ख़ुद ही जानदार शै बन गये थे और अपनी शाखों को लहराते ऐसे मचल रहे थे, जैसे पकड़ में आने वाले को दबोच कर मसल देंगे, तो उधर जाने में हिम्मत जवाब दे गई और वे पीछे के तालाब की तरफ़ चले आये।

पेड़ों की हालत इधर भी अलग नहीं थी— लेकिन खास तालाब के पास घनत्व कम था तो वहीं वे एक झाड़ियों के झुरमुट में आ कर पड़ रहे कि उस धुंध की वजह से उन्हें देखा न जा सके। हालांकि वे झाड़ भी ऐसे हिल रहे थे जैसे कसमसा रहे हों और साथ ही ऐसी आवाज़ें भी गूंज रही थीं, जैसे कुछ जानवर वहां बैठे ज़ोर-ज़ोर से सांस ले रहे हों… लेकिन इसके बावजूद वे तीनों वहां जमे हुए थे।

"वह मार डालेंगे दोनों को… हमें उनकी मदद करनी चाहिये थी।" वरुण भर्राये स्वर में बोला।

"हम कैसे भी उनकी मदद नहीं कर सकते थे वरुण। ख़ुद को गिल्ट में मत डालो… हम यहां फंस चुके हैं। अब जो भी हो, हर हाल में हमें अपने आप को बचाने पर फोकस करना है।" शाहज़ैन ने उसे समझाने की कोशिश की।

"उसने मेरे लिये वह लड़ाई शुरु की।"

"किसने वरुण… क्या वह नोमी थी? नहीं— वह नोमी नहीं कोई और थी और कोई और आत्मा उन दूसरी आत्माओं के खिलाफ़ तुम्हारी साइड क्यों लेगी। वह सब बस एक खेल था… हमारा शिकार करने का और उसी खेल को इस बहाने ट्रिगर किया गया था। वहां सब मुर्दे हैं… ज़िंदा बस नोमी और सिद्धार्थ ही थे, जिन्हें अब वह इस तरह शिकार बना लेंगे।" माहिरा ने डरे-सहमे लहजे में कहा।

"तो ऐसे में क्या हमें उनकी मदद नहीं करनी चाहिये थी?"

"वही तो पूछ रही है बकलोल कि किसकी मदद… वहां नोमी और सिड थे? उनके शरीर भर थे जिन्हें कोई और चला रहा था। हम उनकी मदद करते तो फिर वे हम पर टूट पड़ते… तब हम ही शिकार हो जाते।" शाहज़ैन एकदम से झुंझला गया।

"हमें यहां आना ही नहीं चाहिये था… पता नहीं क्या सूझ गया तुम लोगों को?"

"अब उस बात पर रोने से कोई फायदा नहीं यार… यहां से ज़िंदा बच के निकल पाये तो बहस कर लेंगे।"

वे चुप हो कर वहीं पड़ गये।

दस मिनट बाद उन्हें महसूस हुआ कि कुछ लोग उधर पहुंचे हों— उनकी सांसें फिर सीने में फंसने लगीं। कोई कुछ बोल नहीं रहा था लेकिन उनके चलने-फिरने से पैदा आवाज़ें उनके कानों तक पहुंच रही थीं। वैसे शायद छुपना मुश्किल होता, लेकिन वह धुंध एक आवरण की तरह उनका बचाव कर रही थी। वे ज़मीन पर लेट कर दम साधे पड़े गये और वे आवाज़ें आसपास फिरती रहीं।

"शाहज़ैन… माहिरा… वरुण… कहां हो तुम लोग?" तभी उनके कानों तक सिद्धार्थ की आवाज़ पहुंची, जो वाक़ई में उसी की आवाज़ थी लेकिन कहीं दूर से आ रही थी।

वरुण कुछ बोलने को हुआ, लेकिन तभी शाहज़ैन ने लपक कर उसका मुंह दबोच लिया और उसके कानों में फुसफुसाते हुए बोला— "धोखा भी हो सकता है। उन लोगों के रहते वे इतने बेफिक हो कर हमें नहीं पुकार सकते।"

तभी नोमी की आवाज़ आई… वह भी अपनी सामान्य आवाज़ में उन्हें नाम ले कर पुकार रही थी। वे चुप रहे… आवाज़ें आसपास फिरती रहीं और दूर कहीं नोमी और सिड उन्हें पुकारते रहे। बहुत ज्यादा वक़्त नहीं गुज़रा— कि माहिरा को अपनी पिंडलियों पर किसी लिजलिजी सी पकड़ कर का अहसास हुआ और उसने सिहरते हुए पीछे देखा तो धुंध और स्याही के मिश्रण के बीच सिवा सिवा एक जोड़ी आँखों के कुछ और न दिखा और उसकी बेसाख्ता ही चीख़ निकल गई।

"शश-शश।" शाहज़ैन ने उसे चुपाने की कोशिश की।

लेकिन पता चला कि कोई उसे पैरों की तरफ़ से पकड़ कर बेरहमी से खींचता चला गया… जब शाहज़ैन और वरुण यह समझ पाये तो उन्होंने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तब तक वह दूर हो चुकी थी। अब आसपास फिरती उन आवाज़ों का ख़ौफ छोड़ कर वे खड़े हो कर उसके पीछे लपके तो उसी तरफ़ मौजूद जेरर्ड और नील्स ने उन्हें देख लिया।

"अरे आप लोग इधर हैं… वहां आपकी साथी ने लिआ को मार डाला और वे उसे मार कर भाग भी गये। अभी सामने की तरफ़ कहीं हैं शायद… लेकिन हम दो लोग उनका सामना नहीं कर सकते। आप लोग भी चलिये तो देखते हैं।" जेरर्ड उन्हें देख कर उनकी तरफ़ लपका।

"हां, आप नहीं जानते— अगर उन्हें रोका नहीं गया तो वे बाकी सबको भी मार देंगे। वे अब आपके दोस्त नहीं हैं… वे जिन आत्माओं के कब्ज़े में हैं, वे उन्हें बिना मारे वैसे भी नहीं छोड़ेंगी। हमें उन्हें रोकना होगा।" नील्स ने भी उसकी हां में हां मिलाई।

"अरे भाड़ में जाओ तुम लोग।" शाहज़ैन पलट कर उन पर चिल्ला पड़ा और वे ससेट से गये।

जिस तरफ़ माहिरा का जिस्म खिंचा था, उधर एक बीच के पेड़ के पास सीवर पाईप पड़ा था जिसका कोई इस्तेमाल नहीं था। ऐसा लगा था जैसे उसे खींचने वाला उसे उसी पाईप में खींचता चला गया हो और वह अंदर हो कर ग़ायब हो गई थी। आखिरी पल में शाहज़ैन उसे बस छू भर पाया था। वैसे वह भी अंदर घुस जाता, मगर वरुण ने उसी पल में उसे पकड़ कर झटके से पीछे खींच लिया था।

"रुक-रुक शाज़ू… पीछे कोई रास्ता नहीं है। हम ऐसे ही निकाल सकते हैं उसे।"
 
Back
Top