S
StoryPublisher
Guest
अध्याय १० जब श्मशान से शव गायब हो गया
काली रात का घुप्प अंधेरा । बंग भूमि का श्मशान घाट । एकाएक मेरी निगाह बगल की तरफ पड़ी, तो देखा वहाँ दस-बारह लोग मृत शरीर को लेकर आये थे। उसे जमीन पर रखकर वे लकड़ियों की चिता बनाने लगे। तभी बड़े जोरों की बरसात शुरू हो गई। बरसात से बचने के लिए शव के साथ
आये लोग वहीं नजदीक में एक शेड के नीचे जाकर खड़े हो गये । बारिश बन्द होने के बाद सभी लोग चिता के पास लौट आये। परन्तु एक आश्चर्यजनक घटना हो गई। वहीं पड़ी लाश अदृश्य हो गयी थी । यह अजीब और डरावनी घटना देखकर शव के साथ आये सभी लोग भय कंपित होकर शहर की।
और भूत-भूत चिल्लाते हुए भागने लगे। यह घटना अगस्त १९३१ की है। पूर्व बंगाल में नारायणगंज तहसील अन्तर्गत कोमिल्ला गांव के निवासी विपिन चन्द्र भट्टाचार्य एक बड़े जमींदार थे। उनके पास काफी जमीन-जायदाद थी, विपिन बाबू बहुत ही सात्विक तथा उदार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनके पास जो भी मदद मांगने आता, वह झोली भरकर ही लौटता। विपिन बाबू समारोह मनाने के काफी शौकिन थे। प्रतिवर्ष उनके यहाँ काली पूजा का समारोह धूमधाम से बड़े पैमाने पर मनाया जाता था। साथ में उसी दिन गरीब लोगों को अपार धन दान दिया जाता। इसलिए दानवीर तथा उदार हृदय के जमींदार विपिन बाबू को गांव के लोग बहुत चाहते थे। विपिन बाबू की पत्नी रेणुका देवी शीलवान, मिलनसार और चरित्र सम्पन्न थी। उनके मुँह से कभी क्रोधमय शब्द नहीं निकलता था। उनकी दया भावना को देखकर गांव के लोग माता जी कहते थे। लेकिन सुख और शान्ति के साथ बिपिन बाबू अपना जीबन जरूर व्यतीत कर रहे थे, परन्तु उनके सुख में एक बड़ी कमी थी। कमीका कारण था परिवार में कोई सन्तान न होना । इसके लिए उन्होंने यज्ञ प्राग, पूजा एवं मनौती आदि कितने उपाय किये, लेकिन वे सफल नहीं हुए। विपिन बाबू की ढलती।
उम्र के ख्याल से सन्तान होने की सम्भावना और कम होने लगी। जिससे उनकी उदासी बढ़ती ही रही । तभी एक दिन संयोग से एक कापालिक उनके घर आया । बंगाल के शैव योगियों को कापालिक कहते हैं। बे काली माता के उपासक होते हैं। अपने को देह-दण्ड देने वाले ये कापालिक अमावस्या की
रात में श्मशान में जाकर मंत्रों की साधना से सिद्धियाँ प्रास कर लेते हैं। विपिन चन्द्र ने उस कापालिक का स्वागत किया । सन्तान के अभाव में उनकी उदासी देखकर कापालिक ने अपने झोले से एक फल निकालकर बिपिन चन्द्र को दिया और कहा - "काली माता की कृपा का यह एक मंगित फल है। रेणुका देवी अगर इसे खा लेगी, तो सन्तान की प्राति अवश्य होगी।" बिपिन चन्द्र ने कापालिक का धन्यवाद देते हुए उसका यथोचित सम्मान किया फिर उसके चले जाने
के बाद रेणुका देवी ने बड़ी श्रद्धा से वह फल खाया। आश्चर्य की बात है। ठीक नौ महीने बाद उन्होंने एक सुन्दर तथा स्वस्थ बालक को जन्म दिया । पुत्र के जन्म के अवसर पर खुशियों में मिठाई और गरीबों को कपड़े बांटे गये । उस दिन का समारोह अपूर्व
था। पूरे गांव को मिष्ठान भोजन प्राप्त हुआ । संयोगवश, उस दिन कापालिक भी उपस्थित था। उसका सम्मान 'न भूतो न भविष्यति' जैसा रहा । उस जातक की हस्तरेखायें तथा ज्योतिष देखकर कापालिक व्यथित हुआ। विपिन चन्द्र भी व्यथित हुए, फिर एक बार्तालाप के दौरान विपिन चन्द्र से
कापालिक ने कहा - "इस बालक के भाग्य में मात सुख नहीं लिखा है। सोलहवें साल में इस पर बड़े भारी संकट आने की सम्भावना है, लेकिन आप इसके लिए चिंता मत करिए। उस संकट से मैं इसे मुक्त करूंगा।" इतना कहकर वह कापालिक बड़ी तेजी से चलता बना। लड़के का नाम सुरेन्द्र रखा गया। कापालिक के कथनानुसार पुत्र-जन्म के बाद थोड़े ही दिनों में रेणका देवी बीमार हुई, और उनकी ईहलीला समाप्त हो गई । रेणुका देवी की मृत्यु से बिपिन बाबू शोकाकुल हो उठे। कई दिन तक उन्होंने न अन्न खाया और न पानी पिया। विपिन बाबू को दूसरी शादी करने की जरा भी चाहत नहीं थी, लेकिन पुत्र की देखभाल ठीक हो, इसीलिए दूसरी शादी करने को बे तैयार हो गये। परिणामस्वरूप सुमित्रा नाम की लड़की से विपिन बाबू की दूसरी शादी हो गयी। समित्रा और रेणका के स्वभाव में किसी प्रकार की समानता नहीं थी। सुमित्रा देवी का स्वभाव उदण्ड और क्रोधी था। उसने घर का सारा कारोबार अपने हाथों में ले लिया। छोटे सुरेन्द्र से वह बहुत नफरत करती थी। जिससे बिपिन बाबू बहुत दुखी थे। बेटे की दयनीय हालत देखकर उन्होंने उसे एक विश्वासपात्र तथा दयाशील दाई के हवाले कर दिया। शैशव काल के बाद सरेन्द्र बालपन की किलकारियों में गंजने लगा। उसकी बाल लीलाओं से विपिन बाबू जितना हर्षित होते थे, उतनी ही सुमित्रा देवी क्रुद्ध होती थी। धीरे-धीरे सुरेन्द्र जब चार साल का हुआ, तो एक दिन सुमित्रा ने उसके भोजन में कांच पीसकर उसका चूर्ण मिला दिया। सौभाग्य से उस दिन सुरेन्द्र ने कुछ कारणबश भोजन नहीं किया। उम्र के साथ-साथ सुरेन्द्र जब आठ वर्ष का हुआ, तब सुमित्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम सरसचन्द्र रखा गया। अब तो सुमित्रा सुरेन्द्र से ज्यादा नफरत करने लगी, क्योंकि वह चाहती थी कि सब सम्पत्ति का स्वामी उसका एकलौता बेटा ही बनाया जाय। सुरेन्द्र की चिंता से विपिन बाबू की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती गयी आखिरकार उसी चिंता में उनका एक दिन स्वर्गवास भी हो गया | उस समय सुरेन्द्र पन्द्रहवी वर्षगाठ में पहुंचा था। बसीयत में विपिन बाबू ने सुरेन्द्र को जमीन-जायदाद का मालिक बनाया था और सरसवन्द्र का मासिक वेतन निश्चित किया था। मृत्यु के पूर्व विपिन बाबू सुरेन्द्र से मिलना चाहते थे, लेकिन कम्बख्न सुमित्रा ने उनकी आखिरी तमन्ना को भी नहीं पूरा होने दिया। अपने पिता की मृत्यु से सुरेन्द्र असीम दुख में डूब गया। पिता का अन्तिम दर्शन भी उसे अप्राप्य रहा। उसको लगा कि वह अब पूर्णत: अनाथ हो गया है। उसकी दाई ने उसे हर प्रकार की सांत्वना दी, लेकिन उसे तसल्ली नहीं हुई
इधर विपिन बाबू के वकील सुमित्रा देवी से मिले और उन्होंने वसीयतनामा पढ़कर सुनाया। मजमन सुनकर सुमित्रा देवी क्रोध से पागल हो उठी। पहले तो उसने काफी धन रिश्वत के रूप में देकर बकील साहब को बसीयत जला देने का दबाव डाला, लेकिन वकील साहब किसी भी कीमत पर नहीं तैयार हुए। काफी मिन्नत करने के बाद उन्होंने असली वसीयत अपने पास रख ली, और उसकी एक नकल लेकर एक दिन वे सुमित्रा के पास पुन: पहुँचे । सुमित्रा देवी के कथनानुसार उन्होंने वसीयत को आग लगा दी। खुशी से सुमित्रा देवी ने वकील साहब को दस हजार रूपये पुरस्कार स्वरूप भेंट किया। जमीन-जायदाद का पूरा कारोबार सुमित्रा देबी ने अपने हाथों में ले लिया । सुरेन्द्र पर वह अपनी हुकूमत चलाने लगी। उसकी संरक्षित दाई को उसी क्षण हटा दिया गया। सुरेन्द्र से बिछड़ते समय
दाई को बहुत दुख हुआ, परन्तु कर ही क्या सकती थी? सुमित्रा देवी ने अपने चचेरे भाई रमेश को प्रबन्धक के रूप में नियुक्त किया । वह सुमित्रा देवी से कई गुना ज्यादा दुष्ट था। दोनों ने मिलकर सुरेन्द्र पर अपना कपट जाल फैलाना प्रारम्भ किया। पहले तो सुरेन्द्र के साथ प्रेम ब्यबहार का दिखावा किया गया, लेकिन बाद में उसे पूरी तरह से समाप्त करने की योजना बन गयी । आखिर वह भयानक दिन आ ही गया । उस दिन सुरेन्द्र के भोजन में जालिम सुमित्रा ने जहर मिला दिया। भोजन करते ही सुरेन्द्र वेदनादि से व्याकुल हो उठा। जमीन पर लेट कर वह आनन्द करने लगा और कुछ देर में वह अपनी सुधबुध भूल गया ।
काली रात का घुप्प अंधेरा । बंग भूमि का श्मशान घाट । एकाएक मेरी निगाह बगल की तरफ पड़ी, तो देखा वहाँ दस-बारह लोग मृत शरीर को लेकर आये थे। उसे जमीन पर रखकर वे लकड़ियों की चिता बनाने लगे। तभी बड़े जोरों की बरसात शुरू हो गई। बरसात से बचने के लिए शव के साथ
आये लोग वहीं नजदीक में एक शेड के नीचे जाकर खड़े हो गये । बारिश बन्द होने के बाद सभी लोग चिता के पास लौट आये। परन्तु एक आश्चर्यजनक घटना हो गई। वहीं पड़ी लाश अदृश्य हो गयी थी । यह अजीब और डरावनी घटना देखकर शव के साथ आये सभी लोग भय कंपित होकर शहर की।
और भूत-भूत चिल्लाते हुए भागने लगे। यह घटना अगस्त १९३१ की है। पूर्व बंगाल में नारायणगंज तहसील अन्तर्गत कोमिल्ला गांव के निवासी विपिन चन्द्र भट्टाचार्य एक बड़े जमींदार थे। उनके पास काफी जमीन-जायदाद थी, विपिन बाबू बहुत ही सात्विक तथा उदार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनके पास जो भी मदद मांगने आता, वह झोली भरकर ही लौटता। विपिन बाबू समारोह मनाने के काफी शौकिन थे। प्रतिवर्ष उनके यहाँ काली पूजा का समारोह धूमधाम से बड़े पैमाने पर मनाया जाता था। साथ में उसी दिन गरीब लोगों को अपार धन दान दिया जाता। इसलिए दानवीर तथा उदार हृदय के जमींदार विपिन बाबू को गांव के लोग बहुत चाहते थे। विपिन बाबू की पत्नी रेणुका देवी शीलवान, मिलनसार और चरित्र सम्पन्न थी। उनके मुँह से कभी क्रोधमय शब्द नहीं निकलता था। उनकी दया भावना को देखकर गांव के लोग माता जी कहते थे। लेकिन सुख और शान्ति के साथ बिपिन बाबू अपना जीबन जरूर व्यतीत कर रहे थे, परन्तु उनके सुख में एक बड़ी कमी थी। कमीका कारण था परिवार में कोई सन्तान न होना । इसके लिए उन्होंने यज्ञ प्राग, पूजा एवं मनौती आदि कितने उपाय किये, लेकिन वे सफल नहीं हुए। विपिन बाबू की ढलती।
उम्र के ख्याल से सन्तान होने की सम्भावना और कम होने लगी। जिससे उनकी उदासी बढ़ती ही रही । तभी एक दिन संयोग से एक कापालिक उनके घर आया । बंगाल के शैव योगियों को कापालिक कहते हैं। बे काली माता के उपासक होते हैं। अपने को देह-दण्ड देने वाले ये कापालिक अमावस्या की
रात में श्मशान में जाकर मंत्रों की साधना से सिद्धियाँ प्रास कर लेते हैं। विपिन चन्द्र ने उस कापालिक का स्वागत किया । सन्तान के अभाव में उनकी उदासी देखकर कापालिक ने अपने झोले से एक फल निकालकर बिपिन चन्द्र को दिया और कहा - "काली माता की कृपा का यह एक मंगित फल है। रेणुका देवी अगर इसे खा लेगी, तो सन्तान की प्राति अवश्य होगी।" बिपिन चन्द्र ने कापालिक का धन्यवाद देते हुए उसका यथोचित सम्मान किया फिर उसके चले जाने
के बाद रेणुका देवी ने बड़ी श्रद्धा से वह फल खाया। आश्चर्य की बात है। ठीक नौ महीने बाद उन्होंने एक सुन्दर तथा स्वस्थ बालक को जन्म दिया । पुत्र के जन्म के अवसर पर खुशियों में मिठाई और गरीबों को कपड़े बांटे गये । उस दिन का समारोह अपूर्व
था। पूरे गांव को मिष्ठान भोजन प्राप्त हुआ । संयोगवश, उस दिन कापालिक भी उपस्थित था। उसका सम्मान 'न भूतो न भविष्यति' जैसा रहा । उस जातक की हस्तरेखायें तथा ज्योतिष देखकर कापालिक व्यथित हुआ। विपिन चन्द्र भी व्यथित हुए, फिर एक बार्तालाप के दौरान विपिन चन्द्र से
कापालिक ने कहा - "इस बालक के भाग्य में मात सुख नहीं लिखा है। सोलहवें साल में इस पर बड़े भारी संकट आने की सम्भावना है, लेकिन आप इसके लिए चिंता मत करिए। उस संकट से मैं इसे मुक्त करूंगा।" इतना कहकर वह कापालिक बड़ी तेजी से चलता बना। लड़के का नाम सुरेन्द्र रखा गया। कापालिक के कथनानुसार पुत्र-जन्म के बाद थोड़े ही दिनों में रेणका देवी बीमार हुई, और उनकी ईहलीला समाप्त हो गई । रेणुका देवी की मृत्यु से बिपिन बाबू शोकाकुल हो उठे। कई दिन तक उन्होंने न अन्न खाया और न पानी पिया। विपिन बाबू को दूसरी शादी करने की जरा भी चाहत नहीं थी, लेकिन पुत्र की देखभाल ठीक हो, इसीलिए दूसरी शादी करने को बे तैयार हो गये। परिणामस्वरूप सुमित्रा नाम की लड़की से विपिन बाबू की दूसरी शादी हो गयी। समित्रा और रेणका के स्वभाव में किसी प्रकार की समानता नहीं थी। सुमित्रा देवी का स्वभाव उदण्ड और क्रोधी था। उसने घर का सारा कारोबार अपने हाथों में ले लिया। छोटे सुरेन्द्र से वह बहुत नफरत करती थी। जिससे बिपिन बाबू बहुत दुखी थे। बेटे की दयनीय हालत देखकर उन्होंने उसे एक विश्वासपात्र तथा दयाशील दाई के हवाले कर दिया। शैशव काल के बाद सरेन्द्र बालपन की किलकारियों में गंजने लगा। उसकी बाल लीलाओं से विपिन बाबू जितना हर्षित होते थे, उतनी ही सुमित्रा देवी क्रुद्ध होती थी। धीरे-धीरे सुरेन्द्र जब चार साल का हुआ, तो एक दिन सुमित्रा ने उसके भोजन में कांच पीसकर उसका चूर्ण मिला दिया। सौभाग्य से उस दिन सुरेन्द्र ने कुछ कारणबश भोजन नहीं किया। उम्र के साथ-साथ सुरेन्द्र जब आठ वर्ष का हुआ, तब सुमित्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम सरसचन्द्र रखा गया। अब तो सुमित्रा सुरेन्द्र से ज्यादा नफरत करने लगी, क्योंकि वह चाहती थी कि सब सम्पत्ति का स्वामी उसका एकलौता बेटा ही बनाया जाय। सुरेन्द्र की चिंता से विपिन बाबू की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती गयी आखिरकार उसी चिंता में उनका एक दिन स्वर्गवास भी हो गया | उस समय सुरेन्द्र पन्द्रहवी वर्षगाठ में पहुंचा था। बसीयत में विपिन बाबू ने सुरेन्द्र को जमीन-जायदाद का मालिक बनाया था और सरसवन्द्र का मासिक वेतन निश्चित किया था। मृत्यु के पूर्व विपिन बाबू सुरेन्द्र से मिलना चाहते थे, लेकिन कम्बख्न सुमित्रा ने उनकी आखिरी तमन्ना को भी नहीं पूरा होने दिया। अपने पिता की मृत्यु से सुरेन्द्र असीम दुख में डूब गया। पिता का अन्तिम दर्शन भी उसे अप्राप्य रहा। उसको लगा कि वह अब पूर्णत: अनाथ हो गया है। उसकी दाई ने उसे हर प्रकार की सांत्वना दी, लेकिन उसे तसल्ली नहीं हुई
इधर विपिन बाबू के वकील सुमित्रा देवी से मिले और उन्होंने वसीयतनामा पढ़कर सुनाया। मजमन सुनकर सुमित्रा देवी क्रोध से पागल हो उठी। पहले तो उसने काफी धन रिश्वत के रूप में देकर बकील साहब को बसीयत जला देने का दबाव डाला, लेकिन वकील साहब किसी भी कीमत पर नहीं तैयार हुए। काफी मिन्नत करने के बाद उन्होंने असली वसीयत अपने पास रख ली, और उसकी एक नकल लेकर एक दिन वे सुमित्रा के पास पुन: पहुँचे । सुमित्रा देवी के कथनानुसार उन्होंने वसीयत को आग लगा दी। खुशी से सुमित्रा देवी ने वकील साहब को दस हजार रूपये पुरस्कार स्वरूप भेंट किया। जमीन-जायदाद का पूरा कारोबार सुमित्रा देबी ने अपने हाथों में ले लिया । सुरेन्द्र पर वह अपनी हुकूमत चलाने लगी। उसकी संरक्षित दाई को उसी क्षण हटा दिया गया। सुरेन्द्र से बिछड़ते समय
दाई को बहुत दुख हुआ, परन्तु कर ही क्या सकती थी? सुमित्रा देवी ने अपने चचेरे भाई रमेश को प्रबन्धक के रूप में नियुक्त किया । वह सुमित्रा देवी से कई गुना ज्यादा दुष्ट था। दोनों ने मिलकर सुरेन्द्र पर अपना कपट जाल फैलाना प्रारम्भ किया। पहले तो सुरेन्द्र के साथ प्रेम ब्यबहार का दिखावा किया गया, लेकिन बाद में उसे पूरी तरह से समाप्त करने की योजना बन गयी । आखिर वह भयानक दिन आ ही गया । उस दिन सुरेन्द्र के भोजन में जालिम सुमित्रा ने जहर मिला दिया। भोजन करते ही सुरेन्द्र वेदनादि से व्याकुल हो उठा। जमीन पर लेट कर वह आनन्द करने लगा और कुछ देर में वह अपनी सुधबुध भूल गया ।