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Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

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वह अपने आपको फिर रोक न सका। दूसरे ही दिन आ पहुँचा मेरे यहाँ । वह सरोज को भी साथ ले आया था। जब मैंने सुरेश को यह बतलाया कि अन्य योगियों और तांत्रिकों की तरह रोग-व्याधि का उपचार करना मेरा काम नहीं है, तो उसकी आँखों की चमक एकबारगी बुझ गयी। खिला हुआ चेहरा उदास हो गया। कुछ देर तक तो वह शून्य में निहारता रहा, फिर आहिस्ते से बोला - "मगर शर्मा जी, मैं बड़ी आशा लेकर आया हूँ, आपके यहाँ । यदि मुझे निराश कर देंगे और मेरी सहायता नहीं करेंगे तो तत्र-मंत्र पर से मेरा विश्वास उठ जायेगा। मैं यहीं समझूगा कि सब धोखा है, फरेब है। आडम्बर और पाखण्ड है।" इतना कहने के बाद वह सिसक पड़ा।

सरोज की भी स्थिति करूणा जनक हो उठी थीं। मेरा कमरा मंत्र-पूत है। इसलिये कमरे के बाताबरण में न समय का प्रभाव है और न किसी प्रकार की सूक्ष्मधारी शरीर आत्माएं ही प्रवेश कर पाती है। जब मैं सरोज के बारे में सोच रहा था, तभी मुझे ऐसा लगा कि कोई अदृश्य शक्ति सरोज के चारों ओर चक्कर काट रही है और उसकी आत्मा को प्रभाबित भी कर रही है। निश्चय ही वह ब्रहा पिशाच था। यह समझते देर न लगी मुझे। थोड़ी देर बाद सरोज चेतना शून्य हो गयी और उसका सिर एक ओर लटक गया। शरीर भी ठंडा हो गया । इस स्थिति को देखकर मैं अपने को रोक न सका और न चाहते हुए भी मुझे सहायता करनी पड़ गयी। जैसा कि बतला चुका है, जब । मैंने "चिरागे हाजरात" में ब्रहा पिशाच और सरोज के पिछले जन्मों के तमाम घटनाओं और उनसे सबंधित करूण दृश्यों को देखा, तो एकबारगी मेरा मन द्रवित हो उठा। मेरे एक तांत्रिक मित्र हैं । नाम है चारूचन्द्र बनर्जी। बड़े पहुँचे हुए सिद्ध तांत्रिक है। मैंने उन्हें सारी कहानी सुनायी और अन्त में ब्रहा पिशाच का आवाहन करने का आग्रह किया। इसके लिए उनको एक तांत्रिक अनुष्ठान करना पड़ा और उसके बाद जब उन्होंने आवाहन किया, तो एक विषम स्थिति उत्पन्न हो गयी। ब्रहा पिशाच ने बतलाया कि दुर्घटना में मृत्यु होने के कारण उसे ब्रह्म पिशाच की योनि मिली है। स्थूल शरीर और भौतिक जीवन में उसकी जितनी आयु शेष थी, उसकी आठ गुनी आयु उस योनि में भोगनी पड़ेगी। तब तक उसका सम्बन्ध सरोज से बना रहेगा। कोई भी किसी हालत में उसे छुड़ा नहीं सकता। बात अपनी जगह पर बिल्कुल सत्य थीं। प्रकृति के नियम के अनुसार ब्रहा पिशाच की बाधा तबतक बनी रहती हैं, जबतक ब्रह्म पिशाच की आयु तामसिक लोक में रहती हैं।

चारू बाबू का चेहरा गम्भीर हो गया। थोड़ी देर बाद कुछ सोचते हुए मुझसे बोले - "इस स्थिति में किसी भी तांत्रिक क्रिया के द्वारा सरोज को ब्रहा पिशाच के चंगुल से मुक्त नहीं कराया जा सकता । बस इसके लिए एक ही रास्ता है और वह यह कि ब्रहा पिशाच को तामसिक योनि से किसी भी प्रकार मुक्त कराकर सूक्ष्म शरीर में भेज दिया जाये। अभी उसे शेष आयु भोगनी है। उसे इस दशा में मानव जन्म तो नहीं मिल सकता, लेकिन जो आयु शेष है उसे वह सूक्ष्म शरीर में भोगेगा, उसके बाद ही वह कहीं जन्म ले सकेगा। "इससे लाभ क्या होगा?" - मैंने प्रश्न जिया। "लाभ यह होगा कि ब्रह्म पिशाच का संबंध तामसिक शरीर के कारण सरोज से है और जब वह उसे छोड़कर सूक्ष्म शरीर में चला जायेगा, तो अपने आप संबंध टूट जायेगा।" "ठीक है।” मैंने स्वीकारोक्ति भरे स्वर में सिर हिलते हुए कहा - "आपको जो उचित प्रतीत हो करे।” काश ! मुझे इस बात की जरा सी भी भनक मिली होती कि मैं चारू बाबू को यह आज्ञा देकर अपने सिर पर बहुत बड़ा झंझट मोल ले रहा हूँ तो कदापि हाँ में हाँ न मिलाता । मगर जो होना था - वह हो गया। तीन जन्मों से चली आ रही प्रेम कहानी खत्म हो गयी। ब्रह्मा पिशाच तामसिक योनि से । हमेशा के लिए मुक्त होकर सूक्ष्म शरीर में बाकी आयु भोगने के लिए चला गया और सरोज भी उसके चंगुल से मुक्त हो गयी। आज सरोज अपने पारिवारिक जीवन में खुश है।

 
अध्याय ६ पिशाच सिद्धि

अपनी लम्बी आयु के दौरान मैंने सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का पता लगाने के लिए कितनी ही बार खतरा उठाया है। कितनी ही असम्भव और अलौकिक घटनाओं से मैं अभिभूत और चमत्कृत हुआ हूँ। लेकिन यहाँ मैं पाठकों में सस्ते कौतूहल की भावना जगाने के लिए यूँ ही किसी अद्भुत सनसनीखेज घटना का वर्णन करने नहीं जा रहा है। इस समय मैं जो सत्य कथा लिख रहा हूँ, मेरे जीवन की सबसे विलक्षण घटना है और जिसकी विलक्षण अनुभूति संभवतः अन्तिम सांस तक मेरे साथ जीवित रहेगी

लगभग पच्चीस वर्ष पहले की बात है उन दिनों मैं तंत्र-मंत्र पर गहन शोधकार्य करने में जुटा हुआ था। तंत्र-मंत्र सम्बन्धी एक से एक दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों तथा मंत्रों की खोज और संकलन के साथ साथ उच्चकोटि के सिद्ध महात्माओं और समर्थ तंत्र-साधकों से मिलने की भी पूरी चेष्टा किया करता था | इस युग में योग और तंत्र की साधना और विलक्षण शक्तियों पर भी शायद किसी को विश्वास आता हो, लेकिन मैं पूरी निष्ठा के साथ यही मानता था कि जीवन और जगत के गृहतम रहस्यों से परिचित होने का एकमात्र मार्ग साधना ही हैं। इस उद्देश्य के पीछे मैं पागल था और तो और गूढ़ ज्ञान प्राप्त करने के लिए मैंने बिश्व प्रसिद्ध तांत्रिकों के रहस्यमय देश तिब्बत की यात्रा भी की थीं । दुर्गम हिम-प्रदेश की मरणान्तक पीड़ा देने वाली यात्रा का मुझे फल भी मिला, लेकिन ज्ञान ही ज्ञान और मेरा उद्देश्य था तंत्र विद्याओं में निहित सत्य को पूरी गहराई के साथ स्वयं अनुभव करना। मैं भटकता रहा। लालसा बढ़ती ही रही । नशा गहरा होता गया। उन्हीं दिनों संयोग से मेरी भेंट एक महान तंत्र साधक श्री भवतारण तर्क पंचानन से हुई । वह वाराणसी में रहते थे - श्मशान काली के घोर उपासक और कितनी ही सिद्धियों से सम्पन्न । एक दिन चर्चा चल ही रही थी कि उन्होंने असम के दुर्गम पहाड़ी इलाके में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर रहने वाली एक तांत्रिक सन्यासिनी का जिक्र किया । उन्होंने बताया कि सन्यासिनी वैसे तो पगली के वेश में रहती है, लेकिन सचमुच अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त कर चुकी है वह । उन्होंने मुझे साबधान किया- पहले तो दुर्गम प्रदेश में पहुँचकर उसे खोजना ही मुश्किल है, दूसरे इतना श्रम करना इसलिए भी व्यर्थ है, क्योंकि वह किसी को अपने पास फटकने तक नहीं देती। लेकिन यह सब सुनकर भी मैं क्या समझता ? मैं तो अपने ही धुन में मस्त था । स्वप्न साकार होने की आशा ने सारी बाधाओं को लांघ लिया। कारण चाहे कुछ भी रहा हो । दुर्गम पथ की कठिनाइयाँ मुझे बैसी विकट नहीं लगी। एक दिन मैंने अपने आपको तर्क पंचानन महाशय द्वारा बताए गए स्थान पर खड़ा पाया । जिस स्थान पर श्मशान था - वहाँ ब्रह्मपुत्र का घाट बड़ा ही चौड़ा था । समुद्र की भांति उत्तुंग तरंगों से आन्दोलित महानद की प्रचंड धारा हाहाकार करती हुई मानों समूचे विश्व को निगल जाने के लिए पागल हो रही थी। घना जंगली इलाका। घाटियों और पहाड़ियों का लम्बा सिलसिला । जब मैं पहुँचा तब संध्या अंधेरे दानव की विराट काया के नीचे तड़फड़ा कर अवश हो चुकी थीं। मौत का सा सन्नाटा छाया था। धीरे-धीरे पूरब के आकाश पर घटाटोप बादल उमड़ने लगे और भीषण निःश्वास जैसी हवा हाहाकार करती हुई झाड़ियों और झुरमुटों को झिझोड़ने लगी। श्मशान पाकड़, पीपल आदि घने छतनार पेड़ों से घिरा हुआ था। उन्हीं के बीन था, काल भैरव का ..

प्राचीन जीर्ण-शीर्ण मन्दिर – कितनी ही चिताओं पर अधजली लाशें सुलग रही थीं। एक और चिता अब भी धूं-धूकर जल रही थी। श्मशान की उस निस्तब्ध विभीषिका से सिर पटकती हवा का भयावना चीत्कार मुझे क्लान्त, अवश करके अवसाद से भरे दे रहा था। सहसा आकाश में एक कोने से दूसरे कोने तक भीषण कौंध लपलपा उठी । इसके साथ ही तूफानी बिलाप सा करती हुई भीषण बर्षा होने लगी। मैं सिर छिपाने के लिए मन्दिर की ओर भागा। धरती रह-रहकर बिजली की प्रचंड कड़कड़ाहट से कांप-कांप उठती। एक बार फिर बिजली कौंधी और मन्दिर की टूटी-फूटी सीढ़ी पर फटी पुरानी गंदी सी कथरी लपेटे पड़ी एक विचित्र काया दिखाई पड़ी- पथराया हुआ सपाट चेहरा, भावशून्य आँखें, गन्दा चीकट जटाजूट, नंग-धडंग देह । मैं पथराया सा खड़ा रहा । मुझे देखते ही वह सहसा क्रोध में चीख पड़ी - "भाग, भाग यहाँसे । त्यहाँ कैसे चला आया ?" पहचानते देर नहीं लगी। मैं हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया, "माँ मुझ पर दया करो । मुझे अपना शिष्य बना लो माँ पगली चीख-चीख कर अन्धाधुंध गालियाँ बकती रही, "भाग यहाँ से...फिर कभी आया...तो लौटकर

नहीं जाने पाएगा...भाग...भाग ।" मन मारकर मैं लौट पड़ा । श्मशान से कुछ ही दूर पर एक छोटा सा गांव था। मुश्किल से पन्द्रह-बीस झोपड़े । वहीं शरण मिली। गांव के चौधरी को जब यह मालूम हुआ कि मैं उस पगली से मिलने के लिए ही वाराणसी से इतनी दूर आया हूँ तो आश्चर्य और आशंका से उसकी आँखें कपाल पर चढ़ गई। बोला, "उसके पास फिर मत जाना बाबू। बहुत बड़ी तांत्रिक है। इसके चक्कर में पड़ने का मतलब है सर्वनाश ।" चौधरी से ही उस पगली की कथा मालूम हुई। वह बंगाल के किसी स्टेट की राजकुमारी थी। अनिन्द्य सुन्दरी, सहसा किसी सिद्ध कापालिक की आँखों में गड़ गई। कापालिक राजकुमारी पर आसक्त हो गया और एक दिन उसे वश में कर के अपने साथ उड़ा ले गया। जाने दोनों आकाश में जा छिपे थे कि पाताल में कुछ पता नहीं । कई वर्षों बाद सुनाई पड़ा कि राजकुमारी हिमालय के किसी दूरवती तांत्रिक मठ में उसी कापालिक के साथ भैरबी के रूप में रहती है। एक दिन सहसा ही राजकुमारी पगली के भेष में इस श्मशान में घूमती दिखाई पड़ी। तब से यहीं पर है। न किसी से बोलती है। न कुछ मांगती जांचती हैं। दिन रात बस, श्मशान में पड़ी रहती है। लेकिन मैं चौधरी की सद्भाबना से प्रभावित होते हुए भी उसकी बात कैसे मान सकता था दूसरे ही दिन फिर पगली से मिलने पहुँच गया। इस बार पहले से भी क्रूर स्वागत मिला और तो और उसने पीठ पर कस कर ऐसी लात जमा दी कि मैं बिलबिला उठा । चुपचाप लौट आया। करता भी क्या ? नींद नहीं आ रही थीं। काफी रात तक सोच में डूबा रहा। आखिर क्या करूँ ? लौटने की तो बात नहीं उठती... सहसा देखा, वह मेरे सिरहाने खड़ी है, लेकिन पगली के वेश में नहीं, एक अपरूपा रमणी के वेश में। मन्द मुस्कान के साथ रतनारी आँखों से मेरी ओर देखती हुई कह रही है, "ज्यादा जोर से लगी क्या रे ? कल फिर आना ।" सपने से मन में आशा का संचार हुआ । सबेरा होते ही दौड़ा-दौड़ा श्मशान जा पहुँचा। लेकिन बाप रे ! कैसा भयावना रूप था। पगली मुझे देखते ही क्रोध से चीख पड़ी और एक चिता से जलती हुई।

"

लकड़ी खीचकर मुझ पर झपटी। लेकिन मैं भागा नहीं अडिग खड़ा रहा । मैं भी करो या मरो पर तुल गया था । बोला, "जब भागना ही था तो सपने में बुलाने क्यों आई थीं ? तुमने आने को कहा, तभी तो मैं आया ।" वह जोर से खिलखिला कर हंसी और मुड़कर पास ही पड़े किसी मरे हुए जंगली पक्षी को उठा लिया। घिनौने ढंग से नोच-नोचकर उसका मांस चबाने लगी। अंगुली के आमने पत्थर की ओर इशारा कर दिया। जगप्सा से मेरा रोम-रोम सिहर रहा था, लेकिन विवश होकर बैठना ही पड़ा। चबर-चबर सारा मुर्दा मांस उदरस्थ करने के बाद तृप्ति भरी डकार लेकर वह बोली, "बार-बार आकर मुझे क्यों तंग

कर रहे हो ? बोल, तेरे किये क्या होगा? मैं जानती हूँ तू किस लिये यहाँ आया हैं। कुछ भी नहीं होगा । ब्राह्मण है। संसार में अभी तेरा भाग बागी है।..." सहसा ही उसने फिर रौद्र रूप धारण कर लिया और अश्लील गालियाँ बकती हई चीख पड़ी. "भाग भाग यहाँ से जानबर कहीं का । मसान घाट पर मरने आता है । दूर हो ! चला जा मेरी आँखों के सामने से।"

मैं क्रोध से जल उठा। लेकिन अपने स्थान पर अडिग बैठा रहा। मुझे एक विचित्र सी अनुभूति हो रही थी कि वह ऊपर से मुझे भगाने के लिये भयावना स्वांग भले ही भरती हो, भीतर ही भीतर किसी अज्ञात शक्ति से मुझे अपनी ओर खींचती जा रही है। उस रात फिर वह सपने में आई- एक अनिंद्य सन्दरी नवयौवना राजकुमारी के रूप में। मन्द हँसी के साथ बोली, "रूठ गया ? छि: भले मानस गुस्सा नहीं करते । मैं तो कितने वर्षों से तेरी प्रतीक्षा कर रही हूँ । तू आ गया तो शान्ति मिली। कल आओगे न? जरूर आना ।" सपने का क्या भरोसा? लेकिन फिर भी गया। वहीं बात निकली। देखते ही फिर वही पुराना राग । वह गुर्राती हुई झपटी, "देखती हूँ बड़ा दुःसाहसी है तू । ऐसे नहीं मानेगा। ठहर बताती हूँ-" मैं तो जान हथेली पर रख कर आया ही था, तो भी उसका रूप इतना भयाबना होता था कि धीरज टूटने लगता । किसी तरह साहस बांधकर मैं कहा, "आखिर तुम इतना नाच क्यों नचा रही हो? आता है तो अपमानित करके भगा देती हो। फिर सपने में आकर दुलार के साथ आने के लिए भी कहती हो। तुम्हारे किस रूप को सच्चा मानूं?" सहसा अद्भुत सा परिवर्तन दीख पड़ा। उसके मुख मंडल पर कौतुकभरी मधुर हँसी छलक आयी। पागलपन अथवा आक्रोश का कोई चिन्ह तक शेष न था। अब बड़ी सरल और मीठी लग रही थी वह । बड़े कोमल किन्तु चुनौती भरे स्वर में बोली, "कर सकेगा साधना ? है साहस ?" "है ! तुम जो भी कहोगी करूँगा।" "अच्छा तो सुन, आज रात को ही आकर तू मेरी हत्या कर दे । गला घोंटकर मारना होगा। फिर मेरे शव पर ही बैठकर साधना करनी पड़ेगी। बोल करेगा ?" मैं जड़वत खड़ा रहा। इतनी भयावती शर्त की तो कल्पना भी नहीं की थी। धीमें से कहा, "सब कुछ कर सकता है, लेकिन किसी की हत्या मुझसे नहीं की जाएगी."
 
सुनते ही पगली की जबान बिल्कुल बेलगाम हो उठी । एक से एक घिनौनी और अश्लील गालियों की बौछार । मैं भी जैसे अभ्यस्त हो उठा था । चुप बैठा सुनता रहा । गालियाँ देते-देते जब वह थक गई तो बोली, "फिर यहाँ मरने क्यों आया था। भाग जा ।" मैं लौट आया । लेकिन मैंने भी ठान लिया था कि जब तक इस सन्यासिनी से कुछ प्राप्त नहीं कर लूँगा, लौटूंगा नहीं। कई दिन तक यही क्रम चलता रहा- सपनों में आकर उसका बुलाना, मेरा फिर मिलने जाना और अपमानित होकर लौट आना । आखिर जीत मेरी रही। एक दिन उसका पाषाण हृदय भी पसीज ही गया। उस रोज संध्या बेला में पगली पीपल के पेड़ के नीचे शान्त प्रसन्न मुद्रा में बैठी थी। मैं पहुँचा तो गालियाँ नहीं दी, निकट ही बैठाकर मधुर स्वर में बातें करने लगी। आज पहली बार मुझे पता चला कि मैं उस दिन उसकी हत्या करके शव-साधना करने को तैयार नहीं हुआ था, इससे वह बड़ी प्रसन्न थी। उसने बताया कि इस प्रकार की तंत्र साधनाएं बड़ी निम्न कोटि की होती हैं। इनसे मनुष्य को कुछ तामसिक शक्तियाँ भले ही मिल जाती हों, और कुछ नहीं मिल पाता। मैंने विभिन्न शक्तियों के बारे में जिज्ञासा प्रकट की, तब सन्यासिनी ने मुझे विस्तार से उनका विलक्षण परिचय दिया। हमारे इस लोक से अलग एक और लोक है - बासना लोक । वह इस संसार से परे होते हुए भी दूध पानी की तरह इसी में घुला-मिला है। बासना लोक में तीन तरह के जीव रहते हैं। एक तो वे जो न कभी मनुष्य देहधारी थे न कभी भविष्य में होंगे । इन्हीं को बेताल, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच आदि कहा जाता है। यही लोग बासना लोक के स्थायी जीब हैं। इनकी शक्ति अपरिमित होती है। इनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं होता, इनकी इच्छा शक्ति प्रबल होती है। इच्छा होने पर ये स्थूल मानव शरीर धारण करके अपनी कोई भी कामना लालसा पूरी कर सकते हैं। ये जीव मनुष्यों के सच्चे हितैषी भी होते हैं और कट्टर शत्रु भी। दूसरी तरह के जीब बो हैं जो मृत्यु लोक के मानब शरीर छोड़कर अथबा मर-कट जाते हैं। ऐसे जीवों को ही भूत-प्रेत, जिन्न-चुडैल आदि कहा जाता है। वास्तव में मनुष्य की मृत्यु हो जाती है, पर उसकी कामना, लालसा अथवा बासना नहीं मरती । उनकी इसी कामना आदि को मंत्रों से बांधकर इन्हें वश में कर लिया जाता है, फिर उनसे मन चाहे काम कराए जाते हैं। इनकी शक्ति अपेक्षाकृत सीमित होती है। फिर भी मनुष्य से तो वह कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं। वैसे इन लोगों को वश में करके खेलने से बड़ा खतरा भी रहता है । जरा सी असावधानी होते ही यह घात कर बैठते हैं और स्वयं साधक अथवा तांत्रिक को भी मार डालते हैं। तीसरे प्रकार के जीवों में से कुछ तो बो है जो सोते समय स्वप्न में बासना लोक में पहुँच जाते हैं और जगने पर लौट आते हैं। जो लोग आत्महत्या अथवा हत्या के कारण मर कर बासना लोक में पहुँचते हैं उनकी स्थिति बड़ी हीन और दयनीय होती है। वे पागलों की तरह चीखते-चिल्लाते हुए इधर-उधर भटकते रहते हैं। एक ओर श्मशान का भयंकर बाताबरण । निविड़ अन्धकार सांय-सांय कर रहा था। रह-रहकर पीपल की डाल पर बैठा हुआ कोई मांसखोर पक्षी चोंच रगड़कर चीख उठा। दूसरी ओर काल भैरव के मंदिर में पंख फड़फड़ाते हुए चमगादड़ों का कर्कश चीत्कार। मेरे रोंगटे भरभराकर खड़े हो गए थे

पवमानाची कारवारका मा ..

और सामने बैठी पगली एक से एक रहस्यमय इराबने जीवों के बारे में बोलती जा रही थी ... इनके अलाबा जीबों का एक बर्ग और होता है - बासना लोक में । जिन्हें अपदेवता कहते हैं। कहते हैं, ये लोग किसी अन्य लोक से बासना लोक में प्रवेश कर जाते हैं। तंत्रशास्त्र में इन्हीं को हाकिनी, डाकिनी, शाकिनी आदि कहा जाता है। बड़े ही भयानक जीव होते हैं। बुद्धि और करूणा तो उनमें लेश मात्र भी नहीं होता। पशुओं की भांति उनके पास मन होता है। इनका अधिकांश कार्य उसी से प्रेरित होता है। जिन्हें तंत्र साधना में घोर दुःसाहसी गति-मति प्राप्ति होती है बे ही हाकिनी-डाकिनी विद्या से इन अपदेवतातों को वश में कर पाते हैं, किन्तु इनसे पग-पग पर घोर संकट की आशंका बनी रहती हैं... "इसीलिए मैं तुझे बार-बार मना करती आ रही हूँ। पर तू कुछ समझता ही नहीं। उलटे मुझ पर क्रोध करता है लेकिन मुझ पर तो कुछ और ही धन सवार थी। मैं उसे फिर टालमटोल का मौका नहीं देना चाहता

था। पूछ बैठा, "इनमें से पहली तरह के जीवों को कैसे वश में किया जा सकता है ?" "दिव्यौध विद्या से। लेकिन इसकी साधना बड़ी ही कठिन है।" पगली ने चेतावनी सी दी, "सबके वश की बात नहीं है। तंत्र विज्ञान की बड़ी ऊँची विद्या है। प्रबल साहसी और समर्थ कापालिक ही इसकी साधना कर सकता है." मैं न जाने किस धुन में पूछ बैठा, "तुम्हारे कापालिक गुरू ने क्या तुम्हें यही विद्या दे रखी है ?" न जाने कहाँ क्या गलती हो गई। पगली झंझावात की तरह गर्जन करने लगी, "तू कैसे जानता है...बोल कैसे जानता है...बोल नहीं तो मार डालूंगी।" उसका प्रचंड रूप देखकर मेरा रोम-रोम कांप उठा। और सिर पर पांव रखकर मैं भाग निकला। इस प्रकार नाव जैसे किनारे पहुँचकर इब गई थी। पछतावा होने लगा। नाहकही ऐसी बात क्यों पूछ बैठा ? कितनी मुश्किल से तो पसीजी थी वह । लेकिन बहुत चाहने पर भी उससे फिर मिलने की हिम्मत नही पड़ रही थी। इस बीच रात को कभी वह सपने में भी नहीं आई। तब शायद निराशा अत्यधिक बढ़ जाने के कारण फिर से साहस जुट गया। और मैं जान हथेली पर रखकर एक रोज फिर श्मशान पहुँच गया। वह काल भैरव के मन्दिर की सीढ़ी पर बड़ी गम्भीर मुद्रा में बैठी थी। मुझे देख कर न तड़की न भड़की । कुछ देर गहरे निगाह से घूरती रही, फिर इशारे से अपने पास बुला लिया। मैं डरा-डरा सा निकट पहुँचा, तो वह गंभीर स्वर में बोली, "तु काल की गति को जानना चाहता है? जीवन और जगत के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिये मेरे पास आया है-" मैंने खामोशी से हामी भर दी। "लेकिन तू शायद जानता नहीं। यह सब जानने के बाद जीबन फिर जीबन जैसा नहीं रह जाता । इस चक्कर में मत पड़ मेरी बात मान ले। लौट जा " "ऐसे नहीं लौटूंगा । कुछ भी हो जाए।" "तब ठीक है। लेकिन इसके लिए तुझे पिशाच सिद्ध करना पड़ेगा। इसके बिना तुझे यह सब नहीं

मिल सकता है।" "ठीक है । मैं करूँगा। कैसे क्या करना होगा ?" "शव साधना।" "शव साधना।" मैं चौंक पड़ा। लेकिन पगली सन्यासिनी सचमुच मुझ पर कृपालु हो गई थी। उसने मुझे आश्वासन दिया कि मुझे किसी की हत्या-बत्या नहीं करनी पड़ेगी। साधना के लिए शब स्वयं ही आ जाएगा। इसके अलावा उसने पूरी तरह आश्वासन दिया कि चिंता करने की बात नहीं मैं स्वयं सब कुछ करा दूंगी। उसने कुछ आबश्यक सामग्री के साथ मुझे अमावस्या की रात में अकेले ही श्मशान घाट में पहुँचने का आदेश दिया। उस समय तो मैं आश्वस्त था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतने लगा आशंका बढ़ने लगी। क्या सचमुच सन्यासिनी बचन पूरा करेगी ? कहीं उसने मुझे लम्बे समय के लिए वहका कर गायब हो जाने की तो नहीं सोची। अमावस्या आ ही गयी। सन्यासिनी के निर्देशानुसार दो बोतल शराब, मुर्ग का मांस, भुना हुआ चना इत्यादि लेकर मैं पहुँचा, तो पगली जैसे मेरा इन्तजार ही कर रही थी, लेकिन मैं घबराया, न जाने वह क्यों कुछ विचलित सी प्रतीत हो रही थी। लेकिन मेरी आशंका निर्मूल सिद्ध हुई। उसने संकेत करते हुए कहा, "सामग्री इधर रख दो। शव आ गया है जाकर उसे उठा ला-" मैं उसके इशारे पर एकदम तट पर खड़े पीपल के पास पहुँचा। जड़ें पानी के भीतर काफी दूर तक धंस गई थीं। उन्हीं के बीच किसी षोडशी की निर्वसन लाश अटकी हुई थी। मैं जड़े पकड़कर पानी में उतर गया और केश पकड़कर शव को खींचता हुआ किनारे ले आया । पगली के संकेत पर मैंने लाश उठाकर मन्दिर की सीढ़ी पर लिटा दी । शब में जरा भी बिकृति नहीं आयी थी। शायद उसे मरे अधिक समय नहीं हुआ था। उसके चेहरे पर आँख पड़ते ही सहसा मेरी चीख निकल गई। यह तो वही है। वहीं रतनारी आँखें, जबाकुसुम जैसे कपोल, मनमोहक मुखड़ा । कोई अन्तर नहीं। यह बही सपने में आने वाली सुन्दरी है। पगली ने मुझे झिड़क कर चुप करा दिया और मुझे साधना की विधि बताने लगी। उसने चेतावनी दी, "डरना मत डरे कि मरे । सावधान चाहे कुछ भी हो जाए शव पर से उठना मत ।" मैं विवश होकर उसके संकेतों पर काम करने लगा था। शराब की बोतल, मांस, चना आदि निकट रखकर मैं सन्यासिनी के संकेत पर आसन जमाकर तरूणी के शव पर स्थिर बैठ गया, और उसी के द्वारा बताए हुए मंत्र का जाप करने लगा। श्मशान भूमि गाही रात में डूब गयी थी। दिशाएँ तक लुस

और तो और स्वयं पगली भी अंतान हो चुकी थी। एकाएक मरघट में कुत्तों और सियारों के रोने चिल्लाने का भीषण स्वर गूंजने लगा। लेकिन मैं शव पर अडिग बैठा जप करता रहा।

रात गहराने लगी । अकस्मात् नदी की ओर से दल की दल कितनी ही युवतियाँ मेरी ओर आने लगी। सब की सब निर्वसन थीं। वे मुझे घेरकर खड़ी हो गई और अपलक मेरी ओर ताकती रही, लेकिन सन्यासिनी के आदेशानुसार मैं निर्भीक बैठा एकाग्रचित्त मंत्रोच्चार करता रहा । अन्तत: धीरे-धीरे युवतियाँ फिर नदी की ओर लौट गयीं।
 
सहसा एक तीन कड़कड़ाहट के साथ कुछ कांप उठा और दूसरे ही पल श्मशानभूमि में भयानक नरकंकालों की भीड़ तांडव सी करती दिखाई पड़ी। मेरा साहस डिगने लगा। मैं उठकर भागने कोही था, कि एक रूपवती षोडशीबाला राह रोककर खड़ी मुस्कराती दिख पड़ी। वह दृश्य देखकर मेरी नाड़ियों में वहता रक्त बर्फ की भांति जम सा गया । मैं जिस युवती के शव पर बैठा साधना कर रहा था, मानों बही सजीब होकर सामने आ खड़ी हुई थी। सम्मोहित करने बाली अद्भुत आसुरी छबि मादकता से तरंगित उद्दाम यौवन । आतंक से प्रस्तरीभूत मैं अपलक उसकी ओर निहारता रह गया। सहसा युवती पागल बना देने वाली हँसी-हँस कर बोली, "मैं टहाविद्या...श्मशान भैरवी हूँ चौंसठ योगिनियों में श्रेष्ठतम । डरो मत तुम्हारी इस महाडामरी साधना से दिव्यौध पथ में हड़कम्प मच गया हैं। इसी कारण मुझे भागकर तुम्हारे पास आना पड़ा है। बन्द करो, रोक दोसाधना। शव पर से हट जाओ -" लेकिन मैं उसी आसन में अडिग होकर अविचल भाव से साधना करता रहा । सहसा वह युबती एक दिव्य प्रकाश पुंज में परिवर्तित हो गयीं। नर कंकालों का हाहाकार और तालियों के साथ भीषण नृत्य फिर आरम्भ हो गया। दिव्य ज्योति के रूप में वह युवती धीरे-धीरे आकाश की ओर बढ़ चली। सहसा एक साथ ढेर सारे सियारों की चीखें गूंजने लगी। चारों ओर सड़ते हुए मुर्दे की भयानक गंध व्यास हो गयीं। आकाश का एक भाग प्रचंड गड़गड़ाहट के साथ फट सा गया। फिर वहाँ दहकती हुई आग जैसे लाल बादल घुमड़ने लगे । आकाश में असंख्य गिद्ध चील और कौए मंडरा रहे थे । नरकंकालों का तांडव और मांस भोजी पशुओं का चीत्कार... दहकते हुए बादलों के बीच से एक विकट रूपवाली अद्भुत स्त्रीनीचे उतरती जान पड़ी। उसका भीषण रूप देखकर आतंक से मेरे अंग-अंग शून्य हो चले । अंगारों जैसी दहकती हुई निष्ठुर क्रूर आँखों से मुझे झुलसाती हुई वह पिशाचिनी मानो बड़ी निर्ममता के साथ मेरी हत्या कर देने के लिये मुझ पर झपटी । फिर भी मैं बलपूर्वक मुट्ठियाँ भींचकर स्थिर रहा। एकाएक तरूणी की लाश ने जोर से चीखकर मुँह फाड़ दिया। मेरे बदन में बिजली के झटके से लग रहे थे। फिर भी निरन्तर मंत्रोच्चारण करते हुये मैंने शराब की बोतल उठाकर शव के मुंह में उड़ेल दी | दूसरे ही क्षण पिशाचिनी उतरकर मेरे सामने आ खड़ी हुई। निकट से उसकी आकृति और भी भयानक लगी। अनुपात से कहीं बड़ा सिर, बड़ी-बड़ी गोल आँखें, बाहर की ओर निकले हुए विशाल दाँत, काला भुजंग शरीर साक्षात यमद्त सी लग रही थीं। उसके निकट आते ही युवती का शव चीख पड़ा, "मेरा उद्धार करो...हट जा मेरे ऊपर से...हट जा -" मैं शराब की दूसरी बोतल उठाकर उसके मुँह में उड़ेल पाता इसके पहले ही शव के दोनों हाथ उठे। उसके नुकीले पंजे गर्दन में धंसने लगे। सांस की गति रूकने लगी। मैं चेतना खो बैठा। लेकिन उसी समय मझे एक विलक्षण दृश्य दिखाई पड़ा। तंत्र विद्या की सिद्धि बहीं भयावनी पगली सन्यासिनी अकस्मात मेरे सामने आ खड़ी हुई । अपरूपा राजकन्या के वेश में । तन पर लाल रेशमी साड़ी, बहुमूल्य रत्न-जड़ित आभूषण, मांग में सिन्दर दप-दप् कर रहा था । हाथों में मेहंदी रची थी। नवपरिणीता वधू-सी छवि, कमनीय देहराशि।

मैं कातर स्वर में बोल पड़ा, "कहाँ गई थी तू ?" आतुर हँसी हँसकर वह बोली, "जाऊँगी कहाँ ? तुम्हारे पास ही तो थी। भला तुमको छोड़कर अब जाऊँगी भी कहाँ ? मैं अवाक रहा। वह अबसाद भरे कण्ठ से बोली, "छप्पन वर्ष बीत गए, मैं गुरु-दर्शन की लालसा से तड़पती हुई श्मशान में भटकती रही। लेकिन दर्शन नहीं ही मिला । अब सोचा उस कापालिक से मिली भयंकर तामसिक तंत्र-शक्ति को तुझे देकर अपने को मुक्त कर लूं पर यह भी न हुआ। छलने चली थीं, स्वयं छली गई । जन्म व्यर्थ गया । अपनी आत्मा के लिये कुछ भी न कर सकी... मर्मभेदी चीत्कार के साथ वह फूट-फूट कर रोने लगी। चेतना लौटी तो मैंने अपने आपको चौधरी की झोंपड़ी में एक खाट पर पड़ा पाया । गांव वालों से ही मालूम हुआ कि उन लोगों ने मुझे श्मशान में बड़ी विचित्र स्थिति में पाया था - पगली की लाश से लिपटा हुआ । लाश के दोनों पंजे मेरी गर्दन में लिपटे हुए थे। बड़ी कठिनाई से मेरा उद्धार किया गया

कौन छला गया, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन एक बात का उल्लेख कर देना आवश्यक है - इस घटना को घटित हुए पच्चीस वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो चुका हैं, लेकिन पगली की आत्मा उस भयावती रात से लेकर आज तक मेरे साथ लगी है।
 
अध्याय ७ पीर सुलेमान की चौकी

दैवी राज्य से मनुष्य का संबंध जोड़ने की प्रक्रिया में भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत जितने साधनों का आविष्कार हुआ उनमें 'पीठ' का स्थान सर्वोपरि है। पीठों के निर्माण और उनके द्वारा विभिन्न दैवी शक्तियों के आकर्षण की परम्परा विशेषकर तंत्र के विभिन्न सम्प्रदायों में रही है। अघोर और शाक्त सम्प्रदाय में तो पीठ को अत्यधिक महत्व दिया गया है। इन दोनों सम्प्रदायों की जितनी भी रहस्यमयी साधनायें हैं वे सब पीठ पर निर्भर हैं। 'पीठ' का मतलब है 'शक्ति केन्द्र' । स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत का संबंध जोड़ने वाला एक अदृश्य सूत्र | 'पीठ' का एक विज्ञान है। जो लोग पीठ विज्ञान के रहस्यों से परिचित है वही दैवी राज्य से सम्पर्क स्थापित करके फायदा उठा सकते हैं और तांत्रिक साधना में भी सफलता पा सकते हैं। इस्लाम धर्म और संस्कृति की जितनी भी उपासना साधना है वह सब भी 'पीठ' पर ही निर्भर है। उस क्षेत्र में 'पीठ' को चौकी कहते हैं। मगर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि तांत्रिक 'पीठ' का बहुत व्यापक, गम्भीर और गूढ़ अर्थ है । जबकि 'चौकी को एक विशेष मानवीय संवेदना में बांधा गया है। सात आसमानों को ध्यान में रखते हुए चौकी को भी सात भागों में बांटा गया है। हिन्दू धर्म के सात लोक इस्लाम धर्म के सात आसमान हैं। प्रत्येक चौकी एक-एक आसमान से सम्बन्ध रखती है।

औलिया की चौकी चौथे आसमान से, फकीरों की चौकी पांचवें आसमान से और पीरों की चौकी छठे आसमान से सबंध जोड़ती है। सातवाँ आसमान पैगम्बर का है। एक, दो और तीन चौकी और उनसे सम्बंधित आसमान जिन्न-जिन्नातों के हैं। जिन्न-जिन्नातों की चौकी तो उनकी कब्र होती है। मनुष्य की बासना और उसका संस्कार ये दोनों चीजें मनुष्य का पीछा कभी नहीं छोड़ती। मरने के बाद जब शरीर का बंधन टूट जाता है। तब वे संस्कार और तमाम बासनायें विराट रूप धारण करके आत्मा को काफी परेशान करती है। हिन्दू प्रेतात्माएँ तो उसी के अनुसार कहीं न कहीं जन्म ले लेती हैं। मगर मुस्लिम प्रेतात्माएँ कयामत की रात की प्रतीक्षा में अनन्त काल तक अपनी वासनाओं और संस्कारों का बोझा होती रहती हैं। ऐसी प्रेतात्माओं को रूह कहते हैं । जिन रूहों में अदम्य वासना, कामना और जिन्दगी के प्रति लालसा भरी रहती हैं अथवा जिनकी अकाल मौत हुई है जो जिन्दगी में महत्वपूर्ण काम अधूरे छोड़कर मरे हैं बे जिन्न होते है। साधारण रूहों की हालत एक पागल सी होती है। रूहानी दुनिया के बजाय वे जिस्मानी दनिया में ही मच्छरों की तरह भिनभिनाती रहती हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे 'झण्ड' बनाकर रहती है और हमेशा इंसान को गुमराह करने की कोशिश करती रहती हैं।

उसमें बुरी से बुरी आदतें डाल देती हैं। जिनके वशीभूत होकर इन्सान अपना विवेक खो बैठता है और एक पशु की सी जिन्दगी बिताने लगता है। जिन्नों की हालत इनसे कुछ अलग तरह की होती है। बे उसी इन्सान से अधिक सम्बन्ध रखने के इच्छक होते हैं जिससे उनकी प्रबल बासना मिलती-जुलती है। बेरूहानी दुनिया की दूसरी सतह यानी आसमान में रहते हैं। पहला आसमान रूहों का है और दूसरा है जिन्नों का । रूहों और जिन्नों में वही अन्तर है जो एक मूर्ख और जाहिल इंसान एवं एक पढ़े-लिखे मगर साधारण इन्सान के बीच होता है। जैसे रूहों और जिन्नों में थोड़ा सा भेद है वैसे ही जिन्न-जिन्नात में भी फर्क समझना चाहिए। जिन्नात .. काफी शक्तिशाली होते हैं। उनकी बासनायें अति भयंकर-प्रबल होती हैं। वे अदम्य इच्छाशक्ति के मालिक होते हैं। वे अपनी प्रबल बासना के अनुसार इच्छाशक्ति के बल पर विभिन्न रूप धारण कर सकते हैं। इतना ही नहीं वे किसी भी पदार्थ अथवा वस्तु की सृष्टि कर सकते है। तीसरे आसमान में रहते हुए भी वे जिस्मानी दुनिया से बराबर सम्बन्ध बनाए रखते है।

जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ वह छठे आसमान से सम्बंधित पीरों की है। इस्लाम धर्म में पीरों का बही स्थान है जो हमारे यहाँ अत्यन्त उच्चकोटि के योगियों, सिद्ध पुरुषों महात्माओं और सन्तों का है। जिसे खुदा का एहसास हो चुका है और खुदा के नजदीक है वही पीर है। पीरों की कब्र के ऊपर जो मजार बनाई जाती है वहीं 'चौकी होती है- चौकी की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि पीर का जिस्म जिस दिन और जिस समय कब्र में दफन किया गया होता है,

हर साल में उसी दिन और उसी समय छठे आसमान से उतर कर पीर की आत्मा अपने मजार में अवश्य जाती है। पीरों में किसी भी प्रकार भेदभाव नहीं रहता। वे सभी जाति और सभी धर्म के लोगों की प्रार्थना सुनते हैं, यह दुआ करते व देते हैं। यदि वे किसी पर प्रसन्न हो जायें तब तो पूछना ही क्या। किसी प्रकार का दुख, अभाब रह ही नहीं सकता। कोई ऐसी समस्या नहीं जो हल न हो सके | कोई ऐसा कष्ट नहीं है तुरन्त दूर न हो जाए। बस पीर की कृपा दृष्टि भर होनी चाहिए। अरबी भाषा में लिखित प्राचीन इस्लामी तंत्र ग्रन्थों में सातों आसमानों में संबंधित सातों तरह की चौकियों को मंत्र शक्ति के जरिए बनाने और उनकी सहायता से सातों आसमानों के प्राणियों से सम्पर्क स्थापित करने की अनेक विधियों और अनेक क्रियाओं का उल्लेख मिलता है। एक बार कोई चौकी बन गई तो वह पूरे एक साल काम आती है। यहाँ मैं एक बात और बतला दूँ कि चौकी बही बना सकता है और रूहानी दुनिया के लोग से वही मिल सकता है जिसमें प्रबल प्राणशक्ति होगी और दृढ़ मनोबल होगा अन्यथा मर जाने या पागल हो जाने का डर बना रहता है। यदि साधना में सफलता मिल गई तो निश्चित ही मानवीय शक्ति में एक ऐसी शक्ति घुल मिल जाती है कि जिसके माध्यम से व्यक्ति एक ऐसी अव्यक्त, अगोचर केवल अनुभव की जाने वाली दुनिया के सम्पर्क में आ जाता है। जब ये सारी बातें मुझे मालूम हुई तो मैं उल्लास से भर उठा और अरबी तंत्र-मंत्र की प्राचीन पुस्तकों और पाण्डुलिपियों की खोज में चारों ओर भटकने लगा । इसी सिलसिले में मेरी भेंट एक दिन हसन नियाज़ साहब से हो गई। वह मेरे मित्र थे और उन दिनों अलीगढ़ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक थे। नियाज साहब के पिता अपने जमाने के मशहर लेखक और अरबी एवं फारसी साहित्य के अच्छे बिद्वान थे। उनकी अपनी लाइब्रेरी थी। जिसमें बेशुमार पुस्तकें थीं। वहाँ अरबी तंत्र-मंत्र की पुस्तकों एवं पाण्डुलिपियों की भी कमी नहीं थी। अपने मन की बात बतलाकर जब मैंने नियाज़ साहब से कहा कि वह मुझे अपनी लाइब्रेरी की पुस्तकों को देखने का मौका दें तो वह तुरन्त तैयार हो गये। जिस मकान में लाइब्रेरी थी वह अलीगढ़ शहर के बाहर बड़े सुनसान जगह पर था। लम्बा चौड़ा हवेलीनुमा वह मकान काफी पुराना भी था । नियाज़ साहब के पिता के इंतकाल के बाद एक लम्बे अरसे से उसमें कोई नहीं रहता था और वह खाली ही पड़ी थी। एक हफ्ते के भीतर ही मैं उस मकान में पहुँच गया। जिस कमरे में लाइब्रेरी थी, वह काफी लम्बा चौड़ा था। दीवारों से लगी हुई करीब तीन दर्जन अलमारियों में ठसाठस पुस्तकें भरी हुई थीं। अलमारियों पुस्तकों और मेज कुर्सियों के अलावा फर्श पर धूल की.मोटी तह जमी हुई थी।
 
लाइब्रेरी . के कमरे के सामने खुली छत थी। उसके बाद एक और कमरा था उसी में मैंने अपने रहने का इंतजाम कर लिया। कमरे में तीन बड़ी-खिड़कियाँ थी जो पूरब की ओर खुलती थीं। खिड़की के बाहर मकान से बिल्कुल लगा हुआ काफी बड़ा एक मैदान था जिसमें इमली, जामुन, बेर के अलावा खजूर के भी कई पेड़ थे। उन्हीं खजूरों के नीचे-तीन चार करें भी बनी हुई थी। उसके इर्द-गिर्द जूही और रातरानी के पेड़ लगे थे। जिनकी कोमल डालियाँ कब्र के ऊपर छायी हुई थी। लेकिन जिसने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया। वह था रोजाना शाम के वक्त वहाँ जलने वाला चिराग । उस संगमरमरी कब्र पर वह चिराग रोज कौन जला जाता था ? एक दिन खिड़की के पास बैठा हुआ मैं कोई पुस्तक पड़ रहा था, उसी समय सहसा मेरी नजरें कब्र की ओर घूम गई, देखा तो उन्नीस-बीस साल की एक युवती हाथ में जलता हुआ चिराग लिये धीरे-धीरे कदम उठाती हुई संगमरमरी कब्र की ओर बढ़ रही थी। चिराग की हल्की पीली रोशनी में उस युवती का गोरा चेहरा चमक रहा था । निश्चय ही वह अत्यन्त सुन्दर युवती थी। मगर कौन थी ? कहाँ रहती थी? क्यों वह रोजाना उस कब्र पर चिराग जलाने आती थी? ये तमाम प्रश्न एक-एक कर मेरे मस्तिष्क में उभरने लगे। युवती ने आहिस्ते उस चिराग को कब्र के सिरहाने रख दिया। फिर कुछ देर तक वहीं खड़ी उदास नजरों से कब्र की ओर निहारती रही। उसके बाद हौले-हौले कदम उठाती हुई झुरमुटों के भीतर से न जाने कहाँ चली गई। फरवरी का महीना था । कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। उस दिन सवेरे से ही पानी बरस रहा था । मैंने सोचा ऐसे मौसम में यह युवती चिराग रखने नहीं आयेगी मगर यह मेरा भ्रम था। वह अपने ठीक बक्त पर आई चिराग रखा और पानी में भीगती हुई काफी देर तक उदास नजरों से कब्र की ओर देखती रही। फिर उसके जाते ही हवा का एक तीव्र झोंका आकर पूरे कमरे में बिखर गया। उसी के साथ चारों ओर रातरानी की सुगन्ध भी फैल गई। उस वक्त मैं उस युवती के बारे में ही सोच रहा था | कौन है वह ? कोई अशरीरी आत्मा तो नहीं है ? ये दोनों विकट प्रश्न मेरे मस्तिष्क में बुरी तरह छा गए थे। जिसकी वजह से पूरी रात सो नहीं सका। आखिर भोर के समय थोड़ी सी झपकी लगी फिर जब आँख खुली तो एकदम स्तब्ध रह गया मैं । मेरे बिस्तर के सिरहाने ताजे खिले रातरानी के ढेर सारे फूल रखे हुए थे। आश्चर्य से सन्न बैठा मैं उन फूलों को देख रहा था। कौन आया था मेरे कमरे में? दरबाजे तो भीतर से बन्द थे .......फिर ....... मेरा मन उद्धांत सा हो गया। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसी वक्त मुझे ऐसा लगा कि कोई आहिस्ते से बन्द दरवाजा खोलकर कमरे में आया है और मेरे पलंग के नजदीक खड़ा हो गया है। सिर घमाकर देखा तो स्तब्ध रह गया आश्चर्य से आँखें फैल गई मेरी। मेरे सामने मुगलकालीन वेशभूषा में खड़ी कब्र पर चिराग जलाने वाली युवती मुस्करा रही थी। वह बिल्कुल शहजादी सी लग रही थी। मैं बड़ी देर तक अपलक अवाक् देखता ही रह गया उसकी ओर । किसी सद्ययौवना युबती में इतना सौन्दर्य समा सकता है, कभी इसकी कल्पना भी नहीं की थी मैंने । जैसा स्फटिक होता है बस । बैसाही दूध जैसा उसके शरीर का रंग था। पतले-पतले गुलाबी होंठ, बड़ी-बड़ी स्याह आँखों में गजब का सम्मोहन भरा हुआ था । बाल काले और धुंघराले थे। उन्मत्त कर देने वाला यौवन भी अद्भुत था जिसे देखकर किसी का भी मन बेकाबू हो सकता था। गोरी-गोरी कलाइयों में काले रंग की कांच की चूड़ियाँ पड़ी थीं और दाहिने हाथ की उंगली में हीरे की कीमती अंगूठी भी फंसी थी। अस्फुट स्वर में मैंने पूछा - "आप कौन है ?”

मेरा प्रश्न सुनकर युवती का फूल जैसा चेहरा न जाने क्यों एकबारगी भावहीन हो गया। मुस्कराते हुए होंठ खामोश सूख गए और रसीली आँखो की चमक बुझ गई। धीरे से बोली- "मेरा नाम नाजिमा है । मैदान में उस पार जो लाल कोठी है, उसी में रहती हूँ।" थोड़ा रूककर उसने फिर कहा - "आप पहले इंसान हैं जिसके करीब मैं आई हूँ।".

"बड़ी खुशी की बात है।” मैंने कहा - "बताइए क्या काम है मुझसे ?"

नाजिमा का चेहरा गुलाब की तरह फिर खिल उठा। आहिस्ते से बोली- "आप रूहानी दुनिया के बारे में जानते हैं न ?"

"हाँ-हाँ, पर आपको कैसे मालूम ?"

"मुझे सब कुछ मालूम है। "नाजिमा ने कहा - "यही तो मैं आपको बतलाने के लिए बेचैन थी। इस लायब्रेरी की चौड़ी आलमारी में एक बहुत पुरानी किताब है, हाथ की लिखी हई। उसमें पीर-फकीरों और औलिया की चौकी बनाने का तरीका वहत समझा कर लिखा गया है। आप उसी किताब के सहारे पीर सुलेमान की चौकी बनाइए। खुदा चाहेगा तो आपको जरूर सफलता मिलेगी।" इसके बाद नाजिमा एक पल के लिए भी नहीं रूकी। वह एक झटके से घूमी और तुरन्त कमरे से बाहर निकल गई ।

मैं आश्चर्य से खड़ा जाती हुई नाजिमा को देखता रह गया।

खोजने पर चौथी अलमारी में नाजिमा की बतलाई हुई वह पुरानी किताब मिल गई। सचमुच वह चार सौ साल पुरानी पाण्डुलिपि थी। कागज काफी मोटे होने के बावजूद गल गया था। कहीं-कहीं अक्षर भी मिट गए थे। चमड़े की मजबूत जिल्द में बंधी थी वह पाण्डुलिपि । उसका शीर्षक भी काफी आकर्षक था - "रूहानी दुनिया की सैर" उसमें कुल मिलाकर तीन सौ पृष्ठ थे। कुल पृष्ठों पर तो चमकीले सुनहरे रंग बिरंगे चित्र भी बने हुए थे, जो अपने आप में बहुत मूल्यवान और बिलक्षण थे । बिधि पढ़कर अचानक मेरी आँखों में चमक आ गई। मैंने एकबारगी निश्चय कर लिया कि पीर सुलेमान की चौकी बनाकर ही दम लूँगा और इसके लिये नियाज़ साहब के उस हवेलीनुमा स्थान से अच्छा दूसरा एकान्त स्थान भला मुझे कहाँ मिलता ?" काश! जब मैं यह निश्चय कर रहा था। उस वक्त जरा सी भी इस बात का पता चल गया होगा कि मेरे जरिये एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण होने जा रहा है, जिससे मैं जिन्दगी भर छुटकारा नहीं पा सकूँगा तो सच मानिए मैं सपने में भी पीर सुलेमान की चौकी बनाने की बात न सोचता।

उस दिन से प्राय: रोज ही नाजिमा मेरे कमरे में आने लगी। मगर वह कभी खाली हाथ न आती, कभी उसके साथ रातरानी के फूलों का ढेर होता तो कभी बढ़िया मिठाइयाँ । जिस समय यह कमरे में प्रवेश करती त्यों ही बातावरण में हिना और मुस्कम्बर की भीनी-भीनी खुशबू भर उठती। कभी-कभी वह अपने हाथों से बनाकर खाना भी ले आती। नाजिमा के दिल में मेरे लिए इतनी प्रीति और अपनापन क्यों था यह मेरी समझ में नहीं आता था । कभी-कभी सोचता - "क्या नाजिमा मुझसे प्रेम करने लगी है ? क्या वह मुझे अपना बनाना चाहती है ? मगर नहीं, ब्यबहार में मुझे कहीं भी कामना या वासना की झलक नहीं दिखलाई पड़ी थी। उसके प्रेम में, स्नेहमय अपनत्व में एक स्वर्गीय सौन्दर्य था - निष्काम भावना थी अभी तक मेरी समझ में यह नहीं आया था कि रूहानी दुनिया की सैर की पाण्डुलिपि के बारे में आखिर नाजिमा को कैसे मालूम था ? वह कैसे जानती थी कि वह पाण्डुलिपि कहाँ किस आलमारी में हैं? फिर एक दिन मुझे एक ऐसी चीज की जरूरत पड़ गई जिसे लेने के लिए शहर जाना जरूरी हो गया था, मगर कपड़े पहनकर मैं जैसे ही बाहर निकला नाजिमा मिल गई और उसके हाथ में वही चीज थी, जिसकी मुझे जरूरत थी। इसी तरह कई बार हुआ। मुझे जब कभी भी किसी चीज की जरूरत पड़ती नाजिमा न जाने कैसे जान जाती और उसके जरिए मेरी वह आवश्यकता पूरी हो जाती। मैं हैरान था । आखिर नाजिमा कैसे जान जाती थी मेरे मन की बात ? फिर कहाँ से और कैसे लाकर देती थी वह चीज ?

एक दिन तो मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही। वह रोज की तरह शाम को आई फिर एक बंद लिफाफा मेरी ओर बढ़ाती हुई बोली- "इसे मेरे जाने के बाद खोलियेगा।"

नाजिमा के चले जाने के बाद जब मैंने लिफाफा खोलकर देखा तो सन्न रह गया। भीतर सौ-सौ के बीस नोट थे । देखकर मेरा सारा शरीर एकदम झनझना उठा, मस्तिष्क शून्य सा हो गया जैसे। हे भगवान ! नाजिमा आखिर है क्या बला? उस समय मुझे रुपयों की सख्त जरूरत थी मगर मेरी इस जरूरत को नाजिमा कैसे जान गई? उस रोज सारी रात मुझे नींद नहीं आई बस नाजिमा के बारे में ही सोचता-विचारता रहा। अंत में निश्चय किया कि कल नाजिमा के आने पर उससे इसका राज जरूर पूछंगा। मगर क्या नाजिमा दूसरे रोज आई ? नहीं। उस दिन के बाद वह मुझे कभी नहीं दिखलाई पड़ी ।

आखिर एक दिन मुझसे रहा नहीं गया तो मैं लाल बंगले की ओर चल पड़ा । दरवाजे पर एक बुढ़िया बैठी थी। पूछने पर उसने एक बार मेरी ओर उदास नजरों से देखा फिर अपने कमजोर हाथों से मैदान की ओर इशारा करती हुई धीरे स्वर में बोली - "नाजिमा बहाँ है.... चले जाओ बहीं वह सो रही है."
 
बुढ़िया की बात मेरी समझ में नहीं आई, किन्तु मेरे कदम अपने आप मैदान की ओर बढ़ चले और संगमरमरी कब्र के सामने पहुँच कर रूक गए। उसके बाद मेरे मुंह से एकाएक चीख निकल गई - "नहीं ऐसा नहीं हो सकता।" मगर मेरे चिल्लाने से क्या होता था ? सत्य एकदम सत्य था और बिलकुल मेरे सामने था । कब्र के ऊपर लाल पत्थर पर उर्दू में साफ-साफ लिखा था "नाजिमा ! मेरी प्यारी नाजिमा मैं तुम्हारा इन्तज़ार करूगा जाकिर ।" सारा शरीर जैसे बर्फ हो गया मेरा। सोचने बिचारने की शक्ति जैसे गँवा बैठा मैं । पूरे बीस दिन मैं एक प्रेतनी के सम्पर्क में था ? हाँ ! वह प्रेतनी ही थी....... तभी तो मेरे मन की बात तुरन्त जान जाती और बिना कहे सारी जरूरते पूरा करा कर देती थी। विस्मय और आतंक के कारण मुझे लगातार कई दिनों तक नींद नहीं आई। हर समय नाजिमा के ही बारे में सोचता रहता । रह-रहकर उसका अपरूप सौन्दर्य मेरे सामने थिरकने लगता था। इसी तरह एक सप्ताह बीत गया। नाजिमा कौन थी ? जाकिर कौन था ? उन दोनों का आपसी संबंध क्या था ?...... ये दोनों बिकट प्रश्न बराबर मेरे मस्तिष्क में चक्कर काटते रहे।

आखिर एक दिन इनका उत्तर मिल ही गया मुझको। रूहानी दुनिया की सैर की पाण्डुलिपि ने ही इस जटिल समस्या को हल कर दिया। उस महत्वपूर्ण पाण्डुलिपि का लेखक 'जाकिर ही था । पाण्डुलिपि के आखिरी पृष्ठ पर सुनहरे अक्षरों में उसका नाम लिखा था, वह बहुत ही आश्चर्यजनक, कौतूहलपूर्ण और अविश्वसनीय सा था। जाकिर की प्रेमिका थी नाजिमा । जाकिर अपने समय का एक बहुत बड़ा तिलिस्मी था, साथ ही प्रेतविद्या में भी वह माहिर था । रूहानी दुनिया के बारे में वह हरदम अधिक-से-अधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश करता रहता था। वह विभिन्न तरीकों से कई जिन्न-जिन्नातों से एक साथ सम्पर्क स्थापित कर लेता था। इसमें काफी खतरा था, मगर जाकिर ऐसे खतरों से खेलने में माहिर था। एक बार संयोग से एक बहुत बड़ा जिन्न जाकिर के चंगुल में फंस गया। उसका नाम माकूल अली था । जाकिर उसकी मदद से नाजिमा की रूह को रूहानी दुनिया में भेजने लगा। नाजिमा जब वहाँ से वापस लौटकर आती तो जाकिर को रूहानी दुनिया का आँखों देखा हाल और अपने विचित्र अनुभव बताती । बाद में जाकिर ने उसी के आधार पर रूहानी दुनिया की सैर नामक पुस्तक लिखी थी। कहने की जरूरत नहीं कि पाण्डुलिपि के इस बिबरण ने अदृश्य, अगोचर और मानबीय इन्द्रियों की सीमा से परे की दुनिया के प्रति मेरे बिश्वास की नींब को और अधिक मजबूत कर दिया। दूसरे दिन जुमेरात को मैंने पीर सुलेमान की चौकी बनाने का दृढ़ संकल्प कर लिया। लिफाफे में नोट ज्यों के त्यों रखे थे। मैंने उनमें से दो नोट निकाले और जरूरी सामान लाकर रख दिए । यही से एक ऐसी कहानी का जन्म होता है जिस पर शायद ही किसी को विश्वास हो । मगर सत्य-सत्य होता है और कभी-कभी वह इतना आश्चर्यजनक होता है कि एक बार मनुष्य को अविश्वसनीय और काल्पनिक सा ही लगता है

सांझ की स्याह चादर फैल गई थी चारो तरफ। हालनुमा कमरे को साफ करके मैंने चावल के पांच करे लगाये। फिर उन पर पांच रंग के तेलों के अलग-अलग चिराग जलाकर उन पर पांच रंग के अलग-अलग फूलों की मालायें पहना दीं। इसके बाद पांच तरह की मिठाइयाँ रखकर धूप-लोहबान भी सुलगा दिया। दूसरे ही क्षण सारा कमरा सुगन्ध से भर गया। इसके बाद जो जरूरी काम थे उन्हें पूरा करके मैं पाण्डुलिपि में दिए गए अरबी मंत्र को आंखें बंद करके पढ़ने लगा चुपचाप । धीरे-धीरे एक घंटा बीत गया। चिराग बराबर जलते रहे। एक बार मैंने उनकी तरफ देखा और फिर मंत्र पढ़ने लगा। अचानक एक इतनी भयानक और डरावनी आवाज सुनाई पड़ी कि मेरा कलेजा कांप गया । कोई प्राण त्यागता हुआ व्यक्ति जैसे पीड़ा से कातर स्वर में कराह रहा हो । यह आवाज मैदान के कब्र की ओर से आ रही थी। यह भयानक आबाज धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही थी। साथ ही मेरा भय बढ़ता जा रहा था। सहसा मेरी नजर बायीं ओर घूम गई। देखा तो वहाँ एक घिनौना सा। बदसूरत व्यक्ति बैठा था उसकी काली स्याह देह चमड़ी गल गई थी। नीचे का जबड़ा बाहर की ओर लटका हुआ था । आँखे कोटर में धंसी हुई थीं और सिर मुड़ा हुआ था। हाथ पैर की उंगलियाँ आधी आधी थी । अब कुल मिलाकर वह बड़ा बीभत्स और भयानक व्यक्ति था। मैंने घृणा के मारे उसकी ओर से मुंह फेर लिया और जल्दी-जल्दी मंत्र पड़ने लगा। अब वह भयानक कब्रिस्तानी आबाज बाताबरण की गहराई में डूबने लगी थी। धीरे-धीरे और उसी के बाद नया बातावरण उपस्थित हो गया। चावल पर जल रहे पांचों चिरागों की रोशनी के रंग लाल, पीले, हरे,सुनहले और नीले हो गए। फिर वे एक में मिलकर कुछ अस्पष्ट सा आकार बनाने लगे ।

मैं बहुत ही सतर्क था उस समय और हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार था। वह आकार धीरे-धीरे एक पालकी शक्ल में बदल गया। जैतून की लकड़ी की बनी वह पालकी बहुत ही खूबसूरत थी। जिस पर सोने का पर्त चढ़ा हुआ था और बारीक मीनाकारी की गई थी। दोनों ओर मखमल की कीमती चादरें झूल रही थीं। उन पर भी सोने के बारीक तार से तरह-तरह के फूल कड़े हुए थे । पालकी के चारों तरफ मोतियों और हीरे जवाहरात की झालर लगी थी। कुछ क्षण बाद धीरे से पालकी का पर्दा हटा और उसमें से एक व्यक्ति ने सिर निकाल कर बाहर झांका। वह बहुत ही सुन्दर था। होंठ पतले और लाल थे, नाक नुकीली और आंखें बड़ी-बड़ी थीं। गोरे रंग का वह व्यक्ति सिर पर कलंगीदार टोपी पहने था। उस व्यक्ति ने एकबार मेरी ओर देखा फिर मुस्करा पड़ा। उसकी मुस्कराहट मुझे बहुत अच्छी लगी। फिर उसने इशारा करके मुझे अपने नजदीक बुलाया। मैं अपनी जगह से हटना नहीं चाहता था। मगर न जाने किस अज्ञात प्रेरणा के वशीभूत होकर मैं उसकी ओर बढ़ गया। दूसरे ही क्षण उसने मुझे अपनी पालकी में बैठा लिया । मगर उसके पास बैठते ही मेरा मन-प्राण डूबने लगा जैसे । ऐसा लगा मानो चेतना कभी भी लुप्त हो सकती है, पर ऐसा हुआ नहीं। दूसरे ही क्षण वह दृश्य मेरे सामने से हट गया और इसके साथ ही लगा जैसे वह पालकी तीब्र गति से हवा में उड़ रही हो। वह व्यक्ति मेरे सामने बैठा हुआ अभी भी मुस्करा रहा था। मैंने हिम्मत संजोकर पूछा - "आप कौन हैं ? मुझे कहाँ ले जा रहे हैं ?" मेरा प्रश्न सुनकर वह व्यक्ति धीरे से बोला - "जिसकी चाह तुमको थी मैं वही हूँ और तुम जहाँ जाना चाहते थे हम तुम्हें वहीं ले जा रहे हैं।" इतना कहकर वह चुप हो गया। मैंने बाहर झांककर देखा गहरा अन्धकार फैला था चारों तरफ । मझे लगा जैसे किसी बहुत ही बीरान घाटी के बीच से गुजर रहा होऊँ। थोड़ी देर बाद मुझे उस घाटी में सैकड़ों-हजारों आदमियों के साथ रोने और चीखने चिल्लाने की आवाजें सुनाई पड़ने लगीं। ऐसा लगा मानों सैकड़ों आदमियों को एक साथ कठोर यातनायें दी जा रही हों । उनका सामूहिक आर्तनाद सुनकर मेरा रोम-रोम सिहर उठा। उस व्यक्ति ने हौले से कहा - "उन आबाजों की ओर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। बे हैवान से बदतर उन इंसानों की तमाम रूहें हैं

जिन्होंने अपनी जिस्मानी जिन्दगी में कभी कोई अच्छा काम नहीं किया है। तुम्हारे मजहब में जिसे नरक कहते है वह यही है। मगर उसे बनाने वाला खुदा नहीं इंसान है। उसके अच्छे-बुरे विचार ही स्वर्ग और नरक हैं। इसके अलावा और कुछ नहीं है।" यह सुनकर मेरी सारी देह सन्न हो गई। मुझे अपने आप पर शक होने लगा कि मैं जिन्दा हूँ या मर चुका है। मैंने अपनी आँखे घुमाकर अपने शरीर की ओर देखा फिर सामने बैठे उस व्यक्ति की ओर ताकने लगा। वह मुस्कराकर बोला - "तुम जिन्दा हो, मगर जो कुछ देख रहे हो या आगे जो कुछ देखो-सुनोगे वह रूहानी जिस्म से देख सुन रहे हो या देखो-सुनोगे ।” यह सुनकर मैं और हैरान हो गया। सचमुच उस समय मुझे एक विचित्र अनुभूति हो रही थी। थोड़ी देर बाद मैं एक ऐसे स्थान पर पहुँच गया जहाँ बेहद खामोशी थी। बाद में मालूम हुआ कि वह स्थान दुनिया का ऐसा हिस्सा है जहाँ लोग अपने मजहब और ईमान के रास्ते चलकर आते और रहते हैं।
 
यहीं उस व्यक्ति से मेरा साथ छूट गया। वह कहाँ चला गया और पालकी कहाँ गायब हो गई कुछ पता ही नहीं चला। अपने आपको मैं उस विलक्षण वातावरण में एकदम अकेला और निस्सहाय अनुभव कर रहा था। उस समय मुझे स्थूल और सूक्ष्म शरीर के जरिये जिस्मानी और रूहानी दुनिया का एक साथ अनुभव हो रहा था। वह सब कुछ अत्यन्त विचित्र और वर्णनातीत था। सारी धरती हरे-भरे घासों से ढकी थी। क्षितिज में जहाँ धरती को आकाश चूम रहा था। वहीं काफी दूर तक हल्की सिन्दूरी आभा फैली हुई थी और उसके ठीक नीचे शानदार मकानों और हरे-भरे पेड़ पौधों की लम्बी कतारें छनकर आ रहे रूपहले प्रकाश से चमक रही थीं। उस नैसर्गिक दृश्य को आज भी भूल नहीं पाया हूँ। इन पंक्तियों को लिखते समय वह सारा दृश्य मेरे मानस पटल पर एक बार मूर्तिमान हो आ रहा है। "क्या मैं कोई गहरा स्वप्न देख रहा था ?" "नहीं ....... नहीं वह स्वप्न नहीं बल्कि एक हकीकत थी। इस दुनिया का दूसरा पहलू था और जीते जागते इंसानों का असली रूप था। वहाँ मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ कि मनुष्य अपने आपमें कितना क्षुद्र, अज्ञानी और सीमित था। जिस दुनिया को वह सत्य समझता है वह दुनिया और वहाँ का जीवन इस नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर दुनिया की दृष्टि में एक स्वप्न से ज्यादा और कुछ नहीं है। वह यह नहीं जानता कि जिन्दगी खत्म होने के बाद वह एक ऐसी दुनिया से जाग उठेगा । जहाँ उसे यह जिन्दगी और दुनिया झूठी लगने लगेगी। उसी तरह जैसे हम और आप सपना देखने के बाद जाग जाते हैं और उस सपने को झूठा समझते हैं। मैंने कुछ ऐसे लोगों को भी देखा है, जो बुद्धि, ज्ञान और विद्या में काफी ऊँचे स्तर पर पहुँच गए थे और उस समय एवं क्षण का इंतजार कर रहे थे जब इस भौतिक जगत में हजारों-लाखों लोगों से अलग 'व्यक्तित्व' लेकर जन्म लेंगे तथा ज्ञान का प्रकाश फैलायेंगे ।

मैं कब तक उस अजीबो गरीब दनिया का चक्कर काटता रहा । यह तो नहीं बतला सकता, मगर बाद में मुझे अनुभव हुआ कि मैं जिस वातावरण में और स्थिति में हूँ वह पानी में पड़ रही छाया की तरह हिलती हुई धीरे-धीरे गायब हो रही है। उसके साथ मैं भी एक विचित्र प्रकार का भारीपन अनुभव करता जा रहा था। फिर एक झटका सा लगा और मेरे सामने घना कुहरा सा छा गया। जब यह कुहरा हल्का हुआ तो मैंने स्वयं को अपने कमरे में पाया । पांचों चिराग पहले की तरह ही जल रहे थे। बातावरण में राल, लोहबान और अगरबत्ती की मिली जुली गंध बिखरी हुई थी। मैं जाने कब तक संज्ञाशून्य सा जड़वत बैठा रहा। सहसा उसी समय फिर मुझे कब्रिस्तान से आने वाली भयानक आवाज सुनाई पड़ी। थोड़ी देर बाद अचानक कमरे का बन्द दरवाजा फटाक से खुल गया और हांफती हुई नाजिमा मेरे सामने आ खड़ी हुई। एक प्रेतात्मा को सशरीर अपने सामने देखकर मेरी दशा कैसी हो गई होगी यह आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। जीभ तालु से चिपक गई । न कुछ पूछा गया और न कुछ कहा गया । बस

आँखें फाड़े लगभग दो सौ वर्ष पुरानी उस अतृप्त प्रेतात्मा की ओर ताकता ही रह गया। ऐसी आत्मा की ओर जो अपने मजहब के मुताबिक कयामत की रात कही भी जन्म नहीं ले सकती थी। अचानक निस्तब्ध वातावरण में रूदन भरा स्वर फैल गया। नाजिमा सिसक-सिसक कर रो रही थी। फिर वह दौड़कर सहसा मुझसे एकदम लिपट गई।

"क्या चाहती हो तुम ?" मैं जोर से चीख पड़ा।

"माकूल अली से मुक्ति....बस....मैं माकूल अली से मुक्ति चाहती हूँ। वह हर रात मुझे मारता-पीटता है ...... मुझे उसके चंगुल से छुड़ा लो ...... वह बड़ा जालिम है ....... उफ् ।” नाजिमा की आखिरी बातें जैसे हवा में डूब गई।

मैंने अपने आपको किसी तरह उससे छुड़ाया और कमरे से बाहर भागा। फिर उसी बदहवास हालत में मैं कब तक दौड़ता रहा कुछ मालूम नहीं। बाद में जब मैंने सारी कहानी नियाज साहब को बतलाई तो वे बोले - "मियां ! वह बड़ी जालिम लड़की की बेपनाह रूह है। उसने मेरे बालिद को भी काफी तंग किया था । मजबूर होकर उन्होंने उसकी कब्र पक्की बनवा दी थी मगर उसने मेरे बालिद को फिर भी नहीं छोड़ा। उसी के डर से न मैं उस मकान में रहने का साहस करता है और न तो कोई किराएदार ही वहाँ रहने को तैयार होता है। नाजिमा की प्रेतात्मा को माकूल अली के चंगुल से मुक्ति मिली कि नहीं यह तो मैं नहीं बतला सकता, मगर आज भी उसके अदृश्य बंधन में बंधा हूँ मैं ।
 
अध्याय ८ संन्यासिनी

मेरे जीवन में बहुत-सी खियाँ आई । कुछ घर गृहस्थी के रूप में, कुछ बुद्धिजीवी बिदुषी के रूप में, कुछ साधिका अथवा योगिनी के रूप में और कुछ तांत्रिक संन्यासिनी के रूप में भी, लेकिन इस समय जिस स्त्री की कहानी आप पढ़ रहे हैं वह इन सबमें कोई नहीं है।

एक सप्ताह पूर्व की बात है। मैं नित्य की भांति चुपचाप बैठा था श्मशान की सीढ़ियों पर – सांझ की स्याह कालिमा धीरे-धीरे धरती पर फैल रही थी। आकाश में बादल घिरे हुए थे । हबा रह-रहकर सारे शरीर में सिहरन पैदा कर रही थी। श्मशान में किसी युवक की लाश धूं-धू कर जल रही थी। चिता की लाल-पीली लपटों की रोशनी में मेरी निगाह किसी संन्यासिनी युवती पर पड़ी। स्थिर दृष्टि से अपलक देख रही थी वह चिता की तरफ । उसके गम्भीर चेहरे पर उस समय कौन-सा भाव था ? मैं समझ न सका उसे । कुछ देर बाद वह पलटी और सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आने लगी। जब वह मेरे करीब आई तो मुझसे रहा न गया । न जाने किस प्रेरणा से वशीभूत होकर पूछ ही बैठा मैं "क्या आप काशी की ही रहनेवाली हैं ?" अचानक मेरा प्रश्न सुनकर वह संन्यासिनी चौंक पड़ी। सीढ़ियों पर उठ रहे पैर ठमक कर रूक गये। उसने पलटकर मेरी ओर एक बार गहरी नजरों से देखा, फिर हाँफते हुए कहा, "नहीं ! मैं बाहर से आई हूँ। यहीं ऊपर एक आश्रम में रहने की व्यवस्था हो गयी है कुछ दिनों के लिए।" संन्यासिनी की भाषा प्राज्जल और गंभीर थी-निश्चय ही वह कोई बिदुषी महिला थी। थोड़ा रूक कर उभर आये सांसो को नियंत्रित कर वह आगे बोली, "आपका परिचय ?" मैंने अपना संक्षिप्त में परिचय दे दिया। जिसे सुनकर एक बार फिर उसने मेरी ओर गहरी नजरों से देखा और हाथ में लिए झोले को बगल में दबाती हुई वह कहने लगी, "कैसा योगा-योग है। मैं तो कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि आपसे इस प्रकार इतने सहज ढंग से भेंट हो जाएगी। कहाँ रहते हैं आप ?" "पास ही में, 5 मिनट का रास्ता है। आपको आपत्ति न हो तो, चलिए अपना स्थान दिखला दूं आपको । मुझे भारी प्रसन्नता होगी" अनुरोध भरे स्वर में कहा मैंने । "संन्यासिनी को आपत्ति क्या ? कौन-कौन है परिवार में ?" "सभी लोग हैं, मगर मैं अपने आप में अकेला हूँ।" मेरी बात पर पहले तो वह हँसी, बाद में उसने पूछा, "क्यों ?" "क्यों ? इसका उत्तर तो मेरे पास जरूर है, लेकिन बताने में काफी समय लगेगा। इसलिए आप अपना परिचय बताएँ, तो ज्यादा अच्छा होगा।" "मेरा नाम तो योग भारती है, लेकिन मुझे पाखी के नाम से भी जाना जाता था—” "आपने संन्यास क्यों लिया ? "शर्माजी ! यह एक लम्बी कहानी है।” कहकर वह अपनी पुरानी यादों में जैसे डूब गयी।

काफी देर बाद वह लम्बी सांस लेकर भर्राये स्वर में कहने लगी, “मेरा नाम पाखी है। यह तो आपको मालूम ही हो गया है। मैं पश्चिम बंगाल के एक कस्बे की रहनेवाली हूँ। किसी कारण वश उस कस्बे का नाम नहीं बतलाऊंगी आपको। परिवार में सभी लोग थे - माँ-बाप, भाई, वहन सभी । मेरा । परिवार मध्यवर्गीय था। खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। मैं अपने भाई-वहनों में सबसे बड़ी थी। मेरे माता-पिता मुझको उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे । मैंने शांति निकेतन में रहकर उच्च शिक्षा भी प्राप्त की। लेकिन तभी कस्बे में कालरा फैला । मेरे माता-पिता और भाई-वहन काल के ग्रास बन गये | जब मैं बोलपुर से अपने गांव पहुंची तो वहाँ कब्रिस्तान की खामोशी के सिवाए और कुछ नहीं मिला मुझे। अब मैं वहाँ रहकर क्या करती। इसलिए मैं उस समय अपनी एक सहेली के यहाँ चली जाना चाहती थी। मेरी सहेली का नाम था बूको चटर्जी । वह बारासात में रहती थी। सोचा वहाँ रहकर नौकरी खोजूंगी । इसके सिबाय मैं कर ही क्या सकती थी। उस समय मेरी आयु 24-25 साल से ज्यादान थी, मगर मेरा मस्तिष्क परिपक्व था । किसी भी बात को मैं काफी गहराई से सोचने-समझने की कोशिश करती थी। खैर मैं गांव से पैदल चलकर लगभग 5 मील दूर स्टेशन पर पहुँची और लालगोला सियालदह पैंसेजर में बैठ गयी। जब गाड़ी धुवालिया स्टेशन पर रूकी तो उस समय रात के नौ बजे थे। मेरे बगल में एक महिला बैठी थी। कपड़े लते और चेहरे-मोहरे से वह संभ्रांत लग रही थी। उस महिला से मैंने पूछा, "यह गाड़ी कितने बजे सियालदह पहुँचेगी ?"

"सियालदह ?" महिला चौंकती हुई बोली, "आप कहाँ तक जायेंगी ?"

"वारासात जाना है मुझे ।”

"इस रात में आपको जाने की क्या सूझी? क्या घर में कोई मर्द नहीं था।"वी ने कहा, फिर आपको तो आज बारासात के लिए सियालदह से बस या ट्रेन कुछ भी नहीं मिलेगी।" "रात सियालदह स्टेशन पर गुजार लूंगी।" मैंने कहा। "लगता है घर से नाराज होकर जा रही हो क्या ?” उस महिला ने पूछा। यह सुनकर डिब्बे में बैठे अन्य यात्री भी उत्सुक होकर मेरी ओर देखने लगे । मैंने अपने पास बैठी महिला को अपनी कथा सुना दी । अन्त में बारासात में रहकर नौकरी करने की भी चर्चा की। मेरी करूण कथा सुनकर उस महिला के नेत्र सजल हो उठे। बातचीत के सिलसिले में उस महिला ने अपना नाम श्यामली बनर्जी बताया था। श्यामली बनर्जी ने कहा, "देखो पाखी ! जबान और बेसहारा । लड़की के लिए शहर बड़े खतरनाक होते हैं। फिर तुम तो बहुत सुन्दर भी हो । रात का समय है। मैं नैहारी स्टेशन पर उतर जाऊँगी-" फिर वह अपने पास बैठे एक अधेड़ भद्र पुरुष से मेरा परिचय कराती हई बोली, "ये महाशय मेरे खास परिचित हैं। नाम है रामनाथ चौधरी दमदम में रहते है। बड़े ही सज्जन पुरुष हैं। आज रात तुम इन्हीं के मकान में ठहर जाओ । कल सवर तुम्हें ये गाड़ी में बैठा दंगे । तुम आराम से बारासात पहुँच जाओगी।" मैं उस बुढ़िया के कथानुसार उस रात चौधरी के यहाँ रूकी। सबेरा हुआ मैं चलने की तैयारी करने लगी। तभी हाथ में चाय का प्याला लिए चौधरी महाशय की मौसी आ गयी और मुझे देखकर हँसकर कहने लगी,"कहाँ जा रही हो बेटी ? अब तो हमेशा के लिए यहीं रहना है तुमको मेरे पास -" मैं चौंक पड़ी । बोली - "क्या मतलब मैं समझी नहीं -"

"समझ जाओगी। सब समझ जाओगी-" व्यंग भरे स्वर में वह बोली, "मैं चकला घर चलाती हूँ। तुम जैसे फूल खरीदना और खरीदकर ग्राहकों को सूंघने के लिए देना मेरा पेशा है समझ गयी। श्यामली भी यही काम करती है। चौधरी तो दलाल था । अपनी दलाली का 5 सौ रुपये मुझसे लेकर चला गया । खैर, अब तुम आराम करो बेटी और फिर मैं जैसा कहं वैसा करो" "जरा आप ही सोचिए शर्माजी – कैसी हुई होगी यह सब सुनकर मेरी मानसिक स्थिति ? बड़ा आघात लगा था हृदय को। क्या से क्या हो गया था। क्या सोचा था और क्या हो गया था? आवाक् और स्तब्ध खड़ी रही न जाने कब तक। फिर सोचने लगी हो सकता है, मेरे भाग्य में वेश्या होना ही लिखा हो। मगर शांति निकेतन की मेधावी छात्रा को बेश्या भी होना होगा, इसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी लाल मुकुर टीटागढ़ और बैरकपुर के बीच एक बदनाम बस्ती है । जहाँ सुन्दर शरीर, यौबन और सौन्दर्य का सौदा होता है। जिस्म फरोशी के गर्म माहौल में जहाँ कच्ची कलियां झुलस जाती हैं और खिले हुए फूल मुरझा जाते हैं।

एक सजे-धजे कमरे में बिस्तर पर मैं सिर झुकाए बैठी थी । एकाएक आहट मिली तो मैंने एक नजर सामने की तरफ डाली एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति दरबाजे के अन्दर प्रवेश कर चुका था। बात यह थी कि मुझमें चंचलता थी ही नहीं और नयी आनेवाली लड़कियों की तरह रो भी नहीं रही थी मैं । एकदम गुमसुम और उदास मुझे देखकर वह अनुभवी व्यक्ति समझ गया, "मैं जरूर किसी भले घर से वहका कर लाई गयी हूँ -" वह जैसे ही मेरे पास पहुंचा । मैं हड़बड़ा कर उठी और बिस्तर से हटकर एक ओर खड़ी हो गयी। मेरा सारा शरीर काप रहा था और मेरे गालों पर मोटे-मोटे आंसू हुलक पड़े थे। मुझे देखते-ही-देखते उसने शराब की एक छोटी बोतल निकाली और पास ही रखी तिपाई पर से गिलास उठाकर उसमें शराब पीने लगा ।

क्षण भर में पूरी बोतल खाली कर दिया उसने । अब मैं समझ गई कि आगे क्या क्या होगा ? इसलिए मैं झुककर उसके पैरों से लिपटकर रोती हुई बोली, "मुझे बचा लीजिए बाबा ! मैं तो आपकी बेटी की तरह हूँ। शांति निकेतन की छात्रा रही हूँ। एम० ए० किया है मैंने । अपनी भूल से मैं इस गंदी जगह आ गयी हूँ। मुझे बचा लीजिए बाबा । वर्ना मैं शायद उसके लिए बाबा शब्द-सम्बोधन एकदम अप्रत्याशित था। इस संबोधन ने उन्हें भीतर तक हिला दिया। वह बेचैन हो उठे। एक रोती, प्रार्थना करती, असहाय युवती के प्रति अनायास ही उनके हृदय में ममता उमड़ पड़ी। संभवत: पहली बार अपने लम्बे विलासी जीवन में उन्हें लज्जा महसूस हुई। अचानक पवित्रता की भावना से ओत-प्रोत हो उठे वह । "तुमने मुझे बाबा कहा, "मेरा हाथ थामकर बे मुझे अपने पास बैठाते हुए बोले, "जीबन में पहली बार किसी ने मुझे बाबा कहा है। मेरा नाम रामबाबू है। मेरे घर में दो बेटे, उनकी बहुएँ और मेरी लड़की है। कोई भी मुझे बाबा या पिता नहीं बुलाता है। यहां तक कि मेरी पत्नी भी मुझसे घृणा करती है।" रामबाबू का गला भर आया । उन्होंने अपनी गीली आँखें पोछते हुए पुनः कहा “मैं पढ़ा-लिखा हूँ बेटी । मुझे किसी चीज की कमी नहीं है। अपनी बुद्धि बल से व्यवसाय किया। काफी धन भी कमाया। जायदाद बनाया । अपने दो पुत्रों को विदेशों में उच्च शिक्षा दिलाई."

"ईश्वर की कृपा से सब कुछ मेरे पास है, लेकिन पत्नी से मेरी नहीं बैठती। इसलिए मैं इस नरक में आने को मजबूर हो गया । मेरी पत्नी ने कभी भी प्यार-स्नेह अपनत्व और सलाह से मुझे रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं की। बच्चे भी अपनी माँ की तरह मुझसे घृणा करने लगे और दूर रहने लगे । अपने परिवार की अबहेलना और घृणा के कारण मैं और वहकता गया।" 'नदिया जिले में मेरी खेती बाड़ी और कई मकान हैं यहाँ भी मेरा अपना काफी लम्बा-चौड़ा व्यवसाय है। परिवार के लोग नदिया में रहते हैं। मेरे दोनों बेटे अच्छे पद पर नौकरी करते हैं।' “मैं स्वयं बहुत दुखी रहता हूँ। तुम यहाँ कैसे आ पहुँची? मुझे बताओ बेटी, मैं तुम्हारे लिए कुछ सोचूँ।" मैंने अब राम बाबू की तरफ गौर से देखा तो उनके विश्वास में आकर मैंने अपनी आपबीती सुना डाली

रामबाबू ने वेश्यालय की मालकिन को 4 हजार रुपये देकर मुझे मुक्त करा दिया। वह मुझे अपने घर ले आये। अपने काफी लम्बे चौड़े मकान में वे नौकरों के साथ अकले रहते थे। मेरे आने पर उन्होंने एक नौकरानी का भी इन्तजाम कर दिया। मैं उनकी भांजी के रूप में वहाँ रहने लगी। अब कभी मैं कलकत्ते जाकर नौकरी की इच्छा प्रकट करती तो रामबाबू बच्चों की तरह रोने लगते थे । वास्तव में मैं उन्हें पिता की तरह मानती थी उनका हर तरह से ख्याल रखती थी। रामबाबू को अपने बच्चों से प्यार नहीं मिला था और अब मैंने उनके इस अभाव की पूर्ति कर दी थी। उन्होंने मेरे कहने पर शराब पीना कम कर दिया था। अय्याशी से तो बिल्कुल विरक्त हो गये थे, फिर भी लोगों को उनके सादे आचरण पर विश्वास नहीं हुआ । इसलिए लोग मुझको उनकी रखैल ही समझते थे। जब यह खबर नदिया पहुंची तो उनके घरवालों को बहुत बुरा लगा। रामबाबू कभी-कभी समय निकालकर नदिया चले जाते थे। जब मेरे आने के बाद वह नदिया पहुँचे तो उनके परिवार वालों ने मेरे साथ उनके अवैध संबंध की चर्चा करते हुए भविष्य में नदिया आने के लिए मना कर दिया । घर बालों के इस आरोप से रामबाबू तिलमिला उठे और उसी दिन पुन: वहाँ पैर न रखने की प्रतिज्ञा करके वापस लौट आये। उन्होंने यह बात मुझको नहीं बताई, क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं मुझे पता चल गया तो मैं रूष्ट होकर कहीं चली जाऊंगी। लेकिन इस बात का पता मुझे काफी दिनों बाद चला। उस समय लग गया होता तो सचमुच मैं कहीं न कहीं चली जाती। खैर रामबाबू ने मेरी सुख-सुविधा और सुरक्षा के लिए मिथ्या आरोप का वह जहर अकेले ही पी लिया था। एक दिन रामबाबू ने मेरे सामने अपनी इच्छा प्रकट की, कि वह किसी सुयोग्य लड़के से उसका बिबाह कर घर जमाई रखना चाहते हैं। मैंने उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया । मेरे मन में घोर बिरक्ति भर गयी थी अकारण संसार समाज के प्रति, हो सकता है इसका कारण अब तक के कटु अनुभव रहे हाँ। पूरे १५ वर्ष तक में रामबाबू के सान्निध्य में रही। उन्होंने मुझ पिता का भरपूर स्नेह प्यार और दुलार दिया। मैंने भी एक योग्य पुत्री की तरह उनके प्रति कर्तव्य का पालन किया। एक दिन अचानक उनको दिल का दौरा पड़ा । मैंने उन्हें तुरन्त कलकत्ता नर्सिंग होम में दाखिल करवाया।

रामबाबू ने अपनी अस्वस्थता की सूचना अपने घरवालों को देने की कोई जरूरत नहीं समझी। मेरे आग्रह करने पर भी वह टाल गये। मैंने ही उनकी सेवा की। रामबाबू का अपनी पत्नी और बच्चों से कोई संबंध नहीं रह गया था।

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रामबाबू यह समझ गये थे कि वे अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकेंगे इसीलिए मेरे भविष्य की चिंता उन्हें अधिक सता रही थी। वे मेरी आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा का प्रबन्ध करने के लिए बेचैन हो उठे। धीरे-धीरे समय बीतता गया। रामबाब मेरी सेवा से काफी प्रसन्न थे। एक दिन उन्होंने मझे एक लिफाफा देते हुए कहा, "बेटी मैंने यहाँ की अपनी सारी सम्पत्ति तुम्हारे नाम कर दी है। व्यवसाय मेरे न रहने पर मेरा विश्वस्त नौकर संभाल लेगा। तुम्हें कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ेगी। मैं इससे बढ़कर तुम्हें कुछ नहीं दे सकता हूँ। जब कभी तुम्हें कोई परेशानी हो, मेरे मित्र वकील दुलालचन्द्र से मिल लेना बे तुम्हारी मदद करेंगे । यदि तुम जीवन साथी की कमी महसूस करो तो इसके लिए भी तुम दुलाल चन्द्र से ही मिलना । ये तुम्हारे लिए योग्य साथी ढूंढ देंगे । मैंने उन्हें समझा दिया है __ मैंने इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। मैं राम बाबू की महानता से चकित रह गयी। मैंने इसका विरोध करना चाहा, लेकिन रामबाबू के क्रोध के भय से खामोश रही। इसके ठीक दो महीने बाद रामबाबू की मृत्यु हो गयी। उनकी मृत्यु के समय मेरे सिवाए वहाँ कोई न था। उस समय मेरी वेदना, मेरी पीड़ा और मेरे दुख की कोई सीमा न थी। मैं असहाय-सी उनके सौम्य मुख की ओर देखती रही। उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर उनके परिवार का एक भी व्यक्ति नहीं आया। मुझेही रामबाबू की अंत्येष्टि एवं क्रिया करनी पड़ी। लेकिन जब उनके परिवार वालों को यह पता चला कि मृत्यु के पूर्व रामबाबू ने अपनी निजी संपत्ति मेरे नाम कर दी है, तो उनके बड़े लड़के ने अदालत में लिखित आबेदन-पत्र दिया कि पाखी चक्रवती नामक एक वेश्या ने जबरन उनके पिता रामबाबू के सम्पत्ति अपने नाम कर बा कर हड़प लिया है। मेरे पास पुलिस मामले की जांच के लिए आई। मझको उपरोक्त आरोप की जानकारी मिली तो मेरे दुःख की सीमा न रही। मैंने पुलिस अधिकारी को अपनी व्यथा-कथा सुनाते हुए कहा, "रामबाबू मेरे पिता के समान थे। उन्होंने मेरे लिए बही किया, जो एक पिता अपनी पुत्री के लिए करता है। मुझे उनकी संपत्ति का कोई लालच नहीं है। उन्होंने बिना मुझसे पूछे, मेरे नाम संपत्ति लिख दी है। उनका दिल न टूटे इसलिए मैंने विरोध नहीं किया था।

मैंने निश्चय किया था यह सारी सम्पत्ति उनके घरवालों को लौटा दूंगी। पर उनके घरवालों ने मुझसे न मिलकर हमारे पवित्र रिश्ते पर गंदा आरोप लगाया है। अब मैं बास्तबिकता और सत्यता को सामने लाने के लिए मुकदमा लड़ने को तैयार हूँ।" मुकदमा पूरे दो साल तक चला। रामबाबू के मित्र दुलालचन्द्र ने मेरी सहायता की। मुझे वेश्या सिद्ध करने के लिए सोमनाथ ने कोई कसर बाकी नहीं रखा। श्यामली से लेकर चकलाघर की मालकिन तक की गवाही दिलवाई उन्होंने अदालत में। अन्त में मुकदमा का फैसला मेरे पक्ष में हुआ । फैसले के समय दुलालचन्द भी मौजूद थे। मुकदमा जीतने के बाद मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। मुझे सम्पत्ति पाने की नहीं, बल्कि अपने उपर लगे कलंक के धुल जाने की खुशी थी। मैंने रामबाबू की सारी सम्पत्ति सोमनाथ और उनके छोटे-भाई विपिन कुमार के नाम तुरन्त उसी समय लिख दी। रामबाबू के परिवारवालों की गलतफहमी दर हो गयी । मेरा मन रो उठा भी । भीतर न जाने कैसी रिक्तता भर गयी थी। मेरे सामने समाज का घिनौना रूप और परिवार का स्वार्थ भरा लोलुप रूप प्रकट हो चुका था। मैं दूसरे ही दिन बिना किसी को कुछ बताए हरिद्वार के लिए चल पड़ी। यहाँ मुझे कुछ शांति मिली। एक दिन जब मैं ऋषिकेश में गंगा किनारे बैठी थी, तो उसी समय एक साधु से मेरा परिचय हो गया। उस साधु का नाम था दिव्य भारती। वे मुझे अपने आश्रम में ले गये। मेरे आग्रह पर उन्होंने मुझे संन्यास की दीक्षा दी। मैं छः साल उनके आश्रम में रही और योग और बेदान्त का गहरा अध्ययन और चिन्तन किया मैने । जो थोड़ा बहुत मन में आकर्षण था, वह भी समाप्त हो गया।

इतना सब सुनाने के बाद संन्यासिनी हांफने लगी और उसी के साथ सांसें भी तेज चलने लगी। खांसते हुए उसने एक गिलास पानी मांगा। पानी पीकर उसने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा, "शायद अब मेरा अन्तिम समय आ गया है। मेरी इच्छा थी कि मैं जीवन के अन्तिम क्षणों में काशी में रहूँ और मेरा शरीर गंगा तट पर छूटे। शायद बाबा विश्वनाथ ने मेरी प्रार्थना सुन ली। इतना कहकर संन्यासिनी ने एक बार मेरी ओर भरपूर निगाहों से देखा और अंधेरी गलियों में कहाँ गुम हो गई, काफी दिनों तक मैं भटकता रहा कि उस सन्यासिनी से दोबारामुलाकात हो पर ऐसा हो न सका।
 
अध्याय ९ नाग सिद्धि

सन् १७७९ में भारतीय पुरातत्व अनुसन्धान विभाग की स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा हुई थी। उस समय विभाग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था भारतीय शिल्प और मूर्ति-कला की गुमनाम विभूतियों को खोजना तथा अजन्ता, एलोरा खजुराहो एवं बाद्य के प्राचीन मन्दिरों तथा दुर्लभ मूर्तियों की अनुकृतियाँ तैयार करना । इन कार्यों के प्रमुख अधिकारी थे - मि. जैकसन मि. जैकसन ने भारतीय पुरातत्व अनुसन्धान की जो मौलिक परम्परा स्थापित की, वह सन् १९४५ तक निर्बाध गति से चलती रही। उसके बाद व्यापक परिवर्तन हुआ विभाग में । अंग्रेज अधिकारियों के साथ-साथ कई भारतीय अधिकारी भी शामिल हो गये उसमें । विभाग का विस्तार हुआ और कार्य प्रणाली में भी भारी हेर-फेर किया गया । उस समय जिन भारतीय अधिकारियों की नियुक्ति की गई, उनमें एक थे - मि.जगदीश चन्द्र लाहा। लाहा साहब पुरातत्व विषय में विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटे थे । वह आकर्षक व्यक्तित्व के धनी और सुदर्शन पुरुष थे, लेकिन थे बड़े ही सरल स्वभाव के । कम-से-कम बोलना और अधिक-से-अधिक काम करना एक विशेष गुण था उनका। शायद १९४९-५० की बात है। उन दिनों लाहा साहब पश्चिम बंगाल के सरहदी इलाके में पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्मारकों तथा मंदिरों का विवरण तैयार कर रहे थे। मैं लाहा साहब के सहयोगी के रूप में वहाँ था। जिस इलाके में वह कार्य हो रहा था, वह राय चौधरी विपिन बिहारी घोषाल की जमींदारी के अन्तर्गत था । राय चौधरी साहब साहित्य, कला, संगीत के अलावा बिभिन्न प्रकार के व्यंजनों और सुस्वादु भोजन के भी प्रेमी थे । कलाकारों, संगीतकारों और विद्वानों का सम्मान करना और उन्हें आमंत्रित कर नये-नये सुस्वादु भोजन कराना उनका प्रिय शौक था। इसमें उन्हें अकल्पनीय आनन्द का अनुभव होता था। राय चौधरी साहब का मुख्य रसोइया था रंजन चौबे । गठीले शरीर का युवक था वह । आयु तीस बत्तीस से ज्यादा नहीं थी। वह उत्तरी भारत के किसी गांव का रहने वाला था और अनेक तरह के व्यंजन बनाने में उसे महारत हासिल थी। उसका कहना भी कि पूरे देश में उसके जैसा भोजन बनाने बाला कोई दूसरा नहीं है। बात सच ही थी। जिस-जिस व्यक्ति ने रंजन चौबे के हाथ का बना स्वादिष्ट और रूचिकर भोजन किया था, उनके लिए वह एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया। रंजन चौबे को शाकाहारी भोजन के अलाबा जो विशिष्ट व्यंजन बनाने में सिद्धहस्तता थी वह था गोश्त – राय चौधरी साहब काफी लम्बे अर्से से गोश्त खा रहे थे, लेकिन जो लज्जत और जो स्वाद उन्हें रंजन चौबे द्वारा बनाए गये गोश्त में मिला था, वह उनके लिए अकल्पनीय था। मि. लाहा के साथ मैं भी राय चौधरी साहब का अतिथि था, इसलिए प्राय: नित्य ही रात्रिकालीन भोजन में हम लोगों को शामिल होना पड़ता था। मैं गोश्त तो नहीं खाता था, मगर जैसा शाकाहारी भोजन वहाँ मुझे मिलता था, वैसा आज तक कहीं नहीं मिला सचमुच रंजन के हाँथ में पाक शास्त्र की बिशेष कला थी। मि. लाहा गोश्त खाते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे हंसकर कहा, मि.शर्मा, रंजन चौबे के हाथ का बना गोश्त तुमको अवश्य रखना चाहिए। जिन्दगी भर याद रखोगे ।"

राय चौधरी साहब की विशाल हवेली में दुर्गा पूजा का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता था । राय चौधरी साहब को विशेष प्रसन्नता उस समय हुई, जब उस वर्ष बिजयादशमी के अवसर पर अपनी हवेली में होने वाली शानदार दुर्गा पूजा के भोज में उन्होंने रंजन चौबे द्वारा तैयार किये गये पच्चीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन अपने मेहमानों को खिलाये और उनके अतिथियों ने जी भरकर प्रशंसा की। सबसे ज्यादा प्रशंसा की गयी मांसाहारी व्यंजनों की। इससे राय चौधरी साहब के मन में रंजन चौबे की इज्जत और बढ़ गई थी। रंजन चौबे प्रतिदिन बड़े सबेरे ही उठकर स्वयं मांस खरीदने बाजार जाता था। फिर कई घण्टे बाद बापस लौटता था। जब वह मांस बनाने लगता, तब किचन में किसी और को नहीं घुसने देता था। उस समय रसोई का सारा काम खुद ही संभालता था । रंजन चौबे के पहले राय चौधरी साहब के यहाँ का मुख्य रसोइया गंगाराम था । रंजन चौबे ने उसे निकलवा दिया था, इसलिए वह चिढ़ा हुआ था। चौबे के खिलाफ उसका कोई उपाय काम नहीं कर पा रहा था। फिर भी वह मौके की तलाश में था। दीवाली नजदीक थी। राय चौधरी साहब की हवेली की रंगाई-पुताई हो रही थी। एक रोज सायंकाल राय चौधरी साहब अपने कुछ घनिष्ठ परिचितों के साथ दीवानखाने में बैठे हुए थे।

मि. लाहा के साथ मैं भी बहीं उपस्थित था। उसी समय अचानक गंगाराम आ पहुँचा । उसके हाथ में एक पोटली थी। उसने आदर से झुककर राय चौधरी साहब को सलाम किया, फिर चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया। गंगाराम को अचानक आया देखकर राय चौधरी साहब ने पूछा, "क्या बात है कैसे आये ?" "आज्ञा मिले तो अन्नदाता की सेवा में एक प्रार्थना करने के लिए आया हूँ।” गंगाराम बिनम्र स्वर में कहा, "लेकिन सरकार जो कुछ भी कहूँगा, रंजन चौबे के सामने कहूँगा । इसलिए प्रार्थना है कि चौबे को भी यहाँ बुला लिया जाये, तभी सारी बातें साफ होंगी-" राय चौधरी साहब को कौतूहल हुआ। उनके आदेश पर तुरन्त ही रंजन चौबे को भी बुला लिया गया । इसके बाद उन्होंने पूछा, "अब बोलो गंगाराम, तुम क्या कहना चाहते हो ?" हे अन्नदाता ! आप चौबे जी से पूछे - यह आपके लिए किसका मांस पकाया करते हैं ? कहकर गंगाराम विजेता की दृष्टि से रंजन चौबे की ओर देखने लगा। रंजन चौबे का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने कहा - "सरकार ! पकाता तो मांस ही हूँ। अब किसका मांस पकाता हूँ और कैसे पकाता हूँ यह जानने के लिए गंगाराम को क्यों बेचैनी हो रही है, जबकि वह अब आपकी सेवा में भी नहीं है। फिर अपनी कला इसे क्यों बताऊँ, सरकार !" राय चौधरी साहब को बात युक्तिसंगत लगी। उन्होंने गंगाराम से पूछा, "क्यों गंगाराम, अब तुम क्या चाहते हो?" "मै सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि हुजूर के साथ विश्वासघात किया जा रहा है। बकरे के मांस की जगह सरकार को यह चीज खिलाई जा रही है...।" बात पूरी करते-करते गंगाराम ने साथ में लाई हुई पोटली खोलकर सामने रख दी। राय चौधरी साहब और वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखें विस्मय और आश्चर्य से फटी रह गई। सामने एक भयानक काले सांप का फन और उतरी हुई खाल के साथ उसका मांस पड़ा था।

राय चौधरी क्रोध से तमतमा उठे। वह लगभग कांपते हुए रंजन चौबे की ओर उन्मुख होकर एकदम गरज पड़े, "नमकहराम ! गोश्त की जगह तू काला विषैला नाग खिलाता है...दगाबाज... |" "यह सब झठ है, अन्नदाता रंजन चौबे दबी जबान से बोला, "मेरे आने के बाद गंगाराम को नौकरी से हटा दिया गया, इसलिए यह मुझसे दुश्मनी रखता है। सरकार, जरा आप ही सोचिए, सांप कोई । ऐसा जीव तो नहीं कि गये और तुरन्त पकड़ लाए। फिर रोज-रोज सांप का मिलना भी तो मुश्किल है

मि. लाहा ने भी रंजन के हाथ का बना मांस खाया था - एक बार नहीं कई बार । गंगाराम की बात सुनकर उनका चेहरा स्याह पड़ गया था। सांप के फन की ओर देखते वह हकलाकर बोले, "गंगाराम जरूर झूठ बोल रहा है... सांप खाकर भला कोई जिन्दा कैसे रह सकता है ?

"झुठा मैं नहीं साहब रंजन चौबे है।" मि. लाहा की ओर ताककर वह दृढ़ता से बोला, "आप खुद इससे पूछे - नदी के उस पार जो झाड़ियाँ है, वहाँ जाकर इसने होठों-ही-होठों में कोई मंत्र बुदबुदाते हुए तीन बार "आओ, आओ, आओ" नहीं कहा था?" । राय चौधरी साहब फिर भड़क उठे। उन्होंने क्रोध से कांपते हुए पिस्तौल निकाल ली। कड़ककर रंजन चौबे से बोले, "बोलो चौबे क्या यह सच है ? तुम गोश्त लाने बाजार नहीं, बल्कि नदी के उस पार मंत्र पढ़ने गये थे ?" इस बार रंजन चौबे खामोश रह गया। उसने सकपकाकर सिर झुका लिया। उसको चप देखकर गंगाराम की हिम्मत बढ़ी। वह अदब से बताने लगा, "सरकार में आज सवेरे झाड़ी के पीछे छिप कर रंजन चौबे का सारा तमाशा देख रहा था । मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इसके तीसरी बार "आओ" कहने पर यही काला भुजंग नाग आकर इसके सामने रूक गया और इसने इस जहरीले नाग को ऐसे पकड़ लिया मानो वह रस्सी हो। इसके बाद इसने चाकू से इसका फन काटकर खाल उतारी। फिर कुछ मांस लेने के बाद फन और बाकी मांस पानी में फेंककर यह लौट आया। इसके चले आने के बाद मैंने पानी में से दोनों चीजें निकाली और अन्नदाता के चरणों में हाजिर हो गया। अगर मेरी बात गलत हो सरकार, तो मुझे इसी वक्त सूली पर चढ़ा दें, मैं तैयार हूँ।" अब तक रंजन चौबे का चेहरा काला पड़ गया था। उसका सारा शरीर पत्ते की तरह कांप रहा था और माथे पर पसीना चुहचुहा आया था। राय चौधरी साहब का चेहरा क्रोध-से लाल हो उठा था, फिर भी भरसक अपने को संयत करके बोले, "देखो चौबे, मैं कलाकारों की इज्जत करता हूँ और उनसे मुझे बड़ी हमदर्दी है। मुझे लगता है कि तुम सर्प विद्या के माहिर कोई नायाब फनकार हो। अगर तुम सारा मामला सच-सच बता दोगे तो तुम्हें न सिर्फ जिन्दा छोड़ दिया जाएगा, बल्कि भरपूर इनाम भी दिया जाएगा। लेकिन झूठ बोलोगे तो सोच लो - इस पिस्तौल की सारी गोलियाँ तुम्हारे बदन को छलनी कर देंगी।" रंजन चौबे रोने लगा।

राय चौधरी साहब ने कोमल स्वर में कहा, "रोने से कोई लाभ नहीं, चौबे । जो कहना हो, निर्भय होकर कहो। डरने की कोई जरूरत नहीं। मैं तुमको विश्वास दिलाता हूँ कि तुम्हें कुछ न होगा -" "सरकार...अन्नदाता...." रंजन चौबे कातर स्वर में कहने लगा, "मेरे माता-पिता कौन हैं - यह मैं नहीं जानता। जब मैंने होश संभाला तो अपने को एक कापालिक के संरक्षण में पाया। वह मयूराक्षी नदी के किनारे एकान्त स्थान में कुटिया बनाकर रहता था। उसी ने मुझे पाल पोसकर बड़ा किया । तंत्र मंत्र की कई चमत्कारी विद्याएं सिखाई और मुझसे कई प्रकार की कठोर साधनाएं भी कराई। फिर वह अपने साथ हिमालय ले गया । वहाँ एक गुफा में उस कापालिक के गुरू रहते थे। उनकी उम्र दो सौ साल थी । कापालिक के आदेश पर मैंने उसके गुरू की बहुत सेवा की। अन्त में प्रसन्न होकर उसने मुझे "नागमणि विद्या" की सिद्धि दी, अन्नदाता । उस सिद्धि के बल पर दूर-दूर से सांप आकर मेरे पास इकटे हो सकते हैं। मैं चाहूँ तो अपनी उस सिद्धि के बल पर "नागराज" को भी तुरन्त बुला सकता हूँ। इतना ही नहीं, दाता सर्प दंश से मरे हुए व्यक्ति को मैं एक महीने के बाद भी जीवित कर सकता हूँ।" राय चौधरी साहब कुछ देर तक सोचते रहे, फिर गम्भीर स्वर में बोले, "अगर तुम्हारी ये सब बातें सच है तो कल हम तुम्हारी यह कला अवश्य देखेंगे, चौबे।"

दूसरे दिन रंजन चौबे के बताए अनुसार नदी के किनारे घनी झाड़ियों के पास बड़ा-सा फर्श बिछाया गया। फर्श के बीच में चांदी की एक बड़ी-सी चौकी पर सोने के कटोरे में दूध भरकर रख दिया गया। कुछ फासले पर राज परिवार और राज कर्मचारियों के साथ राय चौधरी साहब खड़े थे। उनके निकट ही मि. लाहा के साथ मैं भी खड़ा होकर तमाशा देख रहा था । "नाग विद्या" से सम्बन्धित तंत्र-मंत्र की कई पुस्तक मैंने पढ़ी थी और उसके विषय में बहुत कुछ सुना भी था, लेकिन "नागसिद्धि" का चमत्कार इस प्रकार कभी देखने को भी मिल जायेगा - मैंने इसकी कल्पना तक नहीं की थी। मैंने देखा - रंजन चौबे, धीरे-धीरे जाकर चांदी की चौकी के पास खड़ा हो गया और कोई मंत्र बुदबुदाने लगा। कुछ देर बाद मंत्रोच्चारण के साथ-साथ वह चारों ओर काली उड़द के दाने फेकता हुआ जोर-जोर से "आओ-आओ-आओ' का उच्चारण भी करने लगा। फिर सबकी आँखों के सामने एक भयानक इन्द्रजाल-सा घटित हो गया। सबने विस्मय से फटी-फटी आँखो से देखा- रंजन चौबे द्वारा चारों ओर उड़द के दाने फेंककर 'आओ-आओ-आओ' का उच्चारण करते ही, चारों दिशाओं से नाना प्रकार के सैकड़ों नाग आकर फर्श पर इकट्रे हो गये। वे भिन्न-भिन्न प्रकार और भिन्न-भिन्न रंगों के थे। कुछ तो काफी बड़े थे और कुछ जहरीले भी।

मैंने देखा - काले रंग के एक भयंकर सर्प के फन पर बालों की लम्बी-लम्बी लटें भी थीं। सबसे अन्त में सुनहरे रंग का एक अति सम्मोहक नाग आया। उसकी लम्बाई लगभग एक हाथ की थी | फन छोटा था। आँखे माणिक की तरह चमक रही थीं और उसके सारे शरीर से तेज फूट रहा था। वह बार-बार अपनी जीभ को लपलपा रहा था। उसे देखते ही सब साँपों ने अपने-अपने फन झुका लिए। उन सपों के बीच से रास्ता बनाता हुआ वह तेजस्वी सर्प चाँदी की चौकी पर दूध से भरे सोने के कटोरे के पास पहुंचा और दूध पीने लगा। राय चौधरी साहब को लगा कि रंजन चौबे उनसे जिस नागराज की चर्चा कर रहा था, सुनहरे रंग का बही तेजस्वी और भव्य नागराज उनके सामने दूध पी रहा है। उन्होंने उसे और पास से देखना चाहा, अतः रंजन चौबे की ओर देख कर बोले, "उस सुनहरे सर्प को पकड़कर मेरे पास तो ले आओ, चौबे ।' रंजन चौबे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा उठा, "यह असम्भव है, अन्नदाता । नागराज हिमालय के निवासी हैं। इनकी उम्र कम-से-कम दो हजार वर्ष है। उनको छेड़ने पर मेरे प्राण नहीं बचेंगे __ तुम सांपों के फनकार हो, चौबे ! तुम्हें नागमणि विद्या सिद्ध है। राय चौधरी साहब बोले, तुम सांपों पर अपना हुक्म चला सकते हो। जाओ, उस सांप को पकड़ लाओ। तुमको कुछ नहीं होगा।

रंजन चौबे कुछ क्षण स्तब्ध खड़ा रहा, फिर जोर से सांस लेकर उसने कहा, ठीक है अन्नदाता, लेकिन अगर नागराज को पकड़ने में मेरी मृत्यु हो जाये तो आपसे निवेदन है कि मेरे शव को जलबाया न । जाए, बल्कि उसे काले बैल की खाल में रखकर टाँके लगवा दिया जाए और तुरन्त मेरी वहन रमा को बुलबा दें। वह भी कापालिक गुरू की शिष्या है और मेरे साथ हिमालय में भी रही है। वह बहुत बड़ी तांत्रिक है। इस समय आसाम के जोरहाट बाजार में रहती है वह । राय चौधरी साहब हंसने लगे । बोले, तुम ब्यर्थ ही डर रहे हो चौबे । तुम्हें कुछ भी न होगा। रंजन चौबे का चेहरा भय से बिबर्ण हो गया था। उसे अपनी मौत सामने खड़ी नजर आ रही थी,

मगर वह विवश था। अब तक सुनहरे रंग का वह तेजस्वी सर्प कटोरे का दूध पी चुका था और सोने का वह कटोरा उसके महाबिष से स्याह पड़ गया था। इसके बाद जैसे ही नागराज बापस लौटने के लिए मुड़ा, उसी समय रंजन चौबे ने उसे पकड़ने के लिए उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। लेकिन पलक झपकते नागराज ने क्रोध से फुफकारकर रंजन चौब के हाथ में डंस लिया। और साँपों के बीच से रास्ता बनाता हुआ आनन फानन में गायब हो गया। उसके जाते ही वहाँ इकटे अन्य सब सर्प भी जैसे अदृश्य में विलीन हो गये। रंजन चौबे का शरीर निष्प्राण हो गया । नागराज का महाविष उसके सारे शरीर में फैल गया था, जिससे देह काली पड़ गई थी। उसकी इस भयानक मृत्यु से वहाँ उपस्थित सभी लोगों का चेहरा फक पड़ गया था। रंजन चौबे की इस आकस्मिक मृत्यु से राय चौधरी साहब भी सहसा स्तब्ध और भौचक्के रह गये थे।

उन्हें इस घटना से गहरा मानसिक आघात लगा था। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सांपों का वह नायाब फनकार इस तरह सांप के ही जहर का शिकार हो जाएगा। लेकिन अब क्या हो सकता था ?

राय चौधरी साहब के आदेश से रंजन चौबे की लाश बड़ी सावधानी से हवेली में लाई गयी, फिर उसको जलाने के बजाय रंजन चौबे को दिये गये बचन के अनुसार उसका शव काले बैल की खाल में रखकर उस पर टाँके लगा दिये गये। उसी दिन मझे और स्टेट के एक विश्वसनीय कर्मचारी को रंजन चौबे की वहन रमा को बुलाने के लिए जोरहाट भेज दिया गया । मुझे भी रमाबाई से मिलने की बड़ी उत्सुकता थी। पूरे तीस घण्टे की उबाऊ यात्रा के बाद हम जोरहाट पहुँचे । उस समय जोरहाट आसाम का एक मामूली कस्बा था। आठ-दस हजार से ज्यादा आबादी नहीं थी वहाँ की। मर्दो के बजाय औरतों की संख्या ही अधिक थी। उस जमाने में जोरहाट और उसके आसपास का इलाका जादू-टोना और तंत्र मंत्र जानने वाली औरतों का गढ़ समझा जाता था । इसलिए उधर जाने से लोग कतराते थे। जब मैं जोरहाट पहुँचा, उस समय सांझ का स्याह कालिमा बिखर चुकी थी। रमा का मकान खोजने में अधिक परेशानी नहीं हुई। बाजार के बाहर बहुत बड़ा-सा कच्चा तालाब था। उसी के दूसरी ओर आठ-दस कच्चे खपरैल के घर थे। काली-शंकर का एक छोटा-सा मन्दिर भी था । उसी मन्दिर के बगल बाला घर रमा का था। रमा अकेले ही रहती थी वहाँ । उसकी उम्र पच्चीस-छब्बीस से ज्यादा नहीं थी। मंझोले कद का खूब गठा हुआ शरीर । लालिमा लिए गोरा रंग । साधारणत: सुन्दर और आकर्षक युवती थी वह । उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक अजीब-सा तेज और गहरा सम्मोहन भी था। जब उसे बतलाया गया कि उसके भाई की मृत्यु हो गई है तो एकबारगी स्तब्ध रह गयी वह । फिर उसकी आँखों से आँसू झरने लगे और वह सिसक-सिसककर रोने लगी। लेकिन किसी तरह उसे धैर्य बंधाकर मैंने बताया कि रंजन चौबे की लाश को जलाया नहीं गया है, बल्कि उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार काले बैल की खाल में रखकर टाँके लगा दिये गये है। यह सुनते ही वह हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो गई। तीसरे दिन रमा को साथ लेकर मैं बापस लौटा तो राय चौधरी साहब बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने उसके भाई रंजन चौबे की अकाल मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए कहा "जो होना था, सो हो गया। जितने रूपये चाहो, मुआवजे के रूप में देने को मैं तैयार हूँ—'

रमा ने सम्मोहन-भरी आँखों से राय चौधरी साहब की ओर देखकर कहा, "मुझे रूपये नहीं चाहिए, राय राजा । आपने मेरे भाई के उस चमत्कार को देखा, जिस पर आपको विश्वास नहीं था, लेकिन अब मैं आपको वह चमत्कार दिखाऊँगी जो आपको एकदम सपने जैसा लगेगा।" राय चौधरी साहब कुछ समझे नहीं। "आप तीन बड़े कड़ाहों में काली गाय का शुद्ध दूध मंगबा दे," रमा बाई ने सोचते हुए कहा, "और मेरे भाई की लाश को भी बैल के पेट से निकलवा दें।" रमा की आज्ञा का तुरन्त पालन हुआ। दोपहर का समय था । रमाबाई का चमत्कार देखने के लिए हवेली के सामने हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। राय चौधरी साहब, उनके परिवार के लोग और राज-कर्मचारियों के अलावा कई अफसर भी वहाँ उपस्थित थे। सब आँखें फाड़े ताक रहे थे - रमा ने दूध से भरे एक कड़ाहे में किसी जड़ी का पीला-सा चूर्ण डाला, फिर रंजन चौबे की लाश भी उसी में डलवा दी । कड़ाहे का सारा दूध तुरन्त विष के प्रभाव से नीला हो गया। दूसरे और तीसरे कड़ाहे में भी रमा ने यही क्रिया की, लेकिन तीसरे कड़ाहे का दूध नीला नहीं पड़ा। उसमें से रंजन चौबे की लाश निकाली गई तो सबने देखा कि उस पर छाई महाविष की कालिमा मिट चुकी थी और अब ऐसा लगता था कि मानोरंजन चौबे गहरी नींद सो रहा हो ।

इसके बाद रमा अपने भाई के सिरहाने बैठ गई और कोई मंत्र पढ़ने लगी। साथ-साथ रहकर वह शब को हिलाती-डुलाती भी जा रही थी। अचानक आकाश में जोर से बादल गरजने जैसे आबाज हुई और उस भयंकर आवाज के साथ ही रंजन चौबे अंगड़ाई लेकर सहसा उठकर बैठ गया । देखने वाले एकदम-स्तब्ध रह गये। राय चौधरी साहब भी एकाएक कुछ नहीं बोल सके । अदभुत चमत्कार था वह । बड़ा अविश्वसनीय, किन्तु एकदम सत्य । एक नहीं हजारों लोग खड़े देख रहे थे - दस दिन पूर्व सर्पदंश से मरा व्यक्ति जी उठा । इससे पहले ऐसी घटना न किसी ने देखी थी, न सुनी थी । उपस्थित लोग काफी देर तक जड़बत अबाक खड़े रहे। मैं पहले ही रमा पर मुग्ध था। फिर उसका यह अलौकिक चमत्कार देखकर तो एक प्रकार से उसका मुरीद ही हो गया। असम्भव इस प्रकार सम्भव कैसे हो गया, यह प्रश्न बार-बार मेरे मन-मस्तिष्क में चक्कर काटने लगा। मैं यह भी जानने को उत्सुक था कि मरने के बाद रंजन चौबे दस दिनों तक किस स्थिति में रहा था ?

राय चौधरी साहब ने उस रोज हवेली में एक विशेष समारोह का आयोजन किया और उसी समारोह में रंजन चौबे तथा उसकी वहन रमा का सम्मान करके पुरस्कार भी दिया। उन्होंने तो दोनों से यह भी आग्रह किया कि उन्हीं के इलाके में बस ही जाएं, लेकिन दोनों ने उनका आग्रह अस्वीकार कर दिया

वहाँ उपस्थित अंग्रेज अफसरों में राय चौधरी साहब तो एक मित्र थे- पैट्रिक ट्रेसी। इस चमत्कार का सबसे ज्यादा प्रभाव उन्हीं पर पड़ा था। उन्होंने लन्दन से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार-पत्र "सैटरडे मार्निंग स्टार" में आँखों देखी इन तमाम घटनाओं को प्रकाशित कराया तो वहाँ तहलका मच गया था। बाद में मि. ट्रेसी रंजन चौबे और रमा से उनकी अलौकिक शक्ति का रहस्य जानने के लिए मिले तो वे दोनों केवल हंसकर रह गये थे। मेरे साथ भी उन दोनों ने ऐसा ही व्यवहार किया। रमा कुछ भी बतलाने को तैयार नहीं हुई, मगर मैं कहाँ मानने वाला था । मैंने तुरन्त ही रंजन चौबे और रमा के कापालिक गुरू की खोज शुरू कर दी

और पूरे चार साल के अथक परिश्रम के बाद वह कापालिक मुझे मिल भी गया । उसका नाम था भैरवानन्द । उन दिनों वह कापालिक अरूणाचल प्रदेश की एक घाटी में रह रहा था। भैरवानन्द कापालिक ने जो कुछ बतलाया उसे सुनकर एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं । उसके कथनानसार रंजन चौबे और रमा पिछले जन्म में नाग और नागिन थे। दोनों इच्छाधारी थे। जब जैसे इच्छा हो, पलक झपकते वे मनचाहा रूप धारण कर सकते थे। यह इच्छासिद्धि केवल उन्हीं नाग-नागिनों को प्राप्त होती है जिनकी उम्र एक हजार वर्ष से ज्यादा हो जाती है। एक बार उन दोनों को न जाने क्यों मानव-रूप धारण करने की इच्छा हो आई और यह इच्छा उत्पन्न होते ही वे दोनों मयूराक्षी के तट पर बालक और बालिका के रूप में प्रकट होकर खेलने लगे। वहीं एक दिन अचानक भैरवानंद कापलिक की नजर उन पर पड़ गई। वह तुरन्त उनका रहस्य समझ गया ।। इसके बाद उसने उसी क्षण अपने मंत्र-बल से उन दोनों की इच्छा शक्ति को समाप्त कर दिया, ताकि वे अपने को पुन: नाग-नागिन के रूप में परिवर्तित न कर सके। कापालिक ने ऐसा क्यों किया यह तो उसने नहीं बतलाया, लेकिन इतना अवश्य कहा कि वे दोनों भाई-वहन अब उसके मंत्र-बल की सीमा के बाहर हो चुके है तथा सम्भव है बे फिर कहीं नाग-नागिन के रूप में विचरण कर रहे हो। खैर ! इन बातों में कितनी सत्यता थी यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन मेरी जिज्ञासा ज्यों की त्यों रह गई । उसका समाधान न हो सका । जब मैंने मि. लाहा को ये सारी रहस्यमय बातें बताई तो वह सुनकर दंग रह गये थे। फिर जोर से सांस लेकर कहने लगे, "मि. शर्मा, जो कुछ भी हो, रंजन चौबे के हाथो का बना खाना खासतौर से मांसाहारी व्यंजन का स्वाद मैं जिन्दगी-भर नहीं भूल सकूँगा। निश्चय ही उसका स्वाद अद्वितीय था... अलौकिक था -
 

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