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Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

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अध्याय १० जब श्मशान से शव गायब हो गया

काली रात का घुप्प अंधेरा । बंग भूमि का श्मशान घाट । एकाएक मेरी निगाह बगल की तरफ पड़ी, तो देखा वहाँ दस-बारह लोग मृत शरीर को लेकर आये थे। उसे जमीन पर रखकर वे लकड़ियों की चिता बनाने लगे। तभी बड़े जोरों की बरसात शुरू हो गई। बरसात से बचने के लिए शव के साथ

आये लोग वहीं नजदीक में एक शेड के नीचे जाकर खड़े हो गये । बारिश बन्द होने के बाद सभी लोग चिता के पास लौट आये। परन्तु एक आश्चर्यजनक घटना हो गई। वहीं पड़ी लाश अदृश्य हो गयी थी । यह अजीब और डरावनी घटना देखकर शव के साथ आये सभी लोग भय कंपित होकर शहर की।

और भूत-भूत चिल्लाते हुए भागने लगे। यह घटना अगस्त १९३१ की है। पूर्व बंगाल में नारायणगंज तहसील अन्तर्गत कोमिल्ला गांव के निवासी विपिन चन्द्र भट्टाचार्य एक बड़े जमींदार थे। उनके पास काफी जमीन-जायदाद थी, विपिन बाबू बहुत ही सात्विक तथा उदार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनके पास जो भी मदद मांगने आता, वह झोली भरकर ही लौटता। विपिन बाबू समारोह मनाने के काफी शौकिन थे। प्रतिवर्ष उनके यहाँ काली पूजा का समारोह धूमधाम से बड़े पैमाने पर मनाया जाता था। साथ में उसी दिन गरीब लोगों को अपार धन दान दिया जाता। इसलिए दानवीर तथा उदार हृदय के जमींदार विपिन बाबू को गांव के लोग बहुत चाहते थे। विपिन बाबू की पत्नी रेणुका देवी शीलवान, मिलनसार और चरित्र सम्पन्न थी। उनके मुँह से कभी क्रोधमय शब्द नहीं निकलता था। उनकी दया भावना को देखकर गांव के लोग माता जी कहते थे। लेकिन सुख और शान्ति के साथ बिपिन बाबू अपना जीबन जरूर व्यतीत कर रहे थे, परन्तु उनके सुख में एक बड़ी कमी थी। कमीका कारण था परिवार में कोई सन्तान न होना । इसके लिए उन्होंने यज्ञ प्राग, पूजा एवं मनौती आदि कितने उपाय किये, लेकिन वे सफल नहीं हुए। विपिन बाबू की ढलती।

उम्र के ख्याल से सन्तान होने की सम्भावना और कम होने लगी। जिससे उनकी उदासी बढ़ती ही रही । तभी एक दिन संयोग से एक कापालिक उनके घर आया । बंगाल के शैव योगियों को कापालिक कहते हैं। बे काली माता के उपासक होते हैं। अपने को देह-दण्ड देने वाले ये कापालिक अमावस्या की

रात में श्मशान में जाकर मंत्रों की साधना से सिद्धियाँ प्रास कर लेते हैं। विपिन चन्द्र ने उस कापालिक का स्वागत किया । सन्तान के अभाव में उनकी उदासी देखकर कापालिक ने अपने झोले से एक फल निकालकर बिपिन चन्द्र को दिया और कहा - "काली माता की कृपा का यह एक मंगित फल है। रेणुका देवी अगर इसे खा लेगी, तो सन्तान की प्राति अवश्य होगी।" बिपिन चन्द्र ने कापालिक का धन्यवाद देते हुए उसका यथोचित सम्मान किया फिर उसके चले जाने

के बाद रेणुका देवी ने बड़ी श्रद्धा से वह फल खाया। आश्चर्य की बात है। ठीक नौ महीने बाद उन्होंने एक सुन्दर तथा स्वस्थ बालक को जन्म दिया । पुत्र के जन्म के अवसर पर खुशियों में मिठाई और गरीबों को कपड़े बांटे गये । उस दिन का समारोह अपूर्व

था। पूरे गांव को मिष्ठान भोजन प्राप्त हुआ । संयोगवश, उस दिन कापालिक भी उपस्थित था। उसका सम्मान 'न भूतो न भविष्यति' जैसा रहा । उस जातक की हस्तरेखायें तथा ज्योतिष देखकर कापालिक व्यथित हुआ। विपिन चन्द्र भी व्यथित हुए, फिर एक बार्तालाप के दौरान विपिन चन्द्र से

कापालिक ने कहा - "इस बालक के भाग्य में मात सुख नहीं लिखा है। सोलहवें साल में इस पर बड़े भारी संकट आने की सम्भावना है, लेकिन आप इसके लिए चिंता मत करिए। उस संकट से मैं इसे मुक्त करूंगा।" इतना कहकर वह कापालिक बड़ी तेजी से चलता बना। लड़के का नाम सुरेन्द्र रखा गया। कापालिक के कथनानुसार पुत्र-जन्म के बाद थोड़े ही दिनों में रेणका देवी बीमार हुई, और उनकी ईहलीला समाप्त हो गई । रेणुका देवी की मृत्यु से बिपिन बाबू शोकाकुल हो उठे। कई दिन तक उन्होंने न अन्न खाया और न पानी पिया। विपिन बाबू को दूसरी शादी करने की जरा भी चाहत नहीं थी, लेकिन पुत्र की देखभाल ठीक हो, इसीलिए दूसरी शादी करने को बे तैयार हो गये। परिणामस्वरूप सुमित्रा नाम की लड़की से विपिन बाबू की दूसरी शादी हो गयी। समित्रा और रेणका के स्वभाव में किसी प्रकार की समानता नहीं थी। सुमित्रा देवी का स्वभाव उदण्ड और क्रोधी था। उसने घर का सारा कारोबार अपने हाथों में ले लिया। छोटे सुरेन्द्र से वह बहुत नफरत करती थी। जिससे बिपिन बाबू बहुत दुखी थे। बेटे की दयनीय हालत देखकर उन्होंने उसे एक विश्वासपात्र तथा दयाशील दाई के हवाले कर दिया। शैशव काल के बाद सरेन्द्र बालपन की किलकारियों में गंजने लगा। उसकी बाल लीलाओं से विपिन बाबू जितना हर्षित होते थे, उतनी ही सुमित्रा देवी क्रुद्ध होती थी। धीरे-धीरे सुरेन्द्र जब चार साल का हुआ, तो एक दिन सुमित्रा ने उसके भोजन में कांच पीसकर उसका चूर्ण मिला दिया। सौभाग्य से उस दिन सुरेन्द्र ने कुछ कारणबश भोजन नहीं किया। उम्र के साथ-साथ सुरेन्द्र जब आठ वर्ष का हुआ, तब सुमित्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम सरसचन्द्र रखा गया। अब तो सुमित्रा सुरेन्द्र से ज्यादा नफरत करने लगी, क्योंकि वह चाहती थी कि सब सम्पत्ति का स्वामी उसका एकलौता बेटा ही बनाया जाय। सुरेन्द्र की चिंता से विपिन बाबू की तबीयत दिन-ब-दिन बिगड़ती गयी आखिरकार उसी चिंता में उनका एक दिन स्वर्गवास भी हो गया | उस समय सुरेन्द्र पन्द्रहवी वर्षगाठ में पहुंचा था। बसीयत में विपिन बाबू ने सुरेन्द्र को जमीन-जायदाद का मालिक बनाया था और सरसवन्द्र का मासिक वेतन निश्चित किया था। मृत्यु के पूर्व विपिन बाबू सुरेन्द्र से मिलना चाहते थे, लेकिन कम्बख्न सुमित्रा ने उनकी आखिरी तमन्ना को भी नहीं पूरा होने दिया। अपने पिता की मृत्यु से सुरेन्द्र असीम दुख में डूब गया। पिता का अन्तिम दर्शन भी उसे अप्राप्य रहा। उसको लगा कि वह अब पूर्णत: अनाथ हो गया है। उसकी दाई ने उसे हर प्रकार की सांत्वना दी, लेकिन उसे तसल्ली नहीं हुई

इधर विपिन बाबू के वकील सुमित्रा देवी से मिले और उन्होंने वसीयतनामा पढ़कर सुनाया। मजमन सुनकर सुमित्रा देवी क्रोध से पागल हो उठी। पहले तो उसने काफी धन रिश्वत के रूप में देकर बकील साहब को बसीयत जला देने का दबाव डाला, लेकिन वकील साहब किसी भी कीमत पर नहीं तैयार हुए। काफी मिन्नत करने के बाद उन्होंने असली वसीयत अपने पास रख ली, और उसकी एक नकल लेकर एक दिन वे सुमित्रा के पास पुन: पहुँचे । सुमित्रा देवी के कथनानुसार उन्होंने वसीयत को आग लगा दी। खुशी से सुमित्रा देवी ने वकील साहब को दस हजार रूपये पुरस्कार स्वरूप भेंट किया। जमीन-जायदाद का पूरा कारोबार सुमित्रा देबी ने अपने हाथों में ले लिया । सुरेन्द्र पर वह अपनी हुकूमत चलाने लगी। उसकी संरक्षित दाई को उसी क्षण हटा दिया गया। सुरेन्द्र से बिछड़ते समय

दाई को बहुत दुख हुआ, परन्तु कर ही क्या सकती थी? सुमित्रा देवी ने अपने चचेरे भाई रमेश को प्रबन्धक के रूप में नियुक्त किया । वह सुमित्रा देवी से कई गुना ज्यादा दुष्ट था। दोनों ने मिलकर सुरेन्द्र पर अपना कपट जाल फैलाना प्रारम्भ किया। पहले तो सुरेन्द्र के साथ प्रेम ब्यबहार का दिखावा किया गया, लेकिन बाद में उसे पूरी तरह से समाप्त करने की योजना बन गयी । आखिर वह भयानक दिन आ ही गया । उस दिन सुरेन्द्र के भोजन में जालिम सुमित्रा ने जहर मिला दिया। भोजन करते ही सुरेन्द्र वेदनादि से व्याकुल हो उठा। जमीन पर लेट कर वह आनन्द करने लगा और कुछ देर में वह अपनी सुधबुध भूल गया ।
 
रात का समय था, डॉक्टर बुलाया गया। दस हजार की रिश्वत देकर सुमित्रा देवी ने डॉक्टर को भी अपने वश में कर लिया । विवश होकर डॉक्टर ने बता दिया, कि सुरेन्द्र की मृत्यु कालरा से हो गई। बड़ी जल्दी में सुरेन्द्र के मृत शरीर को श्मशान ले जाने का प्रबन्ध किया गया। दस-बारह नौकर उसे श्मशान घाट उठा कर ले गये। श्मशान घाट की घटना पाठकगण पहले ही पढ़ चुके हैं। वास्तव में सुरेन्द्र जिन्दा था । उसके शरीर से प्राण का अन्त नहीं हुआ था । बरसात का पानी पाते ही शायद वह होश में आ गया, और भागते हुए जोर-जोर से पुकारने लगा - "बचाओ, बचाओ।" आवाज सुनकर सभी लोग भाग खड़े हुए थे । तभी वहाँ संयोग से बही कापालिक मंत्र साधना करके श्मशान में आया । वह सुरेन्द्र को देखते ही उसके निकट गया। फिर बन्धनों से मुक्त कर सुरेन्द्र को वह अपने साथ कापालिक सीधा हिमालय की ओर ले गया। जहर से पीड़ित सुरेन्द्र की मृत्यु नहीं हुई थी, लेकिन उसके दिमाग पर उसका भारी असर हुआ, और उसकी स्मृति ही चल बसी। सुरेन्द्र को साथ लेकर कापालिक पवित्र स्थानों की यात्रा करता रहा । नियमित रूप से कसरत और पौष्टिक खुराक देने से सुरेन्द्र बहुत जल्द तन्दुरूस्त ही नहीं, बल्कि ताकतबर भी हो गया। हट्टे-कट्टे

और सदह सरेन्द्रको कापालिक ने कुश्ती लड़ना सिखाया । उसने मंत्र साधना कर ली। परिणामत: उसे सिद्धियाँ भी प्राप्त हुई। इस तरह सुरेन्द्र के बलवान होने के बाद कापालिक उसे "भीम भवानी" नाम से पुकारने लगा।

भीम भवानी सुरेन्द्र को साथ लेकर एक दिन कापालिक सुन्दर बन में आया । घूमते-घूमते वे एक गांव में पहुँचे । वहाँ एक क्रूर नरभक्षी बाघ ने पूरी बस्ती में अपना आतंक मचा रखा था। कई लोगों को वह मौत के घाट उतार चुका था। भीम भवानी ने उसे मारने का निश्चय किया । रात को गांव के बाहर एक बकरी बांधीं गई। आधी रात बीत जाने पर बाघ बाहर आया । भीम भवानी हाथ में एक तेज भाला लिए हुए कई गाँव बालों के साथ छिपकर बैठा था। बाघ, बकरी की

ओर आ ही रहा था, कि भीम भवानी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर बाघ को लक्ष्य करके भाला उसकी ओर फेंका। भाले की गति इतनी तेज थी कि भाला बाघ का पेट फाड़कर दूसरी ओर से बाहर निकल आया। बाघ उसी क्षण जमीन पर गिर गया। उसे मृत समझकर भीम भवानी और अन्य लोग बाघ के समीप आये। जख्मी बाघ अपने पास शिकारी को आया देखकर तुरन्त खड़ा हो गया और भीम भवानी पर झपटा। सचेत भीम भवानी ने बाघ का जबड़ा अपने हाथों से पूरी ताकत लगाकर खोल दिया। कुछ देर बाद बाघ का जबड़ा फट गया और वहीं मरकर ढेर हो गया।

भीम भवानी का यह अपूर्व साहस देखकर गांव वाले आश्चर्यचकित रह गये । गाँव वालों ने उसके सम्मान में एक बड़ा समारोह किया, और उसे "बंगाल का बाघ' नाम से पुकार कर उसका गौरव बढ़ाया। उसके बाद भीम भवानी और कापालिक बाराणसी आये। उस समय बाराणसी में कार्लेकर ग्गैण्ड सर्कस लगा था। कार्लेकर ग्रैण्ड सर्कस में तब चेस्टलीन नामक रूप का एक सैडो था। वह विशालकाय हट्टा-कट्टा पहलवान था । पाँच-सौ पौण्ड का बजन वह हाथ में उंगली से उठाता था।

भीम भवानी और कापालिक ने शहर में जाहिर तौर पर लगाये एक पत्रक को देखा जिसमें लिखा था "रूसी सैडो को कुश्ती में हराने वाले बीर को एक हजार रूपये का इनाम दिया जायेगा।" पोस्टर पढकर भीम भवानी के शरीर में खुन दौड़ गया। दूसरे दिन भीम भवानी प्रो.शंकर राव कार्लेकर से मिला । सैडो के साथ सामना करने का अपना निश्चय उससे व्यक्त किया । कुश्ती का दिन निश्चित किया गया और शहर में घोषणा भी की गयी। दंगल के दिन कुश्ती देखने के लिए दर्शक काफी मात्रा में सर्कस के मैदान में इकट्ठा थे । यहाँ तक कि हजारों लोगों को जगह की कमी के कारण निराश होकर लौटना पड़ा। सर्कस के सब खेल हो जाने के बाद भीम भबानी और सैडो की कुश्ती शुरू हुई दोनों पहलबान कपड़े उतारकर आमने-सामने आये। भीम भवानी का शरीर ठोस और मजबूत था। कुश्ती के प्रारम्भ होते ही चेस्टलीन और भीम भवानी को अपनी शक्ति लगाकर एक दूसरे को नीचे दबाया, लेकिन भीम भवानी ने एक अजीब दाँव की सहायता से सैडो को धड़ाम से जमीन पर गिरा दिया, और भीम भवानी उसके सीने पर सवार हो गया। दर्शकों ने करतल ध्वनि से अपनी खुशियाँ जाहिर की। प्रो.शंकर राव ने भीम भवानी को एक हजार रूपये की थैली भेंट देकर उसका सम्मान किया । पुन: दूसरे दिन जब श्री राब से भीम भवानी मिला तो प्रो.शंकर राव ने भीम भवानीको प्रति मास एक हजार रूपये वेतन पर अपने सर्कस में शामिल कर लिया। कापालिक उसके साथ ही रहा। भीम भवानी ने कार्लेकर ग्रैंड सर्कस में लगभग तीन साल काम किया। उस अवधि के भीतर उसने कई मशहूर पहलवानों को कुश्ती में पराभूत किया। कार्लेकर ग्रैंड सर्कस जब बंगाल के कचरापाड़ा गाँव में था, तब एक अद्भुत घटना हुई । बरसात के दिन थे। हवा जोर से चल रही थी। तम्बू के पास प्रो. शंकर राव भीम भवानी से बातें करते हुए खड़े थे। तूफान के कारण तम्बू के एक लम्बे खम्भे का तार टूटा और लोहे का खम्भा पास ही खड़े भीम भवानी के सिर पर आ गिरा। चोट काफी आ गयी थी, इसलिए वह जमीन पर गिर पड़ा । फौरन उसे अस्पताल पहुंचाया गया। उसके सर पर जोर से आघात हुआ था। फिलहाल शल्य क्रिया आदि उपायों से वह जल्दी ठीक हो गया। उसी समय एक विस्मयकारी घटना हुई । सर पर हुए आघात से भीम भवानी की पूर्व स्मृतियाँ जागृत हो गई। उसने

कापालिक से पूछा - "हम कोमिल्ला गांव कब जायेंगे ? प्रश्न सुनते ही कापालिक की खुशी का ठिकाना न रहा। कापालिक ने प्रो. शंकर राब को पूरा हाल बताया, फिर उसकी अनुमति लेकर दोनों साथ-साथ कोमिल्ला गांव पहुँच गये। अब तक कोमिल्ला में कई परिवर्तन हुए थे । सुमित्रा देवी का बेटा चल बसा था। सुमित्रा देवी के निष्ठर व्यवहार से लोग असन्तुष्ट थे। कापालिक सीधा विपिन बाबू के बकील के पास पहुँचा और उसने सुरेन्द्र के बारे में पूरा विवरण दिया। उनको विश्वास दिलाया कि सुरेन्द्र जिन्दा है। जब वकील को भी विश्वास हो गया, तो उन्होंने सुरेन्द्र की हथेली पर सर्पाकृति देखी, जो उसके जन्म के अवसर पर रेखांकित की गयी थी, तो वह चकित रह गये। फिर उन्होंने भीम का बड़ा सम्मान किया। कुछ देर बाद नागरिको की एक आम सभा बुलायी गयी । उसमें सुमित्रा देवी के बुरे व्यवहार का

"

बयान किया गया। उस कपट जाल से सुरेन्द्र की रिहाई कैसे हुई, यह बताकर बिपिन बाबू की बसीयत उसी सभा में पड़ी गयी। यह सब देखकर सुमित्रा अपने चचेरे भाई रमेश के साथ चली गई। सुरेन्द्र के सम्मान में लोगों ने एक बड़ा जुलूस निकाला। उसे समारोह के साथ जमींदार की गद्दी पर बैठा दिया। कापालिक जो प्रति पालक था उसके साथ गुरू के नाते रहने लगा। दोनों ने अपनी रियासत को कई प्रकार से सुख और सन्तोष दिया।
 
अध्याय ११ अभिशप्त खजाना

उस आदमी का हुलिया बड़ा बिचित्र था। तमाम गन्दगी से भरे रूखे-सूखे बाल । महीनों से बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ । गन्दे और बड़े-बड़े नाखून – पूरा जिस्म मैल से काला पड़ा था। शायद कई महीने बीत गये होंगे उसे नहाए। गन्दे कुर्ते-पायजामें में जगह-जगह पैबन्द लगे थे। उम्र बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन पचास से कम भी न थी। उसकी हरकत भी पागलों जैसी थी। वह धीरे-धीरे मेरे चेम्बर में आया और सामने रखी कुर्सी पर निहाल-सा बैठ गया । लगा जैसे काफी थका हुआ हो। कहिए ? मैंने अपेक्षा के भाव से पूछा, "कैसे आना हुआ ?" पागल जैसे उस व्यक्ति ने एक बार गहरी नजर से मेरी ओर देखा, फिर धीरे-धीरे कहने लगा, "मेरा नाम मनोहरलाल है। मध्य प्रदेश से चलकर यहाँ आया है। पहले मेरे पास सब कुछ था। किसी चीज की कमी नहीं थी। अच्छी-खासी दौलत थी। पूर्ण समर्पिता सुन्दर पत्नी थी। चार लड़के और चार लड़कियाँ थी। महलनुमा आलीशान मकान था । जमीन-जायदाद भी थी...मगर अब कुछ भी नहीं है...मेरा सब कुछ समास हो गया...न धन...दौलत है न पत्नी बची, न बच्चे रहे...जमीन जायदाद भी नहीं रह गई । केबल मैं बचा हूँ और बची है उन सबकी स्मृतियाँ, जिन्हें अपने सीने से लगाये आज पाँच साल से भटक रहा हूँ इधर-उधर ।" उसने रूक-रूक कर एक लम्बी ठंडी सांस ली, फिर आँखों की कोरे छलक आई । आँसू पोछता हुआ भरे गले से कहने लगा, शायद आप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि मैं आपके पास क्यों और किस लिए आया हूँ। बात दरअसल यह है कि मैंने आपके बारे में बहुत सुना है। पत्र पत्रिकाओं में बहुत सारी कथा-कहानियाँ और अन्य रचनाएँ भी पढ़ी हैं मैंने । तंत्र-मंत्र पर आपने गहरी खोज की है। खतरनाक

और जानलेवा तांत्रिक साधनायें भी की है आपने । मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी समस्या आप ही की सहायता से हल होगी...मेरा सारा दुःख आप ही दूर कर सकेंगे...इसीलिए आपके पास आया हूँ..." आपने मेरे सम्बन्ध में जो कुछ जाना-समझा और सुना है, वह अपनी जगह ठीक है, मगर आपको यह भी मालूम होना चाहिए कि तंत्र-मंत्र मेरी खोज और साधना का विषय है...यह भी सत्य है कि बिबिध तांत्रिक साधनाओं के फलस्वरूप मुझे अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त हुई है, परन्तु उस अलौकिक तांत्रिक शक्ति से न मैं किसी की सहायता कर सकता है न किसी समस्या का समाधान । मेरी उपलब्धि एक प्रकार से मेरी व्यक्तिगत सम्पत्ति है, जिससे मैं व्यवसाय नहीं करना चाहता। मैं ब्यबसाय की बात नहीं कर रहा हूँ, पर...मनोहर लाल कुछ उदास हो गया। कुछ देर तक सिर झुकाए जैसे हताशा से हांफता रहा, फिर व्याकुल भाव से गिड़गिड़ाने लगा, मैं चाहता हूँ कि आप मेरी कहानी सुन लें...मुझे पूरा विश्वास है कि तब आप निश्चय ही मेरी सहायता करने के लिए तैयार हो जायेंगे । सारी बात सुनकर आप जैसा व्यक्ति ना कर ही नहीं सकेगा - बोलते-बोलते मनोहर लाल ने अपने कुर्ते की जेब से एक छोटी-सी मूर्ति निकालकर मेरे सामने मेज पर रख दी, इसे देखिए... मैंने देखा - कांसे की बनी वह मूर्ति एक युवती की थी। लगता था - कलाकार ने उस मूर्ति गढ़ने में

अपनी सारी कला, सारी प्रतिभा लगा दी हो । अंग-प्रत्यंग को इस प्रकार उभास गया था कि वह ..

बिलकुल सजीव प्रतीत हो रही थी। मैंने मनोहर लाल से पूछा, यह क्या है? किसकी मूर्ति है? मेरी बर्बादी और सारी परेशानी का कारण यही मूर्ति है शर्मा जी। मनोहर लाल फिसफिसाती

आवाज में बोला, इसी मूर्ति के कारण आज मेरी यह हालत है। पूरे पांच साल से यह मूर्ति मेरे साथ है । मैं चाहकर भी अपने आपको इससे छुटकारा नहीं पा रहा हूँ। यह मूर्ति भी शायद मुझसे अलग नहीं होना चाहती। मतलब? समझा नहीं मैं। इस मूर्ति को मैंने न जाने कितनी बार तालाब में फेंका...कां में डाला...रास्ते में फेंका. कड़खाने में फेंका...नदी में डाल दिया, फिर भी यह न जाने कैसे मेरे पास वापस लौट आती है। दो दिन पहले

बनारस आते ही मैंने इसे गंगा में बहा दिया था, लेकिन आज सबेरे जब आपके पास आने को तैयार हुआ तो देखा- यह मेरी जेब में मौजूद है। यह विलक्षण और अविश्वसनीय बात सुनकर सन्न रह गया मैं । उस रहस्यमयी मूर्ति की ओर देखते हुए मैंने मनोहर लाल से पूछा, यह आपको मिली कहाँ ? मेरे इस छोटे-से प्रश्न के उत्तर में मनोहर लाल ने जो चमत्कारी कहानी सुनाई, यह निश्चय ही अत्यन्त रोमांचक और अविश्वसनीय थी शायद इसीलिए मैं उसकी सहायता करने को तैयार भी हो गया था,

पर...

मनोहर लाल का जन्म बिलासपुर के एक साधारण और गरीब परिवार में हुआ था। उसके पिता हरवंशलाल ठेले पर फल और सब्जी बेचा करते थे। उसी की आय से घर का पराखर्च चलता था। मनोहरलाल पढ़ने-लिखने में काफी तेज था। उसने किसी प्रकार हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में

उत्तीर्ण कर ली, फिर टाइप और शार्टहैंड भी सीख लिया। उस समय उसकी उम्र करीब अट्ठारह साल थी। भाग्य भी अनुकूल था, अत: थोड़े ही प्रयास से उसे सरकारी नौकरी भी मिल गई। बेतन था - पाँच सौ रूपये माहवार | नौकरी लगते ही पिता ने उसका विवाह भी कर दिया । पत्नी का नाम था मनोरमा। सचमुच बड़ी मनोरम थी वह खूब सुन्दर आकर्षक और गृह कार्य में दक्ष - धीरे-धीरे दाम्पत्य जीवन के बीस वर्ष व्यतीत हो गये। इस बीच मनोहर लाल चार लड़के और चार लड़कियों का पिता बन चुका था। इसी अवधि में उसकी कई बार पदोन्नति हई और कई जगह। ट्रांसफर भी हुआ। फिर उसकी नियुक्ति छत्तीसगढ़ में हो गई। बस उसके साथ ही उस पर विपत्तियों के काले बादल मंडराने लगे । सौभाग्य-दुर्भाग्य में बदलने लगा और अन्त तो बड़ाही लोमहर्षक रहा

छत्तीसगढ़ पहुँचकर सबसे बड़ी समस्या रहने की हुई। मनोहर लाल और मनोरमा का बहाँ कोई रिश्तेदार भी नहीं था, जिसके घर वे ठहर सकते । शहर के बाहर एक बीरान इलाके के खण्डहरनुमा

कई स्थान लावारिस से पड़े थे, कहीं और ठहरने की व्यवस्था न देखकर मनोहरलाल ने उन्हीं में से एक मकान पर अधिकार जमा लिया। उसका काफी हिस्सा जर्जर और खण्डहर हो चुका था, फिर भी दो-तीन कमरे रहने लायक थे। जब पहली बार मनोरमा उस खण्डहरनुमा मकान में गई थी तभी वहाँ छाई वीरानी और मनहसियत देख कर एकदम सकपका गई थी, मगर करती भी क्या ? उसने धीरे-धीरे अपने आपको वहाँ के बातावरण के अनुकूल बनाना शुरू किया । मनोहर लाल ड्यूटी पर चला जाता तो मनोरमा अपने

बच्चों को लेकर मकान में अकेली पड़ जाती, लेकिन आदत तो डालनी ही थी। इन सबके बावजूद कभी-कभी मनोरमा का दिल पूरी तरह घबराने लगता था। शाम होते ही खण्डहरनुमा उस मकान के वातावरण में एक विचित्र-सी रहस्यमयता छा जाती है। कभी-कभी वह भयानक खामोशी इतनी गहरी हो जाती कि मनोरमा के साथ-साथ उसके बच्चे भी सहमने लगते । आखिर एक दिन नहीं रह गया तो उसने मनोहरलाल से भी कह दिया, इस घर में हमें न जाने कैसा भय का अनुभव होता है । तुम कोई दूसरा ही मकान देखो। तुमको तो बेकार का वहम होता रहता है। मनोहरलाल ने लापरवाही से कहा, भला इस मकान में बुराई क्या है। न मकान मालिक की धौंस सुननी पड़ती है न किराया देना पड़ता है। बिजली-पानी न होने से थोड़ी-सी परेशानी है, लेकिन उसके लिए मैं बराबर कोशिश कर रहा हूँ, जल्दी ही व्यवस्था हो जायेगी। आप समझते क्यों नहीं । मनोरमा झुंझलाकर बोली, मेरे साथ जवान लड़कियाँ भी हैं। सब लोगों से कटकर शहर से इतनी दूर सन्नाटे में आखिर कब तक रह सकेगे ? आज नहीं तो कल बेटियों का ब्याह

भी करना होगा। मनोरमा तरह-तरह से मनोहर लाल को समझाने की कोशिश करती रही, पर वह किसी भी हालत में मुफ्त के उस मकान को नहीं छोड़ना चाहता था। वह मकान काफी लम्बा-चौड़ा रहा होगा किसी जमाने में, लेकिन अब सामने का हिस्सा पूरी तरह खण्डहर में बदल चुका था। पीछे की तरफ कुल बारह कमरे थे, जिनमें से केवल चार कमरे रहने योग्य थे । तीन कमरों का इस्तेमाल किया जा रहा था, चौथा कमरा अलग-थलग होने के कारण मनोरमा ने उसमें फालतू सामान भर दिया था । मकान के जिस हिस्से में वह कमरा था, उधर मनोरमा न स्वयं जाती और न किसी बच्चे को ही जाने देती। मकान के इस हिस्से से उसे बड़ी महीन-सी आवाजें आती महसूस होती। बड़ी ही रहस्यमयी वह आवाज होती थी। कुछ समझ नहीं पाती थी वह, अतः बहुत दिनों तक इसे अपना भ्रमही मानती रही, मगर एक बार उसने स्पष्ट रूप से धुंघरुओं की आवाज सुनी, फिर बड़ी बेटी कल्याणी को भी सुनाई - धुंघरुओं की वह रहस्यमयी आवाज कभी तेज तो कभी धीमी सुनाई पड़ती थी। ऐसा लगता, मानो उस बन्द कमरे में कोई नर्तकी बड़ी तन्यमयता से नाच रही हो। एक रोज शाम को मनोहरलाल आफिस से लौटकर आया तो मनोरमा ने उस कमरे से घुघरुओं की आवाज सुनने की चर्चा की। हमेशा की तरह उस दिन भी मनोरहर लाल ने इसे पत्नी का वहम समझकर कोई ध्यान नहीं दिया था, मगर उसी रात वह स्वयं विस्मित रह गया निस्तब्ध गहरी रात में अचानक मनोहर लाल की नींद उचट गई । उसे लगा जैसे किसी अनजानी-सी आवाज के कारण ही वह जागा हो। उसने अंधेरे में देखने की कोशिश की, मगर कुछ नजर नहीं आया तो उसने फिर आँखे बन्द कर ली और सोने का उपक्रम लगा। दुबारा झपकी आई ही थी कि मनोहरलाल उठ बैठा । वह आवाज इस बार इतनी साफ सुनाई पड़ी थी कि संशय की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। मनोहर लाल टार्च जलाकर उसी आवाज की दिशा में बढ़ने लगा। बो आवाज उसी कमरे से आ रही थी। यद्यपि कमरे के दरवाजे पर ताला लगा था, पर आवाज उसी के भीतर से आ रही थी - इसमें मनोहरलाल को कोई संशय नहीं रहा । मनोहरलाल की इच्छा हुई कि वह कमरा खोलकर देखे कि अन्दर कौन है...वह आबाज कहाँ से आ रही है...लेकिन उस

समय घर में चाबी न होने के कारण वह विवश होकर वापस लौट आया ।
 
रात की घटना की चर्चा मनोहर लाल ने अपनी पत्नी से नहीं की। उसे डर था कि कहीं मनोरमा घबराकर फिर मकान छोड़ने की जिद न करने लगे, लेकिन उसने बहाना बनाकर मनोरमा से उस कमरे की चाभी जरूर ले जी। जैसे-तैसे दिन कटा। शाम होते ही मनोहरलाल बेचैनी से इंतजार करने लगा। आधी रात से ज्यादा रात गुजर गई। मनोहरलाल अपने कमरे में बिस्तर पर पड़ा बेचैनी से करवट बदल रहा था कि अचानक चौंककर उठ बैठा- घंघरुओं की मधुर झंकार सुनाई पड़ने लगी। पहले वह झंकार धीमी रही, फिर तेज हो गई। मनोहरलाल तुरन्त बिस्तर से उठा और टॉर्च लेकर आंगन में निकल आया। ध्यान से उसने सुना, आवाज उसी बन्द कमरे से आ रही थी। मनोहरलाल ने वहाँ पहुँचकर टॉर्च की रोशनी में धीरे से ताला खोलकर दरवाजा ठेला । भीतर गहरा अंधेरा था, इसलिए कुछ सुझाई तो नहीं पड़ा, सिर्फ घुघरुओं की आवाज सुनाई दे रही थी, मगर जैसे ही मनोहर लाल ने कमरे में पैर रखा, अचानक धुंघरुओं की वह मधुर झंकार सोने-चाँदी के सिक्को की लुभावनी खनक में बदल गई। मानो काफी ऊँचाई से सिक्के जमीन पर गिर रहे हो । मनोहरलाल ने टॉर्च की रोशनी में कमरे में देखने की कोशिश की बड़ी बेसब्री से वहाँ काठ-कबाड़ भरा था। फिर उसकी नजर बाईं ओर वाली दीवार पर पड़ी। वहाँ एक बहुत बड़ी आलमारी थी - लगभग चार फुट लम्बा चौड़ा और दो फुट गहरा । आले में एक बड़ा-सा कटोरा रखा था, उसी में न जाने कहाँ से सोने-चांदी के सिक्के गिर रहे थे। उनकी दमक देखकर मनोहरलाल का लालच जाग उठा। टॉर्च जलाए वह काफी देर तक यह अनहोनी अपलक देखता हुआ सोचता रहा - अगर यह दौलत उसे मिल जाये तो कितना अच्छा हो... मन में यह विचार पनपते ही मनोहरलाल बेताबी से उस आले की तरफ लपका, फिर स्तब्ध भाव से ठिठक गया। आले में रखे उस कटोरे में अब सोने-चांदी के सिक्कों के बजाय एक सुन्दर युवती की कांसे की मूर्ति पड़ी थी। बही मूर्ति जो मनोहरलाल ने मुझे दिखाई थी। मनोहरलाल को लगा था कि वह मूर्ति आँखे खोले उसी ओर ताक रही है और उसके होंठ हिल रहे है, जैसे वह कुछ बोलना चाहती हो । कांसा प्रतिमा में जीवन के लक्षण देखते ही मनोहरलाल भयभीत होकर पीछे हट गया । उसी समय एक आवाज सुनाई पड़ी। ऐसा लगा मानों वह आबाज उसी मूर्ति के मुंह से निकल रही है। उस मधुर सुरीले और सम्मोहक नारी स्वर ने पूछा था, "तुमको दौलत

चाहिए...बहुत सारी दौलत...सोना-चाँदी, हीरे-जवाहरात ?" मनोहरलाल ने तुरन्त स्वीकृति में सिर हिला दिया। इसके बाद पलक झपकते वह सारा दृश्य आँखो के आगे से गायब हो गया। मनोहरलाल हड़बड़ाकर बार-बार आँखे मसलता हुआ देखने लगा, लेकिन आलमारी में अब न कटोरा था और न तो वहकांस्य प्रतिमा,बस चारो तरफ गहरी खामोशी छाई थी | मनोहरलाल सोचने लगा शायद उसने सपना देखा है, लेकिन टॉर्च लेकर इस कमरे में उसका आना इस बात का प्रमाण था कि वह किसी आवाज के पीछे ही यहाँ तक चला आया था...यानी वह आबाज...सिक्कों की खनक...नारी मूर्ति.. यह सब सच था ? आखिर कौन थी वह नारी मूर्ति ? इन सबका रहस्य क्या है ?

दूसरे दिन सबेरे जब मनोहरलाल सो कर उठा तो उसका सिर भारी था। रात की सारी घटनाएं उसके मस्तिष्क में अभी तक ताजा थी। उस दिन वह आफिस भी नहीं गया। उसने अपनी पत्नी से कहा कि आज वह उस कमरे की सफाई करेगा ताकि उसका भी इस्तेमाल किया जा सके। मनोरमा का मन तो नहीं हो रहा था कि वह पति को उस कमरे में जाने दे, मगर मनोहरलाल जो कुछ ठान ले, तो उसे रोकना उसके बस में नहीं था। आखिर मनोहर लाल ने वह कमरा खोला और सफाई में जुट गया। उसकी दोनों छोटी बेटियाँ लक्ष्मी और सरस्वती भी अपने पिता की सहायता करने लगी

मनोहरलाल के मन-मस्तिष्क में रात बाली घटना लगातार उथल-पुथल मचाएँ थी । वह अभीतक यह निश्चय नहीं कर पाया था कि रात उसने कोई सपना देखा था या वह सब सच्चाई थी ? उसकी नजर बार-बार उस दीवार की ओर उठ जाती थी, जहाँ उसने सोने-चांदी के सिक्कों को कटोरे में गिरते देखा था। हालांकि इस समय वहाँ कुछ नहीं था, मगर सोने-चांदी के सिक्कों की वह प्यारी-प्यारी खनक अभीतक मनोहरलाल के कानो में गूंज रही थी। अचानक लक्ष्मी चिल्लाई, "बाबू...देखो, इसमें क्या है ?" मनोहरलाल लपककर बेटी के पास पहुँचा, तो देखा वह पीतल की एक छोटी-सी पेटी लिए हुए थी। बिस्मय बिमुग्ध मनोहरलाल वह पेटी खोलते ही चौंक पड़ा, "अरे यह तो हार है हीरे का हार" फिर वह खुशी के मारे चिल्लाने लगा, अरे मनोरमा तुम कहाँ हो ? देखो तो हमें कितना कीमती हार मिला

मनोरमा हांफती हुई आई तो उस हार को देखकर उसकी आँखे फैल गई। अविश्वास भरे स्वर में उसने पूछा, कहाँ मिला यह ? उसी कमरे में । मैं, लक्ष्मी और सरस्वती उस कमरे की सफाई कर रहे थे कि अभी मनोहरलाल की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सरस्वती की कातर चीख सुनाई पड़ी, बाबू लक्ष्मी के सिर से खून निकल

मनोहरलाल दौड़ता हुआ मनोरमा के साथ उस कमरे में पहुंचा तो सरस्वती ने बताया कि सफाई करते-करते पता नहीं कैसे लक्ष्मी ठोकर खाकर गिर पड़ी और सिर से खून निकलने लगा । अत्यधिक रक्तस्राव से आस-पास की जमीन लाल हो उठी थी। बेटी को अचेत देखकर मनोरमा घबरा उठी। मनोहरलाल ने लक्ष्मी को डॉक्टर के यहाँ ले जाने के लिए उठाया, पर दवा-दारू का मौका ही नहीं मिला । लक्ष्मी ने पिता की गोद में ही दम तोड़ दिया। कुछ क्षण पहले एक बहुमूल्य हार मिलने से

खुशी की जो लहर आई थी, वह लक्ष्मी की मृत्यु के कारण दु:ख के सागर में खो गई । घर में मातम छा गया। लक्ष्मी की मृत्यु से मनोरमा बुझ-सी गई । न जाने क्यों उसके मन-मस्तिष्क में एक गांठ-सी पड़ गई । हीरे के कीमती हार का मिलना उसको अशुभ लगने लगा, जिसने उसकी बेटी की जान ले ली थी। उसने बहुत चाहा कि मनोहरलाल हार को न बेचे, बल्कि उसे फेंककर इस अशुभ हार से छुटकारा पा लें, मगर मनोहरलाल के विचार से हाथ आयी दौलत को ठुकराना सिर्फ बेवकूफी थी वह बम्बई जाकर उस हार को जौहरी बाजार में बेच आया। पूरे दो लाख रूपये मिले थे।

लड़कियों में सबसे बड़ी कृष्णा थी, फिर लक्ष्मी, उसके बाद सरस्वती और सबसे छोटी बसन्ती । उस समय कृष्णा की उम्र अट्ठारह के आस-पास थी। मनोरमा की इच्छा थी कि अब जल्दी से जल्दी कृष्णा का विवाह हो जाये। मनोहरलाल भी चाहता था कि बेटियों के कर्ज से जितनी जल्दी मुक्ति पा जाये, अच्छा है। फिर अब तो उसके पास मोटी रकम भी थी। थोड़ी-सी दौड़-धूप के बाद एक जगह शादी पक्की हो गई। लड़का बकालत पड़ रहा था। घर परिवार भी अच्छा था। दोनों तरफ शादी की तैयारियाँ होने लगी। काफी रूपये खर्च हुए। मनोहरलाल सोचने लगा, अगर उसे हार न मिला होता तो वह बेटी की शादी के लिए कहाँ से इतनी रकम लाता ? घर की लक्ष्मी तो चली गई थी, मगर खजाने की लक्ष्मी ने उसके घर का दरवाजा देख लिया था। अचानक शादी के एक दिन पहले पचास हजार की लाटरी निकल आई अब तो खुशी के मारे उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। वह इन सबको भगवान की कृपा समझ रहा था, मगर मनोरमा के हृदय पर एक बोझ-सा लदा था। वह इस प्रकार अचानक मिलने वाली दौलत से सहम गई थी, लेकिन अपने पति से कुछ कह भी नहीं सकती थी। धीरे-धीरे बिवाह का दिन आ गया । शाम होते-होते बारात आ गई। मनोहरलाल ने उस खण्डहर की मरम्मत करवाकर आलीशान मकान का रूप दे दिया था। इसके लिए उसने काफी रूपये खर्च किये

थे, उस दिन वह आलीशान मकान दुल्हन की तरह सजा था। कृष्णा भी दुल्हन बनी, आने वाले क्षणों के जादू में खोई हुई थी। मनोहरलाल ने दोनों हाथ खोलकर दहेज दिया था। लोग उसकी दरियादिली पर हैरान थे कि आखिर चार-चार बेटियों की जिम्मेदारी के बावजूद वह पहली बेटी की शादी इतनी धूमधाम से कर रहा है? अन्तत: विवाह सम्पन्न हो गया। मनोहरलाल और मनोरमा ने आशीर्वाद और आंसुओं के साये में कृष्णा को गले लगाकर बिदा कर दिया, मगर बारात जाने के कुछ क्षण बाद हृदय विदारक खबर सुनने को मिली थी जिस कार में दूल्हा-दुल्हन बैठे थे, उसका एक्सीडेण्ट हो गया...दूल्हे को तो मामूली ही चोट लगी थी, पर कृष्णा की तत्काल मृत्यु हो गई। जिस घर में क्षण भर पहले शहनाई बज रही थी, वहाँ अकस्मात् मातम छा गया। मनोहरलाल को इस घटना से गहरा धक्का लगा। लोगों की सहानुभूति जैसे उसका दुःख और बढ़ा ही रही थी। आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मनोरमा जिस भय और आशंका से व्याकुल थी, उसी ने अचानक मनोहरलाल को भी दबोच लिया। मनोरमा तो जैसे विक्षित हो उठी थी। क्रोध से वह पति पर बरस पड़ी, "आप यही दौलत चाहते थे न, जो इस घर-परिवार में मौत का जहर फैला दे ? और अगर ऐसा नहीं चाहते तो जला क्यों नहीं देते ऐसी दौलत को, जिसने हमारी हंसती-खेलती दो बेटियों को निगल लिया।" कैसी बातें कर रही हो, मनोरमा? मनोहरलाल ने पत्नी को समझाने की कोशिश की, भला मौत और जिन्दगी से इस दौलत का क्या सम्बन्ध है? एक तरफ तो तुम कहती हो कि जिन्दगी और मौत ईश्वर

के हाथ में है और दूसरी ओर तुम्हारीशंका का यह हाल है कि बेटियों की मृत्यु की जिम्मेदारी इस दौलत को ठहरा रही हो, जिसने हमारी सारी दरिद्रता दूर कर दी...हमारी जिन्दगी में सारे सुख भर दिये...सारी परेशानियों समाप्त कर दी...।
 
आखिर आप मेरी बात समझते क्यों नहीं कि इस घर पर मनहसियत का साया है, जो मेरी बेटियों का खून चूस रहा है। मनोरमा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ, ईश्वर के लिए अब इस

मकान को छोड़ दीजिए। हम कहीं और चलकर रह लेंगे, लेकिन.... नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। मनोहरलाल तैश में आकर बोला - "मैंने इसे खण्डहर से महल बनाया है। इस पर काफी रूपये खर्च हुए हैं मेरे, अब मैं इसे कभी नहीं छोडूंगा। तुम कान खोलकर सुन लो, अब यह मेरी जायदाद है। और मनोरमा को रोता छोड़कर वह बाहर निकल गया। इसके बाद मनोरमा ने अपने हृदय पर पत्थर रख लिया और अधिक से अधिक समय पूजा-पाठ में बिताने लगी।

एक रोज आधी रात को अचानक मनोहरलाल की नींद खुल गई। लगा जैसे कोई रहस्यमयी अदृश्य शक्ति उसको उसी कमरे की ओर खींच रही है। वह अपने बिस्तर से उठा और यंत्रचालित सा उस कमरे में जा खड़ा हुआ । उसने विस्मय से देखा - इस समय भी आलमारी में बही कटोरा पड़ा था और कांसे की वह रहस्यमयी नारी-मूर्ति भी उसी में पड़ी हुई थी। मनोहरलाल ने इस बार अनुभब किया कि वह मूर्ति बिल्कुल सजीब लग रही थी, जैसे कांसे की न होकर हाड़-मांस की हो। उसकी छोटी-छोटी आँखे नागिन की तरह चमक रही थी और उस चमक में एक ऐसा विचित्र-सा सम्मोहन था, जिसके वशीभूत होकर मनोहरलाल जड़वत् खड़ा ही रह गया। उसी समय सरसराती हुई वह रहस्यमयी आवाज कमरे में गूंज उठी, "तुमको और दौलत चाहिए ?" हाँ ! मनोहरलाल के मुँह से अपने-आप निकल गया और वहन चाहते हुए भी एक बार फिरदौलत के लोभ में अपने खून का सौदा कर बैठा । अनजाने ही फिर उसी सम्मोहन की स्थिति में चलता हुआ अपने कमरे में लौट आया। दूसरे दिन सबेरे अपने सिरहाने मूल्यबान हीरे-मोतियों की माला देखकर स्तब्ध हो गया मनोहर लाल - उसका अनुमान विश्वास में बदल गया कि इस प्रकार दौलत मिलना उस मूर्ति का ही चमत्कार है। इसके साथ ही मनोहरलाल का ध्यान कृष्णा और लक्ष्मी की आकस्मिक मृत्यु की ओर चला गया। उसे

भी एक बार डर लगा कि दोनों लड़कियों की मृत्यु क्या इस दौलत के ही कारण हुई है यानी यह दौलत खून की प्यासी है? उसकी नजर हीरे-मोती की उस माला पर टिक गई। उसका हृदय भय से कांप उठा सहमकर वह मन ही मन बुदबुदाया, "नहीं-नहीं, अब ऐसा नहीं होना चाहिए।" दूसरे ही क्षण उसने सिर झटककर इन विचारों को मस्तिष्क से बाहर निकाल दिया और वहमुल्य माला उठाकर जेब में डाल ली। धीरे-धीरे दो दिन गुजर गये। इस बीच न कोई दुर्घटना हुई, न कोई अनहोनी। उसे लगा कि वे सब बातें उसके कमजोर मन का वहम भर थी, वरना बेटियों की मृत्यु का इस दौलत से कोई सम्बन्ध नहीं है और एक दिन वह इस हार को भी बेचने के लिए बम्बई रवाना हो गया। उन दिनों मनोरमा की तबीयत खराब थी, इसलिए घर-गृहस्थी का सारा काम-काज सरस्वती और उसकी छोटी वहन नर्मदा मिलजुल कर करती थी। रोज की तरह उस दिन भी दोनों खाना बना रही थी, उसी समय न जाने कैसे अचानक आग लग गई। देखते-ही-देखते पूरा रसोई घर लपटों से घिर गया। दोनों लड़कियाँ लपटों से घिर गयी। दोनों लड़कियाँ चीखने-चिल्लाने लगीं। लोग उन्हें बचाने के लिए दौड़ पड़े, मगर जो होना भी वह होकर रहा । सरस्वती और नर्मदा जलकर राख हो गई। मनोहरलाल हार बेच कर बम्बई से लौटा तो घर में कुहराम मचा था । मनोरमा की चीखों से बातावरण गूंज रहा था । वह बार-बार अपना सिर दीवार पर पटकने लगी इस आघात ने उसे जैसे

पागल बना दिया था। मनोहरलाल भी दोनों बेटियों की लाशें देखकर सकते में आ गया । जेब में पड़ा चार लाख रूपये का बैंक ड्राफ्ट सांप-बिच्छओं की तरह इंक मारने लगा। उसने तुरन्त निर्णय लिया कि अब अपने बेटों और पत्नी को लेकर तुरन्त इस घर को छोड़कर कहीं और चला जाएगा, मगर क्या वह ऐसा कर सका ? नहीं। रात में फिर बही रहस्यमयी अदृश्य शक्ति मनोहरलाल को उस अंधेरे कमरे में खीच ले गयी, किन्तु उस रात मनोहरलाल में जाने कहाँ से इतना आत्मबल आ गया था कि वह आलमारी के सामने पहुँचते ही हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, भगवान के लिए अब मुझे और मेरे बचे-खुचे परिवार को इस जाल से मुक्त कर दो। मुझे नहीं चाहिए धन-दौलत अब हमें जान बचाकर चले जाने दो यहाँ से मैं यहाँ और नहीं रहना चाहता, हर्गिज नहीं। अचानक मनोहरलाल की बात बीच में ही काटकर उस अंधेरे कमरे के निस्तब्ध बाताबरण में सरसराती हुई आवाज गूंजने लगी - "अब इस मायाजाल से मुक्त होना आसान नहीं है। मैं दो सौ बर्ष से इस समय का इंतजार कर रही थी। मुझे जीवन पाने के लिए मानव रक्त की जरूरत थी। मैं जिस दौलत की मालकिन है उसके बदलने में मैंने तेरे और तेरे परिवार के लोगों के रक्त का सौदा कर लिया है। अब तू तब तक यहाँ से नहीं जा सकेगा, जबतक मुझे पूरा जीवन नहीं मिल जाता।" यह सुनते ही मनोहरलाल डर के मारे कांपने लगा। अब वह समझ रहा था कि अनजाने में उससे कितनी बड़ी भूल हो गई थी। काश ! वह अपनी पत्नी की बात मानकर शुरू-शुरू में ही यह घर छोड़ देता तो इतनी विपत्ति न सहनी पड़ती, मगर अब क्या हो सकता था ? दूसरे ही दिन मनोहरलाल पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। उसके चारों लड़के रात को खा-पीकर अच्छे-भले सोए थे, लेकिन सबेरे सब बिस्तर पर मरे पाये गये। मनोरमा तो पहले से ही विक्षिप्तावस्था में थी, इस घटना ने मनोहरलाल को भी पागल बना दिया। उसने पत्नी का हाथ पकड़ा

और खींचता हुआ बाहर भागा। घर से निकलते ही उसने जेब से बैंक ड्राफ्ट निकालकर फाड़ डाला मगर उससे कोई लाभ नहीं हुआ। रास्ते में ही मनोरमा ने भी दम तोड़ दिया। मनोहरलाल फटी फटी आँखो से धूल में पसरे पत्नी के निर्जीव शरीर को देखता रहा, फिर उसे बहीं छोड़कर वह लड़खड़ाते कदमों से भाग निकला। सारी कथा सुनकर मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि उस खण्डहर में निश्चय ही कोई अभिशप्स खजाना छिपा हुआ है और उसकी सुरक्षा के लिए कोई विशेष तांत्रिक क्रिया भी की गई है। कौन-सी क्रिया की गई है - इसे समझने के लिए मैंने वह मूर्ति अपने पास रख ली और तीन दिन बाद आने के लिए कहकर उस समय मनोहर लाल को बिदा कर दिया। उसके जाने के बाद मैंने एक बार फिर उस

मूर्ति को ध्यान से देखा । इस बार बिल्कुल सजीब लगी वह मूर्ति । एक पल के लिए लगा कि वह अपनी बन्द आँखे धीरे-धीरे खोलेगी और मेरी ओर देखेगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
 
क्या सचमुच यह मूर्ति बार-बार मनोहरलाल के पास बापस लौट आती है ? रह-रहकर यही प्रश्न मेरे मस्तिष्क को मथे डाल रहा था। आखिर नहीं रहा गया तो बास्तविकता को परखने के लिए मैं उस मूर्ति को ले जाकर गंगा की बीच धारा में डाल आया। उस रात ठीक से नींद भी नहीं आई मुझे । सारी रात मनोहरलाल के ही विषय में सोचता रहा मैं । भोर के समय थोड़ी-सी झपकी लगी तो उसी तन्द्रिल अवस्था में मैंने एक अनुपम छवि देखी। वह छवि एक सुन्दर लावण्यमयी युवती की थी। मेरे सामने खड़ी मन्द-मन्द मुस्करा रही थी बहू । बड़ी ही लुभावनी मुस्कान थी उसकी। उसने मुझसे पूछा, "क्या आपने मुझे पहचाना?" असमंजस में पड़ गया मैं । चेहरा थोड़ा जाना-पहचाना सा अवश्य लगा, लेकिन उतने से ही हाँ कहा नहीं जा सकता था, इसलिए तुरन्त कुछ बोला नहीं गया मुझसे। बस, मुंह बाए देखता ही रह गया मैं उस तवंगी को। शायद मेरे मन का भाव समझ गई। थोड़ा-सा हंसकर बोली, "कैसे पहचानेंगे? अगर पहचानते ही होते तो इतनी निर्दयता से पानी में क्यों फेंक आते। एक साधक को इतना निर्दयी नहीं होना चाहिए

यह सुनकर चौंक पड़ा मैं एकबारगी। कहीं वह रहस्यमयी मूर्ति ही तो नहीं सजीव होकर खड़ी है मेरे सामने ? हाँ यही तो है। दोनों के चेहरे में कहीं कोई बैषम्य नहीं था..मगर यह सम्भब कैसे हुआ? एक अनजाना सा भय समा गया मेरे भीतर । मैंने कुछ तोलना चाहा...कुछ कहना चाहा, मगर इसके पहले ही वह युवती किसी राजमहिषी के तरह धीरे-धीरे चलती हुई मेरे पास आ खड़ी हुई । मेरे । नासापुट एक सर्वथा अपरिचित किन्तु सुगन्ध से भर गये । मैंने पूछा, "कौन है, आप क्या चाहती है, मुझसे ?" मेरे प्रश्नों के उत्तर में उस युवती ने जो कुछ बताया, उसे सुनकर स्तब्ध रह गया मैं । छत्तीसगढ़ के जिस इलाके में मनोहरलाल रह रहा था, वह लगभग दो सौ वर्ष पहले भील जाति के एक जमींदार के

अधिकार में था, जिसका नाम था वामन देव । वह शैव सम्प्रदाय का तंत्र साधक और दन्तेश्वरी देवी का उपासक था। अपनी इष्ट देवी को प्रसन्न करने के लिए वह उन तंत्र साधक दीपावली की रात नर बलि भी दिया करता था और नर रक्त से ही भगवती दन्तेश्वरी का पूजन करता था। बामदेव की इकलौती बेटी थी चित्रांगदा - उम्र लगभग सोलह वर्ष अपूर्व रूप-सौन्दर्य और यौवन की स्वामिनी थी वह । लम्बा-छरहरा कद, गौर वर्ण, नुकीले नासिका, बड़ी-बड़ी स्वप्निल आँखे और नितम्बों को छूती घनी काली केश-राशि । सचमुच चित्रांगदा अनिंद्य रूपसी युबती थी। उसे जो भी देखता- बस देखता ही रह जाता । इकलौती संतान होने के कारण वामदेव चित्रांगदा को अत्यधिक स्नेह करता था। बामदेव के खजाने में अकूत सम्पत्ति थी और तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर हलमिलटन की नजर गिद्ध की तरह उसके खजाने पर लगी हुई थी। उसे हथियाने के लिए वह नित नयी-नयी चालें भी चल रहा था

बामदेव को इस बात का पता था। इसलिए अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा के संबंध में उसे बराबर चिंता बनी रहती। आखिर जब कोई उपाय नहीं सुझाई पड़ा तो उसने अपने तांत्रिक गुरू को सारी समस्या बतायी । बामदेव का गुरू भयंकर कापालिक था और उन दिनों नर्मदा तट पर कुटिया बनाकर रह रहा था। उसने बामदेव से पूछा, उसकी सबसे प्रिय बस्तु क्या है ? छूटते ही बामदेब ने जबाब दिया, मेरी बेटी चित्रांगदा...और उसके बाद है मेरी सम्पत्ति । गुरु ने पूछा, क्या तुम धन की ही तरह चित्रांगदा को भी नहीं सुरक्षित करना चाहते ? चाहता हूँ, गुरूदेव ! चित्रांगदा मुझे प्राणों से भी प्रिय है। मुझे तो हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं

मेरी पुत्री पर म्लेच्छों की कामुक दृष्टि न पड़ जाय । तो ठीक है । तुम्हारे धन की रक्षा चित्रांगदा करेगी और चित्रांगदा की रक्षा करेगा धन । वह कैसे गुरूदेव ? बामदेव ने अचकचाकर पूछा, मैं कुछ समझा नहीं।

कापालिक गुरू ने जो उपाय बताया, उसे सुनकर बामदेब एक बार तो बिचलित हो उठा, फिर उसने अपने गुरू की बात मान ली। आखिर वह उपाय क्या था ? वह उपाय था धन की सुरक्षा के लिए कोमलांगी चित्रांगदा की बलि । कापालिक गुरू की योजनानुसार काले पत्थर का एक काफी लम्बा-चौड़ा बक्सा बनवाकर उसमें कोषागार का सारा धन रख दिया, फिर अमावस की काली अंधेरी रात में उसी के ऊपर चित्रांगदा की बलि दे दी गई। इतना ही नहीं, धन की सुरक्षा अक्षुण्ण बनी रहे और चित्रांगदा की आत्मा भी कहीं भटकने न पाये, इसके लिए उस कापालिक ने तांत्रिक विधि से चित्रांगदा की कांसे की मूर्ति बनवाकर तांत्रिक विधि से उसी जगह स्थापित कर दिया था। कापालिक गुरु ने बामदेव से कहा था कि जब चित्रांगदा की आत्मा को एक ही परिवार के दस प्राणियों का रक्तपान करने को मिलेगा, उसी समय उसकी आत्मा इस बंधन से मुक्त होकर पुनर्जीवन प्राप्त कर सकेगी। उस रहस्यमयी अपरचिता के मुँह से यह सब सुनकर भय और रोमांच के मिले-जुले भाब से सिहर उठा मेरा मन और उसी स्थिति में अपने-आप न जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया, क्या तुम्हीं चित्रांगदा की आत्मा हो? हाँ ! मैं ही चित्रांगदा की अतृप्त आत्मा हूँ। मेरी ही बलि दी गई थी धन की सुरक्षा के लिए और उसी धन का प्रलोभन देकर मैंने ही मनोहरलाल के परिवार के लोगों का रक्तपान किया है...मगर मुझे प्रेतयोनि से मुक्ति और पुनर्जीवन तभी मिलेगा, जब मैं मनोहरलाल का भी रक्तपान कर लूंगी। बात पूरी करते ही वह रहस्यमयी युवती गायब हो गयी। इसके साथ ही मेरी आँख भी खुल गयी। देखा तो सवेरा होने ही वाला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि रात में मैंने जो कुछ स्वप्न के रूप में देखा और सुना था, उसने मुझे बुरी तरह बिचलित कर दिया। मस्तिष्क में बार-बार एक ही प्रश्न उभरने लगा - क्या मनोहरलाल की भी बही दशा होगी, जो उसके परिवार की हुई है... क्या मनोहरलाल भी जीवित नहीं रहेगा? पुरा दिन उसी के इंतजार में बीत गया। दूसरे दिन भी नहीं आया वह । आखिर क्यों नहीं आया? क्यों... नहीं ! नहीं ! ऐसा नहीं हो सकता । वह आयेगा अवश्य ! कहीं किसी काम से रूक गया होगा। मगर जब दो दिन और बीत गये तो धीरे-धीरे स्वप्न की सत्यता पर विश्वास होने लगा मुझे, फिर अखबार में मनोहरलाल की मृत्यु का समाचार पढ़कर मैं एकदम स्तब्ध रह गया । वह सड़क पार करते समय एक ट्रक की चपेट में आ गया था । बड़ी ही हृदयविदारक मृत्यु हुई थी उसकी । सारा शरीर चिथड़े-चिथड़े हो गया था और काफी दूर तक खून-ही-खून फैला था । समाचार में बताया गया

था कि मृतक के पास कांसे की एक मूर्ति के अलावा और कुछ नहीं था।
 
अध्याय १२ पिशाच लोक की सुन्दरी

आपने भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र से संबंधित कई कहानियाँ पढ़ी होंगी, मगर जो, मैं इस समय सुनाने जा रहा हूँ उन सबसे अलग है। काशी के अधिकांश मुहल्ले किसी समय बंगाली शाक्त साधकों के गुप्त केन्द्र थे । बंगाली टोला तो शाक्त कापालिकों का प्रसिद्ध स्थान माना ही जाता था। वे शाक्त कापालिक अपनी इष्ट देवी को प्रसन्न कर अलौकिक तांत्रिक सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए दीपावली की रात में गुप्त रूप से बलि भी दिया करते थे। इसे पूर्व जन्म का संस्कार ही समझना होगा कि मैं इस प्रकार गुम रूप से निवास करने वाले तंत्र साधकों की खोज में शुरू से ही उन मुहल्लों की संकरी, गन्दी और धूल से भरी गलियों का बराबर चक्कर लगाया करता था। मैं उन साधकों से मिलकर उनकी गुस तांत्रिक क्रियाओं से भली-मांति परिचित होना चाहता था, साथ ही उनकी मति-गति को भी समझना चाहता था। तंत्र बड़ी ऊँची विद्या है। इसकी साधना भी बड़ी कठिन, गम्भीर और सबके वश की नहीं है। सबको इसमें सफलता भी नहीं मिलती। तंत्र का अपना विज्ञान भी है। जो उसके विज्ञान को भली-भांति समझते हैं, वही तांत्रिक साधना कर सकते है और उसमें सफलता भी प्राप्त कर सकते हैं। वैसे तो सभी साधनायें शक्ति की साधना है, मगर साधक और शक्ति के बीच देवता माध्यम होते हैं। वे शक्ति के वाहक का काम करते हैं। पर तांत्रिक साधना में किसी भी देवता की मध्यस्थता की जरूरत नहीं पड़ती। तांत्रिक साधना एकमात्र शक्ति साधना है। शक्ति से सीधा संबंध है तंत्र का, इसीलिए तांत्रिक साधना काफी खतरनाक समझी जाती है। जरा सी भूल या लापरवाही प्राण घातक सिद्ध होती है। हर क्षण प्राण संकट में रहता है। सच तो यह है कि तांत्रिक साधना तलवार की तीखी धार पर रखी शहद की बूंद के समान है। चाहो तो उसे चाटो, मगर साथ ही जीभ भी चिर जायेगी। शहद का स्वाद ले लिया जाये और जीभ भी न चिरे यह कौशल होना चाहिए और यह कौशल एकमात्र सद्गुरू ही बतला सकता है। तंत्र के अंतर्गत ६४ विद्यायें है, जिनमे एक है हाकिनी विद्या । यह घोर तामसिक और अत्यन्त भयंकर विद्या है। इस विद्या की साधना करने से बड़े-बड़े तांत्रिक भी घबराते है। यह है भी ऐसीही प्राणघातिनी साधना । जरा-सी भी गलती हुई कि प्राण संकट में । पग-पग पर मौत का भय बना रहता है। सन् १९५० में जब मैं तंत्र विद्या पर व्यक्तिगत रूप से शोध और खोज कार्य कर रहा था, उस समय मुझे इसी हाकिनी विद्या से संबंधित एक दुर्लभ पाण्डुलिपि मिली थी। उन दिनों मेरे एक तांत्रिक मित्र

थे । नाम था रामचंद्रा । वह तैलंगी ब्राह्मण थे। जब मैंने उनसे इस विद्या की चर्चा की तो उन्होंने बतलाया कि हमारी धरती के प्राणियों का सबसे निकट संबंध जिस लोक से है वह है तामसिक लोक । पृथ्वी जिस आकाशगंगा की परिधि में है उसी में इस लोक का बिस्तार है। तामसिक लोक चार भागों में विभक्त है। पहला भाग ब्रह्म राक्षसों और ब्रह्म पिशाचों का है। दूसरा भाग पिशाचो और बेतालो का है। तीसरे भाग में लम्बी आयु वाली प्रेतात्माएं रहती है। और चौथे भाग में हाकिनी, डाकिनी, शाकिनी आदि तामसिक शक्तियाँ निवास करती हैं। ये अति भयंकर

शक्तियाँ है। प्राकृतिक नियमों में विकृति पैदा कर ये धरती पर भारी उत्पात करती है। भयंकर दुर्घटनाओं, समुद्री तूफानों, प्रलयकारी झंझावातों का मुख्य कारण ये ही होती है। युद्ध और महामारी इनके प्रिय विषय है। वे हमेशा खून की प्यासी रहती है । जहाँ कहीं सामूहिक रक्तपात होता है, वहीं वे अपने समाज के साथ पहुंच जाती है। इतनी ही नहीं वे किसी भी प्राणी का रूप धारण कर संसार में विचरण कर सकती है और किसी भी मृत स्त्री के शरीर में प्रवेश कर उसकी आयु भोग सकती है। मगर कोई उन्हें न पहचान सकता है और न तो समझ ही सकता है। इसी प्रसंग में रामचंद्रा ने मुझे बताया कि बंगाली टोला में एक अधेड़ उम्र की बंगालिन रहती है, जो मुहल्ले भर में मोना बाई के नाम से प्रसिद्ध है। दिन में वह बगल में फटी-पुरानी कथरी दबाये हाथ में टीन का डब्बा लिए पागलों की तरह घूमती है और भीख मांग कर खाती है। लोग उसे एक पागल भिखारिन के सिवाय और कुछ नहीं समझते। मगर शर्मा जी, जानते हैं आप...रामचंद्रा जरा गम्भीर स्वर में बोले, उस भिखारिन की देह औरत की है - यह सच है, पर उसके भीतर मोना नहीं बल्कि एक डाकिनी निवास करती है। आपकी बात समझा नहीं मैं । क्या कहना चाहते हैं आप? आज से चालीस साल पहले इसी बंगाली टोला मुहल्ले में एक तांत्रिक रहा करते थे। नाम था कालिकानन्द अवधूत । वह उच्चकोटि के साधक थे। उनके यहाँ एक लड़की थी। नाम था मोना । बड़ी सुन्दर और आकर्षक थी वह । अवधूत महाशय उसे कलकत्ता के किसी अनाथालय से लाये थे। मोना उस समय १२ साल की थी। उन्होंने विधिवत उसे तंत्र पीठिका की दीक्षा दी । दीक्षा प्राप्त करते ही बारह वर्षीया मोना के चेहरे पर एक दिव्य आभा उतर आयी। रोम-रोम अनिर्वचनीय शक्ति से भर उठा । फिर वह सहज नहीं रही। उसके बाद अवधूत शाक्त मार्ग से डाकिनी विद्या की साधना करने लगे और माध्यम बनी मोना । मगर अवधूत महाशय साधना में असफल रहे । न उनकी साधना सफल हुई और न सिद्धि मिली। साधना के अन्तिम चरण में जिस क्षण मोना के शरीर में मंत्र से आकर्षित और तांत्रिक क्रियाओं के वशीभूत डाकिनी ने प्रवेश किया, उसी क्षण मोना की मृत्यु हो गयी। शायद डाकिनी की अदम्य शक्ति को मोना की आत्मा सहन न कर सकी। तभी से मोना के शरीर में वह डाकिनी निवास कर रही है। इस रहस्य को केवल कालिकानन्द अवधूत ही जानते थे। बाद में उन्होंने मुझे बताया। इतना कहकर रामचंद्रा चुप हो गये । उनके चेहरे के भाव से ऐसा लगा कि बे इस संबंध में मुझको और कुछ नहीं बताना चाहते हैं। सहसा विश्वास नहीं हुआ रामचंद्रा की बातों पर । मेरी अपनी दृष्टि है। अपना विचार है। अपना सिद्धान्त है। मगर एक रात मैंने जो कुछ देखा, उसने मुझे एकबारगी स्तब्ध कर दिया। फिर तो विश्वास करना ही पड़ा मुझे। मोना अहिल्या बाई घाट के ऊपर एक छोटी सी कोठरी में रहती थी। कार्तिक का महीना था। हल्की गुलाबी ठंड पड़ने लगी थी। सारा वातावरण अन्धकार में डूबा हुआ था। जब मैं उस संकरी गली में घुसकर मोना की कोठरी के सामने पहुँचा तो देखा, दरवाजा बन्द था, मगर भीतर रोशनी थी। जब मैंने दरवाजे की फांट से झांक कर देखा तो मेरे होश उड़ गये । सारा शरीर कांपने लगा। उस ठंड में भी मैं पसीने से भींग उठा। मोना का शरीर दरी पर निश्चेष्ट पड़ा था और उसके निकट एक षोड़शी युवती खड़ी थी। हे भगवान !

"

एक नारी में इतना सौन्दर्य, उतना लावण्य और इतना आकर्षण कल्पना भी नहीं की जा सकती। निश्चय ही वह मानवेतर सौन्दर्य था।

एकाएक फटाक से दरवाजा खुला। मैं तुरंत वहाँ से हट गया। युवती बाहर निकली और घाट की सीढ़ियाँ उतरने लगी जल्दी-जल्दी। उसके बाद मैंने उस हल्के अंधेरे में जो कुछ देखा, क्या आप उस पर विश्वास करेंगे ? आप जो भी सोचे या समझें, मगर सत्य तो सत्य ही है। आत्मपरक सत्ता में निहित सत्य पहले अविश्वसनीय लगता ही है। उसको सिद्ध करने के लिए कोई भौतिक प्रमाण नहीं दिया जा सकता। मैंने देखा- नीचे घाट पर पहले से ही कुछ युवतियाँ खड़ी थी। वे शायद मोना की ही प्रतीक्षा कर रही

थीं।

मोना की कोठरी से निकलने वाली युवती जब उनसे मिली तो वे सब एक साथ खिलखिलाकर हँसने लगी। बड़ी मधुर, बड़ी कोमल और सरस हंसी थी वह । फिर सभी युवतियाँ एक साथ थोड़ी दूर तक

आकाश में उठी, फिर एक साथ हबा में विलीन हो गयी। मैं स्तब्ध अबाक देखता रहा। कौन थी वे युवतियाँ ? कहाँ गयीं वे सब ? किसी प्रकार अपने अवश चित्त को संभालता हुआ घर पहुंचा। उस समय सबेरा होने ही वाला था।

रामचंद्रा से मिलकर सारी बातें बता दी। रामचंद्रा बोले, डाकिनियाँ पिशाच लोक की सुन्दरी होती है। मोना के शरीर में जो डाकिनी है, वह उस समय अपने निज लोक के निज शरीर में थी। उसकी बे साथिनें भी पिशाच लोक की सुन्दरियाँ ही थी। वे सब आकाशमार्ग द्वारा पृथ्वी पर बिचरण किया करती हैं। उनका शरीर पार्थिव होते हुए भी साधारण दृष्टिपथ से परे रहता है। सभी उन्हें नहीं देख सकते। बड़े आश्चर्य की बात थी। सब कुछ रहस्यमय था । अविश्वसनीय था । अन्त में रामचंद्रा बोले, पृथ्वी उन सुन्दरियों का आखेट-स्थल है। प्रकृति में विकृति पैदा करके वे अपना मनोरंजन करती है। इसके अलावा स्वस्थ-सुन्दर युवकों के साथ अदृश्य रूप से सहवास कर अपनी बासना की पूर्ति करती है। यदि पिशाच लोक की ये सुंदरियाँ सिद्ध हो जाये तो मनुष्य उनकी सहायता से असम्भव से असम्भव कार्य कर सकता है। शायद इसी उद्देश्य को लेकर कालिकानन्द अवधूत महाशय डाकिनी विद्या की साधना कर रहे थे। दो-तीन दिन बाद अचानक मोना मुझे दिखाई पड़ गयी । कथरी लपेटे हाथ में टीन का डब्बा लिए वह लाई-चूड़ा की दूकान पर खड़ी खी-खी हँस रही थी उस समय । मैं करीब जाकर खड़ा हो गया। उसने एक बार गहरी नजरों से मेरी ओर देखा, फिर अचानक जोर-जोर से हंसने लगी। मैंने धीरे से कहा, "दारू पीयेगी, मोना"? यह सुनते ही मोना का हंसना बन्द हो गया। बोली, पिलायेगा ?
 
हाँ, चल ! अभी पिलाऊँगा। मैं उसे अपने घर ले आया। उसके सामने शराब की बोतल रख दी । मोना शराब पीने लगी। एक बोतल... दो बोतल... फिर तीसरी बोतल भी उसने एक ही सांस में खाली कर दी। देशी शराब, मगर नशा नाम मात्र का नहीं । न आँखे लाल हुई और न जबान ही लटपटायी मोना की। बास्तबिक स्थिति समझ गया मैं । मोना की पार्थिव काया में बैठी उसी डाकिनीने सारी शराब पी थी | मैं यही चाहता भी था। मोना बोली, "काफी दिनों बाद शराब पीने को मिली।"

और पीयेगी? फिर दो बोतल शराब और पी डाली मोना ने । उसी दिन से मोना के पीछे पड़ गया मैं । काश ! पीछे न पड़ा होता तो मेरी इतनी दुर्दशा न होती। मगर कैसे न पड़ता ? डाकिनी सिद्धि का चक्कर जो था । अपने आप में अलौकिक शक्तियों को भरने की ऊँची उड़ान जो थी। मैं रोज मिलने लगा मोना से। उसको खुश करने के लिए कभी शराब, कभी भुना हुआ गोश्त और कभी मिठाई ले जाता साथ । एक दिन काफी प्रसन्न दिखाई पड़ी वह । बोली, "तू मेरे पीछे क्यों पड़ा है ? आखिर क्या चाहता है? बाल ?' डाकिनी सिद्धि चाहता हूँ मैं । मैं हठात् कह बैठा।। डाकिनी सिद्धि ... कैसी सिद्धि .. समझी नहीं मैं । बनो मत, मोना । मैं तुम्हारे असली रूप से परिचित हो चुका हूँ । कोई रहस्य मुझसे छिपा नहीं है । तुम कौन हो.. यह भी मैं भली-भाँति जान गया हूँ। मोना का चेहरा बीभत्स और विकृत हो उठा। तू डाकिनी है। पिछले ४० साल से तू मोना की देह में अधिकार जमाये बैठी है। मोना एकबारगी चीख उठी। उसकी आँखे लाल हो उठी। उस दिन से मोना से मिलना-जुलना बन्द कर दिया मैंने । डाकिनी विद्या से संबधित पाण्डुलिपि तो थीही मेरे पास । उसमें बतायी गयी विधि के अनुसार मैं साधना करने लगा। धीरे-धीरे एक महीना बीत गया । अन्त में जो सोचा था, वही हुआ। मोना मंत्र शक्ति से बंधी जब सामने आकर खड़ी हुई तो उसका रूप साधारण नहीं था। लगभग चीखकर बोली, "तू मुझे क्यों परेशान करता है? बोल, क्या चाहता है ?" डाकिनी सिद्धि ! मैं तुमको अपने अधिकार में करना चाहता हूँ। नहीं कर सकते...

क्यों?

मैं मोना की देह में अभी दस साल और रहूँगी। तब तक तुम किसी भी शक्ति से मुझे अधिकार में नहीं कर सकते । मोना की आँखे नागमणि की तरह चमक रही थी उस समय। मैं तुमको मोना के शरीर में रहते हुए ही सिद्ध कर लूँगा। जो कालिकानन्द अवधूत नहीं कर सके, वह मैं करूंगा। हाँ ! यह बात जरूर है कि मुझे उनकी तरह मानवेतर शक्ति की लालसा नहीं है। मैं तुम्हारे माध्यम से तामसिक लोक, वहाँ के प्राणियों का रहस्य और उनकी मति-गति जानने-समझने भर की कामना करता हूँ। हठ मत करो। यह सम्भव नहीं है तुम्हारे लिए। तुम मंत्र बल और तांत्रिक क्रिया शक्ति के जरिये अंतरिक्ष की किसी भी अमानवीय आत्मा को अपने साथ संयुक्त नहीं कर सकते । अगर कर भी लिया तो उसका बड़ा भयंकर परिणाम होगा। मुझे इसकी चिंता नहीं है, मोना । मैं शायद प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को जानने समझने के लिए ही पैदा हुआ हूँ। इसके लिए मैं बड़े-से-बड़ा खतरा उठाने को तैयार हूँ। मेरी बात सुनकर क्रुद्ध नागिन की तरह फुफकारती हुई मोना वापस चली गयी। साधना की अन्तिम क्रिया के लिए श्मशान की जरूरत पड़ी मुझे । मेरी नजर में नारायणपुर का श्मशान उपयुक्त लगा। वहाँ न मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट के श्मशान की तरह कोलाहल था

और न भीड़-भाड़ । कभी कदा ही कोई चिता जलने के लिए आती है वहाँ । दिसम्बर का महीना । अमावस्या की घनी काली रात। भयानक निस्तब्धता में डूबा हुआ नारायणपुर का श्मशान – शायद दो-एक दिन पहले कोई चिता जली थी वहाँ । उसकी राख चारो तरफ बिखरी थी। एक ओर कुछ अधजली हड्डियाँ भी पड़ी थी। उसी में एक मानव खोपड़ी भी थी। गंगा की धारा की ओर थोड़ा झुका हुआ पीपल का वह काफी पुराना पेड़ हौले-हौले हिल रहा था, जिससे उसकी । डालों में बंधे यमघण्ट की छड़ें कभी-कदा आपस में टकरा जाती थी, जिनकी आवाज से भय का संचार हो जाता था मन में । न जाने कहाँ और किधर से सियारों का झुण्ड निकल आया वहाँ । उनकी जलती हुई पीली आँखें मेरे चारो ओर घूमने लगी। सोचा, अब क्या होगा । तभी गांव की ओर से कुत्तों के भौंकने की आवाज आने लगी। सियारो की टोली गायब हो गयी। चलो, विन्न टला। पीपल के नीचे ही आसन बिछाया। शराब की बोतलें और मुर्गे के गोश्त के साथ अन्य जरूरी सामान सामने रखे । पहले जो कुछ करना था, वह किया, फिर आसन पर बैठकर जप करने लगा। रात धीरे-धीरे गहरी होती गयी । जप शुरू करने के एक घण्टे बाद ऐसा लगा कि कोई अदृश्य हाथ मेरी कलाई को पकड़कर जप करने से रोक रहा है, मगर मैंने बन्द नहीं किया । बराबर जपता रहा मंत्र । एकाएक दूर से सियारों के समवेत स्वर में रोने की आवाज आयी और उसके साथ मैंने देखा कि गंगा की ओर से बहुत सारे नर कंकाल गिरते-पड़ते लड़खड़ाते श्मशान में आकर खड़े हो गये। दूसरे ही क्षण सारा बाताबरण सड़ांध से भर गया। अजीब सा हो उठा बाताबरण । उन नर-कंकालों ने मुझे चारो ओर से घेर लिया। भय विजड़ित दृष्टि से मैं उन सबको देख रहा था। कुछ क्षण बाद सबने मिलकर एक साथ विकट अट्टहास किया, फिर एक गहरा सन्नाटा छा गया वहाँ। सन्नाटा नहीं..बल्कि मन में खिन्नता और क्षोभ उत्पन्न करने वाली बैचेनी । फिर क्या देखता हूँ कि वे सारे नर-कंकाल एक एक कर मनुष्य के रूप में बदल गये । मगर उनका रूप ठीक-ठीक मनुष्यों जैसा था ? नहीं ! काफी वैषम्य था। शरीर के अनुपात से सिर काफी बड़े थे उनके । नाकें भी काफी लम्बी और मोटी थीं। कान भी हद से ज्यादा बड़े-बड़े थे। उनकी आँखों में बिल्ली जैसी चमक थी । वे सब एक साथ मेरी ओर घूर

रहे थे। उफ उनकी दृष्टि को तमाम उम्र नहीं भूल पाऊँगा मैं । लगा जैसे प्रेतपुरी का दावानल सुलग रहा हो वहाँ । आतंक और भय से मेरी बुरी दशा हो रही थी। मगर मैं अपने आपको संभाले हुए था

और हर प्रकार से सतर्क भी । मैं जानता था कि वह भयंकर पैशाचिक लोला थी। एकाएक पीपल का पेड़ जोर-जोर से हिलने लगा मानों वह किसी अदृश्य तूफान में फंस गया हो। लगा, किसी भी क्षण उसकी डालें टूटकर मुझ पर गिर पड़ेगी। उसी के साथ उस उजाड़-बीरान श्मशान में एक विचित्र विमुग्धकारी सृष्टि हो गयी। पहले चारो ओर हल्के गुलाबी रंग का प्रकाश फैला । बड़ा मोहक था वह प्रकाश । मैंने देखा, उस प्रकाश के भीतर से ही एक के बाद एक युवतियाँ प्रकट हुई—निश्चय ही वे इस धरती की स्त्रियाँ नहीं थी। उनका रूप आकर्षक, कमनीय और सुन्दर अवश्य था, मगर साथ ही साथ उनमें अमानवीयता भी थी, जिसे मन में हल्का-सा भय का संचार होता था। उनके बाल सुनहले और काफी घने थे। आँखे मोरनी जैसी थीं। चेहरे गोल और चिपटे थे। बांहे लम्बी थीं। कमर काफी पतली थी। वे गले में किसी चमकदार पत्थर के दानों की मालाएँ पहनी

थी।

अबतक प्रकाश का रंग गुलाबी से सुनहरा हो चुका था। वे युवतियाँ सामूहिक रूप से उस सुनहरे प्रकाश में इस प्रकार चल-फिर रही थी मानों पानी में तैर रही हों। बड़ा विचित्र लग रहा था उनका इस प्रकार तैरना। प्रकाश का रंग फिर बदला। अब वह बिल्कुल सफेद हो गया और उस रंग-परिवर्तन के साथ ही वे तमाम युबतियाँ भी गायब हो गयी और उनके स्थान पर उस शुभ प्रकाश में एक ऐसी नवयुवती प्रकट हुई, जिसे देखकर मैं चौंक पड़ा । पहचानते देर नहीं लगी मुझे। वह मोना के शरीर में रहने वाली डाकिनी थी। उस दिन अंधेरे के कारण उसका रूप ठीक से नहीं देख सका था, मगर प्रकाश में पिशाचलोक की उस सुंदरी की छवि देखकर मैं स्तब्ध रह गया। उसका अंग-प्रत्यंग जैसे तराशा हुआ

था। उसकी गहरी झील जैसी आँखों में हीरे की "कनी" की चमक और अजीब-सा सम्मोहन था। वह धीरे-धीरे मेरे करीब आयी और बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी ओर अपलक देखने लगी। मैंने तुरन्त झोले से शराब की बोतल निकाली और उसे मुर्दे की खोपड़ी में उड़ेल कर उसके सामने कर दिया। वह खिलखिला कर हंसी और खोपड़ी उठाकर मदिरा पीने लगी। वह पीती जाती थी और मैं बार-बार कपाल पात्र में शराब उड़ेलता जा रहा था। फिर एक बिकट अट्टहास किया उसने । सारा श्मशान प्रान्त गूंज उठा उसकी हंसी से । मेरे प्राण आतंक से हिम हो गये जैसे उस अभूतपूर्व क्षण में कुछ घटित होने जा रहा था। क्या पिशाच लीला ? लगा, मैं कभी किसी क्षण मूर्छित हो जाऊंगा। पर उसी समय एक कोमल स्वर सुनाई पड़ा... "जप बन्द दो।" वह युबती शराब से लाल हो उठी आँखों से मेरी ओर देखती हुई कह रही थी, तुम्हारे जप से हलचल मच गयी है । मुझे भी मोना का शरीर छोड़कर यहाँ आना पड़ा। मैं जप बन्द कर दूंगा, मगर तुम भी वादा करो कि मोना की देह में वापस लौट कर नहीं जाओगी। फिर दस साल कहाँ रहूँगी मैं ? मुझे तो रहना है अभी। कालिकानन्द अवधूत की मंत्र-शक्ति के बशीभूत मेरा अस्तित्व अभी दस साल और बंधा रहेगा पार्थिव काया के बंधन में । तुम्ही बताओ, क्या करूँ मैं? यदि मैं अवधूत महाशय की मंत्र-शक्ति को तोड़ दूं तो क्या तुम मेरे अधिकार में रहोगी?
 
मैं तुम्हारे इस प्रश्न का जवाब तब दूंगी जब तुम बचन दोगे कि शराब पियोगे और...और मेरी भोग कामना भी पूरी करोगे ? भोग कामना की पूर्ति तो कर सकूँगा, पर शराब पीने के लिये मत कहो । शराब से मुझे बेहद घृणा है । वह हँस पड़ी। बड़ी रहस्यमय हँसी थी वह । बोली, तब तो तुम अपने अधिकार में न मुझे कर सकोगे

और न मुझसे कोई सहायता ही ले सकोगे । क्या तुम्हारे लिए शराब पीना जरूरी है ? हाँ ! शराब में ऐसी शक्ति है जो साधक के उपचेतन मन के द्वार खोल देती है और हम जैसे प्राणी उसी द्वार से मानव-शक्ति में प्रवेश करते है। न जाने किस प्रेरणा के वशीभूत होकर मैने कह दिया, ठीक है... तुम्हें हासिल करने के लिए मैं कोई भी कीमत चुका सकता हूँ। चलो, मुझे शराब पीना स्वीकार है। काश ऐसा न कहा होता मैंने उस समय । पिशाच लोक की वह अनिंद्य सुन्दरी मेरी बात सुनकर एकबारगी हँस पड़ी। निश्चय ही वह पैशाचिक हँसी थी। उसका अर्थ नहीं समझ सका मैं ।

लो पीयो । मेरे हाथ से पीयो । कहते-कहते उस युवती ने अपने कोमल हाथ से मानव खोपड़ी को शराब से भरकर मेरे होठों से लगा दिया। मगर क्या वह शराब थी? उसमें शराब जैसी कड़वाहट या दर्गन्ध थी? नहीं मझे तो ऐसा लगा जैसे किसी अलौकिक रस का पान कर रहा है. जिसका स्वाद अवर्णनीय था। मगर दूसरे ही क्षण मुझे ऐसा लगा कि मानो मैं मर रहा हूँ। मन घबराने लगा । सारे शरीर में सनसनाहट होने लगी। दिल डूबने लगा। पता नहीं कबतक मेरी यह स्थिति रही, फिर अचानक मैंने हल्कापन महसूस किया और उसके बाद ही अपने आपको सर्वथा नबीन बाताबरण में पाया । मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि वह बाताबरण इस धरती का नहीं था वह अलौकिक था। सिर्फ भावना का प्रवाह था बहाँ। मेरी आत्मा अपने आप बिस्तृत और ब्यापक हो उठी थी। मैं समझ गया कि मेरे अस्तित्व का सम्बन्ध किसी ऐसे पारलौकिक जगत से जुड़ गया है, जहाँ से मनुष्यों की। अंतर्चेतना और अन्तर्मन का संचालन होता है। इसके अलावा ज्ञान-विज्ञान का विशेष केन्द्र भी है यह जगत । मगर अधिक समय तक मैं उस जगत और स्थिति में नहीं रह सका। जब मेरी बहिर्प्रज्ञा जागृत हुई तो सबेरा होने वाला था। उस उजाड़ मरघट के वातावरण में चारो

ओर सांय-सांय हो रहा था। उसी दिन मालूम हुआ कि मोना पिछली रात अपनी कोठरी में मरी पायी गयी। अब मुझे विश्वास हो गया कि डाकिनी हमेशा के लिए मोना की काया छोड़कर मेरे अधिकार में हो गयी है। इस घटना के तीन-चार दिन बाद पिशाचलोक की वह रूपसी डाकिनी स्वयं मेरे पास आयी। उसके आते ही बाताबरण शराब की दुर्गन्ध से भर गया। फिर रोज सांझ के समय उस सुन्दरी के आने का नियमही बन गया। उसकी अगोचर उपस्थिति आनन्ददायक भी लगती और भयप्रद भी। मुझे उसके लिए रोज मदिरा का इन्तजाम करना पड़ता। मेरे माध्यम से वह सारी शराब पी जाती। धीरे-धीरे मेरी आत्मा सुषुसावस्था में चली जाती है और मैं पूर्णत: चेतनाहीन हो जाता। फिर उसी चेतनाशून्य स्थिति में मैं उस पिशाचिनी के साथ न जाने किस-किस लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करता । जब मेरी आत्मा जागृत अवस्था में लौटती तो वहाँ की सिर्फ धुंधली-धुंधली.स्मति भर मेरे मस्तिष्क में रहती।

मैंने अनुभव किया कि जिन स्थानों में जाता था, वहाँ कहीं तो काल यानी समय की गति पृथ्वी की

अपेक्षा अत्यधिक मन्द है और कहीं अत्यधिक तीव्र । एक बार मैं ऐसे जगत में चला गया, जिसे उच्च कोटि के भक्तों का लोक कहा जा सकता है । वहाँ मुझे विभिन्न सम्प्रदायों के भक्त दिखाई पड़े । उनके चारो तरफ प्रकाश का बलय था। हर भक्त अपने इष्ट देवता या देवी के साथ भाब के अथाह सागर में डूबा हुआ था। उन सबके शरीर पारदर्शक और चमकीले थे। पिशाचिनी ने बताया कि इस स्थान पर इच्छा और विचार का कोई महत्व नहीं है। केवल भाव और

भावना का मूल्य है। कहने लगी- ये तमाम लोग अपने-अपने इष्टदेव के साथ अद्वैत भाव में है। संसार में रहकर इन सभी लोगों ने भक्ति में उच्च अबस्था प्राप्त की थी। संसार में जो ब्यक्ति इनके इष्ट की साधना-उपासना या भक्ति करता है, उसकी याचना के अनुसार और उसकी भावना एवं भक्ति की गहराई देखकर ये उसकी कामना पूरी करते हैं। मगर आदमी सोचता है कि उसकी कामना भगवान ने पूरी की है। यह बहुत बड़ा भ्रम है। ये लोग संसार में व्यक्ति के मनपसंद रूप में प्रकट होकर दर्शन भी देते हैं । तब भी भक्त यही सोचता है कि भगवान ने उसको दर्शन दिया है । ऐसा सोचना बहुत बड़ी गलती है। देवी-देवताओं और उनकी भक्ति के नाम पर संसार में जो भी चमत्कार होते है, वे सब इन्हीं लोगों के जरिए होते है। अपनी कामनाओं की पूर्ति और चमत्कारों का संबंध भगवान से जोड़ना भारी भूल है। भगवान का न चमत्कारों से संबंध है और न भक्तों की भावना-कामना से, उनकी ओर से ये आत्माये ही श्रद्धालु भक्तों की इच्छा पूरी करती है और समय पर दर्शन भी देती है। भगवान या परमेश्वर एक सर्वव्यापक परमतत्व है, परमशक्ति है। शक्ति न किसी की उपेक्षा करती है, और न कोई अपेक्षा। इसी प्रकार तामसिक भक्तों की आत्माओं का अपना अलग जगत है। इन्ही को अपदेवता कहते है। संसार में रहकर जिन्होंने तामसिक क्रियाओं और उपकरणों के जरिए तामसिक देवता की साधना उपासना आदि की है, वे अपने जगत में अपने तामसिक इष्ट देवता के नाम से जाने-पहचाने जाते हैं। ये अपदेवता भैंसे, बकरे, मुर्गे आदि की बलि और शराब चढ़ाने से प्रसन्न होते है और बहुत जल्दी मनुष्य की कामना भी पूरी कर देते है। कुछ तो अपनी प्रशंसा पाने के लिए और कुछ योग्य बस्तुओं को पाने के लोभ में मनुष्य की सहायता करते हैं। कुछ अपदेवता तो ऐसे हैं कि अपना पारिश्रमिक पहले ही तय कर लेते हैं। यदि कामना पूरी हो जाने पर उनके पारिश्रमिक स्वरूप मांस-मदिरा आदि भोग बस्तुएं नहीं दी गयी तो बे बड़े-बड़े नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते है। अपदेवताओं की पूजा अधिकतर निम्न बर्ग के ही लोग करते हैं। उनसे बेसन्तुष्ट और प्रसन्न भी रहते हैं। एक बार मेरे पछने पर डाकिनी ने बताया कि उसकी गति आकाशगंगा की सीमा तक है। आकाशगंगा का जो तारा पृथ्वी के सबसे नजदीक है, उसका भी प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में १,२६,००० मील प्रति सेकेंड की गति से चार-पाँच साल लग जाते हैं। मैंने पूछा, तुम सब किस गति से आकाश-संचरण करती हो ? डाकिनी ने बताया, मन की गति से । मगर मेरे और तुम्हारे मन में काफी अन्तर है। मनुष्य का मन शक्ति के सीमित दायरे में घूमता है, जबकि मानवेतर मन में असीम शक्ति होती है और उसका दायरा भी व्यापक होता है। तब तुम मुझे अपने साथ कैसे ले जाती हो?
 
अपने मन से तुम्हारे मन को बांध देती हूँ। उस समय तुम्हारी आत्मा तो हृदय के अन्त: भाव में रहती है, मगर तुम्हारा मन मेरे साथ रहता है । सोचना, समझना और अनुभव करना मन का काम है। उसे स्मृति या संस्कार के रूप में संजोकर रखना आत्मा का काम है। तुम्हारा मन मेरे साथ लोक लोकान्तरों में जो कुछ अनुभव कर आता है, उसे तुम्हारी आत्मा स्मृति के रूप में स्वीकार कर लेती है। एक बार मैं उस पिशाचिनी के साथ ऐसे लोक में चला गया, जहाँ केबल सूक्ष्मतम भावनाओं का तरल प्रवाह और मात्र भावना काही स्पन्दन था। वहाँ पहुँचकर कमरे में लेटे हुए चेतनाशून्य अपने पार्थिव शरीर को मैं एक दर्शक की तरह बिलकुल साफ देख रहा था। वह बड़ी विलक्षण अनुभूति थी। चारो तरफ हल्के गुलाबी रंग का प्रकाश बिखरा हुआ था । वातावरण में आत्मा की गहराई को छु लेने वाली

शान्ति बिखरी हुई थी शायद भारतीय योगियों ने इसी लोक को बैश्वानर जगत कहा है। जो आत्मा की चौकी यानी तुरीयावस्था है। वैश्वानर जगत दो भागों में है - पहला भाग ज्ञान का और दूसरा भाग विज्ञान का। दोनों भागों की आत्मायें समय-समय पर ज्ञान-विज्ञान के नये-नये सिद्धान्तों को संसार में प्रकट करने के लिए मानव शरीर धारण करती है। जब वैज्ञानिकों को पार्थिव की मूल इकाई 'इलेक्ट्रान' की गतिविधियों में कोई कार्य कारण संबंध स्थापित करने में सफलता नहीं मिली तो उन्हें बिबश होकर मानना पड़ा कि भौतिक सत्ता के आगे शायद एक अभौतिक सत्ता है...वह है वैश्वानर जगत । आज बैज्ञानिकों को उस वैश्वानर जगत का आभास मिल चुका है। वहाँ की सूक्ष्मतम भावनाओं के तरह प्रवाह का भी बे हल्का सा अनुभव कर चुके हैं और अब वे गणितीय रीति सेवांटम मैकेनिक्स द्वारा उस जगत में प्रवेश करने का सफल प्रयास कर रहे हैं। क्वांटम मैकेनिक्स इस शताब्दि की विलक्षण बैज्ञानिक उपलब्धि है। इसके द्वारा भौतिक विज्ञान ने स्थूल जागृत महतो महीयान विश्व को छोड़कर अणोरणीयान वाले उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म वैश्वानर लोक में प्रवेश किया है, जहाँ अब तक केवल उच्चकोटि के योगियों का ही प्रवेश था। बैज्ञानिको ने एक मत से स्वीकार किया है कि बहाँ उन उच्चतम बैज्ञानिक सत्यों का साक्षात्कार हो सकता है, जो भौतिक और चेतना के स्तर पर सम्भव नहीं है। उस डाकिनी से प्राप्त विशेष तांत्रिक और यौगिक क्रिया के जरिये और डाकिनी की सहायता से अभौतिक चेतना के स्तर पर मैंने कहाँ-कहाँ और किन-किन लोक-लोकान्तरों में भ्रमण किया, इसका लेखा-जोखा मेरे पास नहीं है। स्मृति में भी अब कुछ सुरक्षित नहीं है। मगर इस सिलसिले में एक दीर्घ अन्तराल के बाद मैं आज जहाँ पहुँचा हूँ और जिस स्थिति में हूँ, वहाँ सत्य की भूखी-प्यासी मेरी

आत्मा एकबारगी हतप्रभ हो गयी है। न मैं सहज हूँ और न मेरा जीवन ही सहज रह गया। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि पिशाचलोक की उस सुन्दरी ने मेरे मानस के सामने जीवन और जगत का जो नग्न सत्य खोल कर रखा, वह मेरे लिए भगवान के बिराट रूप के समान है, जिसे देखकर मैं अर्जन की तरह और अधिक व्याकुल हो उठा है। सत्य की अनुभूति भौतिक स्तर पर मन और आत्मा को अशान्त और आकुल कर देती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि एक लम्बे अर्से से मैं ऐसी ही अशान्ति और व्याकुलता के क्षणों में जी रहा हूँ। सत्य यह है कि उस पिशाचिनी के जरिए प्रकृति के तमाम गूढ़ रहस्यों की जानकारी मुझे मिली है, मगर उसका कितना भयंकर और दारूण मूल्य मुझे अभी तक चुकाना पड़ रहा है- यह सिर्फ मैं ही जानता हूँ।
 

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