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दूसरे क्षण मेज पर औरतों के प्रसाधन की तमाम वस्तुयें प्रकट हो गयी और वह रहस्यमयी युवती अपना श्रृंगार करने लगी। बीच-बीच में वह दरबाजे की ओर देख भी लेती थी । शायद वह किसी का इन्तजार कर रही थी। कमरे में अभी भी विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी गोलियाँ चारों ओर तैर रही
थी। कमरे का दरवाजा खुला तो नहीं - पर दरवाजे के पास एक दूसरी आकृति प्रकट हुई। वह आकृति किसी पुरुष की थी या किसी युवक की । वह पुराने जमाने की अंग्रेजों, की सी पोशाक पहने था। उसके
चेहरे पर शोक का भाव था। लगा, जैसे वह किसी गहरी चिंता में डूबा हुआ हो । वह धीरे-धीरे चलकर युवती के पास आया और हौले से पुकारा - मेहरुन्निसा ... । उस युवक के मुँह से मेहरुन्निसा नाम सुनकर चौक पड़ा मैं। युवक को देखते ही मेहरुन्निसा खड़ी हो गयी और उससे जा मिली। काफी देर तक दोनों आलिंगनबद्ध खड़े रहे। फिर गायब हो गये। और कमरे का वातावरण भी स्वच्छ हो गया। उस रात इशरत महल में मैने जो कुछ देखा सुना और अनुभव किया था उससे मेरे मस्तिष्क में यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि उसमें प्यासी आत्माओं की प्रबल इच्छा शक्ति का गहरा मायाजाल फैला हुआ है इसमें सन्देह नहीं। मगर उसके मूल में कारण क्या है - यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। इशरत महल दो सौ वर्ष पुराना था। नवाब साहब का वह खानदानी महल था । सम्भव है वह कारण उन्हीं के खानदान के इतिहास के किसी अंधेरे पन्ने में दबा, छिपा हो । मगर उनके खानदानी इतिहास का पता लगेगा कहाँ ? उस दिन मैं स्टूडियो नहीं गया । देवी को खोजता रहा पूरा दिन । मगर वह मुझे नहीं मिला सोचा, शायद वह अपने गाँव भाग गया हो । अब मुझे इशरत महल में अकेला ही रहना था। परे दस दिनों तक न कोई उल्लेखनीय घटना घटी और न तो कोई विशेष अनुभव ही हुआ मुझे। मैं आराम से रहा — मगर ग्यारहवें दिन जब मैं वापस लौटा - उस समय रात के बारह बज रहे थे। कृष्णपक्ष की रात थी सारी धरती और सारा आकाश अंधेरे के आगोश में डूबा हुआ था । एक गहरी खामोशी छायी हुई थी चारो तरफ। उस रात सड़क की बत्ती भी बुझी हुई थी। मुख्य दरबाजे का ताला खोलकर मकान के भीतर जैसे ही घुसा - कि एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं ।
भय और आतंक से रोमांचित हो उठा मेरा सारा शरीर। न जाने कहाँ से भीतर खूब रोशनी हो रही थी और मकान के लम्बे-चौड़े आंगन में चारो ओर खून ही खून फैला हुआ था। बिल्कुल ताजा खून था वहाँ और उस ताजे और गर्म खून से सनी, लिपटी आधी दर्जन लाशें पड़ी हुई थी। जिनमें एक जबान और खूबसूरत औरत की भी लाश थी। सभी लाशों की गर्दनें कटी थी। जरा आप ही सोचिये - उस अंधेरी और खामोश रात के समय खून में डूबी हुई आधी दर्जन लाशों को
देखकर मेरी मानसिक हालत क्या हुई होगी? मैं पागल नहीं हुआ बस यही गनीमत समझिये। मैं अभी आँख फाड़े और मुंह बाये वह बीभत्स और भयानक दृश्य देख ही रहा था कि तभी अचानक । सामने वाली दीवार के पास से एक लम्बी चौड़ी काठी का व्यक्ति प्रकट हुआ। उसकी आँखे लाल हो रही थी। उसके चेहरे पर क्रोध और घृणा का भाव था । चेहरे से क्रूरता साफ टपक रही थी। उसके हाथ में नंगी तलवार थी - यह समझते देर न लगी मुझे। मैं वहाँ पत्थर का बुत बना खड़ा रहा। लगा कि किसी भी क्षण में बेहोश होकर गिर पडूंगा। सचमुच बेहोश हो ही गया मैं और चेतना लौटी तो मैं अपने आपको कमरे में पलंग पर पड़ा पाया । मेहरुन्निसा मुझ पर झुकी हुई थी। खाँ साहब की बेटी
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मेहरुन्निसा बड़े प्यार से मेरे सिर को आहिस्ते-आहिस्ते सहला रही थी। मैं उसे देखकर आश्चर्य से भर उठा । वह कैसे और कब आयी वहाँ । मुझे होश में आया देखकर वह बोली कहिये कब कैसी तबीयत है आपकी? ठीक है - मैंने जवाब दिया और फिर पूछा.....आप कैसे आयीं यहाँ ? मैं आऊँगी कहाँ से ? मैं तो यहीं इसी मकान में ही रहती हूँ - सहज भाव से बोली मेहरुन्निसा। यह सुनकर आश्चर्य हुआ मुझे । आश्चर्य भरे ही स्वर में बोला - क्या कहती हैं आप ?...आप इस भुतहे मकान में रहती हैं। मैंने तो उसके पहले आपको कभी देखा ही नहीं यहाँ इस मकान में ? कैसी बात करती हैं आप? मेरे प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया मेहरुन्निसा ने । सिर्फ मुस्कुराती रही। बड़ी रहस्यमयी लगी उसकी मुस्कुराहट उस समय मुझे। मैं उसके चेहरे की तरफ देखता रह गया। दिन का उजाला फैल चुका था । मेहरुन्निसा की उपस्थिति सचमुच मेरे लिए रहस्यमयी थी। जब मैं बाथरूम से वापस लौटा तो देखा कि वह मेरे कमरे में नहीं थी मैं सोच में पड़ गया कि वह बिना बतलाये गई कहाँ। पुरा मकान देख डाला। मगर वह नहीं मिली मझे। आंगन में भी गया । वहाँ भी न खून फैला था और न लाशे थी कहीं। एकाएक मेरा मस्तिष्क झनझना उठा। रात का सारा दृश्य घूम गया मेरे मानस पटल पर । निसन्देह भयानक प्रेतलीला थी वह । मेहरुन्निसा भी मेरे सन्देह की परिधि में थी। उसका ब्यक्तित्व मुझे रहस्यमय लगा। मैं उसी हालत में दौड़ा-दौड़ा खाँ साहब के बंगले पर पहुंचा। वे सुवह का नाश्ता कर रहे थे। मेहरुनिसा भी उनके करीब बैठी हुई थी। मझे देखते ही खाँ साहब बोले आइये-आइये । आपकी खोज का नतीजा क्या हुआ ? कुछ समझ में आया आपके? सारी कथा संक्षेप में सुना दी मैंने और अन्त में मेहरुन्निसा के आने की भी बात बतला दी। जिसे सुनकर बाप, बेटी दोनों एक साथ चौंक पड़े। यह क्या कह रहे हैं शर्मा जी! आप - खाँ साहब, अपने स्वर को जरा कठोर करके बोले - मेरी बेटी तो बिल्कुल सुवह से मेरे पास है। फिर वह क्यों जायेगी उस भुतहे मकान में ? अब मेरे चौंकने की बारी थी। मुझसे कुछ बोला न गया कुछ कहा भी न गया । बस, मुँह बाये उन दोनों की ओर देखता भर रह गया मैं । दिन पर दिन उस भुतहे मकान की रहस्यमयी गुत्थी उलझती जा रही थी। मेहरुन्निसा का अस्तित्व मेरे लिए और अधिक जटिल और रहस्यमय हो गया था। मेरे कमरे में मेरा सिर सहलाने वाली और मुझसे बाते करने वाली आखिर थी कौन ? अगर मेहरुन्निसा नहीं थी तो फिर कौन थी? उस रात फिर मुझे बही लम्बी-चौड़ी काठी बाला ब्यक्ति मकान में दिखाई दिया । सिर झुकाये गमगीन-सा आंगन में खड़ा रहा था वह । मगर जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी - वह एकाएक आंगन की दीवार में समा गया। यह देख कर एकबारगी मेरे मस्तिष्क में कौंध सा गया। दूसरे दिन मैंने उस दीवार को तुड़वाना शुरू किया क्योंकि मेरे ख्याल में उसी दीवार के पीछे उस भुतहे मकान का सारा रहस्य छिपा हुआ था। मेरा अनुमान सही निकला। दीवार के गिरते ही मुझे सामने लगभग चार फुट लम्बी लोहे की मोटी चादर दिखलाई दी, वह चादर दीवार में पेचों के जरिये कसी हुई थी। मैंने उसे
भी खुलवाया। काफी मेहनत से खुली वह मोटी चादर । उसके हटते ही मुझे नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ दिख लायी दी। भीतर अंधेरा था और सीलन भरी बदबू भी थी। मैं टार्च की रोशनी की सहायता से सीढ़ियाँ उतर कर नीचे पहुंचा। नीचे मुझे एक लम्बा चौड़ा कमरा मिला । वह कमरा मुझे काफी रहस्यमय लगा। कमरे में एक बड़ी-सी लकड़ी की आलमारी थी - जो काफी पुरानी लग रही थी। मैंने उसे भी तुड़वाया । आलमारी में भी मुझे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जमाने के चाँदी के कुछ सिक्के और जड़ाऊ तलवार मिली, कमरे के एक कोने में एक बड़ा भारी लोहे का सन्दूक भी था। उसका ताला बड़ा भारी और मजबूत था। उसे तोड़ने में काफी परेशानी हुई। उस लम्बे चौड़े सन्दुक के
खुलने पर मुझे उर्दू में लिखी हुई अरबी तंत्र-मंत्र की काफी पुरानी किताबें, और सुनहरे फ्रेम में जड़ी हुई दो तस्वीरें मिली । उन्हीं के साथ चमड़े में लिपटा हुआ एक दस्तावेज भी मिला। इन सब पुरानी वस्तुओं के अलावा सबसे आश्चर्यजनक और कौतुहल पूर्ण जो वस्तु मुझे उस सन्दुक में मिली - वह थी स्फटिक की एक तश्तरी। लगभग एक फुट व्यास की वह तश्तरी गहरी भी थी। जिसमें पीले रंग का कोई स्वच्छ द्रव भरा हुआ था। जिसमें कम्पास की तरह कई सुइयाँ तैर रही थी। जिनके चारो तरफ ग्रह-नक्षत्रो के चित्र खुदे हुए थे। सूइयाँ उन पर तेजी से घूम रही थी। मैंने उस तश्तरी को छूना चाहा। मगर जैसे ही उसका स्पर्श किया, उसी क्षण मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठा और सिर सनसनाने लगा और उसी के साथ मझे बिजली जैसा झटका लगा और स्फटिक की तश्तरी टूट गयी और उसमें का द्रव और कम्पास की सुइयाँ भी चारों ओर बिखर गयी और उनके बिखरते ही कमरे में भूचाल सा आ गया। दीवारे कांप उठी। मैं उन पुस्तकों दस्तावेज और सिक्के लेकर उस गुप्त कमरे के बाहर निकल आया। साथ में उन तैल चित्रों को भी लाना नहीं भूला उर्दू और अरबी का ज्ञान मुझे था। इसलिए उन प्राचीन तंत्र की पुस्तकों
और चमड़े की खोल में लिपटे उस दस्तावेज को पढ़ने और समझने में दिक्कत नहीं हुई। बे पुस्तके अरबी और फारसी तंत्र-मंत्र और ताबीजों के अलावा काला जादू, मैली विद्याओं, टोना टोटका आदि की हस्त लिखित प्राचीन व दर्लभ पुस्तकें थी, इसमें सन्देह नहीं। उन तांत्रिक पुस्तकों का लेखक कोई औलिया फकीर था, जो कभी अरब होता हुआ हिन्दुस्तान आया था। और हमेशा के लिए मुलतान में ठहर गया था। कहने की आवश्यकता नहीं, आज से करीब दो सौ वर्ष पहले मुलतान
अरबी और फारसी तांत्रिकों का गढ़ था। वह औलियाँ प्राय: खामोश रहता था और हर समय अपनी तांत्रिक साधना में डूबा रहता था। उसने कुछ दिनों बाद अपना एक शिष्य बनाया। जिसका नाम था शाकीर । शाकीर पक्का शार्गिद साबित हुआ । वह खूब सेवा टहल करता अपने गुरु का । गुरु भी अपने लड़के की तरह मानता अपने शिष्य को । ऐसी स्थिति में जो परिणाम सामने आना चाहिए - बहीं आया। शाकीर एक अच्छा साधक बन गया । औलिया की सारी तांत्रिक विद्या उसने धीरे-धीरे सीख ली। मगर तांत्रिक साधना और तांत्रिक विद्याओं ने शाकीर में विनम्रता, सहिष्णुता और बिबेक के बजाय अहंकार भर दिया। अपने आपको महा शक्तिमान समझने लगा वह। अपनी शक्ति और अपने सामर्थ्य के सामने वह किसी को कुछ न समझता। दस्तावेज के अनुसार उसे एक परी सिद्ध थी। जो काफी शक्तिशाली थी। वह शाकीर के इशारे पर कोई भी अच्छा या बुरा काम कर सकती थी। उसी का बेहद घमण्ड था शाकीर को । औलिया के मरने के बाद तो शाकीर का अहंकार और घमण्ड और बढ़ गया । तभी उस पर नजर पड़ी मुलतान के एक जमींदार की। जिसका नाम था कुरबान अहमद – कुरबान अहमद, शाकीर की रूहानी ताकत से भली-भाँति परिचित था। एक दिन उसने
शाकीर को अपने पास बुलाया अपनी एक कोई बहुत बड़ी समस्या उसके सामने रखी। शाकीर ने परी की सहायता से उस जटिल समस्या को हल कर दिया, जिसके बदले जमींदार ने उसे बहुत सारे सोने चाँदी के सिक्के और जड़ाऊ गहने दिये। और याददाश्त के तौर पर एक जड़ाऊ तलवार भी भेंट की। उस जमाने में वह लाखों की सम्पत्ति थी। मगर शाकीर उससे खुश नहीं हुआ। वह तो मेहरुन्निसा को चाहता था । कुरबान अहमद की इकलौती बेटी मेहरुन्निसा को । उसकी खूबसूरती और हुस्न ने शाकीर के मन की शान्ति छीन ली थी। वह हर हालत में मेहरुन्निसा को पाना चाहता था। मगर वह जमींदार अपनी इकलौती बेटी को उसे देना नहीं चाहता था। जब किसी भी प्रकार वह तैयार नहीं हुआ तो शाकीर ने अपने इल्म से काम लिया । एक दिन जब रात के अंधेरे में सारा मुलतान शहर डूबा हुआ था और लोग गहरी नींद में बेखबर सोये हुये थे, उसी वक्त दौड़ती-हांफती मेहरुन्निसा आयी और शाकीर की चौड़ी छाती से लिपट गयी। और फिर अपने आपको शाकीर के हवाले कर दिया । शाकीर तो यही चाहता था। उसकी मुराद पूरी हो गयी थी। वह रू का नहीं, उसी रात मेहरुन्निसा को लेकर सीधा कलकत्ता के लिये रवाना हो गया। वह मेहरुन्निसा को इस शहर से बहुत दूर ले जाना चाहता था ताकि उसके बाप का साया उस पर न पड़े ।
थी। कमरे का दरवाजा खुला तो नहीं - पर दरवाजे के पास एक दूसरी आकृति प्रकट हुई। वह आकृति किसी पुरुष की थी या किसी युवक की । वह पुराने जमाने की अंग्रेजों, की सी पोशाक पहने था। उसके
चेहरे पर शोक का भाव था। लगा, जैसे वह किसी गहरी चिंता में डूबा हुआ हो । वह धीरे-धीरे चलकर युवती के पास आया और हौले से पुकारा - मेहरुन्निसा ... । उस युवक के मुँह से मेहरुन्निसा नाम सुनकर चौक पड़ा मैं। युवक को देखते ही मेहरुन्निसा खड़ी हो गयी और उससे जा मिली। काफी देर तक दोनों आलिंगनबद्ध खड़े रहे। फिर गायब हो गये। और कमरे का वातावरण भी स्वच्छ हो गया। उस रात इशरत महल में मैने जो कुछ देखा सुना और अनुभव किया था उससे मेरे मस्तिष्क में यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि उसमें प्यासी आत्माओं की प्रबल इच्छा शक्ति का गहरा मायाजाल फैला हुआ है इसमें सन्देह नहीं। मगर उसके मूल में कारण क्या है - यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। इशरत महल दो सौ वर्ष पुराना था। नवाब साहब का वह खानदानी महल था । सम्भव है वह कारण उन्हीं के खानदान के इतिहास के किसी अंधेरे पन्ने में दबा, छिपा हो । मगर उनके खानदानी इतिहास का पता लगेगा कहाँ ? उस दिन मैं स्टूडियो नहीं गया । देवी को खोजता रहा पूरा दिन । मगर वह मुझे नहीं मिला सोचा, शायद वह अपने गाँव भाग गया हो । अब मुझे इशरत महल में अकेला ही रहना था। परे दस दिनों तक न कोई उल्लेखनीय घटना घटी और न तो कोई विशेष अनुभव ही हुआ मुझे। मैं आराम से रहा — मगर ग्यारहवें दिन जब मैं वापस लौटा - उस समय रात के बारह बज रहे थे। कृष्णपक्ष की रात थी सारी धरती और सारा आकाश अंधेरे के आगोश में डूबा हुआ था । एक गहरी खामोशी छायी हुई थी चारो तरफ। उस रात सड़क की बत्ती भी बुझी हुई थी। मुख्य दरबाजे का ताला खोलकर मकान के भीतर जैसे ही घुसा - कि एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं ।
भय और आतंक से रोमांचित हो उठा मेरा सारा शरीर। न जाने कहाँ से भीतर खूब रोशनी हो रही थी और मकान के लम्बे-चौड़े आंगन में चारो ओर खून ही खून फैला हुआ था। बिल्कुल ताजा खून था वहाँ और उस ताजे और गर्म खून से सनी, लिपटी आधी दर्जन लाशें पड़ी हुई थी। जिनमें एक जबान और खूबसूरत औरत की भी लाश थी। सभी लाशों की गर्दनें कटी थी। जरा आप ही सोचिये - उस अंधेरी और खामोश रात के समय खून में डूबी हुई आधी दर्जन लाशों को
देखकर मेरी मानसिक हालत क्या हुई होगी? मैं पागल नहीं हुआ बस यही गनीमत समझिये। मैं अभी आँख फाड़े और मुंह बाये वह बीभत्स और भयानक दृश्य देख ही रहा था कि तभी अचानक । सामने वाली दीवार के पास से एक लम्बी चौड़ी काठी का व्यक्ति प्रकट हुआ। उसकी आँखे लाल हो रही थी। उसके चेहरे पर क्रोध और घृणा का भाव था । चेहरे से क्रूरता साफ टपक रही थी। उसके हाथ में नंगी तलवार थी - यह समझते देर न लगी मुझे। मैं वहाँ पत्थर का बुत बना खड़ा रहा। लगा कि किसी भी क्षण में बेहोश होकर गिर पडूंगा। सचमुच बेहोश हो ही गया मैं और चेतना लौटी तो मैं अपने आपको कमरे में पलंग पर पड़ा पाया । मेहरुन्निसा मुझ पर झुकी हुई थी। खाँ साहब की बेटी
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मेहरुन्निसा बड़े प्यार से मेरे सिर को आहिस्ते-आहिस्ते सहला रही थी। मैं उसे देखकर आश्चर्य से भर उठा । वह कैसे और कब आयी वहाँ । मुझे होश में आया देखकर वह बोली कहिये कब कैसी तबीयत है आपकी? ठीक है - मैंने जवाब दिया और फिर पूछा.....आप कैसे आयीं यहाँ ? मैं आऊँगी कहाँ से ? मैं तो यहीं इसी मकान में ही रहती हूँ - सहज भाव से बोली मेहरुन्निसा। यह सुनकर आश्चर्य हुआ मुझे । आश्चर्य भरे ही स्वर में बोला - क्या कहती हैं आप ?...आप इस भुतहे मकान में रहती हैं। मैंने तो उसके पहले आपको कभी देखा ही नहीं यहाँ इस मकान में ? कैसी बात करती हैं आप? मेरे प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया मेहरुन्निसा ने । सिर्फ मुस्कुराती रही। बड़ी रहस्यमयी लगी उसकी मुस्कुराहट उस समय मुझे। मैं उसके चेहरे की तरफ देखता रह गया। दिन का उजाला फैल चुका था । मेहरुन्निसा की उपस्थिति सचमुच मेरे लिए रहस्यमयी थी। जब मैं बाथरूम से वापस लौटा तो देखा कि वह मेरे कमरे में नहीं थी मैं सोच में पड़ गया कि वह बिना बतलाये गई कहाँ। पुरा मकान देख डाला। मगर वह नहीं मिली मझे। आंगन में भी गया । वहाँ भी न खून फैला था और न लाशे थी कहीं। एकाएक मेरा मस्तिष्क झनझना उठा। रात का सारा दृश्य घूम गया मेरे मानस पटल पर । निसन्देह भयानक प्रेतलीला थी वह । मेहरुन्निसा भी मेरे सन्देह की परिधि में थी। उसका ब्यक्तित्व मुझे रहस्यमय लगा। मैं उसी हालत में दौड़ा-दौड़ा खाँ साहब के बंगले पर पहुंचा। वे सुवह का नाश्ता कर रहे थे। मेहरुनिसा भी उनके करीब बैठी हुई थी। मझे देखते ही खाँ साहब बोले आइये-आइये । आपकी खोज का नतीजा क्या हुआ ? कुछ समझ में आया आपके? सारी कथा संक्षेप में सुना दी मैंने और अन्त में मेहरुन्निसा के आने की भी बात बतला दी। जिसे सुनकर बाप, बेटी दोनों एक साथ चौंक पड़े। यह क्या कह रहे हैं शर्मा जी! आप - खाँ साहब, अपने स्वर को जरा कठोर करके बोले - मेरी बेटी तो बिल्कुल सुवह से मेरे पास है। फिर वह क्यों जायेगी उस भुतहे मकान में ? अब मेरे चौंकने की बारी थी। मुझसे कुछ बोला न गया कुछ कहा भी न गया । बस, मुँह बाये उन दोनों की ओर देखता भर रह गया मैं । दिन पर दिन उस भुतहे मकान की रहस्यमयी गुत्थी उलझती जा रही थी। मेहरुन्निसा का अस्तित्व मेरे लिए और अधिक जटिल और रहस्यमय हो गया था। मेरे कमरे में मेरा सिर सहलाने वाली और मुझसे बाते करने वाली आखिर थी कौन ? अगर मेहरुन्निसा नहीं थी तो फिर कौन थी? उस रात फिर मुझे बही लम्बी-चौड़ी काठी बाला ब्यक्ति मकान में दिखाई दिया । सिर झुकाये गमगीन-सा आंगन में खड़ा रहा था वह । मगर जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी - वह एकाएक आंगन की दीवार में समा गया। यह देख कर एकबारगी मेरे मस्तिष्क में कौंध सा गया। दूसरे दिन मैंने उस दीवार को तुड़वाना शुरू किया क्योंकि मेरे ख्याल में उसी दीवार के पीछे उस भुतहे मकान का सारा रहस्य छिपा हुआ था। मेरा अनुमान सही निकला। दीवार के गिरते ही मुझे सामने लगभग चार फुट लम्बी लोहे की मोटी चादर दिखलाई दी, वह चादर दीवार में पेचों के जरिये कसी हुई थी। मैंने उसे
भी खुलवाया। काफी मेहनत से खुली वह मोटी चादर । उसके हटते ही मुझे नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ दिख लायी दी। भीतर अंधेरा था और सीलन भरी बदबू भी थी। मैं टार्च की रोशनी की सहायता से सीढ़ियाँ उतर कर नीचे पहुंचा। नीचे मुझे एक लम्बा चौड़ा कमरा मिला । वह कमरा मुझे काफी रहस्यमय लगा। कमरे में एक बड़ी-सी लकड़ी की आलमारी थी - जो काफी पुरानी लग रही थी। मैंने उसे भी तुड़वाया । आलमारी में भी मुझे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जमाने के चाँदी के कुछ सिक्के और जड़ाऊ तलवार मिली, कमरे के एक कोने में एक बड़ा भारी लोहे का सन्दूक भी था। उसका ताला बड़ा भारी और मजबूत था। उसे तोड़ने में काफी परेशानी हुई। उस लम्बे चौड़े सन्दुक के
खुलने पर मुझे उर्दू में लिखी हुई अरबी तंत्र-मंत्र की काफी पुरानी किताबें, और सुनहरे फ्रेम में जड़ी हुई दो तस्वीरें मिली । उन्हीं के साथ चमड़े में लिपटा हुआ एक दस्तावेज भी मिला। इन सब पुरानी वस्तुओं के अलावा सबसे आश्चर्यजनक और कौतुहल पूर्ण जो वस्तु मुझे उस सन्दुक में मिली - वह थी स्फटिक की एक तश्तरी। लगभग एक फुट व्यास की वह तश्तरी गहरी भी थी। जिसमें पीले रंग का कोई स्वच्छ द्रव भरा हुआ था। जिसमें कम्पास की तरह कई सुइयाँ तैर रही थी। जिनके चारो तरफ ग्रह-नक्षत्रो के चित्र खुदे हुए थे। सूइयाँ उन पर तेजी से घूम रही थी। मैंने उस तश्तरी को छूना चाहा। मगर जैसे ही उसका स्पर्श किया, उसी क्षण मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठा और सिर सनसनाने लगा और उसी के साथ मझे बिजली जैसा झटका लगा और स्फटिक की तश्तरी टूट गयी और उसमें का द्रव और कम्पास की सुइयाँ भी चारों ओर बिखर गयी और उनके बिखरते ही कमरे में भूचाल सा आ गया। दीवारे कांप उठी। मैं उन पुस्तकों दस्तावेज और सिक्के लेकर उस गुप्त कमरे के बाहर निकल आया। साथ में उन तैल चित्रों को भी लाना नहीं भूला उर्दू और अरबी का ज्ञान मुझे था। इसलिए उन प्राचीन तंत्र की पुस्तकों
और चमड़े की खोल में लिपटे उस दस्तावेज को पढ़ने और समझने में दिक्कत नहीं हुई। बे पुस्तके अरबी और फारसी तंत्र-मंत्र और ताबीजों के अलावा काला जादू, मैली विद्याओं, टोना टोटका आदि की हस्त लिखित प्राचीन व दर्लभ पुस्तकें थी, इसमें सन्देह नहीं। उन तांत्रिक पुस्तकों का लेखक कोई औलिया फकीर था, जो कभी अरब होता हुआ हिन्दुस्तान आया था। और हमेशा के लिए मुलतान में ठहर गया था। कहने की आवश्यकता नहीं, आज से करीब दो सौ वर्ष पहले मुलतान
अरबी और फारसी तांत्रिकों का गढ़ था। वह औलियाँ प्राय: खामोश रहता था और हर समय अपनी तांत्रिक साधना में डूबा रहता था। उसने कुछ दिनों बाद अपना एक शिष्य बनाया। जिसका नाम था शाकीर । शाकीर पक्का शार्गिद साबित हुआ । वह खूब सेवा टहल करता अपने गुरु का । गुरु भी अपने लड़के की तरह मानता अपने शिष्य को । ऐसी स्थिति में जो परिणाम सामने आना चाहिए - बहीं आया। शाकीर एक अच्छा साधक बन गया । औलिया की सारी तांत्रिक विद्या उसने धीरे-धीरे सीख ली। मगर तांत्रिक साधना और तांत्रिक विद्याओं ने शाकीर में विनम्रता, सहिष्णुता और बिबेक के बजाय अहंकार भर दिया। अपने आपको महा शक्तिमान समझने लगा वह। अपनी शक्ति और अपने सामर्थ्य के सामने वह किसी को कुछ न समझता। दस्तावेज के अनुसार उसे एक परी सिद्ध थी। जो काफी शक्तिशाली थी। वह शाकीर के इशारे पर कोई भी अच्छा या बुरा काम कर सकती थी। उसी का बेहद घमण्ड था शाकीर को । औलिया के मरने के बाद तो शाकीर का अहंकार और घमण्ड और बढ़ गया । तभी उस पर नजर पड़ी मुलतान के एक जमींदार की। जिसका नाम था कुरबान अहमद – कुरबान अहमद, शाकीर की रूहानी ताकत से भली-भाँति परिचित था। एक दिन उसने
शाकीर को अपने पास बुलाया अपनी एक कोई बहुत बड़ी समस्या उसके सामने रखी। शाकीर ने परी की सहायता से उस जटिल समस्या को हल कर दिया, जिसके बदले जमींदार ने उसे बहुत सारे सोने चाँदी के सिक्के और जड़ाऊ गहने दिये। और याददाश्त के तौर पर एक जड़ाऊ तलवार भी भेंट की। उस जमाने में वह लाखों की सम्पत्ति थी। मगर शाकीर उससे खुश नहीं हुआ। वह तो मेहरुन्निसा को चाहता था । कुरबान अहमद की इकलौती बेटी मेहरुन्निसा को । उसकी खूबसूरती और हुस्न ने शाकीर के मन की शान्ति छीन ली थी। वह हर हालत में मेहरुन्निसा को पाना चाहता था। मगर वह जमींदार अपनी इकलौती बेटी को उसे देना नहीं चाहता था। जब किसी भी प्रकार वह तैयार नहीं हुआ तो शाकीर ने अपने इल्म से काम लिया । एक दिन जब रात के अंधेरे में सारा मुलतान शहर डूबा हुआ था और लोग गहरी नींद में बेखबर सोये हुये थे, उसी वक्त दौड़ती-हांफती मेहरुन्निसा आयी और शाकीर की चौड़ी छाती से लिपट गयी। और फिर अपने आपको शाकीर के हवाले कर दिया । शाकीर तो यही चाहता था। उसकी मुराद पूरी हो गयी थी। वह रू का नहीं, उसी रात मेहरुन्निसा को लेकर सीधा कलकत्ता के लिये रवाना हो गया। वह मेहरुन्निसा को इस शहर से बहुत दूर ले जाना चाहता था ताकि उसके बाप का साया उस पर न पड़े ।