S
StoryPublisher
Guest
हम दोनों पलटे और देखा की पिताजी जीवन में पहलीबार अपने बड़े भाई की आँखों में आँखें डाल कर देख रहे हैं और तेजी से सांस ले रहे हे.
"ये आप क्या करने वाले थे भाईसाहब? मेरे बेटे पर गोली चलाई आपने? मेरे बेटे पर?" इतना कहते हुए पिताजी ने झटके से उनके हाथ से बन्दूक छीन ली और दूर फेंक दी. "रुक जा सागर, तू कहीं नहीं जाएगा! आजतक मैने हर वो काम किया है जो इन्होने (ताऊ जी ने) कहा, चाहे सही या गलत अपने बड़े भाई का हुक्म समझ मैं वही करता आया. इन्होने उस दिन कहा की सागर को घर से निकाल दे तो मैंने वो भी किया पर आज इन्होने तुझ पर बन्दूक तान दी और गोली चलाई, ये मैं नहीं सहन करूँगा!" पिताजी बोले और ताऊ जी बस पिताजी को घूरते रहे. इधर मेरी माँ भाभी का सहारा ले कर आगे बढ़ी और ताऊ जी से बोली; "ब्याह के बाद मैंने आपको और दीदी को अपने माँ-बाप माना और आप दोनों ने भी मुझे बेटी की तरह प्यार दिया. बेटे को खो देने का गम मैं जानती हूँ, भले ही पिछली बार मैं कुछ बोल नहीं पाई पर सागर की कमी मुझे हमेशा खलती थी! आप भी तो जानते हो की बेटा जब घर नहीं होता तो घर का क्या ख्याल होता है? गोपाल भैया जब अस्पताल में था तब आप ने दीदी की हालत देखि थी ना? मुझ में अब अपने बेटे को दुबारा खोने की ताक़त नहीं है, आजतक मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा.....आज पहली और आखरी बार माँगती हूँ..." माँ ने अपना आँचल ताऊ जी के सामने फैला दिया और बोलीं; मेरी झोली में मेरे बेटे का प्यार डाल दो, उसे इसी लड़की से शादी करने दीजिये!" माँ की हिम्मत देख ताई जी और भाभी भी माँ के साथ खड़े हो गये."सागर की हालत देखि थी न उस दिन? क्या करेंगे हम जी कर हमारे बच्चे ही खुश नहीं हैं तो?" ताई जी रोती हुई बोली. "पिताजी सागर अब बच्चा नहीं हैं, सोच समझ कर फैसला लेते हैं! आप ने कितनी बड़ाई की है सागर की और आज आप गुस्से में कैसी अनहोनी करने जा रहे थे?" गोपाल भैया बोले. भाभी कुछ बोल ना पाइन क्योंकि वो ताऊ जी से बहुत डरती थीं इसलिए उन्होंने केवल ताऊ जी के आगे हाथ जोड़ दिये. घर के सारे लोग मेरी तरफ आ चुका था.
खुद को यूँ अकेला देख ताऊ जी की आँखें झुक गई. उन्हें एहसास हुआ की उनका झूठा घमंड लगभग हमारे परिवार का अंत कर देता. ताऊ जी आँखों से पछतावे के आँसूँ बह निकले, उन्होंने अपनी बाहें खोल कर मुझे और नितु को अपने पास बुलाया. हम दोनों जा कर ताऊ जी के गले लग गए और ताऊ जी ने हम दोनों के सर चूमे और बोले; "मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों! मैं गुस्से से अँधा हो चूका था! तुम सब ने आज मेरी आंखें खोल दीं! तुम दोनों की शादी बड़े धूम धाम से होगी और तुम दोनों को वो हर एक ख़ुशी मिलेगी जो मिलनी चाहिए. इतना कहते हुए ताऊ जी पिताजी के पास गए और उनके सामने हाथ जोड़े.
पिताजी ने एक दम से ताऊ जी के दोनों हाथ पकड़ लिए और उनके गले लग गए और बोले; "नहीं भैया ...मैं आपसे छोटा हूँ...आज जो जुर्रत की उसके लिए माफ़ कर देना!" पिताजी रोते हुए बोले; "नहीं छोटे...तूने आज मेरी आँखें खोल दी!" ताऊ जी रोते हुए बोले. फिर ताऊ जी ने भाभी से कहा की वो साक्षी को ले कर आएं और जैसे ही भाभी सीढ़ी की तरफ गईं अश्विनी उनके सामने खड़ी हो गई और उनका रास्ता रोक लिया. भाभी कुछ बोलती उससे पहले ही ताऊ जी तेजी से अश्विनी के पास पहुंचे और एक जोरदार थप्पड़ उसे मारा; "आग लगाने आई थी तू यहाँ? मंथरा!!!! जा बहु ले कर आ साक्षी को!" अश्विनी डरी-सहमी सी एक कोने में खड़ी हो गई! जैसे ही भाभी ने ऊपर जा कर अश्विनी के कमरे का दरवाजा खोला की उन्हें साक्षी के रोने की आवाज सुनाई दी! गोली की आवाज से साक्षी जाग गई थी और जोर-जोर से रो रही थी! मैंने जैसे ही ये आवाज सुनी मैं तुरंत ऊपर दौड़ता हुआ पहुंचा. भाभी अभी साक्षी को गोद में उठाने ही वाली थीं की मैंने उसे उनसे पहले उठा लिया और उसे एक दम से अपनी छाती से चिपका लिया. "मेरा बच्चा......!!!" इतना ही कह पाया. आज कई दीन बाद एक पिता को उसकी बेटी मिली थी और अंदर से आँसूँ बह निकले. जब मैं नीचे आया तो ताऊ जी अश्विनी को डाँट रहे थे; "कैसी माँ है तू? अपनी नन्ही सी बेटी को कमरे में बंद रखती है? जा बुला ले जिस मर्जी कोतवाल को में देखता हूँ की क्या करता है!" ताऊ जी ये कहते हुए मेरी माँ के सामने आये और हाथ जोड़ते हुए बोले; "मुझे माफ़ कर दे बहु! मैं तेरा कसूरवार हूँ, तुझे तेरे बच्चे से दूर करने का पाप किया है मैंने!"
"भाईसाहब जो हुआ सो हुआ, अब बस इस घर में फिर से खुशियां गूंजने लगे मैं बस यही चाहती हूँ!" माँ बोली. तब तक मैं साक्षी को ले कर नीचे आ गया था और मेरी गोद में आते ही साक्षी का रोना बंद हो गया था और उसकी किलकारियाँ शुरू हो गईं थी. "देख रहे हो आप (ताऊ जी), आज दो दिन बाद इस घर में साक्षी की किलकारियाँ गूँज रही हैं? तेरे जाने के बाद सागर ये एकदम से गुमसुम हो गई थी!" ताई जी बोली. मैंने साक्षी के माथो को चूमा तो उसने एकदम से मेरी ऊँगली पकड़ ली और उसकी किलकारी की आवाज पूरे घर में गूंजने लगी. नितु हसरत भरी आँखों से मुझे साक्षी से प्यार करते हुए देख रही थी. जब मेरा ध्यान नितु पर गया तो मैंने उसे साक्षी को दिया. साक्षी को गोद में लेते ही नितु को उसकी ममता का एहसास जीवन में पहली बार हुआ. उसकी आँखें एक दम से भर आईं और उसने साक्षी को अपनी छाती से लगा लिया. जहाँ मैं ये देख कर अंदर ही अंदर ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था वहीँ दूसरी तरफ अश्विनी जल के राख हो चुकी थी. उसकी नफरत उसके चेहरे से दिख रही थी पर वो ताऊ जी के डर के मारे कुछ नहीं कर पा रही थी. वो गुस्से में पाँव पटकते हुए ऊपर अपने कमरे में चली गई. इधर नितु साक्षी को अपनी छाती से लगाए हुए माँ और ताई जी के पास बैठ गई. वहीँ ताऊजी, पिताजी और गोपाल भैया ने मुझे अपने पास बिठा लिया. फिर जो बातें शुरू हुईं तो मैंने घरवालों को सब कुछ बता दिया. अब जाहिर था की ताऊजी ने नितु के घरवालों से मिलने की ख्वाइश प्रकट करनी थी. मुझे उसी वक़्त कहा गया की परसों ही सब को मिलने बुलाओ और चूँकि आज शाम होने को है तो कल मैं नितु को सुबह छोड़ने जाऊ.
"ये आप क्या करने वाले थे भाईसाहब? मेरे बेटे पर गोली चलाई आपने? मेरे बेटे पर?" इतना कहते हुए पिताजी ने झटके से उनके हाथ से बन्दूक छीन ली और दूर फेंक दी. "रुक जा सागर, तू कहीं नहीं जाएगा! आजतक मैने हर वो काम किया है जो इन्होने (ताऊ जी ने) कहा, चाहे सही या गलत अपने बड़े भाई का हुक्म समझ मैं वही करता आया. इन्होने उस दिन कहा की सागर को घर से निकाल दे तो मैंने वो भी किया पर आज इन्होने तुझ पर बन्दूक तान दी और गोली चलाई, ये मैं नहीं सहन करूँगा!" पिताजी बोले और ताऊ जी बस पिताजी को घूरते रहे. इधर मेरी माँ भाभी का सहारा ले कर आगे बढ़ी और ताऊ जी से बोली; "ब्याह के बाद मैंने आपको और दीदी को अपने माँ-बाप माना और आप दोनों ने भी मुझे बेटी की तरह प्यार दिया. बेटे को खो देने का गम मैं जानती हूँ, भले ही पिछली बार मैं कुछ बोल नहीं पाई पर सागर की कमी मुझे हमेशा खलती थी! आप भी तो जानते हो की बेटा जब घर नहीं होता तो घर का क्या ख्याल होता है? गोपाल भैया जब अस्पताल में था तब आप ने दीदी की हालत देखि थी ना? मुझ में अब अपने बेटे को दुबारा खोने की ताक़त नहीं है, आजतक मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा.....आज पहली और आखरी बार माँगती हूँ..." माँ ने अपना आँचल ताऊ जी के सामने फैला दिया और बोलीं; मेरी झोली में मेरे बेटे का प्यार डाल दो, उसे इसी लड़की से शादी करने दीजिये!" माँ की हिम्मत देख ताई जी और भाभी भी माँ के साथ खड़े हो गये."सागर की हालत देखि थी न उस दिन? क्या करेंगे हम जी कर हमारे बच्चे ही खुश नहीं हैं तो?" ताई जी रोती हुई बोली. "पिताजी सागर अब बच्चा नहीं हैं, सोच समझ कर फैसला लेते हैं! आप ने कितनी बड़ाई की है सागर की और आज आप गुस्से में कैसी अनहोनी करने जा रहे थे?" गोपाल भैया बोले. भाभी कुछ बोल ना पाइन क्योंकि वो ताऊ जी से बहुत डरती थीं इसलिए उन्होंने केवल ताऊ जी के आगे हाथ जोड़ दिये. घर के सारे लोग मेरी तरफ आ चुका था.
खुद को यूँ अकेला देख ताऊ जी की आँखें झुक गई. उन्हें एहसास हुआ की उनका झूठा घमंड लगभग हमारे परिवार का अंत कर देता. ताऊ जी आँखों से पछतावे के आँसूँ बह निकले, उन्होंने अपनी बाहें खोल कर मुझे और नितु को अपने पास बुलाया. हम दोनों जा कर ताऊ जी के गले लग गए और ताऊ जी ने हम दोनों के सर चूमे और बोले; "मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों! मैं गुस्से से अँधा हो चूका था! तुम सब ने आज मेरी आंखें खोल दीं! तुम दोनों की शादी बड़े धूम धाम से होगी और तुम दोनों को वो हर एक ख़ुशी मिलेगी जो मिलनी चाहिए. इतना कहते हुए ताऊ जी पिताजी के पास गए और उनके सामने हाथ जोड़े.
पिताजी ने एक दम से ताऊ जी के दोनों हाथ पकड़ लिए और उनके गले लग गए और बोले; "नहीं भैया ...मैं आपसे छोटा हूँ...आज जो जुर्रत की उसके लिए माफ़ कर देना!" पिताजी रोते हुए बोले; "नहीं छोटे...तूने आज मेरी आँखें खोल दी!" ताऊ जी रोते हुए बोले. फिर ताऊ जी ने भाभी से कहा की वो साक्षी को ले कर आएं और जैसे ही भाभी सीढ़ी की तरफ गईं अश्विनी उनके सामने खड़ी हो गई और उनका रास्ता रोक लिया. भाभी कुछ बोलती उससे पहले ही ताऊ जी तेजी से अश्विनी के पास पहुंचे और एक जोरदार थप्पड़ उसे मारा; "आग लगाने आई थी तू यहाँ? मंथरा!!!! जा बहु ले कर आ साक्षी को!" अश्विनी डरी-सहमी सी एक कोने में खड़ी हो गई! जैसे ही भाभी ने ऊपर जा कर अश्विनी के कमरे का दरवाजा खोला की उन्हें साक्षी के रोने की आवाज सुनाई दी! गोली की आवाज से साक्षी जाग गई थी और जोर-जोर से रो रही थी! मैंने जैसे ही ये आवाज सुनी मैं तुरंत ऊपर दौड़ता हुआ पहुंचा. भाभी अभी साक्षी को गोद में उठाने ही वाली थीं की मैंने उसे उनसे पहले उठा लिया और उसे एक दम से अपनी छाती से चिपका लिया. "मेरा बच्चा......!!!" इतना ही कह पाया. आज कई दीन बाद एक पिता को उसकी बेटी मिली थी और अंदर से आँसूँ बह निकले. जब मैं नीचे आया तो ताऊ जी अश्विनी को डाँट रहे थे; "कैसी माँ है तू? अपनी नन्ही सी बेटी को कमरे में बंद रखती है? जा बुला ले जिस मर्जी कोतवाल को में देखता हूँ की क्या करता है!" ताऊ जी ये कहते हुए मेरी माँ के सामने आये और हाथ जोड़ते हुए बोले; "मुझे माफ़ कर दे बहु! मैं तेरा कसूरवार हूँ, तुझे तेरे बच्चे से दूर करने का पाप किया है मैंने!"
"भाईसाहब जो हुआ सो हुआ, अब बस इस घर में फिर से खुशियां गूंजने लगे मैं बस यही चाहती हूँ!" माँ बोली. तब तक मैं साक्षी को ले कर नीचे आ गया था और मेरी गोद में आते ही साक्षी का रोना बंद हो गया था और उसकी किलकारियाँ शुरू हो गईं थी. "देख रहे हो आप (ताऊ जी), आज दो दिन बाद इस घर में साक्षी की किलकारियाँ गूँज रही हैं? तेरे जाने के बाद सागर ये एकदम से गुमसुम हो गई थी!" ताई जी बोली. मैंने साक्षी के माथो को चूमा तो उसने एकदम से मेरी ऊँगली पकड़ ली और उसकी किलकारी की आवाज पूरे घर में गूंजने लगी. नितु हसरत भरी आँखों से मुझे साक्षी से प्यार करते हुए देख रही थी. जब मेरा ध्यान नितु पर गया तो मैंने उसे साक्षी को दिया. साक्षी को गोद में लेते ही नितु को उसकी ममता का एहसास जीवन में पहली बार हुआ. उसकी आँखें एक दम से भर आईं और उसने साक्षी को अपनी छाती से लगा लिया. जहाँ मैं ये देख कर अंदर ही अंदर ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था वहीँ दूसरी तरफ अश्विनी जल के राख हो चुकी थी. उसकी नफरत उसके चेहरे से दिख रही थी पर वो ताऊ जी के डर के मारे कुछ नहीं कर पा रही थी. वो गुस्से में पाँव पटकते हुए ऊपर अपने कमरे में चली गई. इधर नितु साक्षी को अपनी छाती से लगाए हुए माँ और ताई जी के पास बैठ गई. वहीँ ताऊजी, पिताजी और गोपाल भैया ने मुझे अपने पास बिठा लिया. फिर जो बातें शुरू हुईं तो मैंने घरवालों को सब कुछ बता दिया. अब जाहिर था की ताऊजी ने नितु के घरवालों से मिलने की ख्वाइश प्रकट करनी थी. मुझे उसी वक़्त कहा गया की परसों ही सब को मिलने बुलाओ और चूँकि आज शाम होने को है तो कल मैं नितु को सुबह छोड़ने जाऊ.