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Horror नदी का रहस्य (Completed)

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इंस्पेक्टर रॉय बहुत पास से निरीक्षण कर रहे थे. अपने चौदह वर्ष के पुलिसिया जीवन में ऐसा केस आज से पहले कभी नहीं देखा उन्होंने. इसलिए सिर्फ़ बाहरी मुआयने से ये पता कर पाना बेहद मुश्किल है की जो वो देख रहे हैं वो एक्चुअली है क्या?

सामने एक मृत देह है.

तो ये स्वाभाविक है की मृत्यु ही हुई है.

पर हुई कैसे?

क्या सीने पर थोड़े सूखे थोड़े गहरे ये तीन खरोंच इसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं?

इसका बनियान इसके उल्टे दिशा में पैरों के पास पड़ा है.

साधारणतः ऐसा होता नहीं है कि किसी ने बनियान उतारा और उसे पैरों के पास फेंक दिया हो.

अच्छा चलो मान लेते हैं की इसी ने ऐसा किया... पर प्रश्न अभी भी ये रह जाता है कि.....

"सर, कमरे में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला."

रॉय के आगे और कुछ सोचने से पहले हवलदार श्याम ने उसे अपनी रिपोर्ट दी.

रॉय जरा से पलट कर हवलदार को देखा और एक गम्भीर और दीर्घ 'ह्म्म्मम्म' करते हुए दोबारा सामने बिस्तर पर पड़े उस शव को देखने लगा. श्याम भी बगल में आ कर खड़ा हो गया.

"क्या लगता है श्याम.. किसने और कैसे मारा होगा इसे?"

"मेरे को तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है सर. दरवाज़े और खिड़की से जबरन अंदर घुसने का कोई प्रमाण नहीं मिला. और ऐसा होना तो इसी बात की ओर संकेत करता है कि अगर कोई आया था तो ये लड़का उसे अवश्य जानता होगा और इसी ने उसे कमरे में आने दिया होगा. पर एक सवाल फ़िर भी रह जाता है."

"कैसा सवाल?"

"यही की अगर कोई आया ही था तो फ़िर घरवालों को इस बात की कोई खबर क्यों नहीं है? किसी के आने से साफ इंकार कर दे रहे हैं. इनका कहना है की कल उतनी तेज़ बारिश और आँधी में कोई कैसे अपने घर से निकल कर किसी ओर के घर जा सकता है."

"गुड. वैरी गुड श्याम. नाईस क्वेश्चन. तुमने अपना काम बहुत अच्छे से किया है. रहा सवाल इन घर के सदस्यों का तो अगर वाकई कल कोई आया था और ये बताने से इंकार कर रहे हैं तो निश्चित ही ये लोग झूठ बोल रहे हैं... और यदि ये लोग सच कह रहे हैं तो इसका मतलब ये हुआ की कोई आया तो अवश्य ही था पर शायद किसी दूसरे रास्ते से."

कहते हुए रॉय कमरे की दो खिड़कियों में से एक की ओर घूम गया और धीरे क़दमों से, सावधानी से चलते हुए उस खिड़की के पास जा खड़ा हुआ और उसके पल्लों / पलड़ों को बहुत गौर से देखने लगा.

तभी श्याम को एक सिपाही आ कर कान में कुछ कहता है जिसे सुनकर श्याम बड़ी तत्परता से रॉय की ओर देखते हुए बोला,

"सर, मेडिकल टीम आ गई."

रॉय ने अपना रिस्टवाच देखा, अफ़सोस में थोड़ा सिर हिलाया और धीरे से बोला,

"आज फ़िर आधा घंटा लेट."

खिड़की से हट कर रॉय दोबारा उस शव के पास आ कर खड़ा हो गया और उसके आस पास के चीज़ों को सावधानी से देखने लगा.

पाँच मिनट के अंदर ही मेडिकल टीम कमरे में आ गई. उनके कमरे में दाखिल होते ही रॉय टीम के हेड की ओर मुस्कराते हुए आगे बढ़ा और अपना हाथ आगे करता हुआ बोला,

"आइए आइए, पार्थो दा. आप ही का इंतज़ार हो रहा था."

"अरे अब मत पूछिए सर. आ तो कब का गया होता... पर सुबह सुबह आँख कमबख्त जल्दी खुलती भी तो नहीं."

"क्यों दादा, रात में बहुत देर तक काम करते हैं क्या?"

"नहीं... काम होता ही कहाँ है आजकल ज्यादा करने को."

"तो फ़िर? घर में सब ठीक तो है न?"

"अरे नहीं भाई.. सब कहाँ ठीक है?!"

पार्थो दा बहुत ड्रामेटिक स्टाइल में रोनी सूरत बनाते हुए बोले.

उनकी शक्ल देख कर रॉय तनिक चिंतित होता हुआ पूछा,

"क्या हुआ दादा, ऐसे क्यों बोले रहे हैं..? क्या हुआ घर में? लेट क्यों हुआ आपको??"

रॉय की ओर देखते हुए पार्थो दा एक आँख बंद करते हुए बोले,

"तुम्हारी बोउदी (भाभी) को हर रात चाहिए होता है. वो एक नहीं, तीन तीन बार! क्या करूँ.. विवाहित हूँ न... मना भी तो नहीं कर सकता. दायित्व का निर्वहन करना पड़ता है. इसी कारण देर से सोता हूँ और सुबह देर से आँख खुलती है."

रॉय तुरंत समझा नहीं. पर जैसे ही समझा; दोनों हो हो कर के हँस पड़े.

आस पास खड़े मेडिकल टीम के दूसरे सदस्य और पुलिस के सिपाही कुछ समझे तो नहीं कि ये क्यों हँस रहे हैं पर उन्हें इस प्रकार हँसता देख कर वे लोग भी अपनी मुस्कराहट को रोक नहीं सके.

उस समय कमरे में ही उपस्थित घर के दो सदस्यों ने इस प्रकार के इंसेंसिटिव बर्ताव के लिए आपत्ति जताना चाहा पर हवलदार श्याम जल्दी से उनको साइड में ले जा कर बोला,

"देखिए, आप लोग कृप्या शांत रहें. मैं जानता हूँ की आप लोग को इनका ये व्यवहार काफ़ी आपत्तिजनक लग रहा है. विश्वास कीजिए... ये ऐसा आदतन नहीं कर रहे.. दरअसल अधिकतर ऐसे केस पिछले कई महीनों से विभिन्न गाँवों से आ रहे हैं और पिछले तीन महीने से आपके गाँव से आना जारी है... कभी नदी के तट पर तो कभी गाँव में. इस प्रकार हमेशा मृत देह देखना और देख कर स्वयं को संतुलित रख पाना सरल नहीं होता. इसलिए काम के शुरुआत में ही या बीच बीच में कुछेक शब्द ऐसे बोल लेते हैं जिनसे इनका मानसिक स्थिति ठीक रहे और ये सकुशल अपना निर्धारित कार्य कर सकें. आप लोग हमारी परेशानी को भी कृप्या समझने का प्रयास करें. हम पुलिस वाले आप ही की तरह जीता जागता मानव हैं और आपकी और समाज की सहायता के लिए ही सदैव तत्पर रहते हैं. इसलिए करबद्ध निवेदन है आपसे की कृप्या मामले को गम्भीरता से न लें, शांत रहें और सहयोग करें."

इतना कह कर हवलदार ने परिवार जनों के सामने हाथ जोड़ा और अपनी स्थिति समझाने का भरसक प्रयास किया. उसका ये प्रयास तत्काल अपना रंग भी दिखाया और सब ने हवलदार की बात को मान लिया.

इधर रॉय और पार्थो दा ने भी जब देखा की उनकी इन हरकतों से दूसरों में रोष हो रहा है तो उन दोनों ने भी जल्दी से अपना अपना पोजीशन सम्भाला और काम करने लगे.

इंस्पेक्टर रॉय की ही तरह पार्थो दा को भी इस शव ने कुछ पलों के लिए विस्मित कर दिया.

रॉय से एक दो सवाल और करने के बाद पार्थो दा अपने कलीग को कुछ निर्देश देने लगे और खुद भी बारीकी से शव का मुआयना करने में जुट गए. तब तक रॉय भी हवलदार श्याम और दूसरे सिपाहियों के साथ जाँच संबंधी दूसरे दिशा निर्देशों को ले कर जानकारी देने लगे.

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चार दिन बाद,

इंस्पेक्टर रॉय थाने में अपने कमरे में बैठा दूसरे कई फाइलों में खोया हुआ था कि तभी हवलदार श्याम आया,

"सर!"

श्याम को देखते ही रॉय ने तुरंत उसे आने का निर्देश दिया,

"हाँ श्याम, अंदर आओ."

बड़ी तत्परता से श्याम अंदर आ कर सैल्यूट मार कर सावधान के मुद्रा में खड़ा हुआ. रॉय टेबल पर रखे चाय के ग्लास को उठा कर होंठों से लगाते हुए पूछा,

"कहो श्याम ... क्या रिपोर्ट लाए हो? और सुनो.. प्लीज कोई अच्छी बात सुनाना. ऐसे केस ने सुबह से ही सिर दर्द दे रखा है."

हाथ में थामे हुए फाइल को रॉय की ओर बढ़ाते हुए श्याम ने कहा,

"कुछ खबर तो है पर अच्छी या बुरी ये नहीं जानता...."

"ओके.. आगे बोलो." ग्लास को रख फाइल के पन्नो को पलटते हुए रॉय ने कहा.

"सर, पार्थो सर ने ये फाइल देते हुए मुझे आपसे पाँच बातें कहने को कहा था,

पहला, इस लड़के, मतलब की शुभोजीत बनर्जी उर्फ़ शुभो को सडन माइल्ड हार्ट अटैक हुआ था.

दूसरा, इस लड़के को एकाएक खून की कमी हुई थी.. अब ये कमी हार्ट अटैक से ठीक पहले हुई थी या बाद में इस पर पार्थो सर अभी और जाँच करेंगे.

तीसरा, इस बात की पूरी सम्भावना है कि मरने से ठीक पहले ये लड़का सेक्सुअल एक्टिविटी में लिप्त था.

चौथा, उस बिस्तर से एक लम्बा बाल पाया गया है जो लाइट ब्राउन रंग का है और सम्भवतः किसी महिला की है. और ये महिला अंदाजन तीस से चालीस के बीच की आयु की होगी.

और पाँचवा...."

बोलते हुए कुछेक सेकंड्स के लिए हवलदार श्याम रुक गया. लगा जैसे वो खुद पशोपेश में है.

"और पाँचवा क्या श्याम? आगे बोलो."

उसे बोलते हुए चुप होता देख रॉय की भी उत्सुकता एकाएक बढ़ गई.

"सर, पार्थो सर ने पाँचवीं बात ये कहा है कि आज तक उस गाँव में जितने भी शव बरामद हुए हैं; उन सबके पास से ऐसे ही एक लम्बा बाल पाया गया है और पिछले दो सालों में ये इक्कीसवीं बार है."

"ओह! ये तो बहुत बुरी बात है. दो साल में इक्कीस शव?! ये तो बहुत चिंतनीय विषय है.... ह्म्म्म.... (कुछ सेकंड्स चुप रहने के बाद).... पर इसी में एक काम की खबर भी है. एक कॉमन बात जो अब तक के सभी शवों के पास से पाया गया है."

एक विजयी मुस्कान से रॉय श्याम की ओर देखते हुए बोला.

"आप उन लंबे बालों की बात तो नहीं कर रहे हैं सर?" श्याम ने प्रश्न के रूप में अपना मत प्रकट करने का प्रयास किया.

"हाँ.. श्याम. बिल्कुल. मैं इसी कॉमन चीज़ की बात कर रहा हूँ. यही एक ऐसा क्लू बन सकता है हमारे लिए जो अब तक के हुए सभी हत्याओं का......" ख़ुशी से चहकते रॉय का चेहरा एकदम से फक्क पड़ गया.

पैकेट से निकला सिगरेट दोबारा पैकेट में आधा घुस गया.

रॉय की अचानक से ऐसी प्रतिक्रिया को देख कर आश्चर्य करता हुआ श्याम उससे कारण पूछा.

चिंतित रॉय तुरंत कुछ न बोला.

फिर टेबल के नीचे रखे बोतल को उठा कर पानी पीने के बाद एक दीर्घ श्वास लेता हुआ बोला,

"बात वहीँ अटक गई श्याम."

"कैसे सर?"

उत्सुकता ने श्याम को अधिक देर न करने दिया प्रश्न करने के लिए.

सिग्रेट जलाते हुए रॉय बोला,

"अब मुझे भी याद आ रहा है श्याम, जितने भी लंबे बाल मिलने वाले केस हुए हैं वो सब या तो गाँव में या गाँव से सटे हुए उस जंगल में हुए हैं... और सब के सब पुरुषों के शव थे... लड़कों के थे. उन केसेस को अगर ले लें तो शायद इक्कीस हुए होंगे लेकिन उस नदी का क्या? कुछेक अपवाद छोड़ दें तो वहाँ से तो हमेशा स्त्रियों के ही शव मिलते आए हैं आज तक. उस नदी के दक्षिण दिशा से सम्बन्धित अब तक हुए मृत्यु के कुल योग का क्या? क्या वहाँ के शवों से हमें लंबे बाल मिले हैं? बोलो श्याम."

श्याम एकदम से चुप हो गया.

इंस्पेक्टर रॉय ने ये बहुत ही अच्छा और पते का प्रश्न किया था. लंबे बाल मिलने की आंशिक सफ़लता की ख़ुशी में हवलदार श्याम खुद इस पॉइंट को भूल गया था कि ये लंबे बालों वाला केस तो सिर्फ़ गाँव और उससे जुड़े जंगल से से हैं. आखिर नदी के दक्षिणी तट से मिलने वाले शवों के दोषी के बारे में भी तो पता लगाना है.

अधिकांश शव उस गाँव की ही किसी महिला या फ़िर कम आयु की अविवाहित लड़कियों की थी और उन सभी शवों पर इतनी बुरी तरह से दुष्कर्म करने के संकेत मिले थे कि कोई भी सभ्य सम्भ्रांत मनुष्य उन शवों को देख कर ही या तो तुरंत दृष्टि फेर ले या उल्टी करना शुरू कर दे.

कुछ देर तक इंस्पेक्टर रॉय और हवलदार श्याम यूँ ही सोचते रहे. जब कुछ समझ में नहीं आया तो रॉय ने ही बात शुरू की,

"गाँव वालों से पूछताछ हुई?"

"जी सर, हुई. गाँव के ही जिष्णु चाय वाला, हरिपद नौका वाला और बिल्टू दूधवाला, इन तीनों का कहना है कि जिस रात शुभो का देहांत हुआ उसी शाम को वो काफ़ी भटका और बहका हुआ सा लग रहा था. उसके बर्ताव से उसके अलावा उसके साथ किसी और के होने का आभास हो रहा था. बिल्टू दूध वाले का कहना है कि वो पहले हरिपद और जिष्णु काका के बीच होने वाले नदी में हुए एक दुर्घटना की बातें सुनता रहा और फिर अचानक से उससे, यानि बिल्टू से रुना भाभी के बारे में पूछने लगा....."

"एक मिनट... ये रुना भाभी कौन है?"

"सर, रुना भाभी अर्थात् रुना मुखर्जी इसी गाँव में ही रहती हैं और एक शिक्षिका हैं. उनके पति श्री नबीन मुखर्जी पोस्ट ऑफिस में हेड क्लर्क के पद पर कार्यरत हैं. शिक्षिका होने के कारण उनका बहुत मान - सम्मान है इस गाँव में. गाँव का हर छोटा - बड़ा उनके प्रति आदर व श्रद्धा का भाव रखता है. पहले स्कूल से लौटने के बाद घर में ही छोटे बच्चों को मुफ्त का पढ़ाती भी थी पर अब घर के काम बढ़ जाने के कारण नहीं पढ़ाती हैं."

"और ये बिल्टू.... ये तो वही...."

"जी सर, ये उसी तुपी काका का भांजा है. तुपी दूध वाले का. जिनका नौकर, जिसे वे अपना बेटा समान मानते थे; 'मिथुन' की मृत्यु हुई थी करीब महीने भर पहले."

"हम्म...."

रॉय कुछ पल सोचता रहा और फ़िर अपने टेबल के सबसे ऊपर के दराज से एक मोटा सा कॉपी निकाल कर उसके पन्ने पलटने लगा. ये वही कॉपी है जिसमें उस रात शुभो ने कुछ बातें लिखी थीं. बॉडी को मेडिकल टीम के ले जाने के बाद रॉय ने बिस्तर को चेक किया था और गद्दे के नीचे से यह कॉपी बरामद हुई थी.

सात में से तीन पन्नों को पढ़ने के बाद रॉय ने एक लम्बा कश लगा कर सिगरेट ऐशट्रे में डाल कर बुझाया और बड़े गम्भीर और चिंतित मुद्रा में कहा,

"बड़ा पेंच है इस पूरे मामले में. श्याम, एक काम करो, कल ठीक दस बजे... नबीन, रुना, तुपी काका, उनकी बीवी सीमा, भांजा बिल्टू, हरिपद, जिष्णु और शुभो के दोनों दोस्त देबू और कालू को यहाँ हाजिर करो. कल दस बजे का मतलब बिल्कुल दस बजे ही... मुझे ये सब यहाँ चाहिए... इज़ दैट क्लियर?"

पूरी सतर्कता और जोश में श्याम बोला,

"यस सर!"
 
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अगले दिन सुबह ठीक दस बजे थाने के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.

इंस्पेक्टर रॉय उतरा और थाने की सीढ़ियाँ चढ़ा.

दरवाज़े के दोनों तरफ दो सिपाही अपनी अपनी राइफलें ले कर सतर्क बैठे थे... रॉय को देखते ही झट से खड़े हो कर सैल्यूट किया. रॉय ने हाथ उठा कर उनके सैल्यूट का उत्तर दिया.

अंदर अपने टेबल के सामने हवलदार कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था. उसने भी रॉय को देख कर खड़े हो कर सैल्यूट किया. रॉय ने भी पहले जैसे ही उत्तर दिया. हवलदार के बैठने के स्थान के ठीक बगल में; दाएँ साइड रॉय का कमरा है.

कमरे में घुसने से पहले रॉय ठिठक गया. सिर घूमा कर देखा; आज और दिन के मुकाबले कुछ ज्यादा ही लोग आए हैं. उसने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली श्याम पर. श्याम ने तुरंत आँखों के इशारे से ही कुछ कहा रॉय को जिसे रॉय एक क्षण में ही समझ गया.

बेंच और चेयरों पर बैठे लोगों की ओर एक नज़र देख कर श्याम को बोला,

"तुम पाँच मिनट बाद अंदर आना."

"यस सर!"

अपने कमरे में जाने के बाद सबसे पहले रॉय ने टेबल पर पहले से रखे ग्लास से पानी पिया, फिर अपने पॉकेट से अपने भगवान की फ़ोटो निकाल कर उन्हें प्रणाम किया और फिर अपने गुरुदेव के फ़ोटो को.

फ़िर आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा.

सामने कुछ फाइलें रखी थीं.

उनमें से दो - तीन फाइल के पन्ने पलट कर देखा, दूसरे पॉकेट से सिगरेट का पैकेट निकाला, सिगरेट सुलगाया और ऊपर चलते पंखे की ओर देखते हुए मन ही मन कुछ बातों को क्रमवार सजाने लगा.

ठीक पाँच मिनट बाद ही दरवाज़े पर श्याम आया और विनम्र स्वर में बोला,

"आपने बुलाया था सर?"

श्याम के आवाज़ से विचारों के उधेड़बुन से बाहर आया रॉय ने पहले श्याम की ओर देखा और फ़िर उसपर से नज़रें हटा कर सामने रखे आधे खाली ग्लास की ओर देखते हुए बोला,

"हाँ... सुनो."

श्याम अंदर आया और सैल्यूट मार कर सावधान की पोजीशन में खड़ा हो गया.

"श्याम... सब आ गए हैं?"

"जी सर!"

"किसी ने भी नखरे दिखाए... ना नुकुर किया?"

"दो - तीन ने किया सर."

"दो - तीन?! कौन कौन?"

"नबीन, उनकी पत्नी रुना और जिष्णु चायवाला."

"बाकी सब तैयार हो गए थे?"

"सभी कुछ न कुछ कहना चाहते थे शायद... पर पुलिस के डर के कारण शायद कुछ बोला नहीं गया इनसे, सर."

"हम्म... और कोई नयी बात?"

"नहीं सर, फिलहाल नहीं. पर इतना ही की नबीन और दूसरे जन बोल रहे हैं कि उन्हें जल्दी छोड़ दिया ताकि तुरंत अपने काम पर जा सके."

"हाँ.. हाँ.. ऐसा ही होगा... अब तुम जाओ और अगले दस मिनट बाद एक एक कर के सब को भेजना. जब कोई एक आए तो तुम भी यहाँ रहोगे? ओके?... और बद्री को बोलो बाहर तुम्हारे काम को तब तक वो सम्भाले."

"यस सर."

"और ये लो... ये लिस्ट है.. जिसका जिस नम्बर पर नाम है उसे वैसे ही अंदर भेजना."

"यस सर."

कह कर श्याम सैल्यूट दे कर कमरे से निकल गया.

इधर, उसके बाहर निकलते ही रॉय जल्दी से आँखें बंद कर अपने उन्हीं विचारों पर फिर से ध्यान केन्द्रित कर दिया.

ठीक दस मिनट बाद हवलदार श्याम अंदर आया और रॉय से अनुमति लेने के बाद एक एक कर सबको बुलाने लगा.

सबसे पहले हरिपद को बुलाया गया.

रॉय ने उसे टेबल के विपरीत अपने सामने वाले चेयर पर बैठने को कहा.

उसके बैठते ही रॉय ने अपने दाएँ हाथ की ऊँगलियों से कुछ इशारा किया श्याम को जिसे सिर्फ़ श्याम ही समझ सकता था. हरिपद का ध्यान तो इस तरफ गया ही नहीं. उस बेचारे का तो डर से ही हालत ख़राब हुए जा रहा था कि न जाने क्या क्या पूछा जायेगा और अगर किन्ही प्रश्नों का उत्तर अगर वो न दे सका तो कहीं उस जेल में न डाल दे.

पुलिस और उनसे जुड़े कुछ अफवाहों को हरिपद ने इतना सुन रखा था बचपन से की आज जैसे उसकी आँखों के सामने वे सभी अफवाहें किसी चलचित्र की भांति एक एक कर के चलने लगी हो.

रॉय ने उसे पहले पानी पीने को कहा.

हरिपद ने उसके लिए सामने रखे ग्लास को उठाया और गटागट पूरा ग्लास खाली कर दिया.

उसकी हालत देख कर रॉय और श्याम दोनों एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कराए.

"ठीक हो हरिपद?"

"जी, साहब."

"कुछ सवाल करूँगा... सही जवाब दोगे?"

"पूरी कोशिश करूँगा माई बाप."

हरिपद हाथ जोड़कर मिमियाते हुए बोला.

रॉय हल्का सा मुस्कराया. सीधा बैठा. श्याम को इशारा कर के हरिपद से एक हाथ दूर खड़े रहने को कहा.

और फ़िर शुरू हुआ प्रश्नकाल.

किसी प्रश्न का हरिपद बड़ी सहजता के साथ उत्तर दे गया तो किसी प्रश्न में बुरी तरह गड़बड़ा गया.

एक एक कर उससे कुल बारह प्रश्न किए गए. सभी प्रश्नों के उत्तर देते हरिपद के हरेक गतिविधि को बहुत सूक्ष्मता से देख रहा था रॉय.

इधर, बाहर बैठी रुना को धीरे धीरे बेचैनी होने लगी थी.

उसे ऐसा लगने लगा मानो उसके अंदर... उसके सीने में किसी ने दहकता आग का गोला रख दिया हो.

वो सामने श्याम के स्थान पर बैठे बद्री को पानी के लिए बोली. बद्री ने दूसरे सिपाही को पानी के लिए बोला. दूसरा सिपाही एक नया भर्ती हुआ बाईस वर्षीय लड़का था जो निर्देश मिलते ही जल्दी से एक ग्लास पानी ला कर रुना को दिया. रुना ने जरा सा नज़र उसकी ओर करके कृतज्ञता पूर्ण स्वर में धन्यवाद कहा और पानी पीने लगी.

वो लड़का वापस जाने से पहले दो मिनट वहीं खड़ा रहा.

दरअसल उसे रुना की सुन्दरता भा गई थी. अत्यधिक टेंशन के कारण पीठ पर से साड़ी को हटाने के फलस्वरूप रुना के डीप बैक स्क्वायर कट ब्लाउज से पर्याप्त अंश में बाहर दिखती उसकी स्वच्छ, निर्मल, बेदाग़ पीठ और उसपे भी टाइट ब्लाउज के कारण मांसल गदराई पीठ पर बनती हल्की सी क्लीवेज ने तो बस उसे पल भर में ही रुना का दीवाना बना लिया.

काजल लगी आँखें, होंठों पर लाल लिपस्टिक ऐसा मानो अभी अभी ताज़े रक्त में भीगी हुई हो, एक सुंदर पतली चेन जो आंचल के नीचे वक्षस्थल में कहीं समाई हो, दोनों में लाल चूड़ियों के साथ एक एक सफ़ेद शाखा चूड़ी. आंचल सीने पर अच्छे से लिए होने के बावजूद भी उस लड़के को रुना के वक्षों के आकार का अनुमान करने में कोई असुविधा नहीं हुई.


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इतना कुछ देखने के बाद वो लड़का अपने धड़कनों पर नियंत्रण नहीं रख पाया.

उसका दिल धाड़ धाड़ से ज़ोरों से धड़कने लगा. सूख गए होंठों पर बार बार जीभ फिरा कर उन्हें भिगाने की कोशिश करने लगा. इतना तो फिर भी ठीक था.. असल मुश्किल तो तब हुई जब उसे अपने चड्डी के अंदर बेलगाम हलचल होने का आभास हुआ.

बिन हड्डी वाला मांसल अंग अपने दूसरे रूप में आ चुका था जिस कारण पैंट के अंदर से बनी तम्बू के कारण उस लड़के को अपने आप से लज्जा होने लगी. वह तुरंत वहाँ से चला गया.

पानी पीने के बाद बेचैनी तो पूरी तरह से गई नहीं रुना की पर थोड़ा आराम ज़रूर मिला उसे. कुर्सी के बैकरेस्ट से पीठ टिका कर आराम से बैठ गई और अंदर ही अंदर खुद को पुलिस इंटेरोगेशन के लिए दोबारा तैयार करने लगी.

इधर तुपी काका की पत्नी सीमा रुना को खा जाने वाली निगाहों से देख रही थी.

दरअसल जब से वो थाने में आई है और रुना को अपने सामने देखी है तब से ही उसे उसी खा जाने वाली नज़रों से देखे जा रही थी. आँखों में गज़ब का गुस्सा झलक रहा था. तुपी काका, नबीन बाबू, कालू और यहाँ तक की रुना ने भी सीमा के इस बर्ताव को देखा. पर सिवाए तुपी काका और नबीन बाबू के रुना को रत्ती भर का आश्चर्य नहीं हुआ.

सच कहा जाए तो कहीं न कहीं दोनों स्त्रियों में बहुत पहले से कुछ ख़ास नहीं बनती थी. रुना सीमा को पसंद ही नहीं करती थी और सीमा को भी रुना के रूप लावण्य से सदैव ईर्ष्या रही.

रुना अपने आप में अलग थी ज़रूर और इसी कारण विवाहिता होते हुए भी गाँव के कई पुरुषों के रातों की, उनके सपनों की रानी भी थी; पर कहीं न कहीं सीमा रुना को टक्कर देती जान पड़ती थी और कभी कभी यही बात रुना को भी तनिक असुरक्षा का बोध करा देती थी.

थोड़ी ही देर बाद हरिपद कमरे से निकला और चुपचाप एक खाली कुर्सी पर जा के बैठ गया.

फ़िर एक एक कर के सबको बुलाया गया.

सबसे औसतन करीब पन्द्रह मिनट तक सवाल जवाब होते रहे.

सिवाय रुना और सीमा के.

इन दोनों को दो दो बार सवाल जवाब के लिए बुलाया गया और आधे - आधे घंटे तक प्रश्न सत्र चलता रहा.

इन दोनों को बार बार बुलाए जाने से इन दोनों के पति, नबीन बाबू और तुपी काका भी काफ़ी परेशान रहे पर क्या करते... पुलिस के काम में रुकावट डालने का जोखिम भला कौन ले?

जब सब बाहर अपने जगह पर बैठे थे तब रॉय और श्याम अलग से १५ मिनट तक आपस में बातें करते रहे.

फ़िर एकाएक अपने कमरे से निकले.

रॉय ने सबको एकबार अच्छे से देखा और कहा,

"आप लोगों ने काफ़ी अच्छा सहयोग किया. इसके लिए बहुत धन्यवाद. आज के लिए इतना ही. आगे अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़िर से आप लोगों थाने बुलाया जाएगा."

देबू और बिल्टू ने गला खँखार कर धीरे से कहा,

"साहब, फ़िर से आना पड़ेगा? साहब... हम लोगों का काम...."

उनका वाक्य ख़त्म होने से पहले ही रॉय गुस्सा करता हुआ बोला,

"तुम्हें क्या लगता है... आज यहाँ पार्टी करने के लिए बुलाया था क्या? हँसी मसखरी होती है यहाँ? इन सवाल जवाबों में हमारा भी समय जाता है... कई काम हमारे धरे के धरे रह जाते हैं. जो कहा जा रहा है.. सुनो और करो."

इतना कह कर रॉय गुस्से से अंदर चला गया.

हवलदार श्याम ने सबको इशारे से जाने को कहा... रॉय के गुस्से को देख कर किसी को किसी से कुछ कहने पूछने का हिम्मत नहीं हुआ. सब चुपचाप अपने अपने जगह से उठे और बाहर जाने लगे.

तभी अंदर से रॉय ने आवाज़ दिया,

"श्याम... इधर सुनना."

"यस सर."

श्याम तुरंत अंदर आया.

"श्याम... सब गए या नहीं?"

"जी सर, जा ही रहे हैं."

"ह्म्म्म.. सबके बातों को नोट किया?"

"जी सर... सबने जो भी कहा... उसमें जो कुछ भी महत्वपूर्ण लगा; मैंने वो सब नोट कर लिया."

"गुड. वैरी गुड. अब एक और बात बताओ..."

"जी सर..."

"सबसे सवाल जवाब होते समय तुम यहीं थे... पूरे समय... तुमने हर किसी के जवाबों को सुना... नोट किया.... सबकी बातों को सुनने के बाद तुम्हें प्रथमदृष्ट्या क्या लगता है... कौन अपराधी हो सकता है... किसपे संदेह सबसे अधिक हुआ है?"

"सर, मुझे तो लगता है कि.........."

श्याम ने जैसे ही बोलना शुरू किया बाहर से चीख पुकार की आवाज़ आने लगी.

बहुत ज़ोरों से आवाजें आ रही थीं... आदमी और औरत... दोनों के.

रॉय और श्याम पहले तो कुछ समझ नहीं पाए. पहले पाँच सेकंड तक एक दूसरे को देखते रहे... फ़िर एक साथ लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर निकले. दोनों ने देखा की थाने के सिपाही सब भी थाने के बाहर खड़े हैं और किन्हीं को छुड़ाने का असफल प्रयास कर रहे हैं.

रॉय और श्याम दोनों जल्दी से थाने के मेन दरवाज़े तक आए.

बाहर आ कर जो देखा उससे दोनों ही स्तब्ध रह गए.

बाहर सीमा और रुना दोनों एक दूसरे से भीड़ी हुई थीं. दोनों ही एक दूसरे को थप्पड़ों से मार रही थी और जितना ज़ोर से हो सके उतना मारने का प्रयास कर रही थी. खास कर सीमा... उसके गुस्से का कोई पार नहीं दिख रहा था.

वो तो ऐसे कर रही थी जैसे की अभी के अभी रुना के कई टुकड़े कर के उसे कच्चा ही चबा जाएगी. रुना भी पलट कर उसके थप्पड़ों का जवाब दे रही थी पर मारने से कहीं ज्यादा वो खुद को बचाने का प्रयास कर रही थी.

सीमा रह रह के बार बार एक ही बात दोहरा रही थी,

"तू...तूने ही खाया है मिथुन... तूने ही छीना है हमसे... मेरे मिथुन को... उस बेचारे ... भोले लड़के को तूने ही निगला है. बता... बोल न.. क्यों की ऐसा... कमीनी..."

दोनों के पति और वहाँ उपस्थित बाकी सभी लोग दोनों को छुड़ाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन थोड़ा छूटने के तुरंत बाद सीमा फिर से रुना पर टूट पड़ती. धीरे धीरे वहाँ बहुत भीड़ जमा हो गई.

थाने के सामने इस तरह का एक तमाशा होता देख कर रॉय बुरी तरह गुस्से में भर गया और बहुत ज़ोर से चीखते हुए गरज उठा,

"बस करो... क्या लगा रखा है यहाँ? कोई बाज़ार है?? या गाँव का अखाड़ा है??? जो करना है अपने गाँव में... अपने घर में करो... जाओ... अब अगर एक शब्द भी तुम लोगों में से किसी के भी मुँह से सुना तो अभी के अभी बिना किसी कंप्लेंट के तुम सबको पूरे एक महीने के लिए अंदर डाल दूँगा... समझे..! जाओ यहाँ से!!"

रॉय के इस धमकी ने तुरंत वहाँ जमा हुए लोगों पर अपना असर दिखाया और सब हड़बड़ा कर वहाँ से भाग खड़े हुए. सीमा और रुना ने भी अब तक एक दूसरे को छोड़ दिया था और आगे बढ़ गई थी.

सीमा अब भी गुस्से से बीच बीच में रुना को देख रही थी पर कुछ कह नहीं पा रही थी क्योंकि वो तो खुद अब रॉय के गुस्से से डर गई थी.

और भला एक गुस्सैल पुलिस वाला को कौन उकसाए?

यही सोच कर उसने फ़िलहाल अपने गुस्से को काबू करने का पूरजोर कोशिश कर रही थी.

सबके चले जाने के करीब आधे घंटे बाद थाने के अंदर की गतिविधि भी थोड़ी शांत हुई और जब दैनिक कामकाज पटरी पर आई तब रॉय ने बद्री को बुला कर चाय लाने को कहा और साथ ही श्याम को भी बुलवा भेजा.

श्याम ने आते ही सैल्यूट मारा और कहा,

"आपने बुलाया सर?"

"अं.. हाँ... पहले बैठो... कुछ बात करनी है."

श्याम तुरंत आदेश का पालन करता हुआ रॉय के सामने चेयर पर बैठ गया.

"तुमने तो सब देखा... सुना... और तो और थाने के ठीक बाहर हुए तमाशे के समय भी तुम वहाँ मेरे साथ ही थे...क्या लगता है... कौन है असली अपराधी?"

उत्तर देने से पहले श्याम दो क्षण सोचा और बड़े विचारणीय ढंग से बोला,

"सर... मुझे लगता है इन सब में ये.... रुना... रुना जी का हाथ है."

"ऐसा क्यों?"

"सर, वो जब प्रश्नों के उत्तर दे रही थी तब काफ़ी अटक जा रही थी.. लग रहा था मानो वो बोलना चाह कर भी नहीं बोलना चाहती.. या फ़िर सही बात किसी भी हाल में न निकले इसका भरसक प्रयास कर रही थी."

"यस, राईट! रुना मुखर्जी कुछ जानती ज़रूर है पर कहना नहीं चाहती. और कुछ?"

श्याम सोचते हुए बोला,

"सर, और कुछ तो अभी याद नहीं आ रहा. मैंने जो सबके स्टेटमेंट्स नोट किया है; एकबार उनको अच्छे से स्टडी करना पड़ेगा. थोड़ा टाइम लगेगा सर."

"हाँ... थोड़ा टाइम तो ज़रूर लगेगा. लेकिन कोशिश करना पड़ेगा की टाइम थोड़ा ही लगे... ज्यादा न हो जाए. ओके?"

"यस सर."

"हम्म.. और कोई नयी बात? अच्छा....वो नया लड़का कैसा काम कर रहा है?"

"काम तो ठीक ही कर लेता है सर... पर आज थोड़ी सी गलती हो गई उससे... अभी जब मैं यहाँ आया तो देखा बद्री उसे समझा रहा था."

"गलती!! कैसी गलती?"

"व..वो...सर..."

"ओह.. कम ऑन श्याम. जल्दी बोलो."

"स...सर...वो... बाहर कुर्सी पर जब रुना और लोगों के साथ बैठी हुई थी तब उसे प्यास लगी थी... बद्री को बोलने पर उसने उस लड़के को पानी देने को कहा. लड़का जब पानी दिया तो रुना के बहुत पास था... अ...औ..."

"और??" रॉय की उत्सुकता बढ़ने लगी.

"और व.. वो... रुना जी.. पर .... मोहित हो गया."

"हैं?!!"

"जी सर."

रॉय ने श्याम को गौर से देखा.

श्याम सच बोल रहा था. ये बात समझते ही रॉय खिलखिला कर हँस पड़ा. उसे हँसता देख कर श्याम भी हँसी रोक नहीं सका और हँस पड़ा.

"ओके.. जो हुआ सो हुआ... अब काम की बात.. मैं अभी पुराने कुछ केसेस को लेकर व्यस्त रहूँगा.. उनको स्टडी करूँगा; तो ध्यान रहे कोई मुझे डिस्टर्ब न करे. बहुत ज़रूरी होने पर ही मेरे पास किसी को आने देना. समझे?"

"यस सर."

"ओके. यू मे गो नाउ."

अनुमति मिलते ही श्याम वहाँ से चला गया.

श्याम के जाते ही रॉय ने बगल में रखी एक फाइल को उठा कर उसके नीचे दबी कुछ पासपोर्ट साइज़ के फ़ोटो निकाले. ये वो फ़ोटो थे जिन्हें उसने आज सवाल जवाब के समय नबीन बाबू, रुना और अन्य लोगों को लाने को कहा था.

दो सफ़ेद पेपर लिया, उनमें से एक पर उसने सभी पुरुषों के फ़ोटो रख दिया और दूसरे पर दोनों महिला, अर्थात् सीमा और रुना का फ़ोटो रखा और पेपर पर ही एक जगह पेन से पासपोर्ट साइज़ का एक चतुर्भुज बनाया. अब दोनों फ़ोटो और वो चतुर्भुज ऐसे बने और रखे थे कि अगर तीनों को रेखाओं से जोड़ा जाए तो एक त्रिकोण बन जाए.

रॉय ने अब एक सिगरेट सुलगाया, तीन - चार कश लगाया और अपने आप से ही कहा,

"पता नहीं श्याम ने इस बात को नोटिस किया या नहीं... ये दो औरतें... सीमा और रुना... शुरू से ही संदेह के घेरे में हैं. दोनों के लंबे बाल हैं... दोनों के ही बालों का रंग लाइट ब्राउन है, दोनों ने ही अपने नाखूनों को थोड़ा बढ़ाया हुआ है, नाखूनों पर नेलपॉलिश लगी है, दोनों ने ही मैनीक्योर किया है. रुना मुखर्जी तो है ही सुन्दर... लेकिन सीमा को भी इस मामले में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. दोनों ने ही शायद परफ्यूम भी शायद एक सा लगाया था.... या शायद.... म्मम्म....खैर..."

रॉय ने अब दो कागज और लिया; और उन दोनों कागज़ों में से एक पर नबीन बाबू, हरिपद और तुपी काका के फ़ोटो उसी त्रिकोण तरीके से रखा और दूसरे पर देबू, कालू और शुभो के.

इसके बाद रॉय ने टेबल का ही एक और दराज खोला, हेडफ़ोन निकाला और उसे उसी दराज में रखे एक छोटे से टेप रिकॉर्डर से कनेक्ट कर के कुछ सुनने लगा. ज्यों ज्यों सुनता गया... त्यों त्यों उसके चेहरे के भाव कई बार बदलते गए.

इधर,

गाँव में...

एक बड़े घने छाँवदार वृक्ष के नीचे गाँव के कुछ प्रबुद्ध और वरिष्ठ लोग एकत्र हुए थे. सबके ही मुख मंडल पर घोर चिंता के घनघोर बादल छाए हुए थे. सभी किसी सोच में एक साथ डूबे हुए थे. सब के सब बिल्कुल चुप.

बड़ी देर बाद गाँव के सबसे वरिष्ठ सज्जन श्री सुमलय बिस्वास ने गला साफ़ करते हुए कहा,

"नहीं मेरे मित्रों... व्यक्तिगत रूप से मेरा यही मानना है कि इस समस्या का समाधान हमारे खुद के हाथों में नहीं है. पुलिस चाहे कुछ भी कहे या करे; मेरा स्वयं का मानना है की ये सभी घटनाएँ किसी बहुत ताकतवर ऊपरी बला का काम है... और इसका मुकाबला करने के लिए हमें भी ऐसे ही किसी ताकत की सहायता लेनी होगी."

एक वृद्ध सज्जन बोल पड़े,

"वो तो हम सब समझ ही रहें हैं बिस्वास जी... पर असल प्रश्न तो यही है कि क्या आप या इस गाँव में कोई भी ऐसी किसी शक्ति को जानता है जो हमारी सहायता करने के लिए तैयार हो?"

इस प्रश्न पर सभी चुपचाप एक दूसरे का मुँह ताकने लगे... और जब उत्तर नहीं मिला तो परे देखने लगे... सिवाय बिस्वास जी के.

उन्होंने कांपते लहजे में कहा,

"हाँ... मैं जानता हूँ ऐसे किसी को."

उनका ये कहना था कि सभी आश्चर्य से बिस्वास जी की ओर देखने लगे. लेकिन बिस्वास जी के चेहरे पर दृढ़ता के साथ साथ एक अनिश्चितता का भी भाव था. एक घबराहट थी उनमें.

उन्हें ऐसा देख कर एक दूसरा सज्जन उनके पास आया और पूछा,

"कौन? किसकी बात कर रहे हैं आप?"

होंठों पर जीभ फेर कर खुद को नार्मल दिखाने की कोशिश करते हुए बिस्वास जी बोले,

"कापालिक!"
 
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दस दिन बीत गए.

इसी बीच एक और लड़के की मृत्यु हुई.

गाँव में कुछ लोगों को अब सीमा और रुना पर संदेह तो होने लगा था पर उस संदेह को बल देने योग्य पर्याप्त कारण नहीं था उनके पास.

पंद्रहवें दिन खबर लगी की बगल के गाँव में एक सिद्ध बाबा आए हुए हैं और इस गाँव के कुछ लोग उन्हें लाने गए हैं. सिद्ध बाबा के दर्शन के लिए गाँव के भोले और सीधे लोगों में एक उत्तेजना, एक उद्वेग, एक उल्लास घर कर गया और सब के सब जल्द से जल्द बाबा के अपने गाँव में पाने की इच्छा करने लगे.

यहाँ तक की रुना ने भी उस बाबा के खाने के लिए तीन - चार स्वादिष्ट पकवान बनाए और अपने पति, बेटे और अपना भविष्य जानने पूछने के लिए मन ही मन भिन्न भिन्न प्रश्न सजाने बुनने लगी.

ऐसा ही कुछ सीमा भी करने लगी थी.

उसने भी कुछेक पकवान बनाए और बाबा से पूछने के लिए कुछ प्रश्न तैयार कर ली थी.

गाँव में हर जगह, हर कोने में सिर्फ़ उस बाबा के ही चर्चे थे.

बाबा ये हैं, बाबा ऐसे हैं, बाबा वैसे हैं.... बाबा ऐसा कर सकते हैं, बाबा वैसा कर सकते हैं... इत्यादि इत्यादि.

आखिरकार वो दिन भी आ गया. सब नदी के तट पर जा कर खड़े हो गए. थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद जैसे ही बाबा का नाव दूर से आता दिखा; सब अति प्रसन्नता से बाबा का जयकारा लगाने लगे.

बाबा ने जैसे ही नाव से उतर कर नदी तट पर अपने कदम रखे, गाँव वालों में धक्कामुक्की शुरू हो गई उनका चरण छूने के लिए. हर कोई बाबा के चरण छू कर अपना भाग्य बदलना चाहता था. गाँव वालों की ख़ुशी देखते ही बनती थी. उन्हें इस तरह इतना प्रसन्न और अपने प्रति इतना स्नेह, प्रेम और भक्ति देख कर बाबा गदगद हो गए. उनके तेजयुक्त मुखमंडल पर भी प्रसन्नता नाचने लगी. पर उनकी आँखों और भृकुटियों के उतार चढ़ाव कुछ और ही कहानी कह रही थी.

उनके साथ उनके दो चेले भी चल रहे थे. दोनों बाबा के अगल बगल थे.

बाबा अपनी चाल थोड़ा धीरे करते हुए अपने दाएँ चल रहे चेले के कान में कुछ कहा.

चेला बहुत गम्भीरतापूर्वक सारी बात सुना और सिर हिला कर आज्ञा माना.

सभी गाँव वाले पूरी श्रद्धा से उन्हें एक बहुत ही साफ़ सुथरे और सुगंधी लगे पालकी में बैठा कर गाँव से थोड़ा हट कर एक सुनसान जगह में उनके लिए बनी एक कुटिया में ले गए.

इधर वह चेला, जिसका नाम गोपू था, वो बिस्वास जी को एक किनारे ले गया और पूछने लगा,

"बिस्वास जी, आपने जिस कारण गुरूजी जो यहाँ बुलाया है क्या वो एकबार फ़िर से दोहराएँगे? .... विस्तार से."

बिस्वास जी तनिक चकित को कर पूछे,

"क्यों श्रीमन, गुरूजी को कोई असुविधा हो गई है क्या? यदि किसी भी प्रकार की असुविधा हुई है तो मैं पूरे गाँव वालों की ओर से उनसे एवं आपसे क्षमा माँगता हूँ."

कहते हुए बिस्वास जी रुआंसा होते हुए हाथ जोड़ लिए.

चेले को दया आई. उसने तुरंत बिस्वास जी के हाथों को पकड़ कर नीचे करता हुआ बोला,

"अरे बिस्वास जी... ये आप क्या कर रहे हैं? ऐसी कोई बात नहीं है. हमें किसी भी तरह की कोई असुविधा नहीं हुई है. बल्कि मैं, चांदू और गुरूजी .... सब के सब आप लोगों के स्नेह और विश्वास को देख कर आश्चर्य और प्रसन्नता से भरे जा रहे हैं. पर मैं जो पूछ रहा हूँ आपसे उसका सीधा कारण आप ही लोगों की परेशानी से जुड़ा हुआ है. अतः बिना विलम्ब किए कृप्या सब कुछ दोबारा मुझे कह सुनाइए."

"सीधा....कारण....ह..हम..लोगों....से ज...जुड़ा.... क्यों.... आप को... ल... लग..लगता है एस... ऐसा...?"

"गुरूजी को लगता हैं."

गोपू ने सीधा सपाट और संक्षिप्त उत्तर दिया.

स्पष्ट था कि वह शीघ्र से शीघ्र बिस्वास जी से अपना वाँछित उत्तर पाने की अपेक्षा कर रहा था.

बिस्वास जी ने थूक गटका... चेहरा पोछा, चश्मा ठीक किया और फ़िर बोले,

"दरअसल ये कहानी आज से कई वर्ष पहले की है.. इसी गाँव की........"

कहते हुए बिस्वास जी ने वही कहानी सुना दी जो कुछ महीने पहले मीना ने रुना को सुनाई थी.

गोपू सब कुछ पूरे धैर्य से सुनता रहा.

चेहरा पढ़ने वाला कोई पारखी आदमी आसानी से बता सकता था कि इस समय कहानी सुनते हुए गोपू बहुत कुछ सोच रहा था, विश्लेषण कर रहा था और शायद कोई तोड़ ढूँढने की कोशिश कर रहा था.

पूरी घटना सुनाने के बाद बिस्वास जी थोड़ा रुक कर पूछे,

"श्रीमन, कोई विशेष बात है क्या? आपने दोबारा पूरा विवरण क्यों जानना चाहा? गुरूजी ने आपको ऐसा करने को क्यों कहा?"

गोपू से तुरंत कुछ बोला नहीं गया.

परन्तु उसका चेहरा देख कर ये स्पष्ट समझा जा सकता था कि उसका मन शांत नहीं है. बिस्वास जी से सब कुछ सुन तो लिया पर शायद कहीं कुछ जमता हुआ सा नहीं लगा रहा था उसे....या फ़िर शायद कोई ऐसी बात थी जो उसे पल भर में ही विचलित कर दिया था.

उसने बिस्वास जी को इशारा कर के पास में ही एक पेड़ के नीचे चलने को कहा.

दोनों अभी जा कर वहाँ खड़े ही हुए थे कि बिस्वास जी को कुछ सूझा और गोपू को वहाँ बैठने को बोल कर बगल के एक दुकान में चले गए.

थोड़ी ही देर में चाय लेकर उपस्थित हुए.

एक गोपू को दिया; पूरे श्रद्धा भाव से और दूसरा स्वयं लिया.

चाय पीते हुए पूछ बैठे,

"श्रीमन, कृप्या बताइए की आप वास्तव में क्या जानना चाहते हैं? क्या उलझन है? क्या गुरूजी ने किसी संकट की ओर संकेत किया है? क्या समस्या बहुत भयावह है?"

गोपू शांत रहा.

चाय खत्म कर कुल्हड़ एक ओर रखते हुए कहा,

"समस्या है तो सही... क्या है ये तो आपको और पूरे गाँव वालों को पता है... पर..."

"पर क्या श्रीमन?"

अधीर होते हुए कहा बिस्वास जी ने.

"गुरूजी को लगता है की इस पूरे समस्या का मूल कहीं और छुपा हुआ है."

"मूल?"

"हम्म."

"गुरूजी ने ऐसा कहा?"

"हाँ... गुरूजी ने ऐसा ही कहा है और पूरे विश्वास के साथ उनका यही मानना भी है."

"तो क्या समस्या वो नहीं है जो इतने दिनों से हम सोचते और समझते आ रहे थे?"

"नहीं... समस्या तो है वही जो आप समझ रहे हैं... यहाँ ध्यान दीजिए की मैंने आपको क्या कहा है?"

"क्या कहा है?"

"यही की समस्या का मूल कहीं और है."

"ओह हाँ... तो क्या.... म.. मतलब... समस्या का... स.. स...समाधान होगा न?"

"हाँ होगा... अवश्य होगा.."

गोपू ने पूरे विश्वास के साथ कहते हुए अपने जांघ पर एक थपकी दी.

उसका ऐसा विश्वास देख कर बिस्वास जी के मन को भी बल मिला.

कुछ देर वहीँ बैठ यहाँ वहाँ की बातें करने के बाद दोनों उठ खड़े हुए और उस कुटिया की ओर चल पड़े जहाँ बाबा ठहरे हुए हैं और अभी भी गाँव वालों का तांता लगा हुआ है.

धीरे धीरे ही सही पर अंत में सभी गाँव वाले अपने अपने घरों को लौट गए.

बिस्वास जी के अलावा वहाँ अन्य किसी को बैठने नहीं दिया गया.

अब उस कुटिया में चार लोग थे.

स्वयं बाबा जी, उनके दो चेले / शिष्य; गोपू और चांदू, और बिस्वास जी.

दोपहर के दो बजे रहे थे.

गाँव वालों के ही लाए गए पकवानों में से कुछ बिस्वास जी को खाने को दे कर बाबा जी स्वयं थोड़ा भोग खाने लगे.

उनका खत्म होते ही उन्होंने शिष्यों को तुरंत खा लेने को कहा जिसका उन दोनों ने अक्षरशः पालन किया और खाने बैठ गए. अब तक बिस्वास जी ने भी खाना समाप्त कर लिया था.

हाथ मुँह धो कर वापस आ कर बाबा अपने आसन पर बैठ गए.

बिस्वास जी भी उनके आगे हाथ जोड़ कर बैठ गए.

"वत्स..."

मधुर वाणी में बिस्वास जी को सम्बोधित किया बाबा ने.

"ज...जी... गुरूजी."

"गोपू ने तुमसे कुछ पूछा होगा?"

"जी गुरूजी. नदी के बारे....."

बाबा ने हाथ उठा कर बिस्वास जी को रुकने का संकेत किया. बिस्वास जी तुरंत चुप हो गए.

"हम जानते हैं गोपू ने तुमसे क्या पूछा होगा. हमने ही उसे ऐसा करने को कहा था."

"ओह... जी गुरूजी.. समझा."

बाबा एकाएक शांत हो गए. जो प्रसन्नचित्त चेहरा अब तक दमक रहा था वो अचानक से बेहद गम्भीर हो गया. बड़े शुष्क स्वर में बोले,

"वत्स बिस्वास.. जिस समस्या के समाधान हेतु मैं यहाँ आया हूँ; वो तो मैं कर के ही जाऊँगा. परन्तु मेरे विचार से एक बात पहले से ही तुम लोगों को... विशेष कर तुम्हें बता देना मैं उचित समझता हूँ. देखो वत्स, ऐसे मामलों में... मेरा मतलब ऐसे नदी, तालाब या पोखर जैसे मामलों में; मामला उतना पेचीदा नहीं होता जितना की दिखता है अपितु इससे कहीं अधिक जटिल होता है.

क्योंकि जहाँ भी पानी की अधिकता या प्रचुरता होती है; जैसे की नदी, तालाब या पोखर जैसे जगह; वहाँ का वातावरण और उस वातावरण में पाए जाने वाले अन्य वस्तुओं में उपस्थित कुछ ऐसे तत्व होते हैं जिनसे नकारात्मक शक्तियों को बहुत बल मिलता है. ऐसे जगहों के तापमान में सदैव ही एक भारीपन रहता है जिसे साधारण जन झेल नहीं पाते क्योंकि इस तरह के भारीपन को वो झेलने योग्य नहीं बने होते.

अब जैसा की तुम्हें गोपू से पता चल ही गया होगा कि वास्तविक समस्या ये नहीं है वरन, समस्या का मूल तो कहीं और ही है. अब ये मूल क्या है और कहाँ का है, क्यों है इत्यादि बातों का तो मुझे स्वयम ही पता लगाना पड़ेगा.

मैं जानता हूँ कि तुम्हारे मन में बार बार यही एक प्रश्न उठ रहा है की आखिर मैं समस्या के किस मूल की बात कर रहा हूँ. यह तो अभी के लिए मेरे लिए भी एक पहेली है. लेकिन एक सच बताता हूँ. इसे अपने तक ही रखना; गाँव वालों को बताया तो वे लोग बहुत डर जाएँगे.... जब तुम लोग नाव से मुझे और मेरे शिष्यों को बैठा कर ला रहे थे तब तुम्हारे गाँव से कुछ दूर रहते समय ही मैंने जाग्रत सिद्धि मन्त्र पढ़ कर स्वयं की ही आँखों पर फूँक मारी और दक्षिण दिशा की ओर देखा.

उस ओर देखते ही मैंने देखा कि एक सिर पानी से थोड़ा ऊपर उठा हुआ है. मतलब केवल आँखों तक का हिस्सा ही पानी से ऊपर उठा हुआ है. उसकी आँखों में एक अजीब सी बात थी. कुछ कह रही थी उसकी आँखें.... शायद शिकायत कर रही हो... या शायद गुस्सा कर रही या फिर शायद गाँव जाने से मना कर रही हो. ऐसा लग रहा था मानो उसे मेरे यहाँ आने का उद्देश्य का पहले से ही ज्ञात हो गया हो.

इतना तो निश्चित है कि वो सिर किसी युवक का था और यदि अनुमान के बल पर कहा जाए तो कदाचित उसी युवक का होगा जो आज से कई, कई वर्ष पहले उसी नदी के दक्षिण दिशा में डूब कर अपना प्राण गँवा बैठा था.

कई प्रचलित मान्यताओं, कथाओं, लोक कथाओं, दंतकथाओं इत्यादि में दक्षिण दिशा को वर्षों से यमलोक का द्वार कहा व माना जाता है... और उस नवयुवक की मृत्यु भी वहीँ हुई है... अप्राकृतिक मृत्यु ! स्वाभाविक रूप से उस दिवंगत आत्मा में रोष व प्रतिशोध की भावना कहीं अधिक होगी और ये भी एक अच्छा कारण हो सकता है उस आत्मा का शक्तिवान होने का.

परन्तु....."

बोलते हुए चुप हुए बाबा और उनके चुप होते ही उत्सुकता के मारे बिस्वास जी बोल पड़े,

"परन्तु क्या गुरूजी?"

"परन्तु उस युवक की आँखों को देख कर मैं उन्हें उस कम समय में जितना पढ़ पाया उसके अनुसार उस आत्मा में इतनी शक्ति होना कोई बच्चों का खेल नहीं. और तो और, इतनी शक्ति उसकी स्वयं की भी नहीं है. ये शक्ति उसे कहीं और से मिल रही है."

बाबा के इस कथन से अब तक भोग समाप्त कर हाथ मुँह धो कर उनके पास बैठे गोपू और चांदू भी आश्चर्य के सागर में गोते लगाने से खुद को नहीं रोक सके.

बिस्वास जी का मुँह भी खुला का खुला रह गया.

उन तीनों ने लगभग एक साथ ही पूछा,

"अर्थात्??!!"

"अर्थात्... मम्म... कदाचित वो लड़की... जो... उस वन में मृत पाई गई थी.. वही इस लड़के को शक्ति दे रही है... और आवश्यकता होने पर लड़के की आत्मा भी उस लड़की की आत्मा को शक्ति प्रदान करती है. अगर ऐसा है तो भी......"

बाबा फ़िर चुप हो गए.

उनके मुखमंडल पर उभर आए चिंता की रेखाएँ ये चुगलियाँ करने लगी थीं कि बाबा ने अब तक जो कुछ भी कहा है उस लड़के और लड़की की आत्मा और उनकी शक्ति के बारे में; अगर वो सब सच भी हों तो भी कहीं कुछ ऐसा है जो इस पूरे परिदृश्य में फिट नहीं बैठ रहा. कुछ ऐसा है जो सामने हो कर भी नहीं दिख रहा... कहीं कुछ छूट रहा है.

काफ़ी देर तक कोई किसी से कुछ नहीं बोला.

अंत में बाबा ने ही वहाँ छाई शान्ति को भंग करते हुए बिस्वास जी से समय पूछा. बिस्वास जी ने समय बताया.

तीन बज चुके थे.

बाबा खिड़की से बाहर देखा और बिस्वास जी को घर जाने को कहा.

बिस्वास जी भी चुपचाप मान गए और बाबा को प्रणाम कर के वहाँ से चले गए.

दोनों शिष्यों ने देखा, बाबा को चैन नहीं है. बड़े गहन सोच में डूबे हुए हैं. अपने में ही कोई जोड़ - तोड़ कर रहे हैं.

अभी शायद आधा घंटा ही बीता था कि अचानक बाबा की भृकुटियाँ तन गयीं. दायाँ हाथ काँप उठा. ये दो लक्षण बाबा को ठीक नहीं लगे. उन्होंने चांदू को जल्दी से उनकी पोटली लाने को कहा.

पोटली हाथ में आते ही बाबा ने जल्दी से पोटली के अंदर से एक निम्बू निकाला और मन्त्र पढ़ते हुए उसे अपने सामने थोड़ी दूरी बना कर रख दिया. केवल क्षण भर उस स्थान पर रहने के फौरन बाद वो निम्बू वहाँ से लुढ़क कर उस स्थान पर चला गया जहाँ कुछ देर पहले बिस्वास जी बैठे हुए थे.

उस स्थान पर जा कर निम्बू रुक गया और बहुत तेज़ी से अपने स्थान पर घूम गया. और फ़िर, धीरे धीरे लाल होते हुए उसका रंग काला पड़ने लगा.

ये देखते ही बाबा की त्योरियां चढ़ गयी. गोपू की ओर देखा और कहा,

"गोपू... अतिशीघ्र बिस्वास के पास जाओ. जाओ."

इतना कह कर बाबा ने एक संकेत करते हुए उसे एक और निम्बू दिया. गोपू बाबा का आशय समझ गया. तुरंत अपने स्थान से उठा, अपना एक पोटली उठाया और लपकते हुए कुटिया से बाहर निकल गया.

इधर बाबा ने चांदू को अपने पास बिठा कर उसे कुछ जाप करने को कहा और स्वयं भी जाप करने लगे.

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इधर ज़मीन पर पड़ा वो पहला वाला निम्बू धीरे धीरे काला होता जा रहा था....

...प्रतिपल.
 
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बिस्वास जी अपने कदम जल्दी चला रहे थे.

उनको जल्दी अपने घर पहुँचना था क्योंकि दोपहर को अगर एकाध घंटे की नींद न ले तो उनको बदहजमी होने लगती है... तबियत खराब होने लगता है.

अभी कुछ दूर, यही कोई आधा किलोमीटर चले होंगे कि उन्हें अचानक से एक अंजाना भय सताने लगा. लोग बाग़ तो फ़िलहाल अभी भी सड़कों पर हैं पर संख्या बहुत कम है.

और जितने भी हैं; सब के सब कहीं न कहीं जल्द से जल्द जाने की होड़ में हैं. बात भी सही है.

भला कौन इस सूरज चढ़े दोपहरी में बाहर सड़कों पर खुला घूमे.

मन ही मन खुद को इतना विलम्ब होने का कारण मानते व कोसते हुए बिस्वास जी तेज़ कदमों में और तेज़ी लाते हुए आगे बढ़ते रहे.

चलते चलते वो एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जो सुनसान या वीरान तो नहीं है पर दिन और देर शाम को अक्सर वो स्थान मनुष्य अथवा जीव जंतुओं से रहित हो जाया करता है.

बिस्वास जी डरते हुए आगे बढ़ने लगे.

डरने का कोई विशेष कारण नहीं था और न ही इससे पहले कभी उनको डर लगा था पर न जाने क्यों आज डर के मारे उनका पूरा शरीर ऐसे काँप रहा था जैसे घनघोर आँधी में कोई सूखा पत्ता.

उनके तेज़ कदम अब धीरे हो गए.

धीरे क्या हुए... अचानक से उठाना ही बंद हो गए. बहुत कठिनाई से उनको एक एक पग आगे रखना पड़ रहा था.

चार पग ही आगे बढ़ पाए थे बिस्वास जी कि तभी उन्हें आस पास के झाड़ियों में और पेड़ों के नीचे गिरे सूखे पत्तों की चरमराहट सुनाई दी. पलट कर आवाज़ वाली दिशा की ओर देखा.

जहाँ तक दृष्टि जा सकती थी... वहाँ तक देखा... पर संदेहास्पद कुछ भी दिखाई नहीं दिया.

निश्चित हुए ज़रूर पर धड़कनें तेज़ हो गयीं. कुछ अनिष्ट होने का भय एक बार फिर से उनके मन मस्तिष्क में छाने लगा.

फिर आगे बढ़ना शुरू किया उन्होंने...

एक एक पग सावधानी और आहिस्ते से रखते हुए. बिल्कुल ऐसे जैसे की वो धरती माता को कोई कष्ट नहीं देना चाहते हैं.

ऐसे ही चलते हुए उन्होंने यही कोई १० - १२ कदम चल लिया. धड़कनें अब भी तेज़ थी. सिर के दोनों ओर से पसीना बहते हुए दोनों कान के साइड से नीचे चला गया.

पहले भी कई बार उन्होंने इस तरह का वातावरण झेला है... पर इस तरह से छक्के छुड़ा देने वाली स्थिति पहले कभी नहीं आई थी उनके सामने. दो पग और आगे बढ़ते ही उन्हें फिर वैसी ही एक सरसराने की आवाज़ सुनाई दी.

बिस्वास जी तुरंत सिर उठा कर ऊपर पेड़ों की ओर देखा.

पेड़ थे तो सही... पर बहुत अधिक संख्या में नहीं... लेकिन जितने भी थे; ऐसे वातावरण में भय में कई गुणा वृद्धि कर देने वाले थे.

कुछेक पेड़ तो ऐसे भी थे जिनकी टहनियाँ पत्तों सहित इस तरह से फैले हुए थे मानो वो सूरज की रौशनी को नीचे धरती पर आने ही नहीं देना चाहती हो. अन्य समय में ये पथिकों के लिए; यहाँ तक की कई बार बिस्वास जी के लिए भी गर्मी के दिनों में घनघोर छाया प्रदान कर वरदान साबित हुई है लेकिन आज यही ऐसे पेड़ बिस्वास जी को भयावह और प्राणघातक लग रहे हैं.

पेड़ों के झुरमुठों का निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते बिस्वास जी को किसी के पदचाप सुनाई दिए.

और केवल पदचाप ही नहीं; कुछ और भी सुनाई दिया उनको पर वो पूरी तरह से निश्चित नहीं थे.

अपने आसपास और ऊपर की ओर ध्यान रखते हुए बिस्वास जी आगे बढ़ने के लिए जैसे ही फिर एक पग आगे रखा तभी उन्हें फिर वही आवाज़ सुनाई दी.

अब बिस्वास जी निश्चित थे... पदचाप तो है ही... साथ ही घुँघरूओं की भी आवाज़ है!

कोई और समय होता तो शायद यही ध्वनि उन्हें अत्यंत कर्णप्रिय लगी होती... या आयु के जिस पड़ाव पर वो हैं कदाचित ऐसे ध्वनियों पर ध्यान ही नहीं देते... परन्तु आज का ये वातावरण, निर्जन पथ, अकेले वो और उस पर भी आस पास से ऐसे आवाजों का आना; निश्चित ही किसी के भी मन को भयाक्रांत करने के लिए पर्याप्त हैं.

ऐसा तीन से चार बार हुआ.

बिस्वास जी चार पग आगे बढ़ते... वही पदचाप सुनाई देती... वही घुँघरूओं की आवाज़ सुनाई देती... और साथ ही पत्तियों की चरमराहट और हवाओं में सरसराहट.

डरते हुए ही सही पर अंततः बिस्वास जी ने धीमे स्वर में बोलना प्रारंभ किया,

"मैं नहीं डरता... मेरा भगवान मेरे साथ है..... मैं नहीं डरता... मेरे गुरु मेरे साथ है.... मैं नहीं डरता... मुझे नहीं डरना...."

दो ही बार उन्होंने ऐसा कहा था कि अचानक से एक तेज़ हवा चली और साथ में धूल का एक आँधी से चला. दो मिनट में ही आँधी शांत भी हो गई.

अपनी आँखों को मलते हुए बिस्वास जी आगे अपना रास्ता देखने की कोशिश कर ही रहे कि तभी उनके कानों से एक आवाज़ आ टकराई,

"बिsssस्वाsssसssssss..!!"

बेहद ठंड अंदाज़ में ये स्वर बिस्वास के कानों से टकराई.

बिस्वास जी हड़बड़ा गए.

अपना नाम ऐसे अंदाज़ में सुनना उनको वाकई हजम नहीं हुआ और अब उनका डर अपने सभी सीमा को पार कर चुका था.

अपने गुरु अर्थात् बाबा जी का नाम लिया उन्होंने और बहुत मुश्किल से अपना एक पैर आगे बढ़ाया.

ऐसा करते ही एक बार फिर वही धूल भरी आँधी उड़ी और बिस्वास जी को कुछ भी देखना असंभव हो गया.

आँधी जब थमी तब बिस्वास जी ने बहुत धीरे से आँखें खोला.

सामने दूर दूर तक धूल ही धूल उड़ रही थी. जब धूल थोड़ी कम हुई तब बिस्वास जी ने सामने जो देखा उसे देख कर उन्हें बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने तुरंत अपना चश्मा उतार कर उसे अच्छे से पोंछा और फिर आँखों पर चढ़ा कर सामने की ओर बहुत ध्यान से देखा.

उनसे थोड़ी दूर पर, एक बड़े से छायादार पेड़ के नीचे एक अतिसुन्दर रमणी खड़ी थी.

अपने समय के बड़े रसिक श्रेणी के व्यक्ति रह चुके बिस्वास जी ने इतनी दूरी से भी उस नवयौवना के शारीरिक ढांचे को बखूबी देख लिया. गौर व बादामी वर्ण मिश्रित शरीर, हिरणी जैसी बड़ी बड़ी आँखें... पके पपीते समान तने हुए और पुष्ट स्तन द्वय, लम्बे अधखुले बाल जो कदाचित कमर तक आ रही थी, कोमल कंधे, हाथ और पैर.

सच में बहुत सांचे में ढला बदन था उसका...

उन्नत वक्षस्थल, पतली कमर और इन दोनों से अपेक्षाकृत थोड़ा अधिक फैला हुआ नितम्ब.... रह रह कर बिस्वास जी के मन मस्तिष्क में यौन प्रेम जगाने लगी.

बिस्वास जी का गला सूखने लगा. आयु के बहत्तरवें पड़ाव पर ऐसे एक दिन में, ऐसे समय में ऐसा कुछ देखने को मिलेगा; यह तो उन्होंने भूल से भी कभी नहीं सोचा था.

हाँ, अपने जवानी के दिनों में कई गुलछर्रे उड़ाए थे उन्होंने, बहुत मस्ती की थी. हर तरह की मस्ती. लेकिन जैसे जैसे आयु बढ़ती गई, वैसे वैसे वो स्वतः इन चीज़ों से दूर होते गए. मन में बीच बीच में कभी कोई आशा उठी भी होगी तो अपनी समझदारी, समाज और घर परिवार का दायित्व निर्वहन के चक्कर में अपनी ऐसी उत्तेजक इच्छाओं का गला घोंट देना पड़ा था उनको जिसे उन्होंने सहर्ष किया भी क्योंकि जितनी इच्छा उनको अपनी इन यौन इच्छाओं को पूरी करने की होती उससे कहीं अधिक अपने घर परिवार और समाज में अपनी बढ़ती सम्मान, प्रतिष्ठा और दायित्वों के प्रति जागरूकता का बोध रहता.

और साठ के बसंत पर पहुँचने के साथ ही ऐसी इच्छाओं के पूर्ण होने की आशा को भी त्यागना पड़ा.

लेकिन... लेकिन...

जिन इच्छाओं और अल्हड़पन को बहुत पहले ही वो छोड़ और भूल चुके थे... वो इस तरह आज उनके सामने किसी भोज पात्र के भांति सामने खड़ा है. दृष्टि हट नहीं रही, मन कहीं और जाने का नाम नहीं ले रहा, सोया, मुरझाया जननांग जो अब केवल मूत्र त्यागने का एक साधन मात्र रह गया था उसमें भी न जाने कहाँ से प्राण का संचार होने लगा.

अनुमति लिए बिना ही दिमाग किसी रणनीतिज्ञ की भांति सोचने लगा.

'उस ओर जाना चाहिए? ... नहीं.. नहीं... नहीं जाना ही श्रेयकर होगा... परन्तु... क्या अतिशय सुन्दरता की ऐसी अनुपम मूर्ति को अनदेखा करना उचित होगा? जल से लबालब भरा और सुगन्धित फूलों से युक्त एक ऐसा नयनाभिराम सरोवर जो स्वयं आज मेरे सामने आ खड़ा हुआ है... इसमें डूबकी न सही... क्या हाथ की एक अंजुलि मात्र जल से अपने कंठ को तर कर लेने में भी पाप लगेगा? दोष है इसमें?'

स्वयं से ही ऐसे तार्किक प्रश्न करते हुए किसी अनिष्ठ की आशंका को ह्रदय के एक कोने में दबा कर मन में रह रह कर हिलोरें मारता, जन्म लेता वर्षों की लालसा को सम्भालने का अथक प्रयास करते हुए बिस्वास जी छोटे पर एक एक पग बड़ी सावधानी से रखते हुए आगे बढ़ते रहे.

अपनी ओर बढ़े आ रहे इस पुरुष को अपने मन में उठ रहे संशयों, संदेहों व नाना प्रकार के प्रश्नों से जूझता समझ कर वो सुन्दरी लाज से भरे अपने मुख पर एक मीठी सी मुस्कान बिखेर दी. पूरी तरह आश्वस्त. इस बात से कि चाहे लाख रोकना चाहे खुद को कोई पर उसके इस लावण्यमयी मृदु मुस्कान के आघात से बचना किसी के लिए भी असंभव है.

बिस्वास जी उस युवती के सौन्दर्यमन्त्र में वशीभूत हो कर उसकी ओर बढ़ते ही रहे और तभी रुके जब उस युवती के पास, बहुत पास आ गए थे.

अपलक उसके संगमरमर से पूरे बदन को देखते हुए बस किसी तरह इतना ही पूछ पाए,

"कौन हो तुम?"

"लड़की." कहते हुए हल्के से हँस दी वो. उसकी वो क्षण भर की हँसी मानो कई सौ मन (वजन) शहद घोल दिया बिस्वास जी के कानों में.

"वो...त... तो देख ही रहा... हूँ...न.. ना..नाम क्या है?"

"लाडली."

इस बार फिर शरमाई वो. गालों पर पलक झपकते ही लाज की लालिमा छा गई.

तभी बिस्वास जी को ऐसा कुछ दिखा जिसे स्पष्ट देख कर भी बिस्वास जी के लिए विश्वास कर पाना बहुत बहुत ही कठिन था. युवती से दो बातें करने के बाद पहली बार बिस्वास जी की आँखें युवती के शरीर के उस स्थान पर गई जो हरेक पुरुष और यहाँ तक की अन्य स्त्रियों के आकर्षण का प्राकृतिक केंद्रबिंदु होता है... वक्ष !

उसके वक्षस्थलों की ओर दृष्टि जाते ही बिस्वास जी को दुनिया का सबसे बड़े आश्चर्य का एक जबरदस्त झटका लगा. वो युवती अपने शरीर के ऊपरी भाग को केवल एक पतली साड़ी से ही ढक कर रखी थी. उसके पुष्ट, बड़े और भरे हुए स्तन पतली साड़ी के अंदर से सामने की ओर किसी भाले की तरह तने हुए थे और निप्पल तो जैसे उस भाले की नोक हों.

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"आहा... सुंदर नाम है... लाडली..."

कहते हुए बिस्वास जी उस युवती के और निकट आ गए. उसके जिस्म से आती सुंदर सुगंध मानो तन मन को भिगो दे रही थी और बिस्वास जी जितना सम्भव हो सके उस सुगंध में खुद को सराबोर कर लेना चाह रहे थे.

युवती अब आँखें थोड़ा तिरछी रखते हुए बिस्वास जी की ओर देखी. बिस्वास जी की दृष्टि उस समय उसके बड़े वक्षों की ओर ही थी.... और रह रह कर उसके पतले कमर पर फिसल जाती. इसके साथ उनके मन में यौन क्रियाओं की भावना जाग जाती,

'आहा! नाभि भी दिख रही है... कितना सुंदर और गोल है! जी चाह रहा है कि अभी इसे दबोच कर इसके कमर को सहलाऊं और फिर जी भर कर इसके इस सुंदर नाभि को चूमूँ और जीभ घुसा घुसा कर खूब अच्छे से चाटूं!'

पता नहीं अचानक से ऐसा क्या हुआ जो बिस्वास जी स्वयं को रोक नहीं सके और एकदम से हाथ बढ़ा कर उसके कमर को हल्के से सहलाते हुए अपनी मध्यमा ऊँगली उसकी नाभि में डाल दिया.

युवती एकदम से एक हल्की पर तेज़ सीत्कार ले उठी...

चेहरे के भावों से साफ़ कर दिया की उसे बिस्वास जी की इस हरकत का मज़ा ही मिला है.

मतलब, बिस्वास जी इतना में ही नहीं रुक कर अगर इससे भी आगे बढ़ना चाहें तो उसे कोई शिकायत नहीं होगी.

प्रफुल्लित मन से युवती की नाभि में ऊँगली को गोल गोल घूमा कर हल्का दबाव दे कर उसकी काम प्रतिक्रिया देखने में बिस्वास जी को बहुत आनंद आने लगा था. रह रह कर उसके पूरे कमर को सहलाते और फिर नाभि के पास आ कर उसके चारों ओर अँगुली के पोर से सहलाते हुए नाभि में अँगुली डालते और फिर वहाँ भी गोल गोल घूमाने लगते.

लाडली, अर्थात वो युवती काँपने - थरथराने लगी. खुद को खड़े रखने के लिए उसने नीचे झुकी हुई पेड़ की एक डाली को थाम लिया. धड़कने तेज़ हो गई उसकी और इसी के साथ उसके स्तन द्वय का ऊपर नीचे होने की गति भी बढ़ गई जोकि निःसंदेह सभी पुरुषों की भांति बिस्वास जी के भी दृष्टि आकर्षण का केंद्र बन गई फिर से.

लाडली के देह से निकलने वाली सुगंध ने धीरे धीरे अपने और बिस्वास जी के चारों ओर एक अदृश्य घेरा सा बना लिया था अब तक और बिस्वास जी उसी में सुध बुध खो कर इस अनुपम सुन्दरी नवयौवना के सुंदर शरीर रूपी सरोवर में अब डूबकी लगाने के लिए छटपटाने लगे थे. हिम्मत कर के अपने बूढ़े, शुष्क होंठों को लाडली के होंठों से सटा बैठे....लाडली रोकी नहीं.. पीछे नहीं हटी... वरन, अपना बायाँ हाथ बढ़ा कर बिस्वास जी के दाएँ हाथ को थाम ली और दूसरे हाथ को उनके पेट पर बहुत हल्के से रखी.

उसके होंठों के नर्म छुअन ने बिस्वास जी के अंदर के कामाग्नि के लिए घी का काम किया.

बिस्वास अब इतने निकट आ गए कि अब लाडली के स्तनों के निप्पल उनके सीने पे गड़ते हुए से प्रतीत होने लगे.

'आह! अब और नहीं.'

ऐसा सोच कर बिस्वास जी लाडली को पकड़ कर बगल में ही एक झाड़ी के पीछे ले गए और कस कर उसका आलिंगन करके उसे बेतरतीब चूमने लगे. क्या गला, गाल, होंठ, नाक... कुछ भी बाकी नहीं छोड़ना चाहते थे बिस्वास जी. लाडली अभी भी पहले की ही तरह बिस्वास जी का दायाँ हाथ पकड़े थी और दूसरा हाथ जो कि अभी तक उनके पेट पर था; अब धीरे धीरे ऊपर उठ कर सीने पर आ गया था.

कुछ ही क्षणों बाद बिस्वास जी को अचानक से एक हुक सी लगी अपने सीने के अंदर.

ऐसा लगा मानो किसी ने एक छोटी पिन चुभो दिया हो उनके दिल में.

थोड़ा तड़पे ज़रूर, पर इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे इसलिए इसे अनदेखा करते हुए पुनः काम क्रीड़ा में रत होने का प्रयास करने लगे.

झाड़ी के पास ही एक ठूंठ से सटा कर लाडली को खड़ी कर के उसके आंचल को गिरा कर ऊपर के पूरे बदन को बेतहाशा चूमने लगे बिस्वास जी. मन ही मन एक दृढ़ संकल्प ले लिया था उन्होंने कि आज या तो वो इस कमलनयना के साथ सम्भोग करेंगे ही करेंगे या फिर घर बार छोड़ हमेशा के लिए सन्यास ले लेंगे.

यूँ तो लाडली के गदराए देह का हरेक इंच प्रेम पाने के योग्य था परन्तु दृष्टि व लालसा का केंद्र अब भी उसके उन्नत स्तन ही बने हुए थे.

उसके स्तनों के साथ जिस प्रकार से भी सम्भव हो; बिस्वास जी पूरा मन लगा कर खेलने लगे. चूमना, चाटना, दबाना, चूसना, दोनों स्तनों के मध्य अपना मुँह घुसा कर रगड़ते हुए स्तनों की रेशमी छूअन को अपने चेहरे के दोनों साइड से महसूस करना... निप्पलों को दो ऊँगलियों से निर्ममतापूर्वक दबाना, नाखूनों को हल्के से गड़ाना इत्यादि...

कुछ भी बाकी न छोड़ा उन्होंने.

कमर के नीचे धोती में तम्बू तो बहुत पहले ही बन चुका था.... पर इतने देर तक कपड़ों के अंदर रह कर खड़े रहने से उनका जननांग अब दर्द करने लगा था.

वो भी चाहने लगे कि कई साल बाद आज पहली बार इस तरह मूसल की भांति अकड़ कर खड़े अपने इस अंग को शीघ्र से शीघ्र आराम पहुँचाया जाए और आराम पहुँचाने का फिलहाल जो एकमात्र उपाय किया जा सकता है वो उनके सामने स्वयं को बिना किसी मान मनुहार के समर्पित कर चुकी इस लाडली नाम की लड़की के पास है.

अपने छाती पर रखे लाडली के हाथ को उन्होंने पकड़ कर अपने जननांग पर ले जाना चाहा पर लाडली नहीं मानी. वो अपने इस हाथ को उनके ह्रदय के पास से हटाना नहीं चाही.

बिस्वास जी को थोड़ा आश्चर्य हुआ कि इतनी देर से न जाने उन्होंने इस युवती के जिस्म के साथ क्या कुछ नहीं किया... केवल सम्भोग छोड़ कर के; पर ये पहली बार किसी चीज़ को मना की.

'लगता है इसे शर्म आ रही है.. पगली... ही ही ही.. एकबार तेरे अंदर प्रवेश कर जाऊं... फिर देखता हूँ कैसे और क्या क्या रोकेगी.... ही ही ही... फिर तो खुद ही उछल उछल कर लेगी तू. हाहाहा....'

ऐसा सोच कर प्रसन्न होते हुए बिस्वास जी ने लाडली के बाएँ स्तन का निप्पल सहित करीब दो चौथाई हिस्सा अपने मुँह में भर लिया और फिर 'चुक चुक' की आवाज़ कर के चूसते हुए उसकी साड़ी को पैरों पर से उठाते हुए घुटनों के ऊपर तक ले आए. इस दौरान पूरी तल्लीनता के साथ एक ओर स्तन को चूसते रहे तो दूसरी ओर साड़ी को उठाते हुए पैरों और घुटनों के ठीक ऊपर के थोड़े से हिस्से को बड़े प्यार से सहलाते रहे.

इधर उस लाडली की आँखें बंद हो आई थीं.

अपने बाएँ हाथ को बिस्वास जी गर्दन के पीछे से ले जा कर उनको कस कर पकड़ी और दाएँ हाथ की हथेली को उनके सीने पर अच्छे से जमा दी. उत्तेजना के मारे बिस्वास जी का हालत खराब होने लगा. सांसें फूलने लगीं उनकी. सीने पर दिल वाले जगह पर फिर से हल्का हल्का दर्द होने लगा.

बिस्वास जी ने देर न करते हुए उसके स्तनों पर मुँह लगा दिया.

और सिसकारी लेते हुए चूसने लगे.

पर उनको इस बात का तनिक भी भान नहीं हुआ कि जिस युवती के साथ वो काम क्रीड़ा में लिप्त हो रहे हैं; उसी में धीरे धीरे एक परिवर्तन आने लगा है. जिस हाथ को वो बिस्वास जी के सीने पर रखी थी उसके नाखून अचानक से बढ़ने लगे.

बढ़ते बढ़ते एक बड़े आकार के सुई की लम्बाई जितनी लंबी हो गए नाखून अब बहुत आहिस्ते से बिस्वास जी के सीने में गड़ने लगे.

पीड़ा कुछ अधिक होती पा कर बिस्वास जी मुलायम स्तन पर से मुँह हटा कर के सीने की ओर देखना चाहा पर लाडली ने तुरंत ही उनका सिर पकड़ कर दोबारा अपने स्तन पर रख दी.

बिस्वास जी इसे लाडली का उनके लिए प्यार और तड़प समझ कर मन ही मन गदगद होते हुए पूरे मनोयोग से उसके तड़प को शांत करना अपना कर्तव्य समझ कर बड़े प्यार से स्तनपान करने लगे.

लेकिन कुछ ही देर बाद उनके हृदय में एक ऐसा भयानक दर्द शुरू हुआ कि उन्हें अपने सीने पर दोनों हाथों से दबाव बनाते हुए वहीँ गिर जाना पड़ा. इस भयानक पीड़ा से तड़पते हुए ही उनका ध्यान गया लाडली की बढ़े हुए नाखूनों पर जिनके सिरों पर खून लगे हुए थे.

होंठों पर एक ऐसी मुस्कान लिए जिससे ये लगे कि उसे अपनी सफ़लता पर गर्व और बिस्वास जी के बेवकूफी पर बड़ा तरस और हँसी आ रही है; वह अपनी जीभ निकाल कर नाखूनों पर लगे खून को चाटने लगी.

बिस्वास जी ने गौर किया कि वो पसीने से ऊपर से नीचे तक भीग चुके थे.... पीड़ा बढ़ते ही जा रही थी.

और तभी बिस्वास जी की दृष्टि एकबार फिर लाडली की ओर गई जो खून चाटने में व्यस्त थी... और जो देखा उससे उनके आँखों के आगे अत्यधिक डर के मारे अँधेरा छाने लगा.

लाडली बड़े आराम से सभी नाखूनों को अच्छे से चाटने के बाद धीरे धीरे बड़े प्यार से मटकते हुए बेहोश प्राय हो चुके बिस्वास जी की ओर बढ़ने लगी.

परन्तु ज्यादा आगे न बढ़ पाई.

एक छोटी सी गेंद जैसी कोई चीज़ कहीं से उछल कर आई और सीधे उसके और बिस्वास जी के बीच आ कर रुक गई. अपने स्थान पर खड़ी लाडली हतप्रभ हो उस चीज़ को देख कर समझने का प्रयत्न करने लगी कि ये आखिर है क्या?

लाडली आगे की ओर झुक कर जैसे ही उस चीज़ को हाथ में लेना चाही तभी वह गोल सी चीज़ 'भप्प' की एक धीमी ध्वनि से फट पड़ी.

इसी के साथ उसमें से एक हरा रंग का धुआँ निकल कर चारों ओर बड़ी तेज़ी से फैलने लगा और लाडली के कुछ समझ पाने के पहले ही बेहोश बिस्वास जी को ऐसे घेर लिया मानो उनकी रक्षा कर रही हो!

उस धुएँ को देख कर कुछ पल के लिए लाडली डर गई. पर जल्द ही खुद को सम्भालते हुए उठ खड़ी हुई और अपने चारों ओर देखने लगी. दो पल बाद ही उसे सामने से एक तेजस्वी युवक आता दिखाई दिया.

लाडली गुस्से से पूछी,

"कौन हो तुम?"

"एक महान गुरु का शिष्य और इस समय इनका (बिस्वास जी की ओर ऊँगली से संकेत करते हुए) रक्षक... नाम, गोपू."

"क्यों आए हो यहाँ?"

"अभी अभी तो कहा, इनकी रक्षा करने हेतु."

"भाग जा.... नहीं तो बेमौत मारा जाएगा."

लाडली की आँखें गुस्से से लाल हो चुकी थीं. लग रहा था मानो अभी ही गोपू को चीर फाड़ देगी.

गोपू हँस पड़ा,

बोला,

"नहीं... भागने के लिए नहीं आया हूँ. पर तुझ महा पापिन को एक अवसर अवश्य दूँगा... भाग जाने के लिए."

यह सुनकर तो लाडली के क्रोध का कोई पार ही नहीं रहा.

पूर्णतः लाल हो आई आँखों से गोपू को कुछ क्षण देखती रही.

गोपू राह का रोड़ा था, ये तो स्पष्ट था!

और उसके दिलेरी से लाडली को ये स्पष्ट हो गया था कि उसके रहते बिस्वास जी को मारना तो क्या; एक मामूली खरोंच तक दे पाना सम्भव नहीं है.

इतनी ही देर में गोपू ने भी लाडली के भाव भंगिमाओं का अवलोकन - विश्लेषण कर लिया था. कम से कम इतना तो समझ ही गया था कि यह कोई साधारण युवती नहीं है.

"चला जा! जा यहाँ से" लाडली ने फिर हुंकार भरी.

"नहीं." गोपू ने कहा.

"नहीं समझा मेरी बात?"

"समझ गया, तभी तो बोला, नहीं जाऊँगा."

" बहुत सुन ली मैंने, व्यर्थ के तर्क न कर और इस आदमी को मेरे लिए छोड़ कर चला जा." वो बोली

"और मैंने भी तेरा बहुत सम्मान करते हुए चेतावनी दे चुका." गोपू ने पलट कर जवाब दिया.

"प्राण से जाएगा" वो बोली.

"देखा जाएगा."

"देख युवक, मान जा मेरी बात, ये आदमी तुझसे सम्बंधित नहीं है."

"इसका कोई अहित न हो; मेरे गुरु का ऐसा आदेश है और उनका आदेश ही मेरे लिए सर्वोपरि है."

"यानि गुरु के लिए मरना स्वीकार है तुझे?"

"हाँ."

गोपू को टस से मस न होते देख लाडली ने उसपर एक के बाद एक कई ख़तरनाक तंत्र वाले हमला किया. गोपू ने जल्दी से पहले अपने गुरुमंत्र से स्वयं को और बिस्वास जी को पोषित किया और प्राण रक्षा मन्त्र से दोनों की ही प्राणों की रक्षा करते हुए लाडली के सभी हमलों का मुँह तोड़ जवाब दिया. कोई और समय होता या गोपू यदि अकेला होता तो लाडली से और भी अच्छे से लड़ता पर इस समय उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण था बिस्वास जी की रक्षा करना.

अतः गोपू ने और विलम्ब न करते हुए व्योम-विनाशिनी का आह्वान किया.

आह्वान मंत्र सुनते ही लाडली का चेहरा तो जैसे एकदम सफ़ेद हो गया और क्षण भर में ही वहाँ से लोप हो गई!

गोपू ने जल्दी से बिस्वास जी को सहारा दे कर उठाया और वैसे ही कुछ दूर तक ले गया. फिर एक रिक्शा पकड़ कर बिस्वास जी को उनके घर तक छोड़ आया.

कुटिया में पहुँच कर थोड़ी देर के विश्राम के पश्चात बाबा जी के सामने उपस्थित हो कर सब बातें कह सुनाया.

सब कुछ धैर्यपूर्वक सुनने के बाद बाबा गंभीर रूप से ही मुस्कराते हुए कहा,

"जो और जितना सोचा था पूरा मामला उससे भी कहीं अधिक खतरनाक है. अच्छा हुआ जो तुमने काफ़ी बुद्धिमानी से उसके हरेक प्रहार का उत्तर दिया और सबसे बढ़िया ये हुआ कि वह तुम्हारे व्योम - विनाशिनी के आह्वान मात्र से ही भाग गई."

"यही तो आश्चर्य की बात है गुरूदेव... अगर वो कोई साधिका या तांत्रिका थी तो और मुकाबला क्यों नहीं की?"

बाबा जी प्रश्न सुनकर हँस पड़े.

बोले,

"वो कोई साधिका - तांत्रिका नहीं थी और सबसे बड़ी बात तो यह कि वो तो मनुष्य तक नहीं थी!"

"क्या?!!"

दोनों ही शिष्य बहुत बुरी तरह चौंक उठे. अपने कानों पर उन्हें ज़रा भी विश्वास नहीं हुआ.

बाबा बोले,

"कल किसी को भेज कर बिस्वास को बुलवा भेजना. कल उसी के सामने कई और रहस्योद्घाटन करूँगा.... और अब की बार सब कुछ ठीक कर दूँगा."

"जी गुरु जी."

दोनों शिष्य हामी भर कर बेसब्री से आने वाले कल की प्रतीक्षा करने लगे.

प्रतीक्षा तो अब बाबा जी तो भी थी.
 
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"सब सच सच बताओ बिस्वास..."

"म..मम.. मैं...क्या बताऊँ गुरूदेव?"

"वही जो मैं जानना चाहता हूँ.

बिस्वास चुप.. कोई आवाज़ नहीं.. कोई शब्द नहीं. नज़रें झुका कर इधर उधर देखने लगते हैं.

परन्तु बाबा जी के चेहरे के भावों पर कोई अंतर नहीं दिखा.

अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से वो बिस्वास के चेहरे रुपी दुर्ग पर कड़ा प्रहार कर रहे थे. उनका तेज़ सह पाना उच्च स्तरीय ज्ञानी और सिद्ध पुरुष के लिए भी सरल नहीं था तो बिस्वास तो मात्र एक साधारण मनुष्य है.

थूक निगलते हुए उन्होंने अपने गुरूजी की ओर देखा.

समझने में अब कोई परेशानी नहीं रही कि गुरूजी बिना सत्य जाने नहीं मानने वाले. गुरूजी एक बहुत ही उच्च स्तर के सिद्ध पुरुष हैं ये तो बिस्वास जी जानते ही थें परन्तु वो भूतकाल का भी आंकलन कर सकते हैं ये कभी नहीं सोचा था.

फिर भी बात को टालने के लिए एक और प्रयास ... अंतिम प्रयास करने का सोचा उन्होंने.

नासमझ व भोला बनने का प्रयत्न करते हुए एक बार फिर बाबा के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा,

"गुरूदेव... मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूँ. किस सत्य को बताने को कह रहे हैं आप? कब की बात है? कौन सी बात है? म.. मैं...."

बिस्वास जी और कुछ कहे उसके पहले ही बाबा ने हाथ उठा कर उसे चुप हो जाने का संकेत किया.

विचार और कथन में पूरी स्थिरता और चेहरे पर गम्भीरता लिए बाबा ने कहा,

"देखो बिस्वास... मैं और तुम... दोनों ही जानते हैं कि जो सत्य अब तक सबसे छुपा हुआ है उसे अब सामने आना चाहिए और मुझसे कोई भी सत्य छिप नहीं सकता. जानते हो न इस बात को?"

बिस्वास जी आँखें नीची करते हुए सहमति में सिर हिलाया.

बाबा बोले,

"तो जब तुम जानते ही हो इस बात को तो फिर क्यों कुछ छुपाने का प्रयास कर रहे हो? जो भी सत्य है; चाहे वो कितना भी कड़वा क्यों न हो... आखिर सत्य ही है. देर सवेर हमें सत्य को अपनाना ही पड़ता है. सत्य की यही एक सबसे बड़ी गुण होती है कि वो सदैव स्वयं को सामने प्रकट करने के लिए तत्पर रहता है. जैसे कितना भी घनघोर वर्षा क्यों न हो... कितनी भी काली घटा क्यों न छाई रहे.. सूर्य निकलता ही निकलता है... ठीक वैसे ही, सत्य चाहे कैसा भी क्यों न हो; सत्य आखिर में सत्य ही होता है."

अपनी बात को कहते कहते बाबा बिस्वास जी के हाव भाव पर गौर कर रहे थे.

बाबा द्वारा कही गई बातों से बिस्वास के मन में जमी कोई बर्फ पिघल रही है... उसे कुछ अपराधबोध हो रहा है... ये बात बाबा के अनुभवी आँखों ने तुरंत ही ताड़ लिया.

"कहो बिस्वास. डरो नहीं... यदि उस सत्य में तुम्हारी किसी तरह की भूमिका हो भी तो यदि तुम स्वीकार कर लो तो तुम पर से बोझ उतर जाएगा. यदि कोई अपराधबोध हो...तो वो भी पल भर में समाप्त हो जाएगा."

बिस्वास जी के मन में अब तक जो संदेह था... वो अब विश्वास में बदल गया. वो भली भांति समझ गए कि बाबा जी यूँ ही उनसे पूछ रहे हैं; सत्य क्या है ये उनको पहले ही ज्ञात हो गया है.

कुछ देर की चुप्पी के बाद बिस्वास जी अचानक बाबा के पैरों पर गिर पड़े.

रोने लगे...

क्षमा याचना करने लगे.

"गुरूदेव... मुझे क्षमा कीजिए गुरूदेव... मेरी रक्षा कीजिए...!"

बिस्वास जी की अचानक ऐसी अप्रत्याशित प्रतिक्रिया देख कर कुछ क्षणों के लिए तो बाबा भी चकित से हो गए.

उन्होंने गौर किया..

बिस्वास जी वाकई रो रहे थे...

बिलख रहे थे.

बिलख बिलख कर क्षमा याचना कर रहे थे और स्वयं की रक्षार्थ हेतु प्रार्थना - निवेदन भी कर रहे थे.

बाबा तो पहले से जान रहे थे कि सत्य क्या है... अतः उन्हें बिस्वास जी के ऐसे व्यवहार पर अधिक आश्चर्य न हुआ. अपितु प्रसन्न ही हुए कि वो सत्य को कहने का साहस करते हुए गुरु चरणों में क्षमा की भी याचना कर रहे हैं.

मुस्कराते हुए अपने पैरों पर रखे बिस्वास जी के सिर पर हाथ रखते हुए बाबा इतना ही बोले,

"शांत वत्स... शांत."

बाबा के हाथ का स्पर्श अपने सिर पर पा कर बिस्वास जी फूले न समाए और अत्यधिक उद्गार से उनकी और भी अधिक रुलाई फूट पड़ी.

बाबा के स्नेह वचन और आशीर्वाद स्वरूप हाथ को सिर पर पा कर बिस्वास जी न केवल प्रसन्न हुए अपितु उनके अंदर एक नए साहस और विश्वास का संचार भी होने लगा.

बाबा के पैरों पर से सिर तो उठा लिया अपना पर अभी भी बाबा से नज़रें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे.

बाबा अभी भी गम्भीर रूप में ही थे.. फिर भी होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी..

चांदू की ओर देखा...

और आँखों के संकेत से बिस्वास जी को पानी पिलाने के लिए कहा.

चांदू ने शीघ्र ही एक बड़े से तांबे के ग्लास में शीतल जल भर कर बिस्वास जी को दिया.

बिस्वास जी ने ग्लास तो ले लिया पर पीना तभी शुरू किए जब बाबा ने उन्हें दोबारा आदेश दिया.

पानी पी कर कुछ देर में रोने के कारण अपनी उखड़ती सांसों पर नियंत्रण पा कर बिस्वास जी शांत हुए पर अब भी कुछ बोले नहीं.

थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद जब बाबा ने देखा कि बिस्वास जी के कंठ से बोल नहीं फूटे तब उन्होंने ही एक धमाका करने का सोचा और एक हल्की सी मुस्कान लिए, परन्तु पूरी गम्भीरता से; पैरों के पास नीचे बैठे बिस्वास जी की ओर तनिक झुकते हुए कहा,

"वत्स, उस दिन तुम भी उन लोगों के साथ थे न?"

कहीं खोए हुए बिस्वास जी ने अनमने भाव से बाबा की ओर बिना देखे ही उत्तर दिया,

"कहाँ... कब ... किसके साथ?"

"उस दिन... जब उन दोनों युवक युवती को पूरा गाँव ढूँढ रहा था... उन लोगों में से एक तुम भी थे न?"

बाबा के इस प्रश्न ने वाकई एक धमाका किया बिस्वास जी के कानों में. पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई.

अपने स्थान पर बैठे बैठे ही लगभग उछलते हुए बाबा को शंकित नज़रों से देखा... मानो ये निश्चित करना चाहते हों कि अभी अभी उन्होंने जो सुना वो बाबा के ही श्रीमुख से निकली है.

बाबा एकटक बिस्वास जी की ओर देखते रहे... चश्मे के पीछे से झाँकती बिस्वास जी के विस्फारित नेत्रों पर टिकी थी बाबा की आँखें.

बिस्वास जी को अब भी कुछ बोलता न देख कर बाबा फिर बोले,

"उनमें से एक की मृत्यु का कारण स्वयं को मानते हो न?"

ये वाला प्रश्न पर्याप्त था बिस्वास जी को ये विश्वास दिलाने के लिए कि अब तो वो लाख चाह कर भी सच्चाई को अपने भले के लिए अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर पेश भी नहीं कर सकता क्योंकि निश्चित ही ये भी बाबा के हाथों पकड़ी ही जाएगी.

झूठ बोलने का अब तो कोई मतलब ही नहीं रह गया था.

बिस्वास जी ने गले में जम गए थूक को निगला और निगलते हुए ही सिर हिला कर सहमति जताया.

बाबा के हाव भाव में कोई परिवर्तन नहीं आया.

जिससे ये स्पष्ट हो गया कि वे ऐसे ही किसी उत्तर की अपेक्षा कर रहे थे.

"किसकी?"

धीर गम्भीर स्वर में उन्होंने अगला प्रश्न किया.

बड़ी कठिनाई से उत्तर निकला परन्तु बहुत ही धीमा,

"शौमक"

"ज़ोर से बोलो, बिस्वास."

"श...शौमक.!"

हकलाते हुए अब भी कठिनाई से ही बोले बिस्वास जी.

"ह्म्म्म." बाबा इतना ही बोले.

कदाचित अब दृष्टि फेरने की बारी बाबा की थी.

बिस्वास जी के मुँह से नाम सुनने के बाद बाबा तुरंत कुछ न बोलकर कमरे की खिड़की से बाहर देखने लगे. बाबा की चुप्पी ने तीनों; चांदू, गोपू और बिस्वास जी को सस्पेंस में डाल दिया.

थोड़ी देर बाद बाबा बिस्वास जी की ओर देखते हुए फिर पूछे,

"बिस्वास... अब जो पूछूँगा उसका उत्तर एकदम स्पष्ट शब्दों में देना... ठीक?"

मुखमंडल पर चिंता की आभा लिए बिस्वास जी सहमति जताते हुए 'ठीक है गुरूदेव' कहा.

"बिस्वास.... शौमक की मृत्यु हत्या थी या दुर्घटना?... स्मरण रहे... मैंने तुम्हें सब सच बताने के लिए कहा है."

"ज...जी...!"

बाबा के इस प्रश्न ने तो निःसंदेह बिस्वास जी को अब भारी दबाव में ला दिया. हाथ में थामा हुआ ग्लास अब काँपने लगा. साँसें उखड़ने लगी. ललाट पर पसीने की कई बूँदें एक साथ छलक आईं.

स्वयं को संयत करने के लिए दोबारा होंठों को ग्लास से लगाया.

दो लंबे घूँट लगाए.

फिर बाबा की ओर देखा.

बाबा उत्तर की प्रतीक्षा में उन्हीं की ओर देख रहे थे.

"बाबा.. थी तो वो... दुर्घटना ही.."

"पर वास्तविकता में वो एक हत्या थी... यही न?"

बाबा ने बिस्वास जी के वाक्य को पूरा किया. जैसे ही बाबा ने इस वाक्य को कहा; वैसे ही तुरंत गोपू और चांदू की आँखें अविश्वास से बड़ी बड़ी हो गई.

बिस्वास जी ने सिर हिला कर धीमे स्वर में 'जी' कहा.

"कौन कौन सम्मिलित थे इस पाप कार्य में ?"

"लगभग सभी."

"क्यों मारना चाहते थे सब उसे?"

"अ..अम.... व.. वो... काला जादू.... करता था... हानि करता था गाँव वालों का.... गुरूदेव."

इस वाक्य को बिस्वास जी ने ऐसे कहा मानो वो अपने साथ साथ पूरे गाँव वालों की रक्षा करना चाहते हों.

बाबा धीरे से हँस दिए...

बोले,

"तुम्हें कैसे पता वो काला जादू करता था?"

"ग..गाँव वालों....."

"झूठ!"

बिस्वास जी के वाक्य को पूरा करने के पहले ही बाबा गरज उठे.. डांटते हुए उन्हें चुप कर दिया.

बाबा के क्रोध से बिस्वास जी सकपका गए.

कोई बहाना दे कर अपनी बात को सही ठहराने का साहस न किया.

"बिस्वास.. मैं बार बार कह रहा हूँ... सच बोलो. यदि तुम अपने साथ साथ समस्त गाँव वालों की रक्षा करना चाहते हो तो सत्य कहो. कल गोपू ने तुम्हें बचा लिया था.. परन्तु हर बार... हमेशा तुम्हें बचाने के लिए नहीं रहने वाला. यदि पूर्ण सत्य नहीं बताओगे तो मैं भी तुम्हारी यथोचित रक्षा नहीं कर पाऊंगा और वो युवती जो कल तुम्हें लगभग मार ही चुकी थी; वो ज्यादा दिनों तक चुप नहीं बैठेगी. वो फिर हमला करेगी और कदाचित अगले हमले में वो वाकई में तुम्हें एक हौलनाक मृत्यु दे दे!"

बाबा के इस चेतावनी में भय का ऐसा पुट था कि बिस्वास जी के सिट्टी पिट्टी गुम हो गए.

हाथ जोड़ लिया...

फिर से क्षमा माँगी..

कहा,

"गुरूदेव... ग...गुरूदेव.... म..मैं...."

कहते हुए रो ही पड़े.

बाबा ने उनके सिर पर हाथ रख कर उन्हें सांत्वना दिया और चुप कराते हुए उनसे बगैर लाग लपेट के पूरी बात सच सच कह सुनाने को कहा.

"गुरूदेव... व.. वो... एक प्रकार से हत्या ही थी गुरूदेव... वह युवक बच सकता था... पर... पर... किसी ने सहायता नहीं की. उसका उस नदी तक पीछा करना... खास कर दक्षिण दिशा की ओर... वहाँ तक उसे दौड़ाते ... उसका पीछा करते हुए जाना .... सब.. कुछ... कुल मिलाकर एक प्रकार से उसकी हत्या ही है गुरूदेव."

कहते हुए अब तो और भी बुरी तरह से बिलखने लगे थे बिस्वास जी. नदी की बात क्या करना; स्वयं उनकी आँखों से ही अश्रुओं की नदी बहने लगी. स्पष्ट था कि इस बात को... जोकि स्वयं एक प्रकार से रहस्य ही था आज तक; कहने में उन्हें बहुत कष्ट हुई है. सहज नहीं था इस रहस्य को स्वीकार कर पाना.


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बिस्वास जी के इस प्रकार बिलखने से बाबा को बुरा तो लगा पर वो जानते हैं कि बिस्वास जी का ये पूर्ण स्वीकारोक्ति नहीं है! सत्य तो ये है कि बाबा को उनके योगबल से ही संपूर्ण सत्य का पता चल गया था परंतु वे बिस्वास जी के मुँह से सत्य जानना चाहते थे.

इसलिए धीरे से व बड़े प्यार से पूछे,

"और?"

बिस्वास जी तुरंत न बोले पर इस बार बाबा को भी अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी.

कुछ क्षण बाद बिस्वास जी स्वयं ही बोले,

"अ... व... व... उ.. उस हत्या... में मैं स्वयं भी भागीदार था."

"वो कैसे?"

"म... मैंने...नहीं... म... .मैं चाहता था... वो... मरे.."

"क्यों?"

"क... क्योंकि.. मैं अवनी... अवनी... स..."

"हाँ... वत्स... आगे बोलो..."

"क्योंकि मैं अवनी से .... प्यार करता ... था... उस...उससे स... श.. शादी कर.. करना चाहता था."

"और... ये अवनी कौन है वत्स?"

"अ.. अवनी है नहीं गुरूदेव... थी.."

"थी??"

"ज..जी गुरूदेव... व.. वो उस रात.. के दो दिन बाद मर गई."

"कहाँ मरी थी वो?"

"जंगल.. जंगल में... फाँसी लगा कर."

"ओह!"

"ज..जी गुरूदेव."

अब धीरे धीरे पूरी विषयवस्तु बाबा के सामने स्पष्ट होती जा रही थी.

थोड़ा रुक कर बाबा फिर पूछे,

"फाँसी लगाने के लिए फंदा कहाँ से मिला होगा उसे...?"

"उसे फंदे के लिए अलग से किसी रस्सी वगैरह की क्या आवश्यकता थी गुरूदेव. व.. वो तो... स.. साड़ी को ही फंदा बना कर झूल गई."

"ओह्ह... बहुत बुरा हुआ! ... अच्छा, तुम तो अवनी से प्रेम करते थे... है न?"

"जी."

"उसे बताया नहीं कभी?"

"बताया था.. पर उसका कहना था कि वो पहले से ही किसी ओर से प्रेम करती है और जिससे प्रेम करती है; उसके प्रेम के सिवा अब किसी और का प्रेम नहीं चाहिए उसे."

"तो तुमने क्या किया?"

"क..कई बार उसे मनाने का प्रयास किया.. पर सफल नहीं रहा.. वो उस शौमक के प्रेम में पूरी तरह अंधी थी... उस.. उस आवारा के पास था ही क्या...? एक टूटी फूटी झोंपड़ी... एक बूढ़ी माँ.. वही किसी तरह अपना और अपने उस निकम्मे बेटे का पेट पाल रही थी. क्या मिलता अवनी को ऐसे लड़के से शादी करके... उल्टे उस लड़के के ही वारे न्यारे होते अगर उसकी शादी अवनी से होती.. अगर अवनी उसकी पत्नी हो जाती... क्योंकि अवनी का परिवार काफ़ी धनी जो था."

"लेकिन जब तुम देख ही रहे थे कि वह लड़की शौमक के अलावा किसी और के साथ शादी नहीं करना चाहती तो तुम्हें उसे छोड़ देना चाहिए था. उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए था."

"व..वही तो नहीं हो पा रहा था मुझसे.. गुरूदेव.. मेरे तो जैसे मन में ही बैठ गया था कि मुझे अगर शादी करनी है तो इसी से करनी है.. नहीं तो.. नहीं तो.."

"नहीं तो क्या वत्स?"

अब तक ग्लास ज़मीन पर एक ओर रख चुके बिस्वास जी बाबा के इस प्रश्न पर उत्तर देने के स्थान पर अपना सिर दोनों हाथों से पकड़ कर बैठ गए और बहुत धीमे स्वर में कहा,

"पता नहीं.. गुरूदेव... उस समय मुझे जो सूझता... मैं तब वही करता."

"तो क्या इसलिए शौमक की सहायता नहीं की तुमने?"

"जी गुरूदेव. वो निकम्मा कामचोर... कोई माने या न माने गुरूदेव.. पर मैं और गाँव के और भी कई लोग ये जानते थे कि शौमक जादू टोना सीखता - करता था... और... आखिर में अवनी से शादी कर ही ली उसने. शादी की पहली रात भी मनाने वाला था. अवनी की शादी किसी ओर से होता देख मैं सहन तो नहीं कर पाता लेकिन फिर भी खुद को मना लेता. पर... पर... शौमक की उससे शादी की खबर सुन कर मैं तो बुरी तरह से गुस्से से पागल हो गया था. स्वयं पर इतना सा भी नियंत्रण न रख पाया. उसे मारना मेरा उद्देश्य नहीं था.. केवल प्रताड़ित करना चाहता था.. डराना चाहता था.. दंड देना चाहता था. जब देखा की वह नदी के उस दक्षिण दिशा के उस खास जगह में डूब रहा था तो यही सोच कर उसकी सहायता नहीं किया की चलो अब कम से कम अवनी को पाने का मार्ग कुछ तो सरल हुआ. पर... "

बिस्वास जी के वाक्य को अब बाबा ने पूरा किया,

"पर कौन जानता था की नियति को कुछ और ही स्वीकार था... यही न!"

बिस्वास जी केवल सिर हिला कर सहमति जता पाए. उनकी आँखों से फिर अश्रुधारा बहने लगी.

बाबा ने कुछ कहा नहीं. बिस्वास जी को थोड़ी देर रो लेने का समय दिया ताकि उनका मन कुछ हल्का हो जाए.

बिस्वास जी जब शांत हुए तब,

"बिस्वास... बस एक अंतिम प्रश्न रह गया है पूछने को. आशा है की उसका भी तुम बिल्कुल सही उत्तर दोगे."

"जी गुरूदेव.. अवश्य.. वैसे भी अब छुपाने को रह ही क्या गया है. आप पूछिए."

"क्या हरिपद भी इन सब में बराबर का भागीदार था?"

एक क्षण के लिए बिस्वास जी चौंक पड़े.. लेकिन तुरंत ही सामान्य हो गए.

ये प्रश्न ऐसा अवश्य था जिसकी अभी बिस्वास जी ने कल्पना नहीं की थी पर अब जब बाबा ने पूछ ही लिया है तो बिस्वास जी को भली भांति पता है कि क्या उत्तर देना है.

"जी गुरूदेव. वो इन सब में भागीदार भी था और मेरा साझीदार भी था. उसे मेरी मंशा का पूरा पूरा भान था."

दृढ़ स्वर में उत्तर दिया उन्होंने.

उनके उत्तर देने के दौरान बाबा उनके मुखमंडल को ऐसे देख रहे थे मानो कुछ पढ़ने - ताड़ने का प्रयास कर रहे हों.

कुछ और इधर उधर के प्रश्न करने के बाद बाबा ने बिस्वास जी को विदा किया. विदा करने से पहले एक मन्त्र सिद्ध माला भी दिया ताकि कोई बुरी शक्ति उनका हानि लाख चाह कर भी न कर पाए.

बिस्वास जी के जाने के बाद गोपू बड़े असमंजस भाव से बोल उठा,

"गुरु देव.. मैं जिसे अब तक सबसे अच्छा समझ रहा था; अंततः वही बुरा निकला?!"

बाबा मुस्कराए और बोले,

"तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ. तुम्हारा प्रश्न सर्वथा उचित ही है. इस संसार में अक्सर ही ऐसा होता है वत्स.. किसी को कुछ समझो तो वो कुछ और ही समझा जाता है."

अब चांदू बोला,

"तो इसका ये मतलब हुआ क्या गुरूदेव कि ये पूरा गाँव... सभी गाँव वाले दोषी हैं?"

"नहीं वत्स.. गाँव वाले तो अवनी के घर वालों के साथ मिल कर बस उन दोनों को पकड़ना चाहते थे.. पकड़ कर उचित दंड भी देते.. लेकिन हत्या जैसा जघन्य अपराध नहीं करते.. पर ये जो कुछ भी हुआ है.. इसका दोषी तो बिस्वास, हरिपद और उनके कुछ साथी हैं जो इस पूरे घटनाक्रम को अपने लाभ हेतु दुरूपयोग करते हुए इसे दूसरा ही रूप दे दिया."

"परन्तु गुरूदेव... लोग जो इस तरह मर रहे हैं... इसका कारण?"

"वत्स, कारण या तो बिस्वास की कही गई घटना से जुड़ी हो सकती है या फ़िर इस कारण के पीछे कोई और कारण हो सकता है."

"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं गुरूदेव?"

चांदू ने ऐसे प्रश्न किया मानो उसे अब भी बाबा के बातों में कुछ अजीब होने की आशंका हो रही है.

"ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ऐसा ही कुछ होने का आभास हो रहा है मुझे. दक्षिण दिशा में नदी में डूब कर प्राण गँवाने वाले शौमक का क्रोध, उसकी प्रतिशोध की भावना तो समझ में आ रही है.. पर.. जंगल में होने वाले मृत्यु के कारण मुझे फ़िलहाल समझ में नहीं आ रहा है."

"आपका अर्थ समझ में नहीं आया गुरूदेव.. क्या नदी में जितनी भी मृत्यु हुई है.. सब शौमक की आत्मा ने किया है?"

"हाँ वत्स, नदी के उस भाग में आज तक जितनी भी मृत्यु हुई है; उन सब के पीछे शौमक की आत्मा का ही हाथ है. सभी मरने वाले या तो विवाहिता या फिर नवयौवनाएँ थीं. इसका यही अर्थ हो सकता है कि विवाह के तुरंत बाद वाली क्रिया पूर्ण न हो पाने के कारण ही वो औरतों और युवतियों को दक्षिण भाग के भंवर में फँसा कर पहले अपनी तुष्टि करता है; फ़िर निर्दयता के साथ मार देता है.. किन्तु... जंगल में होने वाले मृत्यु के कारण समझ में नहीं आ रहे हैं. शौमक मरता नहीं यदि पूरे परिदृश्य की संरचना वैसी नहीं होती जैसा की बिस्वास ने कुछ देर पहले हमें बताया था. लेकिन अवनी ने तो जंगल में आत्महत्या की थी. उसके घर वाले तो उसे ले जाने गए थे.. सकुशल.. तो फिर... आत्महत्या क्यों की? क्या वो भी विवाह की पहली रात न मना पाने के कारण दुखी थी? क्या ये दुःख इतना बड़ा था कि आत्महत्या कर ली जाए?"

बाबा के इस प्रश्न का उत्तर दोनों शिष्यों में से किसी के पास भी नहीं था और स्वयं बाबा के पास भी नहीं.

सभी कुछ देर तक चुप रहते हुए कुछ न कुछ; अंदर ही अंदर सोच रहे थे कि बाबा फिर बोल पड़े,

"सच कहूँ तो शौमक और अवनी से संबंधित प्रश्न मुझे उतना दुविधा में नहीं डाल रहे जितना की उस युवती का उद्देश्य जो उस दिन बिस्वास को प्रायः मार ही चुकी थी..."

सुनते ही गोपू तपाक से बोल उठा,

"कौन? वो... अ... क्या नाम... हाँ... लाडली??"

"हाँ.. लाडली. वो वहाँ क्यों थी... वो भला बिस्वास को क्यों मारना चाहेगी.. और तो और... उसे भेजने.. उससे कार्य करवाने की क्षमता भला किस में है?"

"क्यों गुरूदेव.. आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?"

"क्योंकि वो कोई साधारण मनुष्य नहीं थी.. अरे साधारण तो क्या.. वो तो कोई मनुष्य ही नहीं थी. ये बात तो मैं पहले भी बता चुका हूँ तुम लोगों को."

"जी गुरूदेव. परन्तु कृप्या ये बताइए कि आप उस लाडली को लेकर बारम्बार चिंतित क्यों हुए जा रहे हैं? क्या वो ही अवनी नहीं थी? क्या आप उसे जानते हैं?"

"नहीं. वो अवनी नहीं थी. गोपू के माध्यम से गोपू के साथ साथ मैंने भी उसके शरीर की ऊर्जा अनुभव किया है.. और अनुभव करते ही मैं जान गया था कि वो कौन है. इसलिए मैं चिंतित हूँ कि उससे अपना कार्यसिद्ध करवाने की क्षमता रखने वाला कौन है.. कौन है वो जिसने इस लाडली को भेजा था क्योंकि जिसने भी लाडली को भेजा था वह निःसंदेह काफ़ी क्षमतावान सिद्धहस्त है... क्योंकि ये लाडली तो स्वयं अपने आप में बहुत.. बहुत ही शक्तिशाली चीज़ है."

गोपू और चांदू ने एक दूसरे को देखा.. फिर एक साथ ही पूछा,

"व.. वो.. कौन थी, गुरूदेव?"

बाबा का चेहरा बहुत ही गम्भीर हो गया.

शरीर एक ऐसे भाव में आ गया मानो तुरंत ही किसी अदृश्य सुरक्षा कवच से स्वयं के साथ साथ अपने शिष्यों को भी घेर लिया हो.

चेहरे के भाव उनके हृदय की अवस्था की स्पष्ट चुगली करने लगे की बाबा चिंतित तो हैं लेकिन दृढ़ संकल्पित भी हैं.

बाबा को चुप देख गोपू और चांदू ने फिर एक दूसरे को देखा.

फिर बाबा को देखा.

अपने स्थान से थोड़ा आगे बढ़ कर बाबा के थोड़ा निकट आए दोनों.

और दोबारा अपना प्रश्न किया,

"वो कौन थी गुरूदेव?"

प्रश्न के समाप्त होते ही बाबा बोल पड़े; एकदम सर्द... भाव रहित अंदाज़ में,

"चंडूलिका !!"
 

कैसी बात कर रहे हो आप डॉक्टर साहब?! ??

भला आपको कौन डरा सकता है? भूत भगाने के लिए आपके पास 'जादुई लकड़ी' है न ?

वैसे भी मुझे नहीं लगता आपको ये कहानी पढ़ कर डर लगेगा.. क्योंकि इसमें उस तरह के भूत वगैरह नहीं है. ?

और बहुत धन्यवाद आपका कि आपको ये कहानी अच्छी लगी. वैसे क्रेडिट मैं अपने मार्गदर्शक को देना चाहूँगा. ?
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[color=rgb(255,]चंडूलिका[/color]

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दो दिन बाद एक शुभ मुहूर्त देख कर बाबा ने एक विशेष अनुष्ठान का शुभारंभ किया.

करना तो वो एक विशेष प्रकार का यज्ञ चाहते थे लेकिन कुछ सोच कर उन्होंने अपने इस अनुष्ठान को एक भिन्न रूप से करने का निश्चय किया.

जप करने के लिए चांदू को साथ बिठाया और स्वयं भी कुछ जपते हुए ध्यान में लीन हो गए.

किसी भी प्रकार की विघ्न - बाधा; विशेषतः यदि वो आसुरिक, तांत्रिक, मांत्रिक या अज्ञात अदृश्य कोई आक्रमण हो तो उनसे लड़ने और उनके उद्देश्यों पर पानी फेरने के लिए बाबा ने गोपू को पहरे पर बिठा दिया.

बाबा और गोपू ने मिलकर कुटिया को चारों ओर से मंत्रों से पोषित कर दिया था और कुटिया के बाहर बिस्वास जी समेत दस और लोगों को पहरे पर लगा रखा था ताकि कोई आदमी, औरत या जानवर इत्यादि कुटिया के आस पास या बाबा से मिलने की बात कह कर अनुष्ठान में विघ्न न डाले.

और कहीं बिस्वास जी और अन्य साथियों पर कोई ऊपरी शक्ति हावी हो कर किसी प्रकार का हानि न पहुँचाए इसके लिए भी बाबा ने पर्याप्त व्यवस्था कर रखा था.

अनुष्ठान आरम्भ हुआ.

मंत्र जाप भी आरम्भ हुआ.

कुटिया के अंदर बाबा और चांदू से थोड़ी दूरी पर बैठा गोपू चौकन्ना हो गया.

कुटिया के बाहर उपस्थित बिस्वास जी और अन्य लोग भी सतर्क और सावधान हो गए.

किसी ऊपरी बला के आ कर उन लोगों को नुकसान पहुँचाए; इस बात का डर तो था उन लोगों में परन्तु बाबा की शक्तियों पर भी उन्हें अगाध विश्वास और श्रद्धा थी.

गोपू भी बहुत सतर्क था लेकिन बाहर उपस्थित लोगों के जैसे भयभीत नहीं था.

कई प्रकार की ऊपरी बाधा और शक्तियों से वो पहले भी निपट चुका था. स्वभाव से तो वीर था ही; बाबा के मार्गदर्शन में वह तंत्र - मंत्र विद्या में महारत प्राप्त कर चुका था.

बाबा के सामने पाँच फल रखे हुए थे.

पाँचों ही बिल्कुल ताज़े.

कुछ देर पहले ही पानी से अच्छे से धोया गया थे इन्हें.

जप करते करते बाबा ने 'हुम' कर के एक गम्भीर नाद किया.

चांदू के लिए ये एक संकेत था. उसने अपना मंत्रजाप वहीँ रोका और आँखें खोल कर पहले बाबा की ओर देखा जो अब भी आँखें बंद किए जाप किए जा रहे थे. उसने तुरंत सामने रखे फलों में से एक फल उठा लिया और तुरंत उसे चाक़ू से काटा.

फल अंदर से भी ताज़ा ही निकला.

चांदू तनिक निराश हुआ. गोपू की ओर देखा.

वो भी निराश हुआ सा लगा.

चांदू को सफ़लता मिलने का पूरा भरोसा था.. पर ऐसा हुआ नहीं.

लेकिन वो भी एकदम निराश नहीं हुआ था. बाबा पर पूरा भरोसा था उसे.

इसलिए तुरंत ही अपने आसन पर पूर्ववत् बैठ गया और मंत्रजाप शुरू कर दिया.

इधर गोपू ने भी अपने नेत्रों को मन्त्र से सिंचित कर खिड़की से बाहर की ओर देखा. कहीं कुछ पारलौकिक नज़र नहीं आया.

बिस्वास जी और अन्य लोग किसी भी प्रकार के दुर्घटना या चुनौती के लिए पूरी तरह तत्पर दिख रहे थे.

उस खिड़की से गोपू को जितने भी लोग नज़र आए; उन सबको बारी बारी से बहुत अच्छे से देखा.

किसी में भी कुछ भी संदिग्ध नज़र नहीं आया.

किसी बात का संदेह तो बारम्बार हो रहा था गोपू को किन्तु जब कहीं कोई ऐसी बात न दिखी जो उसके संदेह को बल देती तब वो स्वयं ही निश्चिन्त हो गया.

इधर बाबा का अनुष्ठान चलता रहा.

तीन से चार घंटे बीत गए.

बाबा और चांदू मंत्रों का जाप करते रहे.

बीच बीच में बाबा के 'हुम' करके संकेत करने पर चांदू एक एक कर के फल काटता रहा; लेकिन हरेक फल अंदर से ताज़ा ही निकला.

अंततः बाबा को भी एक निश्चित समय बाद अपना मन्त्र जाप बंद करना पड़ा.

मन्त्र जाप और अनुष्ठान तो पूरा हुआ पर जिस उद्देश्य के लिए किया गया था वो पूरा नहीं हुआ. सभी कटे फलों को बिस्वास जी और उनके अन्य साथियों के बीच बाँट दिया गया.

बिस्वास जी ने बहुत पूछा लेकिन उनको केवल इतना ही बताया गया कि अनुष्ठान पूरा हुआ और कम से कम दो - तीन दिनों के लिए कोई संकट नहीं है इस गाँव पर.

सभी को विदा करने से पहले बाबा ने कुछ आवश्यक दिशा निर्देश दिया और उन दिशा निर्देशों को पूरी सजगता के साथ पालन करने को कहा.

बाबा के दिशा निर्देशों को अपना आदेश मान कर सबने बाबा को प्रणाम किया और अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर गए.

इधर बाबा अपने स्थान पर विश्राम हेतु बैठे लेकिन बहुत चिंतित दिखाई दे रहे थे.

गोपू ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ते हुए बाबा से कहा,

"गुरूदेव?"

"हम्म.."

"कुछ पूछने को जी चाह रहा है.. आपकी आज्ञा हो तो पूछूँ?"

"वैसे तो हमें अनुमान है कि तुम क्या पूछना चाह रहे हो वत्स.. फिर भी हम तुम्ही से सुनना चाहेंगे. पूछो.. क्या पूछना है?"

एक बार फिर बाबा को प्रणाम कर किया गोपू ने और फिर पूछा,

"गुरूदेव, क्या आज का अनुष्ठान सच में पूरा हुआ?"

"हाँ.. हुआ. और.. नहीं भी."

"अर्थात् गुरूदेव?"

"आज के इस अनुष्ठान के दो उद्देश्य थे. एक, अपनी सिद्धियों को पोषित करना. दो, किसी को यहाँ बुलाना."

"किसे बुलाना चाहते थे आप गुरूदेव?"

"शौमक और अवनी को."

एक क्षण रुक कर कुछ सोचते हुए पूछा गोपू ने,

"तो.. वो....."

उसका प्रश्न पूरा होने से पहले ही गुरूदेव ने उत्तर दे दिया,

"नहीं आए, वत्स."

कहते हुए बाबा थोड़ा निराश दिखे. कदाचित उन्होंने इसमें सफ़लता मिलने की ही आशा की थी.

बाबा के चेहरे पर उभर आए निराशा को देख गोपू से रहा नहीं गया, पूछा,

"तो क्या इसका और कोई उपाय नहीं है गुरूदेव?"

"हम्म.. है... अवश्य है. परन्तु अभी हम वो उपाय करेंगे नहीं."

"क्यों गुरूदेव?"

"क्योंकि इन दोनों या इनमें से किसी एक को भी बुलाना इतना सरल सहज नहीं होगा. आज के अनुष्ठान के दो उद्देश्यों में से एक उद्देश्य शौमक और अवनी या इन में से कोई एक को अपने पास बुला कर उनसे वार्तालाप करना, प्रश्नोत्तर करना था. पर ऐसा हुआ नहीं... और ऐसा न होने का केवल एक ही कारण है."

"वो क्या गुरूदेव?"

तनिक रुक कर बाबा बोले,

"कारण ये कि कोई इनको यहाँ मेरे पास आने से रोक रहा है !"

"क्या?!"

"हाँ वत्स, कोई है ऐसा जिनके सामने इनकी एक नहीं चल रही है. वो जो कोई भी है इनसे कई गुणा अधिक शक्तिशाली है और बड़ी सरलता से मेरा इनके साथ किसी भी प्रकार का कोई भी सम्पर्क होने से रोक रहा है."

"वो कौन है गुरूदेव?"

"अभी इसका पता नहीं चला है वत्स. पता कर सकता था यदि मैं इस बात के लिए भी तैयार रहता. परन्तु ऐसा कुछ होगा इसका तो मुझे रत्ती भर का आभास नहीं था."

ये सुनकर गोपू को बहुत निराशा हुई. चांदू को भी.

बाबा ने और कुछ नहीं कहा क्योंकि उनके मन में भी कई विचार एक साथ उमड़ घुमड़ कर रहे थे.

कुछ समय और बीता.

अचानक चांदू को कुछ याद आया और तुरंत बाबा के पास आकर पूछा,

"गुरूदेव.. मुझे भी कुछ पूछना है."

"पूछो वत्स."

"गुरूदेव.. ये चंडूलिका कौन है?"

प्रश्न सुनते ही गोपू भी बाबा के सामने चांदू के पास आ कर बैठ गया.

दोनों का कौतुक देख बाबा मुस्कराए.

बोले,

"बहुत शक्तिशाली होती है ये चंडूलिका.. इनसे पार पाना हर किसी के बस की बात नहीं. इनसे या तो बहुत ही उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष या सिद्ध साधक ही जीत सकता है या फिर ईश्वर का कोई विशेष कृपा प्राप्त व्यक्ति."

"ओह.. ऐसा?! ये तो इसी से पता चलता है कि ये कितनी खतरनाक है."

"ह्म्म्म."

"पर गुरूदेव... ये आखिर है कौन?"

बाबा मुस्कराए.. पर स्वेच्छा से नहीं... ये इस बात का संकेत था कि अब बाबा जो बोलने जा रहे हैं वो अप्रत्याशित होगा. क्षणमात्र में उनका चेहरा पहले से भी अधिक गम्भीर हो गया.

गम्भीर आवाज़ में ही बोले,

"रानी चुड़ैल!"

सुनते ही दोनों शिष्य अपने स्थान पर बैठे बैठे ही उछल पड़े.

बाबा का ये उत्तर वाकई काफ़ी अप्रत्याशित था.

दोनों को ही अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने अभी अभी जो सुना.. वो क्या सच में सुना या फिर अत्यधिक उत्तेजना व उत्सुकता में उन्हें कोई भ्रम हुआ?

लगभग एक साथ ही दोनों का मुँह खुला,

"क्या?? कौन??!!"

इधर पुलिस स्टेशन में,

"जी सर.. श्योर सर. बिल्कुल होगा. सर, मैं उसी काम में लगा हुआ हूँ."

इसी तरह कुछ और बातें करने के बाद इंस्पेक्टर रॉय ने फ़ोन क्रेडल पर रखा.

एक लंबी साँस छोड़ते हुए कुर्सी पर बैठ गया. पास रखी ग्लास से पानी पिया. दो कागजों पर साईन किया. थोड़ा ठहर कर बेल बजाया.

बेल के बजते ही हवलदार श्याम तुरंत कमरे में आया,

"यस सर."

"काम कैसा चल रहा है श्याम?"

"अ.. सब ठीक है सर."

"हम्म.. अच्छा, मैं पूछ रहा था कि गाँव के केस का क्या हुआ?"

"गाँव...?"

"अरे वही मिथुन, तुपी काका इत्यादि वाला मामला... क्या हुआ उसका?"

"अम..स..सर... जाँच तो अभी चल ही रही है."

"क्या... अभी भी...? श्याम... करीब डेढ़ महीना खत्म होने को आया और तुम कह रहे हो जाँच अभी भी चल रही है?"

श्याम ने सिर झुका लिया. वाकई लज्जित था वो.

सीरियस होते हुए रॉय ने पूछा,

"बात क्या है श्याम... जाँच अगर अभी भी चल रही है तो फिर उसका कोई प्रोग्रेस रिपोर्ट ही दे दो."

"ज..जी सर... प्रोग्रेस तो है. व.."

"हम्म.. क्या प्रोग्रेस है बोलो?"

"सर, अभी तक के जाँच में इतना स्पष्ट हो गया है कि मिथुन की हत्या में किसी मर्द का हाथ नहीं है; मतलब, हमने जिन लोगों पर संदेह किया था, उनमें जितने भी पुरुष थे सब के सब निर्दोष प्रतीत हो रहे हैं."

"हम्म.. तो क्या ये फाइनल है?"

"सर, फाइनल के बारे में अभी कहना थोड़ा जल्दबाजी होगा. परन्तु प्रथम दृष्ट्या तो ऐसा ही लगता है."

"ओके.. तो इसका मतलब हुआ की महिलाओं; रुना और सीमा, ये दोनों संदेह के घेरे में अब भी हैं?"

"यस सर."

"ओके.. तो फिर देर किस बात की. दोनों को फिर बुलाओ थाने. कड़ाई से पूछताछ करो. खुद ही सब उगल देंगी."

"सर.."

"क्या?"

"यहीं पर एक छोटा सा प्रॉब्लम आ गया है."

"प्रॉब्लम?!! कैसी प्रॉब्लम?"

"सर.. हमारे खबरी के अनुसार, हरिपद की बीवी सुनीता के भी लाल बाल हैं.. थोड़ा शेड लिए हुए."

"मेहँदी?"

"जी सर."

"तो? बालों को तो रंगा ही जा सकता है. गैर कानूनी नहीं है."

"जी सर. गैर कानूनी नहीं है."

"तो फिर?"

"सर, खबरी के अनुसार, वारदातों वाले स्थानों के आस पास उसे भी देखा गया है."

"व्हाट?!!"

"जी सर."

"त... तो क्या वो भी....."

"सर, यहीं एक और पेंच है. सुनीता को उन स्थानों पर देखा तो गया है पर उसकी उपस्थिति के समय से वारदात के समय से ठीक मेल नहीं खा रहे हैं."

अब इस बात ने रॉय का दिमाग और भी घूमा दिया. श्याम की ओर एकटक देखते हुए पूछा,

"आर यू श्योर?"

श्याम ने भी उतनी ही तत्परता से उत्तर दिया,

"यस सर."

"ओह.. खबरी ने ठीक से पता किया है सब?"

"जी सर. खबरी अभी भी इसी काम में लगा हुआ है."

"ओके. ओके... और कोई नयी बात?"

"हाँ सर. गाँव में कोई बाबा आया है. गाँव वालों ने ही बुलाया है. उन लोगों का मानना है कि गाँव में ये सब जो कुछ हो रहा है; किसी ऊपरी बला का काम है और इन सब से कोई अत्यंत सिद्ध साधक ही उन लोगों का व इस गाँव का उद्धार कर सकता है."

रॉय धीरे से हल्का हँसा.. बोला,

"गाँव वालों की तो बात ही अलग है. क्या लगता है तुम्हें, कैसा है ये बाबा? ढोंगी? या सच में कोई चमत्कार दिखा सकता है??"

"सर, मैंने पूछा था खबरी से इस बारे में, उसके अनुसार बाबा वाकई बड़ा सिद्धहस्त ज्ञात होता है. स्वभाव भी काफी अच्छा है. सबसे बड़ी आत्मीयता से बात करते हैं. गाँव आए उनको यही कुछ पंद्रह दिन के आस पास हो गए और इतने ही दिनों में कईयों के दुःख दर्द को दूर किया है उन्होंने."

"हम्म.. तुम्हारी बातों से लगता है तुम भी उन पर विश्वास करते हो."

रॉय ने हँसते हुए व्यंग्य किया.

उत्तर में श्याम चुप रहा.

मुस्करा कर सिर नीचे कर लिया.

रॉय को और भी कई काम करने थे इसलिए श्याम को जाने को कहा ये निर्देश देते हुए कि जाँच के काम में तेज़ी लाए और जल्द से जल्द प्रोग्रेस की हर खबर उन तक पहुँचाए.

श्याम के जाते ही रॉय दोबारा सामने पड़ी फाइल को उठा कर देखने लगा.

दूसरी ओर,

बाबा अपने दोनों शिष्यों को समझा रहे थे..

"हाँ वत्स.. ये जो शक्ति है ये बहुत ही शक्तिशाली होती है. साफ़ शब्दों में कहा जाए तो महाशक्तिशाली होती है ये. इनसे टक्कर ले पाना या लेना आत्मघात के समान होता है. दुष्ट व काली शक्तियों की प्रधान देवियों में से एक होती है ये चंडूलिका. हर कोई इनकी साधना नहीं करता है... क्योंकि हर कोई इनकी साधना कर ही नहीं सकता. इन्हें प्रसन्न करने का मार्ग व उपाय बड़ा विषम और दुष्कर है... और यदि इन्हें प्रसन्न कर लिया गया तो समझो आधी से अधिक काली शक्तियाँ तुम्हारे इशारों पर नाचने के लिए तत्पर रहेंगी सदा. उन शक्तियों से कोई भी साधक - साधिका दुनिया की कोई भी कार्य कर और करवा सकती है. चंडूलिका सिद्ध साधक - साधिका अजेय तो नहीं पर कम से कम इतना दम ज़रूर रखते हैं की कोई भी उन्हें सरलता से नहीं हरा पाए."

बाबा के मुँह से ऐसी बातें सुन कर गोपू और चांदू का तो जैसे मन ही मर गया.

अभी कुछ देर पहले तक दोनों यही सोच रहे थे कि अपराधी को शीघ्र से शीघ्र पकड़ कर गाँव को आंतक व विपदा से मुक्त कर लेंगे परन्तु यहाँ तो मामला ही कुछ टेढ़ी खीर वाला निकला.

दोनों शिष्यों के मनोभावों को समझने में बाबा को देर न लगी.

मुस्करा कर बोले,

"चिंता न करो वत्स.. मन छोटा न करो...."

चांदू अधीरता के कारण बीच में ही बोल पड़ा,

"चिंता कैसे न करें गुरूदेव. आपने बात ही ऐसी कह दी. एक तो ऐसे साधक और शक्ति अजेय होती हैं और ऊपर से यदि इनसे टकराते समय आपको कुछ हो गया तो?"

"हा हा हा. तुम्हारी ये चिंता अच्छी लगी चांदू और ये उचित भी है. पर लगता है अत्यधिक चिंता में तुमने मेरे अंतिम वाक्य पे गौर नहीं किया."

चांदू असमंजस वाली दृष्टि से बाबा को देखने लगा.

बाबा ने कहा,

"वत्स, मैंने कहा की 'चंडूलिका सिद्ध साधक - साधिका अजेय तो नहीं पर कम से कम इतना दम ज़रूर रखते हैं की कोई भी उन्हें सरलता से नहीं हरा पाए' इसका अर्थ ये हुआ कि इन्हें हराया जा सकता है. इन्हें हराने के लिए विशेष मंत्र तंत्र की आवश्यकता होती है जो हर कोई नहीं जानता है और न ही अधिकांश लोग जानने का ही प्रयास करते हैं."

"अर्थात् आप इन्हें हरा सकते हैं?"

"बिल्कुल."

"अर्थात् आप इन्हें हराने का उपाय जानते हैं?"

चांदू की इस बात पर बाबा ज़ोर से हँस पड़े,

"हा हा हा हा हा हा... वत्स.. अगर नहीं जानता तो ये कहता ही क्यों की मैं इन्हें हरा सकता हूँ. हा हा हा."

चांदू अपने इस बेवकूफी वाले प्रश्न पर स्वयं बड़ा लज्जित हुआ.

गोपू भी चांदू के इस तरह के व्यवहार पर हँसने से स्वयं को रोक न सका.

कुटिया में वातावरण इसी बहाने थोड़ा हल्का हो गया.

बाबा भी हँस-मुस्करा रहे थे... पर अंदर ही अंदर इस बात से भी चिंतित थे कि चंडूलिका शांत नहीं बैठी होगी. शौमक और अवनी के आत्माओं के संग अपने अगले शिकार की तलाश में होगी!
 
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चार दिन बाद,

एक दिन श्याम सुबह सुबह... रॉय के थाने आते ही उसके सामने जा कर उपस्थित हो गया.

चेयर पर आराम से बैठते हुए रॉय ने बड़े इत्मीनान से पूछा,

"क्या बात है श्याम? कुछ विशेष है??"

"जी सर... ए..एक टिप मिली है."

"टिप.. कैसी टिप?"

"मिथुन मर्डर केस में, सर."

"खबरी से??"

"जी सर."

"पक्की है न?"

रॉय ने सीरियस होते हुए पूछा.

श्याम ने भी उतनी ही तत्परता से उत्तर दिया,

"जी सर... और अगर खबर पूरी तरह से गलत न भी हुआ तो भी हमें इससे बहुत इम्पोर्टेन्ट लीड मिल सकती है."

"हम्म.. दैट्स वैरी गुड."

"थैंक्यू सर."

"तो.. क्या कहते हो.. चलना है अभी?"

"सर, अगर आप अभी फ्री हों तो..."

"हम्म... मैं भी वही सोच रहा था. अच्छा, एक बात बताओ.. जा कर जाँच पड़ताल करनी है या उठा कर लाना है."

"सर, मैं तो सोच रहा था की सीधे उठा कर ही ले आएँ. लेकिन ऐसा होना...."

"क्यों नहीं हो सकता... एक काम करो, तुम जाओ... साथ में ५-६ साथियों को ले जाओ. और जिसको लाना है, ले आओ... पूछताछ के नाम पर. वैसे कोई कुछ कहेगा नहीं पर अगर कोई पूछे तो कहना ऊपर से आर्डर आया है... समझे?"

"यस सर."

"गुड.. अब जाओ. गुड लक."

"थैंक्यू सर."

सैल्यूट मार कर श्याम ख़ुशी ख़ुशी कमरे से निकल गया.

करीब दो घंटे बाद श्याम लौटा... अपने पाँच अन्य साथियों के साथ.

और साथ में थे तुपी काका, उनकी पत्नी सीमा और भांजा बिल्टू.

थाने में लौटने के साथ ही श्याम, रॉय के पास गया और खबर सुनाई.

रॉय खुश हुआ पर जैसे ही कमरे से निकला; उन तीनों को देख कर हटप्रभ हो गया.

उसकी तो बुद्धि ही चकरा गई.

प्रश्नसूचक दृष्टि लिए श्याम की ओर देखा.

श्याम ने पास आ कर कहा,

"सर, खबर मिली है की मिथुन मर्डर केस में सीमा किसी तरह संलिप्त है और इस केस में और अधिक प्रकाश डालने के लिए इसके पति और भांजे को भी साथ ले आएँ हैं."

"वैरी गुड. गुड जॉब."

श्याम की चतुराई देख कर रॉय खुश होता हुआ उसे शाबाशी दिया.

अपने सीनियर से शाबाशी मिलने से श्याम भी काफ़ी गदगद हो उठा.

परन्तु क्षण भर बाद ही चेहरे पर चिंता लिए बोला,

"लेकिन सर... एक छोटी सी दुविधा है.."

"वो क्या?"

"इन तीनों को ले तो आया.. पर अब इनसे असल बात कैसे उगलवाया जाए ये एक समस्या है."

"समस्या की क्या बात है श्याम. एक काम करते हैं, पहले एक एक कर तीनों को अलग अलग बैठा कर सवाल जवाब करेंगे... अगर इस प्रक्रिया से हमारा काम हो जाता है तो ठीक है.. नहीं तो ज़रुरत पड़ने पर तीनों को साथ बैठा कर क्रॉस क्वेश्चन करेंगे."

रॉय के इस आईडिया से श्याम बहुत खुश हो गया,

"ओके सर."

कह कर आगे की कार्रवाई को ले कर व्यस्त हो गया.

इधर,

बाबा की कुटिया में,

गोपू और चांदू बाबा के विशेष दिशा निर्देश के अंतर्गत कुछ विशेष तैयारियों में लगे हुए थे. दोनों के ही हाथ काफ़ी तेज़ी से चल रहे थे और कई सामानों को इकठ्ठा करने में व्यस्त थे.

कई पवित्र और दैव सम्बन्धी वस्तुओं को अच्छी तरह से देखा परखा जा रहा था.

काफ़ी देर तक यही चलता रहा.

जब सभी तैयारी पूरी हुई तब तीनों ही आराम करने लगे. सुस्ताते हुए चांदू पूछा,

"गुरूदेव, इतने से हो जाएगा न?"

"हाँ वत्स."

"और कार्य?"

"हाहाहा... क्यों.. गुरु पर विश्वास नहीं?"

"क्षमा करें गुरूदेव.. मेरा ये अभिप्राय नहीं था. दरअसल, जब से चंडूलिका के बारे में सुना है.. मन हमेशा ही भयग्रस्त व संदेहग्रस्त रहता है."

"अपनी क्षमताओं को लेकर इतना संशययुक्त रहना क्या शोभा देता है वत्स?"

"नहीं गुरूदेव... म.."

उसे बीच में ही रोकते हुए बाबा बोले,

"वत्स.. सदैव स्मरण रखना.. चाहे कुछ भी हो.. अपने क्षमताओं पर कभी भी संदेह नहीं करना चाहिए. इस व्यक्ति विशेष की योग्यता का ही ह्रास होता है. स्वयं पर विश्वास नहीं रहता इससे कार्य विशेष को लेकर मन में भय रहता है और अरुचि भी जाग जाती है."

चांदू सिर झुका लिया,

बोला,

"जी गुरूदेव."

बाबा ने मुस्करा कर चांदू के सिर पर हाथ फेरा और दोनों को ही सम्बोधित करते हुए बोले,

"मेरी चिंता अपनी योग्यता, क्षमता या कार्य के पूरा होने या न होने को लेकर नहीं है.. मेरी चिंता है गाँव वासियों को लेकर."

दोनों ने प्रश्नसूचक दृष्टि से बाबा की ओर देखा...

बाबा कहते गए,

"पता नहीं.. न जाने क्यों मेरा मन कह रहा है कि आने वाले सात दिनों के अंदर अंदर कुछेक गाँव वासियों पर इसी चंडूलिका का या फिर शौमक और अवनी का कोप होने वाला है."

"तो क्या हुआ.. आप उन्हें बचा तो सकते ही हैं गुरूदेव."

"नहीं वत्स, आखिर मैं भी एक मनुष्य हूँ.. मेरी अपनी भी कुछ सीमाएँ हैं. मैं बहुत कुछ तो कर सकता हूँ.. पर सब कुछ नहीं."

"तो फिर उन लोगों को बचाने का और कोई मार्ग शेष नहीं है?"

"है वत्स.. है... मैंने इन लोगों को जो दिशा निर्देश दिया है अगर उसका पालन पूरी निष्ठा से किया जाए तो अवश्य ही सबके प्राण सुरक्षित रहेंगे.. अन्यथा दुर्घटना होने की पूरी सम्भावना है."

"अर्थात् गुरूदेव.. आपको ये संदेह है कि कदाचित सभी आपके निर्देशों का पालन नहीं करेंगे?"

"संदेह नहीं वत्स... विश्वास!... विश्वास है इस बात का."

"क..क्यों... गुरूदेव...?"

बाबा ने उत्तर में कुछ नहीं कहा.

वो चुप रहे और खिड़की से बाहर आसमान की ओर देखने लगे.

गोपू और चांदू इस संकेत को समझ गए. बाबा ने कुछ देर पहले खुद ही कहा था कि वे बहुत कुछ कर सकते हैं... लेकिन सब कुछ नहीं. सब कुछ उनके हाथ में नहीं है. पता नहीं आने वाले सात दिनों में गाँव में क्या क्या होगा...

दोनों अत्यंत चिंतित हो उठे.

उधर,

थाने में इंटेरोगेशन शुरू हो चुका था.

शुरुआत तुपी काका से ही हुआ...

पर तब इंस्पेक्टर रॉय और हवलदार श्याम का आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब इंटेरोगेशन को शुरू हुए दस मिनट ही मुश्किल से हुए थे कि तुपी काका बिलख बिलख कर रोने लगे और हाथ जोड़ कर पुलिस वालों से एक ही बात बार बार दोहराने लगे कि,

"दया कीजिए साब, मुझसे मेरी बीवी के बारे में मत पूछो; मैं नहीं बोल पाऊंगा... साब... मत पूछो साब... कृपा करो साब."

"क्यों.. क्यों कुछ नहीं बोल पाओगे?"

रॉय ने थोड़ा सख्ती से पूछा.

तुपी काका रोते हुए ही बोले,

"साब, जीवन में आज तक अपने आचार, विचार, व्यवहार और व्यापर से बहुत नाम कमाया. बहुत सम्मान मिला पूरे गाँव में... पूरे समाज से. मेरी तो विवाह की भी इच्छा नहीं थी.. माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी की जिद्द कहिये या उनकी इच्छा; देर से ही सही... मैंने शादी कर ली. संतान नहीं हुआ.. इसे भी भाग्य समझ कर समझौता कर लिया. ल...ले.. लेकिन य.. ये थाना.. प... पुलिस... सवाल... ज...जवाब... मुझसे न.. नहीं होगा साब... नहीं होगा."

बच्चों की तरह रोते बिलखते तुपी काका झुक कर लगभग रॉय के पांव ही पड़ गए...

रॉय तुरंत पीछे हट गया.

तुपी काका का रोना धोना देख कर श्याम तो बिल्कुल किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो गया. उससे कुछ बोलते नहीं बना. वैसे भी, जब उसके सीनियर वहाँ पर उपस्थित हैं तो फिर वो क्यों बोले.

कुछ पलों के लिए रॉय का दिमाग भी एकदम से ब्लैंक हो गया था पर था वो एक बहुत ही स्मार्ट ऑफिसर. खुद को सम्भालने में कम समय लगा उसे. तुरंत ही समझ गया कि तुपी काका ऐसा कुछ अवश्य ही जानते हैं जो इस केस में बहुत सहायक हो सकता है पर साथ ही कदाचित तुपी काका और उनके परिवार के सम्मान को चोट पहुँचा सकता है.

इसलिए उस समय तो तुपी काका को वहाँ से उठ कर बाहर जा कर बैठने बोल दिया पर ये दृढ़ निश्चय भी कर लिया की थोड़ी देर बाद तुपी काका के अंतर्मन को फिर से खोदेगा.

रॉय ने बिल्टू को बुलवाया.

बिल्टू अंदर आया ...

घबराया..

बैठा.. उसे पहले पानी दिया गया...

रॉय ने उसे पाँच मिनट का टाइम दिया.

बिल्टू का घबराहट धीरे धीरे कुछ कम हुआ.

रॉय अब उसके ठीक सामने चेयर पर बैठा... उसकी ओर देखते हुए..

पूछा,

"बिल्टू... अब कैसा लग रहा है..?"

"ज..जी.. ठ.. ठीक हूँ ...स... साब.."

"और पानी चाहिए?"

"न..नहीं साब.."

"हम्म.. तो अब हम जो कुछ पूछेंगे उसका तुम सही सही जवाब देना... ठीक है?"

"ज..ज..जी...साहब... ब.. बिल्कुल.."

"ह्म्म्म.. तो बिल्टू.. ये बताओ... तुम्हारा अच्छा नाम क्या है...तुम यहाँ कब से रहते हो.. क्यों रहते हो... तुम्हारे माता पिता कहाँ हैं.. इत्यादि.."

"ज.. जी साब.. बचपन में माता पिता के देहांत के बाद से ही मामा के पास यहाँ रहने लगा था. मामा मामी से बहुत प्यार मिला है. बिल्कुल उनके अपने बेटे जैसा. उनकी अपनी कोई संतान नहीं है न... इसलिए देखा जाए तो एक तरह से... उन लोगों ने मुझे अपना लिया... था... म.. मेरा न.. नाम भी मामा जी ने ही र..रखा था ... गोबिन्दो दास... पर चूँकि सिर पर असल माँ बाप का ही छाँव नहीं था इसलिए अपना ही बेटा मानते हुए... म.. मामा न..ने मेरा नाम गोबिन्दो पाल रखना ही अ..अच्छा समझा."

"ओके.. मामा और मामी के साथ तुम्हारे संबंध कैसे हैं?"

"बहुत अ.. अच्छे ह..हैं साब."

"मामा और मामी के बीच के संबंध कैसे हैं?"

"ब.. बा.. बहुत बढ़िया है साब."

"उनका अपना कोई सन्तान नहीं है.. इस बात को लेकर दोनों के बीच कभी कोई खटपट नहीं हुई?"

"स.. साब.. म.. मैं तो बचपन से ही इनके साथ रहता हूँ.. न..नहीं साब, कभी कोई खटपट नहीं हुई है."

"सच कह रहे हो?"

"ज.. जी.. साब..."

"दोनों की आयु में बहुत अंतर है.. कम से कम पंद्रह साल का. विवाह करने में इतनी देर क्यों की तुपी काका ने?"

"नहीं पता साब... भ.. भला मुझे कैसे पता होगा?"

"इस आयु अंतर के कारण भी कभी कोई खिटपिट हुई है दोनों में?"

"अम... ज..जहाँ तक मुझे मालूम है साब... ऐसा तो कभी क..कुछ हुआ नहीं दोनों में."

"पक्का?"

"जी साब."

"हम्म.. और मिथुन...?'

"म.. मिथुन का क्या साब..?"

"ये मिथुन का क्या किस्सा है? उसके बारे में कुछ बताओ."

"मिथुन भी बहुत कम आयु से ही हमारे यहाँ रहते आया है साब.. दरअसल, उसके माँ बाप बहुत गरीब थे.. बच्चे कुल सात थे.. समुचित पालन पोषण में बहुत ही असमर्थ थे दोनों इसलिए तुपी मामा के यहाँ मिथुन को छोड़ गए थे. काम भी करेगा.. रहना खाना होगा.. और बड़ा भी हो जाएगा.."

"क्यों.. तुम्हारे तुपी मामा के यहाँ ही क्यों छोड़ा मिथुन को?"

"जी.. व.. वो क्या है कि... मिथुन के पिताजी को भी उनके पिताजी ने तुपी मामा के पिताजी स्वर्गीय सुनील पाल जी के यहाँ छोड़ गए थे. वो भी हमारे यहाँ ही बड़े हुए थे.. परिवार के सदस्य की भांति रहते खाते पीते और .. बदले में घर से सम्बन्धित काम कर देते.... चाहे घर में हो या बाहर का काम हो."

"बाहर का काम...?"

"जी.. जैसे पुआल ले आना, सब्जी ले आना.. कहीं कुछ पहुँचा कर आना.. इत्यादि.. सब."

"ओह्ह.. ओके..ओके.."

"ज.जी साब."

"बिल्टू... तुम्हें याद होगा शायद.. जिस दिन हम तुम्हारे घर गए थे.. मिथुन की बॉडी देखने... उस दिन तुमने हमें बताया था कि तुम्हारे मामा मामी; विशेषतः तुम्हारी मामी मिथुन को सगे बेटे से भी अधिक मानती थी... ऐसा क्यों? तुम तो थे ही बेटे के रूप में.. फिर कोई और क्यों?"

"न.. नहीं साब.. वो मुझे ही अधिक मानती हैं."

"क्या मानती हैं?"

इस प्रश्न पर बिल्टू एकदम सुन्न सा हो गया. उसने कल्पना ही नहीं किया था कि इस तरह से भी प्रश्न कर सकते हैं पुलिस वाले.

थूक निगलते हुए तनिक मुश्किल से बोला,

"ब.. बेटा मानती है.. साब."

"पक्का..??"

"जी साब."

"तो फिर मिथुन को सगा बेटा जैसा मानने का कारण??"

"पता नहीं सर."

कह कर बिल्टू ने नज़रें फेर लिया. घबराहट के लक्षण फिर से दिखाई देने लगे थे. रॉय ने कुछ सोचा और बिल्टू को जाने दिया.

अब बारी सीमा की थी.
 
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"ठास!!"

एक ज़ोर का आवाज़ गूँजा.. एक थप्पड़ की आवाज़.

और इसी के साथ एक और आवाज़ निकली,

"र..रुक जाइए.. म.. मैं.. ब.. ब...बताती...ह.. हूँ..."

और ये आवाज़ थी सीमा की.

सीमा, अर्थात् तुपी काका की बीवी.. सीमा पाल.

गाल पर रसीदे गए उस ज़ोरदार थप्पड़ ने अपनी छाप तो छोड़ी ही; साथ में सीमा की सारी हेकड़ी भी निकाल दी जो अब से कुछ मिनटों पहले रॉय, श्याम और तीसरे पुलिस वाले को दिखा रही थी.

हालाँकि जब सीमा को इंटेरोगेशन रूम में बुलाया गया तब वहाँ दो लेडी पुलिस वाली भी थी... पर सीमा ने मानो कुछ न बोलने की कसम खा रखी थी.. एक तो कुछ बोलना नहीं चाह रही थी; दूसरा, कुछ बोले भी तो इतना कम की समझ में ही न आए की बात का मतलब क्या हुआ..

थोड़ी देर बाद ही रॉय के दिमाग ने उसे एक उत्तम विचार दिया और उसने तुपी काका और बिल्टू; दोनों को अंदर बुलवा लिया. सीमा से फिर दो चार सवाल किए गए लेकिन जब उसने फिर कोई जवाब न दिया और अपने उसी रवैये पर अड़ी रही तब मजबूरन रॉय को अपने सिपाहियों को एक खास इशारा करना पड़ा उन लोगों ने भी तुरंत सांकेतिक आदेश का पालन करते हुए तुपी काका और बिल्टू को डंडों से अच्छे से कूटने लगे.

मुश्किल से दस से बारह डंडे ही पड़े होंगे कि सीमा प्रश्नों के उत्तर देने को तैयार हो गई.

शुरू के चार पाँच प्रश्नों के उत्तर उसने सही दिए भी पर फ़िर धीरे धीरे अपने उसी पुराने रवैये में लौटने लगी और अपने उत्तरों को सीमित करने लगी.

वार्निंग भी दी गई उसे...

कुल छह वार्निंग...

पर नहीं मानी..

तब फ़िर से मजबूरन रॉय को दोनों महिला पुलिस कर्मियों को वही विशेष संकेत देना पड़ा..

और इस बार निशाना सीमा थी.

शुरू के सात आठ थप्पड़ खाने के बाद भी उसने थोड़ी प्रतिरोध करने की और स्वयं को निर्दोष बताने की पूरी कोशिश की लेकिन उन दोनों हट्टे कट्टे महिला कर्मियों के ज़ोरदार बरसते थप्पड़ों के सामने शीघ्र ही हथियार डाल दी.

रॉय ने गौर से देखा सीमा को...

मार और भय से अब वो थरथर काँप रही थी.

अभी ही सही समय है; ऐसा जान कर रॉय ने दोबारा प्रश्नोत्तर का भार संभाला.

सीमा के बिल्कुल सामने बैठा.

बोतल दिया पानी पीने को.

सीमा ने कांपते हाथों से बोतल थामा और रॉय से किसी इशारे की प्रतीक्षा किए बगैर ही गटागट पानी पीने लगी.

पानी पी कर तीन मिनट सुस्ताने के बाद,

"तो सीमा जी.. अब आप सब कुछ सच सच कहने के लिए तैयार हैं?"

"ज..जी.. साब."

"ठीक है.. तो शुरू करते हैं प्रश्नोत्तर काल. और ध्यान रहे, इस बार सब सीधे सीधे ही बताइयेगा.. होशियारी जहाँ की... ये दोनों छोड़ेंगी नहीं आपको.. और मैं भी इन्हें रुकने नहीं कहूँगा."

सीमा की आँखों में देखते हुए रॉय ने बेहद गंभीर स्वर में कहा.

सीमा ने डरते हुए कनखियों से अपने अगल बगल खड़े दोनों महिला कर्मियों को देखी और फिर रॉय की ओर देखते हुए हाँ में सिर हिलाई. साथ ही धीरे से बोली,

"स..साब.. मैं इनके सामने नहीं ब...बो.. बोल पाऊँगी.."

कह कर उसने याचना भरी दृष्टि से रॉय को देखा.

रॉय खुश हुआ. उसने सिपाहियों को इशारा कर के तुपी काका और बिल्टू को वहाँ से ले जाने को कहा.

उनके वहाँ से जाते ही उसने बड़े प्यार से प्रश्न करना शुरू किया,

"सीमा जी, ये बताइए.. तुपी जी के साथ आपके संबंध कैसे थे?"

"अ..अच्छे ... थ.. थे...स..साब.."

"कितने अच्छे?"

"ब.. बहुत अच्छे.."

"बिल्टू के साथ आपके सम्बन्ध कैसे हैं?"

"अच्छे हैं."

"क्या सम्बन्ध है?"

"हम हैं तो मामी और भांजा.. लेकिन माँ बेटे का भी सम्बन्ध मान कर चलते हैं."

इस उत्तर पर रॉय थोड़ा ठिठक गया और दो सेकंड के लिए सीमा की ओर देखा.

फिर तुरंत ही यथावत प्रश्न करना शुरू किया,

"ओके सीमा जी; अगर आप दोनों के बीच माँ बेटे वाला सम्बन्ध है तो फिर कहने वाले ये क्यों कह रहे हैं कि आप दोनों के बीच कोई और सम्बन्ध भी है?"

"ज..जी?!!"

सीमा ऐसी प्रतिक्रिया दी मानो रॉय का प्रश्न सुन कर उसे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा हो.

रॉय बिल्कुल शांत बैठा रहा... सीमा की ओर एकटक देखता हुआ.

बड़े आराम से बोला,

"जी, आपने सही सुना.. लोग ऐसा ही कहते हैं... और यदि ऐसा कहते हैं तो अवश्य ही कोई विशेष आधार होगा ऐसी बातों का...या... फ़िर कोई विशेष प्रयोजन!"

"अ.. आधार? ... प्रयोजन??"

"जी बिल्कुल."

"नहीं.. ऐसा कुछ नह.."

सीमा की बात पूरी होने से पहले ही रॉय बोल पड़ा,

"हमारे सूत्रों से हमें ऐसी ही खबर मिली है.. और हमारे सूत्र ऐसी बातों में इस तरह की गलतियाँ नहीं करते. व्यर्थ लांछन लगने - लगाने वाले कार्य नहीं करते. चलिए.. अब सब सच सच बताइए... नहीं तो ...."

कहते हुए रॉय ने सीमा को दोनों महिला पुलिस कर्मियों की ओर संकेत कर के दिखाया.

सीमा अब और भी अधिक सहम गई.

पानी की तरह अब स्पष्ट था कि सीमा वाकई ऐसा कुछ जानती है जो वो चाह कर भी बता नहीं सकती; लेकिन रॉय के पास भी अब अधिक समय नहीं था. उसे शीघ्र से शीघ्र परिणाम तक पहुँचना था.

अतः वो चेयर से उठ खड़ा हुआ और पीछे हटते हुए बोला,

"ये अब भी नहीं बोलेंगी.. सुनो, कुछेक और लगाओ तो इसे."

इतना सुनना था कि सीमा विद्युत् की तेज़ी को भी मात देती हुई हड़बड़ा कर बोल उठी,

"न.. नहीं.. नहीं... सुनिए.."

आगे बढ़ती दोनों महिला कर्मी रुक गयीं.

रॉय पलट कर सीमा की ओर देखा...

सीमा अत्यंत भयभीत होते हुए बोली,

"स..सुनिए... म.. मैं स..सब बताऊँगी..."

"यही तो आपने कुछ देर पहले भी कहा था... फ़िर भी कुछ नहीं बोल रही थीं... अब भी यही कह रही हैं.. क्या अब आप सच में सब सच सच बोलेंगी? यदि नहीं.. या कोई भी चालाकी हुई.. तो फिर इन दोनों को मैं नहीं रोकूंगा... ठीक??"

"ज.. जी.. ब... बिल्कुल ठीक.."

सीमा अपने चेहरे से पसीना पोंछते हुए बोली.

रॉय दोबारा सीमा के ठीक सामने रखे अपने चेयर पर जा कर बैठ गया.

"चलिए सीमा जी.. कहना शुरू कीजिए."

सीमा ने बोतल उठा कर पानी पी, एक गहरी साँस ली और कहना शुरू की,

"आपके सूत्रों ने खबर तो सही दी पर थोड़ी गलत भी है. जिस तरह की सम्बन्ध की बात आप कर रहे हैं वो बिल्टू के साथ नहीं अपितु मिथुन के साथ था. मेरे स्वर्गीय ससुर ने जब मिथुन को अपने घर में स्थान दिया था तब वो बहुत छोटा था और मैं भी उस समय यहाँ नहीं थी... मतलब.. ब्याह नहीं हुआ था उस समय मेरा. मैं तो बहुत बाद में आई थी. तब तक मिथुन भी बड़ा हो गया था. काफ़ी घुल मिल कर रहने वालों में से एक था वो. हँसमुख था, युवा था, बहुत सम्मान करता था और हमेशा ही भाभी भाभी करता रहता था.

मेरे यहाँ आने के बाद शुरू के कुछ महीने ऐसे ही हँसी ख़ुशी बीते.

पर, धीरे धीरे मैंने गौर करना शुरू किया कि मिथुन सदैव ही एक अलग ही दृष्टि से मुझे देखता है. भाभी भाभी कर के तो वो तब भी बोलता रहता था और बड़े आदर से सन्मुख आता था. जितनी देर बात करनी होती; बड़े हँसमुख तरीके से करता था लेकिन जो मैंने गौर किया वो ये था कि अवसर मिलते ही वो मेरे शरीर के कटावों को बड़े लोलुप तरीके से देखने लगता था... और ऐसा कोई भी अवसर वो व्यर्थ नहीं जाने देता था जिसमें वो मेरे शरीर के अंगों को न देख पाए.

(तभी रॉय अपने चेयर से उठा और उन दोनों महिला कर्मियों को एक संकेत कर के अपने साथ श्याम और एक और सिपाही को ले कर उस सेल से बाहर चला गया. रॉय के बाहर जाते ही एक महिला कर्मी सीमा के सामने रॉय वाले कुर्सी पर बैठ गई और दूसरी ने भी पास ही रखे एक चेयर पर बैठ गई. सीमा ने अनवरत बोलना चालू रखा था.)

शुरू में तो मैंने यही सोचा की कदाचित मेरे स्त्री सुलभ प्रवृति के कारण ही ऐसा लग रहा है और मैं नाहक ही इस बेचारे पर संदेह कर रही हूँ; लेकिन शीघ्र ही मुझे आभास हुआ कि मेरी स्त्री प्रवृति ऐसी गलती नहीं कर सकती.

कोई तो कारण होगा जो मेरी इंद्रियाँ मुझे इस प्रकार के संकेत दे रही हैं.

पहले तो मैं ध्यान नहीं दी... सच कहूँ तो ध्यान नहीं देना चाही पर जल्द ही मैंने अपनी स्त्री प्रवृति और इन्द्रियों पर भरोसा कर के मिथुन के गतिविधियों पर नज़र रखने लगी.

और बहुत शीघ्र ही उसे भोला व मासूम समझने की मेरी भूल का मुझे पता चल गया.

वो वाकई अक्सर मुझसे नज़रें चुराकर मेरे जिस्म के कटावों को लालसा भरी नज़रों से देखता था. छोटा सा अवसर मिलते ही छूने की कोशिश करता था. कई बार किसी न किसी बहाने से मेरे कमर व स्तनों को छूने में वो सफल रहा.

कुछ दिन तो केवल मुझे देखने और मुझे कहीं कहीं से छूने तक सीमित रहा... और धीरे धीरे ही सही... उसका दुस्साहस बढ़ता गया...

कभी मेरे नहाने के समय आ आकर बाथरूम का दरवाज़ा खटखटाता और खोलने पर कुछ भी इधर उधर की छोटी मोटी बात पूछता.. और आँखें उसकी मेरे अर्धनग्न शरीर पर होती.

कभी मैं कपड़े बदल रही होती तो अचानक से कहीं से आ टपकता और वासना से मुझे घूरने लगता.

मैंने कई बार कोशिश की उससे दूर रहने की, अपने पति को उसके बारे में बताने की पर असफल रही. बिल्टू को कुछ इसलिए नहीं बोली कभी क्योंकि क्या भरोसा वो शायद कुछ कर बैठता और फिर गाँव भर में हमारे परिवार के चर्चे होते... जोकि अपने आप में ही बदनामी है.

एक ओर जहाँ मैं मिथुन के बढ़ते दुस्साहसों से परेशान और चिंतित होती जा रही थी वहीँ दूसरी ओर अपने पति की उपेक्षा से भी काफी निराश, हताश व उदास थी.

विवाह के छह साल होने को आ रहे थे... लेकिन न ही हमारी अपनी कोई संतान थी और न ही हम दोनों में पति-पत्नी वाला सम्बन्ध. कहते हैं कि विवाह के आठ दस सालों बाद वैसे भी अधिकतर पति पत्नी के बीच पति पत्नी वाला संबंध न हो कर भाई बहन वाला संबंध हो जाता है. और यहाँ हम दोनों में तो पहले से ही भाई बहन वाला रिश्ता होने को आ रहा था. केवल कहने के लिए ही हम दोनों पति-पत्नी थे.

हर रात को ये खाना खा कर सो जाते थे और मैं करवट बदलते रह जाती थी. कुछेक बार मैंने खुद से पहल भी किया, लेकिन इनकी आँखें ही नहीं खुलती.. इन्होंने भी कुछेक बार प्रयास किया लेकिन काम शुरू होते ही इनका काम ख़त्म हो जाता था.

कई दिन, महीने और साल मैंने ऐसे ही गुजार दिए... मान मर्यादाओं में रहते हुए.

लेकिन ये क्षुधा ऐसी है कि बस बढ़ती ही जाए... बढ़ती ही जाए.

और इधर मिथुन भी अपनी गतिविधियों में धीरे धीरे उन्मुक्त होता जा रहा था.

मिथुन रोज़ सुबह उठ कर घर के पीछे, जहाँ तबेला है और उसके बगल में ही वो कमरा जहाँ वो रहता है; वहीँ खुले में व्यायाम किया करता था. एक दिन अचानक ही मेरी नज़र उस पर गई. उसके युवा होते शरीर में गठित होते सुपुष्ट मांसपेशियों को देख कर मेरा मन मचलने - बहकने लगता. मैं चाहती तो नहीं थी.. बिल्कुल भी नहीं... पर न जाने क्यों रह रह कर उसकी ओर मेरा मन खींचता चला जाने लगा. चाहे मैं कोई काम कर रही हूँ या फिर आराम; रह रह कर उसका कसरती बदन मेरी आँखों के सामने छा जाता.

तब अचानक एक दिन मेरे मन में ये विचार आया कि मैं अपने अंदर ये बोझ क्यों ढोती फिरूँ.. मन तो पति से भरना चाहिए था.. लेकिन अगर पति से नहीं हो रहा.. तब क्यों न किसी और से करूँ.

और अगले ही दिन से मैंने भी मिथुन को इशारे देना शुरू कर दिया.

उसके युवा होते मन को मेरे इशारे समझते देर न लगी और...."

कहते हुए सीमा चुप हो गई.

दोनों महिला पुलिसकर्मियों ने अगले पाँच मिनट तक की प्रतीक्षा की कि सीमा अब कुछ बोलेगी.

लेकिन जब सीमा कुछ न बोली तब सामने बैठी महिला कर्मी ने अपनी नज़रें पैनी करते हुए उससे पूछी,

"और??"

एक पल रुक कर सीमा होंठ खोली,

"और फिर उसके बाद से हम दोनों के बीच एक संबंध बन गया."

"कैसा संबंध... और 'हम दोनों' मतलब किन दोनों के बीच?"

"अ...अ..व....."

"जल्दी बोलो!!"

महिला कर्मी ने ज़ोर से डांटा.

सीमा और अधिक डर से सहम गई.

फ़ौरन बोली,

"अ..अव..अ...अवैध संबंध.."

"किनके बीच??"

"म...म...मेरे..अ...और.. र....और... मिथुन के बीच.."

"ह्म्म्म... ठीक... अब ये बता कि उसे मारी क्यों...??"

"क..किसे?"

"मिथुन को!"

सुनते ही सीमा का चेहरा फक्क से सफ़ेद पड़ गया..

आँखों से अविश्वास व्यक्त करती हुई बोली,

"य..ये..अ..आप क्या कह रही हैं...? भला म.. मैं.. मिथुन की ह.. हत्या क्यों करुँगी??"

"तूने नहीं किया?"

"न.. नहीं."

"नहीं किया?"

"नहीं."

"सच में?"

"ज..जी."

"सच कह रही है तू?"

"ज..जी.. सच कह रही हूँ."

"सुन, तूने मिथुन को नहीं मारा.. ये बात बिल्कुल अच्छे से सोच समझ कर ही बोल रही है न?"

"जी, ब.. बिल्कुल.."

"पक्का??"

"जी....."

सीमा आगे भी कुछ कहने जा रही थी कि तभी उसके कान के पास एक तेज़ धमाका सा हुआ और इसी के साथ अत्यधिक पीड़ा से सीमा दोहरी होती चली गई.

अपने बाएँ गाल पर हाथ रख कर वो सिर झुका ली.. आँखों के आगे अँधेरा छा गया.

अगले कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोली.

कुछ और समय बीतने के बाद जब सीमा धीरे धीरे सामान्य हुई तब उसके सामने बैठी महिला पुलिस कर्मी ने चेहरे पर बिना कोई अतिरिक्त भाव लिए एक एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बड़े शांत स्वर में पूछी,

"अब बोलो, तुमने मिथुन को क्यों मारा?"

पीड़ा की अधिकता के कारण सीमा की आँखों में आँसू आ गए थे..

तुरंत कुछ कहते नहीं बना उससे..

जब बगल में बैठी दूसरी महिला कर्मी ने सख्ती से दोबारा उससे प्रश्न किया तब फफक कर उत्तर दिया सीमा ने,

"ज..जी...म..म..मैं.. मैंने.... मारा है...था...उ..उसे.."

"हम्म.. हालाँकि मेरा प्रश्न ये नहीं था कि तुमने उसे मारा है या नहीं या फिर उसे किसने मारा है... लेकिन ठीक है.. तुमने इसका उत्तर स्वयं ही दे दिया.. तो अब ये बताओ मोहतरमा कि तुमने उसे मारा क्यों?? असल प्रश्न यही है और मैं अपने इसी प्रश्न को फिर से तुमसे पूछ रही हूँ."

सीमा अब भी अपने गाल को सहला रही थी...

गाल उसका टमाटर से भी अधिक लाल हो गया था..

बोलने का प्रयास कर के भी उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे... आँसू झर झर गिर रहे थे..

उसकी स्थिति देख सामने बैठी महिला कर्मी ने पानी वाला बोतल उसकी ओर बढ़ाया,

"चल.. पी ले ये... उसके बाद फटाफट एकदम धरल्ले से कहना शुरू करना."

सीमा बिना कोई ना नुकुर किए बोतल ले ली और पानी पीने लगी.

पानी पीने के बाद कुछ क्षण रुक कर बोलना शुरू की,

"पहले के कुछ महीने तो अच्छे से बीते लेकिन फिर मिथुन की सीमाएँ धीरे धीरे बढ़ने लगी थीं. वो खुद को मेरा मालिक समझने लगा था. अधिकार तो ऐसे जताने लगा था मानो अगर मुझे नहाने भी जाना पड़े तो उससे पूछ के जाऊं. जब भी मेरे साथ होता; मेरे पति और भांजे को गंदी गंदी गालियाँ देता. शुरू के कुछ महीने तो वो बिस्तर में भी मुझे किसी देवी की तरह पूजता था.. लेकिन उसके बाद धीरे धीरे ही सही.. उसके बातों और व्यवहार में बहुत परिवर्तन आने लगा. मुझसे; विशेष कर संसर्ग के समय किसी बाजारू औरत से भी कहीं अधिक तिरस्कृत करता हुआ पेश आता. पूछे जाने पर कहता कि ऐसा करके उसे एक विशेष.. एक अलग प्रकार का सुख व आनंद मिलता है. ऐसी बातें वो सिर्फ़ कहने के लिए कहता है.. उसे गलत न समझा जाए. उसका और कोई मतलब नहीं होता. बहुत समय तक ऐसा चलता रहा.. न चाहते हुए भी मैंने हालात के साथ समझौता कर लिया था. परन्तु जैसे सूरज अधिक समय तक बादलों के पीछे नहीं छुप सकता ठीक वैसे ही हमारे संबंध भी किसी से छुपे न रह सके. हम पकड़े ही गए. हम दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में पहले मेरे पति और बाद में भांजे बिल्टू ने देख लिया था.

पति के साथ तो मेरी काफ़ी कहा - सुनी हुई ही थी.. बिल्टू ने भी कड़ी आपत्ति जताया था.

कुछ दिन शांत रहने के बाद हम दोनों में फिर से संबंध बनने लगा. पिछली बार तो मिथुन को कुछ नहीं कहा गया था सिवाय थोड़े से डांट के.. वो भी मेरे पति के द्वारा.. लेकिन इस बार हम फिर पकड़े गए और वो भी मेरे भांजे बिल्टू के हाथों.

उसने मुझे और मिथुन को काफ़ी कुछ सुनाया. मुझे सुनाया... मैं सुनती रही.. पर जब मिथुन को सुनाने लगा तब मिथुन को गुस्सा आ गया और वो भी बहुत उल्टा सीधा बोलने लगा.

और उस क्षण तो मैं डर ही गई जब मिथुन ने मेरे पति और बिल्टू को जान से मार देने की धमकी दी.

सिर्फ़ उसी एक दिन नहीं बल्कि अक्सर कई बार अकेले में या मेरे साथ होने पर भी वह मेरे पति और भांजे को मार देने की कसमें खाता था.

ब.. बस....इसी क.. कारण......."

"इसी कारण क्या?"

"इसी कारण मैंने उसे... मार दिया."

"कब?"

"रात में..."

"ठीक से बताओ."

"उसे मारने के पहले पिछले दो महीने से मैं अक्सर उसे रात में कुछ अलग बना कर खिलाने लगी. कभी गाजर का हलवा, कभी खीर, कभी कुछ तो कभी कुछ. और इसी तरह एकदिन खीर के दूध में ही अच्छे से ज़हर मिला कर उसे दे दी. काफ़ी तेज़ और धीरे असर करने वाला ज़हर था. उसे खाने के कोई दो घंटे बाद ही मिथुन मर गया होगा."

"उसके बाद वो घृणित काम क्यों किया?"

"क.. कौन सा घृणित क... काम?"

"तुझे अच्छे से पता है कि हम किस घृणित काम की बात कर रहे हैं... हमारे खोजी कुत्तों को मिथुन के कमरे से पंद्रह कदम दूर ज़मीन के चार हाथ नीचे वो मिली है... ऐसा तो वही कर सकता या सकती है जिसके दिल में हद से अधिक घृणा भरी हुई हो."

सामने बैठी महिला कर्मी की बात सुन कर होंठों पर एक हल्की मुस्कान लाते हुए सीमा थोड़ा सा सिर झुका कर बोली,

"जैसा की अ.. अभी अभी आपने ब.. बताया... कि 'ऐसा तो वही कर सकता या सकती है जिसके दिल में हद से अधिक घृणा भरी हुई हो'... मेरे दिल में भी उसके प्रति घृणा कूट कूट कर भरी हुई थी... अ.. और.. सच कहूँ ..त.. तो घृणा के साथ साथ उससे भी अधिक दिल में डर अपना डेरा डाले हुए था...."

सीमा की बात खत्म होने से पहले ही बगल में बैठी दूसरी महिला कर्मी अपना कौतुहल न छिपा पाने के कारण पूछ बैठी.

सीमा अबकी बिना झिझक बोली,

"घृणा इसलिए क्योंकि वो मुझे एक बाजारू औरत से भी कहीं अधिक अपमानित करता रहता था. सड़क की कुतिया से भी अधिक नीचे गिरा हुआ होने का अहसास दिलाते रहता था... दिनोंदिन इतने अपमान से मैं थक चुकी थी... (कहते हुए सीमा फिर रोने लगती है).... और डर इसलिए क्योंकि उसने मेरे पति और भांजे को मार डालने की धमकी दी थी.. एक बार नहीं.. कई कई बार.. जब भी वो मेरे साथ होता था... संबंध बनाते समय हमेशा ही कहता था कि वो मेरे पति और भांजे को इस दुनिया से अलविदा करवा कर पूरे घर के साथ साथ मुझ पर भी अधिकार कर लेगा और धन - ऐश्वर्य भोगते हुए मुझे अपनी रखैल बना कर मुझे भी जब चाहे तब भोगेगा... जिसके साथ बाँटना चाहे .. बाँटेगा...

जब मुझे लगा की अब बात हद से अधिक बढ़ने लगा है तो मुझे ही कोई उपाय करना सूझा. अपने पति और भांजे से तो सहायता माँग नहीं सकती थी.. जो कुछ करना था मुझे अकेले ही करना था. सो उसे ज़हर दे दी. दिल में कई सौ गुणा घृणा भरा हुआ था... इसलिए......"

सीमा ने अपनी बात खत्म की.

उसकी पूरी कहानी सुनने के बाद दोनों महिला कर्मी कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहे.

दोनों की ही सूरत ये साफ़ साफ़ बता रही थी कि सीमा की आपबीती पर वो विश्वास करे या अंत में मिथुन के मरने के बाद जो दरिंदगी की उसने उस पर अविश्वास करे.

खैर, सीमा अब सब कुछ बोल चुकी थी इसलिए उससे कुछ और पूछने का कोई मतलब नहीं था; खास कर ऐसी कोई भी बात जो पुलिस वालों को पहले से ही पता हो.

और जो बातें पता नहीं थीं... वो भी अब पता चल चुकी थी.

सीमा को वहीँ छोड़ कर दोनों महिला कर्मी सेल से बाहर आईं और रॉय के कमरे में जा कर उसे रिपोर्ट किया. पूरी कहानी संक्षेप में सुनाई और एक पॉकेट साइज़ रिकॉर्डर उसे सौंप दिया. इसमें सीमा की पूर्ण स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड हो गयी थी.

दोनों को आभार और शाबाशी दिया रॉय ने. वो भी दिल खोल कर. सीनियर से प्रशंसा पा कर वो दोनों भी बहुत खुश हुई.

थोड़ी देर बाद जब दोनों चली गई तब रॉय ने रिकॉर्डर ऑन कर के उसे पूरा सुना; पूरे ध्यान से. फिर श्याम को बुलाया;

दोनों ने साथ में रिकॉर्डिंग सुना.

सुनने के बाद,

"क्या लगता है श्याम?"

"सर?"

"सीमा की स्वीकारोक्ति के बारे में?"

"जैसी घटनाएँ उसने सुनाई उससे तो मुझे ये सही लगती है."

"सही लगती है?!!"

"जी सर."

"तुम्हारे कहने का मतलब ये हुआ कि उसने जो कुछ भी किया वो सब सही था? अंत में हुई दरिंदगी भी??"

"ओ.. न.. नहीं नहीं सर... मेरा मतलब था कि सीमा की स्वीकारोक्ति मुझे सही लगी."

"पक्का...? यही मतलब था न तुम्हारा??"

"ज..जी सर."

श्याम सकपका गया था बेचारा. बोलने में हुई एक छोटी सी गलती उसे ही गलत ठहराने लगी थी.

"तो अब आगे का क्या लगता है? क्या होना चाहिए?"

"स..सर.. मेरे हिसाब से तो... अब इसकी इस स्वीकारोक्ति को रजिस्टर में कलमबद्ध कर के इसे जेल में डाल देना चाहिए."

सुन कर रॉय फुसफुसाते हुए बोला,

"जेल में तो समझो ये ऑलरेडी है."

"स..सर.. आपने कुछ कहा?"

"अम.. नहीं.. कुछ नहीं.."

फिर थोड़ा रुक कर,

"जेल में डालने के बाद?"

"सर, जेल में डाल देने के बाद तो और कुछ रह नहीं जाता. केस तो क्लोज़ हो गया न?"

"हम्म.. राईट! तुम्हारे दृष्टिकोण से सीमा वाला मामला तो क्लोज़ हो गया.... पर गाँव वाले मामले का क्या?"

"स..सर... ग.. गाँव व..वाला मामला?"

"हाँ.. गाँव वाला मामला."

"स.. सॉरी सर.. मैं स..समझा नहीं."

"श्याम!!... ये भूलने की बीमारी तुम्हें कब से लगी? हाँ?!"

श्याम सहम कर सिर नीचे झुका लिया.

रॉय ने फिर समझाया,

"मिथुन को तो सीमा ने मारा है ये मामला सुलझ गया. पर गाँव में और भी जो हत्याएँ हो रही हैं? जो मर्डर्स हो रहे हैं? उनका क्या?"

"ओह. यस सर.. जी सर... वो सब तो अभी भी बाकी हैं."

"इसलिए मैं कह रहा था कि सीमा वाले इस केस के बाद अपना सारा फोकस रुना, मीना और सुनीता की ओर कर दो. ध्यान रहे श्याम, गाँव में अब भी मौतें हो रही हैं और रुना अब भी संदिग्ध है. रुना के साथ साथ उसकी सहेली मीना पर भी नज़र रखना. दोनों काफ़ी अच्छी सहेली हैं. अगर गाँव में हो रही मौतों के साथ इनका किसी भी तरह का संबंध है तो एक पर नज़र रखने से दूसरे की भी कोई न कोई खबर निकल ही आएगी. और साथ में खबर रखना सुनीता का भी. वो भी मुख्य संदिग्ध है. कोई न कोई खबर ज़रूर मिलेगी उसके बारे में. मत भूलना कि उसे अक्सर ही वारदात वाले स्थानों के आस पास वारदात के पहले देखा गया है कई बार."

"जी सर. समझ गया. आप निश्चिन्त रहें सर. मैं कड़ी से कड़ी निगरानी करवाऊंगा."

"गुड. अब तुम जा सकते हो श्याम."

श्याम कुर्सी से उठ कर रॉय को सलाम ठोका और कमरे से निकल गया.

उसके जाते ही रॉय ने एक सिगरेट सुलगाया और उस रिकॉर्डिंग को फिर से सुनने लगा.
 
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इधर,

बाबा की कुटिया में,

"घेतांक?!! ये घेतांक कौन है गुरूदेव?"

बाबा का ध्यान समाप्त होते ही उनके मुँह से यह नाम निकला जिसे सुनकर उनके पास अब तक उनके साथ ही ध्यानमुद्रा में बैठे गोपू और चांदू चौंक गए और तुरंत ही प्रश्न कर बैठे.

बाबा के चिंतित मुँह से स्वतः ही उत्तर निकला,

"एक तांत्रिक.. यहीं.. इसी गाँव का रहने वाला... आज से कुछ वर्ष पहले तक रहता था... अब इस गाँव को छोड़ चुका है.. कुछ दिन पहले ही छोड़ कर गया है.. कई तरह की तांत्रिक क्रियाओं में सिद्धहस्त एवं बुरी शक्तियों का स्वामी."

"ग...गुरूदेव.. तो फिर... ये तांत्रिक......"

गोपू का प्रश्न पूरा होने से पहले ही बाबा बोल पड़े,

"ये सब... सब कुछ... उसी का किया धरा है."

"अर्थात्.. गुरूदेव?"

"अर्थात् इस गाँव में जो कुछ भी हो रहा है; इन सब के मूल में यही दुष्ट तांत्रिक है."

"ये दुष्ट तांत्रिक ही वास्तविक मूल है इन सब दुर्घटनाओं एवं हत्याओं के पीछे?"

"हाँ वत्स."

"परन्तु... गुरूदेव.. आपने तो कहा था कि कोई चंडूलिका है इन सबके पीछे?"

"चंडूलिका इन सबके पीछे अवश्य है वत्स.. उसका हाथ भी है इन सब घटनाओं में.. परन्तु वास्तविक मूल तो यही घेतांक नामक तांत्रिक है. वो चंडूलिका सिद्ध तांत्रिक है. उसी ने चंडूलिका को इन सब में लगाया है."

हरेक शब्द के साथ बाबा की चिंता की गहराईयाँ बढ़ती जा रही थीं.

इस बात को दोनों शिष्य भली भांति समझ रहे थे पर बाबा से अधिक प्रश्नोत्तर करना भी नहीं चाह रहे थे.. क्योंकि दोनों ही इस बात को बहुत अच्छे से समझ रहे थे की बाबा दिन-ब-दिन गाँव और गाँव वासियों के सुरक्षा को लेकर बहुत अधिक चिंतित होते जा रहे हैं.

"आपको क्या लगता है गुरूदेव; तांत्रिक के जाने के बाद भी ये चंडूलिका क्या स्वेच्छा से लोगों का शिकार कर रही है या तांत्रिक ने ही इसे इसी काम में लगा कर गाँव छोड़ कर चला गया है?"

"उस तांत्रिक घेतांक ने ही इसे इस घृणित कार्य में लगा छोड़ा है वत्स.. और ये मेरा अनुमान नहीं है.. मैं जानता हूँ की ऐसा ही हुआ है."

"और ये शौमक और अवनी; गुरूदेव?"

"जीवन के अंतिम क्षणों में वे दोनों अत्यंत भयभीत, दुखी एवं आकांक्षी थे... जीवन जीने की इच्छा बहुत बलवती थी उस समय; पर जी न सके. इसलिए मरणोपरांत इनकी आत्माएँ प्रतिशोध की भावना से भरी हुई है.. और यही कारण है की ये दूसरी आम आत्माओं से अधिक बलवान भी हैं.. लेकिन फिर भी चंडूलिका जैसी एक बड़ी शक्ति के सामने दोनों ही नतमस्तक हैं. चूँकि ये दोनों ही गाँव वालों से प्रतिशोध लेना चाहते थे इसलिए चंडूलिका ने इन्हें अपने अधीन रख लिया और इन्हीं के माध्यम से गाँव वालों को लुभा कर या किसी और तरह से फँसा कर मार रही है."

"इस सबसे चंडूलिका को क्या लाभ है, गुरूदेव?"

"मानव रक्त पी कर एवं स्तरीय स्तरीय आत्माओं को अपने अधीन कर वो और अधिक बलवती होना चाहती है. स्मरण रहे वत्स, चंडूलिका एक रानी चुड़ैल है. एक ऐसी शक्ति जिसे या तो भगवान या फिर कोई अत्यंत उच्च कोटि का सिद्ध पुरुष ही समाप्त या रोक सकता है."

"आप भी तो एक अत्यंत ही उच्च कोटि के सिद्ध महात्मा हैं गुरूदेव; आप भी तो समाप्त कर सकते हैं इसे."

"अवश्य ही कर सकता हूँ वत्स... (थोड़ा रुक कर)... लेकिन......"

"लेकिन क्या गुरूदेव?"

"गाँव में कुछेक और अनिष्ट होने की सम्भावना दिख रही है मुझे. ये मेरी कोरा आशंका नहीं अपितु विश्वास है क्योंकि गाँव के सभी लोग मेरा कहा, मेरा निर्देश नहीं मानेंगे... दुर्भाग्य है ऐसी जनता का, ऐसे लोगों का जो अपने हित की बातों को समय पर ना तो सुनते हैं और ना ही मानते हैं. जब भी थोड़ी पाबंदी लगाईं जाती है तो ये सोचते हैं की मानो उनका जीवन ही उनसे छीन लिया जा रहा है. इसी कारण छोटी सी लगने वाली संकट एक बड़ी भारी विपदा बन जाती है. और यही वो कारण है वत्स, जिससे की मैं आश्वस्त हूँ कि सभी मेरा निर्देश नहीं मानेंगे... और इसलिए कुछ अनिष्ट अवश्य होगा."

कहते हुए बाबा का चेहरा इतनी दृढ़ता से सख्त हो गया था की गोपू और चांदू को आगे कुछ और कहने-पूछने का साहस नहीं हुआ. इस बात को लेकर दोनों ही दृढ़ निश्चित थे कि अगर गुरूदेव ने कुछ अनिष्ट होने की बात कही है तो वो अवश्य ही होगा.

उसी दिन....

रात नौ बजे के आस पास जब सारा गाँव हमेशा की तरह शांत हो गया था...

अँधेरे में कालू मस्ती में डूबा अपने घर की ओर जा रहा था.

रोज़ की तरह आज भी अपना दुकान बढ़ा कर (बंद कर) के वो आजकल अपने नए ठिकाने; केष्टो दादा के दुकान में जाने लगा था.. सिर्फ़ चाय-ब्रेड-बिस्कुट ही नहीं अपितु, दारू और अंडा भी उपलब्ध रहता था वहाँ. अब हाई ब्रांड या विदेशी किस्म के दारू तो मिलने से रहे... इसलिए या तो सस्ते वाला लोकल दारू ही मिलता था वहाँ या फिर ताड़ी (एक पेय पदार्थ जिसे नशे के लिए पिया जाता है).

दुकान से निकल कर काफ़ी दूर तक निकल आने के बाद एक जगह अचानक से कालू के साइकिल का ब्रेक अपनेआप लग गया.

नशे में धुत कालू को कुछ समझ नहीं आया.

वो तो साइकिल पर ही थोड़ी देर खड़ा रह कर झूमता रहा.. जब थोड़ा होश हुआ तब पेडल मारा.. साइकिल आगे चल पड़ी.

मुश्किल से दस कदम चला होगा कि फिर ब्रेक लगा.. अपने आप.

कालू को अब भी कोई होश नहीं था. नशे में उसे तो यही लग रहा था की वो साइकिल तो चला रहा है पर शायद स्पीड थोड़ी कम है.

जब करीब पन्द्रह मिनट के बाद भी सामने दिख रहा आम का पेड़ पीछे नहीं हुआ तब कालू को थोड़ा होश हुआ... जितना भी होश हुआ उसमें उसे इतना महसूस हो गया कि उसके साइकिल में कुछ गड़बड़ है.

वो बैठे बैठे ही थोड़ा नीचे झुक कर ब्रेक और चेन को चेक किया.

दोनों को ठीक पाने पर वो फिर पेडल पर दबाव डाला...

साइकिल आगे बढ़ी.

फिर रुकी...

इस बार कालू बुरी तरह से झुंझला उठा.

कई गंदी गालियाँ देता हुआ वह साइकिल से नीचे उतरा और ब्रेक व चेन चेक करने लगा. सब ठीक था.

नशे में उसे होश तो नहीं था.. पर घर समय पर पहुँचने के लिए उसे होश में आना और रहना बहुत ज़रूरी था. और अब जिस तरह की दिक्कतें हो रही हैं इससे तो वह ऐसे घर पहुँचने से रहा.

अभी वो अपने इस ताज़े समस्या के बारे में सोच ही रहा था कि तभी उसका एक और साथी वहाँ साइकिल चलाता हुआ आ पहुँचा. ये सुधीर था. वैसे तो बड़ा व्यवहार-कुशल था; पर चरित्र से एक नंबर का ठरकी लड़का था. पहले शहर में टिकट ब्लैक किया करता था.. अब किसी कारणवश शहर छोड़ कर गाँव में ही रहते हुए कोई न कोई काम किया करता था.

कुछ देर पहले इसने भी कालू के साथ ही दारू पिया था. अंडे अलग से.

कालू को बीच रास्ते; जोकि वास्तव में एक पतली पगडंडी है; में खड़ा देख कर उसने भी साइकिल कालू के पास आ कर रोक दिया. कालू की आँखें ठीक से खुल नहीं रही थी. खड़े खड़े ही झूम रहा था. उसकी ये हालत देख कर सुधीर हँस दिया... कारण, सुधीर ने कालू से ज्यादा पिया था लेकिन होश अभी भी दुरुस्त था.

बड़े बदतमीजी से हँसते हुए पूछा,

"क्या हुआ हीरो? ऐसे अँधेरे में बीच रास्ते में क्या कर रहा है?"

"क..कुछ न..नहीं.. चेन उ..उतर गई है."

"किसकी?"

"किसकी म... मतलब... साला, साइकिल की उतरी ह.. है."

"अच्छा.. तो चढ़ा नहीं पा रहा है क्या?"

"ह्म्म्म.. अ... अगर.. चढ़ा ल.. लेता तो अ...अभी तक... ग.. घ... घर नहीं चला जाता."

कालू को सुधीर के बेतुके प्रश्नों पर बड़ा गुस्सा आ रहा था; और कोई समय होता और वो अगर नशे में नहीं होता तो शायद अच्छे से निपट लेता सुधीर से. पर करे भी क्या, उसे तो पता ही था कि सुधीर कैसा लड़का है. भले ही मज़े ले रहा है अभी... पर अगर सहायता की बात आई तो यही लड़का सबसे पहले आगे बढ़ कर आएगा.

सुधीर अगले दो मिनट तक कालू को देखता रहा.

समझ गया की अगर इसकी सहायता नहीं की गई अभी तो शायद रात भर यहीं रह जाएगा.

इसलिए वो अपने साइकिल से उतरा और कालू को एक ओर होने को बोल कर खुद उसके साइकिल की चेन चेक करने लगा. चेन देखते ही बोला,

"अबे बोकाचोदा, चेन तो बिल्कुल ठीक है. तुझे कहाँ से ये उतरा हुआ लग रहा है बे?"

कहते हुए वो उठ गया और साइकिल के दूसरे हिस्सों को देखने लगा किसी सम्भावित गड़बड़ी को देखने के लिए. कालू तब तक अपने बायीं ओर थोड़ी दूर पर स्थित एक पेड़ के पीछे मूतने चला गया था.

और इधर सुधीर कालू की साइकिल की जाँच परख कर रहा था.

पर ऐसा कुछ मिला नहीं.

अभी वो आगे कुछ सोचे या बोले; तभी उसे पायल की आवाज़ सुनाई दी. वो जल्दी पलट कर अपने पीछे देखा; जहाँ से वो और कालू आये थे.

पीछे देखते ही उसकी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं.

कुछ क्षणों के लिए उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि वो जो देख रहा है वो वास्तविक है या फिर उसे भी थोड़ी थोड़ी कर के चढ़नी शुरू हो गई है.

पीछे से एक बहुत ही सुन्दर महिला धीमे क़दमों से चलती हुई आ रही थी.

हालाँकि उसने घूंघट किया हुआ था परन्तु घूंघट पूरी तरह से चेहरे को ढक नहीं रही थी. बदन पर साड़ी बहुत ही अच्छे से फिट बैठ रही थी लेकिन सुधीर जैसे लड़के फिगर का अंदाज़ा किसी न किसी तरह से कर ही लेते हैं.

और सुधीर को वह वाकई भा गई.

बिना चेहरा देखे केवल शरीर पर कस कर फिट बैठते कपड़ों से फिगर का अनुमान लगा कर ही उसका दिमाग ख़राब होने लगा था और कमर के नीचे वाले हिस्से में हलचल होने लगी.

उस महिला ने एक बार बस एक क्षण के लिए नज़रें फेरा कर सुधीर की ओर देखी और फिर आगे चल पड़ी. जैसे ही वो सुधीर के बगल से गुजरी; सुधीर को एक बहुत ही मदमस्त कर देने वाला बहुत प्यारी सी सुगंध का आभास हुआ. आज से पहले कभी इतनी अच्छी सुगंध उसके नाक से कभी नहीं टकराई थी.

वो बरबस ही उसकी ओर आकर्षित होने लगा.

जब महिला थोड़ा ओर आगे बढ़ तब सुधीर को होश आया और तुरंत अपनी साइकिल लेकर उस महिला के पीछे चल दिया.

महिला के पास पहुँच कर अपनी साइकिल को धीरे करते हुए बोला,

"आप इसी गाँव की हैं?"

उसके इस प्रश्न पर महिला की ओर से कोई उत्तर न आया.

सुधीर ने फिर पूछा.

महिला फिर भी कुछ न बोली; केवल अपने सिर को थोड़ा नीचे कर ली.

तीसरी बार पूछे जाने पर धीमे और शरमाई स्वर में बोली,

"जी."

उसकी आवाज़ शहद सी मीठी थी.

सुधीर को इतनी अच्छी लगी कि वो उससे और बातें करने की सोचने लगा.

इधर पेड़ के पीछे से कालू सुधीर की इन हरकतों को देख रहा था.. और नशे में ही मन ही मन हँसते हुए उसे गाली दे रहा था कि जहाँ नारी दिखी वहीँ जोगाड़ लगाना शुरू कर दिया कमीने ने.

कालू ने देखा की सुधीर और वो महिला कुछ कदम आपस में कुछ बातें करते हुए चले.. फिर रुक गए... कुछ और बातें हुईं... और अचानक से वो महिला सड़क की दूसरी ओर बेतरतीब उगी हुई झाड़ियों के पीछे चली गई.

सुधीर पीछे मुड़ कर देखा.. कालू अभी भी पेड़ के पीछे ही था. सुधीर को बस उसकी बीच पगडंडी पर खड़ी साइकिल दिखी. कुछ क्षण कालू की साइकिल को देख कर कुछ सोचता रहा.. फिर उन झाड़ियों की ओर देखा जिधर वो महिला अभी अभी गई.

कुछ पल और सोचने के बाद सुधीर भी अपनी साइकिल को उसी ओर ले कर बढ़ गया जिधर वो महिला गई थी.

करीब पाँच मिनट बीत गए.

सुधीर नहीं लौटा.

नशे में भी कालू को थोड़ी चिंता हुई.

जब पाँच मिनट और बीत गए और सुधीर फिर भी नहीं लौटा तब कालू ने जा कर देखने का सोचा की आखिर बात क्या है. अगर इन्हीं कुछ पलों में सुधीर ने उस महिला को पटा लिया है तो फिर ठीक है... नहीं तो मामला गड़बड़ है.

साइकिल बिना लिए ही कालू आगे बढ़ने लगा... धीमे चाल से.

झाड़ियों के पास जा कर उसने बहुत आहिस्ते से इधर उधर देखना शुरू किया. हालाँकि नशे में होने के कारण उसके द्वारा ये सब करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था परन्तु इन सब में उसे एक अलग ही मज़ा आने लगा था अब तक.

जल्द ही उसे झाड़ियों की ही झुरमुठ में एक ओर कुछ हलचल होती दिखी. दूर के एक स्ट्रीट लाइट की धुंधली रौशनी में उस ओर देखने में थोड़ी आसानी हुई.

उन झाड़ियों से वो मुश्किल से ३ - ४ फीट की दूरी पर होगा की अचानक ही उसे एक मरदाना स्वर में 'आर्र्ग्घघघघघर्घ' सुनाई दिया.

ध्यान से ओर जब कालू ने देखा तो उसे वाकई बहुत ज़ोर की हैरानी हुई. इसलिए नहीं की उसने कुछ अलग देखा... बल्कि इसलिए की वो जो संदेह कर रहा था; वही सच हो गया.

उसने देखा कि सुधीर और वो महिला परस्पर आलिंगनबद्ध थे... दोनों कामातुर हो कर एक दूसरे का चुम्बन लिए जा रहे थे... इस बात से पूरी तरह बेखबर की अभी इस समय भी कोई आ कर शायद उन्हें देख सकता है.

सिर्फ़ यही नहीं... इतनी ही देर में सुधीर ने अपना जननांग उस महिला की योनि में प्रविष्ट करा चुका था तथा धीरे और लम्बे धक्के लगा रहा था. उस धुंधलके रौशनी में भी उस महिला के सुधीर के कमर के पास से ऊपर की ओर उठे उसके दोनों गोरे पैर बहुत अच्छे से दिख रहे थे.

महिला स्वयं भी पागलों की तरह सुधीर के चेहरे, गले और कंधे पे चुम्बन पर चुम्बन लिए जा रही थी और अपने हाथों को सुधीर के पूरे नंगे पीठ पर चला रही थी और रह रह के अपने लाल रंग के नेलपॉलिश से रंगे नाखूनों को उसके पीठ पर जहाँ तहां गड़ा देती.

सुधीर का भी इधर हालत ख़राब भी था और पागल भी. उस महिला का ब्लाउज तो उसने खोल दिया था पर शरीर से अलग नहीं किया. धक्के लगाते समय रह रह के वो भी कस कर उस महिला को अपने बाँहों में भर लेता था. उसने अपने हाथों को ब्लाउज के ऊपर से उसकी नंगी पीठ पर रगड़ना जारी रखा.

उसका मुँह उस महिला की क्लीवेज पर चला जाता और स्वतः ही उसके काँपते होंठ उसके क्लीवेज और स्तनों की मुलायम गोरी त्वचा से जा मिलते. उस मुलायम त्वचा से होंठों का स्पर्श होते ही दोनों ही लगभग एक साथ एक गहरी सिसकारी लेते और फिर सुधीर तुरंत ही उस पूरे अंश को चूमने - चाटने लग जाता.

काफ़ी देर तक ऐसा ही चलता रहा...

अचानक उस महिला ने एक ख़ास करवट ली और सुधीर के कानों में कुछ बोली.

जवाब में सुधीर मुस्कराते हुए धक्के लगाना छोड़ कर उठ बैठा और उसके ऐसा करते ही महिला उसके सामने उसके गोद में आ बैठी.

अब दोनों एक दूसरे की ओर सीधे देख सकते थे... महिला बिल्कुल सुधीर के कमर के ठीक नीचे बैठ गई थी... उसके जननांग के ठीक ऊपर.

कुछ क्षण एक दूसरे को काम दृष्टि से देखने के बाद झट से दोनों फिर से पागलों की तरह एक दूसरे को चूमने लगे. थोड़ी देर इसी तरह चूमते रहने के बाद वो महिला रुकी; पीछे की ओर झुक गई, लेकिन सुधीर ने उसे कमर से कस कर पकड़े रखा.

किसी हिंसक भूखे जानवर की मानिंद सुधीर आवाज़ निकालता हुआ फिर से झपट पड़ा सामने मुस्तैदी से खड़े - निमंत्रण देते दोनों गौर वर्ण चूचियों पर टूट पड़ा और एक एक को चूस चूस कर लाल करते हुए दूसरे चूची को बड़ी निर्दयता से मसलने लगता.

कालू ने जैसे ही उन गोरे स्तनद्वय पर गौर किया; उसका तो कंठ ही सूखने को आ गया. महिला की दोनों सफेद स्तनों को आज से पहले कभी उसने इतने उचित आकार के हल्के भूरे रंग के निपल्स के साथ नहीं देखा था.

इतने भरे, इतने पुष्ट इतने सुंदर आकार से बड़े बड़े.... उफ्फ्फ...!!

वो महिला बड़े आराम से, समय लेते हुए सुधीर के उस लौह अंग के ऊपर नीचे हो रही थी... और इधर सुधीर ने अपना मुंह उसके गोरे स्तनों पर रख करजीभ से ही उसे सहलाना शुरू कर दिया.

लेकिन जैसा की स्पष्ट था कि इतने सुंदर चूचियाँ मिलने पर कोई भी सिर्फ़ सहलाने तक ही सीमित नहीं रहने वाला... वही हुआ भी... सुधीर दोनों चूचियों के निप्पल को मुँह में भर कर ज़ोरों से आवाज़ करते हुए चूसने लगा और दोबारा उतनी ही निर्दयता से उन्हें मसलने लगा.

इसी तरह यह दृश्य अगले करीब आधे घंटे तक चलता रहा.

एक समय पर सुधीर अपने चरम पर पहुँच कर झड़ने ही वाला था कि उस औरत ने उसे रोक दिया..

सुधीर की गोद से उठ गई.

उसकी इस हरकत पर कालू और सुधीर दोनों ही बड़े आश्चर्यचकित हो गए.

क्या बात है? क्या करने वाली है ये?

अगले ही पल जो हुआ... उसके बारे में दोनों ने ही कोई कल्पना नहीं की थी.

औरत थोड़ा पीछे हट कर दोबारा बैठी... और बैठे बैठे ही पीछे होते हुए घोड़ी बन गई... और फिर कामातुर नेत्रों से सुधीर की ओर देखते हुए उसके जननांग को अपनी दायीं हाथ की हथेली में अच्छे से मुट्ठी बना कर पकड़ी और फिर एक भूखी शेरनी की तरह उस लौह अंग को लालसा भरी आँखों से देखने लगी. सुधीर की ओर क्षण भर देख कर; एक शैतानी मुस्कान होंठों पर लाते हुए वो उस अंग के मुंड पर हलके से अपनी जीभ फिराई.

उसकी वो लंबी जीभ देख कर कालू का दिमाग घूम गया.. कम से कम एक हथेली बराबर होगी वो जीभ!

वह जीभ बड़े प्यार से, धीरे धीरे सहलाते हुए बार बार उस जननांग के मुंड को छू रही थी और उसके प्रत्येक छूअन से सुधीर के पूरे शरीर में... अंग अंग में... एक कंपकंपी दौड़ जाती.

वो तो बेचारा समस्त तेज़... पूरा का पूरा वीर्य उस कोमल, गर्म योनि में उड़ेल देना चाहता था.. पर इस कमबख्त महिला ... ख़ूबसूरत महिला ने उसे ऐसा करने से मना करने के बाद अब उसके गुप्त अंग से इस प्रकार प्रेम जता रही थी मानो वर्षों से प्यासी रही हो.

उस औरत का प्रेम उस अंग पर धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा था. उसने सुधीर के जननांग की ऊपरी चमड़े से शुरू कर अंदरूनी त्वचा को चाटना शुरू कर दिया. उसके ऐसा करते ही सुधीर की एक तेज़ सिसकारी निकल गई. उसके इस कृत्य ने उसे असीम आनंद दिया.

सुधीर ज़मीन पर उगी बड़ी बड़ी घासों को कस कर पकड़ा और सिर ऊपर आसमान की ओर कर दिया.

जी भर के चाटने के बाद अब जी भर कर चूसने का दौर शुरू हुआ. पहले मुंड को १०-१२ मिनट तक कामाग्नि में जलती किसी नवयौवना की भांति चूसती रही.. और फिर उस पूरे के पूरे अंग को अपने मुँह में गायब करती चली गई.

जैसे जैसे जननांग उसके मुँह में घुसता जाता; सुधीर तो सुख के मारे तड़प उठता ही.. कालू को भी पता नहीं क्यों ऐसा सुख मिलता जैसे सुधीर को भी मिल रहा है.

हर बार महिला अपने जीभ के अग्र भाग से जननांग के नीचे से ऊपर तक अत्यधिक प्रेम में डूबे भावुक - कामुक कामसुख प्यासी प्रेयसी की भांति चाटती हुई आती और मुंड पर आते ही एक प्यारी सी चुम्बन दे कर पूरे अंग को मुँह में गायब कर लेती.

और फिर वो क्षण भी जल्दी ही आया जब सुधीर का मांसल अंग उस महिला की मुँह की गहराईयों में बहुत अंदर तक जाने लगा. उसके गले पर उभर आती नसें और आगे की ओर उबल पड़ती आँखें साफ बता देती कि ये महिला न सिर्फ़ सुधीर को डीप थ्रोट मुखमैथुन दे रही है; वरन इस क्रीड़ा में काफ़ी खेली - खिलाई खिलाड़ी है.

उस औरत की एक ओर कृत्य ने सुधीर के सुख की सीमाओं को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया. वो औरत उसके अंग को पूरी तरह से अपने मुँह में तो भर ही रही थी... अब मुँह में घुसाने के साथ ही साथ जीभ से जननांग के निचले भाग को बड़े कामुक तरीके से सहला दे रही थी.

इस कृत्य ने चरम आनंद से सुधीर के शरीर के समस्त रोम रोम को खड़ा करने लगी. सुधीर के मुँह से आनंद की अधिकता के कारण 'आह आह' निकलने लगी.

इस रोमहर्षक आनंद ने सुधीर को अधिक देर तक मैदान ए जंग में टिकने न दिया...

वीर्यपात हुआ...

महिला के मुँह में ही...

दोनों ने ही सोचा की शायद वो गुस्सा करेगी, बिफर कर कुछ बोलेगी... पर नहीं...

ऐसा कुछ नहीं हुआ...

वरन, जो हुआ वो बिल्कुल उलट हुआ..

वो बड़े प्रेम से स्वाद ले ले कर समस्त वीर्य को पी गई... यहाँ तक की होंठों और जननांग से बह कर नीचे गिरते वीर्य को कुछ अंश और बूँदों तक को चाट गई.

उसके इस रूप को देख कर सुधीर और कालू; दोनों को ही आश्चर्य का ठिकाना न रहा. कोई औरत ऐसी भी हो सकती है... इस तरह से स्वाद ले कर कामसुख दे सकती है ये कभी नहीं सोचा था उन्होंने... सोचना क्या... इस तरह के विचार आधुनिक दुनियादारी से बेखबर दूर गाँव में बसने वाले इन युवकों के मन में कैसे व कहाँ से आयेंगे?

शरारती नज़रों से देखते हुए बड़े कामुक स्वर में सुधीर को बोली,

"कैसा लगा?"

सुधीर उसकी ओर मन्त्रमुग्ध सा देखता हुआ बोला,

"बहुत अच्छा..."

"बस, बहुत अच्छा?"

"सच कहूँ तो मुझे पता ही नहीं की इस अप्रतिम सुख का मैं किन सठीक शब्दों में विवरण दूँ.... तुम्हारी काम कुशलता का किन शब्दों में प्रशंसा करूँ?!"

सुधीर की इन बातों को सुन कर औरत खिलखिला कर हँस पड़ी. उसकी हँसी वातावरण में ऐसी गूंजी की मानो शरीर की कुल्फी ही जमा देगी.

हँसते हुए बोली,

"प्रशंसा के शब्दों के मोती आप अपने पास रखिए... मुझे तो बस वो दीजिए जिसका आपने कुछ देर पहले वादा किया था! याद है न आपको कि आपने क्या वादा किया था??"

"बिल्कुल.. मैंने जब आपसे ये सब के लिए कहा तब आप इस शर्त पर राज़ी हुई थी की ये सब करने के बाद आप मुझसे जो माँगेगी वो मुझे आपको देना होगा."

ये सुनने के बाद वो औरत किसी भोली मासूम लड़की की तरह बोलने लगी,

"तो क्या आप तैयार हैं देने के लिए?"

"बिल्कुल!"

"पक्का?"

"हाँ."

"सहमति दे रहे हैं न आप?"

"हाँ.. पर ये तो बताइए की आपको चाहिए क्या?"

"आपके प्राण!"

सुनते ही सुधीर सकबका गया.

"क.. क्या...??"

सुधीर को सकपका कर उसके चेहरे के रंग बदलते देख वो औरत एकबार फिर खिलखिला कर हँस पड़ी...

उसकी हँसी में एक खिंचाव तो था..पर खून जमा देने वाला भी था!

अचानक कालू ने जो देखा उससे तो उसका सारा नशा ही एक झटके में उड़ गया.

उसने देखा की उस धुंधले रौशनी में भी उस औरत की आँखें बहुत भयावह तरीके से चमकने लगी है. उसके आँखों की काली मोती धीरे धीरे सुर्ख लाल में बदलते हुए मानो जल रहे हैं... साथ ही आँखों का सफ़ेद अंश काला पड़ता जा रहा है.

सुधीर का तो डर के मारे गला ही सूख गया.. वो हड़बड़ा कर उठ कर भागने को मुश्किल से उठा ही था कि उस महिला ने सुधीर का एक पैर पकड़ कर एक ज़ोर का झटका देते हुए सुधीर को उसके उसी स्थान पर यथावत गिरा दिया.

उस महिला के हाथों के नाखून एकदम से बहुत बढ़ गए... और उतने ही तेज़ और नुकीले भी.

एक क्षण भी व्यर्थ न गंवाते हुए उसने दाएँ हाथ की तर्जनी ऊँगली की नाखून का एक ज़ोरदार वार करते हुए सुधीर के गले के बाएँ ओर से घुसा कर दाएँ ओर से निकाल दी.

सुधीर की आँखें गोल और बड़ी हो कर आगे की ओर उबल आने को हो पड़ी.

तर तर कर के रक्त बहने लगा.

पीड़ा से विह्वल सुधीर बेचारा कराह भी नहीं पा रहा था.

और वो औरत उसकी ये तड़प देख बहुत खुश हो गई.. होंठों पर एक बड़ी सी शैतानी मुस्कराहट आ गई. इस बड़ी मुस्कराहट के कारण उसके सामने के कुछ दांत दिखाई दिए जो बड़े भयावह रूप से बड़े और अद्भुत सफेदी लिए चमक रहे थे.

और तभी!!

एक तेज़ झटके से वो अपने नख सुधीर के गले से सामने की ओर निकाल ली और उसके इस कृत्य से सुधीर का गला सामने से बुरी तरह से फट गया. सुधीर अपने फटे गले को दोनों हाथों से पकड़ कर तड़पते हुए लेट गया और कुछ देर बिन पानी मछली की भांति तड़पते हुए ही मर गया.

वो औरत अब और भी भयानक रूप से हँसते हुए सुधीर के गले से बहते रक्त को अपने दोनों हथेलियों में भर कर रक्तपान करने लगी. बहुत देर तक रक्तपान करने के बाद वो बड़े आराम और कामुक ढंग से अंगड़ाई लेते हुए उठी और अपने कपड़ों को ठीक कर के झाड़ियों से निकल कर पगडंडी पर आगे की ओर बढ़ गई.

झाड़ियों से निकलते समय दूर स्ट्रीट लाइट और ऊपर चंद्रमा की धुंधली रौशनी उस औरत के चेहरे से टकरा कर जब उसके मुखरे को थोड़ा स्पष्ट किया तब उसे देख कर कालू को जो घोर आश्चर्य हुआ वो हज़ारों शब्दों में भी बता पाने योग्य नहीं था. चाहे जितने भी शब्द उठा कर कालू को दे दिए जाते; कालू फिर भी अपने जीवन के इस क्षण और इस आश्चर्य का वर्णन नहीं कर पाता.

बस एक ही शब्द ने ज़ोरों से धड़कते उसके ह्रदय के किसी कोने में किसी तरह से साँस लिया,

"रूना भाभी!!"
 
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