बुत-ए-अस्वा
'बुत-ए-अस्वा' की कहानी वहां से शुरु होती है जहां से 'आतशीं' की कहानी ख़त्म हुई थी। पिछले भाग में आपने पढ़ा कि तीन अलग-अलग किरदार किस तरह अपनी प्रेम कहानियों को जीते हुए आगे बढ़ रहे थे—
'आतशीं' की कहानी शुरु हुई थी सफीर से, जो एक आर्मी कानवाय पर हुए हमले में फंस जाता है और अपनी भूतपूर्व प्रेमिका को उठा कर ले जाते देख अपहरणकर्ताओं के पीछे लग जाता है, लेकिन ख़ुद उनकी क़ैद में फंस जाता है और तब उसे चलता है कि उठाई गई लड़की रिमशा नहीं बल्कि उसकी दुश्मन जागीर की लड़की इल्मा थी, जो ख़ुद को सोशल मीडिया पर छुपा कर उसी से मुहब्बत करती थी। दोनों को अफगानिस्तान के सरहदी इलाके में ले जाया जाता है, जहां से उन्हें भागने का मौका तो मिलता है लेकिन इल्मा वापस पकड़ी जाती है और उसे पंजशीर में मौजूद एक तालिबान कमांडर ज़रगाम के पास बतौर रिश्वत भेज दिया जाता है। किसी समझौते की बिना पर सफीर को आज़ादी मिलती है लेकिन अब उसे इल्मा की मुहब्बत समझ में आ चुकी थी तो वह उसके कज़िन ओवैश के साथ उसे छुड़ाने पंजशीर जाता है और ज़रगाम के ठिकाने पर पहुंच भी जाता है।
'आतशीं' की दूसरी कहानी थी रय्यान की, जो उसी हमले से बचने के चक्कर में भटक कर एक जिन्नात लड़की गज़ल तक पहुंच जाता है और गज़ल से उसकी शादी करा दी जाती है। तब उसे पता चलता है कि यह पहले से तय था और हुकूमत पर काबिज़ ज़ालिम शाह आलम के पंजों से पंजशीर को छुड़ाने के लिये उसे ही कमान संभालनी थी। शाह आलम पहले उन दोनों को क़ैद करता है, लेकिन वे निकल भागते हैं तो वह गज़ल के पिता को क़ैद कर लेता है और अपने हत्यारे उनके पीछे लगा देता है। एक मायावी बाग़ में वे उन अजीब से मायावी बौनों का सामना करने के बाद उस जगह से निकल कर आगे बढ़ते हैं।
'आतशीं' की तीसरी कहानी उस जिन्नातों की सल्तनत के निर्वासित शहजादे आर्यन की थी, जो अपनी ही एक छिन चुकी रियासत की शहजादी मनाल के इश्क में उस तक पहुंचता है लेकिन पकड़ा जाता है। तब आज़ादी की शर्त पर उसे जिन्नातों के एक पवित्र शहर भेजा जाता है, जहां उसे शहजादी कज़ीमा को ज़हर देने के इल्जाम में फंसा दिया जाता है और उसे मनाल को बंधक बना कर वहां से भागना पड़ता है। रास्ते में वह एक घूल ओमार के हत्थे चढ़ जाते हैं जो उसके पिता ग़जावी और उसके खास साथी नज़ार से बदला लेना चाहता था और वह उन्हें बंधक बना कर अपनी सल्तनत वापस लेने की गरज से वहां पहुंचता है, जहां नज़ार को क़ैद रखा गया था।
बुत-ए-अस्वा में कहानी इससे आगे बढ़ती है... एक रहस्मयी बुत था, जो आकार-प्रकार के हिसाब से जाने किस तरह के जीव को रिप्रजेंट करता था, जिसे लेकर उस तक पहुंचे इंसानों का यह भी मत था कि वह कोई एलियन ऑब्जेक्ट हो सकता है— लेकिन उसमें यह कूवत थी कि वह की गई इच्छाएं पूरी कर सकता था और यह उसी का दिया वरदान था कि ग्रेटर अल्तूनिया नाम का वह जिन्नातों का विशाल साम्राज्य खड़ा हो पाया था… और उसी का यह श्राप भी था कि वह विशाल साम्राज्य आपसी संघर्ष में उलझ कर धीरे-धीरे खत्म हो रहा था।
एक तरफ वे जिन्नातों की हुकूमतें आपस में एक दूसरे के खून की प्यासी होकर लड़ मरने पर आमादा थीं और उनके बीच शाह आलम के रूप में वह ताक़तवर हस्ती उभर रही थी जो वापस उस बिखरी हुई सल्तनत को एक करके अपना परचम लहराना चाहता था— तो उसे रोकने के लिये इंसान और जिन्नात के बीच बनता वह गठबंधन भी अपना वजूद पा रहा था, जो स्वात की हरियाली से होते अफगानिस्तान के सहरा तक मिलती चुनौतियों से पार पाते हुए वहां पहुंच रहा था, जहां से सुधार की दिशा में एक अंतिम रास्ता जाता था— अतीत के उन दौर में, जहां से इस बिगाड़ की शुरुआत हुई थी।
उन पांच लोगों पर ही दारोमदार था, उस बुत से जुड़े श्राप को खत्म करने का और न सिर्फ उस साम्राज्य की खोई हुई खुशहाली वापस लाने का, बल्कि साथ ही उन्हें वर्तमान के उस बिगाड़ को भी दुरुस्त करना था, जो सीधे उनकी ज़िंदगी को प्रभावित कर रहा था और इस श्राप को खत्म करने के लिये उन्हें वक़्त में सदियों पीछे का सफर तय करना था— वे करते भी हैं… लेकिन वहां दूसरी मुसीबतें उनके इंतज़ार में तैयार बैठी थीं। क्या वे अपने मक़सद में कामयाब हो पायेंगे?
द ब्लडी कैसल
ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिये टेन मिलियन डॉलर की ईनामी रकम वाला एक रियलिटी शो 'द ब्लडी कैसल' लांच होता है जो हॉरर थीम पर होता है। यह शो सेशेल्स के एक निजी प्रापर्टी वाले हॉगर्ड आइलैंड पर आयोजित होता है जहां हांटेड प्लेस के तौर पर मशहूर किंग्समैन कैसल में कंटेस्टेंट्स को सात दिन और सात रातें गुजारनी होती है और जो भी कंटेस्टेंट सबसे बेहतर ढंग से सामने आने वाली हर चुनौती से लड़ेगा, उस हिसाब से उसे वोट मिलेंगे... सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विनर होगा।
'द ब्लडी कैसल' टीम, कैसल या आइलैंड के डरावने माहौल के सिवा भी अपनी तरफ से विज्ञान और तकनीक के इस्तेमाल के साथ उन्हें डराने की हर मुमकिन कोशिश करेगी कि उनकी हिम्मत का सख़्त इम्तिहान लिया जा सके। उनके हर पल को रिकार्ड करने के लिये कैसल समेत न सिर्फ़ पूरे आइलैंड पर बेशुमार कैमरे होंगे, बल्कि ड्रोन कैमरों की मदद भी ली जायेगी और उनकी सांसों पर भी कान बनाये रखने के लिये उनके गलों में एडवांस किस्म के रेडियो कॉलर पहनाये जायेंगे। उन कंटेस्टेंट्स से टीम कोई भी डायरेक्ट संवाद नहीं करेगी, न ही उन्हें किसी तरह की मदद उपलब्ध कराई जायेगी। कंटेस्टेंट्स को यह सात दिन अपने ढंग से बिताने के लिये पूरी छूट होगी और वे चाहें तो रेप और मर्डर तक कर सकते हैं।
शो के पहले सीजन के लिये भारत के अलग-अलग शहरों से आठ लोग चुने जाते हैं जो अलग-अलग फील्ड से थे। दिखने में यही लगता है कि उनका सलेक्शन रैंडमली हुआ है और वे सभी एक दूसरे से एकदम अनकनेक्टेड लोग थे। सारे नियम समझाने के बाद उन्हें आइलैंड पर पहुंचा दिया जाता है और उनका सफ़र शुरू होता है। उन्हें पहले दिन तो यह एक रियलिटी शो ही लगता है, जहां दिन से लेकर रात तक उन्हें डराने की हल्की-फुल्की कोशिश होती है... लेकिन अगले दिन से ही वे कनफ्यूज होने लगते हैं कि यह वाकई कोई शो था और उन्हें डराने वाली सारी कोशिशें मैनमेड एफर्ट्स थीं।
तीसरे दिन से वे वाक़ई डरना शुरू कर देते हैं और उन्हें अहसास होता है कि दरअसल वहां वाकई पैरानार्मल एक्टिविटीज हो रही थीं और 'द बल्डी कैसल' टीम का कैसल की बुरी शक्तियों से एक समझौता हुआ था। शो के नाम पर उनका शिकार बनाया जा रहा था और एंटरटेनमेंट के नाम पर उनकी दुर्दशा को बेचा जा रहा था। उन्हें यह भी अहसास होता है कि वे रैंडमली नहीं चुने गये, बल्कि उन्हें टार्गेट किया गया है और उनसे किसी तरह का बदला लेने के लिये यहां लाया गया है। वे भले दिखने में एक दूसरे से एकदम असम्बंधित हों, मगर अतीत में उनके बीच कोई ऐसा कॉमन पाप घटित हुआ है जिससे वे सब जुड़े हुए हैं और शो का आर्गेनाइज़र उसी पाप का शिकार हुआ है जो अब इतने यूनीक तरीके से उनसे बदला ले रहा है।
तीसरी रात जब एक कंटेस्टेंट की जान चली जाती है, तब उन्हें अपनी बातों पर यक़ीन हो जाता है कि वे सब यहां मरने के लिये छोड़े गये हैं। तब वे दिन भर आपस में चर्चा करते शाम को इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि आखिर वह कौन सा पाप था जिसके तार उन सबसे जुड़े हुए थे और तब उन्हें वह शख़्स नज़र आता है जिसके बदले का शिकार वे हो रहे थे। उन्हें यक़ीन हो जाता है कि वह जगह वाक़ई हांटेड थी और बदले के नाम पर उन्हें वहां मारने ही लाया गया था। उनकी तकलीफ, उनके संघर्ष और उनकी मौत को रिकार्ड करके शो के नाम पर पूरी दुनिया में बेचा जा रहा था। वे जिंदगी से नाउम्मीद हो जाते हैं, लेकिन उस जगह से निकलने या टीबीसी टीम से लड़ने की उनकी हर कोशिश नाकाम हो जाती है।
उनकी हर अगली रात कयामत साबित होती है और लगातार खौफ से जूझते सातवें दिन तक उनमें कई लोग मारे जाते हैं, लेकिन उनमें से किसी की भी जान सीधे शो वालों ने नहीं ली थी, बल्कि वे सभी अपनी ही वजहों से मारे गये थे... अब यहाँ सवाल उठता है कि क्या वाकई ऐसा ही था— जैसा उन्हें दिख रहा था, या फिर इस सारे तमाशे की जड़ में कुछ और था? क्या वाक़ई यह शो फेयर था या अपने किस्म का अनोखा बदला, जहां कोई अपने दुश्मनों को इस तरह खत्म भी कर रहा था और उन मौतों को करोड़ों में बेच भी रहा था? क्या था 'द ब्लडी कैसल' का सच?
वो लड़की भोली भाली सी
"वो लड़की भोली भाली सी" नाम सुन कर रोमांटिक कहानी लगती है, लेकिन ऐसा है नहीं... यह कहानी यूं तो थ्रिल, रोमांच और सस्पेंस से भरी है, लेकिन चूंकि पूरी कहानी एक ऐसी लड़की पर है जिसकी जिंदगी कहानी के दौरान एक सौ अस्सी डिग्री चेंज होती है, तो बस उसी बदलाव को इंगित करते हुए शीर्षक दिया गया है— वो लड़की भोली भाली सी। शुरुआत तो उसके भोलेपन और उसके शोषण से ही होती है लेकिन फिर मज़बूत होने के साथ वह बदलती चली जाती है।
अब कहानी चूंकि थोड़ी कांपलीकेटेड है तो शुरु करने से पहले सभी पाठकों के लिये कुछ बातों पर गौर करना जरूरी है, जिससे आपको सभी सिरों को समझने में मदद मिलेगी।
सबसे पहली और मुख्य चीज़ यह है कि यह कहानी वेब सीरीज के परपज से लिखी गई है, तो इसके दृश्यों की सिक्वेंस भी उसी तरह से रखी गई है... हालांकि लिखने में नॉवल का फार्मेट ही इस्तेमाल किया गया है न कि स्क्रीनप्ले का, लेकिन फिर भी आपके लिये यह जानना ज़रूरी है कि कहानी कहने का तरीका क्या है, इसी से आप अलग-अलग टाईमलाईन में चलते दृश्यों को ठीक से समझ पायेंगे।
मूलतः कहानी तीन अलग-अलग टाईमलाईन में चलती है जिसमें दो हिस्से एकदम अनकनेक्टेड लग सकते हैं लेकिन ऐसा है नहीं और कहानी के अलग-अलग सभी सिरे कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए ही हैं। हर टाईमलाईन के साथ तारीख मेंशन की गई है, जिस पर पढ़ते वक़्त आपको खास ध्यान रखना है, अन्यथा आप बुरी तरह कनफ्यूज्ड हो जायेंगे।
अगर कहानी के मुख्य पात्रों की बात की जाये तो कहानी के केंद्र में एक फीमेल पात्र है, जिसके कई रूप हैं और कई नाम हैं, एक से ज्यादा शेड है। विकास अहलावत नाम का एक पुलिस इंस्पेक्टर है, जिसकी अपनी जिंदगी बीवी और उसके आशिक के बीच बुरी तरह उलझी हुई है, लेकिन प्रोफेशनली उसे एक ऐसे मर्डर केस को सॉल्व करना है— जिसमें बंद घर में मकतूल के आसपास मौजूद पाये गये लोगों में कोई भी अपराधी नहीं साबित होता और न उनसे हत्यारे तक पहुंचने में कोई मदद ही मिलती है।
एक क्राईम वर्ल्ड से रिलेटेड शख़्स संदीप चौरसिया है जिसके अतीत में बड़े पेंच हैं। आतिफ, अनिर्बान, सुनील और माधुरी नाम के किरायेदार हैं, और सलीम, दयाल और माया नाम के मेहमान— जिनकी मौजूदगी मगर बेखबरी में मकान मालकिन की हत्या हुई। एक तरफ़ कहानी वर्तमान से अतीत की तरफ़ जाती है, तो दूसरी तरफ़ अतीत से वर्तमान की तरफ़ आती है और इन दोनों ही टाईमलाईन में आगे-पीछे होते हुए ऐसे ही ढेरों कैरेक्टर्स अवतरित होते रहते हैं।
चूंकि कहानी वेब सीरीज के परपज से शुद्ध मनोरंजन के लिये लिखी गई है तो इसके किरदार रियलिस्टिक वर्ल्ड से जैसे के तैसे लिये गये हैं, उनसे बहुत ज्यादा नैतिकता की अपेक्षा न रखियेगा, वे देवता तुल्य नायक या देवी तुल्य नायिका की बाउंड्री से बाहर हैं और ज्यादातर किरदार ग्रे शेड के हैं। दूसरे, कहानी में कोई मैसेज नहीं है कि उसके नाम पर इसे जस्टीफाई किया जाये। बस मनोरंजन परोसने के नजरिये से लिखी गई कहानी है— तो इसे इसी उद्देश्य तक सीमित समझिये।
कहानी दो लाख से ऊपर वर्ड्स की है, इसे एक भाग में समेटना ठीक नहीं था, तो इसके दो पार्ट्स कर दिये हैं और कहानी का दूसरा पार्ट 'वो लड़की सयानी सी' भी इसी कहानी के साथ पब्लिश की गई है, ताकि पाठक को इंतज़ार न करना पड़े और वह एक साथ पूरी कहानी का आनंद ले सके।
वो लड़की सयानी सी
यह कहानी उस सिलसिले को आगे बढ़ाती है जो 'वो लड़की भोली भाली सी' से शुरु हुआ था और अपने अंजाम तक पहुंचती है। सुहाना या संदीप के अतीत में जो कुछ भी हुआ था, वह धीरे-धीरे विकास की इन्क्वायरी के ज़रिये सामने आता रहता है। उन दोनों की ज़िंदगी में ढेरों पेंच थे, ढेरों उलझनें थीं और उनमें सबा को उन सबसे डील करते हुए, एक सरकारी मिशन के तहत अपनी एक जगह बनानी थी— और जिसके लिये वह हर स्तर तक जाती है।
पिछले भाग में जहां कहानी तीन अलग टाईमलाईन में चली थी, वहीं इस भाग में कहानी दो अलग टाईमलाईन में चलती है और जहां सबा के सफ़र के साथ अतीत का एक कालखंड सामने आता रहता है, जहां वह शोषण से भरे बचपन से उबरते हुए एक ताक़तवर संगठन में घुसपैठ करती है और धीरे-धीरे शीर्ष तक पहुंचती है, जहां पहुंच कर उसे फिर एक मौका मिलता है, एक नये अवतार को ग्रहण करने का… वहीं वर्तमान में विकास की खोजबीन के साथ उस अतीत के उलझे हुए सिरे धीरे-धीरे खुलते रहते हैं और एक बिखरी-बिखरी सी कहानी परिपूर्णता लेते हुए सामने आती है।
उस गुमशुदा अतीत में कुछ ऐसा था, जिसने गोवा को अपने मज़बूत पंजों में जकड़े बादेस से मुक्ति तो दिला दी थी, लेकिन अपना वक़्त लेकर, संभलने के बाद वह फिर से खड़े होने की कोशिश करती है और उसके बचे हुए बागी सिपहसालारों को फिर उसके झंडे के नीचे आना पड़ता है। उसी गुमशुदा अतीत में एक बहुत बड़ी रकम भी गुम हुई थी, जिसका कोई पता ठिकाना नहीं था और अब जैसे वह सारे लोग उसी की तलाश में थे— जो उसके बारे में जानते थे। वे उस रकम के लिये किसी भी हद से गुज़रने को तैयार थे।
जो गोवा में होता है, वही अंतिम मोड़ पर दिल्ली में होता है और अतीत में आपस में असम्बंधित रहे विकास, टोनी, बब्बू, माया और आरज़ू सब एक दूसरे के सामने प्रतिद्वंदी के तौर पर आ खड़े होते हैं— जहां ख़ुद सर्वाईव करने के लिये दूसरे को खत्म करना ज़रूरी हो जाता है। अब सवाल यह था कि उस अंतिम दौर में कौन मरता है और कौन बचता है?
लिलिथियंस
कुछ अजीब सा नाम है न? समझना भी मुश्किल है कि इसका क्या मतलब हो सकता है और उस मतलब का इस कहानी से क्या ताल्लुक हो सकता है। चलिये, कहानी शुरु करने से पहले इस नाम को और इसके संदर्भ को समझ लेते हैं, ताकि आगे कहानी समझने में आसानी हो। इसके लिये हमें अब्राहमिक धर्मों के मूल कांसेप्ट में जा कर एक किरदार को जानना होगा, जिसका नाम लिलिथ है।
हममें से अधिकांश लोग शायद लिलिथ नाम के उस कैरेक्टर से परिचित न हों, जो मूल बाईबिल के हिसाब से आदम के साथ बनाई गई संसार की पहली नारी थी, लेकिन जो मर्द के नीचे नहीं, बल्कि ऊपर रहना चाहती थी और बजाय मर्द के अपना डॉमिनेंस चाहती थी। उसे एडम के डॉमिनेंस में रहना मंजूर नहीं था, और वह एडम को स्वर्ग में छोड़ पृथ्वी पर भाग आती है— जिसके बाद यहुवा एडम की पसली से ही ईव का सृजन करता है ताकि प्रतीकात्मक रूप से यह स्थापित हो सके कि नारी, नर से बनी है और नर के लिये बनी है, जिससे आगे चल कर मर्द की सत्ता को स्वीकारने में उसे कोई बाधा न आये। सारा संसार इस ईव को बाईबिल के हिसाब से ही पहली औरत मानता है।
लेकिन जैसा कि रिवाज़ है कि इस संसार में जहां हर तरह के लोग हैं— तो उस लिलिथ में विश्वास रखने वाले भी लोग हैं, फिर भले लिलिथ को ऐविल पॉवर या शैतान की संज्ञा क्यों न दी गई हो। जब दुनिया में सीधे शैतान को पूजने वाले समुदाय हो सकते हैं तो लिलिथ के वे उपासक भी हो सकते हैं, जो मानते हैं कि एक दिन लिलिथ अंधेरों से निकल कर आयेगी और सारे संसार पर हुकूमत करेगी। ऐसी ही मान्यता में विश्वास रखने वाले, और उसे देवी की तरह पूजने वाले एक कल्ट का नाम है "लिलिथियंस", जो इस कहानी के केंद्र में है। इस कल्ट के लोग एक मिशन पर हैं और पूरी कहानी उसी मिशन से जुड़े संघर्ष को उकेरती है।
इन लिलिथियंस की कमान संसार के कुछ ऐसे ताक़तवर लोगों के हाथ में है, जिन्हें सामान्यतः इलुमिनाती से जोड़ा जाता है और वे दुनिया के लगभग हर बड़े फैसले में शामिल रहते हैं। उनकी इस दुनिया और इस सृष्टि को लेकर अपनी ही एक अलग थ्योरी है, जिसके अकार्डिंग वे एक ऐसे समझौते से बंधे हैं, जिसके चलते उन्हें पूरी दुनिया के माहौल में किसी न किसी तरह उथल-पुथल मचाये रखनी है, जिससे उस हायर बीईंग को एनर्जी मिलती है, जो फीड करती है लोगों के लालच, डर, नफरत, क्रोध, खून-खराबे और मौतों से— और बदले में इस वर्ग को नवाज़ती है बेशुमार पैसे और ताक़त से। इस थ्योरी के हिसाब से हमारी औकात एक बैक्टीरिया भर की है और हम उस हायर बीईंग के शरीर में वैसे ही वास करते हैं, जैसे हमारे ख़ुद के शरीर में बैक्टीरिया और वायरस अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।
उस हायर बीईंग के साथ हुए उस समझौते के अनुसार उन्हें हर कुछ सालों में ऐसा कुछ करना है, जिसके चलते पूरी दुनिया प्रभावित हो, बड़े पैमाने पर केआस फैले, खास कर योरप के उन इलाकों में, जहां लोगों को अमूमन किसी तरह के संघर्ष से नहीं जूझना पड़ता है, बल्कि हैप्पीनेस इंडेक्स में जो अग्रणी रहते हैं और उस हायर बीईंग के हिसाब से वे उसके लिये सबसे ज्यादा यूज़लेस देश और लोग हैं। युद्ध या कोई बड़ा संक्रमण, कुछ भी उन्हें इस इलाके में चाहिये ही चाहिये और यह सब एक के बाद एक होता है और इसी कोशिश में एक संक्रमण कोरोना की तरह ही बेलगाम हो कर पूरे योरप को निगलना शुरु कर देता है— अब सवाल यह भी है कि पूरी तरह फैल कर भी यह बस योरप तक ही सीमित रहेगा या कोरोना की तरह ही पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा?
इस कहानी के केंद्र में सिर्फ लिलिथियंस ही नहीं हैं, बल्कि भारत के एक अमीर घराने में जन्मे दो भारतीय युवक आरव और अहान भी हैं, जो अनजाने में ही इस जानलेवा चक्कर में उलझते चले जाते हैं। वे दोनों भाई थे और जहां आरव पढ़ाई-लिखाई, खेल-कूद और पर्सनैलिटी के हिसाब से एक स्टार किड था, वहीं आरव एक कलात्मक रूचि वाला एवरेज शख़्स, जो अपने भाई की स्टार पर्सनैलिटी के हिसाब के नीचे दब के कहीं खो कर रह गया था और इस चीज़ ने उसमें एक हीनता पैदा कर दी थी, जिसकी वजह से उसके व्यक्तित्व में आई नकारात्मकता ने उसे घर वालों से और दूर कर दिया था।
आरव के लिये तो सबकुछ मयस्सर था, एक बढ़िया नौकरी के सिलसिले में वह स्वीडन जाता है और स्वीडन से ही उसकी ज़िंदगी में उथल-पुथल शुरु हो जाती है, जो उसे फिनलैंड ले जाती है, जहां आखिरकार वह ग़ायब हो जाता है और जब अरसे तक उसकी कोई ख़बर नहीं मिलती और उसकी वजह से माँ-बाप हलकान हो जाते हैं, तब न चाहते हुए भी अहान अपने भाई को वापस लाने की ज़िम्मेदारी अपने सर लेता है और निकल पड़ता है अपने उस भाई की खोज में, जिसने स्वीडन से फिनलैंड तक अपने पीछे ढेरों निशान छोड़े थे— जिन्हें ट्रेस करते अहान को धीरे-धीरे, टुकड़ों में पता चलता है कि उसके भाई के साथ क्या हुआ था और वह कहाँ-कहाँ से गुज़रा था।
इस खोज में जो उसके साथ होते हैं, वह उन्हें नहीं जानता, लेकिन उनकी मदद उसे बराबर मिलती रहती है— हालांकि वह यह ठीक से समझ भी नहीं पाता कि वे दोस्तों में थे या दुश्मनों में… और धीरे-धीरे चलते उसकी खोज के इस सफ़र का जहां अंत होता है— वहां से एक नये काल की शुरुआत हो रही थी, जो आगे पूरी दुनिया को हदसाने वाला था। अब सवाल यह है कि आरव के साथ आखिर क्या हुआ था, और वह कहां खो गया था? अहान उसकी तलाश में निकला तो था, लेकिन क्या वह उसके जीतेजी उससे मिल भी पाता है? क्या अंत होता है उसकी खोज का और कैसी शुरुआत थी उस अंत से जुड़ी जो आगे पूरी दुनिया के लिये आफत बनने वाली थी?
फेक कपल
आसिफ और अरीबा— कहानी के दो मुख्य किरदार, जो एक दूसरे से अजनबी थे, जो एक दूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे और जिनके मिज़ाज और आदतें ज्यादातर एक दूसरे से अपोजिट थे… उनकी ज़िंदगी में एक मोड़ आता है जब उन्हें मुंबई जैसे महानगर में सिर्फ रहने की ग़रज से एक मनपसंद ठिकाना पाने के लिये आपस में एक समझौता करना पड़ता है— रहने की शर्त के मुताबिक ख़ुद को मियां-बीवी बताने का, दिखाने का, और ज़रूरत पड़े तो इस रिश्ते को साबित करने का।
लेकिन क्या यह कैसे भी आसान था? जब वे एक दूसरे से इतने अलग थे, उनके काम अलग थे, उनके सपने, उनके गोल अलग थे और उनके मिज़ाज अलग थे। कई मौकों पर उनके बीच झगड़ने तक की नौबत आ जाती— लेकिन यह झगड़े भी उन्हें हकीक़ी मियां-बीवी ही साबित करते। शायद ऐसे ही तो होते हैं असलियत के पति-पत्नी— एक दूसरे से अलग, मगर एक दूसरे के साथ निभाने की जद्दोजहद करते। वे असल में जितने अलग दिखने की कोशिश करते थे— उतने ही वे एक लगते थे।
दोनों की आर्थिक स्थिति भी अलग थी— आसिफ जहां एक निम्न वर्गीय परिवार से था, जिस पर इतनी ज़िम्मेदारियां लदी हुई थीं कि वह ख़ुद के बारे में सोचना ही भूल गया था, ख़ुद की जरूरतों को दरकिनार कर दिया था और एक लंबे अरसे से अच्छा बेटा और अच्छा भाई होने की जैसे अंतहीन जद्दोजहद में उलझा हुआ था— वहीं अरीबा एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती, एक अच्छे खाते-पीते मगर ऑर्थोडॉक्स टाईप घराने से ताल्लुक रखती थी, जहां लड़की होने का मतलब ज़रूरत भर पढ़ाई, फिर शादी और चूल्हे-चौके के इर्द-गिर्द सिमटी, पति की सेवा और बच्चों की परवरिश भर होता था और वह इस सोच के ही खिलाफ थी, और अपने घर-खानदान में सबसे अलग कुछ कर दिखाने के ख़ब्त से भरी थी।
किसी और के लिये शायद ऐसी सोच को ख़ब्त कहना ठीक न होता लेकिन अरीबा के लिये यही शब्द ठीक था… जो वह करना चाहती थी, वह उनके लिये भी नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता है जिन्हें फैमिली सपोर्ट मिलता है तो उसके लिये तो लगभग नामुमकिन ही था, जिसे बस एक साल का वक़्त और ज़रूरत भर पैसे दिये गये थे ख़ुद को साबित करने के— और वह भी कई शर्तो के साथ। उन शर्तों में एक शर्त वह भी थी, जिसे निभाने की मजबूरी में उसे आसिफ के साथ शादीशुदा होने का दिखावा करते, रहने के लिये वह जगह हासिल करनी पड़ रही थी जो उसके घर वालों के दिये क्राइटेरिया पर खरी उतरती थी। बात सिर्फ दो-चार दिन की होती तो भी आई-गई हो जाती लेकिन उसे तो एक अजनबी मर्द के साथ बाकायदा लंबे वक़्त तक रहना था— बतौर बीवी।
फिर यह कहां आसान था कि एक बेडरूम को शेयर करते, उन दोनों की भावनायें एक दूसरे के लिये अछूती रहतीं? दो अजनबियों का यूं साथ-साथ रहना, एक कमरे में रहना, कब तक उन्हें एक दूसरे से दूर रखता— वह भी ऐसी हालत में जब उनका कहीं और कोई कमिटमेंट भी न हो। यह तो आग और पेट्रोल के आसपास रह कर भी अप्रभावित रहने वाली बात होती, जो मुमकिन ही नहीं थी— न उनके लिये ही बहुत दूर तक और बहुत देर तक एक दूसरे के आकर्षण से मुक्त रह पाना मुमकिन था… लेकिन एक दूसरे की आग में जलने में भी कम अड़चनें कहाँ थीं?
ज़िंदगी ऐसे ही थोड़े सबकुछ आपको दे देती है, जो आपको चाहिये होता है— बल्कि हर अहम हासिल के बदले सख़्त इम्तिहान लेती है। अक्सर लोग नाकाम रहते हैं इन इम्तिहानों में— और अक्सर कामयाब भी होते हैं। उन दोनों की किस्मत में क्या था? नाकामी या कामयाबी? मिलना या बिछड़ना? यह जानने के लिये तो आपको इस हसीन सफ़र पर उनके साथ चलना होगा— उनके साथ जीना होगा। उनके हर तजुर्बे और हर अहसास में हिस्सेदारी करनी होगी, जहां बहुतेरी बातें आपके मन को गुदगुदायेंगी तो बहुतेरी बातें आपको क्षणिक तनाव भी देंगी।
फिर कहानी में इन दो किरदारों की ही ज़िंदगी नहीं उकेरी गई है, बल्कि और भी कई किरदार हैं, जिनके पास अपने तल्ख या खुशगवार तजुर्बे हैं, अपने किस्से हैं, जो कभी मुस्कुराने की वजह देते हैं तो कभी आँख नम करने की ताक़त भी रखते हैं। हर किरदार, जो इस कहानी का हिस्सा है— अपनी जगह अहम है। तो आइये, शुरू करते हैं इन सब किरदारों के साथ एक हसीन सफ़र।
इश्क़ अनलिमिटेड
'इश्क़ अनलिमिटेड' एक ऐसा कहानी संग्रह है जो रोमांस में डूबी दस कहानियों को अपने आप में समेटे है। कुछ कहानियां मुकम्मल हुए इश्क़ की दास्तान कहती हैं, तो कुछ ऐसी हैं जो अधूरी रह गई मुहब्बत के साथ मन में एक कसक छोड़ जाती हैं।
पहली कहानी 'इश्क़ दोबारा' बिछड़ने के बाईस साल बाद एक शादी में वापस टकराये एक कपल की कहानी है, जो उस इत्तेफाक पर अपना अतीत याद करते उसी दौर को जीने लगते हैं। दूसरी कहानी 'संय्या बेईमान', प्रेमिका द्वारा छोड़े गये ऐसे युवक की कहानी है, जो ख़ुद को साबित करने के लिये ग़लत रास्ता अख्तियार कर लेता है और उस पथ पर हर लड़की उसके लिये शिकार हो जाती है।
इस संग्रह की तीसरी कहानी है 'सात दिन का इश्क़', जो बताती है कि सपने देखने वाले प्रेमियों का जब विपरीत सच्चाई से सामना होता है तो कैसे उनका प्यार हवा हो जाता है और वे अलग रास्तों पर बढ़ जाते हैं। चौथी कहानी 'प्रेम में पड़ी लड़की' मोबाईल गेम के सहारे एक लड़के के चक्कर में पड़ गई लड़की की कहानी है, जो अपने प्रेमी के पास पहुंचने के लिये घर से भाग निकलती है, लेकिन उस तक पहुंचने से पहले ही उसकी ज़िंदगी में एक अलग रास्ते की गुंजाइश बन जाती है।
पांचवी कहानी है 'वह पहला सा इश्क़', जो एक ऐसे युवक की कहानी है, जिसे कच्ची उम्र से ही एक लड़की से प्यार हो गया था और इत्तेफाक से पांच साल बाद वह उसे एक ऐसे सफ़र पर टकरा जाती है, जहां ख़राब हालात के चलते दोनों को एक जगह रुकना पड़ता है। छठी कहानी 'तुम वह तो नहीं' उस साहित्यप्रेमी युवक की दास्तान है, जिसे एक खास लम्हे में एक लड़की से प्यार हो जाता है और उसे पाने के लिये वह नैतिक-अनैतिक सभी रास्ते अख्तियार करता है, लेकिन जब हासिल कर पाता है तो पता चलता है कि वह लम्हा ही मात्र एक भ्रम था, जिसके भरोसे उसका इश्क़ टिका हुआ था।
इस कहानी संग्रह की सातवीं कहानी 'लिखे जो खत तुझे' उस 'पेन लवर' की कहानी है जो एक लेखक के शब्दों से ही प्रभावित हो उसे दिल दे बैठती है और हर हफ्ते उसे एक चिट्ठी लिखती है, लेकिन अंततः उसे यह भान होता है कि वह एक भ्रम में थी। आठवीं कहानी 'कसक' बिछड़ गये उस इश्क़ का फसाना है जहां जातिवाद से जकड़े समाज में मिल पाना मुमकिन ही नहीं था— लेकिन बिछड़ने के बाद भी प्रेमी न अपनी मुहब्बत भूलता है और न ही अपना फ़र्ज।
'बंसी वाला इश्क़' इस संग्रह की नवीं कहानी है जो सिर्फ बांसुरी की धुन सुन कर बांसुरी वाले के प्रेम में पड़ जाने वाली लड़की की दास्तान है, जो एक बार इस इश्क़ में पड़ने के बाद फिर इस इश्क़ से उबर ही नहीं पाती। 'ऑनलाइन इश्क़' सिर्फ सोशल मीडिया के सहारे पनपी वह प्रेम कहानी है जहां एक मोड़ पर पहुंच कर लड़का एक भ्रम का शिकार हो कर अलग रास्ता पकड़ लेता है मगर लड़की वहीं टिकी रह जाती है और वहीं ख़त्म हो जाती है।
कहानी जंक्शन
वस्तुतः "कहानी जंक्शन" एक कहानी संग्रह है, जहां अलग-अलग सात कहानियों को आकार दिया गया है। इस कहानी संग्रह में सभी सात कहानियां किसी न किसी सामाजिक मुद्दे से जुड़ी हैं और सभी अंधेरे और अवसाद की स्थिति से निकाल कर रोशनी की ओर ले जाती हैं और एक उम्मीद की किरण जगाती हैं। यह मुद्दे हमारे आसपास के है, हमारे जानने वालों के हैं, हमारे घरों के हैं। जब पढ़ेंगे तो हर कहानी से आपको कोई जानी-पहचानी सी गंध आयेगी।
संग्रह की पहली कहानी 'बाग़ी लड़कियां’ है, जो दो ऐसी लड़कियों के अपने संघर्ष की दास्तान है, जिन्हें अपने आसपास सदियों से पनपता आ रहा पुरुष वर्चस्ववाद स्वीकार नहीं था। जो किसी मर्द के साये से इतर अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व, अपनी एक अलग पहचान गढ़ना चाहती थीं। अपने हर फैसले के पीछे उन्हें अपने ही लोगों का विरोध झेलना पड़ता है, लेकिन हर बाधा को पार करते वे आगे बढ़ती जाती हैं— मगर एक मकाम वह भी आता है, जहां सबकुछ अचीव कर लेने के बाद उन्हें अपने भविष्य को लेकर कोई ठोस निर्णय लेना था और वे फिर एक ऐसा निर्णय लेती हैं, जो उन्हें फिर सबके निशाने पर लाने वाला था।
दूसरी कहानी ‘अधूरी’ समाज में अपनी पहचान को लेकर जूझती एक लड़की की है, जिसमें एक अधूरापन मौजूद था और जिसकी वजह से वह एक सामान्य जीवन कभी नहीं जी पाती और उसे क़दम-क़दम पर उपेक्षा और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। उसे एक उम्मीद दिखती भी है तो एक ऐसे आवारा लड़के में, जो अपने शौक और अपनी हरकतों को लेकर न सिर्फ ज़माने भर में बदनाम था, बल्कि जिसका कोई भविष्य भी नहीं था— लेकिन उसे यक़ीन था कि दुनिया में वही एक ऐसा इंसान है जो उसकी कमी को लेकर कभी उससे नफरत नहीं करेगा, कभी उसका तिरस्कार नहीं करेगा।
संग्रह की तीसरी कहानी है ‘उजले जीवन की स्याह सांझ’… यह एलीट वर्ग के उस एकाकीपन को रेखांकित करती है, जिससे अक्सर स्टेटस के पीछे पगलाए छोटे शहरों के अमीर लोगों को जूझना पड़ता है, जब उनके बच्चे तो एक कामयाब ज़िंदगी जीते किसी मेट्रो सिटी या विदेश में सेटल हो जाते हैं और उनके हिस्से जीवन के संध्याकाल में एकाकीपन आता है। यह कहानी ऐसे ही एकाकीपन के अभिशाप को भोगते एक ऐसे इंसान की है, जो अपनी नियति को बदलने की ठान लेता है और बचे हुए निरर्थक जीवन को गौरवपूर्ण ढंग से खत्म करने के लिये एक अलग ही रास्ता अख्तियार करता है।
‘अंधेरे से उजाले की ओर’ इस संग्रह की चौथी कहानी है, जो अपनी अपंगता के चलते निराशा और अवसाद में घिरे और पल-पल ख़ुद को खत्म करते, एक शख़्स के अंदर आने वाले उस बदलाव को दरशाती है— जिसकी ज़िंदगी में, अपनी ज़रूरत के मद्देनज़र, एक झूठ के सहारे घुसपैठ करने वाली लड़की ने ऐसी हलचल मचाई थी कि उसे अपने नकारात्मक विचारों से निकल कर दुनिया को सकारात्मक ढंग से जीने के लिये एक सही रास्ता मिल गया था और सही मायने में वह अपनी अपंगता को स्वीकार करके उसके साथ खुशी-खुशी जीना सीख पाया था।
‘कनेक्शन’ इस संग्रह की पांचवी कहानी है… यह कनेक्शन है इंटरनेट के सहारे जुड़े दो अजनबियों के बीच का, जो अपनी-अपनी जगह एक खालीपन से भरी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। वे उस ज़िंदगी को ठीक से स्वीकार नहीं कर पाते, उन्हें दस शिकायतें भी रहती हैं, लेकिन उनमें उसे बदलने का हौसला भी नहीं है, और वे बस ऐसे ही उसे जीते चले जाना चाहते हैं— लेकिन उनके बीच बने कनेक्शन से उन्हें अपने दर्द के साझा होने का अहसास होता है, एक दूसरे से थोड़ी प्रेरणा मिलती है उन्हें और ज़िंदगी में थोड़ा रस महसूस होता है। वे आखिर तक यह फिर भी तय नहीं कर पाते कि उनके इस जुड़ाव का भविष्य क्या है।
इस संग्रह की छठी कहानी है ‘मधुरिमा’, जो पचास साल की एक ऐसी औरत की कहानी है जिसने अपनी ज़िंदगी में बड़े दुख झेले थे, बड़ा संघर्ष किया था और हर मुश्किल से जूझते हुए अपनी सभी जिम्मेदारियां निभाने में कामयाब रही थी, लेकिन उन जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद अब वह अपनी ज़िंदगी को फिर से जीना चाहती है, अपनी दबी हुई अधूरी इच्छाओं को पूरा करना चाहती है, उन सपनों को अमली जामा पहनाना चाहती है जो उसने कभी देखे थे, और इसके लिये वह अकेली ही घर से निकल खड़ी होती है।
संग्रह की सातवीं और आखिरी कहानी है ‘मज़हबी कुफ्र’… वस्तुतः यह रूपकों के सहारे कही गई कथा है, जिसके ज़रिये एक संदेश देने की कोशिश की गई है कि असल में धर्म क्या है, इसका सार क्या है, इसे किस तरह लेना चाहिये और एक इंसान के तौर पर कैसा आचरण होना चाहिये— जो धर्म के सकारात्मक पहलू को दुनिया के सामने रखे, न कि उसे दूसरों की नज़र में एक नकारात्मक विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करे।डार्क टूरिज्म