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Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

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दूसरे क्षण मेज पर औरतों के प्रसाधन की तमाम वस्तुयें प्रकट हो गयी और वह रहस्यमयी युवती अपना श्रृंगार करने लगी। बीच-बीच में वह दरबाजे की ओर देख भी लेती थी । शायद वह किसी का इन्तजार कर रही थी। कमरे में अभी भी विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी गोलियाँ चारों ओर तैर रही

थी। कमरे का दरवाजा खुला तो नहीं - पर दरवाजे के पास एक दूसरी आकृति प्रकट हुई। वह आकृति किसी पुरुष की थी या किसी युवक की । वह पुराने जमाने की अंग्रेजों, की सी पोशाक पहने था। उसके

चेहरे पर शोक का भाव था। लगा, जैसे वह किसी गहरी चिंता में डूबा हुआ हो । वह धीरे-धीरे चलकर युवती के पास आया और हौले से पुकारा - मेहरुन्निसा ... । उस युवक के मुँह से मेहरुन्निसा नाम सुनकर चौक पड़ा मैं। युवक को देखते ही मेहरुन्निसा खड़ी हो गयी और उससे जा मिली। काफी देर तक दोनों आलिंगनबद्ध खड़े रहे। फिर गायब हो गये। और कमरे का वातावरण भी स्वच्छ हो गया। उस रात इशरत महल में मैने जो कुछ देखा सुना और अनुभव किया था उससे मेरे मस्तिष्क में यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि उसमें प्यासी आत्माओं की प्रबल इच्छा शक्ति का गहरा मायाजाल फैला हुआ है इसमें सन्देह नहीं। मगर उसके मूल में कारण क्या है - यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। इशरत महल दो सौ वर्ष पुराना था। नवाब साहब का वह खानदानी महल था । सम्भव है वह कारण उन्हीं के खानदान के इतिहास के किसी अंधेरे पन्ने में दबा, छिपा हो । मगर उनके खानदानी इतिहास का पता लगेगा कहाँ ? उस दिन मैं स्टूडियो नहीं गया । देवी को खोजता रहा पूरा दिन । मगर वह मुझे नहीं मिला सोचा, शायद वह अपने गाँव भाग गया हो । अब मुझे इशरत महल में अकेला ही रहना था। परे दस दिनों तक न कोई उल्लेखनीय घटना घटी और न तो कोई विशेष अनुभव ही हुआ मुझे। मैं आराम से रहा — मगर ग्यारहवें दिन जब मैं वापस लौटा - उस समय रात के बारह बज रहे थे। कृष्णपक्ष की रात थी सारी धरती और सारा आकाश अंधेरे के आगोश में डूबा हुआ था । एक गहरी खामोशी छायी हुई थी चारो तरफ। उस रात सड़क की बत्ती भी बुझी हुई थी। मुख्य दरबाजे का ताला खोलकर मकान के भीतर जैसे ही घुसा - कि एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं ।

भय और आतंक से रोमांचित हो उठा मेरा सारा शरीर। न जाने कहाँ से भीतर खूब रोशनी हो रही थी और मकान के लम्बे-चौड़े आंगन में चारो ओर खून ही खून फैला हुआ था। बिल्कुल ताजा खून था वहाँ और उस ताजे और गर्म खून से सनी, लिपटी आधी दर्जन लाशें पड़ी हुई थी। जिनमें एक जबान और खूबसूरत औरत की भी लाश थी। सभी लाशों की गर्दनें कटी थी। जरा आप ही सोचिये - उस अंधेरी और खामोश रात के समय खून में डूबी हुई आधी दर्जन लाशों को

देखकर मेरी मानसिक हालत क्या हुई होगी? मैं पागल नहीं हुआ बस यही गनीमत समझिये। मैं अभी आँख फाड़े और मुंह बाये वह बीभत्स और भयानक दृश्य देख ही रहा था कि तभी अचानक । सामने वाली दीवार के पास से एक लम्बी चौड़ी काठी का व्यक्ति प्रकट हुआ। उसकी आँखे लाल हो रही थी। उसके चेहरे पर क्रोध और घृणा का भाव था । चेहरे से क्रूरता साफ टपक रही थी। उसके हाथ में नंगी तलवार थी - यह समझते देर न लगी मुझे। मैं वहाँ पत्थर का बुत बना खड़ा रहा। लगा कि किसी भी क्षण में बेहोश होकर गिर पडूंगा। सचमुच बेहोश हो ही गया मैं और चेतना लौटी तो मैं अपने आपको कमरे में पलंग पर पड़ा पाया । मेहरुन्निसा मुझ पर झुकी हुई थी। खाँ साहब की बेटी

"

मेहरुन्निसा बड़े प्यार से मेरे सिर को आहिस्ते-आहिस्ते सहला रही थी। मैं उसे देखकर आश्चर्य से भर उठा । वह कैसे और कब आयी वहाँ । मुझे होश में आया देखकर वह बोली कहिये कब कैसी तबीयत है आपकी? ठीक है - मैंने जवाब दिया और फिर पूछा.....आप कैसे आयीं यहाँ ? मैं आऊँगी कहाँ से ? मैं तो यहीं इसी मकान में ही रहती हूँ - सहज भाव से बोली मेहरुन्निसा। यह सुनकर आश्चर्य हुआ मुझे । आश्चर्य भरे ही स्वर में बोला - क्या कहती हैं आप ?...आप इस भुतहे मकान में रहती हैं। मैंने तो उसके पहले आपको कभी देखा ही नहीं यहाँ इस मकान में ? कैसी बात करती हैं आप? मेरे प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया मेहरुन्निसा ने । सिर्फ मुस्कुराती रही। बड़ी रहस्यमयी लगी उसकी मुस्कुराहट उस समय मुझे। मैं उसके चेहरे की तरफ देखता रह गया। दिन का उजाला फैल चुका था । मेहरुन्निसा की उपस्थिति सचमुच मेरे लिए रहस्यमयी थी। जब मैं बाथरूम से वापस लौटा तो देखा कि वह मेरे कमरे में नहीं थी मैं सोच में पड़ गया कि वह बिना बतलाये गई कहाँ। पुरा मकान देख डाला। मगर वह नहीं मिली मझे। आंगन में भी गया । वहाँ भी न खून फैला था और न लाशे थी कहीं। एकाएक मेरा मस्तिष्क झनझना उठा। रात का सारा दृश्य घूम गया मेरे मानस पटल पर । निसन्देह भयानक प्रेतलीला थी वह । मेहरुन्निसा भी मेरे सन्देह की परिधि में थी। उसका ब्यक्तित्व मुझे रहस्यमय लगा। मैं उसी हालत में दौड़ा-दौड़ा खाँ साहब के बंगले पर पहुंचा। वे सुवह का नाश्ता कर रहे थे। मेहरुनिसा भी उनके करीब बैठी हुई थी। मझे देखते ही खाँ साहब बोले आइये-आइये । आपकी खोज का नतीजा क्या हुआ ? कुछ समझ में आया आपके? सारी कथा संक्षेप में सुना दी मैंने और अन्त में मेहरुन्निसा के आने की भी बात बतला दी। जिसे सुनकर बाप, बेटी दोनों एक साथ चौंक पड़े। यह क्या कह रहे हैं शर्मा जी! आप - खाँ साहब, अपने स्वर को जरा कठोर करके बोले - मेरी बेटी तो बिल्कुल सुवह से मेरे पास है। फिर वह क्यों जायेगी उस भुतहे मकान में ? अब मेरे चौंकने की बारी थी। मुझसे कुछ बोला न गया कुछ कहा भी न गया । बस, मुँह बाये उन दोनों की ओर देखता भर रह गया मैं । दिन पर दिन उस भुतहे मकान की रहस्यमयी गुत्थी उलझती जा रही थी। मेहरुन्निसा का अस्तित्व मेरे लिए और अधिक जटिल और रहस्यमय हो गया था। मेरे कमरे में मेरा सिर सहलाने वाली और मुझसे बाते करने वाली आखिर थी कौन ? अगर मेहरुन्निसा नहीं थी तो फिर कौन थी? उस रात फिर मुझे बही लम्बी-चौड़ी काठी बाला ब्यक्ति मकान में दिखाई दिया । सिर झुकाये गमगीन-सा आंगन में खड़ा रहा था वह । मगर जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी - वह एकाएक आंगन की दीवार में समा गया। यह देख कर एकबारगी मेरे मस्तिष्क में कौंध सा गया। दूसरे दिन मैंने उस दीवार को तुड़वाना शुरू किया क्योंकि मेरे ख्याल में उसी दीवार के पीछे उस भुतहे मकान का सारा रहस्य छिपा हुआ था। मेरा अनुमान सही निकला। दीवार के गिरते ही मुझे सामने लगभग चार फुट लम्बी लोहे की मोटी चादर दिखलाई दी, वह चादर दीवार में पेचों के जरिये कसी हुई थी। मैंने उसे

भी खुलवाया। काफी मेहनत से खुली वह मोटी चादर । उसके हटते ही मुझे नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ दिख लायी दी। भीतर अंधेरा था और सीलन भरी बदबू भी थी। मैं टार्च की रोशनी की सहायता से सीढ़ियाँ उतर कर नीचे पहुंचा। नीचे मुझे एक लम्बा चौड़ा कमरा मिला । वह कमरा मुझे काफी रहस्यमय लगा। कमरे में एक बड़ी-सी लकड़ी की आलमारी थी - जो काफी पुरानी लग रही थी। मैंने उसे भी तुड़वाया । आलमारी में भी मुझे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के जमाने के चाँदी के कुछ सिक्के और जड़ाऊ तलवार मिली, कमरे के एक कोने में एक बड़ा भारी लोहे का सन्दूक भी था। उसका ताला बड़ा भारी और मजबूत था। उसे तोड़ने में काफी परेशानी हुई। उस लम्बे चौड़े सन्दुक के

खुलने पर मुझे उर्दू में लिखी हुई अरबी तंत्र-मंत्र की काफी पुरानी किताबें, और सुनहरे फ्रेम में जड़ी हुई दो तस्वीरें मिली । उन्हीं के साथ चमड़े में लिपटा हुआ एक दस्तावेज भी मिला। इन सब पुरानी वस्तुओं के अलावा सबसे आश्चर्यजनक और कौतुहल पूर्ण जो वस्तु मुझे उस सन्दुक में मिली - वह थी स्फटिक की एक तश्तरी। लगभग एक फुट व्यास की वह तश्तरी गहरी भी थी। जिसमें पीले रंग का कोई स्वच्छ द्रव भरा हुआ था। जिसमें कम्पास की तरह कई सुइयाँ तैर रही थी। जिनके चारो तरफ ग्रह-नक्षत्रो के चित्र खुदे हुए थे। सूइयाँ उन पर तेजी से घूम रही थी। मैंने उस तश्तरी को छूना चाहा। मगर जैसे ही उसका स्पर्श किया, उसी क्षण मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठा और सिर सनसनाने लगा और उसी के साथ मझे बिजली जैसा झटका लगा और स्फटिक की तश्तरी टूट गयी और उसमें का द्रव और कम्पास की सुइयाँ भी चारों ओर बिखर गयी और उनके बिखरते ही कमरे में भूचाल सा आ गया। दीवारे कांप उठी। मैं उन पुस्तकों दस्तावेज और सिक्के लेकर उस गुप्त कमरे के बाहर निकल आया। साथ में उन तैल चित्रों को भी लाना नहीं भूला उर्दू और अरबी का ज्ञान मुझे था। इसलिए उन प्राचीन तंत्र की पुस्तकों

और चमड़े की खोल में लिपटे उस दस्तावेज को पढ़ने और समझने में दिक्कत नहीं हुई। बे पुस्तके अरबी और फारसी तंत्र-मंत्र और ताबीजों के अलावा काला जादू, मैली विद्याओं, टोना टोटका आदि की हस्त लिखित प्राचीन व दर्लभ पुस्तकें थी, इसमें सन्देह नहीं। उन तांत्रिक पुस्तकों का लेखक कोई औलिया फकीर था, जो कभी अरब होता हुआ हिन्दुस्तान आया था। और हमेशा के लिए मुलतान में ठहर गया था। कहने की आवश्यकता नहीं, आज से करीब दो सौ वर्ष पहले मुलतान

अरबी और फारसी तांत्रिकों का गढ़ था। वह औलियाँ प्राय: खामोश रहता था और हर समय अपनी तांत्रिक साधना में डूबा रहता था। उसने कुछ दिनों बाद अपना एक शिष्य बनाया। जिसका नाम था शाकीर । शाकीर पक्का शार्गिद साबित हुआ । वह खूब सेवा टहल करता अपने गुरु का । गुरु भी अपने लड़के की तरह मानता अपने शिष्य को । ऐसी स्थिति में जो परिणाम सामने आना चाहिए - बहीं आया। शाकीर एक अच्छा साधक बन गया । औलिया की सारी तांत्रिक विद्या उसने धीरे-धीरे सीख ली। मगर तांत्रिक साधना और तांत्रिक विद्याओं ने शाकीर में विनम्रता, सहिष्णुता और बिबेक के बजाय अहंकार भर दिया। अपने आपको महा शक्तिमान समझने लगा वह। अपनी शक्ति और अपने सामर्थ्य के सामने वह किसी को कुछ न समझता। दस्तावेज के अनुसार उसे एक परी सिद्ध थी। जो काफी शक्तिशाली थी। वह शाकीर के इशारे पर कोई भी अच्छा या बुरा काम कर सकती थी। उसी का बेहद घमण्ड था शाकीर को । औलिया के मरने के बाद तो शाकीर का अहंकार और घमण्ड और बढ़ गया । तभी उस पर नजर पड़ी मुलतान के एक जमींदार की। जिसका नाम था कुरबान अहमद – कुरबान अहमद, शाकीर की रूहानी ताकत से भली-भाँति परिचित था। एक दिन उसने

शाकीर को अपने पास बुलाया अपनी एक कोई बहुत बड़ी समस्या उसके सामने रखी। शाकीर ने परी की सहायता से उस जटिल समस्या को हल कर दिया, जिसके बदले जमींदार ने उसे बहुत सारे सोने चाँदी के सिक्के और जड़ाऊ गहने दिये। और याददाश्त के तौर पर एक जड़ाऊ तलवार भी भेंट की। उस जमाने में वह लाखों की सम्पत्ति थी। मगर शाकीर उससे खुश नहीं हुआ। वह तो मेहरुन्निसा को चाहता था । कुरबान अहमद की इकलौती बेटी मेहरुन्निसा को । उसकी खूबसूरती और हुस्न ने शाकीर के मन की शान्ति छीन ली थी। वह हर हालत में मेहरुन्निसा को पाना चाहता था। मगर वह जमींदार अपनी इकलौती बेटी को उसे देना नहीं चाहता था। जब किसी भी प्रकार वह तैयार नहीं हुआ तो शाकीर ने अपने इल्म से काम लिया । एक दिन जब रात के अंधेरे में सारा मुलतान शहर डूबा हुआ था और लोग गहरी नींद में बेखबर सोये हुये थे, उसी वक्त दौड़ती-हांफती मेहरुन्निसा आयी और शाकीर की चौड़ी छाती से लिपट गयी। और फिर अपने आपको शाकीर के हवाले कर दिया । शाकीर तो यही चाहता था। उसकी मुराद पूरी हो गयी थी। वह रू का नहीं, उसी रात मेहरुन्निसा को लेकर सीधा कलकत्ता के लिये रवाना हो गया। वह मेहरुन्निसा को इस शहर से बहुत दूर ले जाना चाहता था ताकि उसके बाप का साया उस पर न पड़े ।
 
उस वक्त शाकीर की उम्र चालीस के लगभग थी। जबकि मेहरुन्निसा ने सोलह बसंत ही पार किया था । निश्चय ही उस वक्त उसकी पवित्र आत्मा रूहानी दनिया की किसी नापाक ताकत के गिरफ्त में थी। वर्ना वह कभी भी उस अधबूढ़े और बदसूरत तांत्रिक को अपना तन-मन अर्पित न करती। खैर ! शाकीर कलकत्ते में पूरी तरह जम गया। उसकी चमत्कारी तंत्र विद्या ने उसे शौहरत भी दी और धन दौलत भी दिया। उसने मेहरुन्निसा से शादी की और उसके लिए हबेलीनुमा महल बनवाया । जिसका नाम रखा इशरत महल - मगर जो होना था - वही हुआ । एक दिन शाकीर की इल्म छन्न से टूट कर बिखर गयी और जब मेहरुन्निसा को सच्चाई का एहसास हुआ तो मन मसोस कर रह गयी । इसके अलावा और चारा ही क्या था। उन्हीं दिनों एक अंग्रेज युवक शाकीर के यहाँ आने जाने लगा था। उसका नाम था डफ । इफ काफी सुन्दर स्मार्ट और सजीला नौजवान था। सबसे अधिक दिलकश थी उसकी भूरी आँखे - जिसमें एक अजीब सा सम्मोहन भरा था। पहली ही मलाकात में दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे। मेहरुन्निसा को एक अपनत्व और प्यार भरे दिल की और साथ ही किसी मर्द के मजबूत सहारे की जरूरत थी उस समय । दोनों उसे एक साथ ही मिल गया । इफ ने उसके सारे सपने पूरे कर दिये । मगर शाकीर से उन दोनों प्रेमियों का प्यार ज्यादा दिन छिपा न रह सका। वह हर समय शराब के नशे में डूबा रहता था और एक दिन जब वह रोज की तरह शराब की नशे में गले तक डूबा हुआ था –

दोनों को प्यार करते हुए देख लिया उसने । ऐसी नाजुक स्थिति में जो घटना घटनी चाहिये वह दूसरे क्षण घट गयी। शाकीर की आँखों में खून उतर आया। वह लपक कर मेहरुन्निसा के बाप का दिया हुआ जड़ाऊ तलवार उठा लाया और उसने एक ही साथ दोनों का कत्ल कर दिया। दोनों प्रेमियों का खून से डूबा हुआ जिस्म जमीन पर गिर कर एक साथ छटपटाया और एक ही साथ हमेशा-हमेशा के लिए

शान्त भी हो गया। इफ का बाप ब्रिटिश सरकार के किसी उच्चपद पर था। जब उसे मालूम हुआ कि उसके बेटे का प्यार के मामले में कत्ल हो गया है और कत्ल करने वाला शाकीर है तो एकबारगी बौखला गया वह। वह चाहता तो शाकीर को तबाह कर देता- मगर वह उसकी रूहानी ताकत से भली-भांति परिचित था। इसलिए वह खामोश हो गया। पर डफ के दोस्तों ने शाकीर से बदला लेने की ठान ली। डफ के दोस्तों में कुछ हिन्दू भी थे- जिनके लिए डफ ने बहुत कुछ किया था। इसलिए वे अधिक उतावले हो रहे थे।

आखिर वे हिन्द दोस्त एक साथ निहत्थे ही शाकीर के मकान में घुस गये और मारपीट करने लगे। शाकीर था तो अकेला, मगर उसके हाथ में तलवार थी। तलवार के बार के सामने निहत्थे युबक भला कब तक ठहर पाते । शाकीर के हाथों सभी मारे गये । इशरत महल का आंगन लाशों से पट गया। शाकीर इतने से ही शान्त नहीं हुआ । दस्तावेज के अन्त में लिखा था कि उसने अपने इल्म के जोर से मेहरुन्निसा और डफ के अलावा उन सभी युवकों की आत्माओं को इशरत महल में कैद कर दिया ताकि बे जिन्दगी के लिए हमेशा प्यासी रहें और हमेशा भटकती रहें इशरत महल में । यह भी लिखा था कि जब तक स्फटिक की तश्तरी के कम्पास की सुइयाँ घूमती रहेंगी- तब तक बे आत्मायें इशरत महल में कैद रहेगी और उनकी मुक्ति न होगी। मगर यह काम शाकीर के लिए महंगा पड़ा। कुछ दिनों बाद, एक रात वे सभी प्यासी आत्मायें एक साथ शाकीर पर टूट पड़ी और उसका गला घोंट दिया। सवेरे उसकी लाश आंगन में पड़ी पायी गयी। उसकी आँखे और जीभ बाहर को निकली हुई थी और चेहरे पर भय का भाव था। खैर कहने की जरूरत नहीं, तभी से इशरत महल भुतहा हो गया। उन दो तस्वीरों में पहली शाकीर की तस्वीर थी। उसका चेहरा बड़ा भयानक और प्रभावशाली था। यदि किसी सांप को इन्सान की शक्ल से बदल दिया जाय तो वह बहुत कुछ शाकीर जैसा लगेगा। उसका जबड़ा चौड़ा था और नीचे की ओर लटका था। उसकी आँखे लम्बी और गहरी थी और नीलम जैसी चमक थी। उसकी आँखो के भाव को देखकर लगता था कि अपनी शक्ति पर उसे जैसे बहुत विश्वास हो। दूसरी तस्वीर देखते ही एकबारगी चौंक पड़ा मैं । पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। काफी देर तक गौर से देखता रहा मैं । वह मेहरून्निसा की तस्वीर थी। मगर उसमें जो शक्ल थी वह बिल्कुल खाँ साहब की बेटी मेहरून्निसा से मिलती-जुलती थी। वही रूप-रंग और वही नाक-नक्श । कहीं कोई फर्क नहीं। लगा कि जैसे खाँ साहब की बेटी मेहरून्निसा के ही सामने बैठकर चित्रकार ने उस चित्र का निर्माण किया हो। उस चित्र को देखकर मेरी एक शंका का समाधान हो गया। वह यह कि मैंने उस दिन अपने कमरे में जिस मेहरून्निसा को देखा था और जिससे बातें की थी, वह खाँ साहब की बेटी मेहरून्निसा नहीं बल्कि

शाकीर की बीबी मेहरून्निसा थी । खाँ साहब को सारी कहानी सुनाने के बाद जब अन्त में यह बात बतलाया तो बे एकबारगी स्तब्ध रह गये । मुझे इस बात की भारी प्रसन्नता थी कि मेरे हाथ अनायास अरबी और फारसी तंत्र-मंत्र और जादू टोना की हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकें लग गयी थी। वास्तव में तंत्र-मंत्र की बेअद्भुत.पुस्तकें थीं।

इसमें सन्देह नहीं। इन तमाम घटनाओं के घटे एक लम्बा अर्सा गुजर चुका है। इशरत महल की वे तमाम प्यासी आत्मायें मुक्त हुई या नहीं- यह तो मैं नहीं बतला सकता। लेकिन तबसे फिर कभी कोई भयानक घटना नहीं घटी । खाँ साहब ने इशरत महल को तुड़वाकर नये सिरे से उनका निर्माण कराया और उसका नाम रखा मेहरून्निसा महल ।
 
अध्याय १६ कौन थी वह

सायंकाल का समय ! नित्य की भांति मौन साधे बैठा था काशी के लालीघाट की धूल भरी आड़ी तिरछी सीढ़ियों पर मैं। उसी समय सामने से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आते हुए दिखाई दिये रमाशंकर शुक्ल । शुक्लजी मेरे मित्र थे और उन दिनों काशी के एक विशिष्ठ पाठशाला में संस्कृत के अध्यापक थे । मुझ पर दृष्टि पड़ते ही अपनी भारी आवाज में बोले- अरे, भाई शर्माजी ! सुना आपने कुछ, सारनाथ (वाराणसी) में पिछले छः-सात दिनों से एक महात्मा ठहरे हुए हैं, नाम है दिव्यगन्ध । सिक्किम में उनका छोटा सा आश्रम है। बड़े उच्चकोटि के सिद्ध महात्मा है वह, इसमें सन्देह नहीं। थोड़ा रूककर आगे बोले-शुक्लजी दो दिन सत्संग में रहा मैं ।

अद्भुत चमत्कारी जीव हैं स्वयं । एक सांस में ये सारी बातें बतला दी मुझे शुक्ल जी ने । वे मेरे स्वभाव से भलीभांति परिचित थे और यह भी अच्छी तरह जानते समझते थे कि गुस व रहस्यमय ढंग से निवास करने तथा प्रच्छन्न रूप से संचरण-विचरण करने वाले सिद्ध साधकों और योगी महात्माओं की खोज में बराबर रहता हूँ मैं - दूसरे ही दिन गया मैं सारनाथ - राजा, योगी और बेश्या इन तीनों के यहाँ कभी भी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए । इसलिए थोड़ा सा फल और रसगुल्ला ले लिया था मैंने रास्ते में ।

जब मैं सारनाथ पहुँचा उस समय भगवान तथागत के उस रमणीक और शान्त वातावरण में सांझ की स्याह कालिमा बिखरने लगी थी और गूंजने लगा था, 'बुद्धं शरणं गच्छामि...' का स्वर । महात्मा दिव्य गन्ध जहाँ ठहरे हुए थे उस स्थान को खोजने में कोई कठिनाई नहीं हुई मुझे। बड़ी सरलता और बड़ी सहजता से मुझे दर्शन लाभ हुआ उस महापुरुष का । मझोला कद, गौर वर्ण, मुख पर प्रखर आध्यात्मिक तेज और परमशान्ति की आभा । शरीर पर कषाय बख गले में झूलती रुद्राक्ष की कई मालाएँ और सदैव स्थिर रहने वाली होठों पर मन्द-मन्द मुस्कान । अबोध शिशु की जैसी आँखें होती है, वैसी ही कामना बासना आदि से रहित शून्य निर्विकार आँखें, और जिनमें थी एक अलौकिक चमक | यह था महात्मा दिव्यगन्ध का आध्यात्मिक व्यक्तित्व, जिसे देखते ही प्रभावित और साथ ही सम्मोहित सी हो गयी थी

मेरी आत्मा एकबारगी। छोटा सा कमरा, जिसके एक ओर तख्त लगा था और उसी तख्त पर बैठे हये थे शान्त मुद्रा में महात्मा दिव्यगन्ध । झुककर चरण स्पर्श किया और बगल में फल मिठाई रख दिया मैंने । जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। जिस पर दो सज्जन बैठे हुए थे चुपचाप मौन साधे । मैं भी बैठ गया चटाई पर एक ओर । उस छोटे से कमरे में एक विचित्र-सी शान्ति का अनुभव हुआ मेरी आत्मा को । वह शान्ति कैसी थी बतला नहीं सकता मैं। कुछ देर बाद दोनों व्यक्ति महात्मा का चरण स्पर्श कर चले गये तो मैंने अपना परिचय देते हुए अपनी कंटकाकीर्ण आध्यात्मिक यात्रा की व्यथा भरी कथा सुना डाली शुरू से अन्त तक की उस परम साधक को और फिर अन्त में कहा- न जाने किस अज्ञात प्रेरणा के वशीभूत होकर मेरी आत्मा चल पड़ी है। अध्यात्म के तिमिराच्छन्न मार्ग पर, स्वयं उससे अपरिचित हूँ मैं और इस रहस्य से भी अनभिज्ञ हूँ कि कौन सा उद्देश्य लेकर जन्म लिया है इस संसार में मेरी आत्मा ने । कौन सा कार्य सम्पादित कराना चाहता है वह अज्ञात मेरी आत्मा से। कुछ समझ में नहीं आ रहा है प्रभु । आप ही मेरा मार्गदर्शन कर सकते हैं इसमें सन्देह नहीं । मेरी बात ध्यान से सुनते रहे महात्मा दिव्यगन्ध, फिर काफी देर तक अपनी शून्य दृष्टि से अपलक देखते रहे वह मेरी ओर । न जाने क्या खोजती रही उनकी प्रखर और जलती हुई आँखें मुझमें । समझ न सका मैं उस समय । लेकिन हाँ ! न जाने कैसा विचित्र अनुभव हो रहा था, मेरे अन्तर्मन में उन क्षणों, बतलाया नहीं जा सकता ।

उसी समय न जाने किधर से एक छोटी सी बालिका आकर सामने खड़ी हो गयी महात्मा के । १०-१२ वर्ष की रही होगी वह बालिका। सांवला रंग था, गोल चेहरा था, लेकिन अत्यन्त आकर्षक और मन को मोह लेने बाली, बड़ी-बड़ी भौराली आँखें और रक्ताभ होठ। भद्र महिलाओं की तरह लाल चौड़े पाढ़ की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी वह । बड़ा अचरज हुआ मुझे स्त्रियों की तरह साड़ी में लिपटी हुई देखकर उसे । सबसे सुन्दर लगा मुझे उसके चौड़े ललाट पर लगा ध्रुवतारा जैसा चमकता हुआ सिन्दूर का गोल टीका । हे भगवान ! कौन है यह अद्भुत कन्या ? सामने रखी हुई फल मिठाई की ओर उंगली से संकेत कर महात्मा उस बालिका से बोले-ले जा इसे। इसी सबके लिए आयी है न तू । जा भाग जा। उस अपरिचित कन्या ने एक बार मेरी ओर देखा और फल, मिठाई हाथ में लेकर चली गयी बाहर वह

बालिका के चले जाने के बाद महात्मा दिव्यगन्ध मन्द स्वर में बोले- जिस अज्ञात की बात तुमने कहीं है वह विश्वातीत और भावातीत है, उसे भगवान श्रीकृष्ण भी न समझ सके । प्रकृति के नियम और नियति के सिद्धान्तों से भी परे है वह । वर्तमान में तुमको बस इतना ही समझ लेना चाहिए कि वह अज्ञात अध्यात्म से संबंधित तिमिराच्छन्न और रहस्यमय सत्यों को तुम्हारे द्वारा प्रकाश में लाना चाहता है और यह तभी सम्भव है जब तुम अपने आपको और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समर्पित कर दोगे उसे समझे। यह सुनकर कुछ बोला न गया और न तो कुछ कहा ही गया मुझसे । उठकर चरण स्पर्श किया उस परम पुरुष का और वापस लौट आया घर । हे भगवान ! यह क्या ? कमरे का दरवाजा खोलते ही जिस बस्तु पर मेरी दृष्टि पड़ी उसे देखकर एकबारगी स्तब्ध और आश्चर्यचकित रह गया मैं । पाषाणवत सा हो गया मेरा पूरा शरीर अपने स्थान पर । सामने मेरे मेज पर बही फल और मिठाई रखी हुई थी जिसे लेकर गया था मैं महात्मा दिव्यगन्ध का दर्शन करने के लिये । कैसे हो गया यह सब । कौन रख गया मेरे कमरे में फल मिठाई ? कमरे का दरवाजा तो बाहर से बन्द था, ताला भी लगा हुआ था। वह बालिका तो मेरे सामने ही ले गयी थी फल मिठाई। पूरे छ: मील का रास्ता चलकर वह यहाँ पहुँच ही नहीं सकती, असम्भब है, और फिर मेरा मकान भी तो देखा नहीं था उसने और तब फिर...कौतूहल और जिज्ञासा के मिले जुले भाब से भर उठा था मेरा मन ।
 
इस रहस्यमयी घटना को जानने समझने के लिये व्याकुल हो गया मैं। दसरे दिन बिल्कुल सबेरे उठा और नहा धोकर सारनाथ के लिये चल पड़ा मैं । दिव्यगन्ध मुझे देखकर मुस्कराये । चरण स्पर्श किया मैंने । उनके एक शिष्य से ज्ञात हुआ कि बे अगले दिन प्रस्थान करने वाले हैं सिक्किम के लिए। यह सुनकर बिह्वल हो उठा एकबारगी मैं । ऐसे सिद्ध साधकों का दर्शन लाभ कई जन्मों के पुण्य उदय होने पर ही होता है। इतना ही नहीं उनके सान्निध्य का और उनके साथ आध्यात्मिक सत्संग का अवसर भी उसी को प्राप्त होता है- जो उसका अधिकारी है। अपने आपको संभाला न गया मुझसे और लोभ भी संबरण न कर सका मैं उनके सान्निध्य का । जब मैंने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए संकोच भरे स्वर में कहा- बाबा ! आपकी सिक्किम यात्रा में मैं भी चलना चाहता हूँ सेवाभाव से आपके साथ । आज्ञा दीजिये आप मुझे । मेरी बात सुनकर पहले महात्मा दिव्यगन्ध मुस्कराये और फिर सिर हिलाकर स्वीकृति दे दी अपनी उन्होंने । गद्द् हो उठी मेरी आत्मा और प्रसन्न हो उठा मन और उसी प्रसन्नता में भूल गया मैं बाबा से यह पूछना कि कैसे पहुँच गयी मेरे कमरे में फल मिठाई ? इसी जिज्ञासा और कौतूहल को शान्त करने के लिये ही तो गया था मैं सारनाथ ।

सिक्किम के उत्तर में तिब्बत, पश्चिम में नेपाल ओर पूरब में भूटान स्थित है। तिस्ता और रिंगित ये दो पहाड़ी नदियाँ सिक्किम को भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल से अलग करती है। घने जंगलों और हिमालय की हिम मण्डित श्रृंखलाओं के फलस्वरूप सिक्किम का प्राकृतिक वातावरण अति सुखद, शान्त और शीतल प्रतीत हुआ मुझे। पूरे छ: दिन की पर्वतीय यात्रा के बाद साधक दिव्यगन्ध और उनके शिष्यों के साथ पहुँचा मैं चुंगधांग ! तिस्ता नदी का उद्म स्थल है चंगधांग ! बड़ा ही मनोहारी सुन्दर रमणीक और प्राकृतिक छटाओं से भरा हुआ था चुंगधांग । चारो ओर घने जंगल और उसके बाद हिमाच्छादित पर्वत शिखरों की श्रृंखलायें और उन श्रृंखलाओं के ऊपर धुनी हुई रुई की तरह आकाश में तैरते हए बादलों के छोटे-बड़े टुकड़े । सांझ की स्याह कालिमा बिखरी हुई थी चंगधांग के शान्त और नीरव बाताबरण में लेकिन डूबते हुए सूरज के प्रकाश के पीले धब्बे अभी भी पर्वत शिखरों पर चमक रहे थे। तिस्ता के उन्म के ठीक ऊपर झोपड़ी की तरह एक छोटी सी कुटिया थी महात्मा दिव्यगन्ध की। कुटिया के चारो ओर हरे भरे पेड़ थे और थी बिभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ । कुटिया के भीतर मिट्टी के छोटे-छोटे चार कमरे थे । दरबाजा किसी में नहीं था । कुटिया के सामने मौलसरी का काफी बड़ा वृक्ष था, जिसके नीचे एक काफी लम्बा-चौड़ा काले पत्थर का चबूतरा था जिस पर सायंकाल बैठकर चिन्तन-मनन करते थे नित्य दिब्यगन्ध । मेरे ठहरने की व्यवस्था कुटिया के ही एक कमरे में हो गयी। मुझे इस बात का घोर आश्चर्य हुआ कि कोई भी साधक या योगी रात्रि के समय अपने निकट किसी को भी रहने नहीं देता। वह रात्रि का होता है और रात्रि उसकी होती है। इसका क्या रहस्य है यह मैं नहीं जानता । लेकिन उस महान साधक और योगी को किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं थी- अपने निकट रात्रि में मुझे रखने में । प्रसन्न था मैं और उत्साहित भी । लेकिन आश्चर्य की बात तो यह थी कि इतने निकट होते हुए भी मुझसे बहुत ही कम बातें करते थे और प्राय: मौन ही रहते थे महात्मा दिव्य गन्ध । कभी कदा चबूतरे पर जब बे बैठे हुए होते थे उस समय साधना संबंधी चर्चा करते वह मुझसे, बास्तव में दिव्यगन्ध का व्यक्तित्व वहाँ उस स्थान पर अत्यन्त रहस्यमय प्रतीत हुआ मुझे। प्राय: समाधि में ही रहते थे दिव्यगन्ध । उस दिन भी नित्य की भांति समाधि में लीन थे वह ।

रात्रि का पहला प्रहर था सम्भवत: । पूर्णमासी का चांद पहाड़ों के ऊपर चढ़ आया था उस समय । हिमाच्छादित पहाड़ों और जंगलो में उसकी धवल चांदनी बिखरी हुई थी। शान्त और निस्तब्ध बातावरण में एक विचित्र-सी नीरवता और एक विचित्र-सी उदासी उतर आयी थी जैसे । नदी के उद्गम स्थान पर एक छोटा-सा झील था जो काफी गहरा था और उसका पानी अत्यन्त निर्मल था । उसी झील के किनारे चुपचाप बैठा हुआ था मैं गालों पर हाथ धरे । चाँद काफी ऊपर आ गया था अब । निस्तब्धता भी पहले से अधिक गहरी हो गयी थी। चारो ओर सांय-सांय हो रहा था। निश्चय ही अधिक हो गयी थी रात । एकाएक मेरी दृष्टि उठ गयी आकाश की ओर | वहाँ एक विचित्र और अविश्वसनीय दृश्य देखा मैंने । नीले निरभ्र आकाश में बादलों के टुकड़े तैर रहे थे और उन्ही के बीच से धीरे-धीरे एक छायाकृति उतर रही थी नीचे की ओर । आश्चर्यचकित भाव से देखने . लगा मैं उस रहस्यमयी छायाकृति को उतरते हुए और जब वह झील के उस पार धरती पर उतर गयी तो उसका रूप प्रकट हुआ चांदनी में। हे भगवान् ! वह तो एक नवयुवती थी, अति सुन्दर और अति लावण्यमयी। उस बियाबान चांदनी रात में अविश्वसनीय रूप से आकाश से धरती पर अवतरित होने वाली उस गौरांगी नवयुबती की उपस्थिति अत्यन्त रहस्यमय लगी मुझे। भय मिश्रित कौतूहल और जिज्ञासा के भाव से भर उठा मेरा मन । कौन थी वह ? देवकन्या या कोई अप्सरा।।

लम्बा कद, इकहरी देह, बर्फ की तरह बिल्कुल सफ़ेद शरीर का रंग, थोड़ा लम्बा चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें, ऊँचा चौड़ा मस्तक, और उस मस्तक पर ध्रुव तारे की तरह चमकती हुई बिंदिया, सुन्दर गले में हार झूल रहा था जिसमें जड़े हुए कीमती रंग-बिरंगे नग चांदनी में अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहे थे | संगमरमरी काया पर साड़ी की तरह एक झीना सा पारदर्शी रेशमी बख था दूध जैसा धबल, आश्चर्यजनक ढंग से इस प्रकार आकाश से धरती पर आना उसे किसी अन्य लोक के प्राणी होने का संकेत कर रहा था। युवती कुछ क्षण तक झील के किनारे खड़ी रही स्थिर भाब से और फिर उसने चारो ओर देखा सिर घुमाकर । जैसे निर्भय हो जाना चाहती हो वह । एक अनर्वचनीय अनुभूति हो रही थी मुझे उस समय और उसी विलक्षण अवस्था में उस नवयुवती को अपलक देखता रहा मैं न जाने कब तक। एकाएक उस नीरव शान्त बाताबरण में एक चीख गूंज उठी और उसी के साथ भंग हो गयी मेरी तन्मयता भी। निश्चय ही वह चीख उसी रहस्यमयी युवती की थी इसमें सन्देह नहीं। संभवतः उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ गयी थी और देख लिया था उसने मुझे। उस समय उसकी झील जैसी आँखों में आश्चर्य, विस्मय, भय और कौतूहल के मिले-जुले भाव स्पष्ट झलक रहे थे। काफी देर तक देखती रही उसी अवस्था में मुझे और फिर धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ने लगी और मेरे सामने आकर खड़ी हो गयी वह चुपचाप – एकबारगी सहम-सा गया मैं । दूसरे क्षण किसी अनर्वचनीय सुगन्ध से भर गया मेरा नासापुट । न जाने किस भाव से मेरी ओर देख रही थी वह, मेरी समझ में नहीं आया । विचित्र थी उसकी भाव भंगिमा उस समय ।

आखिर रहा न गया मुझसे पूछ ही बैठा मैं, कौन हैं आप और कहाँ से आयी हैं आप इस बियाबान अरण्य प्रदेश में...। मेरा प्रश्न सुनकर वह नवयुवती पहले हल्के से मुस्करायी फिर उसके बाद पलकें झपकाकर कोमल स्वर में बोली-वैश्वानर लोक की सुन्दरीहूँ मैं । योगियों का भाव राज्य है वह। समाधिकी उच अवस्था में प्रवेश करते हैं उसमें योगीगण | सचमुच वैश्वानर लोक अत्यन्त रमणीक और अद्भुत छटाओं से भरा हुआ एक सुरम्य लोक है। वहाँ भाव ही प्रधान है। आनन्द मग्न रहते हैं योगीगण वहाँ के अपार्थिव वातावरण में । उस सुन्दरी का स्वर अत्यन्त मधुर, कोमल और स्निग्ध था | लगा जैसे उसके मुख से शब्दों के रूप में लाजबन्ती के नन्हें-नन्हें फूल झर रहे हों। थोड़ा रूककर वह कोमलांगी आगे बोली- अब मैं आपको अपना पूरा परिचय दे ही दूं- मैं सिद्धि हूँ जिसको पास करने के लिये मनुष्य योग की कठिन साधना करता है।
 
यह सुनकर घोर आश्चर्य हुआ मुझे। योग सिद्धियों के विषय में बहुत कुछ पढ़ा और सुना था, इसके अतिरिक्त योग की कई सिद्धियों का चमत्कार भी देखा था लेकिन कभी कोई योगसिद्धि लावण्यमयी नवयुवती के रूप में साकार होकर प्रकट होगी मेरे सामने, इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी मैंने, सपने में भी नहीं। सम्भवत: मेरी बात समझ गयी वह रूपांगना । अपने आप हँस पड़ी एकबारगी वह । सचमुच बड़ी ही स्निग्ध और रस भरी हँसी थी लगा जैसे किसी मन्दिर की कई घण्टियाँ एक साथ बज उठी हो। खूब हँस लेने के बाद उसी प्रकार रस पगे स्वर में वह बोली- योग साधना मार्ग का चरम प्राप्तव्य है "भावातीत अबस्था', जिसे योग की भाषा में कहते हैं भावातीत समाधि और योगीगण उस परमसमाधि की अवस्था में आनन्दमग्न रहते हैं वैश्वानर लोक में। भावातीत समाधि वास्तव में आत्मा की समाधि है।

आत्मा का जो आनन्द है वह आनन्द उसे उपलब्ध होता है उस समाधि के माध्यम से वैश्वानर लोक में। बैश्वानर लोक तीन प्रकार की आत्माओं का विचरण स्थान है। पहली बे आत्मायें हैं जो ऊपर के लोकों से भ्रमण करने के उद्देश्य से वहाँ आती है और कुछ काल व्यतीत कर वापस अपने लोक को लौट जाती है। दूसरी बे आत्मायें हैं जो वैश्वानर लोक की स्थायी निवासिनी हैं और तीसरी वे आत्मायें हैं- जो मानवीय होती हैं और भावातीत अवस्था में प्रवेश करती है उस परम दिव्य लोक में । स्थायी आत्मायें अपने आपमें स्वतंत्र होती है। उनकी गति सर्वत्र हैं।

योगसिद्ध महात्मागण अपनी योगसिद्धि के बल पर उन्हें आवश्यकता पड़ने पर पार्थिव शरीर में साकार रूप भी प्रदान करते हैं। मुझे ही ले लो, अपनी आँखों को झपकाकर नवयुवती आगे बोली- वैश्वानर लोक की स्थायी निवासिनी हूँ मैं । बाबा ऐसा ही करते हैं मेरे साथ । अपनी योग सिद्धि के बल पर बाबा मुझे बुला लेते हैं और इस प्रकार प्रकट हो जाती हूँ मैं साकार रूप में और फिर जो वह आज्ञा देते हैं उसको करना पड़ता है मुझको लेकिन यह रूप स्थायी नहीं है। इस शरीर का इस रूप का और इस लावण्यमय यौवन का निर्माण तो बाबा के योग सिद्धि बल से हुआ हैं जो कभी भी अपार्थिव सत्ता में विलीन हो सकता है। यह सब सुनकर अवाक् और स्तब्ध रह गया मैं एकबारगी। अचानक कुछ कौंध सा गया मेरे मस्तिष्क में। थोड़ा सहमकर मैंने पूछा- मेरी एक कौतूहल भरी जिज्ञासा है। क्या आप उसका कर सकती हैं। समाधान ? नवयुबती बोली- बतलाओ कौन सी है जिज्ञासा ? सारनाथ बाली घटना को बतलाते हुए मैंने अन्त में कहा- वह घटना सचमुच अत्यन्त आश्चर्यजनक कौतूहलपूर्ण और अविश्वसनीय है मेरे लिए। इसमें आश्चर्य और अविश्वास की क्या बात है- नवयुवती सरल भाव से और सहज ढंग से बोली- वह कन्या की जो आत्मा थी- वह वैश्वानर लोक की थी। जिसे पार्थिव रूप दिया था बाबा ने कुछ क्षण के लिए । बाबा किसी का दिया कुछ भी स्वीकार नहीं करते । हाँ या ना भी नहीं करते और इसीलिये आपकी वस्तु सिद्धि निर्मित्त बालिका द्वारा आपके स्थान पर भिजवा दिया उन्होंने क्षण मात्र में ।

समझ लीजिये ऐसे सभी कार्य होते हैं योग सिद्ध महापुरुषों के । यह सब अविश्वसनीय,अलौकिक बातें सुनकर विचित्र-सी हो रही थी मानसिक स्थिति। उस हिममय शान्त निस्तब्ध अरण्य प्रान्त में एक अज्ञात सा भय छाने लगा था मेरे मन मस्तिष्क पर । किसी प्रकार अपने आपको संभाल कर मैंने पूछा- बाबा ने क्या आज्ञा दी है आपको? उनके किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए पार्थिव कायाधारण करना पड़ा आपको ? मेरी बात सुनकर नवयुवती बोली- बैश्वानर लोक को सिद्ध लोक भी कहते हैं। सिद्धों की कई मण्डलियाँ हैं वहाँ। उन मण्डलियों में हजारों वर्ष से उच्चकोटि के सिद्धगण विद्यमान है और उनके भाव के ही द्वारा पृथ्वी पर मानव शरीर में निवास करने बाले सिद्ध-साधकों और योगियों से बना रहता है बराबर सम्पर्क । मैं एक बात बतलाऊं आपको विश्वास करेंगे? कौन सी बात है ? मैंने थोड़ा ब्यग्र होकर पूछा- बतलाइये, क्यों न करूंगा मैं विश्वास ।

"

नवयुबती मेरी आँखों में झांकते हुए कोमल स्वर में बोली- आप स्वयं अपने आपको नहीं जानते समझते, मनुष्य हो न । मनुष्य न अपने को जानता है और न तो दूसरे को ही और यही तो माया है, प्रकृति की माया ।अच्छा, छोड़िये इन बातों को । मैं यह कहना चाहती थी कि आप स्वयं को बिल्कुल नहीं जानते। जिन सबको आप अपना जानते हैं और समझते है अपना, वह सब किसी का दिया हुआ है। न नाम आपका है न शरीर आपका है और न तो है परिवार ही आपका। ये सब कुछ आपके माता पिता द्वारा प्राप्त हुआ है आपको। आपने स्वयं अर्जित नहीं किया किसी को। सच पूछिये तो यदि आपकी कोई बस्तु है अपनी तो वह है केवल आपकी आत्मा और वह आत्मा पूर्ण आध्यात्मिक है और है पिछले कई जन्मों के शुभ-सस्कारों से संपन्न और यही एकमात्र कारण है कि भाव राज्य के सिद्ध मण्डलियों से आपकी आत्मा का संबंध बराबर अगोचर रूप से बना रहता है जिससे अपरिचित हैं आप। क्या कहा आपने ? हे भगवान क्या सुन रहा हूँ मैं ये सब... । ठीक ही कह रही हूँ मैं । आश्चर्य नहीं होना चाहिए आपको । अविश्वास की तो कोई बात ही नहीं है क्योंकि ऐसा न होता तो आपकी आत्मा में आध्यात्मिक प्यास क्यों जगती ? साधु, सन्त और सिद्ध महात्माओं की खोज में इधर-उधर भटकते ही क्यों आप कुछ कहिए। लेकिन न कुछ बोला ही गया और न तो कुछ कहा ही गया मुझसे । बस सुनता रहा मैं उस सुन्दरी की बातें। भोर का समय हो चुका था । हिमालय के उत्तुंग शिखरों पर सूर्य की रश्मियों के लाल-पीले धब्बे चमकने लगे थे। पूरब का आकाश सफेद हो रहा था धीरे-धीरे और पक्षी कलरव करने लगे थे जंगलों में।

अब मैं चलती हूँ युवती का स्वर एकबारगी गूंज उठा कानों में और उसी के साथ मेरी स्वप्निल तन्द्रा भंग हो गयी और चौंककर चारो तरफ देखने लगा मैं । रहस्यमयी सुन्दरी, रहस्यमय ढंग से गायब हो चुकी थी अब तक । बस धुंआ-धुंआ सा फैला हुआ था उस समय मेरे चारो तरफ। किंकर्तव्यविमूढ़ सा न जाने कब तक बैठा रहा मैं उस निर्जन स्थान में । वास्तव में उस रहस्यमयी युवती की रहस्यमयी उपस्थिति और उसकी रहस्यमयी बातो ने स्तब्ध और पाषाणबत् कर दिया था एकबारगी मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को। धीरे-धीरे एक महीने का समय व्यतीत हो गया। इस अवधि में फिर कोई उल्लेखनीय बात नहीं हुई। एक दिन ज्ञात हुआ कि महात्मा दिव्यगन्ध पूरे पाँच दिनों तक महासमाधि में रहेंगे और उनकी कुटिया का पट बन्द रहेगा उस समय । यह सुनकर बेचैन हो उठा मैं ।
 
उस निर्जन, पर्वतीय वन प्रान्त में कहाँ मिलेगा मुझे आश्रय ? समझ में नहीं आ रहा था कुछ। दूसरे ही दिन कुटिया का पट बन्द हो गया पाँच दिनों के लिए। अब मैं क्या करूँ ? दोपहर का समय था । तिस्ता के किनारे गाल पर हाथ धरे न जाने क्या सोच विचार कर रहा था मैं और उसी समय एक सांवले रंग की लड़की न जाने किधर से आ गयी वहाँ । आयु यही रही होगी दस बारह साल के लगभग । शरीर गठीला और उसका रंग था गहरा काला। फिर भी वह सुन्दर और लावण्यमयी लगी मुझे। उसके चेहरे पर एक विचित्र सी चमक और आभा थी। आँखें भी बड़ी-बड़ी थी लेकिन थी झील जैसी गहरी और स्थिर — कम आयु होने पर भी उस लावण्यमयी कन्या के सिर के बाल काफी घने काले और काफी लम्बे थे- जो उसकी पीठ पर बिखरे हुए थे, कुल मिलाकर वह कृष्णवर्णा कन्या विशेष रूप से आकर्षक थी। इसमें सन्देह नहीं।

धीरे-धीरे चलकर मेरे बिल्कुल करीब आयी और अपनी स्थिर दृष्टि से देखने लगी मेरी ओर चुपचाप वह । आखिर रहा न गया मुझसे पूछ ही बैठा- क्या नाम है तुम्हारा?..

लड़की पहले मुस्करायी और फिर आकाश की ओर देखती हुई कोमल स्वर में बोली- मेरे नाम तो बहुत सारे हैं। कौन सा नाम बतलाऊँ मैं तुमको ? मेरा रंग काला है न । तुम काली कहकर बुला सकते हो मुझे यह ठीक रहेगा। मैंने उस अबोध बालिका का मन रखने के लिए कहा कौन कहता है कि तुम्हारा रंग काला है ? सांबला है सांबला। फिर काली क्यों कहूँगा? इससे क्या ? लड़की मुस्कराती हुई बोली- सांबला रंग भी तो काले रंग का ही हल्का रूप है । मैं कुछ नहीं जानती, बस । तुम मुझे काली ही कहकर बुलाना, समझेन । लड़की चतुर थी और बाक्पटु भी- यह समझते देर न लगी मुझे। पूछा- कहाँ रहती हो ? अपना बाया हाथ उठाकर तर्जनी उंगली से एक ओर इशारा करती हुई वह बोली सामने पहाड़ों की जो तलहटी है न उसी तलहटी में रहती हूँ मैं । इश्वर कैसे आयी- मैंने पूछा ? बाबा की देखभाल करनी पड़ती है न इसीलिए आ जाती हूँ कभी कदा- बड़े ही भोलेपन से उत्तर दिया उस बालिका ने । फिर थोड़ा रुककर आदेश भरे स्वर में बोली वह- इस आश्रयहीन, निर्जन और सुनसान इलाके में क्या करोगे? और कहाँ, कैसे रहोगे ? बाबा की कुटिया तो बन्द हो चुकी है अब...चलो उठो, आओ मेरे साथ । इतना कहकर उस अपरिचिता ने मेरा हाथ थामकर जोर से खींचा मुझे अपनी ओर ।

लड़खड़ा सा गया फिर संभाला अपने आपको और फिर चल पड़ा मैं मंत्रमुग्ध सा जड़वत उस लड़की के साथ तलहटी की ओर । लड़की बड़ी तेजी से कदम उठाती हुई आगे-आगे चल रही थी। पूरे एक घंटे का समय लगा तलहटी तक पहुँचने में। काफी दर तक फैला हआ था तलहटी का मैदान । जिसके एक ओर घना जंगल था और दूसरी ओर था गगनचुम्बी पर्वतों की श्रृंखलाएं । घोर निस्तब्धता थी वातावरण में । चारों ओर सांय-सांय हो रहा था। गहन उदासी भी थी बहाँ । एक दूसरे से काफी अलग-अलग कई झोपड़ियाँ थी घास-फूस की। उन्हीं में एक झोपड़ी थी काली की भी। जिसके भीतर बस एक ही कोठरी थी जिसमें एक काठ का तख्त था जो जर-जर हो चुका था और जिस पर एक मैली कुचैली चादर बिछी हुई थी। कुछ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं थी वहाँ । सामने की दीवार पर भद्रकाली का एक चित्र टंगा हुआ था। जिसके शीशे पर न जाने कब की धूल जमी हुई थी और चढ़ी हुई जबा फूल की माला भी न जाने कब की सूख चुकी थी मुरझाकर । तख्त पर एक अतिवृद्ध सज्जन बैठे अपलक निहार रहे थे काली माँ की मटमैली पड़ी छवि की ओर । ज्ञात हुआ कि वह वृद्ध सज्जन उस बालिका के दादा थे और उनका नाम था पूर्णेन्दु शेखर – बंगाली सजन थे महाशय । कलकत्ता में सरकारी अफ़सर थे। सारी सुख सुविधायें थी। किसी बात की कमी नहीं थी, लेकिन पचास वर्ष पूर्व केवल तीस वर्ष की आयु में विराग हो गया उन्हें

और न जाने किस प्रेरणा के वशीभूत होकर कलकत्ता से उस बीरान, सुनसान पहाड़ी तलहटी में आकर बस गये थे महाशय । फिर वापस कलकत्ता नहीं गये । युवा पत्नी का मोह भी आकर्षित न कर सका कभी उन्हें वह भी पति की प्रतीक्षा करते-करते दिवन्यात हो गयी बेचारी। एक पुत्र था वह अपनी पत्नी के साथ कलकत्ता में रहता था । नौकरी करता था। साल दो साल में एक बार पत्नी के साथ पिता का दर्शन लाभ करने चला आया करता था। नाम था सखेन्द्रशेखर । उसकी एक मात्र पुत्री थी कालिन्दी । महाकाली के उपासक थे पूर्णेन्दु शेखर । प्राय: साधना उपासना में ही लीन रहते थे महाशय । शायद इसी कारण अपनी पौत्री का नाम रखा था कालिन्दी। पिछली बार दुर्गा पूजा के अवसर पर अपने । माता-पिता के साथ आयी तो जिद करके दादा के पास ही रह गयी कालिन्दी। उस समय उसकी आयु मात्र नौ साल की थी। आश्चर्य की बात तो यह थी कि इतनी अल्पायु में वह कोमल बालिका भोजन

बनाती, बर्तन साफ करती, पूरी झोपड़ी की सफाई करती और रात में सोते समय दादा का पैर भी दबाती। इतना ही नहीं पूर्णेन्दु शेखर जब माँ महामाया की पूजा अर्चना करते तो खूब जोर लगाकर शंख बजाती कालिन्दी और उस शंख की ध्वनि गूंज उठती उस सुनसान वीरान और उदास तलहटी में । धीरे-धीरे एक सप्ताह का समय व्यतीत हो गया और जब मैं चलने लगा तो मेरे साथ चलने के लिए

आतुर हो उठी कालिन्दी भी । जब मैंने कहा कि वापस आते समय अकेली होगी तुम, बोलो कैसे लौटेगी तू अकेली । तो उसने हँसकर उत्तर दिया- तुम इसकी चिंता मत करो। मैं भला अकेली कहाँ है ? अकेले तो तुम हो। इसीलिए तो तुमको पहुंचाने के लिए चल रही हूँ मैं तुम्हारे साथ। जिस ढंग से और जिस भाषा में उत्तर दिया था कालिन्दी ने उसे सुनकर दंग रह गया मैं एकबारगी। कुछ बोला न गया मुझसे । बोलता भी क्या ? चल पड़ा कालिन्दी के साथ । चढ़ाई थी काफी दूर चलने के बाद थक गया मैं, ऊंचे पत्थर पर दोनों पैर लटका कर बैठ गया । कालिन्दी नहीं बैठी ।
 
वह इधर उधर घूमती रही अपने आपमें मगन । दोपहर का समय हो चुका था। थोड़ी देर बाद कालिन्दी दौड़कर मेरे पास आयी, उसके हाथ में एक बड़े से पत्ते के दोने में गरम-गरम रोटियाँ और सब्जी थी। उस बियाबान में कहाँ मिल गयी थी रोटी सब्जी उसे समझ में नहीं आया । आश्चर्य से कालिन्दी की ओर देखते हुए मैंने पूछा- "कहाँ से लायी यह

रोटी सब्जी और वह भी गरम-गरम? कहाँ मिल गयी तुझे इस जंगल में ?" मेरे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया। थोड़ा हँसकर बोली- "तुमको भूख लगी थीन ? आधा दिन भी तो हल गया है। लो खा लो” और यह कहकर कालिन्दी ने रोटी का दोना मेरी ओर बढ़ा दिया। भोजन करने के बाद थोड़ी सी झपकी लग गयी मुझे । थका तो था ही, न जाने कब वह झपकी गहरी नींद में बदल गयी पता ही नहीं चला मुझे और उसी अवस्था में मैंने देखा कालिन्दी को लेकिन बालिका के रूप में नहीं एक नवयुवती के रूप में, रंग तो काला ही था मगर उस कालेपन का भी अपना सौन्दर्य था और अपना लावण्य । शरीर पर चौड़े लाल पाढ़ की रेशमी साड़ी थी । कलाइयों में शंख के बलय थे। चौड़े मस्तक पर लाल सिन्दूर का गोल टीका था। होंठ रक्ताभ थे। अपनी बड़ी बड़ी स्वप्निल आँखों से अपलक देख रही थी वह मेरी ओर । बड़ा ही मोहक और अद्भुत रूप था उस समय कालिन्दी का ।

लगा जैसे कालिन्दी के उस भुवनमोहिनी रूप में साक्षात् महामाया पराशक्ति महाकाली मेरे सामने खड़ी मुस्करा रही है और अपनी सजल और स्वप्निल आँखों की भाषा में जैसे कह रही हो- जिस मार्ग पर तुम चल रहे हो, उसकी धूल पर शताब्दियों बाद किसी के पद चिन्ह अंकित होते हैं। मान-अपमान, आशा-निराशा और सुख-दुःख से भरा पड़ा है सत्य का यह मार्ग, समझेन, जब तुम इन सबकी उपेक्षा करोगे, तभी प्राप्त होगी सफलता तुम्हें । बहुत देर तक करूणा, स्नेह अनुकम्पा के मिले-जुले भाव की भरी उसकी सम्मोहन से भरी बड़ी-बड़ी आँखे स्थिर रही मुझ पर । फिर वह मेरे समीप आकर बैठ गयी और अपनी कोमल उंगलियों से मेरे बालों को सहलाते हुए कहने लगी- "पिछले कई जन्मों से तेरे साथ हूँ मैं तुम नहीं जानते । इस जन्म में भी साथ नहीं छोडूंगी। जब तुम मेरे लिये रोते हो तो सहा नहीं जाता और रहा भी नहीं जाता मुझसे । फिर दौड़कर आना ही। पड़ता है। क्यों रोते हो तुम ? ऐसे मत रोया करो। मेरा हृदय ममता से भरा एक माँ का हृदय है न, तुम्हारे आँसू से बिगलित होकर गलने लगता है वह । बड़ी पीड़ा होती है मुझे। तुम्हारे दुःख कष्ट को

और तुम्हारी पीड़ा बेदना को न कोई जान सकेगा और न तो कोई समझने का प्रयास ही करेगा। आवश्यकता ही क्या है? मैं जो हूँ। तुम धैर्यपूर्वक और शान्त निर्विकार भाव से बढ़ते चलो अपने मार्ग पर । जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी होती है। एक न एक दिन सभी को इस नश्वर संसार से जाना है। कोई रहने नहीं आया यहाँ । जब तुम्हारे जाने का समय आयेगा तो उसके पहले ही अपने एक अंश से नारी शरीर में आविर्भूत होकर आ जाऊँगी अपनी गोद में लेने के लिए तुमको ...... समझे न ..... "

एकाएक मुझे एक झटका-सा लगा और नीचे गिर पड़ा जमीन पर । लेकिन अभी मेरी बाह्य चेतना बापस नहीं लौटी थी और जब चैतन्य हुआ तो देखा एक पहाड़ी युवती मेरे चेहरे पर पानी छिड़क कर मुझे होश में लाने का प्रयत्न कर रही थीं। कुछ देर तक स्थिर भाव से बैठा रहा मैं और फिर मेरी आँखें कालिन्दी को खोजने लगी। कहीं भी दिखलायी नहीं दी वह मुझे। कहाँ चली गयी वह बालिका ? मेरी समझ में नहीं आ रहा था। मैंने उस पहाड़ी युवती से भी पूछा- उसने सिर हिलाते हुए कहा- जब मैं इधर से गुजर रही थी तो केबल आप जमीन पर गिर पड़े थे और कोई नहीं था। घोर आश्चर्य हुआ मुझे । सोचा सम्भव है मुझे सोया हुआ देखकर वापस घर चली गयी हो कालिन्दी। लेकिन स्वप्न जैसी स्थिति में जो कुछ देखा, सुना था वह सब क्या था ? कालिन्दी के रूप में करूणा, दया, अनुकम्पा और स्नेह से भरी किसकी छवि

थी वह? कौन थी वह? अभी भी वो रहस्यमय मोहक छवि मेरे मानस पटल पर थिरक रही थी। काले भरे बादल घिर आये थे आकाश में उस समय । कभी भी जोर-शोर से पानी बरस सकता था। मैं धीरे से उठा और किसी प्रकार चलकर दिव्यगन्ध के आश्रम में पहुँचा। तब तक साँझ हो चुकी थी और पानी भी बरसने लगा था । मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे दिव्यगन्ध । देखते ही बोले- "कहाँ थे तुम ?" दिव्यगन्ध के इस प्रश्न के उत्तर में एक-एक कर सारी कथा सुना डाली और अन्त में अन्तरबोध स्थिति में जो देखा, सुना था उसका भी वर्णन किया मैंने । आँखें बन्द किये और मौन साधे सब कुछ सुनते रहे दिव्यगन्ध ।

फिर कुछ देर बाद गम्भीर स्वर में कहने लगे- पूर्णेन्दु शेखर से पूर्ण परिचित हूँ मैं । जब पूर्णेन्दु शेखर युवक थे, उस समय नियमपूर्वक नित्य दक्षिणेश्वर जाते थे और माँ काली का दर्शन करते थे और दर्शन करने के बाद घंटों गंगातट पर बैठे रहते थे विचारमग्न । रामकृष्ण परमहंस के प्रति अगाध श्रद्धा थी उनके हृदय में । कभी-कभी विचार मन की अवस्था में रोने लगते थे, माँ-माँ पुकारते हुए रामकृष्ण की तरह महाशय । न जाने कैसी बिह्वलता थी वह । सच बात तो यह है कि साधकों को समझना बड़ा कठिन है। एक दिन उसी अवस्था में रामकृष्ण परमहंसदेव ने प्रत्यक्ष होकर दक्षिणा काली की मंत्र दीक्षा प्रदान की पूर्णेन्दु शेखर को। लगता है यह सब उनके पूर्व जन्म के आध्यात्मिक संस्कार का ही परिणाम था इसमें सन्देह नहीं। फिर क्या हुआ? उत्सुक होकर पूछा मैंने । होगा क्या ? महात्मा दिव्यगंध थोड़ा अन्यमनस्क होकर बोले- एक दिन न जाने किस प्रेरणा के वशीभूत होकर नौकरी और घर-गृहस्थी छोड़ कर इस सुनसान बिरान घाटी में चले आये और एक झोपड़ी डालकर रहने लगे। कोई काम तो था नहीं, प्राय: माँ की साधना उपासना में ही डूबे रहते थे हर समय महाशय एक रात स्वप्न में पूर्णेन्दु शेखर को आशीर्वाद देती हुई माँ महामाया ने कहा- अरे पूर्णेन्दु पौत्री के रूप में अपना एक दे रही हूँ अंश मैं तुझे उसका आदर सम्मान करना और हाँ उसका नाम "कालिन्दी" रखना, अच्छा रहेगा, दिव्यगंध कहते जा रहे थे मुंह बाये सुन रहा था मैं एक अविश्वसनीय अनोखा वृत्तांत । पूर्णेन्दु शेखर की पुत्रवधू का नाम था काकुली । सौम्य, शान्त और सभी के प्रति आदर सम्मान रखने वाली साक्षात् अन्नपूर्णा ।
 
यथासमय गर्भवती हुई काकुली और यथासमय कन्या लाभ हुआ उसे और कन्या लाभ का समाचार जब पूर्णेन्दु शेखर को प्राप्त हुआ तो उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर माँ महामाया को प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त अपलक निहारते रहे माँ की छवि की ओर, उनकी आँखों से झर-झर कर आँसू गिर रहे थे गालों पर उस समय ।

माँ के आदेश पर उस कन्या का नाम पूर्णेन्दु ने रखा "कालिन्दी" | उसने तो अपना नाम काली बतलाया था मुझे, मेरी बात सुनकर महात्मा दिव्यगन्ध बोले- "वह अपना नाम काली ही बतलाती थी सभी को ।” फिर क्या हुआ- मैंने पूछा। और जब कालिन्दी आठ-नौ साल की हुई तो थोड़े दिनों के लिए अपने दादा के पास आ गयी वह रहने के लिए। दादा को बहुत चाहती थी कालिन्दी। पूर्णेन्दु शेखर भी महामाया का स्वरूप समझकर उसे अपने सन्निकट पाकर अति हर्षित हुए। प्राय: मिलने जुलने वाले लोगों से यही कहते थे- "यह कालिन्दी नहीं, स्वयं भगवती महामाया का साक्षात् रूप है।" कभी कदा पूर्णेन्दु शेखर यहाँ भी लेकर आते थे कालिन्दी को। हम दोनों की साधना चर्चा बड़े मनोयोग से सुनती थी और कभी-कभी अपनी बाल सुलभ जिज्ञासा भी प्रकट करती थी वह । उसकी जिज्ञासा में सार तत्व भी होता था साधना का । कभी-कभी तो मैं चकित हो उठता था उसकी जिज्ञासा सुनकर। इतनी कथा सुनाकर मौन साध गये एकबारगी दिब्यगन्ध । न जाने क्या सोचते रहे, फिर बोले- "दो साल पहले की बात है। शरद पूर्णिमा की सांझ थी। पहाड़ों के पीछे से चांद निकलने ही वाला था। कालिन्दी भी आयी थी अपने दादा के साथ । उस दिन अपने हाथ से खीर बनाकर लायी थी मुझे खिलाने के लिए वह । हम तीनों मिलाकर खीर खाये। फिर पूर्णेन्दु के साथ साधना संबंधी इधर-उधर

की बातें होने लगी मेरी । कुछ देर तो बैठी रही कालिन्दी अपने दादा के पास, फिर एकाएक उठकर चली गयी नदी की ओर । न जाने क्यों आवश्यकता से अधिक गम्भीर और उदास थी उस समय वह

"फिर क्या हुआ ?" थोड़ा सशंकित होकर पूछा मैंने ? "होगा क्या ?" उस महान योगी का कण्ठ बिगलित था। विषण्ण भाव से बोले दिव्य गन्ध "न जाने कैसे डूब गयी तिस्ता में वह बालिका।" । "ऐ! क्या कहा आपने ? तिस्ता में डूब गयी कालिन्दी लेकिन कैसे?" बिगलित हो उठा मेरा स्वर । बहुत बड़ा आघात लगा था मुझे उस समय । हाँ, काफी खोजने के बाद मिली उसकी निर्जीव काया। उस कोमलांगी का पूरा शरीर पड़ गया था नीला और हो गया था पाषाणवत् । लेकिन फिर भी उसका मुख तेजोमय था पूर्ववत् ऐसा लगता था अभी आँखे खोलेगी कालिन्दी और सरस स्वर में बोल पड़ेगी बाबा ........ अन्तिम शब्द के साथ कण्ठ अवरूद्ध हो उठा एक महान योगात्मा का और उसी अवस्था में रुक-रूककर भर्राये स्वर में उन्होंने आगे कहा- "धन्य थे पूर्णेन्दु शेखर जिनकी पौत्री रूप में। महामाया ने अपने चिन्मय अंश से जन्म लिया । मुझे भी उस महाशक्ति का प्राप्त हुआ कुछ समय के लिए सानिध्य और सौभाग्यशाली हो तुम जिसे उपलब्ध हुआ उस महान शक्ति का आशीर्वाद -" यह सुनकर मुझसे आगे कुछ पूछा न गया। पूछने के लिए मेरे पास रखा ही क्या था भला अब । थोड़ी देर बाद स्वयं पूर्ववत् अवस्था में महात्मा दिव्यगंध बोले- "कालिन्दी की अकाल मृत्यु के आघात को

सहन न कर सके पूर्णेन्दु शेखर – उस रात उन्होंने भी त्याग कर दिया अपने नश्वर शरीर का । प्रात: देखा गया उनकी निर्जीव पार्थिव काया माँ महामाया की छवि के सम्मुख दण्डवत् की मुद्रा में पड़ी थी भूमि पर ।" यह दारूण कथा सुनकर हतप्रभ और स्तब्ध रह गया मैं एकबारगी पाषाणबत् बैठा रहा न जाने कब तक अविचल मुद्रा ने मैं । एक महान योगी के मुख से एक महान साधक की दुखद और दारूण कथा सुनकर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था मेरी आत्मा को । लगता था जैसे कोई लम्बा सपना देखा था मैंने । नहीं, नहीं, कौन कहेगा सपना ? सपना नहीं सब कुछ सत्य था और था यथार्थ - आज भी कभी कदा मानस पटल पर थिरक उठती है कालिन्दी की मोहक छवि । दीर्घकाल के बाद गुप्त साधकों की खोज के अन्तर्गत प्रस्तुत कथा को लिपिबद्ध करते समय भी मेरे सामने जैसे कालिन्दी का हँसता, मुस्कराता हुआ चेहरा घूम रहा है चारो ओर । सचमुच क्या कभी जीवन में कालिन्दी की मोहक छवि भूल सकेगी मेरी आत्मा ? कभी नहीं, कभी नहीं।
 
अध्याय १७ कालीमठ

आज सुवह की डाक से अनुसंधान विभाग का एक पत्र आया है मेरे पास । पत्र का उत्तरार्द्ध यों है शाक्त सम्प्रदाय और धर्म के बारे में और भी कुछ तथ्यों के रहस्य का अब पता लगा है। उस रात जो कुछ देखा था आपने- वह आपकी उस अवश चेतना की छाप मात्रही थी। आपकी थीसिस कापी के मिलने के बाद उस इलाके में विभाग ने दरयाफ्त कराया- तो उसका अन्दाज सत्य निकला । वह अभिशस धूसर निर्जन कुंज किसी अतृप्त बासना का आखेट स्थल ही है और वह ध्वंसावशेष सी झोपड़ी

दो साल पूर्व शाक्त सम्प्रदाय पर रिसर्च कर रहा था मैं । महान वैष्णव धर्म के दर्प के सामने उन्नत मस्तक बाले शाक्त धर्म के प्रति सहज जिज्ञासा का भाव मेरे मन में जाग्रत हो गया था । एक प्रबल प्रभंजन की भांति भारत के नक्शे पर छा जाने वाले उस धर्म के संबंध में और अधिक जानने की उत्कट इच्छा ने मुझे कहीं का न रखा। तभी मिला मुझ को डॉ. वर्मा का पत्र । वे मेरे गाइड थे । लिखा था गौहाटी विश्वविद्यालय में मेरे परिचित डॉ. भादुड़ी भट्टाचार्य प्राध्यापक हैं । उनको अपने संग ले लेना । मैं डिब्रूगढ़ आ गया। नक्शे में देखा जिस कालीमठ के द्वारा शाक्त धर्म के इतिहास पर प्रकाश मिलने की सम्भावना बनी थी-शिलांग और सिलचर के बीच किसी स्थान पर था । आधीरात तक भादुड़ी से परामर्श होता रहा। तीसरे दिन हम लोग शिलांग पहुँचे । समय और इतिहास के बिराट पदों से रौंदे हुये अलसाये और धूल-धूसर शिलांग के कुछ मील दूर जेंग पाँग की हतश्री बड़ी ही कातर और म्लान प्रतीत हुई । छोटा सा गाँव बीस-पच्चीस झोपड़े और चारो तरफ ऊँचे-ऊँचे मटमैले पहाड़। मैंने भादुड़ी से पूछा- 'कालीमठ के अवशेष यहाँ कहाँ मिलेंगे ?' "थोड़ी दूर पर एक पुराना किला सा है- बहीं पर कहते हैं विद्यारण्य बाचस्पति ने नवाक्षर-साधना की थी। थोड़ी ही देर में हम बहाँ पहुँच जायेंगे दूर से ही दिख गयी वह गढ़ी। ध्वस्त परिवेश में- अतीत की एक यादगार के रूप में अपने चन्द वर्षों के तूफानी आधिपत्य में हलचल मचा देने वाले शाक्त धर्म के प्रारम्भिक जीवन की प्रतीक वह गढ़ी। धूल-धूसरित होकर भी बांकी भंगिमा से सिर ऊँचा किये खड़ी थी, सब ओर साँय-साँय हो रहा था । एक विचित्र उदासी- एक अबूझ सी खिन्नता व्यास थी उस गढ़ी में । पत्थर की ईटों से बनी उस ऊँची शानदार गढ़ी की धूल से अटी सीढ़ियाँ चढ़ते समय ऐसा लगा जैसे काफी अर्से से कोई आया ही न हो यहाँ !

टूटी फूटी जर्जर बारादरी में प्रवेश करते ही दशहत से पर फड़फड़ाते कबूतर कानों को छूते हुए निकल गये । लगा, जैसे चमगादड़ भी चीखा हो यहीं कहीं। बचपन में भरपुर चाँदनी से दमकती रातों में घर के पुश्तैनी बाग में आँख मिचौली खेला करता था। जहाँ जुन्हैया खिली होती- जहाँ खूब उजाला रहता। किन्तु अकसर पेड़ों की घनी परछाईयों से अंधेरा भी भरा करता, ऐसे में खूब सतर्क होकर विस्फारित आँखों से चारों ओर की टोह लेते हुए एक-एक पग आगे बढ़ाते रहने पर भी पीछे से आकर कोई अपनी हथेलियों से आँखे बन्द कर लेता । कुछ वैसी ही अनुभूति उस म्लान-निस्तब्ध गढ़ी में भी हुई मुझे। धूल से भरे-पड़े पत्थर झांकते टूटे-फूटे बुर्ज पर घूमते हुए हर क्षण यही लगता रहा कि कहीं सधी हुई हवा की उस विवशता के बीच किमखाव के आसन पर बैठे गले में रुद्राक्ष की माला पहने-सामने चौमुखा दीप जलाये कोई साधक-अतीत के जीर्ण शीर्ण काले परदे को उघाड़ देगा और सहज ही में उसे, डरावने-अँधियारे बाताबरण में मन-प्राणों को

स्तम्भित कर देगा ? किन्तु कोई नहीं आया । सतर्कता से एक-एक कमरे एक एक कोना और आंगन देखने पर भी निराशा ही हुई। तभी रमेश भादुड़ी ने फुसफुसा कर कहा- वह देखो सामने ........... और अब सहसा नजर सामने की ओर गयी तो देखा- एक कमरा था जिसके काले जीर्ण-शीर्ण से दरवाजे में अर्गला बन्द थी। रमेश ने आगे बढ़कर अर्गला खोल दिया और फिर दरवाजा भी ! उस दरवाजे के खुलते ही हवा का एक जबर्दस्त झोंका कमरे के अन्दर घुस गया और बातावरण में एक तीव्र गंध बिखर गयी । कमरे के दरवाजे पर से दो-दो टार्च का तीन प्रकाश सर्वप्रथम जिस वस्तु से टकराया उसने एक क्षण के लिये हम लोगों के शरीर का रक्त प्रवाह ही रोक दिया। किसी की हिम्मत अन्दर आने की नहीं हुई।

दरवाजे पर ही ठिठके खड़े रहे | न जाने कब तक खड़े रहे और स्तब्ध अपलक सामने कमरे के बीचोबीच स्थित उस भयंकर काली की अष्टभुजी मूर्ति को निहारते रहे। बैसी विलक्षण तेजोमयी मूर्ति हमने जीवन में कभी नहीं देखी थी। काले पत्थर की आदमकद प्रतिमा थी वह । एक पैर महाकाल के हृदय पर दूसरा पैर पशु के मस्तक पर था काली का । अन्दर मन्दिर के बाताबरण से स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि जगदम्बा का विधिवत नित्य पूजन होता है। प्रतिमा के सामने एक चौमुखी पाषाण की बेदी थी और उसके एक तरफ पीतल का त्रयोदश मुखी दीपक रखा था | उसकी ओर देखकर ऐसा प्रतीत हुआ मानो अभी-अभी हवा के किसी झोके ने दीपक की तमाम जलती हुई घृतबाती को एकबारगी बुझा दिया है। जगदम्बा के गले में जवा की माला पड़ी हुई थी जिसका हर एक फूल ताजा और खिला हुआ सा लग रहा था, हम आश्चर्य से देख कर रहे थे । मन और मस्तिष्क का समाधान नहीं हो रहा था । आश्चर्य कौतूहल, भय और रोमांच का मिला-जुला भाब हृदय से उठ-उठ कर मन-प्राण पर छाता जा रहा था जैसे और उस भाव के साथ आत्मा में एक विचित्र अनुभूति-सी हो रही थी। कैसी थी वह अनुभूति ये कुछ कहा नहीं जा सकता। किन्तु ! ऐसा अनुभव हो रहा था मानो हम दोनों की आत्मा किसी अज्ञात सम्मोहनी शक्ति के वश में हो गयी है और तभी अगर-धूप की गंध से भरा हवा का एक तीन झोंका मुख के पास भ्रमण करता हुआ निकल गया।

उसी के साथ मंदिर का जर-जर दरवाजा एक झटके के साथ अपने आप बन्द हो गया। हम अवाक् जड़वत् खड़े के खड़े रह गये। जब हम नीचे आये तो सात बज रहे थे । सारा आकाश काले बादलों से भर गया था और उद्दाम हवा की ताल पर लम्बे और भयानक जंगली वृक्ष झूमकर नाच रहे थे। मैंने कहा- अब ? रमेश ने आसमान की ओर देखा। फिर शंकित होकर कहा- “पानी आयेगा अरुण भाई। ........'हाँ आयेगा तो ........... धुनी हुई रूई के आडंबर के समान काले अंधकार से भर गया था आसमान, चारो तरफ एक अजीब सा सन्नाटा एक अबूझ सी निबिड़ता छा गयी थी खंडहर जैसी कालीमठ की गढ़ी अंधेरे में अपने अतीत की कहानी पर सिर धुनती-सी प्रतीत हो रही थी। चारों ओर निर्जन इलाका था। ऊजड़-मरघट जैसा बीहड़ घूसर और निस्तब्धता थी उसके चारो तरफ ! बादलों से घिरकर काला हो गया था आकाश। गहन निश्वास जैसी हवा हाहाकार करती झाड़ियों और झुरमुटों को कम्पाये दे रही थी।
 
थोड़ी देर पूर्व झींगुरों की झनकार भी सुनाई दे रही थी। किन्तु इस घने अंधियारे ने जैसे उस अनवरत क्रन्दन का भी गला घोट दिया था। तेज गति से वापस लौट रहे थे हम । मन में यही लग रहा था- 'यानी अभी न गिरे अभी न गिरे।' वर्षा हो ही गयी । पहले टप-टप बूंदे टपकी फिर झर-झर कर झाड़ियों में बरसने लगा आसमान ! साथ.. ही उद्दाम हवा का तूफानी बिलाप भी गूंज उठा बारिश की लय के साथ । लगा-जैसे त्राण न मिला तो अकड़ जायेगा शरीर-कातर स्वर में रमेश ने कहा- 'दौड़ो अरुण, अरुण दौड़ो! दिशाहीन-लक्ष्य हीन काले अँधियारे के बीच वहते पानी में चप्पलों से छप-छप करता मैं भागा। पीछे-पीछे रमेश भी दौड़ा। पानी की बौछार तेज हुई। उसी के साथ तेज हई हवा का वेग । पानी से भींगे वृक्ष झमते हुए दोहरे हुए जा रहे थे।

थोड़ी देर बाद लगा, कि अब न दौड़ा जायेगा। यहीं इस अनजाने अरण्य प्रान्तर में ही हो जायेगी जल-समाधि । मैंने पूछा- "हम जा किस ओर रहे हैं- रमेश ?" होश खो कर- बदहबास-सा जो अलक्ष्य दौड़ा जा रहा था- जैसे उसकी मूर्छा टूटी। बोला- 'ऐं' ! मैंने उसके कन्धे पर हाथ रख कर कहा-रुको, तो सही। ऐसे में तो न जाने कहाँ भटक जायेंगे ? गजब हो गया। शायद हम भटक गये- रमेश बोला- “वह देखो बारिश के धुंध के पार सिलचर की रोशनी झिलमिला रही है।" स्तब्ध रह गया मैं । छाती के भीतर कुछ खाली सा प्रतीत हुआ । कातर स्वर में मैंने कहा- तुम्हें तो कुछ पता होगा। किस तरफ आ रहे हैं हम ? । बारिश होती रही उसी तरह जोर-शोर से ! कड़कड़ा कर बिजली चमकी। उस भयानक रब के क्षण मालूम हुआ जैसे बर्षों का जल बत्रों को गीला कर शरीर के चमड़े की परत भेद कर भीतर प्रवेश कर गया है। रमेश ने अन्दर लगा लिया कुछ। बोला- यह रास्ता.....सिलहट की ओर जाता है शर्मा ! हम लोग अपने डेरे से कितनी दूर हैं यहाँ से ? सात-आठ मील से क्या कम होंगे।' मेरा सारा जोश ठण्डा पड़ गया कहा- 'तब तो सब चौपट हो गया। कहीं जलसमाधि न हो जाय हमारी यहीं ?" रमेश सिहर उठा। कुछ कहा नहीं उसने । मैंने कहा- श्मशान के प्रेत जैसे हम कब तक खड़े रहेंगे इस बीहड़ स्थान पर ? कोई शेल्टर तो खोजना ही होगा।' अजीब था वह समां! अँधेरे में आसमान और धरती मानों मिल कर एकाएक हो गये थे। शीतल अंधकार का अन्तहीन समुद्र और उसके बीच दप-दप होने वाली जुगनूओं की चमक और उस बिकट अन्धकार में उद्दाम बासना लिये उठती नये पानी की भीनी महक- याद नहीं, उस अराजकता भरी रात में जोश, होश खोकर हम कबतक भटकते रहे। मन में एक अजीब-सी बिबशता भर गयी थी ! तभी रमेश ने कहा- 'रूको अरुण भाई ! रूको -' नजर उठाकर सामने देखा ! अंधकार का धुंधला सा परदा और उसके उस पार न जाने क्या चमचमाता-सा मैंने कहा- 'क्यों ?' आहट लो। लगता है कि, जैसे यहाँ कोई रहता है। पीछे का घना अंधकार वैसा का वैसा ही रहा। किन्तु धुंधले-उजाले के मटमैले तारों में फंसे सामने के हल्के अँधियारे में सुषुप्ति भरी दृष्टि ने जैसे कुछ

चीजों को पहचान ही लिया। लगा, जैसे खूब घने वृक्षों से घिरी जर्जर ईटों का अहाता हो। मैंने रमेश की ओर देखा वह कुछ सुन-सा रहा था । फुसफुसा कर बोला- 'अरुण भाई'! सुनो- किसी के गाने की आवाज । आधी रात को कौन गा रहा है यहाँ पर ? ....... क्लान्त आच्छन्नता से भरे बिबश चित में बारिश के शोर-अंधेरे में बृक्षों के ऊपर सिर पटकती हवा की चीत्कार और झींगुरों की झनकार ने मिलजुल कर एक विचित्र हाहाकार सा भर दिया था बाहर! रमेश का स्वर भी अर्थहीन-सा लगा। फिर उन्नत हवा के आरोह-अवरोह पर तैरती दुर्गा सप्तशती के श्लोकों की निम्न पंक्तियाँ कानों में गूंज उठीं

बालार्क मण्डला भासां चतुर्बाहं त्रिलोचनाम् ।

पाशांबुश बरांभीतिधारयन्तीं शिबो भजे ।। ... एतत्ते कथितं भूपदेवी माहात्म्य......मैंने कलाई घड़ी देखी। रेडियम टच अंक हरी आग जैसे चट-से जल उठे । ग्यारह पैंतीस ! मैं स्तब्ध सा खड़ा रह गया। इतनी रात गये इस तिमिराच्छन्न निर्जन प्रान्त में कौन श्लोक पाठ कर रहा है ? मैंने कहा- रमेश देखो तो सही, कौन है ? श्यामल आकाश का वक्ष जलाती बिजली चमकी। छलकते पार जैसी रेखा ओर-छोरहीन आसमान के एक कोने से दसरे कोने तक कौंध गयीं । हजारों मैगनीशियम के तारों जैसे प्रखर आलोक से उद्भासित हो गया वह स्थल । देखा- पानी से तर काई की परत से हंकी ईटों के एक खंडहर के सामने खड़े थे हम । वातावरण को मथती विद्युत बाणी गरज कर शान्त हो गयी। दुर्गा पाठ भी समाप्त हो गया। आगे बढ़ कर रमेश ने

आवाज दी। 'अरे ! भई कोई है ? बारिश का एक रस शोर । अंधेरे की छाती पर जुगनुओं के बुझते-जलते रहने का खेल । अपने रब से धरती को कंपाती हुई बिजली फिर कौंधी। 'अरे भाई कोई रहता यहाँ ?'

राशि-राशि बिखरे अन्धकार में धुंधले उजाले का दायरा एक बार सिमट कर फैला और फिर फैलता ही गया लगा कोई दरवाजा खोल रहा है। तभी मेरे मुंह से निकला 'अरे ! वह तो काली मन्दिर बाला ही दरवाजा है। हाँ बही दरवाजा था- जिसे हमने दो-तीन घण्टे पूर्व खोला था फिर वहीं कैसे पहुँच गये ? रमेश ने मेरी तरफ और मैंने रमेश की तरफ देखा- दोनों की दृष्टि आपस में टकरायी। आँखों में विस्मय लिये हम एकटक सामने देखते रहे। दर बाजा खुला । सामने एक षोडशी युवती खड़ी थी- हाथ में एक दीपक पात्र लिये हमारी ही ओर थी उसकी नजर । अन्दर प्रविष्ट होने का संकेत कर बोली वह 'आइये आइये, आ जाइये अन्दर । और आगे-आगे चल पड़ी वह । उसके पैरों के नुपूरों की कर्ण प्रिय झंकार ने जैसे सम्मोहित कर दिया हमें । अन्दर वहीं विशाल काली की भयंकर प्रतिमा और वही रुपरेखा- जिसे हम पूर्व में देख चुके थे । वह युवती दीपक यथा स्थान रखकर हमारी तरफ मुड़ी और बोली- बैठिये, बाबा साधना में हैं और तभी हमारी नजर प्रतिमा के सामने गयी देखा- एक अधेड़ सा व्यक्ति ध्यानस्थ बैठा है आसन पर । ऊँची काठी की देह यष्टि मुड़ा हुआ सिर — गले में रूद्राक्ष की माला। शरीर पर रक्तवर्ण का रेशमी वस्त्र और मुख पर अजीब प्रकार की प्रखर कान्ति।

हम वहीं थोड़ी दूर पर आसन लेकर बैठ गये। उस मंद आलोक में कमरे का बाताबरण अगरबत्ती-धूप

की गंध से भर रहा था और निस्तब्धता ब्यास थी। युवती ने फिर हमसे कोई बात नहीं की।
 

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