अध्याय ९ नाग सिद्धि
सन् १७७९ में भारतीय पुरातत्व अनुसन्धान विभाग की स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा हुई थी। उस समय विभाग का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था भारतीय शिल्प और मूर्ति-कला की गुमनाम विभूतियों को खोजना तथा अजन्ता, एलोरा खजुराहो एवं बाद्य के प्राचीन मन्दिरों तथा दुर्लभ मूर्तियों की अनुकृतियाँ तैयार करना । इन कार्यों के प्रमुख अधिकारी थे - मि. जैकसन मि. जैकसन ने भारतीय पुरातत्व अनुसन्धान की जो मौलिक परम्परा स्थापित की, वह सन् १९४५ तक निर्बाध गति से चलती रही। उसके बाद व्यापक परिवर्तन हुआ विभाग में । अंग्रेज अधिकारियों के साथ-साथ कई भारतीय अधिकारी भी शामिल हो गये उसमें । विभाग का विस्तार हुआ और कार्य प्रणाली में भी भारी हेर-फेर किया गया । उस समय जिन भारतीय अधिकारियों की नियुक्ति की गई, उनमें एक थे - मि.जगदीश चन्द्र लाहा। लाहा साहब पुरातत्व विषय में विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त कर लौटे थे । वह आकर्षक व्यक्तित्व के धनी और सुदर्शन पुरुष थे, लेकिन थे बड़े ही सरल स्वभाव के । कम-से-कम बोलना और अधिक-से-अधिक काम करना एक विशेष गुण था उनका। शायद १९४९-५० की बात है। उन दिनों लाहा साहब पश्चिम बंगाल के सरहदी इलाके में पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्मारकों तथा मंदिरों का विवरण तैयार कर रहे थे। मैं लाहा साहब के सहयोगी के रूप में वहाँ था। जिस इलाके में वह कार्य हो रहा था, वह राय चौधरी विपिन बिहारी घोषाल की जमींदारी के अन्तर्गत था । राय चौधरी साहब साहित्य, कला, संगीत के अलावा बिभिन्न प्रकार के व्यंजनों और सुस्वादु भोजन के भी प्रेमी थे । कलाकारों, संगीतकारों और विद्वानों का सम्मान करना और उन्हें आमंत्रित कर नये-नये सुस्वादु भोजन कराना उनका प्रिय शौक था। इसमें उन्हें अकल्पनीय आनन्द का अनुभव होता था। राय चौधरी साहब का मुख्य रसोइया था रंजन चौबे । गठीले शरीर का युवक था वह । आयु तीस बत्तीस से ज्यादा नहीं थी। वह उत्तरी भारत के किसी गांव का रहने वाला था और अनेक तरह के व्यंजन बनाने में उसे महारत हासिल थी। उसका कहना भी कि पूरे देश में उसके जैसा भोजन बनाने बाला कोई दूसरा नहीं है। बात सच ही थी। जिस-जिस व्यक्ति ने रंजन चौबे के हाथ का बना स्वादिष्ट और रूचिकर भोजन किया था, उनके लिए वह एक अविस्मरणीय अनुभव बन गया। रंजन चौबे को शाकाहारी भोजन के अलाबा जो विशिष्ट व्यंजन बनाने में सिद्धहस्तता थी वह था गोश्त – राय चौधरी साहब काफी लम्बे अर्से से गोश्त खा रहे थे, लेकिन जो लज्जत और जो स्वाद उन्हें रंजन चौबे द्वारा बनाए गये गोश्त में मिला था, वह उनके लिए अकल्पनीय था। मि. लाहा के साथ मैं भी राय चौधरी साहब का अतिथि था, इसलिए प्राय: नित्य ही रात्रिकालीन भोजन में हम लोगों को शामिल होना पड़ता था। मैं गोश्त तो नहीं खाता था, मगर जैसा शाकाहारी भोजन वहाँ मुझे मिलता था, वैसा आज तक कहीं नहीं मिला सचमुच रंजन के हाँथ में पाक शास्त्र की बिशेष कला थी। मि. लाहा गोश्त खाते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे हंसकर कहा, मि.शर्मा, रंजन चौबे के हाथ का बना गोश्त तुमको अवश्य रखना चाहिए। जिन्दगी भर याद रखोगे ।"
राय चौधरी साहब की विशाल हवेली में दुर्गा पूजा का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता था । राय चौधरी साहब को विशेष प्रसन्नता उस समय हुई, जब उस वर्ष बिजयादशमी के अवसर पर अपनी हवेली में होने वाली शानदार दुर्गा पूजा के भोज में उन्होंने रंजन चौबे द्वारा तैयार किये गये पच्चीस प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन अपने मेहमानों को खिलाये और उनके अतिथियों ने जी भरकर प्रशंसा की। सबसे ज्यादा प्रशंसा की गयी मांसाहारी व्यंजनों की। इससे राय चौधरी साहब के मन में रंजन चौबे की इज्जत और बढ़ गई थी। रंजन चौबे प्रतिदिन बड़े सबेरे ही उठकर स्वयं मांस खरीदने बाजार जाता था। फिर कई घण्टे बाद बापस लौटता था। जब वह मांस बनाने लगता, तब किचन में किसी और को नहीं घुसने देता था। उस समय रसोई का सारा काम खुद ही संभालता था । रंजन चौबे के पहले राय चौधरी साहब के यहाँ का मुख्य रसोइया गंगाराम था । रंजन चौबे ने उसे निकलवा दिया था, इसलिए वह चिढ़ा हुआ था। चौबे के खिलाफ उसका कोई उपाय काम नहीं कर पा रहा था। फिर भी वह मौके की तलाश में था। दीवाली नजदीक थी। राय चौधरी साहब की हवेली की रंगाई-पुताई हो रही थी। एक रोज सायंकाल राय चौधरी साहब अपने कुछ घनिष्ठ परिचितों के साथ दीवानखाने में बैठे हुए थे।
मि. लाहा के साथ मैं भी बहीं उपस्थित था। उसी समय अचानक गंगाराम आ पहुँचा । उसके हाथ में एक पोटली थी। उसने आदर से झुककर राय चौधरी साहब को सलाम किया, फिर चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया। गंगाराम को अचानक आया देखकर राय चौधरी साहब ने पूछा, "क्या बात है कैसे आये ?" "आज्ञा मिले तो अन्नदाता की सेवा में एक प्रार्थना करने के लिए आया हूँ।” गंगाराम बिनम्र स्वर में कहा, "लेकिन सरकार जो कुछ भी कहूँगा, रंजन चौबे के सामने कहूँगा । इसलिए प्रार्थना है कि चौबे को भी यहाँ बुला लिया जाये, तभी सारी बातें साफ होंगी-" राय चौधरी साहब को कौतूहल हुआ। उनके आदेश पर तुरन्त ही रंजन चौबे को भी बुला लिया गया । इसके बाद उन्होंने पूछा, "अब बोलो गंगाराम, तुम क्या कहना चाहते हो ?" हे अन्नदाता ! आप चौबे जी से पूछे - यह आपके लिए किसका मांस पकाया करते हैं ? कहकर गंगाराम विजेता की दृष्टि से रंजन चौबे की ओर देखने लगा। रंजन चौबे का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने कहा - "सरकार ! पकाता तो मांस ही हूँ। अब किसका मांस पकाता हूँ और कैसे पकाता हूँ यह जानने के लिए गंगाराम को क्यों बेचैनी हो रही है, जबकि वह अब आपकी सेवा में भी नहीं है। फिर अपनी कला इसे क्यों बताऊँ, सरकार !" राय चौधरी साहब को बात युक्तिसंगत लगी। उन्होंने गंगाराम से पूछा, "क्यों गंगाराम, अब तुम क्या चाहते हो?" "मै सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ कि हुजूर के साथ विश्वासघात किया जा रहा है। बकरे के मांस की जगह सरकार को यह चीज खिलाई जा रही है...।" बात पूरी करते-करते गंगाराम ने साथ में लाई हुई पोटली खोलकर सामने रख दी। राय चौधरी साहब और वहाँ उपस्थित सभी लोगों की आँखें विस्मय और आश्चर्य से फटी रह गई। सामने एक भयानक काले सांप का फन और उतरी हुई खाल के साथ उसका मांस पड़ा था।
राय चौधरी क्रोध से तमतमा उठे। वह लगभग कांपते हुए रंजन चौबे की ओर उन्मुख होकर एकदम गरज पड़े, "नमकहराम ! गोश्त की जगह तू काला विषैला नाग खिलाता है...दगाबाज... |" "यह सब झठ है, अन्नदाता रंजन चौबे दबी जबान से बोला, "मेरे आने के बाद गंगाराम को नौकरी से हटा दिया गया, इसलिए यह मुझसे दुश्मनी रखता है। सरकार, जरा आप ही सोचिए, सांप कोई । ऐसा जीव तो नहीं कि गये और तुरन्त पकड़ लाए। फिर रोज-रोज सांप का मिलना भी तो मुश्किल है
मि. लाहा ने भी रंजन के हाथ का बना मांस खाया था - एक बार नहीं कई बार । गंगाराम की बात सुनकर उनका चेहरा स्याह पड़ गया था। सांप के फन की ओर देखते वह हकलाकर बोले, "गंगाराम जरूर झूठ बोल रहा है... सांप खाकर भला कोई जिन्दा कैसे रह सकता है ?
"झुठा मैं नहीं साहब रंजन चौबे है।" मि. लाहा की ओर ताककर वह दृढ़ता से बोला, "आप खुद इससे पूछे - नदी के उस पार जो झाड़ियाँ है, वहाँ जाकर इसने होठों-ही-होठों में कोई मंत्र बुदबुदाते हुए तीन बार "आओ, आओ, आओ" नहीं कहा था?" । राय चौधरी साहब फिर भड़क उठे। उन्होंने क्रोध से कांपते हुए पिस्तौल निकाल ली। कड़ककर रंजन चौबे से बोले, "बोलो चौबे क्या यह सच है ? तुम गोश्त लाने बाजार नहीं, बल्कि नदी के उस पार मंत्र पढ़ने गये थे ?" इस बार रंजन चौबे खामोश रह गया। उसने सकपकाकर सिर झुका लिया। उसको चप देखकर गंगाराम की हिम्मत बढ़ी। वह अदब से बताने लगा, "सरकार में आज सवेरे झाड़ी के पीछे छिप कर रंजन चौबे का सारा तमाशा देख रहा था । मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इसके तीसरी बार "आओ" कहने पर यही काला भुजंग नाग आकर इसके सामने रूक गया और इसने इस जहरीले नाग को ऐसे पकड़ लिया मानो वह रस्सी हो। इसके बाद इसने चाकू से इसका फन काटकर खाल उतारी। फिर कुछ मांस लेने के बाद फन और बाकी मांस पानी में फेंककर यह लौट आया। इसके चले आने के बाद मैंने पानी में से दोनों चीजें निकाली और अन्नदाता के चरणों में हाजिर हो गया। अगर मेरी बात गलत हो सरकार, तो मुझे इसी वक्त सूली पर चढ़ा दें, मैं तैयार हूँ।" अब तक रंजन चौबे का चेहरा काला पड़ गया था। उसका सारा शरीर पत्ते की तरह कांप रहा था और माथे पर पसीना चुहचुहा आया था। राय चौधरी साहब का चेहरा क्रोध-से लाल हो उठा था, फिर भी भरसक अपने को संयत करके बोले, "देखो चौबे, मैं कलाकारों की इज्जत करता हूँ और उनसे मुझे बड़ी हमदर्दी है। मुझे लगता है कि तुम सर्प विद्या के माहिर कोई नायाब फनकार हो। अगर तुम सारा मामला सच-सच बता दोगे तो तुम्हें न सिर्फ जिन्दा छोड़ दिया जाएगा, बल्कि भरपूर इनाम भी दिया जाएगा। लेकिन झूठ बोलोगे तो सोच लो - इस पिस्तौल की सारी गोलियाँ तुम्हारे बदन को छलनी कर देंगी।" रंजन चौबे रोने लगा।
राय चौधरी साहब ने कोमल स्वर में कहा, "रोने से कोई लाभ नहीं, चौबे । जो कहना हो, निर्भय होकर कहो। डरने की कोई जरूरत नहीं। मैं तुमको विश्वास दिलाता हूँ कि तुम्हें कुछ न होगा -" "सरकार...अन्नदाता...." रंजन चौबे कातर स्वर में कहने लगा, "मेरे माता-पिता कौन हैं - यह मैं नहीं जानता। जब मैंने होश संभाला तो अपने को एक कापालिक के संरक्षण में पाया। वह मयूराक्षी नदी के किनारे एकान्त स्थान में कुटिया बनाकर रहता था। उसी ने मुझे पाल पोसकर बड़ा किया । तंत्र मंत्र की कई चमत्कारी विद्याएं सिखाई और मुझसे कई प्रकार की कठोर साधनाएं भी कराई। फिर वह अपने साथ हिमालय ले गया । वहाँ एक गुफा में उस कापालिक के गुरू रहते थे। उनकी उम्र दो सौ साल थी । कापालिक के आदेश पर मैंने उसके गुरू की बहुत सेवा की। अन्त में प्रसन्न होकर उसने मुझे "नागमणि विद्या" की सिद्धि दी, अन्नदाता । उस सिद्धि के बल पर दूर-दूर से सांप आकर मेरे पास इकटे हो सकते हैं। मैं चाहूँ तो अपनी उस सिद्धि के बल पर "नागराज" को भी तुरन्त बुला सकता हूँ। इतना ही नहीं, दाता सर्प दंश से मरे हुए व्यक्ति को मैं एक महीने के बाद भी जीवित कर सकता हूँ।" राय चौधरी साहब कुछ देर तक सोचते रहे, फिर गम्भीर स्वर में बोले, "अगर तुम्हारी ये सब बातें सच है तो कल हम तुम्हारी यह कला अवश्य देखेंगे, चौबे।"
दूसरे दिन रंजन चौबे के बताए अनुसार नदी के किनारे घनी झाड़ियों के पास बड़ा-सा फर्श बिछाया गया। फर्श के बीच में चांदी की एक बड़ी-सी चौकी पर सोने के कटोरे में दूध भरकर रख दिया गया। कुछ फासले पर राज परिवार और राज कर्मचारियों के साथ राय चौधरी साहब खड़े थे। उनके निकट ही मि. लाहा के साथ मैं भी खड़ा होकर तमाशा देख रहा था । "नाग विद्या" से सम्बन्धित तंत्र-मंत्र की कई पुस्तक मैंने पढ़ी थी और उसके विषय में बहुत कुछ सुना भी था, लेकिन "नागसिद्धि" का चमत्कार इस प्रकार कभी देखने को भी मिल जायेगा - मैंने इसकी कल्पना तक नहीं की थी। मैंने देखा - रंजन चौबे, धीरे-धीरे जाकर चांदी की चौकी के पास खड़ा हो गया और कोई मंत्र बुदबुदाने लगा। कुछ देर बाद मंत्रोच्चारण के साथ-साथ वह चारों ओर काली उड़द के दाने फेकता हुआ जोर-जोर से "आओ-आओ-आओ' का उच्चारण भी करने लगा। फिर सबकी आँखों के सामने एक भयानक इन्द्रजाल-सा घटित हो गया। सबने विस्मय से फटी-फटी आँखो से देखा- रंजन चौबे द्वारा चारों ओर उड़द के दाने फेंककर 'आओ-आओ-आओ' का उच्चारण करते ही, चारों दिशाओं से नाना प्रकार के सैकड़ों नाग आकर फर्श पर इकट्रे हो गये। वे भिन्न-भिन्न प्रकार और भिन्न-भिन्न रंगों के थे। कुछ तो काफी बड़े थे और कुछ जहरीले भी।
मैंने देखा - काले रंग के एक भयंकर सर्प के फन पर बालों की लम्बी-लम्बी लटें भी थीं। सबसे अन्त में सुनहरे रंग का एक अति सम्मोहक नाग आया। उसकी लम्बाई लगभग एक हाथ की थी | फन छोटा था। आँखे माणिक की तरह चमक रही थीं और उसके सारे शरीर से तेज फूट रहा था। वह बार-बार अपनी जीभ को लपलपा रहा था। उसे देखते ही सब साँपों ने अपने-अपने फन झुका लिए। उन सपों के बीच से रास्ता बनाता हुआ वह तेजस्वी सर्प चाँदी की चौकी पर दूध से भरे सोने के कटोरे के पास पहुंचा और दूध पीने लगा। राय चौधरी साहब को लगा कि रंजन चौबे उनसे जिस नागराज की चर्चा कर रहा था, सुनहरे रंग का बही तेजस्वी और भव्य नागराज उनके सामने दूध पी रहा है। उन्होंने उसे और पास से देखना चाहा, अतः रंजन चौबे की ओर देख कर बोले, "उस सुनहरे सर्प को पकड़कर मेरे पास तो ले आओ, चौबे ।' रंजन चौबे हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा उठा, "यह असम्भव है, अन्नदाता । नागराज हिमालय के निवासी हैं। इनकी उम्र कम-से-कम दो हजार वर्ष है। उनको छेड़ने पर मेरे प्राण नहीं बचेंगे __ तुम सांपों के फनकार हो, चौबे ! तुम्हें नागमणि विद्या सिद्ध है। राय चौधरी साहब बोले, तुम सांपों पर अपना हुक्म चला सकते हो। जाओ, उस सांप को पकड़ लाओ। तुमको कुछ नहीं होगा।
रंजन चौबे कुछ क्षण स्तब्ध खड़ा रहा, फिर जोर से सांस लेकर उसने कहा, ठीक है अन्नदाता, लेकिन अगर नागराज को पकड़ने में मेरी मृत्यु हो जाये तो आपसे निवेदन है कि मेरे शव को जलबाया न । जाए, बल्कि उसे काले बैल की खाल में रखकर टाँके लगवा दिया जाए और तुरन्त मेरी वहन रमा को बुलबा दें। वह भी कापालिक गुरू की शिष्या है और मेरे साथ हिमालय में भी रही है। वह बहुत बड़ी तांत्रिक है। इस समय आसाम के जोरहाट बाजार में रहती है वह । राय चौधरी साहब हंसने लगे । बोले, तुम ब्यर्थ ही डर रहे हो चौबे । तुम्हें कुछ भी न होगा। रंजन चौबे का चेहरा भय से बिबर्ण हो गया था। उसे अपनी मौत सामने खड़ी नजर आ रही थी,
मगर वह विवश था। अब तक सुनहरे रंग का वह तेजस्वी सर्प कटोरे का दूध पी चुका था और सोने का वह कटोरा उसके महाबिष से स्याह पड़ गया था। इसके बाद जैसे ही नागराज बापस लौटने के लिए मुड़ा, उसी समय रंजन चौबे ने उसे पकड़ने के लिए उसकी तरफ हाथ बढ़ाया। लेकिन पलक झपकते नागराज ने क्रोध से फुफकारकर रंजन चौब के हाथ में डंस लिया। और साँपों के बीच से रास्ता बनाता हुआ आनन फानन में गायब हो गया। उसके जाते ही वहाँ इकटे अन्य सब सर्प भी जैसे अदृश्य में विलीन हो गये। रंजन चौबे का शरीर निष्प्राण हो गया । नागराज का महाविष उसके सारे शरीर में फैल गया था, जिससे देह काली पड़ गई थी। उसकी इस भयानक मृत्यु से वहाँ उपस्थित सभी लोगों का चेहरा फक पड़ गया था। रंजन चौबे की इस आकस्मिक मृत्यु से राय चौधरी साहब भी सहसा स्तब्ध और भौचक्के रह गये थे।
उन्हें इस घटना से गहरा मानसिक आघात लगा था। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि सांपों का वह नायाब फनकार इस तरह सांप के ही जहर का शिकार हो जाएगा। लेकिन अब क्या हो सकता था ?
राय चौधरी साहब के आदेश से रंजन चौबे की लाश बड़ी सावधानी से हवेली में लाई गयी, फिर उसको जलाने के बजाय रंजन चौबे को दिये गये बचन के अनुसार उसका शव काले बैल की खाल में रखकर उस पर टाँके लगा दिये गये। उसी दिन मझे और स्टेट के एक विश्वसनीय कर्मचारी को रंजन चौबे की वहन रमा को बुलाने के लिए जोरहाट भेज दिया गया । मुझे भी रमाबाई से मिलने की बड़ी उत्सुकता थी। पूरे तीस घण्टे की उबाऊ यात्रा के बाद हम जोरहाट पहुँचे । उस समय जोरहाट आसाम का एक मामूली कस्बा था। आठ-दस हजार से ज्यादा आबादी नहीं थी वहाँ की। मर्दो के बजाय औरतों की संख्या ही अधिक थी। उस जमाने में जोरहाट और उसके आसपास का इलाका जादू-टोना और तंत्र मंत्र जानने वाली औरतों का गढ़ समझा जाता था । इसलिए उधर जाने से लोग कतराते थे। जब मैं जोरहाट पहुँचा, उस समय सांझ का स्याह कालिमा बिखर चुकी थी। रमा का मकान खोजने में अधिक परेशानी नहीं हुई। बाजार के बाहर बहुत बड़ा-सा कच्चा तालाब था। उसी के दूसरी ओर आठ-दस कच्चे खपरैल के घर थे। काली-शंकर का एक छोटा-सा मन्दिर भी था । उसी मन्दिर के बगल बाला घर रमा का था। रमा अकेले ही रहती थी वहाँ । उसकी उम्र पच्चीस-छब्बीस से ज्यादा नहीं थी। मंझोले कद का खूब गठा हुआ शरीर । लालिमा लिए गोरा रंग । साधारणत: सुन्दर और आकर्षक युवती थी वह । उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक अजीब-सा तेज और गहरा सम्मोहन भी था। जब उसे बतलाया गया कि उसके भाई की मृत्यु हो गई है तो एकबारगी स्तब्ध रह गयी वह । फिर उसकी आँखों से आँसू झरने लगे और वह सिसक-सिसककर रोने लगी। लेकिन किसी तरह उसे धैर्य बंधाकर मैंने बताया कि रंजन चौबे की लाश को जलाया नहीं गया है, बल्कि उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार काले बैल की खाल में रखकर टाँके लगा दिये गये है। यह सुनते ही वह हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो गई। तीसरे दिन रमा को साथ लेकर मैं बापस लौटा तो राय चौधरी साहब बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने उसके भाई रंजन चौबे की अकाल मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हुए कहा "जो होना था, सो हो गया। जितने रूपये चाहो, मुआवजे के रूप में देने को मैं तैयार हूँ—'
रमा ने सम्मोहन-भरी आँखों से राय चौधरी साहब की ओर देखकर कहा, "मुझे रूपये नहीं चाहिए, राय राजा । आपने मेरे भाई के उस चमत्कार को देखा, जिस पर आपको विश्वास नहीं था, लेकिन अब मैं आपको वह चमत्कार दिखाऊँगी जो आपको एकदम सपने जैसा लगेगा।" राय चौधरी साहब कुछ समझे नहीं। "आप तीन बड़े कड़ाहों में काली गाय का शुद्ध दूध मंगबा दे," रमा बाई ने सोचते हुए कहा, "और मेरे भाई की लाश को भी बैल के पेट से निकलवा दें।" रमा की आज्ञा का तुरन्त पालन हुआ। दोपहर का समय था । रमाबाई का चमत्कार देखने के लिए हवेली के सामने हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी। राय चौधरी साहब, उनके परिवार के लोग और राज-कर्मचारियों के अलावा कई अफसर भी वहाँ उपस्थित थे। सब आँखें फाड़े ताक रहे थे - रमा ने दूध से भरे एक कड़ाहे में किसी जड़ी का पीला-सा चूर्ण डाला, फिर रंजन चौबे की लाश भी उसी में डलवा दी । कड़ाहे का सारा दूध तुरन्त विष के प्रभाव से नीला हो गया। दूसरे और तीसरे कड़ाहे में भी रमा ने यही क्रिया की, लेकिन तीसरे कड़ाहे का दूध नीला नहीं पड़ा। उसमें से रंजन चौबे की लाश निकाली गई तो सबने देखा कि उस पर छाई महाविष की कालिमा मिट चुकी थी और अब ऐसा लगता था कि मानोरंजन चौबे गहरी नींद सो रहा हो ।
इसके बाद रमा अपने भाई के सिरहाने बैठ गई और कोई मंत्र पढ़ने लगी। साथ-साथ रहकर वह शब को हिलाती-डुलाती भी जा रही थी। अचानक आकाश में जोर से बादल गरजने जैसे आबाज हुई और उस भयंकर आवाज के साथ ही रंजन चौबे अंगड़ाई लेकर सहसा उठकर बैठ गया । देखने वाले एकदम-स्तब्ध रह गये। राय चौधरी साहब भी एकाएक कुछ नहीं बोल सके । अदभुत चमत्कार था वह । बड़ा अविश्वसनीय, किन्तु एकदम सत्य । एक नहीं हजारों लोग खड़े देख रहे थे - दस दिन पूर्व सर्पदंश से मरा व्यक्ति जी उठा । इससे पहले ऐसी घटना न किसी ने देखी थी, न सुनी थी । उपस्थित लोग काफी देर तक जड़बत अबाक खड़े रहे। मैं पहले ही रमा पर मुग्ध था। फिर उसका यह अलौकिक चमत्कार देखकर तो एक प्रकार से उसका मुरीद ही हो गया। असम्भव इस प्रकार सम्भव कैसे हो गया, यह प्रश्न बार-बार मेरे मन-मस्तिष्क में चक्कर काटने लगा। मैं यह भी जानने को उत्सुक था कि मरने के बाद रंजन चौबे दस दिनों तक किस स्थिति में रहा था ?
राय चौधरी साहब ने उस रोज हवेली में एक विशेष समारोह का आयोजन किया और उसी समारोह में रंजन चौबे तथा उसकी वहन रमा का सम्मान करके पुरस्कार भी दिया। उन्होंने तो दोनों से यह भी आग्रह किया कि उन्हीं के इलाके में बस ही जाएं, लेकिन दोनों ने उनका आग्रह अस्वीकार कर दिया
वहाँ उपस्थित अंग्रेज अफसरों में राय चौधरी साहब तो एक मित्र थे- पैट्रिक ट्रेसी। इस चमत्कार का सबसे ज्यादा प्रभाव उन्हीं पर पड़ा था। उन्होंने लन्दन से प्रकाशित होने वाले एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार-पत्र "सैटरडे मार्निंग स्टार" में आँखों देखी इन तमाम घटनाओं को प्रकाशित कराया तो वहाँ तहलका मच गया था। बाद में मि. ट्रेसी रंजन चौबे और रमा से उनकी अलौकिक शक्ति का रहस्य जानने के लिए मिले तो वे दोनों केवल हंसकर रह गये थे। मेरे साथ भी उन दोनों ने ऐसा ही व्यवहार किया। रमा कुछ भी बतलाने को तैयार नहीं हुई, मगर मैं कहाँ मानने वाला था । मैंने तुरन्त ही रंजन चौबे और रमा के कापालिक गुरू की खोज शुरू कर दी
और पूरे चार साल के अथक परिश्रम के बाद वह कापालिक मुझे मिल भी गया । उसका नाम था भैरवानन्द । उन दिनों वह कापालिक अरूणाचल प्रदेश की एक घाटी में रह रहा था। भैरवानन्द कापालिक ने जो कुछ बतलाया उसे सुनकर एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं । उसके कथनानसार रंजन चौबे और रमा पिछले जन्म में नाग और नागिन थे। दोनों इच्छाधारी थे। जब जैसे इच्छा हो, पलक झपकते वे मनचाहा रूप धारण कर सकते थे। यह इच्छासिद्धि केवल उन्हीं नाग-नागिनों को प्राप्त होती है जिनकी उम्र एक हजार वर्ष से ज्यादा हो जाती है। एक बार उन दोनों को न जाने क्यों मानव-रूप धारण करने की इच्छा हो आई और यह इच्छा उत्पन्न होते ही वे दोनों मयूराक्षी के तट पर बालक और बालिका के रूप में प्रकट होकर खेलने लगे। वहीं एक दिन अचानक भैरवानंद कापलिक की नजर उन पर पड़ गई। वह तुरन्त उनका रहस्य समझ गया ।। इसके बाद उसने उसी क्षण अपने मंत्र-बल से उन दोनों की इच्छा शक्ति को समाप्त कर दिया, ताकि वे अपने को पुन: नाग-नागिन के रूप में परिवर्तित न कर सके। कापालिक ने ऐसा क्यों किया यह तो उसने नहीं बतलाया, लेकिन इतना अवश्य कहा कि वे दोनों भाई-वहन अब उसके मंत्र-बल की सीमा के बाहर हो चुके है तथा सम्भव है बे फिर कहीं नाग-नागिन के रूप में विचरण कर रहे हो। खैर ! इन बातों में कितनी सत्यता थी यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन मेरी जिज्ञासा ज्यों की त्यों रह गई । उसका समाधान न हो सका । जब मैंने मि. लाहा को ये सारी रहस्यमय बातें बताई तो वह सुनकर दंग रह गये थे। फिर जोर से सांस लेकर कहने लगे, "मि. शर्मा, जो कुछ भी हो, रंजन चौबे के हाथो का बना खाना खासतौर से मांसाहारी व्यंजन का स्वाद मैं जिन्दगी-भर नहीं भूल सकूँगा। निश्चय ही उसका स्वाद अद्वितीय था... अलौकिक था -