"मैंने कहा ना मम्मी, मैं आपसे नाराज़ नहीं हूँ, आप खामखाह परेशान हो रही हैं", सलोनी जैसे ही अपनी बात कहनी चालू करती है, राहुल उसे एकदम से काट देता है | उसके खुशक स्वर से मालूम चलता था वो थोडा नहीं बहुत नाराज़ था | राहुल छत की और घूर रहा था जबकि सलोनी पिल्लो पर कोहनी के सहारे ऊपर उठी हुई थी और राहुल की और देख रही थी |
कमरे में चुप्पी छा जाती है | सलोनी को समझ नहीं आता वो उसे कैसे मनाये? कमरे का माहोल कुछ ऐसा बन चूका था कि वो सीधे जाकर राहुल से लिपट नहीं सकती थी | वो बहुत ही अटपटा होता |
सलोनी उसी तरह लेटे हुए कोहनी के बल अपना सर उठाए राहुल को घूर रही थी जो अपने माथे पर अपनी बांह रखे छत को घूर रहा था | उसका लंड अब पूरी तरह से नर्म पड़ चूका था |
बेटे को घूरती सलोनी अचानक महसूस करती है कि उनके रिश्ते ने एक दिन में क्या से क्या मोड़ ले लिया था | कहाँ वो एक माँ थी, एक पवित्र माँ, जिसके लिए बेटे से बढ़कर कुछ भी नहीं था | शायद अब भी उसकी ममता में कुछ फर्क नहीं पड़ा था, बस अब उनके रिश्ते में वो पवित्रता नहीं रही थी |
सुबह की उस छोटी सी घटना के बाद सब कुछ जैसे एकदम से बिखर गया था | वो उसके लंड को सहलाती किस तरह अपने पर काबू खो देती है और उसके लंड को चुस्ती है और उसके वीर्य को पी जाती है | 'उफ्फ्फ' जबकि उसे वीर्य पीना कभी अच्छा नहीं लगता था | वो कभी कभी अपने पति की ख़ुशी के लिए उसके वीर्य को पीती थी | मगर उसे यह कतई पसंद नही था | मगर आज तो वो किस तरह अपने बेटे के लंड से वीर्य पी गई थी, उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा था कि इस सबका नतीजा क्या होगा?
नहीं बाद में अपने कमरे की तन्हाई में उसने यह जरूर सोचा था बल्कि फैसला किया था कि वो फिर कभी भी इस तरह की वाहियात हरकत नहीं करेगी | मगर उसका फैसला 'रेत का महल' साबित हुआ था जो हवा का पहला झोंका आते ही ढह गया था | उसने खुद दोपहर को अपने बेटे के साथ ड्राइंग रूम में क्या किया था? किस तरह वो उसके लंड को अपनी मुट्ठी में भरकर सहलाने लगी थी और जब उसके बेटे ने उसके मुम्मे को टीशर्ट के ऊपर से मसलना चालू किया था तो उसने खुद उसको बढ़ावा दिया था | किस तरह राहुल ने उसके पायजामे में हाथ डालकर उसकी चूत को कच्छी के ऊपर से सहलाया था और जब उसने उसकी चूत को अपनी मुट्ठी में भरा था | वो खुद अपनी चूत उसके हाथ में उछाल रही थी और फिर उसका सख्लन हो गया था | यह शायद जिंदगी में पहली बार हुआ था कि सलोनी ने बिना चुदवाए सख्लन हासिल कर लिया था मात्र अपने बेटे के स्पर्श से और वो भी कच्छी के ऊपर से |
कमरे में चुप्पी छा जाती है | सलोनी को समझ नहीं आता वो उसे कैसे मनाये? कमरे का माहोल कुछ ऐसा बन चूका था कि वो सीधे जाकर राहुल से लिपट नहीं सकती थी | वो बहुत ही अटपटा होता |
सलोनी उसी तरह लेटे हुए कोहनी के बल अपना सर उठाए राहुल को घूर रही थी जो अपने माथे पर अपनी बांह रखे छत को घूर रहा था | उसका लंड अब पूरी तरह से नर्म पड़ चूका था |
बेटे को घूरती सलोनी अचानक महसूस करती है कि उनके रिश्ते ने एक दिन में क्या से क्या मोड़ ले लिया था | कहाँ वो एक माँ थी, एक पवित्र माँ, जिसके लिए बेटे से बढ़कर कुछ भी नहीं था | शायद अब भी उसकी ममता में कुछ फर्क नहीं पड़ा था, बस अब उनके रिश्ते में वो पवित्रता नहीं रही थी |
सुबह की उस छोटी सी घटना के बाद सब कुछ जैसे एकदम से बिखर गया था | वो उसके लंड को सहलाती किस तरह अपने पर काबू खो देती है और उसके लंड को चुस्ती है और उसके वीर्य को पी जाती है | 'उफ्फ्फ' जबकि उसे वीर्य पीना कभी अच्छा नहीं लगता था | वो कभी कभी अपने पति की ख़ुशी के लिए उसके वीर्य को पीती थी | मगर उसे यह कतई पसंद नही था | मगर आज तो वो किस तरह अपने बेटे के लंड से वीर्य पी गई थी, उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा था कि इस सबका नतीजा क्या होगा?
नहीं बाद में अपने कमरे की तन्हाई में उसने यह जरूर सोचा था बल्कि फैसला किया था कि वो फिर कभी भी इस तरह की वाहियात हरकत नहीं करेगी | मगर उसका फैसला 'रेत का महल' साबित हुआ था जो हवा का पहला झोंका आते ही ढह गया था | उसने खुद दोपहर को अपने बेटे के साथ ड्राइंग रूम में क्या किया था? किस तरह वो उसके लंड को अपनी मुट्ठी में भरकर सहलाने लगी थी और जब उसके बेटे ने उसके मुम्मे को टीशर्ट के ऊपर से मसलना चालू किया था तो उसने खुद उसको बढ़ावा दिया था | किस तरह राहुल ने उसके पायजामे में हाथ डालकर उसकी चूत को कच्छी के ऊपर से सहलाया था और जब उसने उसकी चूत को अपनी मुट्ठी में भरा था | वो खुद अपनी चूत उसके हाथ में उछाल रही थी और फिर उसका सख्लन हो गया था | यह शायद जिंदगी में पहली बार हुआ था कि सलोनी ने बिना चुदवाए सख्लन हासिल कर लिया था मात्र अपने बेटे के स्पर्श से और वो भी कच्छी के ऊपर से |