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Horror नदी का रहस्य (Completed)

हम सभी को पता है कि यहां कोई स्टोरी लिखने से उजरत नहीं हासिल होने वाली है.... कोई अवार्ड भी नहीं मिलने वाला है इसके बावजूद भी यहां लोग लिखते हैं.... किसलिए ?

अपनी दबी हुई लालशा को उजागर करने के लिए.... अपने अरमानों को... अपने लिखने के हूनर को इस फोरम के द्वारा पाठकों तक पहुंचा सकें ।

मैंने पहले भी कहा था कि बुक्स प्रोडक्ट होता है , राइटर्स मैनुफैक्चरर होता है और रीडर कंज्यूमर होता है - अगर रीडर ही न रहे तो फिर राइटर्स और उनके बुक्स का क्या काम !

रीडर के किसी भी प्रश्न का उत्तर देना राइटर्स का पहला कर्तव्य होता है ।
आप अच्छा लिखते हो....इसको मैंने ही नहीं बल्कि इस फोरम के कई लोगों ने माना है लेकिन इसका मतलब ये नहीं हुआ कि आप रीडर के भावनाओं से खिलवाड़ करें ।

इसी फोरम पर एक लड़की ने कहानी लिखी थी.... उसकी ये पहली कहानी थी.... कहानी अच्छी चल रही थी.... कमेन्टस भी अच्छे अच्छे आ रहे थे.... लेकिन एकाएक लोगों ने उसके कहानी पर अपशब्दों का इस्तेमाल शुरू कर दिया...... उसकी गलती सिर्फ यही थी कि उसने " इन्सेसट " का टैग डालकर " एडल्टरी " में लिखना शुरू कर दिया ...... ये एक मामूली सी गलती थी लेकिन रीडर ने उसकी ऐसी की तैसी कर दी ।...... कोई दूसरा राइटर्स होता तो पता नहीं क्या करता ? लेकिन उस लड़की ने बहुत ही मासुमियत से अपने गलती की माफी मांगी..... उनसे भी जिन्होंने उस पर बहुत ही खराब कमेन्टस किए थे ।.......... सच कहूं तो राइटर्स ऐसे होते हैं ।
 
प्रिय महान रीडर,

सर्वप्रथम आपको मेरा सादर प्रणाम,

अब, मुद्दे की बात... कल रात से ही मैं आपके इस टिप्पणी को पढ़ रहा हूँ... समझ में नहीं आ रहा है की आपके इस प्रतिक्रिया का कारण क्या है?

अव्वल तो जिसने जैसा पूछा / बोला, मैंने उसे वैसा ही उत्तर दिया. हल्के ढंग से. इसमें किसी के भी भावनाओं के साथ खिलवाड़ कहाँ हुआ? ये बात लाख सोचने पर भी मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है. यहाँ तक की जिन्हें बोला उन्होंने तक भी इसे अपने ढंग से बड़े हल्के से लिया. निर्मल जल की भांति स्पष्ट है की सब मेरी टांग खिंचाई कर रहे हैं जोकि चलता है... आम बात है. पाठक तो लेखक पर इतना अधिकार तो रखते ही हैं.

फिर भी यदि किसी को उत्तर सुनने / जानने / पढ़ने से संकोच होता है तो फिर वो क्यों कुछ पूछे / बोले? जैसा चल रहा है; चलने दें.

अब क्रमवार कुछ चीज़ों को स्पष्ट करना चाहूँगा..

पहला, 'लालशा' नहीं 'लालसा' है सही शब्द.

दूसरा, यदि 'लिखना' जानते हैं तो कहीं भी... किसी भी फोरम पर लिखा जा सकता है... चाहे अंदर की भावना, अरमान या (आपके अनुसार) 'लालशा' कैसी भी हो.

तीसरा, 'लिखने का हुनर' कहीं भी जाँचा, परखा और विकसित किया जा सकता है. इसके लिए किसी विशेष साईट या फोरम पर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है.

चौथा, ये वाला पढ़ कर थोड़ा अजीब लगेगा पर है सौ प्रतिशत सत्य... और वो ये कि 'रीडर के किसी भी प्रश्न का उत्तर देना राइटर्स का पहला कर्तव्य होता है ।'... ये सही नहीं है.. एक लेखक किन किन पाठकों के किन प्रश्नों का उत्तर देगा या नहीं देगा ये संपूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत चुनाव व पसंद - नापसंद पर निर्भर करता है.

पाँचवां, 'रीडर्स' 'राइटर्स' तक यहाँ बात ठीक है.. परन्तु 'बुक्स' नहीं.. क्योंकि ये एक साईट प्रदत्त फोरम है... अतः बात को उसी संदर्भ में ही रखा जाए तो बेहतर है.

छठा, 'मैं अच्छा लिखता हूँ' इस बात को वाकई बहुत से लोगों ने माना व स्वीकारा है एवं सुंदर शब्दों से भूरि भूरि प्रशंसा भी की है. इस बात के लिए मैं उन लोगों का समय समय पर आभार जताता रहा हूँ और आगे भी आभार जताता रहूँगा.

सातवाँ, जिस लड़की व उनके द्वारा लिखी हुई कहानी का चर्चा किया है आपने; जिसपे पाठकों ने अपशब्दों का प्रयोग किया था... इस बात को मानने में थोड़ी कठिनाई है..क्योंकि ये एक ऐसा साईट / फोरम है जहाँ आपसी प्रतिक्रियाओं / टिप्पणी पर यहाँ के एडमिन कड़ी दृष्टि रखते हैं और यदि अनुचित टिप्पणी... या अपशब्द दिखे तो उसे तुरंत हटाते हैं एवं उपयोगकर्ता को भी चेतावनी देते हैं... कभी कभी तो उपयोगकर्ता को ही बैन कर दिया जाता है. मैंने स्वयं अपनी इसी कहानी / थ्रेड में ऐसा ही एक ज्वलंत उदहारण देखा है.

फिर भी यदि ऐसा कुछ हुआ तो कृप्या उस कहानी का लिंक देने का कष्ट करें. मेरे साथ साथ यहाँ के दूसरे पाठकगण भी उस कहानी को पढ़ना चाहेंगे.

नौवां, 'राइटर्स' कौन और कैसे होते हैं.. इस बात को कृप्या अपने तराज़ू पर रख कर निर्णय न करें. आपकी जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि भले ही इस साईट / फोरम में मैं नया हूँ, पर लेखन कार्य से मैं पिछले कई वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ. कई गणमान्य लेखकों के साथ चिट्ठी-पत्री व उठना - बैठना है. उनमें से एक Bhaiya Ji भी हैं. कई मैगज़ीनों में मेरे लेख प्रकाशित हो चुके हैं. इसलिए आपके तराज़ू में मैं फिट नहीं आऊँगा. और कल के आपके इस बचकानी आरोपयुक्त टिप्पणी से इस बात का भली भांति आंकलन हो गया है कि मैं आपके व्यक्तिगत अनुभव व दृष्टिकोण से मीलों आगे हूँ. (स्वयं की प्रशंसा नहीं कर रहा, जो सत्य प्रतीत हो रहा है; वही कह / लिख रहा हूँ.)
 
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"गुरूदेव... मुझे बचा लीजिए गुरूदेव... मैं जीना चाहता हूँ गुरूदेव."

"शांत... शांत हो जाओ वत्स.. पहले शांत हो कर बैठो तो सही."

बाबा जी ने डर से काँपते कालू के सिर पर हाथ रखते हुए कहा. कालू बहुत डरा हुआ था. बुरी तरह काँप रहा था. होश उड़े हुए थे उसके. चेहरा सफ़ेद सा पड़ चुका था और पसीने से तर था.

सिर पर बाबा के हाथ का स्नेहमयी स्पर्श पा कर शांत होने का व्यर्थ प्रयास करने लगा कालू पर भय में रत्ती भर की भी कमी न आई.

पहले की अपेक्षा उसे अब थोड़ा शांत होता देख बाबा ने बहुत स्नेह से पूछा,

"वत्स.. अब बोलो.. क्या बात है?"

"ग..ग...ग...गुरु...गुरूदे... गुरूदेव... व..व..वो.. म..म..मार... मार देगी... मार डालेगी... म...मु..मुझे भी.."

"कौन मार देगी?"

बाबा ने स्नेहिल ढंग से ही पूछा परन्तु अब स्वयं को कालू की बातों में थोड़ा केन्द्रित भी कर लिया,

कालू पूर्ववत् काँपते हुए ही उत्तर दिया,

"न..नाम... न...नहीं बताऊंगा..."

"क्यों?"

"क...क्योंकि....क...क्यों...कि..."

"आगे बोलो वत्स... क्योंकि....??"

"क्योंकि... व.. वो... म..मुझे... म.. म.. मा... मार डा.. डालेगी... गुरूदेव.... म..मुझे बचा... ल...लीजिए... ग..गुरूदेव..."

अब की बार तो लगभग रो ही पड़ा कालू.

उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा ने बड़े अपनेपन से कहा,

"देखो वत्स.. अगर तुम नाम नहीं भी बताओगे... तो भी वो तुम्हें मार देगी... हैं न... क्योंकि उसका तो कदाचित लक्ष्य तो तुम अब बन ही गए हो... यदि नाम बता दोगे तो कदाचित मैं तुम्हारी कोई सहायता कर पाऊं. बोलो वत्स... कौन है वो जिसे तुम्हारे प्राण चाहिए?"

"भ.. भा... भाभी."

"भाभी? कौन भाभी?"

"र..र....."

"बोलो वत्स.. कौन भाभी?"

"र...रुना भाभी."

"रुना भाभी??"

"ह... हा.. हाँ ग..ग.. गुरूदेव...."

"रुना भाभी.. अर्थात् गाँव की शिक्षिका?"

"ज.. जी.. गुरूदेव.. पहले ग... गाँव में पढ़ाती थ.. थी..."

"अब नहीं पढ़ाती?"

"पढ़ाती ह.. है."

"अभी तो तुमने कहा कि वो पहले पढ़ाती थी?"

"अ.. अब.. शहर में... छ... छोटे ब...ब... बच्चों के स्कूल में..."

"ओह.. अच्छा..!"

"ज.. जी.. ग.. गुरूदेव."

एक क्षण रुक कर बाबा जी ने फिर पूछा,

"हम्म... अच्छा वत्स.. तुमने ये तो बता दिया की तुम्हें कौन मारना चाहती है.. अब ये तो बताओ की वो तुम्हें क्यों मारना चाहती है?"

"क....क.. क्यों... क्योंकि......"

"हाँ वत्स, बोलो... डरो नहीं."

"क.. क्यों...कि... म.. मैंने उ...उसे मारते उ... उन्हें दे देख लिया थ.. था."

"किसे मारते किसे देख लिया?"

"र.. रुना भाभी को दे.. देखा... स.. सुधीर को....मारते हुए.. अ... और.... ब.. बब्लू को भी."

"बब्लू?"

"ज... जी.. स...सुधीर को मारने के अगले तीन र.. रात बाद बब्लू को भी मार दिया उन्होंने."

"किसने? रुना भाभी ने?"

"जी गुरूदेव."

"ओह्ह."

कह कर बाबा जी चुप हो गए.

पूरा मामला तो उन्हें बहुत हद तक बहुत स्पष्ट तो था ही... बस ये नया काण्ड उन्हें थोड़ा परेशान कर दिया.

अगले कुछ मिनटों तक बाबा जी को कुछ न बोलते देख कर कालू ने रोते हुए उनके पैर पकड़ लिया,

"गुरूदेव.. गुरूदेव... मुझे बचा लीजिए गुरूदेव.. म.. मैं न... नहीं मरना... चाहता.. गुरूदेव."

रोते बिलखते कालू के सिर पर हाथ रखते हुए बाबा जी अत्यंत शांत व धीर-गम्भीर स्वर में बोले,

"अब जब हमारे पास आए हो तो हम तुम ऐसे ही कुछ नहीं होने देंगे. शांत हो जाओ.. रोना बंद करो."

बाबा जी के कहने पर कालू ने धीरे धीरे रोना तो बंद किया पर सिसकियाँ अब भी चालू थीं.

इधर बाबा जी भी चुपचाप बैठे हुए थे...

उन्हें चिंतामग्न देख चांदू से न रहा गया. समीप आ कर पूछा,

"क्या बात है गुरूदेव? आपको किस चिंता ने इतना चिंतित कर दिया है?"

"अंह?!... ओह.. कुछ नहीं." बाबा जी जैसे गहरी चिंता से बाहर आए.

कालू की ओर देखते हुए पूछा,

"तुम्हें रुना ने कब देखा था? सुधीर को मारते समय या बब्लू को?"

"सुधीर को म... मारते समय शायद... उन..उनको स.. संदेह... रहा ह... होगा की कोई उन्हें द.. दे.... देख र.. रहा है... पर बब्लू को म.. मारते समय... म.. मु... मुझे.... म.. मे... मेरी ओर देखते हुए ही उ.. उसे... मारी."

"बब्लू को कैसे मारा उसने?"

"ग.. गर्दन... स... से रक्त... च..चूसते ह...हुए."

"और?"

"और....??"

"मतलब फिर क्या किया उसने?"

"म.. मे...मेरी ओ.. ओर दे.. देख कर मुस्कराई अ... और चेहरा पोंछते हुए चली गई. उसकी वो मुस्कान और भयानक रूप... म.. मुझसे भ... भूले... नहीं भूलती... गुरूदेव."

"क्या बब्लू को मारने से पहले... अ.. अच्छा छोड़ो... (गोपू की ओर देख कर बाबा ने एक विशेष संकेत किया जिसपे गोपू ने भी हाँ में सिर हिला कर स्वीकृति दिया)... ये बताओ कि क्या उसने तुम्हें कुछ कहा था जाने से पहले?"

"नहीं गुरूदेव."

"अच्छे से याद है?"

"ज.. जी गुरूदेव."

"ह्म्म्म.. कोई अनोखी बात... कोई भी ऐसी बात जो तुम्हें उसमें बिल्कुल ही अलग दिखा या लगा हो?"

"ग.. गुरु... देव.. रुना भाभी हत्याएँ कर रही हैं.... र.. रक्त पी रही हैं... इससे ब... बड़ा अलग और अ.. अविश्वसनीय बात और क्या होगा मेरे लिए.. या.. किसी के लिए भी."

कालू का उत्तर सुन कर बाबा जी चुप हो गए.

सत्य भी है, जिसे समस्त ग्रामवासी हमेशा से एक सुसंस्कृत, शिक्षित व समाज को एक नूतन दिशा - पथ दिखाने वाली जानता - मानता आया हो; उनके लिए रुना का यह रूप वास्तव में ही बहुत ही अविश्वसनीय होगा.

कुछ सोच कर बाबा जी कालू को बोले,

"सुनो कालू, क्या तुमने इन घटनाओं की चर्चा किसी से की है अभी तक?"

"न.. नहीं गुरूदेव."

"हम्म.. वाह! बहुत अच्छा. करना भी नहीं."

"क.. क्यों गुरूदेव?"

"किसी से इस घटना की चर्चा जब तक तुम नहीं करोगे.. तब तक तुम सुरक्षित रहोगे."

"सच में.. गुरूदेव?"

"बिल्कुल."

"प.. पर.. वो मेरी... ओर...."

"अब और कोई प्रश्न नहीं वत्स, जाओ.. बहुत समय व्यतीत हो गया. अब लौट जाओ. और निश्चिन्त रहो.. जब तक तुम इन घटनाओं की चर्चा किसी से नहीं करोगे तब तक तुम पूरी तरह से सुरक्षित रहोगे. समझे?"

"ज.. जी.. गुरूदेव... आपकी जय हो..."

बोलते हुए कालू बाबा जी के चरणों में लोट गया. बाबा जी ने उसे अच्छे से सान्तवना और आशीष दिया.

उसके जाने से पहले बोले,

"पूजा-पाठ करते हो?"

"न... नहीं गुरूदेव.. कुछ विशेष नहीं करता."

"ओह.. तब तो शरीर पर कोई कवच आदि भी धारण नहीं किए होगे?"

"क.. कवच.. गुरूदेव?"

"समझा. नहीं धारण किए हो."

"न.. नहीं गुरूदेव... मैंने य... ये पहना है."

"क्या.. दिखाओ."

कालू ने गले में पहना एक छोटा सा ताबीज नुमा लॉकेट दिखाया बाबा जी को.

बाबा जी ने कुछ क्षण अच्छे से देखने के बाद बोले,

"कहाँ से मिला तुम्हें ये?"

"मिला??"

"हाँ.. मिला... ये तुम्हें मिला है कहीं से. तुम्हें किसी ने दिया नहीं है... है न?"

कालू लज्जा से सिर झुकाता हुआ बोला,

"जी गुरूदेव."

"तो बताओ फिर.. कहाँ से मिला तुम्हें ये?"

"घर के पीछे.. हमारा जो पुआल घर है.. गायों का चारा जहाँ रखते हैं... वहीँ से."

"वहाँ से?"

"जी गुरूदेव.."

"अच्छा... ठीक है.. इसे सदैव ही पहने रहना. अब तुम जाओ... तुम्हारा कल्याण हो."

कालू ने एक बार फिर बाबा जी को प्रणाम किया और बाहर चला गया. उसके जाते ही बाबा जी ने गोपू को संकेत दिया. गोपू लपक कर कालू के पीछे पीछे गया.

कालू को पीछे से टोकते हुए गोपू बोला,

"कालू... सुनो.."

"कहिए."

"एक और प्रश्न है जिसे गुरूदेव स्वयं नहीं पूछ सकते इसलिए मुझे कहा है तुमसे पूछने के लिए."

"पूछिए... क्या पूछना चाहते हैं आप?"

"जिस दिन.. जिस समय बब्लू को रुना भाभी ने मारा था... तुम वहीँ थे?"

"जी.. था."

"बहुत पहले से?"

"जी."

"बब्लू को मारने से पहले रुना भाभी ने कुछ किया उसके साथ?"

इस प्रश्न पर कालू से तुरंत उत्तर देते नहीं बना. हिचक और संकोच से गोपू की ओर देखते हुए सिर हाँ में हिलाया.

"क्या किया था रुना भाभी ने?"

कालू चुप रहा. बेचारे को समझ में नहीं आ रहा था कि बोले तो आखिर कैसे बोले?

गोपू के द्वारा फिर से प्रश्न किए जाने और ज़ोर देने पर झिझकते हुए कहा,

"हाँ... उन दोनों में....."

कालू की बात को काटते हुए गोपू बोला,

"सम्भोग हुआ था?"

"न.. न.. नहीं... स.. सम्भोग नहीं.. पर.. वैसा ही... कुछ... अ... अर्थात्... दो... दोनों अर्धनग्न अवश्य हो गए थे... परन्तु.... सम्भोग.... नहीं हुआ.... था."

"ये सच बोल रहे हो न?"

कालू की ओर दृष्टि तीक्ष्ण करता हुआ गोपू बोला.

कालू थोड़ा सहम कर पर दृढ़ता से बोला,

"ज..जी.. बिल्कुल..."

"ह्म्म्म.. ठीक है... अब तुम जाओ."

कालू अपनी साइकिल सम्भाला और जल्दी से वहाँ से विदा हो लिया.

कुटिया में घुसने के साथ ही गोपू बोल पड़ा,

"गुरूदेव... क्रीड़ा हुआ भी ... और नहीं भी."

सुनकर बाबा जी गम्भीर स्वर में 'ह्म्म्म' कर के चुप रहे.

चांदू और गोपू; दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और फिर बाबा जी को देखते हुए उनके पास आ कर चरणों के समीप बैठ गए.

बाबा बोले,

"ये रुना नहीं है..."

"क्या?!!"

चांदू और गोपू अचम्भित से होते हुए बोल पड़े.

बाबा जी बोलते रहे,

"यदि ये रुना होती तो सदैव ही इस बात का बड़ी भली भांति ध्यान रखती की उसे कोई देख न ले. वो पकड़ी न जाए. पर यहाँ हो रहा है उल्टा. कोई उसे किसी को मारने से पहले प्रणय क्रीड़ा करते हुए देख रहा है इस बात से बहुत आनंदित होती है वो. कालू को मारने के बजाए उसकी ओर देख कर मुस्कराते हुए अपने आखेट का रक्त पीना... (थोड़ा रुक कर सिर हिलाते हुए)... नहीं... मैं निश्चित हूँ. ये रुना नहीं है."

"तो क्या इसलिए आपने कालू को इस बात का चर्चा किसी से करने से मना किया गुरूदेव?"

"हाँ वत्स.. जब वो घटना का वर्णन कर रहा था.. तभी मुझे ये बात स्पष्ट हो गया था.."

"व.. वो कैसे गुरूदेव...?"

चांदू ने यह प्रश्न बड़े भोलेपन से किया.

बाबा जी दोनों शिष्यों की ओर देखते हुए मुस्कराए और फिर बोले,

"वो ऐसे की आज से करीब पाँच दिन पहले जब मैं ध्यानमग्न था तब मुझे अवनी की आत्मा से कुछ क्षणों के लिए साक्षात्कार होने का अवसर प्राप्त हुआ. मैंने उसे उसका मानव रूप दिखाने का निवेदन किया जिसे वो तुरंत ही मान गई और मुझे तभी की तभी अपना मानव रूप दिखाई. उसके जीवित रहते उसका जो मानव... नारी रूप था उसे देख कर मैं अचंभित रह गया. मुझे ये जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ की इस चेहरे को मैंने पहले भी इसी गाँव में कहीं देखा है. अपना मानव नारी रूप दिखाने के तुरंत बाद ही अवनी चली गई. मैं उसे दोबारा बुला सकता था पर उसका यूँ ऐसे चले जाना इस बात का संकेत था कि उसे अभी कहीं और आवश्यक रूप से होना है....."

चांदू बाबा जी के वाक्य का पूरा होने तक प्रतीक्षा नहीं कर सका और बड़ी अधीरता से पूछा बैठा,

"कहीं और..? कहाँ गुरूदेव..? क्या किसी और के पास होना चाहिए था उसे?"

चांदू के बालसुलभ व्यवहार को देख बाबा जी हँसते हुए बोले,

"हाँ वत्स.. उसके ऐसे व्यवहार से तो ऐसा ही लगा था."

"तो क्या आप जानते हैं कि उसे कहाँ होना चाहिए था?"

"हाँ वत्स."

"कहाँ गुरूदेव.. कृप्या बताईए."

"चंडूलिका के पास!"

चंडूलिका का नाम सुन कर दोनों शिष्य एक क्षण के लिए सहम गए. सच कहा जाए तो दोनों को ही समझ में नहीं आया की इस बात पे क्या प्रतिक्रिया दी जाए.

कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद गोपू ने धीरे से कहा,

"गुरूदेव.. आप कह रहे थे की आपने अवनी के मानव नारी रूप को इसी गाँव में कहीं देखा है. क्या आपको इसका भी उत्तर मिल गया?"

"हाँ वत्स, मैंने इसी गाँव में देखा था उसे."

गोपू ये पूछना चाह रहा कि 'किसे देखा है आपने'.. पर गुरूदेव से एक के बाद एक इतने प्रश्न करना वो अपने सभ्य आचरण के प्रतिकूल मान कर न चाहते हुए भी चुप रहा. लेकिन उसकी ये उत्कंठा उसकी आँखों में जिज्ञासा लिए गुरूदेव की ओर बराबर बनी रही.

गुरु तो आखिर गुरु होते हैं. शिष्य के मनोभाव उन्होंने तुरंत ताड़ लिया.

बोले,

"इसी गाँव की शिक्षिका रह चुकी.... रुना!"

असीमित आश्चर्य का गुबार एकाएक दोनों के कंठों से विस्मित स्वरों के रूप में फूट पड़ा,

"क्या?!! रुना भाभी?!!"

"हाँ.. वही."

"वही जिनके विषय में अभी कुछ देर पहले कालू बता रहा था??" गोपू पूछा.

बाबा जी ने उसे ऐसे देखा मानो उसी से कोई प्रश्न करने लगे हों.

गोपू को पलक झपकते ही अपनी भूल का आभास हुआ एवं सहमते हुए धीरे से कहा,

"नहीं... नहीं... कालू वाली रुना भाभी कोई और है."

गोपू के चुप होते ही चांदू बोल पड़ा,

"परन्तु गुरूदेव.... ये अवनी और रुना भाभी...??"

"ह्म्म्म.. वत्स, इसे विधि का विधान कहो... या नियति का कोई चक्कर... आज से वर्षों पहले जो अवनी थी... ठीक वैसी ही रुना भी दिखने - सुनने में है. यहाँ तक की दोनों की कुंडली में कई तरह योग एवं गणना तक एक समान है. अपने योगबल से मैं जितना जान पाया.. उस अनुसार दोनों के न केवल चेहरे अपितु लंबाई और शरीर भी एक समान ही है... अंतर इतना है कि रुना का शरीर.... अं......"

गुरूदेव को वाक्य पूरा करने थोड़ी झिझक होते देख चांदू स्वयं ही बोल पड़ा,

"रुना जी का शरीर अवनी के शरीर के अपेक्षाकृत अधिक भरा हुआ है?"

"हाँ... यही बात. वैसे भी विवाह और संतानोत्पत्ति के इतने वर्ष बाद ऐसे परिवर्तन आना सामान्य बात है."

"तो....??"

"तो अब यही वत्स की अब पूरा माजरा हमें या तो शौमक और अवनी दोनों बताएँगे या फिर चंडूलिका स्वयं!"

"चंडूलिका?"

"हाँ.. परन्तु लगता नहीं है की उसके साथ मेरा कोई सामना होगा... क्योंकि यदि ये सब कुछ... अर्थात् गाँव में जो कुछ भी हो रहा है... इन सबमें यदि चंडूलिका प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी होती तो अभी तक ये गाँव आधा श्मशान बन चुका होता... अब रही बात तांत्रिक घेतांक की तो अब इस गाँव में नहीं है.. वो कहाँ है ये मैंने जानने का प्रयास नहीं किया... वो अब इस दुनिया में है भी या नहीं.. ये जानने में भी मेरी कोई रूचि नहीं है. रुचिकर एवं करने योग्य कार्य अभी के लिए यही है की इन ग्रामवासियों को कैसे बचाया जाए और शौमक और अवनी का कैसे उद्धार किया जाए."

"अ... और गुरूदेव... आप कालू से कुछ कवच इत्यादि के बारे में पूछ रहे थे??" गोपू ने पूछा.

"हाँ वत्स.. तुमने कालू के गले में वो माला, बेहतर है उसे लॉकेट या ताबीज बोल दो; तो देखा ही होगा. वो उसका नहीं है. वो लॉकेट एक सिद्ध महात्मा का है जो कदाचित इस लॉकेट के वास्तविक धारक का गुरूदेव रहे होंगे. यदि ये लॉकेट कालू का ही होता तो रुना भाभी...या वो जो कोई भी है... उसके साथ कालू का यूँ आमना सामना नहीं होता. पर आमना सामना हुआ... इसका अर्थ ये हुआ की लॉकेट वास्तविक रूप से किसी ओर का है... जो कि अब कालू के पास है.. उसके गले में शोभायमान है... परन्तु शक्ति अभी भी वैसी की वैसी ही है. इसलिए वह नकारात्मक शक्ति कालू के आस पास नहीं फटक पा रही है."

कहते हुए बाबा जी ने अपने दोनों शिष्यों की ओर देखा.

दोनों को ही तनिक उलझन में देख कर बोले,

"याद करो... कालू ने क्या क्या कहा था.. जब वो मूत्र त्यागने सुधीर से कुछ क़दमों से दूर हुआ, तभी वो रहस्यमयी महिला आई. फिर बब्लू के साथ भी वो था.. कुछ कदम चल कर उससे दूर हुआ नहीं की वो शक्ति बब्लू के पास आ पहुँची."

"अर्थात्... गुरूदेव.. जब तक कालू उस लॉकेट को पहना हुआ है तब तक कोई भी नकारात्मक शक्ति न तो कालू के पास आ सकती है और न ही कालू जिनके साथ है; उनके पास."

"बिल्कुल."

"लेकिन... गुरूदेव... ये लॉकेट... कालू के घर के पीछे...?"

"जब शुभो की मृत्यु हुई तब मैंने तुम्हें उसके घर और आस पास जानकारी इकठ्ठा करने भेजा था... याद है?"

"ज..जी गुरूदेव."

"उस दिन तुम लौट कर आए थे और कहा था कि मृत्यु वाले दिन ही सुबह सुबह शुभो कालू से मिलने उसके घर गया था... और उस समय कालू अपने घर के पीछे पुआल घर में था?"

"जी गुरूदेव."

"तो बस... हो सकता है वहाँ उन दोनों में कोई कहा सुनी हुई हो... या हाथापाई... या किसी और तरीके से वह लॉकेट शुभो के गले से निकल गया और फलस्वरूप रात में वो मारा गया."

"अर्थात्, उस शक्ति को पता चल चुका था की शुभो के गले में अब वो लॉकेट नहीं है?!" गोपू कुछ सोचता हुआ बोला.

"हाँ... यही संभव होता प्रतीत होता है... कदाचित वो उस पर दृष्टि जमाए हुए थी बहुत पहले से या... फिर... ये सब संयोग मात्र है."

थोड़ी देर चुप रह कर बाबा जी फिर बोले,

"गोपू, अमावस्या कब है?"

दो क्षणों की गणना के तुरंत बाद ही गोपू बोला,

"आज से १२ दिन बाद गुरूदेव."

बाबा जी ने हाथ बढ़ा कर पत्रिका माँगा. चांदू के द्वारा पत्रिका देते ही बाबा जी उसमें किसी चीज़ का बहुत ध्यानपूर्वक आंकलन एवं विश्लेषण करने लगे. फिर पत्रिका को एक ओर रखते हुए एक दीर्घ, गहरी साँस छोड़ते हुए बोले,

"ये अमावस्या ही उपयुक्त रहेगा."

"वो क्या गुरूदेव?"

"वैसे तो अमावस्या वाले रात ऐसे कुछ योग बनते हैं की कुछ विशेष प्रकार के नकारात्मक शक्तियों को विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है. परन्तु ये अमावस्या कुछ ऐसी है जिस दिन... पूरे २४ घंटे के लिए कुछ योग ऐसे बन रहे हैं जिसके कारण ऐसी ही विशेष प्रकार की शक्तियाँ अपेक्षाकृत थोड़ी सरलता से वश में आ सकती हैं. यद्यपि शक्तिशाली तो ये तब भी होंगी एवं कड़ा प्रतिरोध भी होगा इनकी ओर से... पर अब करना तो पड़ेगा ही... इसी विशेष दिन की प्रतीक्षा कर रहा था मैं इतने दिनों से."

"किस बात की प्रतीक्षा गुरूदेव?" चांदू ने पूछा.

बाबा जी जप के लिए आसन बिछाते हुए दृढ़ गंभीर स्वर में बोले,

"एक निर्णायक लड़ाई की..! तुम दोनों तैयारियाँ शुरू कर दो."
 
[color=rgb(255,]२०)[/color]


[color=rgb(255,]अंतिम भाग[/color]

[color=rgb(255,]अ)[/color]

घोर अँधेरी रात....

हाथ को हाथ न सूझे...

घोर निस्तब्धता...

साथ चलते सह यात्री का आहट तो सुनाई दे पर स्वयं वो सह-यात्री ही दिखाई न दे...

तारे भी कुछ इस तरह टिमटिमा रहे थे मानो एक हल्के से संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हों; संकेत का 'स' हुआ नहीं की तुरंत कहीं छुप जाए सारे के सारे.

रात्रि के इस भयावहता को बढ़ाने में सहायता के लिए रह रह कर पेड़ों से उल्लूओं के बोल और विभिन्न कीड़ों के बजबजाते स्वर चारों ओर से सुनाई दे रहे थे.

कुछ रात्रि अपने साथ ऐसे स्याहपन ले कर आते हैं जिसे साधारण जन सोचना तक पसंद नहीं करते हैं.

ऐसी ही एक रात्रि होती है अमावस्या की.

एक ऐसी रात्रि जिसके विषय में लोग व समाज न तो बातें करना पसंद करते हैं और न ही इसके बारे में ज्यादा कुछ जानते हैं. निःसंदेह ऐसे विषयों पर स्वयं की जानकारी से कहीं अधिक वर्षों से चली आ रही सुनी सुनाई बातों पर साधारण जन को अधिक विश्वास होता है.. और यदि सुनी सुनाई बातें केवल सुनने में ही हद से अधिक भयावह हो तो फ़िर आम लोगों का क्या दृष्टिकोण हो सकता है ये तो अपने आप में ही जगजाहिर हैं.

ऐसी ही रात्रियों में कुछ विरले रात्रि ऐसी भी होती है जोकि शुरू होते ही अपने साथ कई प्रकार की विशेषताएँ ले आती हैं.

विशेषताएँ इसलिए क्योंकि ये स्वयं ही होती हैं इस रात्रि की और इस रात्रि से संबंध रखने वालों की... इस तरह की रात्रियों की प्रतीक्षा करने वालों की... उन प्रतीक्षारत लोगों की भी जो

गाँव की यदि बात की जाए तो यहाँ के लोग तो बहुत समय पहले से ही शीघ्र सो जाने के आदि थे पर अब जो पिछले कुछ समय से गाँव में जिस प्रकार की घटनाएँ हो रही हैं; उस कारण संध्या काल में ही दुकान बढ़ा कर (बंद कर) सब के सब सात से साढ़े सात बजे तक अपने अपने घरों में घुस जाते हैं.

और जिस दिन अमावस्या हो.. उसपे भी ऐसी विशेष तिथि, ग्रह - नक्षत्र वाली अमावस्या... उस दिन तो सुबह से ही लोगों के मन मस्तिष्क में एक अलग ही आतंक होना तो बहुत सामान्य सी बात है.

आज ऐसी ही एक रात्रि है.

आठ बजते बजते ही सब खा पी कर सो गए.

पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया.

रात्रि के इसी भयावह वाले पलों में गाँव से निकल कर उससे सटे वन की ओर पाँच जोड़ी पैर तेज़ी और सावधानी से बढ़े जा रहे थे.

तीन तो अपने ही बाबा जी और उनके दो शिष्य चांदू और गोपू हैं.. और बाकी दो बाबा जी के वरिष्ठ सहयोगी हैं जो आज ही के दिन बाहर से आए थे. ये दोनों भी कई प्रकार की सिद्धियाँ रखते हैं जोकि आज की रात काफ़ी काम देने वाली है.

आज की रात एक ऐसे काम के लिए... एक ऐसी प्रक्रिया के लिए... जिसकी भयावहता का न तो कोई सीमा है और न ही कोई अनुमान.

सभी के कदम तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं.

एक निर्दिष्ट स्थान के लिए.

सभी के चेहरे दृढ़ संकल्पता का साक्ष्य लिए थे.

सबसे आगे गोपू और चांदू हाथों में मशाल लिए चल रहे थे.

बीच में बाबा जी मंत्रजाप करते हुए चल रहे थे और पीछे पूरी सतर्कता के साथ मंत्रजाप करते हुए हाथ में मशाल थामे कदम बढ़ाए जा रहे थे बाबा जी के दोनों नए सहयोगी.

ये एक संकरा सा रास्ता था! दोनों तरफ नागफनी ने विकराल रूप धारण कर रखा था, लेकिन उसके खिलते हुए लाल और पीले फूलों ने उसकी कर्कशता को भी हर लिया था! बहुत सुन्दर फूल थे, बड़े बड़े! अमरबेल आदि ने पेड़ों पर अपनी सत्ता कायम कर रखी थी! मकड़ियों ने भी अपने स्वर्ग को क्या खूब सजाया था अपने जालों से! ऊंचाई पर लगे बड़े बड़े जाले!

शीघ्र ही वे पाँचों एक संकरा सा पथ से होते हुए उस निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच गए. हालाँकि उस पथ को पार करने में भी बहुत कठिनाई आई. दोनों ओर से नागफनियों ने विकराल रूप धारण कर रखा था.. आवागमन के मार्ग पर झुक आए दोनों ओर से कई पेड़ों के टहनियों से बचते बचाते, जंगली बड़ी बड़ी मकड़ियों के सुंदर व विशाल जालों से स्वयं को दूर रखते हुए सब आगे बढ़ते गए.

आगे... ठीक उसी स्थान पर पहुँचे सब के सब जहाँ उन्हें पहुँचना था.

एक विशाल पेड़.. डाल, टहनियाँ उसकी दूर दूर तक फैली हुईं हैं. पत्तों के आकार भी एक सामान्य मनुष्य के हथेली से भी बड़े.


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पेड़ के जात को जान पाना रात के इस अँधेरे में, भले ही हाथों में जलते मशालें हों; दुष्कर कार्य प्रतीत हो रहा था. वैसे भी अभी इस पेड़ के सामने पहुँचे ये पाँच आगंतुक इस पेड़ के जात - प्रजाति, प्रकार, इत्यादि जानने के इच्छुक तो बिल्कुल नहीं थे.

कुछ सफ़ेद फूल भी निकले थे वहाँ, जो निश्चय ही दिन के उजाले में एक अलग ही खूबसूरती दिखा रहे होते!

सभी ने बहुत अच्छे से उस वातावरण को देखते समझते हुए मन ही मन उसका एक बढ़िया अवलोकन व आंकलन किया. आसपास कुछ दूरी पर कई तरह के वृक्षों के जमावड़े थे. जैसे की, आम, पपीते, अमरुद, बेल, बेर, आंवले, बरगद इत्यादि सभी थे वहाँ. मशालों से उठती लपटों में नज़र आती बरगद और बेलों ने क्या खूब यौवन धारण किया था!

अद्भुत!

बाबा जी ने मन ही मन वहाँ के वातावरण की प्रशंसा करते हुए अपने सामने सर उठा कर तन कर खड़े उस पेड़ को देखते हुए सोचा,

'यदि इस पेड़ के साथ वो दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना न जुड़ी होती तो कदाचित प्रायः दिन के उजाले में गाँव के बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ अवश्य ही इस स्थान पर आ कर हर्षित - आनंदित होते.

इस घोर अन्धकार रात्रि में, मशालों से होती रौशनी में यदि ये पूरा परिदृश्य इतना सुंदर लग सकता है तो फिर सूर्यदेवता की रेश्मी किरणों की उपस्थिति में कैसा दिखता होगा.'

"गुरूदेव... अब??"

साथ आए नए सहयोगी में से एक ने दबे स्वर में पूछा.

परिदृश्य में खोए बाबा जी की तंद्रा टूटी..

आगे बढ़ कर अच्छे से एकबार फिर पूरे स्थान को देखा.

ऊँगलियों पर कुछ गणना की...

उसी निर्दिष्ट पेड़ के सामने पहुँचे.

फिर चारों दिशाओं की ओर मुँह करके कुछ क्षणों तक हाथ जोड़ कर मंत्रपाठ करते हुए प्रार्थना करते रहे.

उसके बाद चांदू की ओर देख कर एक संकेत दिया...

चांदू शीघ्रता दिखाते हुए अपने कंधे पर लटकते झोले में से एक मुड़ा हुआ कपड़ा निकाला और उस कपड़े के अंदर रखे एक आसन को निकाल कर बाबा जी की ओर बढ़ा.

बाबा जी ने गोपू को भी एक संकेत किया.

गोपू उनके पास पहुँचा.

बाबा जी ने शांत ढंग से पूछा,

"सुबह यहीं इसी स्थान को साफ़ किया था ना?"

गोपू ने हाँ में सिर हिलाया.

बाबा जी ने उसे एकबार और उस स्थान को झाड़ देने का आदेश दिया.

गोपू ने तुरंत उन मशालों की रौशनी में बाबा जी के दिखाए उस स्थान को ऊपर - ऊपर से हल्के से साफ़ किया.

तत्पश्चात बाबा ने उस स्थान पर चांदू से आसन ले कर बिछा दिया और एक कमंडल में से हथेली में जल ले कर उस आसन से तीन फीट की दूरी माप कर आसन के चारों ओर एक गोल घेरा बनाते हुए मंत्रजाप करते हुए जल डाला.

कुछ क्षण हाथ जोड़ कर प्रार्थना किया और फिर बैठ गए आसन पर.

कुछ क्षण और उन्होंने मंत्रजाप किया.

इतना कर के उन्होंने अपने शिष्यों की ओर देखा.

दोनों शिष्य जल्दी जल्दी बाबा जी के पूर्व निर्देशानुसार अपने साथ लाए झोलों में से भिन्न भिन्न प्रकार के तंत्र - मंत्र - यंत्र के सभी सामान निकाल निकाल कर रखने व सजाने लगे.

एक सीधी, आमने सामने की तेज़ टक्कर के लिए ये बहुत आवश्यक होता है कि आप अपनी पूरी तैयारी के साथ हों. इसलिए बाबा जी भी पूरी सजगता के साथ अपने शिष्यों द्वारा की जा रही तैयारी पर एक तीक्ष्ण दृष्टि जमाए हुए थे.

ये तैयारी थी एक गूढ़ अनुष्ठान के लिए... जो दैवीय भी होगा और घातक भी.

अनुष्ठान का शुभ मुहूर्त अब से कुछ देर बाद शुरू होने वाला था.

दोनों नए सहयोगियों ने बाबा जी की ही तरह जल से गोल घेरा बना कर अपने अपने लिए आसन बिछाए और उसपे बैठते ही मंत्रजाप प्रारंभ कर दिया.

दोनों शिष्यों ने भी प्राण रक्षा कवच का स्तोत्र पाठ करते हुए बाबा जी के स्थान से थोड़ा पीछे अपने लिए आसन बिछा कर उसपे बैठ गए. मशालों को पहले ही साथ लाए चार बांस के साथ बाँध कर उन्हें चार कोनों पर गड्ढे खोद कर गाड़ दिए गए थे.

दो लालटेनों को भी हल्के आंच पर जलता रख दिया था गोपू ने.

कुछ ही देर में वहाँ उस स्थान पर, उस वातावरण में केवल उन पाँचों के मुख से एक लय में निकलते मंत्रोच्चारण ही गूँज रहे थे... धीमे आवाज़ में.

कुछ समय ऐसे ही बीता.

मंत्रोच्चारण के स्वर धीरे धीरे अपनी गति पकड़ते हुए अब तक थोड़ी तेज़ हो चुकी बहती हवा के कारण उस निर्जन वातावरण में गूँजते हुए दूर दूर तक फैलने लगे.

कुछ समय बीतने के पश्चात गोपू और चांदू ने मंत्रोच्चारण के साथ साथ अपने साथ लाए एक विशेष कटोरे नुमा पीतल मिश्रित किसी अन्य धातु से बने उस बर्तन को वाद्ययंत्र की भांति बजाने लगे.

समय बीतने के साथ साथ मंत्रोच्चारण और वाद्ययंत्रों से निकलने वाली ध्वनियाँ तेज़ होती हवा के साथ दूर का सफ़र तय करते हुए नदी के तट तक पहुँच गए.

ध्वनियों का नदी के लहरों से टकराते ही एक भिन्न हलचल होने लगी उनमें; विशेष कर नदी के दक्षिणी दिशा में. कुछ ऐसा मानो कोई सोया हुआ अपने आसपास होती गतिविधियों के कारण धीरे धीरे नींद से जाग रहा हो.

बाबा जी, उनके शिष्यों और सहयोगियों के मंत्रपाठ में भी शनैः शनैः तीक्ष्णता बढ़ती जा रही थी. हर मंत्र का हरेक शब्द... यहाँ तक की उन शब्दों में प्रयुक्त होने वाले मात्रा तक थोड़ा थोड़ा करके एक भीषण अलौकिक व दैवीय ऊर्जा को जन्म दे रही थी.

नदी के लहरों में हलचल बढ़ने के साथ साथ बाबा जी के सामने स्थित पेड़ में भी; विशेष कर उसके पत्तियों में हलचल होने लगी. सूखी पत्तियाँ एक एक कर के नीचे गिरने लगीं.

मानो रात्रि के इस पहर में गहरी निद्रा में अब तक सोया हुआ वह पेड़ भी अंगड़ाईयाँ लेते हुए जाग रहा हो... और सूखी पत्तियाँ अंदर होते इसी करवट के परिणामस्वरूप डालियों से अलग हो कर नीचे गिर रही हैं.

बीच बीच में एक अजीब सी हल्की... दबी सी आवाज़ आ रही थी दूर कहीं से... हवाओं के साथ बहते हुए...

आवाज़ केवल बाबा जी की ही कानों से टकराई...

प्रश्न स्वयमेव ही कौंधा उनके मन में,

'अरे... एक आवाज़ आ रही है न?! ये आवाज़.... किसकी....'

प्रश्न उनका पूरा होने से पहले ही दोबारा सुनाई दी वही आवाज़...

'अरे... ये तो.... नहीं.. नहीं.... ये एक नहीं... वरन दो आवाजें हैं..!!'

बाबा जी ने अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया उस आवाज़ पर...

ऐसा करते ही अगले ही क्षण चौंक उठे;

क्योंकि आवाज़ एक नहीं.... वाकई दो आवाजें थीं... एक मर्दाना.. दूसरा जनाना..

मर्द दुःख, तड़प और पीड़ा की मार से मानो रो रहा हो... और.. जनाना; असीम आनंद की हँसी हँस रही हो... परन्तु इस जनाना की आवाज़ बहुत ही भिन्न है... अलग हट कर... बात क्या है...

'कौन हो सकते हैं इन दो आवाजों के स्वामी?'

मन मस्तिष्क में चिंता लिए बाबा जी ने अपना कार्य जारी रखा...

और इधर,

लगभग एक साथ ही, अपने अपने घरों में, अपने अपने कमरों में गहरी नींद सोए देबू और रुना की आँखें एक साथ खुल गयीं.....

यदि कोई उस समय इनके पास खड़ा इन्हें देख रहा होता तो शायद इनके आँखें खुलते ही डर से मर गया होता.

क्योंकि दोनों की ही आँखों की पुतलियों के रंग एकदम से बदले हुए थे!

देबू की पुतलियाँ हल्की पीली - लाल मिश्रित रंग की जबकि रुना की हल्की नीली मिश्रित हरी...!

एक झटके से रुना अपने बिस्तर पर उठ बैठी...

आँखें घोर आश्चर्य से बड़ी बड़ी और गोल हो गयी थी... उसने पलट कर बगल में सोए अपने पति की ओर देखी...

नबीन बाबू घोड़े बेच कर सोने में व्यस्त थे..

रुना अपनी उन्हीं जलती आँखों से नबीन बाबू को देखती हुई उन्हें बिना छूए उनके सिर के ऊपर एक बार हाथ फिराई और फ़िर बिस्तर से उठ कर अपने कमरे से बाहर निकल गयी.....
 
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उधर देबू भी अपने बिस्तर से उठ चुका था..

दरअसल देबू और रुना दोनों ही अपने घरों से निकल गए थे..

दोनों जैसे किसी एक जगह जल्द से जल्द पहुँचना चाह रहे थे.. दोनों के ही चेहरे और आँखों में चिंता व परेशानी साफ झलक रही थी..

पर यहाँ सबसे आश्चर्य वाली बात जो थी वो यह कि देबू और रुना; दोनों के ही पैर ज़मीन को नहीं छू रहे थे ! दोनों के ही शरीर धरती से कुछ इंच ऊपर हवा में थे और मानो इसी तरह हवा में ही उड़ते हुए अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे थे.

कुछ क्षणों में ही जिस मार्ग से वे दोनों अपने अपने गंतव्य की ओर अग्रसर थे; वो मार्ग और उनका गंतव्य... दोनों स्पष्ट हो गए.

वे दोनों गाँव की एक संकरी जंगली पगडंडी से होते हुए उसी वन की ओर बढ़े जा रहे थे जहाँ इस समय बाबा जी अपने सहयोगियों व शिष्यों के साथ एक गुप्त अनुष्ठान में रत थे.

दरअसल अब तक बाबा जी ने एक हवन आरम्भ कर दिया था... उस हवन से उठती ज्वाला और उन पाँचों के मुख से निकलते मंत्रोच्चारण क्षण प्रतिक्षण आक्रामक से होते जा रहे थे.

विशेष कर बाबा जी तो बहुत ही दृढ़ संकल्पित लग रहे थे. उनके हरेक मंत्र पाठ से आस पास उपस्थित निर्जीव पदार्थ तक में कंपन सी हो रही थी.

अग्नि की लपटें तक बाबा जी के मुख से निकलने वाले हरेक मन्त्र व उनके लय, छंद, ताल पर थिरकन कर रही थीं.

ये क्रम अभी अनवरत चल ही रहा था कि तभी एक साथ देबू और रुना हवा में उसी तरह रहते हुए वहाँ पहुँच गए.

पहले तो दोनों ने एक दूसरे को आश्चर्य से देखा.. आँखों ही आँखों में बात हुई और फिर गुस्से से काँपते हुए दोनों ने उन पाँच साधकों की ओर देखा.

दोनों के बदली नेत्रों और बदले रूप को देख कर गोपू और चांदू भयभीत तो अवश्य हुए पर बाबा जी पर उनका अगाध विश्वास था... इसलिए निर्भय हो कर अपने मन्त्र जाप में रमे रहे और वाद्य यंत्र बजाते रहे.

देबू और रुना को वहाँ आया देख कर बाबा जी को भी कुछ क्षणों के लिए अचरज अवश्य हुआ पर तब तक उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ इतनी अधिक प्रबल रूप से सक्रिय हो चुकी थीं कि उन्हें समझते देर न लगी की ये दोनों वास्तव में शौमक और अवनी हैं.... देबू और रुना के शरीर में... देबू और रुना; जो इसी ग्राम के ग्रामवासी हैं.

सब ने गौर किया की अत्यंत क्रोध में होने के बाद भी दोनों के शरीर से एक अद्भुत आभा प्रकाशित हो रही थी. देबू जहाँ अत्यंत सुकुमार लग रहा था वहीँ रुना हद से अधिक चित्ताकर्षक एवं रूपवती लग रही थी.

दोनों ही इतने अच्छे लग रहे थे की यदि ये कोई और समय होता और देखने वाले साधारण जन होते तो अब तक देबू और रुना को देव-देवी या यक्ष-यक्षिणी मान कर उनकी पूजा - आराधना और जयजयकार शुरू कर दिए होते.

पाँचों एकाग्रचित्त हो कर अनुष्ठान में पूरा मन लगाते हुए देबू और रुना पर दृष्टि जमाए हुए थे.

जब उन पाँचों में से कोई कुछ न बोला तब रुना क्रोध से काँपती - हाँफती कुछ कदम आगे बढ़ी और खनकते; पर खतरनाक आवाज़ में बोली,

"ये क्या कर रहे हो तुम लोग..? कौन हो तुम? क्या चाहते हो?"

कोई कुछ नहीं बोला.

रुना ने दोबारा वही प्रश्न किया.

कोई कुछ न बोला.

पर बाबा जी ने एक बार उन दोनों की ओर देखा और आँखों से एक प्रकार का संकेत किया जिसके बाद देबू व रुना और प्रश्न न कर के चुपचाप वहीँ खड़े रहे.

अग्नि में थोड़ी धान को स्वाहा करते हुए बाबा जी ने उन दोनों को देखा और कहा,

"मैं कुछ बोलूँ इसके पहले ये बताओ की हमारे पहनावे से तुम्हें क्या लगता है... हम कौन हैं?"

"साधु - संन्यासी लग रहे हैं." देबू ने उत्तर दिया.

"हाँ. वही हैं हम."

"ऐसे इस अनुष्ठान का कारण?"

"ओह.. तो तुम्हें पता है की हम यहाँ अनुष्ठान कर रहे हैं..??"

"हाँ.. और ये जो हवन किया जा रहा है; ये भी कोई साधारण हवन नहीं है. अन्य हवनों से बहुत भिन्न है." देबू ने उत्तर दिया.

"हम्म.. वाह! तुम तो बहुत जानते हो?" बाबा जी ने व्यंग्य किया.

देबू और रुना पर इस व्यंग्य का कोई असर नहीं हुआ.

रुना का क्रोध तो अभी भी शांत नहीं हुआ था. उसकी आँखें तो ऐसी लग रही थीं मानो बाबा जी को कच्चा ही चबा जाने को व्याकुल हो रही हो.

"हाँ. जानता हूँ. ये हवन हमें यहाँ बुलाने के लिए किया जा रहा है."

"सिर्फ़ बुलाने के लिए?"

"अ...और भी कारण हो सकते हैं. उतना मुझे पता नहीं." रुना ने चुपके से देबू का एक हाथ दबा दिया. देबू ने भी बात नहीं बढ़ाने का सोच कर जरा सा जवाब दिया.

"ठीक है. पर ये तो बताओ की ये हवन किसे बुलाने के लिए किया जा रहा है?"

"हमें बुलाने के लिए!"

"हमें..? किसे??"

"हमें."

"तुम दोनों कौन हो?"

"आप नहीं जानते?"

"नहीं जानता. तुम ही बताओ."

"हमें मतलब मुझे अर्थात् देबू को और इन्हें; रुना को."

"पर हमने तो किसी ओर को यहाँ बुलाने के लिए ये हवन किया था.."

"ठीक से नहीं किया होगा तुमने." विष घुला हुआ सा स्वर में बोली रुना अब... इतनी देर बाद. उसके हाव भाव और अब उसके स्वर से ये स्पष्ट हो गया कि इस तरह यहाँ बुलाए जाने को ले कर वो तनिक भी खुश नहीं थी.

"मेरे द्वारा किया हुआ कोई भी अनुष्ठान, यज्ञ, हवन इत्यादि कभी विफल नहीं होता..... (थोड़ा रुक कर).. अवनी!"

ये नाम सुनते ही देबू और रुना चिहुंक उठे. कदाचित इस तरह इस नाम का लिए जाने के बारे में उन दोनों ने कल्पना नहीं की थी.

"क्या हुआ? तुम दोनों के होश क्यों उड़ गए?"

"नहीं.. ऐसा तो कुछ नहीं हुआ." देबू ने बात संभालने का प्रयास किया.

बाबा जी हँस पड़े.

बोले,

"अब हमें इतना भी मूर्ख मत समझो... शौमक... कहने - दिखने के लिए तो तुम दोनों देबू और रुना हो परन्तु वास्तव में..... तुम दोनों शौमक और अवनी हो जो इन दोनों बेचारे ग्रामवासी के शरीर को अपना घर बनाए हुए हो."

इस रहस्योद्घाटन के बाद रुना अर्थात् अवनी का गुस्सा पलक झपकते ही फुर्र हो गया. देबू.. अर्थात् शौमक भी एकदम से चुप हो गया.

"क्या हुआ...? अब कुछ नहीं कहना?" बाबा जी मुस्कराते हुए बोले.

"चाहते हैं क्या आप?" कुछ सोच कर शौमक ने पूछा.

"तुम दोनों के बारे में जानना चाहता हूँ."

"आप नहीं जानते?"

"नहीं जानता."

"लगता तो नहीं है."

"हम्म.."

"ये ढोंग कर रहा है. इसका कोई और ही मतलब है. ये पाखंडी है.... साला."

रुना ने दांत भींचते हुए कहा.

उसकी बात सुन बाबा जी हँसते हुए बोले,

"सुनो बालिके... तुम्हारी दुःखद मृत्यु को हुए वर्षों बीत गए... किन्तु बुद्धि कदाचित किशोरावस्था पार कर अभी अभी नवयुवती होते एक किशोरी की भांति ही है. यदि मैं पाखंडी होता तो रात के इस समय अपने सहयोगियों के साथ इस प्रकार के अनुष्ठान करने का साहस नहीं करता... यदि मैं पाखंडी होता तो तुम दोनों शक्तिशाली आत्माओं को यहाँ बुला लाने योग्य शक्ति न रखता. संदेह करना तुम्हारा अधिकार हो सकता है परन्तु विवेक का प्रयोग उससे भी कहीं अधिक वांछनीय है."

अवनी के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था. गुस्से में मुँह फेर ली.

देबू ने स्थिति को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया,

"हमारी कहानी सुन कर आप क्या करेंगे?"

"तुम दोनों के विषय में कुछ तो जानता अवश्य हूँ किन्तु दूसरों के मुख से सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहता. जिनकी ये कहानी है... मैं उन्हीं से सुनना चाहता हूँ. एक वाक्य में कहूँ तो मैं सत्य जानना चाहता हूँ.... और जान कर क्या करूँगा.. ये तो सब कुछ जान लेने के बाद ही कह पाऊंगा."

देबू और रुना... यानि शौमक और अवनी ने एक दूसरे को देखा... देबू ने रुना का हाथ पकड़ा और उसकी आँखों में कुछ क्षण देखता रहा. उन कुछ क्षणों में ऐसा लगा मानो समय जहाँ का तहाँ ठहर गया हो.

फिर बाबा जी की ओर मुड़ गया.

और एक बदले से आवाज़ में बोला,

"ठीक है... मैं सुनाता हूँ."

"ठीक है. तुम ही शुरू करो."

एक गहरी साँस ले कर शौमक अपने बारे में कहना शुरू किया,

"जब से होश संभाला है माँ बाप की कोई खबर नहीं. बाप का भी कोई सगा नहीं था इसलिए नानी ने ही मुझे अपने साथ रखा. बचपन से ही पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था.. स्कूल जाता अवश्य था पर पढ़ने नहीं; वहाँ आने वाले दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए. स्कूल से आने के बाद भी दिन भर खेलता, धमा चौकड़ी करता था. हाँ, इस बात का बचपन से ही बड़ा ध्यान रखता था कि मेरे कारण मेरी नानी को कोई दिक्कत न हो कभी भी. नहाना भी अच्छा नहीं लगता था.. क्योंकि नहा लेने के बाद दोबारा खेल कूद कर गंदा होना अच्छा नहीं लगता था और बिना खेले कहीं भी एक पल के लिए शांति से बिल्कुल नहीं बैठता था. दिन इसी तरह मस्ती में बीतते जा रहे थे. समय बीतने के साथ साथ अब मैं बड़ा भी होने लगा था.

यही कोई दस - बारह साल का रहा होऊँगा कि एक बार गाँव में कुछ साधु - संन्यासी लोग आए. गाँव में आए ऐसे अपरिचितों की ओर ध्यान आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं था. प्रायः खेल से कुछ समय निकाल कर उन लोगों को देखने जाता था. कभी गाँव के ही ऐसे लोगों के साथ जो उन साधु - संन्यासी लोगों के लिए खाने पीने का सामान ले कर जाते तो कभी कभी मैं कहीं पेड़ पर चढ़ कर या झाड़ियों के पीछे से छुप कर उन साधु - संन्यासियों को देखता रहता था. रोज़ रोज़ उनको देखने रहने से मैं उनके खान पान, रहन सहन, दैनिक क्रियाकलाप को देख कर प्रभावित एवं उनकी ओर आकर्षित होता गया.

मैं उनके साथ मिलने लगा, बैठ कर बातें करने लगा.

धीरे धीरे मैं अधिक से अधिक समय उन लोगों के साथ बिताने लगा.

खेल छूटता गया...

पर अब मुझे कोई परवाह नहीं रहा अपने दोस्तों का, उनके साथ खेलने वाले खेलों का.

मैं तो बस सुबह शाम उन साधु - संन्यासियों के साथ ही बीताता रहता.

और एक दिन जब साधुओं को गाँव छोड़ कर कहीं ओर जाने का समय आया तो मैंने भी उन्हें अपने साथ ले चलने की हठ किया. वे नहीं माने. कहा की अभी मेरा समय नहीं हुआ है. मैं बहुत निराश हो गया. चूँकि इतने दिनों में मेरे प्रति उनका भी एक लगाव हो गया था इसलिए जाने से पहले उन लोगों ने मुझे ढेर सारा आशीर्वाद और फल इत्यादि दिए, और एक स्वस्थ और अच्छे जीवन की मंगलकामना की...

उन साधु - संन्यासियों के चले जाने के कई दिनों बाद तक भी मैं बहुत अधिक निराशा में रहा. सुबह शाम, उठते बैठते बस यही मनाता की बस एक बार फिर से वही साधु - संन्यासी लोग कुछ दिनों के लिए आ जाए.

मेरी ये इच्छा पूरी भी हुई... हुबहू तो नहीं... पर.....

कुछ समय और बीतने के बाद गाँव में एक और संन्यासी आया...

अकेला...

किन्तु ये वाला संन्यासी पहले वालों से भिन्न था...

इसके वस्त्र काले थे, माथे पर एक बड़ा सा काला तिलक, नशे में डूबे बड़े बड़े लाल नेत्र...

हमेशा अपने में ही मगन रहता था. गाँव वाले इनसे बातचीत करने का प्रयास करते पर ये संन्यासी अधिकांश समय चुप ही रहता.. सबसे बात नहीं करता था...

मेरा भोला मन उसकी ओर आकर्षित होने लगा और कुछेक भेंट के बाद मैं उसकी भी सेवा करने लगा. पीने के लिए घड़े में पानी भर देना, साधना के सभी सामानों को अच्छे उठा कर उनके नियत स्थान पर रखना, भोजन तैयार रखना, उनके सोते समय उनके पैरों को दबा देना, इत्यादि.

मेरे इस निष्काम सेवा से वो साधक बहुत ही प्रसन्न हुआ...

और एक दिन मुझसे ढेर सारी बातें की.. मैं कहाँ रहता, क्या करता हूँ, घर में कौन कौन हैं... सब कुछ जान लेने के बाद वो और भी कई तरह की बातें करने लगा जैसे की ये जीवन नश्वर है, सब कुछ क्षण भंगुर है, सारा संसार कितना रहस्यमयी एवं मायावी है, इत्यादि.

उस दिन के बाद से मैं और भी अधिक ज्ञान पाने की लालसा में उनकी और भी अधिक सेवा करने लगा.

बदले में वो साधक भी मुझे कुछ न कुछ सिखाया करता था.

वो जो कुछ भी जैसे जैसे सिखाता जाता; मैं बिल्कुल वैसे वैसे करता जाता था.

इसी तरह दिन बीतते गए.

मैं अब उस साधक का सहयोगी बन चुका था. उसके अधिकांश तंत्र विधियों को मैं स्वयं अपनी आँखों से सफल होता हुआ देख चुका था. समय लगा मुझे कुछ सीखने में पर समय बीतने के साथ साथ बहुत कुछ सच में सीख गया था.

इधर, अपनी गाँव की ही एक लड़की से प्यार हो गया था.

अवनी नाम था उसका. (कहते हुए उसने रुना / अवनी की ओर देखा.)

(थोड़ा रुक कर बोलना शुरू किया)

अवनी से प्रेम करना तो सरल था.. पर अवनी से प्रेम पाना नहीं.

क्योंकि वो थी एक धनी संपन्न घर की बेटी और मैं.... मेरा तो यदि सुबह का खाना हो जाए तो दोपहर का पता नहीं होता और यदि दोपहर का हो जाए तो रात में क्या होगा उसका पता नहीं होता था.

अवनी को जब से देखा था तब से इतना अधिक खोया खोया सा रहने लगा था कि अपने दैनिक कार्यों को पूरे निष्ठा से पूर्ण कर पाना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा था.

रात दिन अपने और अवनी के साथ के सपने देखता रहता था.

अपने सेवा में त्रुटि पाता देख उस साधक को भी अटपटा सा लगा.

सो एक दिन उन्होंने मुझसे मेरे भटकाव का कारण पूछ लिया. मैं अपने मन के भावों को छुपाता अवश्य था परन्तु यदि पकड़ा जाऊं तो सत्य बताने से पीछे नहीं हटता था.

सो मैंने सब कुछ सच सच उस साधक को; जो अब मेरे गुरु थे.. उनको बता दिया... अवनी मुझे मिल नहीं सकती और अवनी के बिना मैं जी नहीं पाता.. इसलिए मैं गुरु जी से हठ करने लगा की कोई उपाय कर के मेरे लिए अवनी के मन में प्रेम लाया जाए. पहले तो गुरु जी ने स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया. कह दिया कि ये उचित नहीं है. ऐसे ही किसी के मन में प्रेम नहीं लाया जा सकता है. और यदि लाया भी गया तो ये बहुत बड़ा धोखा होगा.

किन्तु मैं कहाँ मानने वाला था.

मैंने भी प्रण कर लिया की यदि गुरु जी कोई उपाय नहीं कर देंगे तो मैं अपने प्राण दे दूँगा... आत्महत्या कर लूँगा.

गुरु जी से रहा नहीं गया... मेरी बात मान गए. एक रात शुभ घड़ी देख कर उन्होंने सम्मोहिनी विद्या का प्रयोग किया. कहा, जब तक मैं चाहूँगा ये विद्या तब तक अवनी पर अपना प्रभाव जमाए रखेगी. ये कह कर उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया.

अगले दिन सुबह से ही मुझे चमत्कार दिखा. बाजार में खरीददारी करते समय अवनी से टकरा गया.

मैंने देखा की वो मुझे मुस्कराते हुए देख रही थी. मैं समझ गया... अब अवनी भी मुझे चाहने लगी है.

और फिर हमारा रोज़ का मिलना शुरू हुआ. घंटों समय साथ बिताया करते थे हम. उससे मिलने के लिए मैं अपने गुरु से अनुमति भी ले लिया करता था.

हमारा प्रेम तो परवान चढ़ने लगा परन्तु जल्द ही थोड़े ही समय बाद मुझे बहुत बुरा लगने लगा अपने इस कृत्य पर. ऐसे भी कभी कोई प्रेम होता है क्या? इसे प्रेम पाना नहीं अपितु प्रेम करवाना कहते हैं... छि... धिक्कार है मुझे स्वयं पर... गुरु जी ने सही कहा था... ये सब अत्यंत ही अनुचित और अन्याय है.

इस विद्या का तोड़ तो गुरु जी ने बता ही दिया था; अतएव जैसे ही मुझमें अपराधबोध जागृत हुआ मैंने इस विद्या के हट जाने की कामना की. फलस्वरूप अवनी के ऊपर से वशीकरण का प्रभाव हट गया..

मैं बहुत ही दुखी हो गया था कि अब अवनी मेरी नहीं होगी...

पर आश्चर्य!

घोर आश्चर्य...!

अवनी अब भी मुझसे प्रेम करती थी! ये देख-जान कर मुझे बहुत अच्छा लगा और स्वयं को सौभाग्यमान मान कर ये सोचा की शायद अवनी भी मुझसे सच में प्यार करने लगी है. फिर तो कई महीने प्रेम में हम दोनों सुबह शाम, दिन रात मगन रहे.

और जैसा हर प्रेम कहानी में होता है... हमारा चोरी छिपे मिलना अधिक दिनों तक गुप्त नहीं रहा.... हम पकड़े गए. और जैसा की होना था.. वही हुआ. अवनी के घरवालों को ये सब बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा. मुझे तो देखना तक पसंद नहीं किया उन लोगों ने.

पंचायत बैठी.

पूरा गाँव आया... भरी सभा में सख्त निर्देश मिला की फिर कभी हम दोनों नहीं मिलेंगे. दोनों के अलग रास्ते होंगे.

उस दिन सबके सामने तो हमने निर्देश मान लिया पर वास्तव में हमारा प्रेम कभी कम नहीं हुआ. हम फिर मिलने लगे और शीघ्र ही ये निर्णय लिया दोनों ने मिल कर की अब हमें शादी कर लेनी चाहिए और इस गाँव को छोड़ दूर कहीं और जा कर बस जाना चाहिए.

सही अवसर देख कर हम घर से भाग गए...

गाँव के मंदिर में ही शादी की. गुरु जी के पास जा कर उनसे आशीर्वाद ले कर विदा लिया. हम तुरंत गाँव छोड़ देना चाहते थे... पर... (तनिक रुक रुना / अवनी की ओर देखा).. न जाने क्यों हमने सोचा की शादी की पहली रात यहीं गाँव में ही कहीं गुज़ार ली जाए..

(अब बाबा जी ने भी रुना / अवनी की ओर देखा और मुस्करा दिए. वो समझ गए कि दरअसल शौमक जल्द से जल्द गाँव छोड़ना चाहता था पर अवनी ही शादी की पहली रात गाँव में गुज़ारना चाहती थी. देबू / शौमक रुना / अवनी के सम्मान के खातिर झूठ बोल रहा है.)

पर पहली रात को ही हम पकड़े गए.

गाँव वाले काफी आक्रामक हो गए थे.. बुरी तरह मारना पीटना शुरू कर दिया था मुझे... अवनी को भी बहुत लगी थी.. अवनी को मैंने भागने का संकेत दे कर स्वयं भी भागा.. दोनों दो अलग दिशा में भागे...

(इतना कह कर देबू / शौमक रुक गया.. गला भर आया था उसका. अवनी की भी आँखों में आँसू आ गए थे.. बाबा जी समेत उनके शिष्यों और सहयोगियों को भी बहुत बुरा लगने लगा अब.)

भागता भागता मैं नदी की ओर चला गया. गाँव वाले इस तरह पीछे पड़ गए थे मानो सबके दिमाग में खून सवार था. कोई भी कुछ नहीं सुनना चाहता था. मेरे पास अपने प्राण बचाने के लिए सिवाय भागने के और कोई उपाय नहीं था.

सामने नदी थी तो मैं नदी में ही चला गया... स्वयं को बचाने के लिए. तैरते हुए दक्षिण दिशा में चला गया. वहाँ गहराई थोड़ी अधिक है.... मैं डूबने लगा था.. गाँव वाले कुछेक नौका ले कर मेरे पास तक आए भी थे पर एक दूरी पर रुक गए. सब पीछे हो लिए. सहायता के लिए चिल्लाता मैं क्षण भर में समझ गया कि ये लोग मुझे बचाना नहीं चाहते हैं. अपने ही गाँव वालों के इस व्यवहार पर मैं आश्चर्यचकित सा रह गया. मेरे वो गाँववाले जिनके सहृदयता व सहायता भाव के किस्से दूर दूर तक प्रचलित थे... वे ही आज अपने ही गाँव के लड़के को अपने सामने प्राणलेवा संकट में यूँ ऐसे ही छोड़ कर जा रहे थे. सहायता माँगता तो आखिर किससे?

अंत में प्रेम करने का दंड मुझे अपने प्राण दे कर भोगना पड़ा."

इतना कह कर देबू / शौमक सुबकते हुए चुप हो गया..

उसकी ये व्यथा कथा सुन कर तुरंत कोई कुछ नहीं बोला.

कुछ पल चुप्पी में ही बीत गए.

स्वयं बाबा जी को भी यह दुविधा होने लगी की वो शौमक को सान्तवना दें या कोई अन्य प्रश्न करे....

अंत में उन्होंने यही निर्णय लिया की अब शौमक से प्रश्न न कर के अवनी से करेंगे.

अवनी की ओर देख कर बाबा जी ने मुस्कराते हुए पूछा,

"बेटी, मैं जानता हूँ की तुम्हारी कहानी भी कुछ हद तक शौमक जैसी ही रही होगी.. फिर भी, यदि कुछ और है बताने को तो अभी बता सकती हो."

भरे गले में गुस्से से बोली,

"उससे क्या होगा?"

एक दीर्घ श्वास लेते हुए बाबा जी बोले,

"देखो बेटी, बता देने से न तो तुम्हारे पुराने दिन वापिस आएँगे और न ही तुम दोनों फिर से जीवन प्राप्त कर लोगे... पर यदि बता दिया तो तुम्हारे मन पर से बोझ उतर जाएगा... मन में कोई बोझ; अब चाहे वो कोई गुप्त बात हो या कोई ग्लानि; यदि लंबे समय तक मन में रहे तो वो अपने आप ही एक अभिशाप बन जाता है. यदि बताने के लिए कुछ हो और वो तुम बता दो तो विश्वास करो मेरा कि उससे तुम्हें शांति मिलेगी, मन हल्का होगा..."

रुना / अवनी ने बगल में ही खड़े देबू / शौमक को एकबार देखा. उसकी आँखों से ये आभास हुआ की कदाचित किसी बात पर उसे विश्वास नहीं हो रहा और और साथ ही उसका दिल दुखा था.. और कदाचित वो बात शौमक का उसपे वशीकरण प्रयोग से संबंधित था.

वो सिर झुका ली..

अश्रुधाराएँ पहले की तुलना में और अधिक बहने लगे..

वो सिर उठाई... होंठों पर एक कुटिल मुस्कान थी..

भयानक हिंसक स्वर में बोली,

"हाँ... है कुछ बताने को... (अत्यंत दुःख और क्रोध से काँपने लगी वो)... और वो ये कि मैंने आत्महत्या नहीं की थी!"

वाक्य के अंत में 'नहीं की थी' को इतने ज़ोर से बोली की वहाँ उपस्थित सभी वनस्पतियों के पत्ते थरथरा कर काँप उठे... बाबा जी समेत बाकियों के कान कुछ क्षण के लिए शून्य से पड़ गए.

अचरज में डूबे बाबा जी पूछे,

"आत्महत्या नहीं की थी? पर सारा गाँव तो यही....."

बाबा जी की बात को बीच में काटते हुए बोली अवनी,

"मेरे साथ हुई दुर्घटना को मैं बेहतर जानूँगी या वो कमीने गाँव वाले?"

"निःसंदेह तुम्ही जानोगी. बताओ क्या हुआ था तुम्हारे साथ?"

कुटिल मुस्कान गायब हो गई... होंठ अत्यधिक क्रोध के कारण काँपने लगे...

बोली,

"तुम.... आपने मुझे बेटी कहा है... इसलिए मैं बताऊँगी नहीं... वरन, दिखाऊँगी..."

और अचानक से रुना / अवनी की दोनों आँखें सफ़ेद प्रकाश से जल उठे... वो सीधे बाबा जी की आँखों में देख रही थी. बाबा जी भी उसी की आँखों में टकटकी लगाए देख रहे थे.....
 
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बाबा जी की आँखों में आँखें डाल कर उन्हें देखती अवनी की आँखें और अधिक चमक उठीं और इसी के साथ बाबा जी को ठीक उसी क्षण अपनी आँखों के आगे एक चलचित्र चलता हुआ सा अनुभव होने लगा..

वाद्य यंत्र बजने बंद हो चुके थें.

केवल मंत्रों की ध्वनियाँ ही गूँज रही थीं वहाँ... जो कि निकल रहे थे बाबा जी के दोनों सहयोगियों और शिष्यों के कंठों से...

और बाबा जी किसी बुत की भांति चुपचाप अवनी की आँखों में देखते हुए खड़े थे..

थोड़े समय बाद... यही कोई पंद्रह मिनट बीते होंगे,

बाबा जी के शरीर में एक तीव्र कंपन हुई... और वे तुरंत आँखें बंद कर उन्हें मसलने लगे..

"ओह... बुरा हुआ... बहुत बुरा हुआ..."

स्तंभित स्वर में शोकाकुल होते हुए बोले.

रुना कब देबू का बायाँ हाथ पकड़ ली थी ये किसी के नज़रों में नहीं आया था; परन्तु अब उसका हाथ छोड़ते सबने देखा.

देबू और रुना की आँखें भीगी हुई थीं.

सहयोगियों का तो पता नहीं पर दोनों शिष्य गोपू और चांदू को बड़ा अचरज होने लगा था ये पूरा दृश्य यूँ बदलता हुआ देख कर. कहाँ तो अब तक दोनों ही पक्षों में तीखे शब्दों और व्यंग्य बाणों के प्रयोग हो रहे थे... दोनों में से कोई भी पहले प्रहार के लिए तत्पर था.. पर अब.. दोनों ही पक्ष ऐसे भावुक क्यों हो रहे हैं?

"हाँ.. बुरा तो हुआ... बहुत बुरा हुआ था... पर आपको को बुरा लगा... लेकिन उसका क्या; जिसके साथ इतना बुरा हुआ... जिसके सम्मान की हत्या हुई.. जिसके विश्वास का गला घोंटा गया..." रुंधे स्वर में रुना बोली.

बाबा जी चुप थे.. कुछ कहना अवश्य ही चाह रहे थे परन्तु इस समय कदाचित चुप रहना ही उन्हें श्रेयस्कर लगा.

रुना ने कहना जारी रखा,

"हर व्यक्ति यही दो तो चाहता है... सम्मान और विश्वास... यदि यही दो न मिले... या जिसकी ओर सहारा समझ कर हम देखे.. वही यदि इन दो बातों का हत्यारा निकल जाए तो...?? फिर क्या कोई और मार्ग शेष रह जाता है?? .. आत्महत्या करने के सिवाय???"

बाबा जी अब भी बहुत दुखी थे..

सच में...

यदि कोई इस तरह किसी के साथ व्यवहार करे... भरोसा तोड़े... तब तो...

'नहीं...'

मन ही मन सोचा बाबा ने..

'ये ठीक नहीं.. मुझे कुछ कहना होगा...'

अवनी की ओर देख कर दृढ़ स्वर में बाबा ने कहा,

"सुनो बेटी, तुम दोनों के साथ ही बहुत अन्याय हुआ ये बात मैं मानता हूँ... और बेटी तुम्हारे साथ अन्याय तो क्या, घोर पाप हुआ है. परन्तु इसका अर्थ ये तो नहीं कि तुम दोनों अपने हाथों को वर्ष दर वर्ष, अविराम रक्तरंजित करते जाओ.. क्योंकि इतने वर्षों में कई ऐसे भी मारे गए जिनका तुम्हारे; तुम दोनों के साथ हुए दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना के साथ कोई संबंध नहीं था. प्रतिशोध की अग्नि ऐसी होती है पुत्री की यदि समय पर न बुझी तो बाद में कई सारे जतन करने के बाद भी शांत नहीं होती और एक समय बाद व्यक्ति विशेष; चाहे वो मृत हो या जीवित; के स्वभाव, चरित्र, प्रकृति, इत्यादि सब कुछ जला कर भस्म कर देती है. तुम दोनों ने कईयों के रक्त से अपने हाथ लाल कर लिए हैं... बहुत हुआ... अब अपने क्रोधाग्नि को शांत करने का यत्न करो और ये सब छोड़ दो. यदि इतना करते हो तो मैं तुम्हें ये वचन देता हूँ कि मैं स्वयं तुम दोनों को इस योनि से आज ही मुक्ति दिलाऊँगा और एक सुखी जीवन के लिए अगले जन्म का मार्ग प्रशस्त करूँगा."

इतना कह कर बाबा चुप हुए....

शौमक और अवनी भावहीन मूर्ति समान बाबा की बातों को सुन रहे थे... उनके चुप होते ही दो पल बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा.

अवनी के होंठों पर एक हल्की मुस्कान बिखर गई.

शौमक उसका आशय समझ गया. उसने भी मुस्कराते हुए सहमति में सिर हिलाया.

फ़िर दोनों एक साथ बाबा जी की ओर देखा.

और एक साथ ही कहा,

"नहीं.!!"

"नहीं??!"

"हमारी प्रतिशोध की अग्नि कब और कैसे शांत होगी ये हम स्वयं निश्चित करेंगे. कोई बाहरी आ कर हमें नहीं बतायेगा कि हमें कब, क्या करना है."

बाबा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.

"लेकिन क्यों... क्यों ऐसा करते रहना चाहते हो तुम लोग? आखिर कब तक?"

"तब तक.. जब तक कि इस गाँव के सभी दोषी मारे नहीं जाते."

"लेकिन सभी तो दोषी नहीं हैं!?"

"कौन दोषी है या नहीं है; इसका निर्णय भी हम करेंगे!"

इस बार भी दोनों ने एक साथ कहा.

"देखो बेटी, (बाबा अवनी की ओर देखते हुए बोले) मैं समझता हूँ तुम्हारी पीड़ा को. तुम्हारे साथ बहुत बहुत बुरा हुआ है और दोषी को दंड तो मिलना ही चाहिए. परन्तु इन गाँव वालों का इतना भी भयंकर दोष नहीं की इस तरह सब को एक एक कर के मार दिया जाए...."

बाबा के बात को बीच में ही काटते हुए बोली अवनी,

"तो क्या उन लोगों से निवेदन कर के उन्हें मारूँ?? ये गाँव वाले भी कम दोषी नहीं हैं.. अतएव इन्हें भी उचित दंड मिलना ही चाहिए और ये दंड मृत्युदंड ही है."

"मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूँगा."

"तू रोकेगा??"

"हाँ."

"फिर तो तू भी मारा जाएगा!"

"चिंता नहीं."

"सोच ले."

"इसमें सोचना कैसा? मैं यहाँ अच्छे से सोच कर ही आया था. गाँव वाले मेरी शरण में हैं अब... मैं उनका कोई अहित नहीं होने दूँगा."

"हाहाहा.. तेरी ही शरण में रहते हुई ही आठ लोग मारे गए इतने दिनों में.!!"

"हाँ.. वो भी इसलिए क्योंकि उन लोगों ने मेरी बात नहीं मानी थी."

"तू फिर भी नहीं रोक पाएगा उन्हें मरने से ऐ साधक!"

"प्रयास कर लो."

"क्या ये तुम्हारी चुनौती है, साधक?"

"हाँ... चुनौती है."

दोनों की ही आँखें अत्यधिक क्रोध से लाल हो गए.

उनके क्रोध और तेज़ से आस पास के पेड़ हिलने लगे और तेज़ हवाएँ चलने लगीं.

बाबा तो तैयार हो कर ही आए. थे. तुरंत उन्होंने अब तक अधबुझी हो चुकी हवन से एक लकड़ी का टुकड़ा उठा लिया और उन दोनों की ओर फेंक दिया. दोनों हवा में ही लड़खड़ा गए.

अधिक समय नहीं था हाथ में. कुछ क्षणों बाद ही वे संभल जाएँगे.

बाबा भी तैयार...

हवन से एक छोटी लकड़ी निकाला.. दूसरे हाथ में थोड़ा सा भस्म लिया.. दोनों का आपस में स्पर्श कराया और फिर उस लकड़ी को एक ओर रख कर उस भस्म से शरीर पर भस्म-लेप किया, धारण किए हुए उन तांत्रिक-आभूषणों को पोषित किया, छोटे से बर्तन में रखे रक्त के घोटे से माथे को सुसज्जित किया! और फिर अपना त्रिशूल निकाला! बाएं गाड़ा! आसान बिछाया और उस पर थोड़े अनाज रख दिया...

फिर चिमटा निकाला, चारों दिशाओं में खड़खड़ाया और क्षण भर में दिशा-पूजन किया!

झोले में से दो कपाल निकाले. एक कपाल को सामने रख कर दूसरे कपाल को त्रिशूल पर टांग दिया!

पीछे बैठे उनके एक सहयोगी ने दो हाथों की अस्थियां बाबा को दिया... बाबा ने उन अस्थियों को सामने रखे कपाल पर रखा और क्रंदक-मंत्र पढ़ा!

दोनों अस्थियों को आपस में जो से दे मारा.. और फिर से उस कपाल से छुआ दिया..

ऐसा करते ही दोनों अस्थियाँ काँप उठी और कपाल भी अपने स्थान पर ज़ोर से हिला !

वातावरण में एक अत्यंत ही दिल दहला देने वाला कानफोड़ू अट्ठहास हुआ!

तंत्र क्रिया सक्रिय एवं आरम्भ हो गई..!

और अब तक संभल चुके शौमक और अवनी भी इस पूरे व्यवस्था को आश्चर्य से आँखें फाड़े देख रहे थे.

बाबा को उन्होंने कम कर के आँका तो नहीं था पर अब तो बाबा उनके कल्पना से भी कहीं अधिक तंत्र ज्ञाता निकले!

कुछ देर के लिए चुप्पी छा गई वहाँ..

सहयोगी और शिष्य अब अत्यंत धीमे स्वर में मंत्रपाठ कर रहे थे..

इनके अलावा अगर और कहीं से आवाज़ें आ रही थीं तो बस सम्मुख जल रही हवन की लकड़ियों से आती चट-चट की आवाज़ें...!

मरघट की सी शांति चारों ओर छाई हुई थी...

बाबा काफ़ी सतर्कता से तीक्ष्ण दृष्टि से उन दोनों को देख रहे थे..

शौमक और अवनी भी बराबर सावधानी बरतते हुए बाबा, उनके सहयोगियों और शिष्यों को देख रहे थे.

बाबा ने एक विशेष संकेत किया.. शिष्यों ने मंत्रपाठ के उच्चारण की गति और स्वर; दोनों को तनिक बढ़ा दिया. वातावरण में अब मंत्र ऐसे गूँज रहे थे जैसे शिथिल पड़े हुए धौंकनी रुपी श्मशान में हवा भर दी जा रही हो जिसके परिणामस्वरूप वो अब फुफकारने लगी है!

हवन से उठता धुआँ वहाँ उपस्थित सभी के अस्तित्व की पहचान लिए इस भूलोक से विदा लिए जा रहा था!

शौमक कदाचित अब भी असमंजस में था परन्तु अवनी ने मानो कुछ ठान लिया था.

उसके दोनों हथेलियाँ सख्ती से मुट्ठी में परिणत हो गए थे और दोनों मुट्ठियों से एक चमक बिखरने लगी थीं..

ये देख बाबा यूँ धीमे हँसे जैसे कोई अभिभावक एक बच्चे के भोले शरारत को देख हँसता है. बाबा ने पास ही रखा एक कपाल उठाया, सहयोगी ने तुरंत उसमें मदिरा डाला.. बाबा ने एक मंत्र पढ़ा और एक महानाद करते हुए मदिरा कंठ से नीचे उतार लिया!

फिर बाबा जी ने वाचाल-प्रेत का आह्वान किया, वो उपस्थित हुआ! उसके बाद कर्ण-पिशाचिनी का आह्वान कर उसको भी राजी कर लिया. फिर वे दोनों मुस्तैद हो गए!

फिर आरम्भ हुआ तंत्र युद्ध!!

दोनों और से तंत्रों का अद्भुत टकराव होने लगा.

बाबा के पास उन दोनों के हरेक वार - प्रहार का पर्याप्त उत्तर था.. और बड़ी ही सरलता से उन दोनों के वारों से निपट रहे थे.

बाबा पर रत्ती भर भी अपने वारों का प्रभाव न होता देख कर अवनी प्रतिक्षण अत्यंत क्रोधित होती हुई और भी अधिक शक्ति से वार करने लगी और शौमक अपनी पूरजोर दम लगा कर बाबा के वारों से अवनी को सुरक्षित रखने का प्रयास करने लगा.

वैसे, बाबा केवल अवनी के प्रहारों से स्वयं की रक्षा ही कर रहे, पलट कर वार नहीं कर रहे थे.

तभी उनका एक सहयोगी उठ कर बाबा के कानों में कुछ कहा... बाबा ने ऊपर गगन में देखा.. समय निकला जा रहा था... इन दोनों से अधिक समय तक यूँ ही लड़ते रहने का कोई अर्थ नहीं था.

तंत्र युद्ध में उनकी शक्ति देख बाबा जी समझ गए थें कि इन्हें ये शक्तियाँ चंडूलिका से मिल रही हैं... क्योंकि ऐसे तंत्र और वार करने की शक्ति साधारण आत्माओं में तो कभी होती ही नहीं है...

तुरंत ही स्वयं को एक तंत्र कवच में सुरक्षित कर के बाबा ने नेत्र बंद कर के मंत्र पढ़ना शुरू किया. उनके चेहरे पर आते जाते भावों ने ये बिल्कुल ही स्पष्ट कर दिया की अब बाबा इस खेल को यहीं समाप्त करने हेतु किसी महा शक्ति का आह्वान कर रहे हैं.

और कुछ ही पलों बाद वो शक्ति वहाँ उपस्थित भी हो गई.

एक महा गर्जन के साथ!

महाप्रेत था ये...

सभी प्रकार की आत्माओं, भूत - पिशाच, चुड़ैल, डायन, इत्यादि का बाप!

बाप क्या... अगर इसे इन सबका भगवान भी कह दिया जाए तो कदचित कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

अब तो अवनी का भी हालत ख़राब!

और किसी से भी लड़ लेगी.. कुछ समय तक टक्कर दे देगी.. परन्तु ये..?! ये तो महाप्रेत है.. अवनी जैसी आत्माओं का मास्टरजी!

इससे पहले की शौमक और अवनी कोई उपाय सोचते; बाबा जी ने त्वरित गति से एक ऊर्जा पाश से दोनों को घेर लिया. अब चंडूलिका लाख चाह कर भी इनकी किसी तरह कोई सहायता नहीं कर पाएगी.

"इन्हें उचित दंड दो!"

बाबा के मुख से हुंकार रुपी आदेश निकला.

महाप्रेत न एक क्षण भी न गँवाया.. दोनों को पकड़ा और शुरू हो गई उठा पटक..

आख़िर कितनी देर और टिकते.

दया की भीख माँगने लगे.

अवनी की हेकड़ी निकली हो न हो... चाहे क्रोध शांत हुआ हो या न हो.. लेकिन महाप्रेत के हाथों शौमक की दुर्गति होते और न देख सकी.

उसने भी हाथ जोड़े.

क्षमा माँगी.

"ठहरो!"

महाप्रेत रुका. पलट कर बाबा जी की ओर देखा.. अगले आदेश के लिए.

पर बाबा ने और कोई आदेश नहीं दिया. महाप्रेत के लिए पहले से तैयार भोग को आगे बढ़ाया.

महाप्रेत तो अति प्रसन्न!

भोग स्वीकार किया और बाबा को प्रणाम कर के अदृश्य हो गया.

बाबा अब उन दोनों प्रेमी आत्माओं की ओर देखा.

मुस्कराए,

पूछा,

"अब भी टक्कर लेना है?"

"नहीं..." दोनों ने कराहते हुए कहा.

"तो अब....?"

"हम अपनी भूल स्वीकार करते हैं."

"ह्म्म्म...तो.. अवनी.. तुम्हारे साथ हुए पूरे घटना को सविस्तार सुनाओ."

"पर मैंने तो तुम... आपको सब दिखा दिया."

"केवल मैंने देखा.. और किसी ने नहीं."

"तो?"

"तो यह कि अब तुम वो सारी घटना सुनाओगी.. यही तुम्हारी एक प्रकार की स्वीकारोक्ति भी होगी."

समय व्यर्थ न गँवाते हुए वह बोलना शुरू की,

"जब गाँव वाले मेरे पीछे पड़े थे तब मैं अपने परिवार वालों के साथ न जा कर अलग जाने का निर्णय लिया. मैं जंगल के रास्ते भागी. ऐसे संकट की घड़ी में केवल और केवल शौमक के गुरु ही मुझे बचा सकते थे. मैं भागते भागते उनके पास गई और उनसे भेंट होते ही उनके पैर पकड़ ली. प्राणों की भीख माँगने लगी.

उस साधक ने मुझे पकड़ कर उठाया. दो मीठे बोल बोला. सान्तवना दिया की सब ठीक हो जाएगा. मुझे अंदर जा कर सोने के लिए कहा. उससे पहले कुछ खाने पीने को दिया. खा पी कर मैं सो गई.

अगले दिन सो कर उठी. अच्छा लगने के बजाए पूरा शरीर मानो टूट सा रहा था.

बदन के सभी कपड़े अस्त व्यस्त थे.

शौच के लिए गई तो देखा की योनि से रक्तस्राव हो रहा है. एक अलग ही पीड़ा है वहाँ. समझते देर न लगी मुझे.

रात में मेरे निद्रा में ही कल तक अक्षत रही कौमार्य को तोड़ दिया गया है! धर्षण हुआ है मेरा!

ये एक सदमा था मेरे लिए.

उस साधक से आमने सामने बात करने के लिए मैं उन्हें ढूँढने लगी. पर वो कहीं नहीं मिले. मैं वहाँ से, उनकी कुटिया से तुरंत निकल जाना चाही.. पर आश्चर्य!! कितना भी प्रयास कर लूँ.. कुटिया से पाँच कदम दूर जाने के बाद मैं आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी. जब भी आगे बढ़ती, किसी अदृश्य दीवार से टकरा जाती! निरंतर प्रयास करती रही पर विफ़ल रही. थक हार कर मैं कुटिया में ही रोते रोते सो गई.. भूखे पेट...

संध्या समय वो साधक लौट आया.

हाथ में कुछ सामान भी था.

मुझे खाने को दिया.

मैं मना करना चाहती थी पर उस साधक की आँखों में देखते ही मैं अपने सारे प्रतिरोध, कुंठा इत्यादि को भूल गई... खाना खाने के बाद मुझे परोसे गए एक कपाल में मदिरा को भी पी गई.

आँखें भारी होने लगी.. नींद आने लगी बहुत ज़ोरों से...

वहीँ लुढ़क गई.

फिर रात भर मेरे साथ मेरे इच्छा विरुद्ध यौन क्रीड़ा चलता रहा. मेरे बदन के हरेक इंच को जैसे कच्चा ही चबा जाना चाहता था वह. पिछली रात तो कदाचित बदन पर कपड़े रह गए थे.. लेकिन आज पूरी तरह से निर्वस्त्र कर के ही माना वो नीच.. इतनी बुरी तरह से पूरे शरीर के हरेक अंगों का माँस मर्दन हुआ; जिसका मैंने कभी अपने सबसे बुरे स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी.

लेकिन इस बुरे स्वप्न का यहीं अंत नहीं था..

क्योंकि...

केवल योनि से मिले सुख से संतुष्ट नहीं हुआ वो. कुछ अलग चाहता था.. मैं समझ गई थी कि ये क्या चाहता है... पर मैं मना कर पाऊँ; इतनी शक्ति नहीं बची थी मेरे अंदर.

फ़िर उसने वही किया जो वो चाह रहा था..

अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित किया मेरे साथ... बहुत तड़पी मैं.. पर उसे तो केवल स्वयं के आनंद से ही मतलब था.

अगले दिन मुझे पता चला की वो इसी तरह हर गाँव से ऐसे पाँच लड़कियों से संसर्ग करता है जिनका कौमार्य पर कोई दाग न हो.. फिर एक महाशक्ति को एक विशिष्ट रात्रि में बलि देता है.. नर बलि!

उसने स्वयं हँसते हुए कहा की इसकी ये तंत्र क्रिया दूसरे सभी तंत्रों से भिन्न है; बल्कि दूसरे शब्दों में देखा व कहा जाए तो ये कोई तंत्र क्रिया नहीं कुछ और ही था.. कुछ ऐसा जो इस दुनिया में विरले लोगों को ही पता है.

हर किसी में साहस नहीं होता है ये क्रिया करने का!

इस क्रिया व पद्धति को करने से उसे और अधिक विशिष्ट शक्तियां मिलेंगी. वो और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा.

इस गाँव में आने के कुछ ही समय में उसने इसी गाँव की चार लड़की के साथ दुराचार कर के उनका बलि दे चुका था.. अंतिम की खोज थी उसे. एक दिन गाँव के हाट (बाजार) में मुझे शौमक के साथ देख लिया था.

उसके चेले की इतनी सुंदर, देह से पूर्ण एक प्रेमिका हो सकती है ऐसा उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था.

शौमक के द्वारा मेरे ऊपर से वशीकरण हटा लेने के तुरंत बाद ही उस साधक ने भी मुझ पर वशीकरण अस्त्र चलाया और मुझे शौमक पर मुग्ध करवा दिया.

संसर्ग करते समय उस साधक ने मुझसे कहा था कि उसे पता था कि मैं और शौमक इस गाँव से बाहर नहीं जा सकते.. और मैं स्वयं ही इनके पास आऊँगी.. ये उस रात मेरी ही प्रतीक्षा में थे... तैयार!

अगले दो दिनों तक मेरे साथ यही कुकर्म चलता रहा..

चौथे दिन की रात्रि को मेरा बलि होना था... और संयोग से उस दिन उस साधक ने दिन भर और जी भर कर मदिरा पान किया. उसे बेहोश देख मैंने एक बार फिर वहाँ से भाग जाने का प्रयास करने का निर्णय लिया.

कदाचित उस दिन उस कुटिया को चारों ओर से बाँधने भूल गया था वो नीच... इसलिए मैं बड़े आराम से वहाँ से निकल गई.

पर अब भाग कर जाती कहाँ...

कौमार्य नष्ट हो चुका था मेरा... शौमक का क्या हुआ... वो जीवित रहा भी या नहीं... क्या ऐसी दशा में मुझे अपनाएगा? और यदि अपना भी लिया; तो क्या मुझे ये शोभा देगा की मैं अपने देवता को झूठे, बासी फूल अर्पण करूँ?

क्या मुँह ले कर घर जाऊँ? क्या वापस लौट आने के लिए ही घर से भाग कर प्रेमी के साथ शादी की थी? समस्त गाँव वालों के सामने तो परिवार वालों के मुँह पर कालिख पोत ही चुकी थी मैं.. तो अब कैसे... परिवार वाले मुझे स्वीकार कर अपनाना भी चाहे तो समाज उन्हें ऐसा करने नहीं देगा...

कहेंगे की ऐसा करने से एक ऐसे उदाहरण की सृष्टि होगी जिससे भविष्य पर गाँव की कई जवान - नादान लड़कियों पर गलत प्रभाव पड़ेगा.

किसी और के घर नहीं जा सकती. कोई रख भी ले तो कहीं वो भी उस नीच साधक की ही भांति न निकले..

चलते चलते इसी स्थान पर, इसी पेड़ के नीचे आ कर बैठी मैं. रुलाई छूट गई मेरी. बहुत देर तक रोती रही..

और कोई मार्ग शेष न था.. अतः एक भयानक निर्णय ले ली.

आत्महत्या!!

हत्या तो मेरी उसी रात हो गई थी; जिस रात उस नीच ने मेरा देह धर्षण कर के कौमार्य ले लिया था..

अब तो बस खानापूर्ति करनी थी.

स्वयं को दैहिक रूप से मार कर...

कार्य सहज न था. भला स्वयं के प्राण लेना भी कभी सहज होता है??

अपने भगवान और पूर्वजों से क्षमा माँगी..मन को दृढ़ की... और इसी पेड़ की सबसे ऊँची डाली से.... लटक गई.

समाप्त... मेरी इहलीला."

अवनी की आपबीती ने सबकी आँखों को भीगा दिया.

अंदर से हर कोई बुरी तरह से हिल गया.

कुछ पलों की चुप्पी के बाद बाबा ने पूछा,

"अब वो शैतान तांत्रिक कहाँ है?"

अवनी के बदले शौमक ने उत्तर दिया,

"अवनी के उसके चंगुल से छूट कर निकल जाने और बाद में आत्महत्या कर लेने के कारण उसका बलि का कार्यक्रम अधूरा रह गया था. जो सिद्धि उसे कुछ ही समय पश्चात मिलने वाली थी अब उसमें और भी अधिक विलम्ब हो गया. इसी कारण वो क्रोध से अत्यंत पागल हो उठा था. लक्ष्य के इतने निकट पहुँच कर असफ़ल होना किसी से भी सहन नहीं होता है.

अवनी के इस हरकत से उसे जो असफ़लता मिली और जो क्षति हुई; क्रोध के उन्माद में इसका प्रतिशोध वो पूरे गाँव से लेने की सोचा और एक रात यहाँ से जाने से पहले एक भयंकर क्रिया का संपादन किया. एक ऐसा अनुष्ठान जो कि किसी भी साधारण मनुष्य की कल्पना से परे थी.

चंडूलिका को जाग्रत किया उसने!

और हमें उसके अधीन कर दिया.

(कहते हुए कुछ क्षणों के लिए शौमक रुक गया. देखा की सभी उसकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रहे थे.. मुख से निकलते एक एक शब्दों को. पेड़, पौधे, घास, इत्यादि सभी वनस्पतियाँ भी मानो ठहर कर उसकी बातें सुनने को उत्सुक थे.)

(शौमक ने कहना जारी रखा...)

शादी की पहली रात से ही एक साथ घटी इतने सारे घटनाओं का हम दोनों पर बहुत गहरा धक्का लगा था जिसका प्रभाव हमारे मरणोपरांत भी रहा. उस तथाकथित तांत्रिक घेतांक और चंडूलिका ने हम दोनों को और भी अधिक वहशी बना दिया. अब हम दोनों को ही यौन संतुष्टि चाहिए थी.. हम दोनों ही गाँव वालों के बुद्धि को भ्रमित कर उनसे यौन सम्बन्ध स्थापित करते और जब काम हो जाता तब चंडूलिका के इशारे पर ही उन्हें मार भी दिया करते थे.. वैसे भी गाँव वालों को लेकर हमारे मन में अब तो कोई अच्छा विचार रहा नहीं था.. इसलिए उन लोगों को मारने में रत्ती भर का भी संकोच नहीं होता था."

इतना कह कर शौमक अपनी बात ख़त्म किया.

कदाचित बाबा से रहा नहीं गया; ज़ोर से बोल पड़े,

"बस... !! बहुत हुआ... अब और नहीं.. अब और कष्ट नहीं!!"

कहते हुए आसन पर बैठ गए.

मंत्रोच्चारण प्रारंभ किया.

अब की बार अलग ही उद्देश्य था बाबा का जो शीघ्र ही सामने आ गया.

एक नारियल लिया. लम्बा सा लाल तिलक लगाया. मंत्रोच्चारण चलता रहा.

और थोड़े ही समय पश्चात् एक मद्धम नील प्रकाश से आलोकित हो गया वह नारियल. थोड़े और मंत्रोच्चारण के बाद अचानक न जाने कहाँ से एक सफ़ेद तेज़ रौशनी आई और उस नारियल में समा गई!

बाबा सामने देख कर बोले,

"तुम दोनों ने बहुत कष्ट झेला है.. अब विश्राम करो. मैं कल सुबह ही तुम दोनों की अंत्येष्टि एवं अन्य क्रियाकर्म कर दूँगा. साथ में पिंडदान की व्यवस्था भी. अब जाओ! विश्राम करो!!"

बाबा के हुंकार रुपी आदेश का तुरंत प्रभाव देखने को मिला.

धीरे धीरे शौमक और अवनी हवा में विलीन हो गए. मुखमंडल में एक सुखद प्रसन्नता, आभार एवं संतुष्टि लिए.

बाबा ने भुजंग का आह्वान किया. उसके आते ही बाबा ने सामने धरा पर बेसुध पड़े देबू और रुना को उनके घर पहुँचा देने का आदेश दिया.

तत्क्षणात् आदेश का पालन हुआ.

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अगले दिन सुबह,

अपने वचनानुसार बाबा ने सभी कार्य संपन्न कर दिया.

फ़िर अपने साथ सहयोगियों और शिष्यों को लेकर जंगल के बहुत अंदर एक सुनसान स्थान पर गए. जंगल के और सभी स्थानों से ये स्थान तनिक हट कर था.

बाबा ने गणना कर के ज़मीन पर एक बहुत गहरा गड्ढा खुदवाया.

तत्पश्चात वहाँ उस गड्ढे के अंदर मंत्रोच्चारण के बीच उस नारियल को झोले में से निकाल कर बहुत सावधानी से एक लाल कपड़े में पूरी तरह से लपेट कर ढक कर रख दिया और फिर मंत्रोच्चारण के साथ ही उस गड्ढे को भरने का आदेश दिया.

गड्ढा भरते ही चांदू बहुत उत्सुकतावश पूछ बैठा,

"गुरूदेव... इस नारियल में क्या है? कल एक अद्भुत प्रकाश को इसमें प्रविष्ट होते देखा था."

"इसमें उस चंडूलिका की प्रतिछाया है वत्स... महाप्रेत को बुलाते समय मैंने शौमक और अवनी को अपने तंत्र पाश में बाँध दिया था. ऐसा करते ही उस चंडूलिका को पता चल गया था की कदाचित कल उसकी पराजय निश्चित है. जो महाप्रेत को बुलाने की क्षमता रखता हो वो और कई तरह की सिद्धियाँ भी अवश्य ही रखता होगा.

यह सोच कर ही वह फ़ौरन इस गाँव को छोड़ कर अन्यत्र कहीं चली गई. जाने से पहले अपनी प्रतिछाया को छोड़ गई. क्यों... इसका कोई सटीक उत्तर नहीं है मेरे पास.

इस बात का सदैव ध्यान रहे वत्स... की ये है तो चंडूलिका की प्रतिछाया मात्र; पर कम शक्तिशाली नहीं है. अतः ये इस सुनसान... इस वीराने में ही इस गड्ढे के अंदर नारियल में कैद रहनी चाहिए.. किसी भी प्रकार से यदि बाहर निकलने में सफ़ल हो गई तो घोर अनर्थ हो जाएगा...

..... वैसे.."

"वैसे.. क्या गुरूदेव?"

"ऐसा कहते हैं कि इन्हें जो कोई भी स्वतंत्र करता है ये उन्हीं की हो कर रह जाती हैं... संसार का समस्त सुख, हर प्रकार का सुख अपने उद्धार करने वाले की झोली में डाल देती है. कभी कभी तो कई प्रकार की शक्तियाँ भी प्रदान करती हैं.

पर ये सब कहने सुनने की बातें हैं.. वास्तविकता से इनका कोई लेना देना है या नहीं; ये कोई नहीं जानता आज तक."

"परन्तु गुरूदेव... गाँव वालों ने वाकई बहुत बुरा किया था न शौमक और अवनी के साथ."

"गाँव वाले क्या कर रहे थे ये स्वयं गाँव वालों को भी पता नहीं था क्योंकि वे सभी उस शैतान घेतांक के सम्मोहनी विद्या से प्रभावित थे. गाँववालों को अपनी करनी केवल दिख रही थी; अपने सोच पर कदापि नियंत्रण नहीं था उन लोगों का."

अब गोपू ने एक प्रश्न किया,

"गुरूदेव, ये शौमक और अवनी की आत्माएँ देबू और रुना के शरीर में क्यों प्रवेश कर गए थे... कारण क्या था?"

"देबू और रुना, दोनों ही काफ़ी हद तक शौमक और अवनी के जैसे दिखने में थे. अति संयोग ही है यह कि देबू और रुना के जन्म के समय की ग्रह - नक्षत्र की दिशा दशा बिल्कुल वैसी ही थी जैसी शौमक और अवनी की. और देबू भी रुना की ओर आकर्षित था कुछ समय से. इन्हीं सब कारणों ने ऐसी अवांछनीय परिस्थितियों को बल दिया."

"घेतांक और चंडूलिका का क्या होगा गुरूदेव... क्या वो फिर कभी गाँव वापस आएँगे?"

"चंडूलिका तो नहीं आएगी वत्स. इनका एक स्वभाव होता है कि जिस स्थान को एक बार ये छोड़ देती है, वो वहाँ दोबारा कभी नहीं जाती. अतः गाँव वाले चंडूलिका के आतंक से अब पूर्णतः मुक्त हैं और सदैव रहेंगे. रहा प्रश्न घेतांक का तो उसका कुछ कह नहीं सकता. वापस आ भी सकता है... और नहीं भी. वैसे, न आने के ही संभावनाएँ अधिक हैं; क्योंकि अगर आ गया, तो अब गाँव वाले उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे."

इसके बाद बाबा और उनके दो सहयोगियों ने कुछेक क्रियाएँ और की वहाँ और फिर सब वहाँ से चले गए.

गाँव में कुछेक दिन और रह कर, सब के धन्यवाद स्वरूप अनेक प्रकार के भेंट पा कर; एक निश्चित दिन, निश्चित घड़ी देख कर बाबा अपने सहयोगियों और शिष्यों के साथ गाँव वालों से विदा ले कर चले गए. गाँव वालों ने नम आँखों से उन्हें विदा किया.

*समाप्त*
 

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गाँव में हर ओर शांति ही शांति छा गई.

दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने लगे.

अब संध्या समय दुकान जल्दी बंद करने की जल्दी किसी को नहीं रहती. किसी को किसी प्रकार का भय नहीं था. सभी के मन हल्के थे.

चाय दुकान हो या दारू दुकान; दोस्तों संग मिल कर अब हर कोई मस्त था.

केवल एक को छोड़ कर...

बिस्वास जी...

बाबा जी के जाने के बाद से ही बड़े व्याकुल, चिंतित रहते थे..

खाना पीना कम हो गया था.

हरदम, हर क्षण किसी चिंता में डूबे रहते थे.

सुख शांति तो जैसे अनायास ही किसी ने छीन लिया हो उनसे.

आस पड़ोस वालों से, मित्रों से... सब से बात करना कम कर दिया था बिस्वास जी ने. कुछेक लोगों से तो बात करना ही लगभग छोड़ चुके थे.

धीरे धीरे एक महिना बीत गया.

एक रात कमरे में अपने बिस्तर पर सोते हुए अचानक से उठ बैठे.

चेहरे पर भय और आँखों में जिज्ञासा स्पष्ट दिख रही थी.

कान लगा कर दूर कहीं से कुछ सुनने का प्रयास करने लगे.

'हाँ.. एक आवाज़ तो आ रही है... जनाना आवाज़.. कौन हो सकती है?'

बिस्वास जी उठ कर बंद खिड़की के पास जा कर खड़े हो गए. पिछले कुछ दिनों से बिस्वास जी अपने कमरे के दो में एक खिड़की को बंद कर के ही सोते थे. उनके बिस्तर के ठीक बगल वाले खिड़की को बंद रखते थे; जबकि दूसरा खिड़की जोकि उनके बिस्तर से थोड़ा दूर था; उसे खुला रखते थे.

सोचने लगे,

'पर ये रो क्यों रही है..?'

'नहीं नहीं; ये हँस रही है.'

वाकई में एक बहुत ही वीभत्स हँसी की आवाज़ दूर कहीं से सुनाई दे रही थी. किसी को भी अंदर से कंपा देने वाली हँसी.. असीम आनंद और दुःख से भरी हुई, साथ ही अत्यंत हिंसक.. निष्ठुर.. क्रूर...

अचानक बिस्वास जी की नज़र कमरे में ही उनसे थोड़ी दूर स्थित आदमकद आईने पर गई.

पता नहीं क्यों, वे उस ओर आकर्षित हो गए... धीरे पगों से उसकी ओर बढ़े.. और जा कर आईने के बिल्कुल सामने खड़े हो गए. आँखें सिकुड़ कर उसमें कुछ देखने का प्रयास करने लगे.

कुछ क्षण तक तो देखने का ही प्रयास करते रहे..

और अचानक....

आँखें घोर आश्चर्य और असीम भय से पथरा गए.. हृदय ज़ोरों से धड़कने लगा. इतने ज़ोर से की वो स्वयं अपने कानों से ही अपने हृदय के स्पंदन को सुन पा रहे थे..

पास एक छोटे से टेबल पर रखे अपने चश्मे को आँखों से लगाया..

"उफ़!! नहीं! ये क्या........?"

इससे अधिक नहीं बोल पाए बिस्वास जी.

उनके पीछे से दो सड़े हुए हाथ, जिनसे कहीं कहीं से मांस लटक रहे थे, खून टपक रहे थे, अँगुलियों में करीब तीन - तीन इंच के लाल लंबे नाखून मानो अपने शिकार को शीघ्र पकड़ने के लिए तड़प रहे हों; धीरे धीरे बिस्वास जी के चेहरे के दोनों ओर से आगे की तरफ़ निकले....

और फिर....

..... रात के सन्नाटे में दूर दूर तक एक तेज़ चीख़ तैर गई!




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