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Horror भूत बंगला

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“पर ऐसा कैसे हो सकता है ……इट इज इम्पोसिबल …” निहारिका को करण की बातों पर यकीन नहीं हो रहा था.

“पर यह सब बताने के लिए मैंने तुम्हे उस दिन फ़ोन नहीं किया था …….” करण फिर गंभीर हो गया.

“तो फिर किसलिए फ़ोन किया था तुमने …….” निहारिका को एक के बाद एक शोक मिल रहे थे.

“उस लड़की के मरने से पहले मुझे उस लड़की की शक्ल एक पल के लिए देखने को मिल गयी ……”

“कौन थी वो ……” निहारिका ने पुछा

“वो तुम थी ……उसकी शक्ल हूँ-ब-हूँ तुमसे मिलती थी.”

“क्या ….!!!” निहारिका पे जैसे एटम बम्ब गिर गया हो . वो अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई. उसके कुछ समझ में नहीं आ रहा था की उसे करण की बातों पर विश्वास करना चाहिए या नहीं.

“मुझे पता है तुम्हे मेरी बातों पर यकीन नहीं होगा …..” करण भी उठ खड़ा हुआ और निहारिका के पास जाकर उसका हाथ थाम लिया.

निहारिका ने करण का हाथ झटक दिया और उसके गालो पर तमाचा मार दिया, “तुम मेरे साथ मजाक क्यूँ कर रहे हो, मुझे लगता है तुम्हे डॉक्टर के पास चलना चाहिए, तुम्हे गहरा सदमा लगा है …..”

निहारिका के हाथ झटकने से और तमाचे से करण को बहुत बुरा लगा. फिर भी उसने अपने आप को संभाला.

“मजाक और मैं तुम्हारे साथ…….ओह गिव मी ए ब्रेक …….मजाक तो ज़िन्दगी ने मेरे साथ किया है, तुम्हें क्या लगता है यह जो घाव है मेरे जिस्म पर वो किसने दिए हैं, किसने मुझपे जानलेवा हमला किया, किसने उस निर्दोष मनोहर को मार डाला, किसने उन सारे लोगों की जान ली जो कभी उस बंगले में रुके थे …..मैं जब से उस बंगले में आया हूँ तब से मेरे साथ डरावनी घटनाये हो रही है ….” करण दांत पीसता हुआ बोला.
 
“मजाक और मैं तुम्हारे साथ…….ओह गिव मी ए ब्रेक …….मजाक तो ज़िन्दगी ने मेरे साथ किया है, तुम्हें क्या लगता है यह जो घाव है मेरे जिस्म पर वो किसने दिए हैं, किसने मुझपे जानलेवा हमला किया, किसने उस निर्दोष मनोहर को मार डाला, किसने उन सारे लोगों की जान ली जो कभी उस बंगले में रुके थे …..मैं जब से उस बंगले में आया हूँ तब से मेरे साथ डरावनी घटनाये हो रही है ….” करण दांत पीसता हुआ बोला.

मारने को तो निहारिका ने तमाचा मार दिया गुस्से में पर अब वो सॉरी फील कर रही थी …उसने अपना मुंह खोला ही था सॉरी कहने के लिए की तभी करण फिर बोल पड़ा

.

“मिस निहारिका चौहान ……मैं होता कौन हूँ आपसे मजाक करने वाला …और यह सच है की, जिसके साथ ऐसी घटनाएं होती है, सिर्फ वोही समझ सकता है इन बातों को ……खैर जाने दीजिये आप नहीं समझेंगी मुझे ….” कहते हुए करण ने अपना मूंह फेर लिया, और जाने लगा.

निहारिका उसे जाते जाते देख रही थी. वो करण का हाथ झटक कर उसका दिल नहीं दुखाना चाहती थी. उसे ग्लानी होने लगी अपने ऊपर.

पर जाते-जाते करण मुड कर वापस निहारिका को देखा, “निहारिका …..आई ऍम सॉरी मैंने कल रात से तुम्हें तकलीफ दे रहा हूँ ….एंड थैंक्स फॉर यौर केयर…..मैं अब और तुमपे बोझ नहीं बन सकता ….गुडबाय.” और करण लड़खड़ाते हुए जाने लगा.

“प्लीज़ करण ……….आई ऍम सॉरी.” निहारिका ने चिल्ला के कहा, जिसे सुनकर करण के कदम ठहर गए.

करण वापस मुड़ा तो निहारिका दौड़ कर उसके पास आई और उसके गले लग गयी.

“कहाँ जा रहे थे तुम ………और दोबारा कभी अपने आप को मुझपे बोझ मत कहना वरना मैं तुमसे कभी बात नहीं करुँगी ...” उसने करण की छाती पर बनावटी गुस्से और प्यार से दो चार मुक्के जड़ दिए.

“मैं अपने बंगले पे जा रहा हूँ और अपना सामान पैक कर के वापस लन्दन चला जाऊंगा ….बस तुमसे आखरी बार गुडबाय कह रहा था.” करण ने कठोरता से कहा.

निहारिका की आँखों में आंसू आ गए. वो अपनी किस्मत को कोस रही थी, पहली बार तो उसे किसी से प्यार हुआ था, और अब वो भी उसे छोड़ के जा रहा है. वो किसी भी तरह करण को अपने पास रोक लेना चाहती थी.

“मेरी बातो का इतना बुरा मान गए की मुझे छोड़ के जा रहे हो …….” निहारिका ने सीधे करण की आँखों में आँखे ड़ाल के देखा. उसकी आँखों से आंसू गिर के उसके कोमल गालो को भिगो रहे थे.

“तुम मुझे पागल समझती हो, डॉक्टर के पास ले जाना चाहती हो ……तो मैं तुम्हारी मुश्किलें आसान कर रहा हूँ …..मैं खुद ही लन्दन चला जाऊंगा और वह अपने इस पागल दिमाग का इलाज करा लूँगा …इसी बहाने तुम्हारे पैसे भी बच जायेंगे....हुह .” करण ने निहारिका को अपने सीने से झटके से दूर करते हुए कहा.

“प्लीज़ करण मुझे ऐसे छोड़ कर मत जाओ ……” निहारिका वहीँ रोने लगी.
 
“तुम हमारी दोस्ती ऐसे नहीं तोड़ के जा सकते …….” निहारिका कहना तो ‘प्यार’ चाहती थी ‘दोस्ती’ की जगह ….पर बस कह ना सकी.

करण उसे इग्नोर कर के लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ गया, उसकी जांघो में अभी भी दर्द हो रहा था. वो ना तो उस बंगले में और ना ही इंडिया में अब और रुकना चाहता था.

निहारिका करण को जाते देखती रही. वो समझ गयी थी की अब करण रुकने वाला नहीं है. पर क्या करे दिल के हाथो मजबूर होके वो फिर करण की ओर दौड़ पड़ी और उसका हाथ थाम लिया.

उसने अपने आंसू पूंछते हुए कहा, “पता नहीं तुम मुझे कौन से गुनाह की सजा दे रहे हो …..खैर अभी तुम्हारे घाव पूरी तरह से ठीक नहीं हुए है ….तुम्हें बंगले तक मैं छोड़ देती हूँ....”

वो मुड़ी और अपने घर से अपने कार की चाभी ले आई. कार स्टार्ट कर के वो करण के पास आई और दरवाज़ा खोल दिया. करण उसे इग्नोर कर के आगे बढ़ने लगा. वो भी यह सब अपने दिल पे पत्थर रख के कर रहा था. उसने एक बार निहारिका की तरफ देखा जो ड्राईवर की सीट पे बैठी उसके बगल में धीरे-धीरे गाड़ी चला रही थी.

“प्लीज़ …………….” निहारिका ने रिक्वेस्ट किया.

इस बार करण निहारिका को मना नहीं कर पाया और उसके बगल में कार में बैठ गया. जैसे जैसे कार बंगले की तरफ जाती जा रही थी, वैसे वैसे करण की दिल की धड़कन बढती जा रही थी.

रास्ते भर दोनों ने एक दुसरे से कुछ बात नहीं की बस निहारिका धीरे-धीरे सुबकती रही. उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे. अब करण का दिल इतना भी कठोर नहीं था की जिस से वो प्यार करता था उसे ऐसे रोते हुए हालत में उसे हमेशा के लिए छोड़ के चला जाये.

थोड़ी ही देर में निहारिका की कार बंगले पर पहुँच गयी. सामने पुलीस की बहुत सी गाड़ियाँ खड़ी थी, और आस-पास के गाँव के लोगों का हुजूम इकट्टा हो गया था. बहुत से पुलिसवाले इधर उधर घूम रहे थे, कुछ के पास तो खोजी कुत्ते भी थे.
 
थोड़ी ही देर में निहारिका की कार बंगले पर पहुँच गयी. सामने पुलीस की बहुत सी गाड़ियाँ खड़ी थी, और आस-पास के गाँव के लोगों का हुजूम इकट्टा हो गया था. बहुत से पुलिसवाले इधर उधर घूम रहे थे, कुछ के पास तो खोजी कुत्ते भी थे.

निहारिका आज पहली बार इस बंगले पर आ रही थी. हालाँकि उसने कई बार रास्ते से गुजरते हुए इस बंगले को देखा था पर वो आज पहली बार इसके अन्दर जाने वाली थी.

कार रुकते ही निहारिका उसमे से उतर गयी और एक नज़र बंगले पे डाली. उस बंगले को देख के ही कोई भी कह सकता था की दुनिया भर की मनहूसियत उस बंगले में भरी हुई है. गार्डन्स तो थे पर उसमे पौधे बिना पानी के सूख के मर गए थे. बंगले के चारो तरफ नीम के बड़े बड़े पेड़ थे पर वो सब भी मर गए थे जैसे उन्हें किसी ने सदियों से भी पानी नहीं दिया हो. पूरा बंगला बेजान और बंजर लग रहा था.

निहारिका ने देखा की करण अभी भी कार में ही है. उसे लग गया की करण उस बंगले में जाने से घबरा रहा है.

“कमओन ??? बाहर आओ, मैं हूँ ना ………” उसने प्यार से मुस्कुरा के कहा.

करण, मरता क्या ना करता, इसीलिए वो बाहर आ गया. बंगले को एक नज़र देख के ही उसकी रूह कांप गयी. सिलसिलेवार उसे सारी घटनाएं याद आती चली गयी जो उसके साथ घटी थी इस बंगले में आने के बाद.

तभी दोनों ने देखा की एक पुलीस वाला उनकी ओर आ रहा है.

“मैडम आप लोग कौन है…….? और यह क्या कर रही है….?” उस पुलीस वाले ने निहारिका से कहा.

“ऑफिसर मेरा नाम निहारिका चौहान है, मैं मशहूर वकील संतोष चौहान की बेटी हूँ.” निहारिका ने अपना परिचय दिया.

“अरे संतोष सर को कौन नहीं जानता, अक्सर हमारी मुलाकात होती रहती है उनसे ………पर आपने बताया नहीं की आप यहाँ कैसे …?” उस पुलिसवाले ने कहा.

“वो एक्चुअली ऑफिसर मैं यहाँ अपने दोस्त को ड्रॉप करने आई थी अपनी कार से …..” निहारिका ने जवाब दिया.

उस पुलिसवाले ने एक नज़र डाली करण के ऊपर. “आपके साथ यह महाशय कौन है …?” उसने पुछा.

“कहा ना ऑफिसर यह मेरा दोस्त है …..करण मल्होत्रा, यह इस बंगले का मालिक है, कुछ दिन पहले ही लन्दन से आया है …” निहारिका ने जवाब दिया.

“यहाँ यह सब क्या हो रहा है ऑफिसर …..आपलोग यहाँ ….और यह गाँव वाले ….? इस बार करण ने सवाल किया.

“जब आप इस बंगले के मालिक है तो आपको पता होना चाहिए की यहाँ दो-दो खून हो गए है.” पुलिसवाले ने गंभीरता से कहा.

करण को तो लग ही रहा था की पुलीस ज़रूर आएगी. अगर पुलीस उस से सवाल करती तो वो क्या जवाब देता शायद वो भी नहीं जानता था.

करण की चुप्पी और डर को पुलिसवाला ताड़ गया, “क्या आप बता सकते है की कल रात आप कहाँ थे …?” उसने पुलिसिया स्टाइल में सवाल किया.

मगर करण को कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था. आखिर वो कहता भी क्या, अगर सच कहता तो सीधा जेल जाता क्यूंकि वो जो भूत प्रेतों की कहानी उस पुलिसवाले को बताने जाता वो उसपे शर्तिया यकीन नहीं करता. इसीलिए करण चुप रहा.
 
मगर करण को कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था. आखिर वो कहता भी क्या, अगर सच कहता तो सीधा जेल जाता क्यूंकि वो जो भूत प्रेतों की कहानी उस पुलिसवाले को बताने जाता वो उसपे शर्तिया यकीन नहीं करता. इसीलिए करण चुप रहा.

“यह खून कैसे हुए ऑफिसर …..” निहारिका ने बीच में बोला.

“मैडम अभी कुछ पता नहीं चल पाया है …..गाँव वालो ने लाशो की शिनाक्त कर दी है …….एक आदमी है उसका नाम है मनोहर, उसकी किसी ने बेरहमी से छाती फाड़ के हत्या कर दी है. दूसरा लाश एक औरत का है जिसे रेखा के नाम से गाँव वालो ने पहचाना है, उसकी मौत हार्ट अटैक से हुई है, उसके दिमाग की हर नस फट गयी है ……शायद बेचारी अपने पति की हत्या देख नहीं पाई और उसे हार्ट अटैक आ गया.

वो तो असल में करण ही जानता था की मनोहर को रेखा ने मारा है और रेखा को उस परलौकिक शक्ति ने. लेकिन उसे यह डर लग रहा था की कहीं वो इन सब मामलो में ना फँस जाए. उसने इंडिया के पुलीस वालो के बारे में सुन रखा था की वो केस जल्दी सुलझाने के लिए किसी पे भी मर्डर का इलज़ाम लगवा देते है.

“तो मिस्टर. करण मल्होत्रा आपने बताया नहीं की आप कल रात कहाँ थे जब यह दोनों खून हुए थे.” पुलिसवाले ने करण की ओर देख के पुछा.

निहारिका मौके की नजाकत को समझ गयी, उसको लग गया की करण कोई जवाब नहीं दे पायेगा जिस से उसपे शक और गहरा सकता है. आखिर वो जाने माने वकील की बेटी और खुद एक वकील थी. उसका दिमाग तेज़ चलने लगा कोई कवर स्टोरी बनाने के लिए ताकि पुलीस का शक करण के ऊपर से हटा सके.

“वो एक्चुअली ऑफिसर कल रात को इस बंगले में कुछ चोर लुटेरे घुस आये थे. सब बंगले में सो रहे थे. वो सब शायद चोरी के मकसद से आये थे. लेकिन मनोहर ने उन्हें देख लिया, तो उन लोगो ने उसको मार दिया, शायद उसकी पत्नी भी यह सब देख के दिल के दौरे की वजह से मर गयी …..फिर करण को जब लगा की बंगले पे चोर गुस आये है, तो यह उनसे अकेले भीड़ गया. और आप देख सकते है की उन चोरो की मुठभेड़ में करण को कितनी चोट लगी है ….देखिये पीठ पूरा छलनी हो गया है. पैर में भी काफी चोट आई है.” निहारिका ने पुलिसवालों को करण के ज़ख्म दिखाए. उसने बड़ी चालाकी से पुलिसवाले को आश्वस्त कर दिया था की दोनों खून में करण कही इन्वोल्ड नहीं है. एक अछे वकील की हर खूबिया थी निहारिका के अन्दर.
 
फिर करण को जब लगा की बंगले पे चोर गुस आये है, तो यह उनसे अकेले भीड़ गया. और आप देख सकते है की उन चोरो की मुठभेड़ में करण को कितनी चोट लगी है ….देखिये पीठ पूरा छलनी हो गया है. पैर में भी काफी चोट आई है.” निहारिका ने पुलिसवालों को करण के ज़ख्म दिखाए. उसने बड़ी चालाकी से पुलिसवाले को आश्वस्त कर दिया था की दोनों खून में करण कही इन्वोल्ड नहीं है. एक अछे वकील की हर खूबिया थी निहारिका के अन्दर.

“देखिये करण साहब, यह आपका लन्दन नहीं है की आप चोरो से सीधे भीड़ जाए, देखिये आपको कितनी चोट लगी है, जान भी जा सकती थी आपकी, अगली बार कोई ऐसी घटना घटे तो हेरोगिरी ना दिखाकर पुलीस को फ़ोन कर दीजियेगा.” वो पुलिसवाला करण को हिदायत देके चला गया.

उसके पीछे-पीछे धीरे-धीरे गाँव वाले भी चले गए। उसमे से एक निकल के आया। करण उसको देखते ही पहचान गया. वो भुवन था, जिसने पहली बार आते ही उसकी गर्दन पकड़ ली थी. करण को उसकी दी हुई चेतावनी भी याद थी की उसे इस बंगले में नहीं रहना चाहिए. उसे लगा की काश वो भुवन की चेतावनी मान लेता तो शायद आज मनोहर और रेखा जिंदा होते.

“थारे से कहे रहे थे की ….ये बंगला श्रापित है ……लेकिन थारे दिमाग में यह बात नहीं गयी. मैंने तो पहले ही कहा था की जो भी इस बंगले में रहेगा ……उसे सिर्फ मौत मिलेगी.” कहकर भुवन अपने रास्ते चल दिया.

करण उसे जाते हुए देख रहा था. कही न कही वो मनोहर और रेखा की मौत का ज़िम्मेदार खुद को मान रहा था.

“चलो अन्दर चलते है ………” निहारिका ने शान्ति भंग की फिर करण का हाथ पकड़ के उसे अन्दर ले जाने लगी.

“तुम्हे इन गाँव वालो की बातों पे ध्यान नहीं देना चाहिए ….” निहारिका ने कहा.

“थैंक्स निहा …..अगर तुम कोई कहानी नहीं बनती तो मैं पक्का जेल में होता.”

“फिर थैंक्स …..अरे अगर मैं तुम्हारी वाईफ होती तब भी तुम मुझे थैंक्स कहते.” निहारिका ने हंस के चुटकी ली. करण ने कुछ नहीं कहा बस उसे निहारता रहा.

चूँकि निहारिका पहली बार बंगले में आई थी, अन्दर आने के बाद वो भी बंगले की भव्यता की तारीफ़ किये बगैर न रह सकी.

“कितना शानदार बंगला है यह ………” निहारिका ने चहक के कहा. वो तो करण ही जानता है की कितना ‘शानदार’ है यह बंगला असल में. करण का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा था निहारिका को छोड़ के जाने का, पर वो इस बंगले में और नहीं रुकना चाहता था. उसे पता था पिछली बार तो वो मरते-मरते बचा था, पर अगर इस बार फिर उसपे हमला हुआ

तो वो नहीं बच पायेगा.

“अआहह्ह्ह्ह ……” निहारिका हलके से कराह उठी.

करण सुन के, एक पल के लिए तो घबरा गया.

“क्या हुआ निहा ….?” करण ने पुछा.
 
“कुछ नहीं अचानक सर में तेज़ दर्द होने लगा है ……” निहारिका अपना सर पकड़ के सोफे पे बैठ गयी. बंगले में घुसते ही उसका सर दर्द होने लगा था.

“कोई बात नहीं थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा …..तुम यही बैठो मैं अपना सामान पैक कर के आता हूँ.” करण को लग रहा था की निहारिका बहाने बना रही है, ताकि उसे लन्दन जाने से रोक सके.

वो अपने कमरे में चला गया और अपना सामान पैक करने लगा. जितना भी कैश था उसने सब ले लिया ताकि ज़रुरत के समय वो कुछ काम आ सके.

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इधर हॉल में निहारिका का सर घूमने लगा. उसका सर का दर्द हद से ज्यादा बढ़ गया था. उसे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था की अचानक उसे सर में तेज़ दर्द कैसे उठ गया.

वो इधर-उधर देख ही रही थी की अचानक उसे वो ऊपर वाली मंजिल वाला कमरा दिखाई दिया. उसे याद आ गया की करण को उस लड़की का बलात्कार उसी कमरे में दिखा था.

वो उठी और ऊपर वाले मंजिल की तरफ बढ़ने लगी. एक-एक सीढ़ी चढ़ना उसके लिए भारी हो गया था, मानो कोई उसे नीचे खींच रहा हो, कोई नहीं चाहता की वो उस कमरे में जाए.

इधर करण इस सब से बेखबर अपने कमरे में जल्दी-जल्दी सामान पैक करने में लगा हुआ था. और वहीँ निहारिका धीरे-धीरे उस कमरे तक पहुँचती जा रही थी.

कमरे तक पहुच कर उसे अजीब सा एहसास हो रहा था जो उसे पहले कभी नहीं हुआ था. वो दरवाज़ा खोल के उस कमरे के अन्दर चली गयी.

अन्दर जाके उसे वही सब दिखाई दिया जो करण को दिया था. ऐसा लग रहा था की वो किसी लड़की का बेडरूम है. बड़ा सा किंग साइज़ बेड था जिसपे धुल से भरा हुआ बेडशीट था. बेड ही क्या पूरा कमरा धुल से भरा हुआ था

जैसे वहां कोई बरसो से नहीं आया हो.
 
अन्दर जाके उसे वही सब दिखाई दिया जो करण को दिया था. ऐसा लग रहा था की वो किसी लड़की का बेडरूम है. बड़ा सा किंग साइज़ बेड था जिसपे धुल से भरा हुआ बेडशीट था. बेड ही क्या पूरा कमरा धुल से भरा हुआ था

जैसे वहां कोई बरसो से नहीं आया हो.

कमरे में बाहर के मुकाबले ज्यादा ठण्ड थी. निहारिका को सलवार कमीज़ में हलकी ठण्ड लगने लगी. वो पूरे कमरे को उत्सुकता से देख रही थी.

निहारिका ने देखा की पास में एक वार्डरोब है. उसमे कई सारे लडकियों के मेकअप का सामान था. सामने एक बड़ा शीशा लगा हुआ था.

“करण यह सब लडकियों के मेकअप मेटेरिअल से क्या करता है ….?” सोचते हुए निहारिका दराज की तरफ बढ़ी.

उसने वार्डरोब का एक दराज खोला तो उसमे एक कागज़ का टुकड़ा था, उसमे वही लिखा हुआ था जो की कुछ दिन पहले करण ने पढ़ा था.

“अब शादी के दिन दूर नहीं है मेरे प्रीतम …..अब ये जुदाई सहन नहीं होती, जल्दी से बरात लेके आजाओ …. हमारे मिलन का साक्षी ये पूरा संसार होगा ….मैं तुम्हारा इंतज़ार करुँगी ….तुम्हारी प्रियसी .”

निहारिका ने पढ़ते हुए बोला.

“यह चिट्ठी, यह ख़त मुझे लगता है मैंने पहले कहीं देखा है ……

“पर यह कैसे हो सकता है, मैं तो आज पहली बार आई हूँ यहाँ …….मुझे याद नहीं आ रहा की मैंने यह ख़त कहा देखा है ….???” निहारिका सोच में पड़ गयी.

उसने ओर इधर-उधर खोजना चाह, और कुछ याद करने की कोशिश की, लेकिन उसे याद नहीं आया की वो ख़त उसने कहाँ देखा है. बड़ा भ्रमित महसूस कर रही थी वो.

इधर करण को बहुत बुरा लग रहा था. जिस लड़की ने उसकी इतनी मदद की, जब कोई न था, तब उसने उसके घावो की मर्हम पट्टी की थी, समय रहते उसे पुलीस से बचाया, और तो और जो उसके दूर चले जाने से रोई भी,

वो उसका दिल दुखा के कैसे जा सकता था.

करण इसी उधेड़-बुन में खोया था की तभी .....

“बचाओ ओ ओ ………………” करण को निहारिका की चीख सुनाई दी.

वो एकदम सन्न रह गया. वो अपने कमरे से भाग के बाहर हॉल में आया तो देखा की निहारिका वहां नहीं है. बदहवास सा वो इधर-उधर देखने लगा तभी उसे ऊपर वाली मंजिल का वो कमरा याद आया. वो भाग के ऊपर गया, बिना अपने घायल पैर की परवाह किये बगैर. “हे ..हेल्प …म..मी ….क ..करण ……..” निहारिका की घुटी-घुटी आवाज़ आई.

कोई अनजान, अदृश्य, परलौकिक रूहानी ताक़त उसका गला दबा रही थी.

वो भाग के कमरे मी पंहुचा तो उसके होश उड़ गए. माहोल एकदम वैसा ही भयानक था जैसा पिछली बार रेखा पर प्रेत का साया आने पर था. पूरे कमरे की लाइट ऑन-ऑफ ऑन-ऑफ हो रही थी. बिन मौसम तूफ़ान आया हुआ था उस कमरे मे. सारी खिड़कियाँ जोरो से खटखटा रही थी. अब तो लाइट इतनी जल्दी ऑन-ऑफ हो रही थी की उनमे से कई तो फ्यूज होके चकना-चूर हो गयी. हवाएं जोरो से सन-सना रही थी. पूरा माहोल बहुत भयानक था.

कमरे के बीच मे करण ने देखा की निहारिका नीचे ज़मीन पे पड़ी तड़प रही है. वो भाग के जैसे ही उसके पास पंहुचा, वैसे ही उस प्रेत आत्मा ने उसे दूर उछाल दिया. अपनी पिछली गलतियों से सीख ले के वो इस बार अपना बैलेंस बनाने मे कामयाब हो गया.

वो फिर से निहारिका की तरफ बढा पर फिर से दूर उछाल दिया गया. वो भूत उसे निहारिका के पास आने ही नहीं दे रहा था. इस बार करण बैलेंस नहीं बना पाया और सीधे दिवार से जा टकराया. उसका सर सीधे दिवार से जा लगा जिस से बहुत सा खून बहने लगा. उसका सर फट गया था.

“क …करण ….पल ..प्लीज ….बचाओ …मु …मुझे ….” निहारिका का दम घुटता जा रहा था, उसके नाक से खून की धार निकलने लगी थी.
 

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