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Romance अनैतिक

इधर जब अश्विनी का पेट हँस-हँस कर दुःख गया तब वो अपनी हँसी रोकते हुए बोली; "ये जो साक्षी को खो देना का डर तेरे पति के मन में है ना इससे कई गुना ज्यादा डर मैंने झेला है!" अश्विनी ने गंभीर होते हुए कहा. "पता है कैसा लगता है जब कोई तुम्हारी जान लेने घर में घुस आता है? मुझे पता है.... सब कुछ था मेरे पास...पैसा, घर, नौकर-चाकर, गाडी, इतना बड़ा घर, रुतबा.... इस घर का हर एक शक़्स गर्व महसूस कर रहा था. सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से! मेरी वजह से उन्हें इतने बड़े घर से नाता जोड़ने का मौका मिला था! क्या गलती थी मेरी? क्या एक लड़की को चैन की जिंदगी जीने का हक़ नहीं होता? सागर मुझे ये सब कभी नहीं दे सकता था. इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया! बिग डील?! पर उसने मुझे बद्दुआ दी....ऐसी बद्दुआ जिसने मेरे हँसते-खेलते जीवन में आग लगा दी थी! मैं प्रेग्नेंट थी....तुम्हार पति के 'बीज' से! हाँ मैंने ये सच कभी रक्षित को नहीं बताया ...खुदगर्जी की...तो क्या? पर फिर वो काली रात आई मेरे जिंदगी में, वो चार लोग घर में घुस आये और गोलियाँ चलाने लगे. मैं कितना डर गई थी. पर रक्षित ने मुझे संभाला और मुझे ऊपर के स्टोर रूम में छुपने को कहा. मैं ऊपर पहुँची और स्टोर रूम के दरवाजे के पीछे छुप गई. मैंने अपने पूरे परिवार की चीखें सुनी! सोच सकती हो वो डर क्या होता है? वो लोग मुझे ढूंढते हुए ऊपर आ गए और स्टोर रूम के बाहर खड़े हो गये. मैंने साँस लेना रोक लिया था क्योंकि अगर उन्हें मेरी साँस लेने की आवाज सुनाई दे जाती तो वो मुझे भी मार देते! वो तो मेरी क़िस्मत थी की मैं बच गई और सुबह होने तक वहीँ छुपी रही.

सुबह जब वहाँ से निकली तो सबसे पहले अपनी पति की लाश देखि और उसे खून में लथ-पथ देख मैंने अपने होश खो दिए!

जब होश आया तो मैं हॉस्पिटल के बेड पर थी और मेरे आस-पास सब थे! होश आने के बाद मैंने दो दिन तक किसी से बात नहीं की, क्योंकि मेरे मन में जो आग लगी थी वो थी तुम्हारे पति से बदला लेने की! फिर साक्षी पैदा हुई और जानती हो मैंने उसका नाम 'साक्षी' क्यों रखा? क्योंकि मैं अपने दुश्मन का नाम भूलना नहीं चाहती थी. आखिर ये नाम उसी ने मुझे बताया था! एक-एक दिन मैंने जलते हुए काटा फिर छोटी दादी (मेरी माँ) का ड्रामा शुरू हो गया और घर में तुम्हारे पति की वापसी की बातें चलने लगी. यही वो समय था जब मैंने उससे बदला लेने का प्लान बनाना शुरू कर दिया. पर मेरे पास कोई जरिया नहीं था. उसकी कोई कमजोरी नहीं थी. इसलिए मैंने कमजोरी पैदा करने की सोची और साक्षी को जानबूझ कर उसकी गोद में डाल दिया. कुछ ही दिन में उसे साक्षी से प्यार हो गया, मुझे लगा शायद उसका मन मेरे लिए पिघल जायेगा और मैं एक बार फिर उसे अपने प्यार के चक्कर में फाँस कर उसका इस्तेमाल करूँ यहाँ से निकलने के लिए पर वो साला मेरे झांसे में ही नहीं आया. तो मैंने अपनी आखरी चाल चली और साक्षी को उससे दूर कर दिया! वो दो दिन वो जिस तरह तड़प-तड़प कर रोया उसे देख कर मेरे दिल को सुकून मिला! पर मेरी किस्मत ने मुझे एक बार फिर धोका दे दिया.....तुझे यहाँ भेज कर! बस तबसे मेरे सारे डाव उलटे पड़ने लगे! तुम दोनों को इस तरह रोमांस करते देख मेरा खून जलता है, कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब मैं तुम दोनों को बद्दुआ ना दूँ!" अश्विनी ने अपने दिल की साऱी बढास निकाल दी थी और नितु को ये सब सुन कर बहुत बड़ा झटका लगा. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की अश्विनी अपने अंदर इतना जहर पाले है! पर अब नितु के सब्र की इंतेहा हो चुकी थी. अश्विनी का एक और कड़वा शब्द और वो अपना आपा खो देती!

"वैसे इतना नशा करने के बाद तो जान रही नहीं होगी उसमें जो तुझे माँ बना सके? तभी तो उसने तुझे यहाँ भी दिया मेरे पास, भीख मांगने! नामर्द कहीं का!" अश्विनी घमंड में बोली

पर नितु ने उसे एक जोरदार जवाब देते हुए एक झन्नाटेदार तमाचा मारा. "उन्होंने मुझे यहाँ नहीं भेजा, मेरी मति मारी गई थी जो मैं यहाँ तुझे समझाने आई! तेरे साथ जो हुआ उसके लिए मुझे जरा भी अफ़सोस नहीं, तू इसी के लायक थी! बुरा लगता है तो सिर्फ उस लड़के के लिए जो तुझ जैसी मतलबी लड़की से प्यार कर बैठा! तेरी ही काली किस्मत खा गई उसे! भगवान् ने तुझे इतना प्यार करने वाला दिया जिसने तेरे पैदा होने से ले कर बड़े होने तक प्यार किया और तूने उसी के जज्बातों से खेला! तुझे समझाया था न 'इन्होने' की तेरे इस 'सो कॉल प्यार' में कितना खतरा है? बताया था न तुझे तेरी माँ की करनी पर तब तो तू 'इनसे' सच्चा प्यार करती थी! तब तो तू आग का दरिया पार करने को तैयार थी. जरा सी स्ट्रगल क्या करनी पड़ी तेरी हालत खराब हो गई! हो भी क्यों न, हराम का जो खाती आई है आजतक? मर यहाँ और सड़ती रह! "प्यार क्या होता है ये तुझे कुछ दिनों में पता चल जायेगा जब मैं इनके बच्चे की माँ बनूँगी! साक्षी के प्यार की कमी को तो मैं पूरा नहीं कर सकती पर जब इनकी गोद में हमारा बच्चा होगा तब ये खुद को संभाल ले लेंगे!" इतना कहते हुए नितु जाने को पलटी,

अश्विनी अपने गाल पर हाथ रखे खड़ी रही और रोती हुई बोली; "इस थप्पड़ का बदला तू याद रखेगी!"

नितु ने उसकी इस धमकी का कोई जवाब नहीं दिया और नीचे आ गई.

कुछ देर बाद भाभी, माँ और ताई जी कीर्तन से लौट आये. शाम तक मैं भी सबके साथ लौट आया और नितु में अलग सा बदलाव पाया. और दिन वो सिर्फ तभी घूंघट करती थी जब ताऊजी, पिताजी या गोपाल भैया सामने होते वरना वो सर पर पल्ला रखे काम करती पर आज मैं जब से आया था वो घूंघट काढ़े घूम रही थी और मुझसे नजरें चुरा रही थी. मैंने बहाने से उसे ऊपर आने को कहा तो उसने घूंघट किये हुए ही सर ना में हिला दिया. मैं समझ गया की कुछ तो बात है, मैं अपने कमरे में आया और वहाँ से आवाज लगा कर नितु को ऊपर बुलाया. आखिर नितु को ऊपर आना पड़ा और उसने अभी भी घूंघट कर रखा था.

मैंने फ़ौरन उसे अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर दिया. हाथ पकड़ कर नितु को पलंग पर बिठाया और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया.जैसे ही मैंने नितु का घूंघट उठाया तो उसकी आँखों को आसुओं से भरा हुआ पाया, मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो बिफर पड़ी; "आई एम सॉरी…. मैं अपना वादा पूरा नहीं कर सकी!” और फिर नितु ने रोते हुए साऱी बात बताई,

मैंने नितु की बात बड़े इत्मीनान से सुनी और जब उसकी बात खत्म हुई तब पहले उसके आँसू पोछे; "मेले बेबी ने मेले लिए इतना कुछ किया? पर ये बताओ आपको उसके मुँह लगने की क्या जरुरत थी? और जो आप उसे ऐशों-आराम देने की बात कर रहे थे उसके लिए हम पैसे कहाँ से लाते? बेबी मैं साक्षी से बहुत प्यार करता हूँ पर हालात ऐसे हैं की मैं उसे छह कर भी नहीं अपना सकता! कई बार जब कोई रास्ता नहीं रह जाता तो खुद को हालातों के सहारे छोड़ देना चाहिए! समय हमेशा एक सा नहीं रहता! कहने को तो जब उसने मेरा दिल तोडा तो मैं बहुत कुछ कर सकता था और उसकी शादी कभी होने नहीं देता पर मैंने ऐसा नहीं किया. मैंने खुद को हालात के सहारे छोड़ दिया और देखो मुझे आप मिल गए! आपने आज जो किया वो मेरे लिए बहुत है, रही बात साक्षी की तो.......देखते हैं क्या होता है!" मैंने नितु के सर को चूमा और उसे गले लगा लिया. इतने दिनों में मुझ में इतनी तो समझ आ गई थी की मैं साक्षी को अपना नाम नहीं दे सकता और रहा उसका मोह, तो वो भी मैं चाह कर भी नहीं छोड़ सकता. जानता था की जुदाई के समय बहुत दर्द होगा....पर सह लेंगे थोड़ा!

मैंने और नितु ने सब को हमारे न्यूयॉर्क जाने की बात बता दी थी और ये भी की वहाँ से लौट कर हमें बैंगलोर ही रहना हे. मेरा बैंगलोर रहने का फैसला घर में सब के लिए कष्टदाई था तो नितु बोली; "माँ आप चिंता ना करो, हम धीरे-धीरे अपना काम समेटना शुरू करते हैं और फिर लखनऊ में अपना ऑफिस शिफ्ट कर लेंगे! या फिर अपना मैं ऑफिस यहाँ खोल लेंगे!" नितु की बात सुन माँ को संतुष्टि हुई की उन बेटा उनके पास जल्द ही लौट आयेगा. इसी के साथ नितु ने सब को बैंगलोर आने का भी निमंत्रण दे दिया और सब ख़ुशी-ख़ुशी मान गये.
 
दिन बीतते गए और इन बीते दिनों में मैंने साक्षी को खूब प्यार दिया. इतना प्यार जो शायद आने वाले सालों तक उसके ऊपर आशीर्वाद बनकर रहता.मैंने और नितु ने मिलकर घरवालों के साथ बहुत अच्छी और प्यारी-प्यारी यादें बनाई! जहाँ माँ और ताई जी ने नितु को अपनी बेटी की तरह प्यार दिया वहीँ मैं जो की घर का सबसे छोटा बेटा था उसे उसकी जिम्मेदारी का एहसास होने पर ताऊ जी और पिताजी ने खूब आशीर्वाद दिया. गोपाल भैया और भाभी के संग मेरा और नितु का दोस्तों जैसा रिश्ता बन गया था. भाभी मेरा और नितु का खूब ख्याल रखती और कहती रहती की जल्दी से जल्दी खुशखबरी सुनाओ! अब चूँकि घर पर हम दोनों को ज्यादा प्राइवेट समय नहीं मिल पाता था तो दोनों अपने-अपने काम में लगे रहते.हमारा रोमांस केवल किस तक ही सिमट कर रह गया था. प्यासे दोनों ही थे पर अपने प्यास को काबू रखने जानते थे. ऐसे कई पल आया जब अश्विनी ने हम दोनों को रोमांस करते देखा और जलती हुई चली गई पर हमें उससे कोई फर्क नहीं पडा. नितु ने साक्षी को अपनी बेटी जितना प्यार दिया और अगर मेरे बाद किसी इंसान से साक्षी को प्यार मिला तो वो नितु ही थी. जब कभी मैं घर पर नहीं होता तो नितु उसके साथ खेलती, नहलाती, कपडे बदलती और उस गुड़िया को अपने से चिपकाए रहती. जब मैं घर पर होता तो नितु हमारी इतनी फोटो खींचती की क्या कहूँ! हम दोनों ही जानते थे की साक्षी धीरे-धीरे बड़ी होगी और उसे ये प्यार याद नहीं रहेगा, उसके लिए हम उसके दादा-दादी होंगे ना की माँ-बाप! ये एक ऐसा दर्द था जो हम अभी से महसूस कर रहे थे पर हालात के आगे मजबूर थे! हम दोनों का प्यार ही था जो हमें सहारा दे रहा था! साक्षी के साथ बितायी ये यादें ही हमारे लिए सब कुछ था! उधर भाभी की डिलीवरी की डेट नवम्बर के आखरी हफ्ते की थी और भाभी ने दोनों को सख्त हिदायत दी थी की हम अगर तब यहाँ नहीं आये तो वो हमसे कभी बात नहीं करेंगी! इन खुशियों में दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला.

हमारे जाने से एक दिन पहले की बात है, सुबह से ही मैं बहुत बुझा-बुझा था! साक्षी के सुबह उठते ही मैं उसे अपनी छाती से चिपकाए कमरे में बैठा था. आज मेरी गुड़िया भी बहुत खामोश थी. और दिन तो उसकी किलकारियाँ गूंजती रहती थीं पर आज वो बहुत शांत थी. ऐसा लगा मानो उसे पता ही की कल उसके पापा चले जाएंगे! फिर एक ख्याल आया की एक बार भगवान् से मदद मांग कर देखूँ, क्या पता वो मेरी सुन लें! मैं नहा-धो कर तैयार हुआ और साक्षी को भी नहला कर रेडी किया. साक्षी को गोद में लिए मैं नंगे पाँव मंदिर चल दिया. जाने क्यों पर आज लग रहा था की मेरी इस तपस्या का फल मुझे अवश्य मिलेगा मैं आजतक कभी इतना नंगे पाँव नहीं चला था. यहाँ तो मंदिर भी खेतों के बीच था सो वहाँ तक पहुँचने में जाने कितनी ही बार पाँव में कंकड़ लगे, पर भगवान पर आस्था और साक्षी के प्यार ने मुझे सहारा दिया. आखिर मंदिर पहुँच कर मैंने भगवान से प्रर्थना की; "आप से आज तक मैंने आप से जो माँगा अपने मुझे वो दिया है, आज बस एक आखरी बार आपसे कुछ माँगना चाहता हूँ! मुझे मेरी बेटी दे दो! मैं साक्षी को अपने साथ रखना चाहता हूँ, उसकी परवरिश करना चाहता हूँ, उसे उसके पापा का प्यार देना चाहता हूँ! वादा करता हूँ फिर आप से कुछ नहीं माँगूँगा! प्लीज भगवान जी... कोई तो रास्ता सुझा दो मुझे या फिर इसकी माँ को ही अक्ल दे दो ताकि वो साक्षी को मुझे सौंप दे!" मैं घुटनों पर खड़ा भगवान से मिन्नतें करता रहा, आसुओं की धारा साक्षी पर गिरी जो चुप-चाप मेरी ही तरफ देख रही थी. साक्षी ने कैसे कुछ बोलने के लिए मुँह खोला और फिर चुप हो गई. मानो कह रही हो की पापा आप मत रोइये! मैंने उसे एक बार चूमा और फिर भगवान पर सब छोड़ कर मैं घर लौट आया इस बात से अनजान की नितु पहले ही यहाँ आ कर यही दुआ माँग कर गई हे. जब मैं घर पहुँचा तो माँ ने पुछा की मैं कहाँ गया था? पर माथे पर टीका देख वो समझ गईं, "मेले बच्चे को मंदील ले कल गया था!" मैंने तुतलाते हुए बोला तो साक्षी की किलकारियाँ शुरू हो गई.

घर में सब जानते थे की मैं साक्षी से कितना प्यार करता हूँ और उससे बिछड़ना मेरे लिए आसान नहीं होगा. पर इससे पहले मुझे ये बात कोई समझाता मैंने अपने चेहरे पर ख़ुशी का मुखौटा ओढ़ लिया. मैंने किसी को भी शक नहीं होने दिया की मैं कल साक्षी से दूर जाने को ले कर दुखी हु. दोपहर को खाने के बाद मैं साक्षी को गोद में ले कर अपने कमरे में बैठा था; "बेटा.... मुझे ना... आपको कुछ बताना है! कल है न...मैं...............जा रहा हूँ!" मैंने बड़े भारी मन से साक्षी से ये बात कही, साक्षी अपनी भोली सी आँखों से मेरी आँखों में देखने लगी जैसे पूछ रही हो की मैं वापस कब आऊँगा? "नेक्स्ट हम ....आपके बर्थडे पर मिलेंगे! तब मैं आपके लिए ढेर सारे गिफ्ट्स ले कर आऊँगा" पर मेरा इतना कहते ही साक्षी ने रोना शुरू कर दिया. जैसे उसे मेरी सब बात समझ आ गई हो. "आऊ... ऊू ऊ ऊ मेरा बच्चा! बस रोना नहीं...I प्रॉमिस मैं आपके बर्थडे पर आऊँगा!" पर साक्षी पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ, जैसे उसे सिर्फ अपने पापा ही चाहिए और कुछ नहीं चाहिए! "आई एम सॉरी बेटा! बट हमारे हालात ऐसे हैं की मैं आपके साथ चाह कर भी नहीं रह सकता! मेरा सारा काम-धंधा बैंगलोर में सेट है....आई एम हेल्प लेस!" मैंने रोते हुए कहा और साक्षी को अपने सीने से लगा लिया. करीब आधे घंटे हम दोनों ऐसे ही बैठे रहे और अब साक्षी का रोना बंद हो गया था. "आई होप नेक्स्ट टाइम जब आप मुझे देखो तो मुझे भूलोगे नहीं!" मैंने अपने आँसू पोछते हुए कहा. "ऐसे कैसे भूल जायेगी?" नितु पीछे से बोली और चल कर मेरे पास आई. "७ महीने की बच्ची की इतनी अच्छी यादाश्त नहीं होती की वो हर किसी को याद रख सके! उस दिन देखा था जब मैंने शेव की थी तो ये मुझे पहचान ही नहीं रही थी!" मैंने कहा.

"वो इसलिए क्योंकि उसे आपको दाढ़ी में देखने की आदत हो गई थी! अनफॉर्चूनेटलीउसकी माँ (नितु) को आप क्लीन शेवन अच्छे लगते हो! पर आप कांटे हो साक्षी ने आपको कैसे पहचाना? आपका स्पर्श पाते ही वो समझ गई की ये उसके पापा हैं!" नितु ने मुस्कुराते हुए कहा. नितु का तर्क इमोशनल था सायंटीफिक नहीं! पर मैंने आगे बात को नहीं खींचा और मुस्कुराते हुए नितु को अभी अपने गले लगा लिया. हम तीनों ऐसे ही गले लगे हुए खड़े थे की नितु ने हमारी सेल्फी ले ली! वो पूरा दिन मैं साक्षी के साथ बातें करता रहा और उसका मन मैंने दुबारा अपने जाने पर नहीं भटकने दिया. मेरा ये बचपना देख गोपाल भैया बोले; "वो इतनी छोटी है की उसे आपकी बात क्या समझ आती होगी?" पर ताऊ जी ने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा; "बच्चे ऐसे ही बोलना सीखते हैं!" उनकी बात लॉजिकल थी! मैं साक्षी को गोद में ले कर खड़ा हुआ और उसे ऐसे पकड़ा जैसे दो लोग डांस करते हैं और गाना गन गुनाते हुए आंगन में नाचने लगा;

"दिन भर करे बातें हम

फिर भी लगे बातें अधूरी आज कल

मन की दहलीजों पे कोई आए ना

बस तुम ज़रूरी आज कल

आई लव यू..." पूरा घर मेरा बचपना देख खुश हो गया और साक्षी भी मुस्कुराने लगी. वो साक्षी ही थीं जिसने मुझे एक बाप बनने का मौका दिया और मेरे अंदर एक बाप का प्यार जगाया था! इधर नितु ने चुप-चाप मेरे डांस की वीडियो बना ली थी.

रात तक मेरा यूँ साक्षी को गोद में ले कर खेलना और उससे बातें करना जारी था! खाना खाने के बाद भी मैं और साक्षी साथ सोये, बेचारी नितु को साक्षी को मुझसे चुराने का भी मौका नहीं मिला. पर रात को हम दोनों जागते रहे और बारी-बारी साक्षी को चूमते रहे, दोनों में जैसे होड़ लगी थी की साक्षी के उठने तक उसे सबसे ज्यादा कौन चूमेगा. उस खेल में पता ही नहीं चला की कब सुबह हो गई. नितु साक्षी को आखरी किस दे कर उठी और नीचे चली गई और इधर मैं साक्षी को अपने सीने से लगा कर लेट गया.मेरा दिल जोर से धड़कने लगा था. यही धड़कन सुन साक्षी उठ गई. मैंने जैसे ही उसे देखा तो खुद को रोने से नहीं रोक पाया. साक्षी अब भी जैसे समझने की कोशिश कर रही हो की मैं क्यों रो रहा हूँ! उसकी नन्ही सी हथेली मेरी ऊँगली के स्पर्श का इंतजार कर रही थी. मैंने उसे जैसे ही अपनी ऊँगली पकड़ाई उसने कस कर अपनी मुठ्ठी बंद कर ली ताकि कहीं मैं उसे छोड़ कर चला न जाऊ. जैसे-तैसे मैंने खुद को काबू किया और साक्षी को ले कर नीचे आ गया.मेरी शक्ल देख कर कोई भी कह सकता था की मैं रात भर नहीं सोया था और अभी आये आसुओं से मेरी आँखें नम हो चली थी. मेरी ये हालत देखते ही माँ नितु से बोली; "बहु तुझे कहा था न की सागर से बात कर, उसे समझा की वो साक्षी से इतना मोह ना बढाए? देख क्या हालत हो गई है इसकी?!" माँ ने नितु से कहा तो वो सर झुका कर खड़ी हो गई. मेरे तो जैसे मुँह में जुबान ही नहीं थी मैं बस साक्षी को देखे जा रहा था और अपना रोना रोक रहा था!

माँ की देखा-देखि ताई जी भी मुझे समझाना शुरू हो गईं, मैंने बड़ी हिम्मत बटोरी और बोला; "ठीक है ताई जी....!" इतना कह कर मैंने बेमन से साक्षी को नितु को दिया. मेरा ऐसा करने से सब शांत हो गए ये सोच कर की मैंने उनकी बात मान ली है और इधर नितु को भी साक्षी के साथ आखरी कुछ पल मिल गए प्यार करने को.मैं ने पहले अपने सारे कपडे पैक किये और फिर नहाने घुस गया.बाथरूम में मैंने जी भर कर अपने आँसू बहाये, क्योंकि यहाँ मुझे रोकने वाला कोई नहीं था. नहा-धो कर मैं बाहर आया तो नितु ने साक्षी को मेरी गोद में दे दिया. फिर सबके साथ बैठ कर हमने नाष्ता किया. "तो बेटा तुम दोनों पहले बैंगलोर जाओगे?" ताऊ जी ने पूछा.

"जी मैंने टैक्सी बुक की थी. जो अभी आती होगी. पहले हम बस स्टैंड जायेंगे और वहाँ से दिल्ली की व्होल्व्हो लेंगे, फिर दिल्ली से डायरेक्ट फ्लाइट न्यूयॉर्क तक!..... और गोपाल भैया, मेरे आने तक गाडी चलाना सीख लेना!" मैंने कहा.

"मुझे लगा तुमलोग पहले बैंगलोर जाओगे?" पिताजी बोले.

"जी पर फिर वहाँ से वापस मुंबई आना पड़ता, इससे अच्छा है की डायरेक्ट ही चले जाते हे. मैंने कहा और इतने में हमें बाहर से टैक्सी का हॉर्न सुनाई दिया. गोपाल भैया सारा समान टैक्सी में रखने लगे और इधर हमदोनों सब के पाँव छू कर आशीर्वाद लेने लगे. माँ बहुत ज्यादा भावुक हो गईं थीं; "माँ...बस कुछ महीनों की बात है, हम साक्षी के जन्मदिन पर आ जायेंगे!" मैंने कहा तो माँ खुश हो गई. सबसे मिलने के बाद नितु ने साक्षी को आखरी दफा गोद में लिया और उसे अपने सीने से लगा कर रो पडी. भाभी ने नितु को संभाला और उसे चुप कराया.इधर मैं हाथ बांधे साक्षी को गले लगाने का इंतजार कर रहा था. बुझे मन से नितु ने साक्षी को मुझे दिया. साक्षी को गोद में लेते ही मुझे वो रात याद आई जब मैंने उसे पहलीबार गोद में लिया था. मेरे आँसू बह निकले और मैंने साक्षी को कस कर अपने सीने से लगा लिया, मेरी तेज धड़कनें सुन साक्षी रो पड़ी शायद उसे भी एहसास हो गया था की मैं जा रहा हूँ! मैंने साक्षी को गोद में ले कर घूमना शुरू कर दिया और घुमते-घुमते मैं ५० कदम दूर आ गया.मैंने टैक्सी वाले को उसका मीटर चालु करने को कह दिया था ताकि उसका नुकसान ना हो! इधर मैंने साक्षी से बात करना शुरू कर दिया ताकि वो चुप हो जाए और हुआ भी यही, साक्षी चुप हो गई और मेरी छाती से लग कर सो गई. आधे घंटे तक मैं उसे लेकर ऐसे घूमता रहा और उधर सबने मुझे संभालने की जिम्मेदारी नितु को दे दी; "बहु...देख सागर बहुत भावुक है! साक्षी से उसका मोह कहीं उसे….तू तो जानती ही है... वो जब उदास होता है तो खाना-पीना छोड़ देता है!" माँ अपनी चिंता जताते हुए बोली.

"आप चिंता न करो माँ, मैं 'इनका' बहुत अच्छे से ख्याल रखुंगी.!" नितु बोली और तब तक मैं भी साक्षी को गोद में लिए वापस आ गया.भाभी ने साक्षी को गोद में लेना चाहा पर साक्षी ने अपने एक हाथ से मेरी शर्ट और दूसरे से मेरी ऊँगली पकड़ रखी थी. मेरा मन नहीं हुआ उसके हाथ से खुद को छुड़ाने का, इसलिए भाभी ने ही उसके हाथ से मेरी शर्ट और ऊँगली छुड़ाई. साक्षी जागने के लिए थोड़ा कुनमुनाई, तो मैंने उसके माथे को एक बार चूमा और साक्षी के मुँह पर प्यारी सी मुस्कान आ गई. इसी मुस्कान को आँखों में बसाये मैं जाना चाहता था. नितु और मैं सब को नमस्ते की और गाडी में बैठ गये. कुछ दूर गए होंगे की दोनों की आँखें फिर से बहने लगी. मैं अपना रोना तो बर्दास्त कर सकता था पर अपनी पत्नी का रोना नही. मैंने नितु के आँसूँ पोछे और इधर-उधर की बातें शुरू कर दीं ताकि उसका मन हल्का हो जाये. नितु समझ गई और मेरी बातों को आगे बढ़ाती रही. हम बस स्टँड पहुँचे और वहाँ से हमें दिल्ली के लिए व्होल्व्हो मिली! व्होल्व्हो में बैठते ही नितु बोली; "आपके साथ ट्रैन की यात्रा कर ली, प्लेन की यात्रा कर ली, बाइक यात्रा और कार यात्रा भी कर ली एक बस यात्रा बची थी वो भी आज पूरी हो गई!"

"बेबी बस एक क्रुझ शिप की यात्रा रह गई!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा. बस चली और कुछ देर बाद साक्षी को याद कर मेरी आँखें फिर से नम हो गईं, नितु ने अपना फ़ोन निकाला और भाभी को वीडियो कॉल की. भाभी ने साक्षी को गोद में बिठा कर कैमरा उसकी तरफ कर दिया और इधर नितु ने मेरा ध्यान अपने फ़ोन की तरफ खिंचा. साक्षी को देखते ही दिल खुश हो गया, मैंने हाथ हिला कर साक्षी को बुलाया, मुझे फ़ोन पर देखते ही वो खुश हो गई और अपने छोटे-छोटे हाथों को मेरी तरफ बढ़ा दिया जैसे कह रही हो की पापा मुझे गोदी ले लो! ये देखते ही दिल रोने लगा क्योंकि आज मैं चाह कर भी उसे गोद में नहीं ले सकता था. नितु ने मेरा हाथ कस कर दबा दिया और मुझे रोने से बचा लिया. कुछ देर ऐसे ही साक्षी से बात की और मन कुछ हल्का हो गया.कॉल के बाद मैंने नितु को थैंक यू कहा तो नितु मुस्कुराने लगी.हम अगले दिन सुबह ६ बजे दिल्ली पहुँचे और वहाँ से टैक्सी कर एयरपोर्ट पहुंचे. वहीँ पर हम दोनों बारी-बारी से फ्रेश हुए और फिर फ्लाइट ले कर न्यूयॉर्क पहुंचे. चूँकि हमें कनेक्टिंग फ्लाइट मिली थी तो इतनी ट्र्यावलींग से बैंड बजना तो तय था. पूरे रास्ते मैंने खुद को अच्छे से संभाला हुआ था. क्योंकि मुझे रोता हुआ देख नितु को भी वैसे ही दुःख होता जैसा उसे रोता हुआ देख मुझे होता था. मैंने खुद को बिजी रखने के लिए काम में लगा दिया और अपनी बेटी की जुदाई के दर्द को दबाना शुरू कर दिया. होटल पहुँच कर नितु सो गई पर मैं प्रेझेंटेशन चेक करने में बिजी हो गया.मीटिंग कल सुबह थी और मैं कुछ भी खराब नहीं करना चाहता था.
 
सुबह जब नितु उठी तो मुझे ऐसे काम करते हुए देख वो नाराज हो गई; "आप सोये नहीं? मुझे तो लेटते ही नींद आ गई और सीधा अभी उठी! बीमार हो गये तो?" नितु ने चिंता जताते हुए कहा.

"यार अपने हनीमून पर कोई बीमार होता है?" मैंने मुस्कुरा कर कहा. "अक्च्युअली कुछ चीजें एडिट करनी थीं और मैं एक बार सारी प्रेजेंटेशन को गो दो करना चाहता था. यू नो टू बी ऑन अ सेफ साइड!" मैंने कहा और तैयार होने चला गया.नितु ने आज साडी पहनी थी और मैंने बिज़नेस सूट! साडी में नितु कमाल की लग रही थी; "आर यू शुअर हम प्रेजेंटेशन देने जा रहे हैं?" मैंने नितु की तारीफ करते हुए कहा जिसे सुन उसके गाल लाल हो गये.

मैं उम्मीद कर रहा था की हमारी मुलाक़ात मर्दों से होगी पर यहाँ तो सारी लेडीज बैठी थी. नितु को साडी में देख उनमें से एक ने पूछ लिया; "मिस नितु वी वेयर एक्सपेकटिंग यू टू बी वियरिंग अ बिजिनेस स्युट, नॉट अ टिपिकल इंडियन ड्रेस!” पहली औरत ने कटाक्ष करते हुए कहा.

“ओह… इट्स नॉट जस्ट अ ड्रेस! इट रीप्रेजेंट अवर कल्चर, इफ वियरिंग बिजिनेस स्युट इज योवर कल्चर देन इन अवर कंट्री अ वुमन आफ्टर म्यारिज वीअर दींस…अँड बाय दीं वे इट्स कॉल अ सारी!” नितु ने दो तुक जवाब दिया जिसे सुन मुझे लगा की गया ये कॉन्ट्रैक्ट हाथ से. पर तभी दूसरी औरत पूछने लगी; "हाऊ लाँग ह्याव यू बिन म्यारीड?” इससे पहले नितु कुछ और बोल कर बात बिगड़ती मैंने जवाब दिया; "१ मंथ”.

“यू शुड बी ऑन योवर हनिमून, व्हॉट आर यू डूयिंग हिअर?” पहली वाली औरत ने हम दोनों को छेड़ते हुए कहा.

“वेल माई हसबंड इज वेरी हार्डवर्किंग गाय, ही वर्क हिज बेस्ट ऑफ टू अरेंज दिस मीटिंग अँड आई एम नॉट लेटींग हिम डाऊन बाय न्यागिंग अबाउट अ हनिमून. वी ह्यावं अवर व्होल लाइफ फॉर हनिमून?!” नितु ने फ़टाक से जवाब दिया जिसे सुन वो औरत चुप हो गई. साफ़ जाहिर था की हमें यहाँ प्रेजेंटेशन देनी ही नहीं है, क्योंकि नितु जी की बात सुन कर यहाँ से खाली हाथ ही निकलना पडेगा. मैंने अपना लैपटॉप बंद कर दिया और दरवाजे की तरफ देखने लगा. मैंने सोचा की इससे पहले ये सिक्योरिटी को बुलाएं और हमें धक्के मार कर निकालें बेहतर है की खुद ही निकलते हे. पर वहाँ काफी देर से चुप बैठीं तीसरी मैडम बोलीं; "व्हेअर डू यू थिंक यू आर गोइंग मिस्टर? वीआर वेटींग फॉर योवर प्रेझेंटेशन!” उनका नाम कॅरोलीन था और उनकी बात सुन कर मुझे उम्मीद की किरण दिखाई दी और मैंने आगे बढ़ते हुए प्रेजेंटेशन शुरू की, फॅक्ट्स नितु ने संभाले तो फिगर मैं संभाल रहा था. वो तीनों हम दोनों की कॉर्डीनेशन देख कर काफी प्रभावित हुए; "लूक मिस्टर सागर यू गाईज लॅक इन वन फिल्ड, अँड दॅट इज एक्सपिरियंस! वन इअर इज नॉट सफीशियंट टू वर्क विद अस!” कॅरोलीन बोली. "इट्स बेटर द्यान हाविंग नो एक्सपिरियंस! वी जस्ट वांट अ च्यांस, इफ यू लाईक अवर वर्क देन गिव अस दीं कॉन्ट्रॅक्ट इफ नॉट वी वॉन्ट कंपलैन!” मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा जो कॅरोलीन को भा गया, उसने बिना किसी के पूछे ही हमें १ क्वार्टर का काम ऑफर कर दिया! ये सुन कर मैं और नितु दोनों मुस्कुरा दिए और बाकी के दो मैनेजर चुप बैठे रहे. कॅरोलीन उठ के मेरे पास आईं और हमने हैंडशेक किया अब उन दोनों को भी उठ के आना पड़ा और एक फॉर्मल हैंडशेक हुआ.

हम दोनों ही मुस्कुराते हुए बाहर आये और कॉन्ट्रैक्ट पाने की ख़ुशी हमारे चेहरे से साफ़ झलक रही थी. हालाँकि नितु उम्मीद कर रही थी की मैं उसे उसके एटीटुड के लिए कुछ कहूँगा पर मैंने उसे एक शब्द भी नहीं कहा. "बेबी आपने जो कहा वो बिलकुल सही था. हमें कहीं भी ड्रेस कोड मेंशन नहीं किया गया था. अब उन दोनों को आपका साडी पहनना अच्छा नहीं लगा तो वो दोनों जाएँ चूल्हे में!" मैंने कहा तो नितु हँस पड़ी! अगले ४-५ दिन हमें वहीँ रुकना था ताकि हम कुछ डाटा कलेक्ट कर सकें, काम खत्म होने के बाद नितु को लगा हम वापस जायेंगे पर जब मैंने नितु को बाकी का प्लान बताया तो वो ख़ुशी से चीख पडी. "हम हनीमून के लिए वेगास जा रहे हैं!" ये वो प्लान था जो मैंने नितु से छुपाया था. वेगास का नाम सुनते ही नितु झूम उठी और उसने फ़ौरन ऑफिस फ़ोन कर के अक्कू को हड़का दिया; "बेटा हमारे आने तक तुम लोगों ने अगर काम शुरू नहीं किया ना तो तुम सब की बत्ती लगा दूँगी!" नितु की बात सुन सब की एक साथ फ़ट गई और सारे अपने-अपने काम में लग गये. इधर नितु की बात सुन कर मैं खूब हँसा जो अक्कू ने भी सुनी!

कुछ देर बाद आकाश ने मुझे मैसेज कर के पुछा की मॅडम क्यों गुस्सा हैं तो मैंने उसे ये ही कहा की वो गुस्से में नहीं बल्कि एक्साईटेड हैं, क्योंकि हमें एक क्वार्टर के लिए प्रोजेक्ट मिल गया है! खेर मैं और नितु वेगास के लिए निकले और पूरे रास्ते नितु बहुत जोश में थी और बहुत खुश भी! वहाँ मैंने पहले से ही रिजर्वेशन कर दी थी जो नितु के लिए दूसरा सरप्राइज था! पहली रात थी और नितु खूब जोश में थी. एक सरप्राइज उसने भी खरीद लिया था. मैं लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था की नितु लॉन्जरी पहन कर इठला कर मेरे पास आई, मैंने फ़ौरन लैपटॉप बंद कर दियाऔर बिना पलकें झपकाए उसे देखने लगा.

लाल रंग की इस लॉन्जरी में नितु के जिस्म का एक-एक हिस्सा कातिलाना लग रहा था. जाली से कपडे में से मुझे नितु का दूधिया जिस्म साफ़ दिख रहा था. मैं उठ कर खड़ा हुआ और नितु को गोद में उठा लिया और उसे बिस्तर के बीचों-बीच लिटा दिया. नितु ने अपनी बाहों का हार मेरे गले में डाल दिया और मुझे अपने ऊपर खींचने लगी. मैंने भी झुक कर नितु के होठों को अपने होठों में कैद कर लिया और उनका रस निचोड़ने लगा. इधर नितु की कूदती हुई जीभ मेरे मुँह में प्रवेश कर गई जिसे मेरे दाँतों ने दबोच लिया. हम दोनों अभी किस में ही डूबे थे की भाभी का व्हिडिओ कॉल आ गया.इस विघ्न से पहले तो दोनों को बहुत चिढ हुई पर फिर इस आस से की कहीं साक्षी को हमसे कोई बात करनी हो नितु ने कॉल उठा लिया. नितु ने मुझे उसके ऊपर से हटने को कहा पर मैं कहाँ मानने वाला था. नितु ने फ़ोन कुछ इस तरह से पकड़ा की सिर्फ वही दिखे, पर ये कॉल भाभी ने ऐसे ही किया था. जैसे ही उन्होंने पुछा की सागर कहाँ है मैं एक दम से सामने आ गया जिससे भाभी को ये पता चल गया की हम दोनों 'प्यार' कर रहे थे. "भाभी हमेशा गलत टाइम पर कॉल करते हो!" मैंने मजाक करते हुए कहा तो भाभी शर्मा गईं और नितु का भी यही हाल था. उनके कॉल के बाद नितु बोली; "सच्ची आप न ....बड़े वो हो!" मैंने उसे सताने की सोची और एकदम से उठ गया मानो जैसे मैंने उसकी बात का बुरा माना हो. मैं उठ कर काउच पर बैठ गया, नितु डरी सहमी सी आई और बोली; "सॉरी!" उसके डरने से मुझे बहुत हँसी आ रही थी. मैं उठ कर खड़ा हुआ और बाहर जाने लगा तो नितु ने मेरा हाथ पकड़ लिया; "सॉरी!" मैं एक दम से पलटा और उसे गोद में उठा लिया. तब जाकर उसे ये एहसास हुआ की मैं बस उससे मजाक कर रहा था. हम दोनों फिर से बिस्तर पर लेटे एक दूसरे के होठों से खेल रहे थे. नितु और मैं दोनों एकदम से गर्म हो गए थे, एक-एक कर हमने कपड़े उतार फेंके और नितु ने मुझे खुद से चिपका लिया, उसकी दोनों टांगें मेरी कमर पर लोच हो गईं थी. मेरा खड़ा लिंग नितु की पनियाई योनी पर दस्तक दे रहा था. नितु ने अपना हाथ नीचे ले जा कर आज पहली बार मेरा लिंग छुआ और उसे अपनी योनी के द्वार पर रखा. नितु के मुलायम हाथों के एहसास ने ही मेरे लिंग से प्रि कम की बूँद टपका दी थी! मैंने धीरे से लिंग को अंदर दबाया और आज भी मुझे उतनी ही ताक़त लगानी पड़ी जितनी सुहागरात में लगानी पड़ी थी. "ससससस....आह्ह!!!" नितु ने सिसकारी ली और लिंग फिसलता हुआ पूरा अंदर समा गया.नितु की योनी भट्टी की तरह गर्म थी और मेरे लिंग के लिए ये गर्मी झेलना मुश्किल था. इसलिए मैंने अपने लिंग को तेजी से अंदर-बाहर करना शुरू किया, नितु को ५ मिनट नहीं लगे और उसने ढेर सारा पानी बाहा दिया जिससे उसकी योनी की गर्मी कुछ कम हुई. घर्षण कम होने की वजह से मुझे आधा घंटा ही मिला खुद को रोके रखने का और फिर मैं और नितु दोनों एक साथ स्खलित हुए! मैं लुढ़क कर नितु की बगल में लेट गया, नितु कुछ देर सीढ़ी लेटी रही और फिर करवट ले कर मुझसे चिपक कर सो गई.

हम वेगास में ७ दिन रुके और हर रात हमने जी भर के संभोग किया, जिसके परिणाम स्वरुप नितु अब संभोग में खुल गई थी. जिस दिन हमें वापस इंडिया आना था उस दिन हम एयरपोर्ट जल्दी पहुँच गए, नितु ने हमेशा की तरह आज भी साडी पहनी हुई थी. वो कॉफ़ी लेने काउंटर पर गई और मैं लैपटॉप पर काम करने लगा की एक आदमी जो बात करने के अंदाज से मुझे ऑस्ट्रेलियाई लगा वो नितु से बात करने लगा. जब ५ मिनट तक लौट नहीं आई तो मैंने उसे बैठे-बैठे ढूँढना शुरू किया तो पाया वो उस आदमी से बात कर रही हे. नितु लग ही इतनी सुंदर रही थी की वो आदमी उससे बात करने लगा. इधर ये देख कर मेरी जलने लगी और जब नितु ने मेरी तरफ देखा तो मुझे और जलाने के लिए उसने उससे और बातें शुरू कर दी. अब मुझे भी नितु को दिखाना था की मैं भी कुछ कम नहीं तो मैंने अपना ब्लेजर पहना, बालों को हाथों से सही किया और सनग्लास पहन कर बैठ गया.कुछ दूर एक सुंदर लड़की बैठी थी जो कॉफ़ी पीते हुए सब को देख रही थी. उसके हाथ में फ़ोन था और वो चार्जर कनेक्ट करने का पॉइंट देख रही थी. मैंने हाथ के इशारे से उसे बताया की चार्जिंग पॉइंट मेरे नजदीक है तो वो मुस्कुरा कर मेरे पास आई. फिर उसने मुझे थैंक्स बोलै और मैंने उससे बातें करना शुरू कर दिया. उस लड़की ने शॉर्ट्स पहनी थीं और उसकी लम्बी मखमली गोरी टांगें बहुत हसीन लग रही थी. वो मेरी ही बगल में बैठ कर बातें करने लगी. उसे देखते ही नितु जल भून कर राख हो गई और उस आदमी को बोली; "माई हसबंड इज वेटींग फॉर मी!" इतना बोल कर वो तेजी से मेरे पास आई और हाथ अपनी कमर पर रख कर गुस्से से मुझे देखने लगी. "ओह....मिट माई ब्युटीफुल वाइफ नितु!” मैंने हँसते हुए कहा तो वो लड़की नितु को देखती ही रह गई! जब उसने नितु से बात शुरू की तो पता चला की वो लेस्बिअन है और उसे नितु बहुत पसंद आई! ये सुन कर नितु की हँसी रोके नहीं रुक रही थी! वो दहाड़े मार के हँसने लगी और मैं शर्म से लाल हो गया.इस तरह हँसते हुए हम दिल्ली पहुँचे और वहाँ से बैंगलोर!

बैंगलोर पहुँचते ही मैं सीधा ऑफिस आया, नितु को घर पर कुछ काम था इसलिए वो वहीं रुक गई. ऑफिस आ कर देखा तो वहाँ का हाल एकदम बिगड़ा हुआ था! साफ़-सफाई तो छोडो तीनों ने कोई काम-धाम ही नहीं किया था! जब मैंने काम की अपडेट माँगी तो तीनों ने आधा-अधूरा काम दिखा दिया. “व्हॉट दीं हेल इज गोइंग ऑन हिअर? आई ट्रस्ट यू गाईज हिअर अँड यू हॅव बिन वेस्टिंग योवर टाइम! कॉल योवर होम/हॉस्टेल अँड टेल देम यू आर नॉट गोइंग बॅक अंटील यू रॅप ऑल दिस!” मैंने तीनों को अपना फरमान सुना दिया.

इधर नितु का फ़ोन आया तो मैंने उसे सब बताया और वो बहुत नाराज हुई. शाम को वो सब का खाना ले कर आई और तब तक ना मैंने कुछ खाया था ना उन तीनों ने! "दरअसल ये गलती मेरी है! मैंने इन लोगों को सर पर चढ़ा रखा है!" नितु गुस्से में बोली. तीनों जानते थे की हम दोनों जितना एम्प्लाइज का ध्यान रखते थे उतना कोई नहीं रखता था और हमें दोनों को गुस्सा दिला कर तीनों ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी थी. तीनों ने हमें आ कर सॉरी बोला और प्रॉमिस किया की आगे से वो ऐसी लापरवाही नहीं करेंगे. आखिर नितु ने सब को खाना परोसा और खाना खा कर हम पाँचों काम में लग गये. रात ११ बजे तक बैठ कर सारा काम निपटा, अगले दिन की छुट्टी नितु ने दे दी! "कल रात सात बजे तुम तीनों रेडी रहना!" नितु बोली तो तीनों को लगा की कल रात को भी काम करना होगा. "बेवकूफों! शादी में तो आया नहीं गया तुमसे अब रिसेप्शन की पार्टी चाहिए या नहीं?" नितु ने हँसते हुए कहा तो तीनों की जान में जान आई.

तीनों को हमने कैब से ड्राप किया और फिर १ बजे घर पहुंचे. घर पर मेरे लिए एक सरप्राइज वेट कर रहा था. जैसे ही मैं कमरे में घुसा तो वहाँ का नजारा देख मैं दंग रह गया! सारे कमरे में नितु ने साक्षी और हमारी फोटो चिपका दी थी! ऐसा लगता था मानो पूरे कमरे में साक्षी ही छाई हो! आज इतने दिनों बाद मुझे साक्षी का एहसास हुआ तो मेरी आँखें नम हो गई. "हे... ये मैने आपको रुलाने के लिए नहीं किया! ये इसलिए किया ताकि जो दर्द आप अपने अंदर छुपाये रहते हो उसे खत्म कर सकूँ!" नितु बोली. मैंने नितु को कस कर गले लगा लिया और उसे थैंक यू कहा!

नितु चेंज करने गई और इधर मैं पूरे कमरे में घूमने लगा और हर एक फोटो को छू कर देखने लगा. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सच में साक्षी को छू रहा हूँ, वो हर एक पल मुझे याद आने लगा जो मैंने साक्षी के साथ बिताया था. इस बार मैं रोया नहीं बल्कि दिल अंदर से खुश हो गया, ये मेरे साथ पहली बार हो रहा था! कुछ देर बाद नितु चेंज कर के आई और मुझे तस्वीरों को छूता देख वो भावुक हो गई और पीछे से आ कर मुझे अपनी बाँहों में जकड़ लिया. "बेबी! आपको पता है आज मुझे कैसा फील हो रहा है? मुझे रोना नहीं बल्कि इन तस्वीरों में साक्षी को देख कर ख़ुशी हो रही है! ऐसा लगता है जैसे वो मेरे सामने ही है!" फिर मैं नितु की तरफ पलटा और उसे अपने गले लगा लिया; "आपको जितना भी थैंक यू कहूँ उतना कम है!" मैंने कहा तो नितु ने मुझे और कस कर जकड़ लिया.कुछ देर हम ऐसे ही खड़े रहे, फिर मैंने चेंज किया और एक बार फिर हम दोनों एक दूसरे की बाहों में सो गए!

सुबह मैं जल्दी उठा, नितु अब भी सो रही थी इसलिए मन नहीं किया उसे जगाया. मैं बाहर आया और अपने लिए चाय बनाई और काम में लग गया.नितु ग्यारह बजे उठी और मुझे काम करते देख वो अपनी कमर पर हाथ रख कर खडी हो गई और प्यार भरे गुस्से मुझे देखते हुए बोली; "सो मत जाना आप! सारा टाइम काम..काम..काम...! इधर मैं उस टाइम कॉल पर था तो मैंने बस कान पकड़ कर उसे मूक भाषा में सॉरी कहा. नितु ने दोनों के लिए चाय बनाई और कप मुझे देते हुए नाश्ते के लिए पुछा, मैं तब भी कॉल पर था सो मैं ने फिर से नितु से दो मिनट रुकने को कहा. इधर नितु गुस्से में उठी और किचन में जा कर उसने बर्तन सिंक में पटकने शुरू कर दिये. मैंने जल्दी से कॉल निपटाई और किचन में आ गया और नितु को पीछे से अपनी बाहों में जकड़ लिया. "सॉरी बेबी! वो कल रात को सारा काम फाइनल हुआ तो पार्टी को इनवॉइस भेज रहा था!" मैंने नितु के बालों को सूंघते हुए कहा पर नितु कुछ नहीं बोली; "अच्छा बाबा ....अब से इतना काम नहीं करूँगा!" मैंने नितु को मस्का लगाने को कहा और वो थोड़ा पिघल भी गई की तभी मेरा फ़ोन बज उठा जिसे सुन नितु का पारा फिर से चढ़ गया."डोन्ट यू डेअर पीक अप दॅट कॉल?” नितु ने मुझे चेतावनी देते हुए कहा. पर कॉल पार्टी का था और मैंने स्क्रीन पर पार्टी का नाम नितु को दिखाया तो वो नाराज हो कर कमरे में चली गई. मुझे मजबूरन कॉल उठा कर बात करनी पड़ी, बात कर के मैं वापस कमरे में आया तो नितु मुँह फुलाये हुए दूसरी तरफ मुँह कर के लेटी हुई थी. "बेबी सॉरी! वो एक पार्टी ने कुछ डाटा भेजा है बस उसी के लिए कॉल किया था!" मैंने कान पकड़ते हुए कहा. पर नितु गुस्से में कुछ नहीं बोली उल्टा चादर उठा कर अपने ऊपर डाल ली. मैं समझ गया की आज तो मेरी शामत है, इसलिए मैं किचन में नाश्ता बनाने लगा. नाश्ता ले कर मैं कमरे में आया और नितु के सामने खड़ा हो गया, पर वो तब भी कुछ नहीं बोली. मैंने नाश्ता एक साइड में रखा और नितु के पास बैठ गया; "बाबा...ट्राय अँड अंडर स्टँड.... हम इतने दिन बाहर बिता कर आये हैं और हमारी गैरहाजरी में तुमने देखा ना किसी ने कुछ काम नहीं किया. अब थोड़ा टाइम लगेगा ताकि सारी चीजें इन-ऑर्डर आ जायें, बिज़नेस भी जरुरी है ना? वरना हम खाएंगे क्या?" मैंने नितु से प्यार से कहा तो उसने पलट कर मुझसे सवाल पूछ लिया; "क्या बिज़नेस मुझसे भी जरुरी है?"

"नहीं बेबी... बट प्लीज समझो! सुबह इनवॉइस भेजना जरुरी था! ओके आई प्रॉमिस मैं प्यार ज्यादा और काम कम करूँगा!" पर मेरी किसी भी बात का नितु पर कोई असर नहीं पड़ा, उसने दूसरी तरफ मुँह कर लिया और लेटी रही. मैं उठा और बालकनी में आ कर बैठ गया, सर पीछे टिका कर मैं सोचने लगा की नितु को कैसे मनाऊँ! कुछ देर बाद नितु खुद ही उठ कर आई, नाश्ता टेबल पर रखा और मेरी गोद में बैठ गई. नितु ने सबसे पहले मेरी गर्दन पर गुड मॉर्निंग वाली किसी दी और फिर मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी. "आपको लगता है की सिर्फ आप ही अच्छा ड्रामा कर सकते हो?" नितु ने मुझे मेरा वेगास में किया ड्रामा याद दिलाया, जिसे याद कर मैं हँस पडा. हमने वैसे ही बैठे-बैठे नाश्ता किया, इधर मेरा लिंग खड़ा हो गया और नितु को गढ़ने लगा. नितु ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई पर आगे कुछ होता उसके पहले ही दरवाजे की बेल्ल बज गई. नितु ने उठ कर दरवाजा खोला, एक आदमी आया था और फिर मुझे अगली आवाज ड्रिल की आई जिसे सुन मैं फ़ौरन हॉल में आया तो देखा की वो आदमी हम दोनों के नाम की नेम प्लेट लगा रहा हे. “मिस्टर अँड मिसेस मौर्य” एक शानदार फॉन्ट से लिखा हुआ था. जिसका आर्डर नितु ने कल दे दिया था. अपना और नितु का नाम देख मैं मुस्कुरा दिया और यही ख़ुशी मुझे नितु के चेहरे पर दिखी. शाम होने तक आस-पडोसी आ कर हमें मुबारकबाद देते रहे और मैं और नितु सबकी खातिर-दारी करते रहे. शाम होते ही हम दोनों तैयार हुए और मैंने तीनों को बारी-बारी से कॉल किया. हमने कैब से तीनों को पिक किया और एक अच्छे रेस्टरंट में घुसे. नितु ने सब का खाना आर्डर किया और साथ ही ड्रिंक्स भी! नितु ने अपने लिए वाइन ली और बाकियों ने बियर| बातों का सिलसिला चालु हुआ, यहाँ से ले कर गाँव तक और न्यूयोर्क तक की सारी बातें नितु ने शुरू कर दी. इधर मौके का फायदा उठा कर मैंने अपने लिए ३० मिली चिवागे आर्डर कर दी, नितु अपनी बातों में लगी रही और देखते ही देखते मैंने ५ पेग टिका लिए! इधर मैंने भी इतना ध्यान नहीं दिया की नितु ने वाइन की पूरी बोतल खत्म कर दी! रेस्टरंट में गाना चल रहा था और लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था. अब मुझे तो सुररूर चढ़ने लगा था और नितु तो फुल झूम रही थी. तभी गाना लगा; 'सखियाँ ने मैनु म्हणे मार दियाँ....' ये सुनते ही नितु ने छोटे बच्चे जैसी सूरत बनाई.

नितु ने गाने की लाइन मुझसे शिकायत करते हुए दोहराईं| पिछले कुछ दिन से मैं काम इतना व्यस्त था की कॉल आते ही बाहर आ जाय करता था.

नितु ने हाथ जोड़ते हुए कहा तो मुझे उस पर बहुत प्यार आ गया.मैंने अपने दोनों हाथ खोल दिए और वो आ कर मेरे गले लग गई. "अभी-अभी हम घूम कर आये हैं, अब आपको फिल्म देखना पसंद नहीं तो मैं क्या करूँ? और रूठते तो आप इतना हो के की क्या बताऊँ!" मैंने नितु को गले लगाए हुए उससे कहा तो सारे हँस पडे. मैं और नितु अब काफी चिपक कर बैठे थे और बाकी तीनों अलग-अलग बैठे थे. नितु के इस उमड़ रहे प्यार के कारन तीनों थोड़ा अनकंफर्टेबल हो रहे थे. घडी में १२ बजे थे तो मैंने बिल मंगवाया और वो बहुत अच्छा खासा आया! आकाश ने कैब बुक की और हमने पहले दोनों लड़के को छोड़ा, नितु की दोस्त अब हॉस्टल नहीं जा सकती थी तो नितु ने उसे हमारे घर रुकने को कहा. हम तीनों घर पहुँचे तो कैब से उतरते ही नितु ने ड्रामा शुरू कर दिया. मैंने घर की चाभी नितु की दोस्त को दी और उसे फ्लैट नंबर ३९ खोलने को कहा और मैं नितु को गोद में उठा लिया. नशा नितु पर चढ़ चूका था और अब उसे चलने में दिक्कत हो रही थी. या फिर ये उसका ड्रामा था! मैं और नितु अंदर आये, मैंने उस लड़की को गेस्ट रूम में सोने को कहा. मैं नितु को ले कर अंदर आया और उसे बिस्तर पर लिटा कर उठने लगा तो उसने हमेशा की तरह अपने बाहों का हार मेरे गले में डाल कर मुझे रोक लिया. "बेबी दरवाजा तो बंद कर ने दो!" मैंने कहा और दरवाजा बंद कर के, जूते उतार के फेंक कर नितु की बगल में लेट गया.मेरा सर भी घूमने लगा था और होश अब कम होने लगा था. इधर नितु पर खुमारी छाने लगी थी. उसने मेरी तरफ करवट ली और मेरे होठों से अपने होंठ मिला दिये.

नितु के मुँह से मुझे रेड वाइन की सुगंध आ रही थी. नितु ने मेरे होठों को बारी-बारी से चूसना शुरू कर दिया. उसके हाथ अपने आप फिसलते हुए मेरी छाती से होते हुए मेरे लिंग पर पहुँच गए और पैंट के ऊपर से ही नितु ने उसे दबाना शुरू कर दिया. मैं समझ गया की नितु क्या चाहती है पर मेरा लिंग सो रहा था और वो सिर्फ नितु के छूने भर से खड़ा नहीं हो रहा था. नितु उठी और मेरी टांगों के बीच बैठ गई. उसे काफी मेहनत करनी पड़ी मेरी पैंट की बेल्ट खोलने में. मेरा होश अब कम होने लगा था. मैं जानता था की नितु क्या करने वाली थी पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की वो ये करेगी. नितु ने मेरी पैंट खोल दी और उसे नीचे खींचने लगी. पर बिना मेरे कमर उठाये वो ये नहीं कर पाती.मैंने अपनी कमर उठाई तो नितु ने पहले पैंट निकाली और फिर कच्छा.मेरा सोया हुआ लिंग नितु के सामने था. नितु ने डरते हुए उसे छुआ और लिंग की चमड़ी पीछे खिसकाई जिससे मेरा सुपाड़ा उसके सामने आया. नितु एकदम से नीचे झुकी और उसे मुँह में भर लिया पर इसके आगे क्या करना है उसे नहीं पता था. आखिर मैंने आँखें बंद किये हुए नितु को गाइड करना शुरू किया; "सक इट लाईक अ क्यांडी!" ये सुन नितु ने मेरे लिंग को टॉफ़ी की तरह चूसना शुरू किया. लिंग को जब नितु का प्यार आज पहली बार मिला तो वो ख़ुशी से फूल गया और नितु के मुँह में ही अपना अकार लेना चाहा पर नितु उसे पूरा मुँह में नहीं ले पाती इसलिए नितु ने तुरंत उसे अपने मुँह से निकाल दिया. अब नितु के सामने उसके मुँह के रस से नहाया हुआ एक विशालकाय लिंग था जिसे देख नितु को उस पर प्यार आ रहा था. पर अब एक दिक्कत थी. वो थी वो तेज महक जो नितु को लिंग से आ रही थी. ये महक उसे मेरे लिंग को दुबारा मुँह में लेने नहीं दे रही थी. इधर मैं बेकरार हो रहा था की नितु कब मेरा लिंग फिर से मुँह में ले ले! "बेबी.... यूज योवर सलाईवा....! पोरं इट ऑन दीं टीप, दॅट शुड इज दीं…..” मैंने बात पूरी नहीं की पर नितु समझ गई. उसने मेरे लिंग के सुपाडे पर अपने थूक की एक धार गिराई जो धीरे-धीरे बहती हुई नीचे जाने लगी. नितु ने धीरे से लिंग को फिर से अपने मुँह की गर्माहट दे दी और इस बार उसे लिंग से वाइन की महक आई. नितु ने लिंग मुँह में भर कर उसे चूसना शुरू किया, उसका मुँह स्थिर था और फिर मैंने उसे अगला आदेश दिया; "बेबी....थोड़ा बाईट करो!" ये सुनते ही नितु को क्या सूझी की उसने लिंग को अपने मुँह के दाहिनी तरफ सरकाया और अपने दाँतों से दबाया.नितु की दाहिनी तरफ के सारे दाँतों का दबाव मुझे मेरे लिंग के एक हिस्से पर होने लगा, फिर नितु ने अपने मुँह के बाईं तरफ से भी ऐसा ही दबाव डाला, इस एहसास ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिये. कुछ मिनट नितु ऐसे ही मेरे लिंग को कभी दाँत से दबाती तो कभी उसे टॉफ़ी की तरह चूसती| मेरा लिंग अब पूरी तरह सख्त हो गया था और अब मौका था अगले पड़ाव का!

"बेबी व्हाइल सकिंग मुव्ह योवर माऊथ इन फॉरवर्ड अँड बॅकवॉर्ड डायरेक्षण!" नितु ने अच्छे विद्यार्थी की तरह ठीक वैसा ही किया और अब मेरा मजा दुगना होने लगा था. ५ मिनट की चुसाई में ही नितु ने मुझे चरम पर पहुँचा दिया. "सक मी लाईक योवर सिपिंग अ कॉल्ड ड्रिंक फ्रॉम अ स्ट्रा" मेरा ये कहना था और नितु ने अपने मुँह के अंदर बड़ा सक्षण बनाया और लिंग चूसने लगी. कमरे में अब 'चप-चप' की आवाज गूंजने लगी. नितु बड़ी शिद्दत से चूस रही थी और हर पल मेरा हाल ऐसा था जैसे की कोई मेरे प्राण-पखेरून खींचता जा रहा हो! नितु की इस चुसाई के आगे मैं टिक ना सका और मुझे उसे अपने स्खलित होने की चेतावनी देने का समय भी नहीं मिला. नितु के मुँह में ही मेरा फव्वारा छूटा जिसे नितु सारा का सारा गटक गई! उसने एक बूँद भी बर्बाद नहीं होने दी थी. इधर अपने इस तीव्र स्खलन के बाद मुझ में जैसे जान ही नहीं बची थी. शराब की खुमारी नींद में बदल गई और मैं उसी हालत में सो गया.नितु कुछ देर बाद उठी और मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी. फिर जा कर बाथरूम में चेंज कर के आई और मेरे होठों को मुँह में ले कर चूसने लगी. पर मैं गहरी नींद सो चूका था सो उसकी किस का जवाब नहीं दे सका. नितु ने कुछ नहीं कहा और मुस्कुराती हुई मेरे सीने पर सर रख सो गई.
 
सुबह सबसे पहले मैं ही उठा और अपनी ये हालत देख मुझे एहसास हुआ की मैं कल नितु को प्यासा ही छोड़ दिया था. मुझे पता था की सुबह उठते ही नितु नाराज होगी पर ऐसा नहीं हुआ. मैं जब कॉफ़ी ले कर आया तो नितु अंगड़ाई लेते हुए उठी और मेरी गर्दन पर किसी की और मुस्कुराते हुए कॉफ़ी पीने लगी. "सॉरी यार ...वो कल रात... आई पिस आऊट!" मैंने कहा तो नितु हँसने लगी; "तो क्या हुआ?" मैं नितु का मतलब समझ गया, तभी नितु की दोस्त उठ कर आ गई और मैंने उसे भी कॉफ़ी दी. नाश्ता कर के हमने उसे हॉस्टल छोड़ा और हम दोनों ऑफिस आ गये.

अब मस्ती-मजाक बहुत हो चूका था. काम का लोड बहुत बढ़ चूका था और फिर हमें अगस्त में गाँव भी जाना था. अगला एक महीना मैंने रात-रात जाग कर काम किया जिससे नितु को बहुत कोफ़्त होती थी. वो मेरे इस जूनून से चिढ़ने लगी थी! अब हमारे पास बस तीन महीने बचे थे और अब हम सोच में पड़ गए थे की एक्सपांड करें या न करें? एक्सपांशन के लिए हमें नया स्टाफ हायर करना था और रेंट भी बढ़ने वाला था. अगर हम एक्सपांशन करते हैं तो हम ये सारा काम लखनऊ शिफ्ट नहीं कर पाएंगे! नितु ने तो मना कर दिया. क्योंकि वो जानती थी की यहाँ से लखनऊ शिफ्ट करना ज्यादा जरुरी है आखिर उसने माँ से वादा जो किया था. "बेबी... मैं जानता हूँ की आपको लखनऊ शिफ्ट होना है पर जो काम अभी हाथ में है उसे हम ऐसे छोड़ नहीं सकते! प्लीज बीयर विदमी! अभी के लिए एक प्रोफेशनल हायर कर लेते हे. अगस्त में हम जब गाँव जायेंगे तो मैं मोहित और प्रफुल से बात करता हु." पर नितु जिद्द पर अड़ गई थी. उसे माँ से किया वादा पूरा करना था और साथ ही साक्षी को अपने गले से भी लगाना था. उसका ये प्यार बिज़नेस के आगे आ गया था जो मुझे कतई गवारा नहीं था. नितु ने गुस्से से मुझ पर चिल्लाते हुए कहा; "आप शायद भूल गए हो की आप एक बाप भी हो? क्या आपका मन नहीं करता साक्षी को मिलने का? या काम के आगे उसे भी भूल गए हो!" नितु की बात मेरे दिल में शूल की तरह गढ़ गई. गुस्सा तो बहुत आया पर मैंने खुद को रोक लिया और अपने गुस्से को पी गया और उठ कर घर के बाहर चला गया.

कुछ देर बाद जब नितु को उसके कहे शब्दों का एहसास हुआ तो उसने ताबड़तोड़ मुझे कॉल करना शुरू कर दिया. मैं जानबूझ कर उसके काल नहीं उठा रहा था और सर झुकाये लालबाग़ लेक के किनारे बैठा रहा. ऐसा नहीं था मैं साक्षी से प्यार नहीं करता था पर मैं खुद को संभाल रहा था ताकि साक्षी को याद कर के उदास न रहु. मैं ये मान चूका था की शायद मेरी किस्मत में साक्षी का प्यार नहीं है, इस बार जब उससे मिलूँगा तो वो मुझे पहचनानेगी भी नहीं! बस इसी एक डर से दूर भाग रहा था और नितु को लग रहा था की मेरा साक्षी के लिए मेरा प्यार खत्म हो चूका है! मैं जानता था की वो गलत है पर दिल नहीं कह रहा था की उसे ये कहूँ!

अँधेरा होने तक मैं वहीँ बैठा रहा, जब गार्ड आया तो मैं घर लौट आया. दरवाज़ा खोला तो सामने नितु जमीन पर अपने दोनों घुटनों में सर छुपाये हुए रो रही थी. दरवाजे की आहात सुनते ही उसने मुझे देखा और एकदम से खडी होकर मेरे पास दौड़ती हुई आई और मेरे गले लग गई. मैंने उसके सर पर हाथ फेरा और उसे चुप कराया| "आई एम सॉरी!!!” नितु ने सुबकते हुए कहा. "इट्स ओके!” मैंने कहा और फिर नितु से कुछ खाने को मँगाने को कहा.

हम दोनों टेबल पर खाना खाने बैठ गए पर नितु गुम- सुम थी और कुछ बोल नहीं रही थी. ना ही वो खाने को हाथ लगा रही थी. मैंने खुद उसे अपने से खाना खिलाना शुरू किया तब जा कर उसने खाना शुरू किया. दोनों ने चुप-चाप खाना खाया और सोने चले गये. मैं पीठ के बल सीधा लेटा था की तभी नितु ने करवट ली और अपना सर मेरे सीने पर रख दिया. कुछ देर हिम्मत बटोरने के बाद बोली; "आई… थिंक…. आई कान्ट… कन्सिव!” ये सुनते ही मैं चौंक कर बैठ गया और नितु को भी बिठा दिया. “क्या डू यू मीन यू कान्ट कन्सिव? किसने बोला? कौन से डॉक्टर को दिखाया?" मैंने सवालों की बौछार कर दी! "इतने महीने हो गए....और मैं अभी तक कन्सिव नहीं कर पाई हूँ! हर हफ्ते मैं टेस्ट (प्रेगनेंसी टेस्ट) करती हूँ...पर....! शायद मेरी उम्र की वजह से....?!" नितु ने हताश होते हुए कहा. अब मुझे सब समझ आगया की आज नितु क्यों मुझ पर बरस पड़ी थी! "हे.... आप पागल हो क्या? हमें बस ३ महीने हुए हैं और इन तीन महीनों में हमने कितनी बार संभोग किया? इट टेक टाइम.... थोड़ा सब्र करो! (कुछ सोचते हुए) अक्च्युअली इसका दोषी मैं हूँ...मैं आपको ज्यादा समय नहीं दे पाता और आप इसे अपनी उम्र से जोड़ रहे हो? पागल... बुद्धू ....डफर.... आपकी संतुष्टि के लिए कल डॉक्टर के चलते हैं ओके? अँड आई एम शुअर कुछ नहीं निकलेगा!" मैंने कहा और नितु को अपने गले लगा लिया. माँ न बन पाने के डर के कारन नितु हार मानने लगी थी और उसकी ममता साक्षी को चाहती थी. वो मन ही मन साक्षी को अपना आखरी विकल्प मान चुकी थी और उसे खोने से डरती थी. पूरी रात मैंने नितु को अपने सीने से चिपकाए रखा और उस के सर पर हाथ फेरता रहा ताकि वो चैन से सो जाये.

सुबह उठते ही मैं फटाफट तैयार हुआ और कॉफ़ी ले कर नितु को उठाया. मुझे तैयार देख नितु को होश आया की हमें डॉक्टर के जाना हे. वो फटाफट तैयार हुई और हम डॉक्टर के आये, कुछ टेस्ट्स वगैरह हुए और रिपोर्ट हमें कल रिपोर्ट के साथ बुलाया. वो पूरा दिन नितु डरी-डरी रही और मैं उसके साथ बैठा रहा, ऑफिस की छुट्टी की और फ़ोन भी बंद कर दिया. अगले दिन जब हम दोनों रिपोर्ट ले कर डॉक्टर के पास पहुंचे तो उसने कहा की घबराने वाली कोई बात ही नहीं हे. दोनों के लिए कुछ दवाइयाँ लिखी और हमें एक साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करने को कहा. नितु अच्छे से जान गई थी की काम को ले कर मैं कितना पॅशनेट हूँ इसलिए हमने कुछ नियम-कानून बनाये. मैं किसी भी हाल में शाम ६ बजे के बाद कोई भी बिज़नेस से जुड़ा हुआ काम नहीं करुंगा. ६ बजे के बाद मेरा पूरा समय सिर्फ और सिर्फ नितु का होगा और मैंने भी एक शर्त रखी की सुबह हम दोनों जल्दी उठेंगे और योग और एकजरसाइज करेंगे, बाहर से खाना-पीना बंद और एक हेलथी लाइफ स्टाइल जियेंगे. ऑफिस में एक की जगह हमें दो लोग हायर करने पड़े, नए लोगों को मैंने अपने साथ युएस. वाले प्रोजेक्ट पर लगा लिया. नितु को मैंने बाकी के काम दे दिए जो उसके लिए म्यानेज करना आसान था. बिज़नेस अब धीरे-धीरे ग्रो कर रहा था और हम दोनों इसी से खुश थे.इधर अश्विनी अंदर ही अंदर हमारे घर की बुनियाद में सेंध लगा चुकी थी. सारे घर के लोगों के दिलों में अश्विनी ने अपनी जगह फिर से बना ली थी. सब की बातें वो सर झुका कर मानने लगी थी और साक्षी तो पहले से ही सब का प्यार पा रही थी. अश्विनी के मन में मेरे लिए जो गुस्सा था वो अब धधक कर आग का रूप ले चूका था. उसका बदला, उसकी नफरत अब सारी हदें पार कर चूके थे! बाहर-बाहर से तो वो ऐसे दिखाती थी की वो बहुत खुश है पर अंदर ही अंदर कुढ़ती जा रही थी. मुझसे बदला लेने के लिए उसे सब से पहले नितु को ठिकाने लगाना था. ताकि मैं उसे खोने के बाद टूट जाऊँ और तिल- तिल कर तड़पूँ और फिर वो अपने हाथों से मेरा खून करे! पर कुछ भी करने के लिए उसे चाहिए था पैसा जो उसके पास था नहीं, पर मंत्री की जायदाद तो उसकी थी!

अश्विनी ने चोरी छुपे उस इंस्पेक्टर को कॉल किया और उससे उसने वकील का नंबर लिया. "वकील साहब मैं अश्विनी बोल रही हूँ!" अश्विनी का नाम सुनते ही वकील को याद आ गया."वकील साहब उस दिन आप घर आये थे ना? और आपने कहा था की मंत्री यानी मेरे ससुर जी की जायदाद की एकलौती वारिस मैं हूँ?! तो आप मुझे बता सकते हैं की मैं उसे कैसे क्लेम करूँ?" ये सुनते ही वकील खुश हो गया और उसने अश्विनी को कानूनी दांव-पेंच समझाना शुरू कर दिया जो उसके पल्ले नहीं पडा. "देखिये वकील साहब, मुझे अपनी बेटी के भविष्य की चिंता हे. आपके ये दांव-पेच मेरी समझ के परे हैं, मुझे आप बस इतना बताइये की क्या आप मुझे उस जायदाद का वारिस बना सकते हैं?" अश्विनी ने साक्षी के नाम से झूठ बोला. उसे साक्षी के भविष्य की रत्ती भर चिंता नहीं थी उसे तो केवल मुझसे बदला लेना था! "आप उस जायदाद की जायज वारिस हैं और मैं आपको आपका हक़ दिलवा सकता हूँ!" वकील बोला. इससे पहले वो अपनी फीस की बात करता अश्विनी ने उसे पहले ही बता दिया; "देखिये वकील साहब, मेरे पास आपको देने के लिए पैसे नहीं हैं! मेरे घरवाले इस केस को ले कर मुझे रोक रहे हैं पर मैं चाहती हूँ की आप मेरी तरफ से केस फाइल कर दिजिये. जैसे ही मुझे जायदाद मिलेगी मैं उसका १०% आपको फीस के रूप में दे दुंगी. आप को यदि मुझ पर भरोसा ना हो तो आप कागज बना कर ले आइये मैं साइन कर देती हूँ!" अश्विनी ने अपनी चाल चली, वैसे तो वकील बिना फीस के कोई काम नहीं करता पर अश्विनी के १०% के लालच में पड़ कर वो मान गया.ये सारा काम चोरी-छुपे होना था इसलिए अश्विनी ये सोच कर बहुत खुश थी की क्या होगा जब वो केस जीत जाएगी! सारा का सारा परिवार उसके कदमों में गिर पड़ेगा यही सोच कर अश्विनी के मन का कमीनापन बाहर आ गया.

कुछ दिन बाद वकील अश्विनी से मिलने आया और कागज ले कर आया जो उसे साइन करने थे. अश्विनी छुपते-छुपाते हुए उससे मिलने कुछ दूरी पर गाँव के स्कूल पहुँची, आज चूँकि छुट्टी थी और पूरा स्कूल खाली था तो वो आराम से सारे कागज पढ़ सकती थी. उसे ये जान कर हैरानी हुई की मंत्री की जायदाद पूरे ५० करोड़ की थी और वकील को ये जान कर ख़ुशी हुई की उसे इस केस के ५० लाख मिलने वाले हे. "देखिये अश्विनी जी, केस तो मैं कल फाइल कर दूँगा और आपको चिंता करने की भी जरुरत नहीं क्योंकि मेरी बहुत अच्छी जान पहचान है जिससे आपको ज्यादा तारीखें नहीं मिलेंगी, बस उसका खर्चा थोड़ा-बहुत होगा! मंत्री साहब की पार्टी ने क्लेम किया था जायदाद पर मैंने फिलहाल उस पर स्टे ले रखा हे. आपको एक दिन कोर्ट में पेश होना होगा, पर आपको कुछ कहना नहीं हे." वकील की बात सुन कर अश्विनी आश्वस्त हो गई और ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आई.

रात को सोते समय साक्षी ने सोचना शुरू किया, उस ने हर एक बात, हर एक शब्द सोच लिया था जो उसे कहना हे. अब बात आई टाइमिंग की, तो वो भी उस ने सोच लिया की कौनसा समय सबसे बेस्ट होगा जिससे पूरे परिवार को एक साथ धक्का लगे! जून का महीना आते ही अश्विनी की जलन उस पर हावी होना शुरू हो चुकी थी. उसे जल्द से जल्द अपना बदला चाहिए था. उसने छुप के वकील को फ़ोन किया; "वकील साहब और कितना टाइम लगेगा?" अश्विनी ने पूछा.

"अश्विनी जी, अभी तो बस दो ही महीने हुए हैं!" वकील मुस्कुराता हुआ बोला.

"वो सब मुझे नहीं पता, मुझे ये प्रॉपर्टी किसी भी हालत में १० अगस्त से पहले अपने नाम पर चाहिए!" अश्विनी ने अपना फरमान सुनाते हुए कहा.

"इतनी जल्दी? देखिये कोर्ट-कचेहरी में थोड़ा टाइम तो लगता है!" वकील हैरान होते हुए बोला.

"आप कह रहे थे न की कुछ खर्चा होगा? कितना लगेगा?" अश्विनी ने अपनी बेसब्री दिखाते हुए कहा.

"जी...वो...यही कुछ ५ लाख!" वकील हकलाते हुए बोला.

"मैं १० लाख दूँगी! पर काम मेरे मुताबिक करवाओ!" अश्विनी की बात सुन वकील हैरान हो गया और उसने अपने जुगाड़ लगाने शुरू कर दिये. विपक्ष के वकील को उसने लाख रुपये पकड़ाए और ५ लाख में उसने जज को सेट किया जिसने विपक्ष का क्लेम ख़ारिज कर दिया. जुलाई के महीने में ही कोर्ट ने फैसला अश्विनी के पक्ष में दे दिया वो भी बिना अश्विनी के कोर्ट जाये. जैसे ही ये खबर वकील ने अश्विनी को दी वो फूली न समाई! प्रॉपर्टी ट्रांसफर के कुछ कागजों पर साइन करने के लिए वकील ने अश्विनी को स्कूल बुलाया. उन कागजों में वकील ने मंत्री की जमीन का एक टुकड़ा जिसकी कीमत करीब २० लाख थी वो अश्विनी से अपनी फीस के रूप में मांगी. अश्विनी ने मिनट नहीं लगाया उसकी बात मानने में और सारे पेपर पढ़ कर दस्तखत कर दिये. "२९ जुलाई तक सारी प्रॉपर्टी आपके नाम हो जायेगी." वकील ने पेन का ढक्कन बंद करते हुए मुस्कुरा कर कहा.

"थैंक यू वकील साहब! आप वो हवेली खुलवा दीजिये और उसकी साफ़-सफाई करवा दीजिये! वहां एक कांता नाम की औरत काम करती थी उसे मेरा नाम बोल दीजियेगा वो सब काम संभाल लेगी और उसके पति को कहियेगा की १९ अगस्त को मुझे लेने यहाँ आये वो भी मर्सिडीज लेकर!" अश्विनी ने कमीनी हँसी हँसते हुए कहा. वकील समझ गया की अश्विनी १९ को ही घर लौटेगी इसलिए उसने अश्विनी के कहे नितुसार साफ़-सफाई करवा दी और कांता और उसके पति को नौकरी पर रख लिया.

इधर घर लौटते ही अश्विनी की ख़ुशी छुपाये नहीं छुप रही थी. पर उसकी ख़ुशी को ग्रहण लगने वाला था. रात को ताऊ जी ने बताया की अश्विनी की दूसरी शादी के लिए एक रिश्ता आया हे. ये सुनते ही अश्विनी को बहुत गुस्सा आया, उसका मन तो किया की वो अभी ताऊ जी का खून कर दे पर उसने खुद को काबू किया और रोनी सी सूरत बना कर बोली; "दादाजी....प्लीज...ऐसा मत कीजिये!.... मैं इस परिवार को छोड़ कर नहीं जाऊँगी! मुझे इस घर से अलग मत कीजिये! आप सब ही मेरे लिए सब कुछ हो!" अश्विनी रोते हुए बोली, ताई जी ने माँ बन कर उसे सम्भाला और उसे पुचकारने लगीं ताकि वो चुप हो जाये. "बेटी तेरी उम्र अभी बहुत कम है! इतनी बड़ी उम्र तो कैसे काटेगी?" ताऊ जी ने प्यार से अश्विनी को समझाना चाहा पर वो नहीं मानी और अपना तुरुख का इक्का फेंक दिया; "आप मेरी चिंता मत कीजिये, साक्षी जो है मेरे पास? मैं उसी के सहारे जिंदगी काट लूँगी, फिर आप सब भी तो हैं!" ताऊ जी शांत हो गए और अश्विनी की बात फिलहाल के लिए मान गये. इधर अश्विनी की खुशियों पर लगा ग्रहण छट गया और उसकी वही कमीनी हँसी लौट आई. "बहुत जल्दी तेरी गर्दन मेरे हाथ में होगी!" अश्विनी रात को सोते समय बुदबुदाई! उसका मतलब मेरी गर्दन से था! बदले का प्लान सेट था और अब बस उसे मेरे आने का इंतजार था. वो जानती थी की मैं साक्षी के जन्मदिन पर जरूर आऊँगा और ठीक इसी समय वो अपना वार मुझ पर करेगी.इधर इन सब बातों से बेखबर मैं और नितु अपनी नई जिंदगी अच्छे से जी रहे थे. दिन, हफ्ते, महीने गुजरे और अगस्त आ गया.नितु ने अपनी टीम यानी अक्कू, पंडित जी और अपनी दोस्त के कान खींचने शुरू कर दिये. "अगर इस बार तुम में से किसी ने भी हमारे जाने के बाद मज़े किये और काम नहीं किया तो तुम सब की खैर नहीं! मुझे डेली अपडेट चाहिए की तुम लोगों ने कितना काम किया है? कोई भी काम अगर पेंडिंग हुआ तो तुम सबकी प्रमोशन खतरे में पड जायेगी!" नितु ने सब को चेतावनी देते हुए कहा. प्रमोशन के लालच में तीनों काम करने के लिए तैयार हो गये. इधर मेरी टीम में ज्वाइन हुए दोनों मेरी उम्र के थे और मुझे उन्हें ज्यादा कुछ नहीं कहना पड़ा क्योंकि वो काम की सिरीयस नेस समझते थे. हमारा प्रोजेक्ट स्टेप बाय स्टेप था इसलिए मेरा उनके काम पर नजर रखना बहुत आसान था. स्टाफ को अच्छे से काम समझा कर हम अगले दिन फ्लाइट से लखनऊ पहुँचे, एक दिन मम्मी-डैडी के पास रुके और फिर गाँव पहुंचे. हमने अपने आने की तारीख किसी को नहीं बताई थी. इसलिए ये सरप्राइज पा कर सब खुश हो ने वाले थे. घर आते ही सबसे पहले मैं अपनी माँ से मिला और फिर अपनी लाड़ली को ढूंढते हुए अश्विनी के कमरे में जा पहुँचा जहाँ भाभी और अश्विनी साक्षी को तैयार कर रहे थे. मुझे वहां देखते ही भाभी खुश हो गईं, साक्षी ने मुझे देख अपने हाथ-पाँव मारने शुरू कर दिये. मैंने उसे फ़ौरन उठाकर अपने सीने से लगा लिया और आँखें बंद किये उस पल को जीने लगा. इतने महीनों से जल रही एक बाप के सीने की आग आज शांत हुई! “आई मिस यू सो मच माई लिट्ल एंजल!!!!” मैंने साक्षी को अपने सिने से लगाए हुए कहा, आँसू की कुछ बूँदें छलक कर साक्षी के कपड़ों पर गिरीं तो भाभी ने मेरे कंधे पर हाथ रख मुझे नहीं रोने को कहा.

उधर अश्विनी के चेहरे पर आज अलग ही मुस्कान थी. ऐसा लगा मानो उसे इस बाप-बेटी के मिलन से बहुत ख़ुशी हुई हो! पर मैं नहीं जानता था की ये वो मुस्कान थी जो किसी शिकारी के चेहरे पर तब आती है जब वो अपने शिकार को जाल में फँसते हुए देखता हे. पीछे से नितु भी भागती हुई ऊपर आ गई. पहले उसने भाभी को गले लगाया और फिर आस भरी नजरों से मुझे देखने लगी ताकि मैं उसे साक्षी को दे दू. मैंने साक्षी को उसे दिया तो उसने फ़ौरन उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके माथे पर पप्पियों की झड़ी लगा दी. अश्विनी को ये दृश्य जरा भी नहीं भाया और वो नीचे चली गई.

ताऊ जी, पिता जी, गोपाल भैया और ताई जी बाहर गए थे इसलिए उनके आने तक हम सब नीचे ही बैठे रहे. माँ ने मुझे अपने पास बिठा लिया और मुझसे बहुत से सवाल पूछती रहीं, इधर नितु साक्षी को अपनी छाती से लगाए हुए उसे दुलार करने लगी. उसने साक्षी से बातें करना शुरू कर दिया था और उसकी ख़ुशी से निकली आवाजों का अपने मन-मुताबिक अर्थ निकालना शुरू कर दिया था. मैं ये देख कर बहुत खुश था और उन बातों में शामिल होना चाहता था पर मेरी माँ को भी उनके बेटे का प्यार चाहिए था. इसलिए मैं माँ की गोद में सर रख कर लेट गया और माँ ने मेरे बालों को सहलाते हुए बातें शुरू कर दी. "बहु (भाभी) आज सागर की पसंद का खाना बनाना." माँ ने कहा तो भाभी रसोई जाने को उठीं, नितु ने एक दम से उनका हाथ पकड़ कर उन्हें रोक लिया. "आप बैठो यहाँ, आज से खाना मैं बनाऊँगी!" ये कहते हुए नितु उठी. "अरे तू अभी आई है, थोड़ा आराम कर ले कल से तू रसोई संभाल लिओ!" भाभी बोलीं पर मैं उठ कर बैठा और अपनी पत्नी की तरफदारी करते हुए बोला; "आज खाना मैं और नितु बनाएंगे और माँ आप चलो मैं आपको चॉपर दिखाता हूँ!" ये कहते हुए हम सारे रसोई में पहुँच गये. मैंने भाभी और माँ को चॉपर दिखाया और वो कैसे काम करता है ये बताया तो वो ये देख कर बहुत खुश हूये.

मैं और नितु हाथ-मुँह धोकर खाना बनाने घुस गये. साक्षी के लिए मैं एक बेबी कॅरी बॅग लाया था जिसे मैंने पहन लिया और साक्षी को उसमें आराम से बिठा दिया. अब मैं एक कंगारू जैसा लग रहा था जिसके बेबी पाउच में बच्चा बैठा हो! मैं और नितु खाना बना रहे थे और साक्षी के साथ खेल भी रहे थे. गैस के आगे खड़े होने का काम नितु करती, और चोप्पिंग का काम मैं करता. सब्जियों को देख साक्षी उन्हें पकड़ने की कोशिश करती और मैं जानबूझ कर दूर हो जाता ताकि वो उन्हें पकड़ न पाए. हमें इस तरह से खाना बनाते हुए देख माँ और भाभी हँस रही थी. खाना बनने के १५ मिनट बाद ही सब आ गए और हम दोनों को देख कर बहुत खुश हूये. "बेटा तूने बताया क्यों नहीं की तुम दोनों आ रहे हो? हम लेने आ आ जाते!" ताऊ जी बोले तो नितु मेरी तरफ देखने लगी; "ताऊ जी आप सब को सरप्राइज देना चाहते थे!" मैंने कहा और फिर हमने सबके पाँव छुए और आशीर्वाद लिया. मेरी गोद में साक्षी को देखते ही पिताजी बोले; "आते ही अपनी लाड़ली के साथ खेलने लग गया?!"
 
"पिताजी मिली प्याली-प्याली बेटी को मैंने बहुत याद किया!" मैंने तुतलाते हुए साक्षी की तरफ देखते हुए बोला. साक्षी ये सुनते ही हँसने लगी. बीते कुछ महीनों में सबसे ज्यादा वीडियो कॉल नितु ने साक्षी को देखने के लिए की थी. मैं चूँकि बिजी होता था तो १५ दिन में कहीं मुझे मौका मिल पाता था वीडियो कॉल में साक्षी को देखने का. "सच्ची पिताजी हम दोनों ने साक्षी को बहुत याद किया, मैं तो फिर भी काम में लगा रहता था पर नितु तो हर दूसरे-तीसरे दिन भाभी को वीडियो कॉल किया करती थी." मैंने कहा तो माँ बोली; "अब बहु भी खुशखबरी सुना दे तो उसका भी अकेलापन दूर हो जाए!" माँ की बात सुन हम दोनों शर्म से लाल हो गए थे. भाभी ने जैसे तैसे बात संभाली और बोलीं; "पिताजी खाना तैयार है!" सब खाने के लिए बैठ गए और जब मैंने और नितु ने सब को खाना परोसा तो सब हैरान हो गये. "पिताजी खाना आज दोनों मियाँ-बीवी ने मिल कर बनाया है!" भाभी हँसते हुए बोली. ये सुनकर सब खुश हुए और सब ने बड़े चाव से खाना खाया.खाने के बाद हमारे लाये हुए तौह्फे हमने सब को दिये. सब के लिए कुछ न कुछ था. यहाँ तक की हम दोनों अश्विनी के लिए भी एक साडी लाये थे जिसे उसने सब के सामने नकली हँसी हँसते हुए ले लिया. पर सबसे ज्यादा तौह्फे साक्षी के लिए थे, १० ड्रेसेस के सेट जिसमें से एक ख़ास कर उसके जन्मदिन के लिए था. उसके खलेने के लिए खिलोने, फीडिंग बोतल, छोटी छोटी चुडीया और भी बहुत सी चीजें.मैं साक्षी को गोद में ले कर उसे उसके गिफ्ट्स दिखा रहा था और साक्षी बस हँसती जा रही थी!

रात को सोने के समय मैं साक्षी को अपने साथ ऊपर कमरे में ले आया. रसोई के सारे काम निपटा कर नितु भी ऊपर आ गई. मैं साक्षी को गोद में ले कर उससे बात करने में लगा हुआ था. नितु कुछ देर चौखट पर खड़ी बाप-बेटी का प्यार देखती रही और फिर बोली; "आई एम रियली सॉरी! मैंने आपको बहुत गलत समझा! मुझे लगा था की ऑफिस के काम में आप साक्षी को भूल गए!" नितु ने सर झुकाये हुए कहा. "बेबी (नितु) भूल नहीं गया था...बस अपने प्यार को दबा कर रख रहा था. घरवायलों से तुमने वादा किया था न की तुम मेरा ख्याल रखोगी? फिर तुम्हें गलत कैसे साबित होने देता?!" मैंने नितु को उस दिन की बात याद दिलाई जब उसने अमेरिका जाते समय माँ से वादा किया था. "आपको अपनी फिलिंग इस तरह दबानी नहीं चाहिए! इट कुड हर्ट यू मेंटली!" नितु चिंता जताते हुए बोली.

"बेबी आप जो थे मेरे पास मेरा ख्याल रखने के लिए!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, बात को खत्म करने के लिए नितु को अपने पास बुलाया. नितु दरवाजा बंद कर के आई और हम तीनों आज महीनों बाद एक साथ गले लगे. फिर नितु ने साक्षी को मेरी गोद से ले लिया और उसे चूमते हुए लेट गई. वो पूरी रात हमने जागते हुए साक्षी को प्यार करके गुजारी, इतने महीनों का सारा प्यार साक्षी पर उड़ेल दिया गया.साक्षी को सोता हुआ देख कर हम दोनों ठंडी आहें भर रहे थे!इस तरह से दिन कब निकले और साक्षी का जन्मदिन कब आया पता ही नहीं चला. १८ अगस्त की सुबह को सब तय हुआ की कल हम केक काटेंगे और साक्षी का जन्मदिन धूम-धाम से मनाएंगे. ताऊ जी ने गोपाल भैया और मेरी ड्यूटी लगाई की हम दोनों सारे इंतजाम करें और इधर उन्होंने सारे गाँव में दावत का ऐलान कर दिया. मुझे और गोपाल भैया को कुछ करना ही नहीं पड़ा क्योंकि प्रकाश को एक कॉल किया और उसने सारा इंतजाम करवा दिया. टेंट वाला आया और पंडाल बाँधने लगा, हलवाई बर्तन वगेरा सब घर छोड़ गए और कल शाम को आने की बात कह गये. प्रकाश ने बड़े-बड़े स्पीकर लगवा दिए और गानों की लिस्ट मेरे पास थी! केक का आर्डर देने मैं, प्रकाश और गोपाल भैया निकले और शाम तक सब तैयारियाँ हो गईं थी.

रात को खाने के बाद मैं, नितु और साक्षी अपने कमरे थे और बेसब्री से १२ बजने का इंतजार कर रहे थे. हम दोनों ही साक्षी को जगाये हुए थे और उसके साथ खेल रहे थे, कभी दोनों उससे बात करने लगते तो कभी उसे गुद-गुदी करते. टिक...टिक...टिक.. कर घडी ने आखिर १२ बजा ही दिये. १२ बजते ही नितु ने साक्षी को गोद में ले लिया और बोली; मेरी राजकुमारी!! आपको जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो! आप को मेरी भी उम्र लगे, जल्दी-जल्दी बड़े हो जाओ और बोलना शुरू करो! मुझे आपके मुँह से पहले पापा सुनना है और फिर मेरे लिए मम्मी!" नितु ने साक्षी के दोनों गाल चूमे और फिर उसे मेरी गोद में दिया; "मेला बेटा बड़ा हो गया!....बड़ा हो गया!.....आऊ... ऊू ऊ ऊ ले...ले... १ साल का हो गया मेरा बच्चा! हैप्पी बर्थडे मेले बच्चे...आपको दुनियाभर की खुशियाँ मिले....और आप जल्दी-जल्दी बड़े हो जाओ! आई लव यू माई lil एंजल! गॉड ब्लेस यू!!!" मैंने साक्षी को चूमते हुए कहा और वो भी मेरे इस तरह तुतला कर बोलने से हँस पडी. उस रात को साक्षी के सोने तक नितु और मैं उसके साथ खेलते रहे और अनगिनत फोटो खींचते रहे, कभी उसे चूमते हुए तो कभी उसके सामने मुँह बनाते हुए!

फिर हुई सुबह एक ऐसी सुबह जो सब के लिए एक अलग रूप ले कर आई थी. जहाँ एक तरफ मैं और नितु खुश थे क्योंकि आज हमारी बेटी साक्षी का जन्मदिन था. ताऊ जी-ताई जी खुश थे की उनके घर में आई खुशियाँ आज दो गुनी होने जा रही है, माँ-पिताजी खुश थे की उनका बहु-बेटा उनके पास हैं और बहुत खुश हैं, गोपाल भैया- भाभी खुश थे की उनकी जिंदगी में एक नया मेहमान आने वाला है और आज उनकी पोती का जन्मदिन है तो दूसरी तरफ जलन, बदले और सब को दुःख पहुँचाने वाली अश्विनी इसलिए खुश थी की आज वो इस घर रुपी घोंसले के चीथड़े-चीथड़े करने वाली है! वो घरोंदा जो उसे आज तक सर छुपाने की जगह दिए हुआ था आज उसी घरोंदे को वो अपने बदले की आग से जलाने वाली थी.

मैं और नितु साक्षी को साथ लिए हुए नीचे आये और सब का आशीर्वाद लिया और साक्षी को भी सबका आशीर्वाद दिलवाया. नहा-धो कर हम तीनों पहले मंदिर गए और वहाँ साक्षी के लिए प्रार्थना की. हमने भगवान से अपने लिए कुछ नहीं माँगा, ना ही ये माँगा की वो साक्षी को हमारी गोद में डाल दे क्योंकि हम दोनों ही इस बात से समझोता कर चुके थे की ये कभी नहीं होगा, आज तो हमने उसके लिए खुशियाँ माँगी...ढेर सारी खुशियाँ ...हमारे हिस्से की भी खुशियाँ साक्षी को देने को कहा. प्रार्थना कर हम तीनों ख़ुशी-ख़ुशी घर लौटे और रास्ते में साक्षी के लिए रखी पार्टी की बात कर रहे थे. सारे लोग आंगन में बैठे थे की अश्विनी ऊपर से उत्तरी और उसके हाथों में कपड़ों से भरा एक बैग था. उसे देख सब के सब खामोश हो गए, "ये बैग?" ताई जी ने पूछा.

"मैं अपने ससुर जी की जायदाद का केस जीत गई हूँ!" अश्विनी ने मुस्कुराते हुए कहा और उसकी ये मुस्कराहट देख मेरा दिल धक्क़ सा रह गया और मैं समझ गया की आगे क्या होने वाला हे. "आप सब की चोरी मैंने केस फाइल किया था और कुछ दिन पहले ही सारी जमीन-जायदाद मेरे नाम हो गई!" अश्विनी ने पीछे मुड़ने का इशारा किया तो हम सब ने पीछे पलट कर देखा, वहाँ वही वकील जो उस दिन आया था हाथ में एक फाइल ले कर खड़ा था. "वकील साहब जरा सब को कागज तो दिखाइए!" अश्विनी ने वकील को फाइल की तरफ इशारा करते हुए कहा और वो भी किसी कठपुतली की तरह नाचते हुए फाइल ताऊ जी की तरफ बढ़ा दी और वपस हाथ बाँधे खड़ा हो गया.ताऊ जी ने वो फाइल मेरी तरफ बढ़ा दी, चूँकि मेरी गोद में साक्षी थी तो मैंने नितु से वो फाइल देखने को कहा. सबसे ऊपर उसमें कोर्ट का आर्डर था जिसमें लिखा था की अश्विनी मंत्री जी की बहु उनकी सारी जायदाद की कानूनी मालिक हे. नितु ने ये पढ़ते ही ताऊ जी की तरफ देखते हुए हाँ में गर्दन हिला दी. "हरामजादी! तूने....तेरी हिम्मत कैसे हुई?" ताऊ जी का गुस्सा आसमान पर चढ़ गया था और वो लघभग अश्विनी को मारने को आगे बढे की पिताजी ने उन्हें रोक लिया. "तुझे पता है न उस दौलत की वजह से ही मंत्री का खून हुआ? और तू उसी के लालच में पड़ गई?" पिताजी ने कहा.

"आप सब को तो मेरी चिंता है नहीं, तो मैंने अगर अपने बारे में सोचा तो क्या गुनाह किया? मेरी भी बेटी है, कल को उसकी पढ़ाई का खर्चा होगा, शादी-बियाह का खर्चा होगा वो कौन करेगा? अब आपके पास उतनी जमीन-जायदाद तो रही नहीं जितनी हुआ करती थी. सब तो आपने इस.... सागर की शादी में लगा दी!" अश्विनी बोली और उसकी बात सुन सब का पारा चढ़ गया.

"चुप कर जा कुतिया!" भाभी बोली.

"किस हक़ से मुझे चुप होने को कह रही हो? मैं तुम्हारी बेटी थोड़े ही हूँ? तुमने तो मुझे नौकरानी की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया अब मेरी बेटी को भी नौकरानी बनाना चाहती हो?" अश्विनी भाभी पर चिल्लाते हुए बोली ये सुनते ही गोपाल भैया ने अश्विनी की सुताई करने को लट्ठ उठाया; "मुझे छूने की कोशिश भी मत करना, तुम्हें सिर्फ नाम से पापा कहती हूँ! बेटी का प्यार तो तुमने मुझे कभी दिया ही नहीं! मुझे अगर छुआ भी ना तो पुलिस केस कर दूँगी!" अश्विनी ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा पर भैया का गुस्सा उसकी धमकी सुन और बढ़ गया.मैंने और भाभी ने उन्हें शांत करने के लिए उन्हें रोक लिया. भाभी उनके सामने खड़ी हो गईं और मैंने पीछे से अपने एक हाथ को उनकी छाती से थाम लिया.

"तो इतने दिन तू बस नाटक कर रही थी!" ताई जी बोली.

"हाँ!!! आज साक्षी का जन्मदिन है और सब के सब यहाँ हैं जिन्होंने कभी न कभी मेरा दिल दुखाया है और तुम सब लोगों से बदला लेने का यही सही समय था. जब से बड़ी हुई हमेशा मैंने सब के ताने सुने, कोई पढ़ने नहीं देता था सब मुझसे ही काम करवाते थे! थोड़ी बड़ी हुई तो मुझे लगा ये (मेरी तरफ ऊँगली करते हुए) शायद मुझे समझेगा पर इसके अपने नियम-कानून थे! हमेशा इस घर के नियम-कानून से बाँधे रखा...पर अब नहीं! अब मेरे पास पैसा है और मैं अपनी जिंदगी वैसे ही जीऊँगी जैसे मैं चाहती हूँ!” अश्विनी ने अपने इरादे सब के सामने जाहिर किये पर ये तो बस एक झलक भर थी.

"तुझे क्या लगता है की अपने बचपन का रोना रो कर तू सब को चुप करा सकती है? भले ही किसी ने तुझे बचपन से प्यार नहीं दिया पर जिसने किया उसे तूने क्या दिया याद है ना? तुझे सिर्फ मुझसे नफरत है तो बाकियों पर ये अत्याचार क्यों कर रही है? इतनी मुश्किल से इस घर में खुशियाँ आई हैं और तू उनमें आग लगाने पर तुली है!" मैंने गुस्से में कहा.

"तेरी माँ के मरने के बाद मैंने ही तुझे संभाला था. तुझे तो याद भी नहीं होगा! बेटी तुझे किस बात की कमी है इस घर में?" माँ ने कहा.

"याद है....आपके सुपुत्र ने ही बताया था और इसीलिए आपसे मुझे उतनी शिकायत नहीं जितनी इन सब से है! मेरा दम घुटता है यहाँ!" अश्विनी अकड़ कर बोली.

"तो निकल जा यहाँ से! और आज के बाद दुबारा कभी अपनी शक्ल मत दिखाइओ!" गोपाल भैया ने लट्ठ जमीन पर फेंकते हुए कहा. "मेरे ही खून में कमी थी....या फिर ये तेरी असली माँ का गंदा खून है जो अपना रंग दिखा रहा है!" भैया ने कहा और अश्विनी से मुँह मोड लिया!

अश्विनी चल कर मेरे पास आई जबरदस्ती साक्षी को खींचने लगी. साक्षी ने मेरी कमीज अपने दोनों हाथों से पकड़ राखी थी. अश्विनी ने अपने हाथों से उसकी पकड़ छुड़ाई.इधर साक्षी को खुद से दूर जाते हुए देख मेरी आँखों से आँसू बहने लगे, नितु का भी यही हाल था और वो लगभग अश्विनी से मूक जुबान में मिन्नत करने लगी. पर अश्विनी पर इसका रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा, साक्षी ने रोना शुरू कर दिया था और अश्विनी उसी को डाँटते हुए घर से निकल गई. बाहर उसकी शानदार काले रंग की मर्सिडीज खड़ी थी जिसमें बैठ वो अपने हवेली चली गई और इधर सारा घर भिखर गया.पिताजी और ताऊ जी आंगन में पड़ी चारपाई पर सर झुका कर बैठ गए, माँ और ताई जी रसोई की दहलीज पर बैठ गए, भाभी और गोपाल भैया बरामदे में पड़ी चारपाई पर बैठ गए और मैं और नितु स्तब्ध खड़े रहे! जो कुछ अभी हुआ उससे हम दोनों के सारे सपने चूर-चूर हो गए थे. माँ ने हम दोनों को २-३ आवाजें मारी पर हमारे कानों में जैसे वो आवाज ही नहीं गई. आखिर भाभी ने उठ कर हमारे कन्धों पर हाथ रखा तब जा कर हमें होश आया. नितु ने मेरी तरफ देखा तो मेरी आँखें आंसुओं की धारा बहा रही थी. वो कस कर मुझसे लिपट गई और जोर-जोर से रोने लगी! भाभी ने उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे शांत करवाना चाहा पर वो चुप नहीं हुई. वो रो रही थी पर मैं तो रो भी नहीं पा रहा था. दिल में आग जो लगी हुई थी! आज तीसरी बार मैंने साक्षी को खोया था और ये दर्द दिल में आग बन कर सुलग उठा था. मैंने नितु को खुद से अलग किया और तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा तो नितु ने एकदम से मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोक लिया. वो जानती थी की मैं अश्विनी की जान ले कर रहूँगा; "प्लीज....अभी आपकी जरुरत… यहाँ इस घर को है!" नितु ने रोते हुए कहा और कस कर मेरा हाथ थामे रही. उसकी बात सही थी. पहले मुझे अपने परिवार को संभालना था उसके बाद मैं अश्विनी की हेखडी ठिकाने लगाने वाला था. मैंने हाँ में सर हिला कर उसकी बात मान ली और वापस आंगन में आ गया.

मैं ताऊ जी के सामने घुटने मोड़ कर बैठ गया और उनसे पूछने लगा; "ताऊ जी...आप ने मेरी शादी में कितने पैसे खर्चा किये?....बोलिये?"

"मैंने जो भी किया वो सब से पूछ कर अपनी ख़ुशी से किया! ये हमारे घर की आखरी शादी थी....अगली शादी देख सकूँ इतनी मेरी उम्र नहीं! और तू भी उसकी बातों पर ध्यान मत दे!" ताऊ जी बोले. फिर उन्होंने गोपाल भैया से कहा की वो सब को मना कर दें आज की पार्टी के लिए! इतना कह कर ताऊ जी उठ कर जाने लगे तो मैं उनके गले लग गया."बेटा......!!!" वो बस इतना कह पाए और फिर अपनी आँखों में आँसू लिए अपने कमरे में चले गये. पिताजी ने मुझे अपने पास बैठने को कहा, उधर नितु और भाभी माँ-ताई जी के पास बैठ गई. "बेटा.....हम सब ने ये सोचा भी नहीं था.... इस परिवार को फिर से बिखरने मत दिओ!" पिताजी रोते हुए बोले. मैंने उनके आँसू पोछे और उनसे घर के असली हालात जाने.

अश्विनी की शादी में मेरी शादी से भी दुगना खर्च हुआ था और इसके चलते घर के हालात डगमगा गए थे. ताऊ जी और पिताजी ने जैसे-तैसे हालात संभाले ही थे की अश्विनी के साथ वो काण्ड हुआ, फिर गोपाल भैया का नशा मुक्ति केंद्र जाना और पोलिस की पहरेदारी, इस सब के चलते हालात खराब होने लगे. ले दे कर अब हमारे पास जमीन के दो बड़े टुकड़े बचे थे जिनसे आराम से गुजर-बसर हो रही हे. ऐसा नहीं था की हालात बहुत पतले थे पर अब हालत वो नहीं थे जो २ साल पहले हुआ करते थे. मुझे ये सब जानकार बहुत धक्का लगा था पर मैं इसे जताना नहीं चाहता था. कुछ देर बाद जब गोपाल भैया वापस आये तो मैं उन्हें ले कर ताऊजी के कमरे में गया.ताऊ जी दिवार से सर लगाए जमीन पर बैठे थे, मैं और गोपाल भैया उनके सामने बैठ गए; "ताऊ जी आप चिंता क्यों करते हैं? आपके दोनों बेटे आपके सामने बैठे हैं, हम दोनों मिल कर घर संभाल सकते हैं और देखना इस बार फिर से खुशियाँ वापस आएँगी!" मैंने ताऊ जी को उम्मीद बंधाते हुए कहा, उन्होंने मुझे और गोपाल भैया को अपने गले लगने को बुलाया. हमें अपने सीने से लगाए वो बोले; "बच्चों अब तुम दोनों का ही सहारा है! संभाल लो इस घर की कश्ती को!" ताऊ जी से मिल कर मैं और भैया वापस आये तो मैंने उन्हें भाभी का ख़ास ख्याल रखने को कहा क्योंकि वो ६ महीना प्रेग्नेंट थी. मैं माँ और ताई जी के पास आया और उनके बीच में बैठ गया, दोनों ने अपना सर मेरे दोनों कन्धों पर रख दिया. "माँ, ताई जी आपका बेटा है ना यहाँ तो फि आपको कोई चिंता करने की कोई जरुरत नही." मैंने कहा तो दोनों रो पड़ीं, तभी नितु आ गई और उसने माँ को संभाला और मैंने ताई जी को. कुछ देर बाद नितु को मैं वहीँ छोड़ कर भाभी के पास आया. गोपाल भैया भाभी के पास सर झुका कर बैठे थे; "क्या भैया मैंने आपको यहाँ भाभी का ख्याल रखने को भेजा और आप हो की सर झुका कर बैठे हो?! अच्छा भाभी ये बताओ, आप चाय पीओगे?" मैंने कमरे में कैद शान्ति को भंग करते हुए कहा, भाभी ने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया और अपने पास बिठाया. "तूने दुःख छुपाना कहाँ से सीखा?" भाभी ने भीगी आँखों से पूछा. "जब लगने लगा की मेरे रोने से मेरे परिवार को कितना दुःख होता है तो ये आँसूँ अपने आप सूख गए!" मैंने कहा और सब के लिए चाय बनाने लगा. चाय बना कर मैने सब को दी, दोपहर में किसी ने कुछ नहीं खाया और मैं बस एक कमरे से दूसरे कमरे में आता-जाता रहा ताकि थोड़ी चहल-पहला रहे और घर वाले ज्यादा दुखी न हों. प्रकाश ने भी जब फ़ोन किया तो मैंने उसे सब बता दिया.
 
रात हुई और नितु ने सब के लिए खाना बनाया पर किसी का मन नहीं था. मैंने एक-एक कर सबको उनके कमरों से बाहर निकाला और एक साथ बिठा कर सब को खाना खिलाया. जैसे-तैसे सब ने चुप-चाप खाना खाया, और सब सोने चले गये. मैं और नितु साथ ही ऊपर आये और उस सूने कमरे को देख दोनों भावुक हो गए, नितु मेरे कंधे पर सर रख कर रोने लगी. पर मेरी आँखों में अब आँसू नहीं बचे थे, मुझे इस वक़्त मजबूत बनना होगा यही सोच कर मैंने अपने होंठ सी लिए. नितु को बड़ी मुश्किल से चुप करा कर लिटाया और मैं भी उसकी तरफ करवट ले कर लेट गया.नितु मेरे नजदीक आई और अपना सर मेरे सीने में छुपा कर सोने की कोशिश करने लगी. आज उसे भी वही दर्द हो रहा था जो मुझे 'मुन्ना' के चले जाने के बाद हुआ था. कुछ देर बाद नितु सो गई. पर मैं सोचता रहा....

अगले दो दिन इसी तरह गमगीन निकले, इधर मैं मोहित और प्रफुल से मिला और उनसे बिज़नेस यहाँ शिफ्ट करने की बात की. जब मैंने उन्हें डिटेल में सब बताया तो वो दोनों मान गए, पर पार्टनर हाईप के लिए नही. उनका फॅमिली बॅक ग्राउंड इतना स्ट्रोंग नहीं था और उन्हें एक कोंस्टांट और स्टेबल इनकम चाहिए थी जो उन्हें सैलरी से मिलती.वो मेरे साथ सैलरी पर काम करने को मान गए, उनके साथ मिल कर मैंने ऑफिस के लिए जगह देखनी शुरू की. मैंने बैंगलोर फ़ोन कर के पांचों को हालात बता दिए और ये भी की मैं ऑफिस लखनऊ शिफ्ट कर रहा हु. उनके पास बेहद सारा टाइम था नई जॉब ढूँढने के लिए. मैंने ये बात घर में भी बता दी तो सब को इत्मीनान हुआ की जल्द ही मैं उनके नजदीक रहूँगा.नितु ने घर के साथ-साथ ऑफिस का काम भी संभाला. खेती का काम मैंने समझना शुरू कर दिया. ताऊ जी, पिता जी और गोपाल भैया मुझे सारी चीजें समझा रहे थे और खुश भी थे की मैं इतनी दिलचस्पी ले रहा हु. एक दिन वो मुझे व्यापारियों से मिलने ले गए तो मैंने उनके साथ रेट को ले कर भाव-ताव करना शुरू कर दिया. मैंने थोड़ी जांच-पड़ताल के बाद खेतों का सोईल टेस्ट भी करवा दिया और उससे जो बातें सामने आईं उसे जान कर पिताजी और ताऊ जी काफी हैरान हूये. दिन बीतते गए और घर के हालत अब सुधरने लगे, पैसों के तौर पर नहीं बल्कि घर की सुख और शान्ति के तौर पर.

२ सितंबर आया और सुबह मैं सब के लिए चाय बना रहा था की नितु को उल्टियाँ शुरू हो गई. मैं चाय छोड़ कर उसके पास जाने को हुआ तो माँ हँसती हुईं मेरे पास आईं और बोलीं; "तू बाप बनने वाला है!" ये सुन कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, मैं दौड़ता हुआ ऊपर आया और नितु ने मुझे एकदम से गले लगा लिया, उसकी ख़ुशी आज सैकड़ों गुना ज्यादा थी. “शुक्रिया बेबी!!!!” मैंने नितु को कस कर बाहों में जकड़ा और उसे कमर से उठा कर छत पर गोल घूमने लगा. अब तक माँ ने सब को ये खबर दे दी थी. ताऊ जी ने मुझे नीचे से आवाज मारी और हम दोनों नीचे आये. नितु ने हमेशा की तरह घूंघट किया हुआ था. ताऊजी उसके पास आये और जेब से २००० का नोट निकाला और नितु के सर से वार कर ताई जी को देते हुए कहा की वो ये मंदिर में दान कर दें.ताऊ जी ने मुझे नितु को डॉक्टर के ले जाने को कहा ताकि नितु का एक बार चेक-अप हो जाए, मैंने गोपाल भैया से कहा की वो भाभी को भी ले लें एक साथ दोनों का चेक-अप हो जायेगा. भैया को उस समय कहीं जाना था सो मैं दोनों को ले कर डॉक्टर के पास आ गया.डॉक्टर ने पहले नितु का चेक-अप किया और उसके प्रेग्नेंट होने की बात कन्फर्म की. ये सुनते ही हम तीनों के चेहरे खिल उठे, फिर डॉक्टर ने भाभी का भी चेक-अप किया और उन्हें भी सब कुछ नार्मल ही लगा. मैंने नितु के घर फ़ोन लगाया और नितु ने मेरे घर फ़ोन लगा दिया. डैडी जी को जब ये बात पता चली तो वो बहुत खुश हुए और कल आने की बात कही" इधर नितु ने माँ से बात कर के बताया की सभी लोग मंदिर में हे. हम तीनों मिठाई ले कर सीधा मंदिर गए जहाँ पुजारी जी ने नितु और मुझे ख़ास भगवान् का आशीर्वाद दिया. फिर हम सब घर लौट आये, हमारा घर खुशियों से भर गया था और चूँकि कल मेरा जन्मदिन था तो पूरा परिवार डबल ख़ुशी मना रहा था. ताऊ जी ने ये डबल खुशखबरी मनाने के लिए तुरंत अपने समधी जी (नितु के डैडी) को कॉल किया और कल की दावत के बारे में बता दिया. पूरे गाँव भर में ढिंढोरा पीटा जा चूका था. ये खबर उड़ती-उड़ती अश्विनी तक भी जा पहुँची थी. उसे नितु की प्रेगनेंसी के बारे में जान कर बहुत कोफ़्त हुई क्योंकि अब उसका तुरुख का पत्ता पिट चूका था. उसने अपनी अगली चाल की प्लानिंग शुरू कर दी थी! अश्विनी ने अपने पाँव राजनीति की तरफ बढ़ा दिए थे और उसने अब वहाँ कनेक्शन बनाने शुरू कर दिए थे......

रात को खाने के बाद मैं लैपटॉप पर काम कर रहा था की नितु बिस्तर से उठ कर मेरे पास आई. उसने पीछे से अपनी बाहों को मेरी गर्दन पर सामने की तरफ लॉक किया और मेरे कान में फुसफुसाई; "हॅपी बर्थ डे माई शोना!" मैं उठा और नितु को गोद में उठा लिया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया. झुक कर उसके होठों को मुँह में भर चूसने लगा. नितु कसमसा रही थी. मैं रुका और उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुराया और बोला; "ऐसे सूखे-सूखे कौन बर्थडे विश करता है!" मैंने कहा तो नितु मुस्कुराई और बोली; "तो मेरे शोना, बोलो क्या चाहिए आपको?"

"आपने मुझे दुनिया का सबसे बेस्ट गिफ्ट दिया है!" मैंने कहा और नितु की बगल में लेट गया.नितु कसमसाती हुई मेरे से चिपक गई और सोने लगी. मैं उसके बालों में हाथ फेरता रहा और साक्षी को याद करता रहा. महीना होने वाला था मुझे साक्षी से दूर, आज बाप बनने की इस ख़ुशी ने मुझे जिंझोड़ कर रख दिया था. साक्षी के लिए प्यार आज फिर उमड़ आया था और आँखों से एक क़तरा निकल कर तकिये पर जा गिरा. अगली सुबह मैं जल्दी उठा और सब ने बारी-बारी मुझे जन्मदिन की बधाइयाँ दी और मैंने सब का आशीर्वाद लिया. इतने में मम्मी-डैडी जी भी आ गये और मेरे हाथ में चाय की ट्रे देख हैरान हुए, दोनों ने मुझे खूब प्यार दिया और आशीर्वाद दिया! इतने में नितु ऊपर से उत्तरी और अपने मम्मी-डैडी को देख कर उसने उनका आशीर्वाद लिया. फिर उन्होंने सवाल नितु से सवाल पुछा; "तू पहले ये बता की सागर चाय की ट्रे ले कर क्यों खड़ा है?" नितु कुछ बोल पाती उससे पहले मैं ही उसके बचाव में कूद पड़ा; "डैडी जी ये तो रोज का है, मैं जल्दी उठ जाता हूँ तो सब के लिए चाय बना लेता हु." मेरा जवाब सुन ताऊ जी बोले; "समधी जी, ये छोटे-मोटे काम करने के लिए हमने इसे (यानी मुझे) रखा हुआ हे." ताऊ जी की बात सुन सारे हँस पड़े! मम्मी-डैडी जी को दरअसल शाम को वापस जाना था इसलिए वो जल्दी आये थे, पर ताऊ जी कहाँ मानने वाले थे उन्होंने जबरदस्ती उन्हें भी शाम के जश्न में शरीक होने के लिए रोक लिया.

शाम को बड़ी जोरदार पार्टी हुई और पूरा गाँव पार्टी में हिस्सा लेने आया. रात के ८ बजे थे और अँधेरा हो गया था. सारे आदमी लोग ऊपर छत पर थे और सभी औरतें नीचे आंगन में, खाना-पीना जारी था की तभी घर के सामने अश्विनी की काली मर्सिडीज आ कर रुकी. उसकी गाडी देखते ही मैं तमतमाता हुआ नीचे आया, वो गाडी से अकेली उतरी काली रंग की शिफॉन की साडी, लो कट ब्लाउज जो देख कर ही लगा रहा था की बहुत टाइट है, स्लीवलेस और वही कमीनी हँसी! अब सारे घर वाले नीचे मेरे साथ खड़े हो गए थे. वो कुछ बोलती उसके पहले ही मैं चिल्लाते हुए बोला; "गेट दीं फक आऊट ऑफ हिअर!" मेरे गुस्से से आज भी उसे डर लगता था इसलिए वो एक पल को सहम गई. फिर हिम्मत बटोरते हुए बोली; "मैं तो तुम्हें विश करने आई थी!"

"फक यू अँड फक योवर विशेस! नाऊ गेट लॉस्ट ऑर आई विल्ल कॉल दीं पोलिस!" मैंने फिर से गरजते हुए कहा. वो अकड़ कर गाडी में बैठ गई और चली गई. सब का मूड खराब ना हो इसलिए मैंने प्रकाश को इशारा कर के म्यूजिक चालू करने को कहा और फिर सब को ले कर अंदर आ गया."सब चलिए ऊपर...अभी तो पार्टी शुरू हुई है!" मैंने बात पलटते हुए कहा और सब ऊपर आ गए पर सब का मूड ऑफ था!

ये मायूसी देख मेरे मुँह से ये शब्द निकले;

"ना जाने वक्त खफा है या खुदा नाराज है हमसे,

दम तोड़ देती है हर खुशी मेरे घर तक आते-आते।"

ये सुनते ही ताऊ जी उठे और प्रकाश से बोले; "अरे बेटा जरा मेरा वाला गाना तो लगा..." मैं हैरानी से ताऊ जी को देखने लगा और तभी गाना बजा; "दर्द-ऐ-दिल ....दर्द-ऐ-जिगर दिल में जगाया आपने|" ताऊ जी ने ताई जी की तरफ इशारा करते हुए गाना शुरू किया. उनका गाना सुन पार्टी में जान आ गई और सब खुश हो गये. इधर ताई जी शर्म के मारे लाल हो गईं अब तो पिताजी भी जोश में आ गए और उन्होंने गाने का अगला आन्तरा संभाला;

"कब कहाँ सब खो गयी

जितनी भी थी परछाईयाँ

उठ गयी यारों की महफ़िल

हो गयी तन्हाईयाँ"

अब शर्म से लाल होने की बारी माँ की थी. माँ तो ताई जी के पीछे छुप गई. इधर डैडी जी ने प्रकाश से गाना बदलवाया जिसे सुन सारे जोश में आ गए, आदमियों की एक टीम बन गई और औरतों की एक टीम.

'ऐ मेरी जोहराजबीं' ओये होये होये !!! क्या महफ़िल जमी छत पर की अंताक्षरी शुरू हो गई. मर्द गा रहे थे और औरतें शर्मा रहीं थी. सब को उनकी जवानी के दिन याद आ गये. इस सब का थोड़ा बहुत श्रेय शराब को भी जाता है जिस ने समां बाँधा था और सब मर्द थोड़ा झूम उठे थे. तभी नितु उठ के जाने लगी तो मैंने गाना शुरू किया; "आज जाने की जिद्द न करो!" मेरा गाना सुन वो वहीं ठहर गई. घूंघट के नीचे उसके गाल लाल हो गए थे और भाभी उसका हाथ पकड़ उसे अपने पास बिठा लिया. रात दस बजे तक महफ़िल चली और फिर सब धीरे-धीरे जाने लगे. आखिर बस परिवार के लोग रह गए, ताऊ जी ने मुझे अपने पास बुलाया और बोले; "बेटा दुबारा उदास मत होना!" मैंने सर हाँ में हिला कर उनकी बात मानी.आज एक बार अश्विनी को हार मिली थी....वो आई तो थी यहाँ मेरा बर्थडे और नितु के माँ बनने की ख़ुशी को नजर लगाने पर आज उसे एक बार मुँह की खानी पड़ी थी. उसकी लाख कोशिशों के बाद भी मेरा परिवार नहीं टूटा बल्कि ताऊ जी की वजह से वो एक साथ खड़ा रहा. रात को सारे मर्द छत पर सोये थे और तब ताऊ जी ने डैडी जी से सारी बात कही जिसे सुन वो बहुत हैरान हुए और मुझे डाँटा भी की मैंने उन्हें क्यों कुछ नहीं बताया, पर काम के चलते मुझे होश ही नहीं रहा था. अगली सुबह को मम्मी-डैडी अयोध्या चले गए, उन्हें वहाँ मंदिर में माथा टेकना था.

डैडी जी के जाने के बाद नितु मेरे पास आई और मुझसे बोली; "आपको लगता है की वो वाक़ई में विश करने आई थी?"

"वो यहाँ सिर्फ हमारी खुशियों को नजर लगाने आई थी! अपना रुपया-पैसा और ऐशों-आराम की झलक दिखाने आई थी! इतनी मुश्किल से ये परिवार सम्भल रहा था और वो ...." मेरे मुँह से गाली निकलने वाली थी सो मैंने खुद को रोक लिया और आगे बात पूरी नहीं की. खेर दिन बीतने लगे और हम दोनों बैंगलोर वापस नहीं गये. जाते भी कैसे? यहाँ कोई नहीं था जो घर संभाल सके और भाभी का ख्याल रख सके. "बेटा काम भी जरुरी होता है, तुम दोनों जाओ और काम सम्भालो हम सब हैं यहाँ!" ताऊ जी बोले पर नितु ने साफ़ मना कर दिया; "ताऊ जी, भाभी की देखभाल जरुरी है और मेरे न होने से यहाँ घर का काम कौन देखेगा? आखिर माँ, ताई जी और भाभी को ही काम करना पड़ेगा और ये मुझे कतई गवारा नही." नितु बोली.

"ताऊ जी, नितु ठीक कह रही हे. मैं वैसे भी लखनऊ में घर और ऑफिस की जगह देख रहा हूँ तो हम दोनों का ही यहाँ रहना जरुरी हे." मैंने कहा, ताऊ जी ने मेरी पीठ थपथपाई और बोले; "मुझे मेरे बच्चों पर नाज है!"

चूँकि नितु भी प्रेग्नेंट थी और उसे ही ज्यादा काम करना पड़ता था इसलिए मैंने घर के लिए एक वाशिंग मशीन ले ली, जिससे नितु का काम काफी कम हो गया.दिन बीतने लगे और भाभी का नौवाँ महीना शुरू हो गया और नितु ने भाभी का बहुत ख्याल रखना शुरू कर दिया. भाभी का लगाव भी नितु से बहुत ज्यादा बढ़ गया था. दोनों साथ खाते और रात में नितु भाभी के पास ही सोती. ऑफिस का सारा काम मेरे ऊपर था और मैं रात-रात भर जाग कर सारा काम करने लगा था. खेती-किसानी का काम गोपाल भैया ने संभाल लिया था और अब पैसे के तौर पर हालात सुधरने लगे थे. इधर दिवाली आ गई और घर की साफ़-सफाई मैंने और गोपाल भैया ने संभाली. दिवाली से २ दिन पहले पिताजी ने घर में हवन करवाया ताकि घर में सुख-शान्ति बनी रहे. धन तेरस पर मैं माँ और ताई जी को बजार ले कर गया और उन्होंने शॉपिंग की. दिवाली के एक दिन पहले मम्मी-डैडी जी आये और वो भी बहुत तौह्फे लाये, ख़ास कर भाभी के लिए. आखिर दिवाली वाले दिन अच्छे से पूजा हुई, चूँकि शादी के बाद नितु की ये पहली दिवाली थी तो पूजा में हमें सबसे आगे बिठाया गया.पूजा के बाद सब ने नितु को उपहार में बहुत से जेवर दिए और उसे बहुत सारा आशीर्वाद मिला. नितु की आँखें उस पल नम हो गईं थीं, माँ ने उसे अपने पास बिठा कर खूब दुलार किया.

दिवाली के ५ दिन बाद सुबह भाभी को लेबर पैन शुरू हो गया, मैं और नितु उन्हें ले कर तुरंत हॉस्पिटल भागे.हम समय से पहुँच गए थे और डॉक्टर ने प्राथमिक जाँच शुरू कर दी थी. इधर सभी घरवाले पहुँच गए थे, कुछ देर बाद नर्स ने हमें खुशखबरी दी; "मुबारक हो लड़का हुआ है!" ये खुशखबरी सुनते ही सब ख़ुशी से झूम उठे. ताऊ जी ने नर्स को २,००१/- दिए और सब भाभी से मिलने आये. मैं और नितु भाभी के पास खड़े थे और उनका हाल-चाल पूछ रहे थे. भाभी का दमकता हुआ चेहरा देख सब को ख़ुशी हो रही थी. सब ने बारी-बारी बच्चे को चूमा और आशीर्वाद दिया. बस हम दोनों ही बचे थे. पहले मैंने नितु को मौका दिया तो नितु ने जैसे ही बच्चे को गोद में उठाया वो रोने लगा. ये देख वो घबरा गई और तुरंत बच्चे को मेरी गोद में दे दिया. मैंने जैसे ही उसके मस्तक को चूमा वो चुप हो गया और उसके चेहरे पर मुस्कराहट की एक किरण झलकने लगी. "लो भाई, अब जब कभी मुन्ना रोयेगा तो उसे सागर को दे देना. उसकी गोद में जाते ही बच्चे चुप जाते हैं!" भाभी बोली. पता नहीं क्यों पर उस बच्चे को देख मुझे साक्षी की याद आ गई और मेरी आंखें छल-छला गई. जिस प्यार को मैं अंदर दबाये हुआ था वो बाहर आ ही गया, नितु ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे रोने से रोकना चाहा पर अब ये आँसूँ नहीं रुकने वाले थे. मैंने बच्चे को नितु को सौंपा और सबकी नजर बचा कर बाहर आ गया, बाहर एक बेंच थी जहाँ मैं सर झुका कर बैठ गया और रोने लगा. कुछ देर बाद नितु भी सब से नजर बचा कर आई और मुझे बाहर ढूँढने लगी. मैं उसे सर झुका कर रोता हुआ दिखा तो वो मेरी बगल में बैठ गई. मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोली; "प्लीज मत रोइये....मैं जानती हूँ आपकी जान साक्षी में बस्ती है...पर हालत ऐसे हैं की....." नितु आगे बोलते-बोलते रुक गई.

"हालातों से तो मैं लड़ सकता हूँ पर उसकी नामुराद माँ का क्या करूँ? कमबख्त ....क्या बिगाड़ा था मैंने उसका? सब कुछ उसी ने किया ना? मैंने तो नहीं कहा था की मुझे प्यार कर! खुद मेरी जिंदगी में आई और सारी दुनिया उजाड़ दी! नहीं भूल सकता मैं साक्षी को...शी इज माई फर्स्ट बॉर्न ! कभी-कभी तो इतना दिल जलता है की मन करता है की उसे (अश्विनी को) बद्दुआ दे दूँ! पर फिर इस डर से रुक जाता हूँ की एक बार उसे बद्दुआ दी थी तो उसका पूरा घर उजड़ गया था. इस बार अगर उसे कुछ हो गया तो साक्षी का क्या होगा?!" मैंने रोते हुए कहा. "जानती हूँ मैं कभी साक्षी की कमी पूरी नहीं कर सकती पर शायद आपको अपनी औलाद दे कर उस दर्द को कुछ कम कर पाऊँ!" नितु मेरी आँखों में देखते हुए बोली और मेरे आँसूँ पोछे."थैंक यू!" मैंने कहा और मुँह धो कर मैं नितु को अपने साथ अंदर ले आया. जब सब ने पुछा तो मैंने कह दिया की एक कॉल करना था. शाम तक भाभी को डिस्चार्ज मिल गया, बाकी घर वाले पहले ही घर आ चुका था.. मैं, गोपाल भैया, भाभी और नितु गाडी से घर पहुँचे, जहाँ पहले से ही पूजा की तैयारी हो चुकी थी. पूरे विधि-विधान से भाभी और मुन्ना ने घर में प्रवेश किया. शुरू के पंद्रह दिनों में जो रस्में निभाईं जाती हैं वो सब निभाईं गई. नामकरण हुआ तो मुन्ना का नाम अस्तित्व रखा गया.जब वो रोता तो पूरे घर में उसे चुप कराने वाला कोई नहीं था. तब भाभी मुझे आवाज दे कर बुलाती और कहती; "लो सम्भालो अपने भतीजे को, जान खा जाता है मेरी| आखिर ऐसी कौन सा जादू है की तुम्हारी गोद में जाते ही चुप हो जाता है?" भाभी ने पुछा तो नितु पीछे से बोली; "भाभी जादू नहीं...ये तो प्यार है इनका!" ये सुनते ही भाभी ने नितु को छेड़ते हुए बोला; "कितना प्यार है वो तो दिख ही रहा है?!" नितु शर्म से लाल हो गई.
 
दिन बड़े प्यार से गुजरे, लखनऊ में मुझे ऑफिस के लिए जगह मिल गई. घर भी ढूँढ लिया था अब बस शिफ्टिंग का काम रह गया था. इसलिए अब हमें बैंगलोर वापस आना था ताकि शिफ्टिंग शुरू की जा सके. सारा स्टाफ जॉब छोड़ चूका था और ऑफिस अब खाली था. सबसे विदा ले कर हम निकलने लगे तो भाभी ने नितु को अपने गले लगाया और कहा; "जल्दी आना...और अपना ध्यान रखना" और फिर मेरे कान पकड़ते हुए बोलीं; "पिछली बार इसे तेरी जिम्मेदारी दी थी और इस बार तुझे दे रही हूँ! अगर इसका ख्याल नहीं रखा तो तेरी पिटाई पक्की है!" ये सुन कर सब हँस पडे. माँ और ताई जी ने भी भाभी को खुली छूट दे दी की वो चाहे तो मार-मार के मेरा भूत बना दें और इसका सारा मजा नितु ने लिया. रास्ते भर वो मुझे डराती रही की मैं अभी भाभी को फ़ोन कर देती हूँ!

हम बैंगलोर पहुँचे और मैंने ऑफिस का सारा सामान पैक करवा कर फिलहाल के लिए घर शिफ्ट करवाया और ऑफिस खाली कर दिया जिससे एक महीना का रेंट बच गया.मैंने प्याकर अँड मुवर से बात करनी शुरू की और इधर नितु ने लिस्ट बनानी शुरू कर दी की कौन-कौन सा सामान उसे लखनऊ भेजना है और कौन सा यहीं बेच देना हे. ऑफिस का काम सर पर पड़ा था जिसे मैंने मोहित-प्रफुल को दे दिया पर अस वाला प्रोजेक्ट मेरे सर पर तलवार की तरह लटक रहा था. नितु चाह कर भी मेरी उसमें मदद नहीं कर पा रही थी. हफ्ता बीता होगा की नितु का जन्मदिन आ गया, पूरा घर सामान से भरा पड़ा था और ऐसे में हम कोई पार्टी नहीं कर सकते थे, ऊपर से बैंगलोर आने के बाद मैंने नितु को जरा सा भी टाइम नहीं दिया था जिसकी उसने कोई शिकायत नहीं की थी. अब चूँकि उसका बर्थडे था तो मुझे आज का दिन उसके लिए स्पेशल बनाना था. रात को १२ बजे मैंने नितु को उठा कर बर्थडे विश किया और फिर हमने केक काटा. अब हम संभोग तो कर नहीं सकते थे क्योंकि नितु का अब चौथा महीना चल रहा था. इसलिए वो रात हम बस एक दूसरे की बाहों में सिमटे हुए काटी.अगली सुबह नितु को मैंने कॉफ़ी दी और उसे बिस्तर से उठने से मना कर दिया. वो पूरा दिन मैंने घर का सारा काम किया. सुबह से ही उसे सब के फ़ोन आने लगे और सब ने उसे बहुत आशीर्वाद और प्यार दिया. दोपहर का खाना भी मैंने बनाया जो की नितु को बहुत पसंद था. "माँ के बाद अगर मुझे किसी के हाथ का खाना पसंद है तो वो है आपके हाथ का खाना." नितु बोली. रात को मैंने नितु की स्पेशल दाल मखनी बनाई और उसके साथ गर्म-गर्म फुल्के बनाये| नितु का मन किया और उसने कबर्ड से वाइन निकाल ली, वो उसे गिलास में डाल ही रही थी की मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और प्यार से कहा; "बेबी...नो ड्रिंकिंग ड्यूरिंग प्रेग्नानसी!" ये सुनते ही नितु को याद आया और उसने एकदम से अपने कान पकडे; "सॉरी! शोना!!! मैं भूल गई थी!" नितु बोली और एकदम से भावुक हो गई. मैंने उसे अपने गले लगाया और उसके सर को चूमते हुए बोला; "बेबी इट्स ओके!" ये सुनते ही वो एकदम से चुप हो गई और कुछ देर बाद मुस्कुराने लगी.

उस दिन से नितु के मुड स्वींग बहुत ज्यादा कॉमन हो गये. कभी-कभी वो इतने जोश में होती की पैकिंग करने लगती और फिर थोड़ी देर बाद भावुक हो कर मुँह फुला कर बैठ जाती. जैसे ही उसका मुँह बनता वो मेरे पास आती, लैपटॉप उठा कर दूर रखती और मेरी गोद में बैठ जाती. "मेला बेबी नाराज है!" मैं नितु को थोड़ा प्यार से सहलाता और कुछ ही देर में वो नार्मल हो जाती और मेरी गर्दन पर किस करने लगती. कभी तो कभी बच्चों की तरह अपने बेबी बंप पर हाथ रख कर देखती और आईने के सामने जा कर कहती; "मैं मोटी हो गई हूँ ना?" मैं उसकी इस बात पर इतना हँसता की मेरे पेट में दर्द होने लगता. कभी वो कहती; "प्रेगनेंसी ९ महीने की क्यों होती है?" तो कभी-कभी वो तकिये को गोद में ले कर बेबी को पकड़ने की प्रॅक्टिस करने लगती. उसका ये भोलापन देख कर मैं उसे हमेशा अपनी बाहों में भर लेता. ऐसे करते-करते जनवरी आ गया, अस का एक प्रोजेक्ट पूरा हो गया था और उसकी पेमेंट आने वाली थी.इधर अश्विनी ने अपने सारे मोहरे बिछा दिए थे, प्लान सेट था अब बस देरी थी तो सागर के उसमें फँसने की. राजनीति में उसके पाँव पसारने से अच्छे-बुरे लोगों से उसका वास्ता पड़ने लगा था. पार्टी ने सोचा था की वो अश्विनी को मंत्री की बहु के रूप में प्रोजेक्ट करेगी, ऐसी बहु जिसने सब कुछ खो दिया हो और इसी को वो इस्तेमाल करना चाहते थे. लोगों की सहानुभूति जीतना अश्विनी ने शुरू कर दिया था. छोटी-छोटी रैलियों में अश्विनी जाती और अपना दुखी चेहरा दिखा कर लोगों का दिल जीत लेती. ऐसा नहीं था की उसके बदले की आग शांत हो चुकी थी. बल्कि वो तो सही मौके का इंतजार कर रही थी. गाँव में वो कुछ भी नहीं कर सकती थी क्योंकि उससे ना केवल उसे जेल जाने का खतरा था बल्कि उसकी पार्टी को भी अपने नाम पर कीचड़ उछलने का खतरा पैदा हो जाता. पर बैंगलोर में वो सागर और नितु पर हमला करवा सकती थी. उसने दो गुंडों को बैंगलोर में मुझ पर नजर रखने को भेजा. मेरा एड्रेस तो वो पहले ही नितु के जरिये सुन चुकी थी. कुछ ही दिनों में अश्विनी को पता चल गया की मैं कब घर आता हूँ और कब बाहर जाता हु.

मैंने पैकर्स एंड मूवर्स से बात पक्की कर ली थी और एक दिन पहले ही उन्होंने सारा समान लोड कर लिया था. आज मुझे उन्हें पेमेंट करने जाना था साथ नितु ने कार्टन और पैक किये थे जो मुझे ड्राइवर को सौंपने थे. मालिक ने मुझे सुबह जल्दी बुलाया ताकि ड्राइवर समय से समान ले कर निकल सके.सुबह ७ बजे मैं तैयार हो कर निकलने लगा तो नितु जिद्द करने लगी की उसे कुछ फ्रूट्स लेने हैं तो वो भी मेरे साथ नीचे चलेगी. इसलिए मैं उसे ले कर नीचे आया और कार्टन कैब में डालकर पहले उसे फ्रूट्स खरीदवाए और फिर उसे वापस बिल्डिंग के पार्किंग लॉट तक छोड़ मैं कैब में बैठ कर निकला" १०० मीटर जाते ही मुझे याद आया की मैं पैसों का पैकेट लेना भूल गया तो मैंने कैब वापस घर की तरफ मुड़वाई| कैब अभी गेट पर ही पहुँची ही थी की आगे का नजारा देख मेरी हालत खराब हो गई. पार्किंग लोट में दो आदमी थे, एक ने वॉचमन को चाक़ू की नोक पर डरा कर चुप करा रखा था और दूसरे ने नितु की गर्दन पर चाक़ू लगा रखा था. नितु एक पिलर के सहारे खड़ी थी और उस आदमी से मिन्नत कर रही थी की वो उसे छोड़ दे! चूँकि आज रविवार का दिन था और ज्यादा तर लोग अभी बाहर नहीं आये थे इसलिए नीचे कोई नहीं था. मैंने टैक्सी वाले को कहा की वो जल्दी से पुलिस को फ़ोन लगाए और बुलाये| मैं धीरे से उतरा और दबे पाँव आगे बढ़ा, मेरा कुछ भी आवाज करना नितु के लिए खतरनाक साबित होता. दोनों आदमियों की पीठ जिस तरफ थी मैं घूम कर उसी तरफ से पहुँचा, रास्ते में मैंने एक बड़ा पत्थर का टुकड़ा उठा लिया. वॉचमन ने मुझे देख लिया और उसने एक आदमी का ध्यान अपने रोने-धोने से भटकाया, मैं एक दम से उस आदमी के पीछे खड़ा हो गया जिसने नितु की गर्दन पर चाक़ू लगा रखा था. वो नितु को गन्दी-गन्दी गालियाँ दे रहा था और किसी 'मेमसाहब' का नाम बड़बड़ा रहा था. मैंने उसके दाहिने कंधे पर अपने बाएं हाथ से थपथपाया तो वो एकदम से पलटा, मैंने अपने दाहिने हाथ में पकड़ा पट्ठा से उसके सर पर एक जोरदार हमला किया और वो चिल्लाते हुए नीचे जा गिरा.उसकी चिल्लाने की आवाज सुन दूसरा आदमी मेरी तरफ तेजी से दौड़ा, मैंने वो पत्थर खींच कर उसके मुँह पर मारा. वो पत्थर जा कर उसकी नाके बीचों-बीच लगा और वो भी चिलाते हुए नीचे गिरा| "नितु ऊपर जाओ और दरवाजा लॉक करो!" मैंने नितु से कहा पर वो घबराई हुई बस वहीँ जम कर खड़ी हो गई. मैं उसकी तरफ बढ़ा और उसे झिंझोड़ कर उसे होश में लाया और उसे घर जाने को कहा. नितु ऊपर गई और मैं नीचे पड़े आदमी की छाती पर बैठ गए और मुँह पर मुक्के मार कर उससे पूछने लगा; "बोल हरामी किस ने भेजा था तुझे? बोल वरना आज तेरी जान ले लूँगा!" मैंने उसके मुँह पर जगहसे मारने चालु कर दिए इतने में वो टैक्सी ड्राइवर भाग कर वॉचमन के पास आ गया जो अपने डंडे से दूसरे आदमी को (जिसे मैंने पत्थर फेंक कर मारा था.) पीट रहा था. शोर मच गया था और लोग इकठ्ठा होने लगे थे, इधर मेरी पिटाई और पत्थर से लगी चोट के कारन पहला आदमी बोल उठा; "री...अश्विनी मेमसाब!" मेरा इतना सुनना था की मेरा गुस्सा फुट पड़ा, मैंने उसे और पीटना शरू कर दिया. उसकी गर्दन अपने दोनों हाथ से पकड़ ली और दबाने लगा. कुछ पड़ोसियों ने मुझे पकड़ कर पीछे खींचा जिससे वो मरने से बच गया.इतने में पुलिस अपना साइरेन बजाती हुई आ गई और फटाफट दोनों आदमियों को हिरासत में लिया. "तुम्हें तो चोट लगी है!!" पुलिस इंस्पेक्टर बोला तब जा कर मेरा ध्यान अपनी शर्ट पर गया जहाँ चाक़ू से घाव हो गया था. जब मैंने पहले आदमी के कंधे पर थपथपाया था तो वो थोड़ा हड़बड़ा दिया था और मेरी तरफ घुमते हुए उसने मेरे सीने को अपने चाक़ू से जख्मी कर दिया था. जख्म ज्यादा खतरनाक नहीं था. बस उससे मेरी कमीज फ़ट गई थी और कुछ खून की बूँदें मेरी शर्ट पर दिख रही थी. हमारी बिल्डिंग में ही एक डॉक्टर साहब थे जिन्होंने मेरा इलाज कर दिया. "तुम्हें पता है ये कौन लोग हैं?" इंस्पेक्टर ने मुझसे पुछा तो मैंने बस ना में गर्दन हिला दी और मैं वहां से निकल कर फ़ौरन नितु के पास ऊपर आ गया."नितु दरवाजा खोलो...मैं हूँ!" मेरी आवाज सुनते ही उसने दरवाजा खोला और रोती हुई मुझसे लिपट गई. पीछे से इंस्पेक्टर भी आ गया, मैंने नितु को आराम से बिठाया और उसे पानी पीला कर शांत करवाया.उसने जैसे ही मेरी शर्ट पर खून देखा तो वो और भी डर गई. मैंने उसे विश्वास दिलाया की मुझे कुछ नहीं हुआ. उसके बाद इंस्पेक्टर ने हम से सारा वाक़्या पूछा. नितु इतनी घबराई हुई थी की उससे कुछ बोला ही नहीं जा रहा था और वो बस मेरे कंधे पर सर रख कर रोये जा रही थी. मैंने इंस्पेक्टर को अपनी साइड की सारी कहानी बता दी. पर उसे नितु की साइड की भी कहानी सुननी थी पर नितु अभी बयान देने की हालत में नहीं थी. इतने में वही डॉक्टर मियां-बीवी आ गए और इंस्पेक्टर को समझाते हुए बोले; "इंस्पेक्टर आप देख सकते हो शी इज इन शॉक! गिव हरसम टाइम!" चूँकि नितु प्रेग्नेंट थी इसलिए वो उससे ज्यादा पूछताछ नहीं कर सकता था. "नितु...देखो मैं हूँ यहाँ आपके पास! यू आर सेफ नाऊ! रिलॅक्स ... ओके!!!!" बड़ी मुश्किल से मैंने नितु को शांत किया और उसके सर पर हाथ फेरता रहा ताकि वो दुबारा से शॉक में न चली जाये. पड़ोसियों का ताँता लग चूका था और सभी हैरान थे की भला हम दोनों ने किसी का क्या बिगाड़ा हो सकता हे. कोई कहता की ये प्रोफेशनल झगडा है तो कोई कहता की चोर चोरी करने आये थे! मैं जानबूझ कर चुप था क्योंकि मेरे मन में अब बदले का ज्वालामुखी फुट चूका था! अब इस लावा से मैं अश्विनी को खुद जला कर राख करने वाला था. पर मैं जोश में होश खोने वालों में से नहीं था. मुझे मेरा बदला पूरी प्लानिंग से लेना था. अभी मुझे पहले अपनी बीवी को संभालना था.

करीब घंटे बाद नितु स्टेबल हुई और मैंने इंस्पेक्टर को उसका बयान लेने को बुलाया; "मैं फ्रूट्स ले कर ऊपर आ रही थी की दो लोगों ने मेरा रास्ता रोक लिया, और दोनों मुझ पर चिल्लाते हुए बोले की वो मेरा खून करने आये हैं! ये शोर सुन वॉचमन भैया आ गए तो उनमें से एक ने चाक़ू निकाला और वॉचमन भैया को उससे डरा कर दूर ले गया.बस एक आदमी था जो मुझे गालियाँ दे रहा था और कह रहा था की 'मेमसाहब ने कहा है की पहले तेरा बलात्कार करें और फिर तुझे तड़पा-तड़पा कर मारेंगे!'" ये बोलते-बोलते नितु फिर से रो पड़ी, मैंने उसे संभाला और उसने आगे की बात रोते हुए कही; "वो बड़े गंदे-गंदे शब्द बोल रहा था और मुझे छूने की कोशिश कर रहा था. मैं हरबार उसका हाथ झटक देती और उसे खुद को छूने नहीं देती. गुस्से में आ कर उसने चाक़ू निकाला और मेरी गर्दन पर लगा दिया और फिर से गालियाँ देने लगा. तभी मेरे पति आ गए और उन्होंने उसपर हमला कर दिया." नितु की बात सुन कर मेरा खून खौल रहा था और आँखें गुस्से से लाल हो गईं थी. नितु ने जब मेरी आँखें देखि तो वो डर गई और फिर से रोने लगी. मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया और उसके सर को सहलाने लगा. मैं चाहता तो इंस्पेक्टर को बता सकता था की ये सब किस की करनी है पर जो इंसान नितु और मुझ पर इस कदर हमला करवा सकता है उसे कानून को चकमा देना कितना आसान हो गए ये मैं जानता था. इंस्पेक्टर ने मेरी बहादुरी की तारीफ की और साथ ही उसने उस ड्राइवर और वॉचमन की हिम्मत को सराहया| मेरे पास पैकर्स एंड मोवेर्स वाले का फ़ोन आया तो मैंने उसे घर बुला लिया और उसे कहा की घर पर कुछ प्रॉब्लम आ गई है तो वो किसी को भेज दे और मैं उसी को पैसे दे दूंगा. मेरी गंभीर आवाज सुन वो समझ गया की कुछ हुआ है और खुद ही आ गया.मैंने उसे पैसे और वो दोनों कार्टन दे दिये.

इधर धीरे-धीरे कर सब चले गए और अब घर में सिर्फ मैं और नितु ही रह गए थे. मैंने नितु को सहारा दे कर उठाया और अपने कमरे में लाया, अभी तक मैंने इस घटना की खबर किसी को नहीं दी थी. नितु को बिस्तर पर बिठाया और मैं उसी के साथ बैठ गया, "बेबी भूख लगी है? कुछ बनाऊँ?" नितु ने ना में गर्दन हिलाई और अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया. "बेबी अपने लिए नहीं तो हमारे बच्चे के लिए खा लो!" मैंने नितु को हमारे होने वाले बच्चे का वास्ता दिया तो वो मान गई. मैं उसे कमरे में छोड़ जाने लगा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया; "बाहर से मंगा लो!" मैंने खाना बाहर से मंगाया और मैं खुद नितु के साथ बैठ गया.नितु मेरे कंधे पर सर रख बैठी रही और उसकी आँख लग गई. कुछ देर बाद जब बेल्ल बजी तो वो एकदम से डर गई; "बेबी खाना आ गया!" मैंने नितु को विश्वास दिलाया की उसे डरने की कोई जरुरत नही. खाना परोस कर मैं नितु के पास आया और उसे खुद अपने हाथ से खिलाया, नितु ने भी मुझे अपने हाथ से खिलाया. खाना खा कर मैंने नितु को लिटा दिया और मैं भी उसकी बगल में ले गया.नितु ने मेरा बायाँ हाथ उठा कर अपनी छाती पर रख लिया क्योंकि उसका डर अब भी खत्म नहीं हुआ था और मेरा हाथ उसकी छाती पर होने से उसे सुरक्षित महसूस हो रहा था. कुछ देर बाद नितु सो गई और सीधा शाम को उठी, मैं अब भी उसकी बगल में लेटा था और अपने बदले की प्लानिंग कर रहा था.

मैंने रात को मोहित को फ़ोन किया और उसे बताया की परसों सारा समान पहुंचेगा तो वो सब समान शिफ्ट करवा दे. मेरी गंभीर आवाज सुन वो भी सन्न था पर मैंने उसे कुछ नहीं बताया, बस ये कहा की नितु की तबियत ठीक नहीं है इसलिए थोड़ा परेशान हूँ! रात को जब मैं खाना बनाने लगा तो नितु मेरे सामने बैठ गई और मुझे गौर से देखने लगी. मैंने माहौल को हल्का करने के लिए उससे थोड़ा मज़ाक किया; "बेबी...ऐसे क्या देख रहे हो? मुझे शर्म आ रही है!" ये कहते हुए मैं ऐसे शरमाया जैसे मुझे सच में शर्म आ रही हो. नितु एकदम से हँस दी पर अगले ही पल उसे वो डरावना मंजर याद आया और उसकी आँखें फिर नम हो गई. मैं रोटी बनाना छोड़ कर उसके पास आया और उसे अपने सीने से लगा लिया. "बस...बस! मेला बहादुर बेबी है ना?" मैं तुतलाते हुए कहा तो नितु ने अपने आँसूँ पोछे और फिर से मुझे गौर से देखने लगी. "बेबी… आई नो इट्स नॉट इजी फॉर यू टू फॉरगेट क्या हॅपेंड टूडे बट प्लीज फॉर दीं सेक ऑफ अवर चाइल्ड ट्राय टू फर्गेट दिस होरिफिक इंसीडेंट. योवर सिरीयस नेस, योवर फियर इज हार्मफुल फॉर अवर कीड!” मैंने नितु को एक बार फिर अपने होने वाले बच्चे का वास्ता दिया. नितु ने अपनी हिम्मत बटोरी और पूरी ताक़त लगा कर मुस्कुराई और बोली; "मुझे हलवा खाना है!" मैंने उसके मस्तक को चूमा और उसके लिए बढ़िया वाला हलवा बनाया. रात में हम दोनों ने एक दूसरे को खाना खिलाया और फिर दोनों लेट गये. नितु ने रात को मेरा हाथ फिर से अपनी छाती पर रख लिया, कुछ देर बाद उसने बायीं करवट ली जो मेरी तरफ थी और मेरा हाथ फिर से अपनी कमर पर रख लिया. मैंने नितु के मस्तक को चूमा तो वो धीरे से मुस्कुराई, उसकी मुस्कराहट देख मेरे दिल को सुकून मिला.

सुबह जागते हुए ही मैंने नितु के लिए कॉफ़ी बनाई और उसे प्यार से उठाया. नितु ने आँखें तो खौल लीं पर वो फिर से कुछ सोचने लगी. मुझे उसे सोचने से रोकना था इसलिए मैंने झुक कर उसके गाल को चूम लिया, मेरे होठों के एहसास से नितु मुस्कुराई और फिर उठ कर बैठ गई. नाश्ता करने के बाद मैं नितु के पास ही बैठा था और उसका ध्यान अपनी इधर-उधर की बातों में लगा दिया. पर उसका दिमाग अब भी उन्हीं बातों को याद कर रहा था. कुछ सोचने के बाद वो बोली; "मेमसाब ...अश्विनी ही है ना?" नितु की बात सुन कर मैं एकदम से चुप हो गया.नितु ने फिर से अपनी बात दोहराई; "है ना?" मैंने ना में सर हिलाया तो उसने दूसरा सवाल पुछा; "तो फिर कौन है?"

"मुझे नहीं पता? शायद यास्मिन (कुमार की गर्लफ्रेंड) हो?" मैंने बात बनाते हुए कहा.

"उसे हमारे घर का एड्रेस कैसे पता?" नितु ने तीसरा सवाल पूछा. "हमारे घर एक एड्रेस मैंने सिर्फ भाभी को बताया था और हो न हो अश्विनी ने सुन लिया होगा!" नितु बोली. ये सुनने के बाद मेरा गुस्सा बाहर आ ही गया;

"हाँ वो ज़लील औरत अश्विनी ही है और मैं उसे नहीं छोड़ूँगा!" मैंने गुस्से से कहा और नितु को सारा सच बता दिया जो मैंने उस आदमी से उगलवाया था.

"नहीं...आप ऐसा कुछ नहीं करोगे?" नितु ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा.

"तो हाथ पर हाथ रखा बैठा रहूँ? या फिर इंतजार करूँ की कब वो अगलीबार हमें नुकसान पहुँचाने में कामयाब हो? ना तो मैं इस डर के साये में जी सकता हूँ ना ही अपने बच्चे को इस डर के साये में जीने दूँगा!" मैंने खड़े होते हुए कहा.

"आप ने ऐसा कुछ भी किया तो आप जानते हो उसका क्या नतीज़ा होगा? आपको जेल हो जाएगी, फिर मेरा क्या होगा और हमारे बच्चे का क्या होगा? आप पुलिस में कंप्लेंट कर दो वो अपने आप देख लेगी!" नितु बोली.

"आपको लगता है की पुलिस कंप्लेंट करने से सब सुलझ जायेगा? जो अपने गुंडे यहाँ भेज सकती है क्या वो खुद को बचाने के लिए पुलिस और कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकती? इस समस्या का बस एक ही अंत है और वो है उसकी मौत!" मैंने कहा.

"फिर साक्षी का क्या होगा? कम से कम उसका तो सोचो?" नितु बोली.

"उसे कुछ नहीं होगा, उल्टा अश्विनी के मरने के बाद हम उसे आसानी से गोद ले सकते हे. हमें हमारी बेटी वापस मिल जाएगी!" मैंने कहा.

"और जब उसे पता लगेगा की उसकी माँ का खून आपने किया है तब?" नितु के ये आखरी सवाल ऐसा था जो मुझे बहुत चुभा था.

"जब वो सही और गलत समझने लायक बड़ी हो जाएगी तो मैं खुद उसे ये सब बता दूँगा और वो जो भी फैसला करेगी मैं वो सर झुका कर मान लुंगा." मैंने बड़े इत्मीनान से जवाब दिया.

"ये पाप है...आप क्यों अपने हाथ उसके गंदे खून से रंगना चाहते हो! प्लीज मत करो ऐसा कुछ!....सब कुछ खत्म हो जायेगा!" नितु गिड़गिड़ाते हुए बोली. मैंने नितु को संभाला और उसकी आँखों में देखते हुए कहा;

"जब किसी इंसान के घर में कोई जंगली जानवर घुस जाता है तो वो ये नहीं देखता की वो जीव हत्या कर रहा है, उसका फ़र्ज़ सिर्फ अपने परिवार की रक्षा करना होता हे. अश्विनी वो जानवर है और अगर मैंने उसे नहीं रोका तो कल को इससे भी बड़ा कदम उठाएगी और शायद वो अपने गंदे इरादों में कामयाब भी हो जाये. मैं तुम्हें नहीं खो सकता वरना मेरे पास जीने को रहेगा ही क्या? प्लीज मुझे मत रोको....मैं कुछ भी जोश में नहीं कर रहा ....सब कुछ प्लॅन है!" मैंने कहा और फिर नितु को सारा प्लान सुना दिया. प्लॅन फुल प्रूफ था. पर नितु का दिल अब भी इसकी गवाही नहीं दे रहा था. "अच्छा ठीक है...मैं अभी कुछ नहीं कर रहा... ओके?" मैंने फिलहाल के लिए हार मानी पर नितु को संतुष्टि नहीं मिली थी; "प्रॉमिस मी, बिना मेरे पूछे आप कुछ नहीं करोगे?" अब मेरे पास सिवाय उसकी बात मानने के और कोई रास्ता नहीं था. इसलिए मैंने नितु से वादा कर दिया की बिना उसकी इज्जाजत के मैं कुछ नहीं करुंगा. मेरे लिए अभी नितु की ख़ुशी ज्यादा जरुरी थी. मेरी बात सुन नितु को अब पूर्ण विश्वास हो गया की मैं कुछ नहीं करुंगा. २० जनवरी को हम ने बैंगलोर का घर खाली कर दिया और हम लखनऊ के लिए निकल गये. पहले नितु ने नया घर देखा और फिर नया ऑफिस, नितु बहुत खुश हुई, फिर हम गाँव लौट आये. यहाँ सब की मौजूदगी में नितु ज्यादा खुश रहने लगी. नितु ने मुझे साफ़ मना कर दिया की मैं उस घटना के बारे में किसी से कोई जिक्र न करूँ, इसलिए मैं चुप रहा.इधर फरवरी का महीना शुरू हुआ और मैंने ऑफिस शुरू कर दिया. पूरा घर उस दिन पूजा में सम्मिलित हुआ. पूजा के बाद सब हमारे फ्लैट पर आये और वहाँ भी ग्रह-पूजन उसी दिन हुआ. सब को घर बहुत पसंद आया और हमें आशीर्वाद दे कर सभी लौट गये. बिज़नेस बड़े जोर-शोर से शुरू हुआ, नितु ने अभी ऑफिस ज्वाइन नहीं किया था क्योंकि मैं उसे स्ट्रेस नहीं देना चाहता था. सारे पुराने क्लाइंट्स मोहित-प्रफुल हैंडल कर रहे थे और युएस का वो एक क्वार्टर का काम मैं अकेला देख रहा था. मैं अब नितु को ज्यादा से ज्यादा समय देता था. सुबह-शाम उसके साथ सोसाइटी के गार्डन में घूमता, हर इतवार उसे मंदिर ले जाता जहाँ पाठ हो रहा होता था ताकि होने वाले बच्चे में अच्छे गुण आयें| कुछ बदलाव जो मैं नितु में देख रहा था वो ये की उसका बेबी बांप कुछ ज्यादा बड़ा था. उसका वजन कुछ ज्यादा बढ़ गया था. पर नितु कहती थी की मैं उसका इतना ख्याल रखता हूँ उसे इतना प्यार करता हूँ की उसका वजन बढ़ गया हे. मैंने हँसते हुए उसकी बात मान ली, दिन बड़े प्यार भरे गुजरने लगे थे और बिज़नेस में मोहित और नए कोंट्राक्टे ले आया था. रविवार को कभी कभार मोहित-प्रफुल की बीवियाँ घर आतीं और जल्द ही तीनों की अच्छी दोस्ती हो गई. बैंगलोर वाले हादसे के बाद मैं नितु को कहीं भी अकेला नहीं जाने देता था. जब भी हम कभी बाहर निकलते तो साथ निकलते और दिन में निकलते.जितनी भी जरुरी प्रिकॉशन लेनी चाहिए वो सब मैं ले रहा था और मैंने इसकी जरा सी भी भनक नितु को नहीं लगने दी थी वरना वो भी डरी-डरी रहती.
 
कुछ दिन बाद मुझे किसी काम से बरेली जाना पड़ा और वापस आते-आते रात हो गई. दस बज गए थे और इधर नितु बार-बार मुझे फ़ोन कर के मेरी लोकेशन पूछ रही थी. "बेबी...बस लखनऊ एंटर हुआ हूँ ज्यादा से ज्यादा पोना घंटा लगेगा.” पर नितु उधर बेचैन हो रही थी. मैं ड्राइव कर रहा था और फ़ोन लाउड स्पीकर पर था. मेरी गाडी एक चौराहे पर पहुँची जहाँ दो जीपें रास्ता रोके खड़ी थी. मैंने गाडी रोक दी और नितु को होल्ड करने को कहा, दोनों जीपों के सामने ३ लोग खड़े थे. मैं गाडी से उतरा और उनसे बोला; "रास्ता क्यों रोक रखा है?" अभी इतना ही बोला था की किसी ने मेरे सर पर पीछे से जोरदार हमला किया. मैं चिल्लाता हुआ सर पकड़ कर गिर गया, "मेमसाब से पन्गा लेगा तू?" एक आदमी जोर से चिल्लाया और हॉकी मेरी पीठ पर मारी| उसके सारे साथियों ने हॉकी, बैट, डंडे निकाल लिए और मुझे उनसे पीटना शुरू कर दिया. मैं दर्द में पड़ा करहाता रहा और वो मुझे मारते रहे, तभी वहाँ से पुलिस की एक जीप पेट्रोलिंग के लिए निकली जिसे देख सारे भाग खड़े हुए, पर जाते-जाते भी उन्होंने गाडी की विंड शिल्ड तोड़ दी थी! पुलिस वालों ने मुझे खून से लथपथ हालत में हॉस्पिटल पहुँचाया, गाडी से उन्हें जो फ़ोन मिला था उसे उन्होंने देखा तो नितु फ़ोन पर रोती हुई चीख रही थी; "प्लीज...छोड़ दो मेरे पति को!" शायद उसने मेरी दर्द भरी चीख सुन ली थी. पुलिस ने उसे भी अस्पताल बुला लिया, नितु ने फ़ौरन सब को खबर कर दी थी और देखते ही देखते हॉस्पिटल में मेरे दोस्त और मम्मी-डैडी आ गये.

गाँव से गोपाल भैया, ताऊ जी, पिताजी और प्रकाश बाइक पर निकल चुका था. जो रात के २० बजे हॉस्पिटल पहुंचे. डॉक्टर ने प्राथमिक उपचार शुरू किया, भगवान् का शुक्र था की पुलिस की पैट्रॉल जीप को देख कर सारे भाग खड़े हुए और उन्हें मुझे जान से मारने का मौका नहीं मिला. नितु मुझसे मिलने को आतुर थी पर मैं उस वक़्त होश में नहीं था. मुझे सुबह के १० बजे होश आया, बड़ी मुश्किल से मैंने अपनी आँख खोली और सामने नितु को देखा जिसकी रो-रो कर हालत खराब हो गई थी. नितु एक दम से मेरे गले लग गई और फफक कर रो पडी. मेरे सर पर पट्टी थी. बायाँ हाथ पर फ्रैक्चर और पीठ पर जो हमला हुआ था उससे मेरी रिड की हड्डी बस टूटने से बच गई थी. मैं और नितु दोनों ये जानते थे की ये किसकी करनी है पर दोंनो ही खामोश थे. तभी इंस्पेक्टर आया और बोला की वो लोग चोरी करने के इरादे से आये थे और हमला किया था. उनकी तलाश जारी है, ये सुनते ही नितु उस पर चीख पड़ी; "चोरी करने के लिए कौन जीप से आता है? देखा था न आप लोगों ने उन्हें जीप से भागते हुए? जानना चाहते हो न कौन हैं वो लोग तो नंबर लिखो और अगर है हिम्मत तो उन्हें पकड़ कर जेल में डालो!" माँ ने नितु को शांत करवाया पर नितु ने बैंगलोर में जो हुआ वो सब बता दिया और अश्विनी का नाम भी बता दिया. ये सब जानकार सब को बहुत धक्का लगा, पिताजी ने मेरे पर चिल्लाना शुरू कर दिया की मैंने उनसे इतनी बड़ी बात छुपाई| नितु बेचारी कुछ बोलने को हुई तो मैंने इसे आँखों से इशारा कर के चुप रहने को कहा. सब मुझे डांटते रहे और मैं सर झुकाये सब सुनता रहा. पर जो गुस्से का ज्वालामुखी मेरे अंदर उसदिन फूटा था वो अब नितु के अंदर सुलग उठा था. इधर लखनऊ पुलिस बैंगलोर पुलिस के साथ संपर्क करने लगी पर मैं जानता था की इसका कोई नतीजा नहीं निकलेगा और हुआ भी वही.

अगले दिन ही हमें बताया गया की उन दोनों को तो लखनऊ जेल भेजा गया पर वो यहाँ तो आये ही नहीं?! मतलब अश्विनी ने पैसे खिला कर मामला सुलटा दिया था. लखनऊ पुलिस ने जब कल के वाक़्या के बारे में उससे पुछा तो उसने पार्टी मीटिंग में होने की बात कह कर अपना पला साफ़ झड़ लिया. पुलिस ने केस बंद कर दिया. घर वाले बड़े मायूस हुए और इन्साफ न मिल पाने से सभी के मन में एक खीज जरूर थी. दो दिन बाद मुझे डिस्चार्ज मिला और मैं गाँव आ गया, अब मेरी हालत में थोड़ा बहुत सुधार था. उसी रात को नितु मेरी पीठ में दवाई लगा रही थी. की मेरी पीठ की हालत देख वो रो पडी. "हे .... इधर आओ!" मैंने नितु को अपने सामने बुलाया और उसकी ठुड्डी ऊपर करते हुए बोला; "ये जख्म ठीक हो जायेंगे!" नितु ने गुस्से में आ कर अपने आँसूँ पोछे और मेरी टी-शर्ट के कालर पकड़ कर मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "यू' हयाव माई परमिशन! किल दॅट बीच!" नितु की आँखों में अंगारे दहक रहे थे और उसने फैसला कर लिया था की अब वो उस कुतिया को अपने घरोंदे को तबाह करने नहीं देगी. “उसने मुझ पर हमला किया, वो तो मैं सह गई पर उसने आपकी ये हालत की और ये मैं कतई बर्दाश्त नहीं करुँगी! उस हरामजादी की हिम्मत कैसे हुई मेरे पति को नुकसान पहुँचाने की?” नितु गुस्से में गरजी, उसकी सांसें तेज हो चली थीं और उसकी पकड़ मेरी टी-शर्ट पर और कठोर होती जा रही थी.

नितु की 'नितुमति' के बाद बाद मेरे चेहरे पर शैतानी मुस्कान आ गई. मैंने आगे बढ़ कर नितु के मस्तक को चूमा और हाँ में गर्दन हिला कर उसकी बात का समर्थन किया. नितु को उसके गुस्से का एहसास हुआ और ये भी एहसास हुआ की उसने तेश में आ कर मेरी टी-शर्ट के कालर पकड़ लिए थे. उसने कालर छोड़ दिया और एकदम से मेरे गले लग गई. पर उसकी आँखों से एक बूँद आँसूँ नहीं गिरा. मैं नितु के बालों में हाथ फिर रहा था और उसे शांत कर रहा था की तभी नितु का फ़ोन बज उठा. ये कॉल किसी अनजान नंबर से आया था इसलिए नितु ने कॉल उठा लिया, ये कॉल किसी और का नहीं बल्कि अश्विनी का ही था. "तुम दोनों ने क्या किस्मत लिखवाई है यार? साला दोनों बार बच गए, चलो कोई नहीं आखरी हमला बड़ा जबरदस्त होगा और अचूक होगा!" अश्विनी अपनी अकड़ दिखाते हुए बोली.

"कुतिया!!!!" नितु बहुत जोर से चीखी|l "अब तक मैंने अपने पति को रोक रखा था. पर अब मैं ने उन्हें खुली छूट दे दी है...." अभी नितु की बात पूरी भी नहीं हुई थी की अश्विनी बरस पड़ी; "ओ हेल्लो! तूने मुझे समझ क्या रखा है? मैं अब वो डरी-सहमी सी अश्विनी नहीं हूँ! मैंने अब शिकार करना सीख लिया है, तुझे पता भी है मेरी पहुँच कहाँ तक है? नहीं पता तो जा के उस इंस्पेक्टर से पूछ जिसे तूने मेरे पीछे लगाया था! सीधा कमिश्नर ने उसे डंडा किया है और उसने केस बंद कर दिया. होली के बाद गाँव में मुखिया के चुनाव हो रहे हैं और उस में मेरी पार्टी का भी उमीदवार खड़ा है, ये चुनाव तो मैं चुटकी बजा कर जीत जाऊँगी और फिर तू और तेरे पति को मैं कहीं का नहीं छोडूंगी! बड़ा साक्षी के लिए प्यार है ना उसके मन में, अब देख तू उसे ही कैसे केस में फँसाती हु. मैं पंचायत में चीख-चीख कर कहूँगी की बचपन से ही वो मेरा रेप करता आया है और साक्षी उसी का खून है! फिर देखती हूँ वो लोग कैसे उसे छोड़ते हैं?! ना मैंने उसे उसी खेत में जिन्दा जलवाया जहाँ मेरी माँ को जलाया था तो मेरा नाम अश्विनी नहीं!" इतना कह कर उसने फ़ोन काट दिया.

अश्विनी की बात में दम था. उसके झूठे आरोप के सामने हमारी एक नहीं चलती. हमारे पास कोई सबूत नहीं था जिससे ये साबित हो सके की अश्विनी झूठ बोल रही हे. नितु पर अश्विनी की बातों का बहुत गहरा असर हुआ था और वो एक दम से खामोश हो गई थी. मैंने कई बार उसे झिंझोड़ा तो वो फिर से रो पड़ी और रोते-रोते उसने सारी बात बताई. अब तो मेरे लिए अश्विनी की जान लेना और भी ज्यादा जरुरी हो गया था. क्योंकि अगर मैं पीछे हटता तो उसका इन्तेक़ाम पूरा हो जाता और मेरा पूरा परिवार तहस-नहस हो जाता! "आपको घबराने की कोई जरुरत नहीं है! मैं अपने उसी प्लान पर काम करता हूँ और अब तो मेरे पास परफेक्ट कव्हर है अपने प्लान को अंजाम देने का!" मैंने नितु के आँसू पूछते हुए कहा. “ट्रस्ट मी!!!” मैंने नितु की आँखों में देखते हुए उसे विश्वास दिला दिया.सुबह हुई और मैं उठ कर नीचे आया, मेरा जिस्म अभी भी रिकवर होना शुरू ही हुआ था. पर बदले की आग ने उस दर्द को दबाना शरू कर दिया था. "रात को तुम-दोनों झगड़ रहे थे?" माँ ने पुछा तो नितु का सर झुक गया, शुक्र था की किसी ने पूरी बात नहीं सुनी थी. "वो...माँ....वो...." मुझे कोई बहाना सूझ नहीं रहा था. इधर ताऊ जी ने मुझे अच्छे झड़ दिया; "तुझे शर्म आनी चाहिए! बहु माँ बनने वाली है और तू है की उससे लड़ता फिर रहा है? सारा वक़्त तेरी तीमारदारी करती रहती है और तू है की???"

"ताऊ जी मैं तो बस इतना कह रहा था की वो चैन से सो जाए पर वो मान ही नहीं रही थी!" मैंने झूठ बोला.

"कैसे सो जाए वो?" ताई जी बोलीं तो मैंने माफ़ी माँग कर बात वहीं खत्म कर दी. नाश्ते के बाद मुझे घर से निकलना था सो मैंने डॉक्टर के जाने का बहाना किया; "पिताजी मैं एक बार फिजिओ थेरेपी करवाना चाहता हूँ, उससे शायद जल्दी आराम मिले!" ये सुन कर नितु चौंक गई पर खामोश रही, पिताजी ने गोपाल भैया से कहा की वो मुझे डॉक्टर के ले जाये. मैं और भैया बाइक से निकले और मैं उनसे रास्ते भर बातें करता रहा और बातों-बातों में मैंने अश्विनी के घर का पता उनसे निकलवा लिया. कुछ देर बाद हम ट्रीटमेंट के बाद वापस आ गए, अगले दिन मुझे पता था की गोपाल भैया को आज व्यापारियों से मिलने जाना है तो मैं उनके जाने का इंतजार करने लगा. पिताजी और ताऊ जी तो पहले ही कुछ काम से जा चुका था., जैसे ही भैया निकले मैं उनके पीछे-पीछे ही फिर से फिजिओ थेरेपी करवाने के बहाने से निकला. इस बार मैं सीधा अश्विनी के घर के पास वाले पनवाड़ी के पास रुका और उससे एक सिगरेट ली. वहीं खड़े-खड़े मैं आराम से पीता रहा और अश्विनी के घर पर नजर रखता रहा. अगले कुछ दिन तक ऐसे ही चला और वहाँ खड़े-खड़े सबकी बातें सुनते-सुनते मुझे अश्विनी के घर आने-जाने वालों और उसके नौकरों के नाम भी पता चल गये. अब वक़्त था उस घर में घुसने का ताकि मैं ये अंदाजा लगा पाऊँ की घर में अश्विनी का कमरा कौन सा है? पर उसके लिए मुझे एक लिबाज की जरुरत थी. मेक-अप की जरुरत थी. हमारे गाँव में एक नट था. जो हरसाल ड्रामे में हिस्सा लेता था. प्रकाश की उससे अच्छी दोस्ती थी क्योंकि वो उसे मस्त वाला माल दिलवाया करता था. १-२ बार प्रकाश ने मुझे उससे मिलवाया भी था एक वही था जो मुझे मेक-अप का समान दे सकता था. पर उससे माँगना मतलब मुसीबत मोल लेना था. इसलिए मेरे पास सिवाए चोरी के कोई रास्ता नहीं रह गया था.

मैं उससे मिलने निकला और कुछ देर उसी के पास बैठा तो बातों-बातों में पता चला की उसे पैसों की सख्त जरुरत हे. मेरे पास उस वक़्त ४,०००/- थे जो मैंने उसे दे दिए, इस मदद से वो बहुत खुश हुआ. फिर मैंने उससे चाय माँगी तो वो चाय बनाने लग गया.वो चूँकि अभी तक कुंवारा था सो उसके घर में बस एक बूढी माँ थी जो बिस्तर से उठ नहीं पाती थी. इधर वो चाय बनाने में व्यस्त हुआ और इधर मैंने बातों-बातों में ही उसके पास से एक दाढ़ी और मूछ चुरा ली! चाय पी कर मैं घर लौट आया और अगले दिन की तैयारी करने लगा.

मेरी एक पुरानी टी-शर्ट जो घर में गंदे कपडे की तरह इस्तेमाल होती थी मैंने वो उठा ली, एक पुरानी पैंट जो की भाभी धोने वाली थी वो भी मैंने उठा ली. अगले दिन मैंने नीचे वो फटी हुई पुरानी टी-शर्ट पहनी और उसके ऊपर अपनी एक कमीज पहन ली.नीचे वही गन्दी पैंट पहन ली, कंधे पर मैंने अंगोछा रखा और घर से निकलने लगा. "सागर ये कौन सी पैंट पहन रखी है?" भाभी ने पुछा तो मैंने बोल दिया की भाभी आप इसे धोना भूल गए और इस कमीज के साथ यही मैच होती हे. इतना बोल मैं घर से निकल गया.

अश्विनी के घर से कुछ दूर पहुँच कर मैंने अपनी कमीज निकाल दी, अपने साथ लाये लिफाफे से मैंने वो नकली दाढ़ी-मूछ भी लगा ली. अब किसी के लिए भी मुझे पेहचान पाना नामुमकिन था. मेरी कॅलक्युलेशन और जाणकारी के हिसाब से आज अश्विनी अपने घर पर मौजूद नहीं थी और हुआ भी यही.मैं जब उसके घर पहुँचा तो बाहर उसकी काली मर्सिडीज नहीं थी. इसका मतलब घर पर सिर्फ कांता (उसनी नौकरानी) ही होगी. मैंने दरवाजा खटखटाया तो कांता ने दरवाजा खोला और मेरी गरीब हालत देख कर चिढ़ते हुए बोली; "क्या है?" मैंने अपनी आवाज बदली और कहा; "जी...वो मेमसाब ने बुलाया था....कुछ मदद देने के लिए!" वो मेरे हाथ का प्लास्टर देख समझ गई की मैं पैसे माँगने आया हु. "घर पर कोई नहीं है, बाद में आना!" वो मुँह सिकोड़ कर बोली. "रहम करो हम पे! बहुत दूर से आये हैं और बड़ी आस ले कर आये हे. ऊस दिन मेमसाब कही रही की आज वो घर पर होंगी!" मैंने अपना ड्रामा जारी रखा पर कांता टस से मस नहीं हुई, इसलिए मुझे अपनी दूसरी चाल चलनी पड़ी; "देवी जी तनिक पानी मिलेगा पीने को?" मेरे मुँह से देवी जी सुन कर वो खुश हो गई और अभी लाइ बोलकर अंदर गई जिसका फायदा उठा कर मैं अंदर घुस गया और अंदर का मोआईना बड़ी बारीकी से किया. कांता को रसोई से पानी लाने में करीब दो मिनट लगे, जो मेरे लिए काफी थे घर का नक्शा दिमाग में बिठाने को.

शादी के बाद अश्विनी का कमरा उसके सास-ससुर के कमरे के सामने पहली मंजिल पर था पर उस हत्याकांड में उसके पति की मौत उसी कमरे के बाहर हुई थी. शायद उसी डर से अश्विनी अब पहली मंजिल पर भटकती नहीं थी और उसने नीचे वाला कमरा जो की रक्षित का स्टडी रूम था उसे ही अपना कमरा बना लिया था.

इधर कांता मुस्कुराती हुई गिलास में पानी ले आई, मैंने लगे हाथों उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए जिससे मुझे उससे और बात करने का मौका मिल जाये. वो मुझसे मेरे बारे में पूछने लगी तो मैंने उसे झूठ-मूठ की कहानी सुना दी. बातों ही बातों में उसने मुझे काफी जानकारी दे दी, अब अगर मैं वहाँ और देर रुकता तो वो अपना घागरा उठा के दिखा देती! उससे शाम को आने का वादा कर मैन वहाँ से निकल आया और कुछ दूर आ कर अपने कपडे ठीक करके घर लौट आया.

मेरी रेकी का काम पूरा नहीं हुआ था. अब भी एक बहुत जरुरी मोहरा हाथ लगना रह गया था. पर किस्मत ने मुझे उससे भी मिलवा दिया. हमेशा की तरह मैं उस पनवाड़ी से सिगरेट ले कर पी रहा था और अखबार पढ़ रहा था की एक आदमी पनवाड़ी के पास आया और उससे बात करने लगा; "अरे रामप्यारे भैया, कइसन बा!" वो आदमी बोला.

"अरे हम ठीक हैं, तुम कहो बनवारी भैया कितना दिन भय आजकल हिआँ दिखातो नहीं?" पनवाड़ी बोला.

"अरे ऊ हमार साहब, सेक्रेटरीवा ...ससर हम का काम से दिल्ली भेज दिया रहा! कल ही आये हैं और आज अश्विनी मेमसाब के फाइल पहुँचाय खतिर भेज दीस!" बनवारीबोला.

"अरे बताओ तोहार छमिया कांता कैसी है?" पनवाड़ी बोला.

"अरे ऊ ससुरी हमार 'लिए' खातिर पियासी है! होली का अइबे तब ऊ का दबा कर पेलब!" इतना कह कर बनवारीचला गया.यानी कांता और बनवारीका चक्कर चल रहा है!

खेर मुझे मेरा स्वरनम मौका मिल गया था. अब बस मुझे होली के दिन का इंतजार था. वहाँ से मैं सीधा अपने घर के लिए पैदल निकला और एक आखरी बार अपने सारे पत्ते जाँचने लगा.

हथियार का इंतजाम अभी नहीं हुआ था. मैंने वापस अपने चेहरे पर दाडी-मूछ लगाई और बजार की तरफ घूम गया, वहाँ काफी घूमने के बाद मैंने एक रामपुरी चाक़ू खरीदा. इतनी आसानी से उसे मारना नहीं चाहता था. मरने के टाइम उस्की आँखों में वही दर्द देखना चाहता था जो मेरी पत्नी की आँखों में थी जब उसने मुझे हॉस्पिटल में पड़ा हुआ देखा था. मैंने बजार से कुछ साड़ियाँ भी खरीदीं जिन्हें मैंने गिफ्ट रॅप करवा लिया. चूँकि हमारा गाँव इतना आधुनिक नहीं था तो वहाँ अभी भी सी.सी.टी.वी. नहीं लगा था जो मेरे लिए बहुत कारगर साबित होना था.अब बस होली का इंतजार था जो २ दिन बाद थी. कल होलिका दहन था और गाँव के चौपाल पर इसकी सारी तैयारी की जा चुकी थी. सभी बरी परिक्रमा कर रहे थे और अग्नि को नमस्कार कर रहे थे. मुझे और नितु को भी साथ परिक्रमा करनी थी. जिसके बाद नितु ने मुझसे कहा; "कहते हैं होलिका दहन बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है!"

"हाँ" मैंने बस इतना ही कहा क्योंकि मैं नितु की बात का मतलब समझ गया था.
 
उसी रात को मम्मी-डैडी जी भी आ गए हमारे साथ होली मनाने. पिछले २० दिनों में नितु ने मुझसे मेरी प्लानिंग के बारे में कुछ नहीं पुछा था. हम बात भी कम करते थे. घर वालों के सामने हम खुश रहने का नाटक करते रहते पर अकेले में हम दोनों जानते थे की मैं कौन सा बड़ा कदम उठाने जा रहा हु. उस रात मैंने नितु से बात शुरू की; "कल आपको मेरे लिए कव्हर करना होगा, याद रहे किसी को भी भनक नहीं होनी चाहिए की मैं घर पर मौजूद नहीं हु. घर पर बहुत सारे लोग होंगे तो किसी को जल्दी पता नहीं चलेगा!" मैंने नितु से इतना कहा और फिर मैं जल्दी सो गया.लेट तो मैं गया पर नींद बिलकुल नहीं आई, कारन दो, पहला ये की कल मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा दिन था. मैं कुछ ऐसा करने जा रहा था जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था. एक सीधा-साधा सा इंसान किसी का कत्ल करने जा रहा था! दूसरा कारन था मेरा बायाँ हाथ, अपने प्लान के तहत मैंने बहाना कर के आज अपना प्लास्टर कटवा दिया था. इस बहाने के लिए मुझे अस्तित्व का सहारा लेना पड़ा था. मैंने जानबूझ कर उसका सुसु अपने बाएं हाथ पर करवाया ताकि मुझे प्लास्टर कटवाने का अच्छा बहाना मिल जाये. हालाँकि इस हरकत पर सब ने खूब जोर से ठहाका लगाया था की भतीजे ने आखिर अपने चाचा के ऊपर सुसु कर ही दिया. प्लास्टर कटने के बाद मेरे हाथ में दर्द होने लगा था.सुबह हुई और मैं जल्दी से उठा और सबका आशीर्वाद लिया, अपने बाएँ हाथ पर मैंने दो गर्म पट्टियां लपेटीं ताकि दर्द कम हो. जोरदार म्यूजिक बज रहा था और घर के सारे लोग चौपाल पर आ गए थे. घर पर सिर्फ औरतें रह गईं थीं, सब ने होली खेलना शुरू कर दिया था. शुरू-शुरू में ताऊ जी ने इस आयोजन के लिए मना कर दिया था कारन था मुझ पर हुआ हमला. पर मुझे कैसे भी कर के ये आयोजन खूब धूम-धाम से करना था ताकि मुझे घर से निकलने का मौका मिल जाये इसीलिए मैंने ये आयोजन सुबह जल्दी रखवाया था. मुझे बस इसके लिए ताऊ जी के सामने नितु की पहली होली का बहाना रखना पड़ा था. सारे लोग खूब मजे से होली खेल रहे थे और मैं इसी का फायदा उठा के वहाँ से सरक गया.चेहरे और कपड़ों पर खूब सारा रंग पोत रखा था जिससे मुझे कोई पहचान ना पाए. मैं प्रकाश की बाइक ढूंढते हुए पहुँचा, सुबह मैं उसी की बाइक पर यहाँ आया था और उसे ईस कदर बातों में उलझाया की वो अपनी बाइक लॉक करना ही भूल गया.मैंने धीरे से बाइक को धक्का दे कर कुछ दूर तक ले गया और फिर स्टार्ट कर के सीधा प्रकाश के खेतों की तरफ चल दिया. उसके खेतों में जो कमरा था. जिस में मैंने वो साड़ियाँ गिफ्ट रॅप कर के छुपाई थी. उन्हें ले कर मैं सीधा अश्विनी के घर पहुँच गया.

अभी सुबह के ७ बजे थे, मैंने प्रकाश की बाइक दूर एक झाडी में छुपा दी और वो गिफ्ट्स ले कर सीधा अश्विनी के घर पर दस्तक की. मेरी इनफार्मेशन के हिसाब से वो घर पर ही थी और सिवाए कांता के वहाँ और कोई नहीं था.दरवाजा कांता ने ही खोला और मेरे मुँह पर पुते हुए रंग को देख वो समझ नहीं पाई की कौन हे. "आरी छम्मक छल्लो ई टुकुर-टुकुर का देखत है?" मैंने आवाज बदलने की कोशिश की पर ठीक से बदल नहीं पाया था पर उसे फिर भी शक नहीं हुआ क्योंकि मेरे मुँह में पान था! "बनवारीतू?!" कांता ने चौंकते हुए कहा. मेरी और बनवारीकी कद-काठी कुछ-कुछ मिलती थी इसलिए उसे ज्यादा शक नहीं हुआ. "काहे? कोई और आने वाला है का?" मैंने कहा तो वो शर्मा गई और पूछने लगी की मैं इतनी जल्दी क्यों आ गया; "अरे ऊ सेक्रेटरीवा कहिस की जा कर एही लागे ई गिफट अश्विनी मेमसाब को दे कर आ तो हम इहाँ परकट होइ गए! फिर तोहरे से आजका वादा भी तो किये रहे!" मैंने कहा तो वो हँस दी और वो गिफ्ट ले लिए और उसे सामने के टेबल पर रख दिये. "अरे मरी ई तो बता की मेमसाब घर पर हैं या नहीं?" मैंने पुछा तो उसने बताया की अश्विनी नहा रही हे. अब मुझे उसे वहाँ से भेजना था सो मैंने कहा; "कछु पकोड़े-वकोडे हैं का?" तो वो बोली की मैं उसके क्वार्टर में जाऊँ और उसका इंतजार करूँ, वो गरमा-गर्म बना कर लाएगी.उसके जाते ही मैंने सर्जीकल ग्लव पहने और मैन गेट लॉक अंदर से लॉक कर दिया और क्वार्टर की तरफ खुलने वाला दरवाजा खोल दिया ताकि उसे लगे की मैं बाहर हु. मैंने जेब से चाक़ू निकाला और उसे खोल कर बाएँ हाथ में पकड़ लिया. इसका कारन ये था की पुलिस को लगे की खुनी लेफ्टी है, चूँकि मेरे बाएँ हाथ में फ्रैक्चर है तो मुझ पर शक जाने का सवाल ही नहीं होता.

सुबह की टाइट बाँधी हुई पट्टियां काम कर गईं, मैंने गिफ्ट्स पर से भी अपनी उँगलियों के निशान मिटा दिये. मेरा दिल अब बहुत जोरों से धड़क रहा था. सांसें भारी हो चली थीं और मन पूरी कोशिश कर रहा था की मैं ये हत्या न करूँ पर मेरा दिमाग गुस्से से पागल हो गया था. इधर बाहर ढोल-बगाडे और लाउड म्यूजिक बजना शुरू हो चूका था. 'रंग बरसे' वाला गाना खूब जोर से बज रहा था. मैंने अश्विनी के कमरे का दरवाजा जोर से खटखटाया, तो वो गुस्से में बड़बड़ाती हुई बाथरूम से निकली और एकदम से दरवाजा खोला.

अपने सामने एक गुलाल से रंगे आदमी को देख वो चौंक गई और इससे पहले वो कुछ बोल पाती या चिल्लाती मैंने अपने दाएँ हाथ से उसका मुँह बंद कर दिया और बाएँ हाथ में जो चाक़ू था उससे जोर दार हमला उसके पेट पर किया. चाक़ू एक ही बार में उसकी पेट की मांस-पेशियाँ चीरता हुआ अंदर चला गया.अश्विनी की चीख तो तब भी निकली पर बाहर से आ रहे शोर में दब गई. मैंने चाक़ू को उसके पेट में डाले हुए एक बार जोर से बायीँ तरफ घुमा दिया जिससे वो और बिलबिला उठी और अपने खून भरे हाथों से मेरा कालर पकड़ लिया. उसकी आँखें फटने की कगार तक खुली थीं पर अभी उसे ये बताना जरुरी था की उसका कातिल आखिर है कौन; "आई लव यू वन्स! बट यू ह्याड टू फक ऑल दिस अप! यू मेड मी डू दिस!" मेरी आवाज सुनते ही वो समझ गई की उसका कातिल कोई और नहीं बल्कि सागर ही हे. वो कुछ बोलना चाहती थी पर उसे उसका मौका नहीं मिला और वो पीछे की ओर झुक गई. उसका सारा वजन मेरे बाएँ हाथ पर आ गया जिसका दर्द से बुरा हाल हो गया था. मैंने उसे छोड़ दिया और एक नजर कमरे में दौड़ाई तो पाया की मेरी नन्ही सी पारी साक्षी चैन की नींद सो रही थी. उसे सोते हुए देख मेरा मन उसे छूने को किया पर दिमाग ने मुझे बुरी तरह लताड़ा की मैं भला अपने खून से रंगे हाथों से उसे कैसे छू सकता हूँ?! इसलिए मैं वहाँ से भाग आया और वो गिफ्ट्स ले कर घर से भाग आया.

मैने बाइक स्टार्ट की ओर घर की तरफ बढ़ा दी. बहुत दूर आ कर मैंने वो साड़ियाँ और ग्लव्स जला दिए, उस रामपुरी चाक़ू को मैंने एक जगह गाड़ दिया जिससे कोई सबूत न बचे और चुपचाप होली के समारोह में शामिल हो गया और अपने ऊपर और रंग डाल लिया. किसी को भनक तक नहीं लगी थी की मैं गया था. पर मेरा मन अब अंदर ही अंदर टूटने लगा था. मैंने अपने परिवार को बचा लिया था पर अपने द्वारा किये गुनाह से बहुत दुखी था. मुझे अपने आप से घिन्न आने लगी थी. मुझे अपने सर से ये पाप का बोझ उतारना था. पर ये पाप पानी से धुलने वाला नहीं था इसे धोने के लिए मुझे किसी पवित्र नदी में नहाना था. हमारे गाँव के पास बस एक ही नदी थी वो थी सरयू जी! मैंने प्रकाश से कहा की चल कर सरयू जी नहा कर आते हैं, वो ये सुन कर हैरान हुआ पर जब मैंने जबरदस्ती की तो वो मान गया.हम सब को बता कर सरयू जी निकले, हमारे साथ ही कुछ और लोग जुड़ गए जिन्हें मेरी बात सही लगी थी. पहले हमने घर से अपने कपडे लेने थे पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं अंदर घुसू इसलिए मैंने भाभी को आवाज दे कर उनसे मेरे कपडे लाने को कहा. भाभी ने एक अंगोछा और कपडे ले कर बाहर आईं, फिर वहाँ से हम प्रकाश के घर गए ताकि वो भी अपने कपडे ले ले. आखिर हम सरयू जी पहुँचे, मैंने उन्हें प्रणाम किया और मन ही मन अपने किये पाप के लिए उनसे माफ़ी मांगी. जाने क्यों पर मेरा दिल कहने लगा था की जिस प्रकार भगवान राम गोपाल भैया जी ने रावण का वद्ध किया था और फिर ब्रह्महत्या के पाप से निवारण हेतु उन्होंने स्नान और पूजा-पाठ इत्यादि किया था उसी तरह आज मैं भी अश्विनी की हत्या करने के बाद इस पवित्र जल से अपने पाप धोने आया हु. मैं खुद की तुलना भगवान राम चंद्र जी से नहीं कर रहा था बस हालत को समान मान रहा था!

सरयू जी में प्रवेश करते हुए मुझे वो सारे पल याद आ रहे थे जो मैंने आशु के साथ बिताये थे! वो उसका मेरे सीने से लग कर खुद को पूर्ण समझना, उसकी छोटी-छोटी नादानियाँ, मेरा उसे पीछे से अपने हाथों से जकड़ लेना, उसका ख्याल रखना वो सब याद कर के मैं रो पडा. बहुत प्यार करता था मैं उससे, पर अगर उसके सर पर बदला लेने का भूत ना चढ़ा होता तो आज मुझे ये नहीं करना पडता. ये सब सोचते हुए मैं अच्छे से रगड़-रगड़ कर नहाया, मानो जैसे उसका खून मेरे जिस्म से पेंट की भाँती चिपक गया हो! नहाने के बाद मैं बाहर निकला और किनारे पर सर झुका कर बैठ गया.सूरज की किरणे जिस्म पर पड़ रही थीं और ऐसा लगा मानो जैसे मेरी मरी हुई आत्मा फिर से जीवित हो रही हो! कुछ देर बाद हम घर के लिए निकल पड़े और जैसे ही प्रकाश ने मुझे घर छोड़ा तो ताऊ जी और पिताजी बाहर मेरी ही राह देख रहे थे.

मैं बाइक से उतरा तो ताऊ जी ने अश्विनी का खून होने की खबर दी, मैं कुछ रियाक्ट ही नहीं कर पाया और मेरे मुँह से बस साक्षी के लिए चिंता बाहर आई; "साक्षी कहाँ है?" इतने में डैडी जी गाडी की चाभी ले कर आये और हम उनकी गाडी से अश्विनी के घर पहुंचे. पुलिस की जबरदस्त घेराबंदी थी पर चूँकि वो दरोगा ताऊ जी को जानता था सो उसने हमें आगे आने दिया और सरे हालत के बारे में बताया. दरवाजे के पास एक महिला पुलिस कर्मी कांता का बयान लिख रही थी और एक दूसरी पुलिस कर्मी रोती हुई साक्षी को गोद में लिए हुए ताऊ जी के पास आई और उन्हें साक्षी को गोद में देने लगी पर ताऊ जी चूँकि दरोगा से बात कर रहे थे सो मैंने फ़ौरन साक्षी को गोद में ले लिया और उसे अपनी छाती से लगा लिया. साक्षी को जैसे ही उसके पापा के जिस्म का एहसास हुआ वो एकदम से चुप हो गई और आँखें बड़ी करके मुझे देखने लगी. मैंने उसके माथे को चूमा और उसे फिरसे अपने गले लगा लिया. मेरा दिल जो उसके कान के पास था वो अपनी बेटी से उसके बाप द्वारा किये हुए पाप की माफ़ी माँगने लगा था. मेरी आँखें एक बार फिर भीग गईं, पीछे खड़े डैडी जी ने मेरी पीठ सहलाई और मुझे हौंसला रखने को कहा. थोड़ी बहुत पूछ-ताछ के बाद हम घर लौट आये, जैसे ही मैं साक्षी को गोद में लिए हुए आंगन में आया की नितु दौड़ती हुई मेरे पास आई. मेरी आँखों में देखते हुए उसने साक्षी को गोद में ले लिया, मैंने उससे नजरें फेर लीं क्योंकि मुझ में अब हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं उसका सामना कर सकू.

अश्विनी की मौत का किसी को उतना अफ़सोस नहीं हुआ जितना होना चाहिए, कारन साफ था की जो उसने मेरे और परिवार के साथ किया. अगले दिन मम्मी-डैडी जाने वाले थे की पुलिस आ धमकी और सबसे सवाल-जवाब करने लगी. चूँकि हमने अश्विनी पर आरोप लगाया था की उसने मुझ पर हमला करवाया था इसलिए ये कार्यवाही लाजमी थी. मुझे इसका पहले से ही अंदेशा था इसलिए मैंने इसकी तैयारी पहले ही कर रखी थी. जब दरोगा ने मुझसे पुछा की मैं कत्ल के समय कहाँ था तो मैंने उसे अपनी कहानी सुना दी; "जी मैं अपने परिवार के साथ होली खेल रहा था. उसके बाद हम दोस्त लोग नहाने के लिए गए थे. जब वापस आये तो मुझे ये सब पता चला."

"तुम्हारे ऊपर जब हमला हुआ तो तुम्हें अश्विनी पर गुस्सा नहीं आया?" दरोगा ने पूछा.

"आया था पर मैं अपाहिज कर भी क्या सकता था?!" मैंने अपनी टूटी-फूटी हालत दिखाते हुए कहा. पर उसे मुझ पर शक था सो उसने मेरी बातों को चेक करना शुरू कर दिया. अपना शक मिटाते-मिटाते वो उस फिजिओ थेरेपी क्लिनिक जा पहुँचा जहाँ मैं जाया करता था. उन लोगों ने भी मेरी बात को सही ठहराया, चूँकि वो क्लिनिक अश्विनी के घर से अपोजिट पड़ता था इसलिए अब उसे मेरी बात पर इत्मीनान हो गया था और उसने मुझे अपने शक के दायरे से बाहर कर दिया था. सारी बात आखिर कार घूम कर 'कुंवर सिंह' पर आ कर अटक गई. उसी को दोषी बना कर केस बंद कर दिया गया.

इधर नितु मेरे बर्ताव से परेशान थी. मैं उसके पास हो कर भी नहीं था. होली के तीसरे दिन घर के सारे बड़े मंदिर गए थे, नितु जानबूझ कर घर रुकी हुई थी. मैं जैसे ही निकलने को हुआ की नितु ने मेरा दायाँ हाथ कस कर पकड़ लिया और मुझे खींच कर ऊपर ले आई और दरवाजा बंद कर दिया. "क्या हो गया है आपको? किस बात की सजा दे रहे हो खुद को? ना ठीक से खाते हो ना ठीक से सोते हो?! रातबेरात उठ जाते हो और सिसकते रहते हो?! मुझसे नजरें चुराए घुमते हो, मेरे पास बैठना तो छोडो मुझे छूते तक नहीं! और मुझे तो छोड़ो आप साक्षी को भी प्यार से गले नहीं लगाते, वो सारा-सारा दिन रोती रहती है अपने पापा के प्यार के लिए!" नितु रोते हुए बोली. मैं सर झुकाये उसके सारे आरोप सुनता रहा, वो चल कर मेरे पास आई और मेरी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर की; "जानते हो न की अगर आप ये कदम नहीं उठाते तो क्या होता? आप नहीं होते, मैं नहीं होती, हमारा बच्चा नहीं होता, माँ-पिताजी....सब कुछ खत्म हो जाता! मैं समझ सकती हूँ की आपको कैसा लग रहा है?! पर आपने जो किया वो गलत नहीं था. पाप नहीं था! आप ही ने कहा था ना की जब घर में कोई जंगली-जानवर घुसा आता है तो आदमी पहले अपने परिवार को बचाता है, फिर क्यों आप खुद को कसूरवार ठहराए बैठे हो?!" नितु मेरी आँखों में देखते हुए बोली. उसकी बात सुन कर मुझे एहसास हुआ की वो सच ही कह रही है और मेरा यूँ सबसे दूर रहना और खुद को दोषी मानना गलत है! मैंने आज तीन दिन बाद नितु को कस कर अपने सीने से लगा लिया, अंदर जो भी बुरे विचार थे वो नितु के प्यार से धुल गये. मैंने उसके माथे को चूमा और मुझे इस काली कोठरी से आजाद कराने के लिए शुक्रिया कहा. "हर बार जब मैं खुद को अंतहीन अँधेरे में घिरा पाता हूँ तो तुम अपने प्यार की रौशनी से मुझे उजाले में ले आती हो!" मैंने कहा और नितु के माथे को एक बार फिर चूम लिया.अश्विनी का हमारे अलावा कोई परिवार नहीं था तो चौथे दिन हमें अश्विनी की बॉडी सौंपी जानी थी. परिवार में किसी को भी इससे कतई फर्क नहीं पड़ रहा था. आखरी बार जब मैंने आशु का चेहरा देखा तो मुझसे खुद को संभाला नहीं गया और मैं घुटनों पर गिर कर रोने लगा. नितु जो मेरे पीछे थी उसने मुझे संभाला और बड़ी मुश्किल से संभाला. एक ऐसी लड़की जिसे मैं इतना प्यार करता था उसने मुझे उसी का खून करने पर मजबूर कर दिया था! ये दर्द मेरे लिए सहना बहुत मुश्किल था. "तेरे साथ जो उसने किया, उसके बाद भी तू उसके लिए आँसू बहा रहा है?" ताऊ जी बोले.

"मैंने कभी उससे कोई दुश्मनी नहीं की, वो बस पैसों की चका-चौंध से अंधी हो गई थी पर अब तो रही नहीं तो कैसी दुश्मनी!" मैंने जवाब दिया और खुद को किसी तरह संभाला. बड़े बेमन से ताऊ जी ने सारी क्रियाएँ करनी शुरू कीं, पर आशु को आज मुखाग्नि दी जानी थी. नितु मुझे एक तरफ ले गई और बोली; "मुखाग्नि आप दोगे ना?" मैंने हाँ में सर हिलाया.
 
भले ही मेरी और आशु की शादी नहीं हुई पर उसे मंगलसूत्र सबसे पहले मैंने बाँधा था.......हा शायद यह अनैतिक था ! उन कुछ महीनों में हमने एक पति-पत्नी की तरह जीवन व्यतीत किया था.......हा शायद यह भी अनैतिक था ! सबसे ज्यादा आशु को प्यार मैंने ही किया था........ शायद यह भी अनैतिक था !

जब मुखाग्नि का समय आया तो मैं आगे आया; "ताऊ जी कृपया मुझे ही मुखाग्नि देने दीजिये!" मैंने कहा और ताऊ जी को लगा की मैं चाचा-भतीजी वाले प्यार के कारण मे यह बात कर रहा हूँ इसलिए उन्होंने इसका कोई विरोध नहीं किया. अश्विनी को मुखाग्नि देते समय मैं मन ही मन बोला; "आज हमारे सारे अनैतिक रिश्ते खत्म होते हैं! मैं भगवान से दुआ करूँगा की वो तेरी आत्मा को शान्ति दें!" आग की लपटों ने आशु की जिस्म को अपनी आगोश में ले लिया और उसे इस दुनिया से आज मुक्ति मिल गई! अगले कुछ दिनों में जो भी जरुरी पूजा और दान होते हैं वो सब किये गए और मैं उनमें आगे रहा.

आखिर अब हमारा परिवार एक जुट हो कर खड़ा था और फलने-फूलने लगा था. खुशियाँ अब हमारे घर आ आकर अपना घर बसाने लगीं थी. साक्षी को उसके बाप और माँ दोनों का लाड-प्यार मिलने लगा था. नितु उसे हमेशा अपने से चिपकाए रखती और कभी-कभी तो मेरे और नितु के बीच मीठी-मीठी नोक-झोक हो जाती की साक्षी को प्यार करने का मौका बराबर मिलना चाहिए! मई का महीना लगा और नितु का नौवां महीना शुरू हो गया, नितु ने मुझसे कहा की मैं घर में साक्षी को कानूनी रूप से गोद लेने की बात करू. दोपहर को जब सब का खाना हो गया तो मैंने बात शुरू की; "पिताजी....मैं और नितु साक्षी को कानूनी रूप से गोद लेना चाहते हैं!" ये सुन कर पिताजी और ताऊजी समेत सारे लोग मुझे देखने लगे. "पर बेटा इसकी क्या जरुरत है तुझे? घर तो एक ही है!" पिताजी बोले.

"जरुरत है पिताजी... साक्षी के साथ भी कुछ वैसे ही हो रहा है जो उसकी माँ आशु के साथ हुआ. नितु की डिलीवरी के बाद मुझे और नितु को शहर वापस जाना होगा और फिर यहाँ साक्षी अकेली हो जायेगी. अगर मैं उसे साथ ले भी जाऊँ तो वहाँ लोग पूछेंगे की हमारा रिश्ता क्या है? कानूनी तौर पर गोद ले कर मैं उसे अपना नाम दे पाउँगा और वो मुझे और नितु को अपने माँ-बाप कह सकेगी.समय के साथ ये बात दब जाएगी की वो नितु की बेटी नहीं है!" मैंने बात घुमा-फिर कर कही. थोड़ी बहुत न-नुकूर होने के बाद आखिर ताऊ जी और पिताजी मान गये. मैंने अगले ही दिन ये कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी और चूँकि नितु की कुछ जान-पहचान थी सो ये काम जल्दी से हो भी गया.मंत्री की जायदाद का सारा क्लेम मैंने कानूनी रूप से ठुकरा दिया और सारी जायदाद बूढ़े माँ-बाप की देख रेख करने वाले वृद्धाश्रम ट्रस्ट को दे दी गई.

नितु की डिलीवरी से ठीक एक दिन पहले हमें साक्षी के एडॉप्शन पेपर्स मिल गए और अब साक्षी कानूनी तौर पर मेरी बेटी बन गई थी. मैं ये खुशखबरी ले कर घर आया, नितु को पेपर्स दिए और उसे जोर-जोर से पढ़ के सुनाने को कहा. इधर मैंने साक्षी को अपनी गोद में उठा लिया और उसे चूमने लगा. नितु जैसे-जैसे पेपर्स के शब्द पढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे उसकी ख़ुशी बढ़ती जा रही थी. जब उसका पढ़ना पूरा हो गया तब मैंने साक्षी से सबके सामने कहा; "आज से मेरी बच्ची मुझे सब के सामने पापा कहेगी!" ये सुन कर साक्षी मुस्कुराने लगी और उसके मुँह से आवाज आने लगी; 'डा...ड....' इन्हें सुन कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैंने साक्षी को कस कर अपने गले लगा लिया. "मुझे भी मेरी बेटी के मुँह से मम्मी सुनना है!" नितु बोली और मैंने साक्षी को उसकी गोद में दे दिया. नितु ने साक्षी को गले लगाया और फिर उसके माथे को चूमते हुए बोली; "बेटा एक बार मम्मी बोलो!" पर साक्षी के मुँह से डा..ड...ही निकल रहा था जिसे सुन सब हँसने लगे. वो रात बड़ी खुशियों भरी निकली और इस ख़ुशी को देख ताऊ जी बैठे प्रार्थना करने लगे की अब कभी भी किसी की गन्दी नजर इस परिवार को ना लगे.

अगले दिन सब कुछ हँसी-ख़ुशी चल रहा था की दोपहर को खाने के बाद नितु ने मुझे अपने पास बुलाया और अनकंफर्टेबल होने की शिकायत की. मैं उसे और भाभी को ले कर तुरंत हॉस्पिटल पहुँचा, डॉक्टर ने बताया की घबराने की कोई बात नहीं है, नितु जल्द ही लेबर में जाने वाली हे. ठीक शाम को ४ बजे डॉक्टर ने उसे लेबर रूम में शिफ्ट किया, मैं थोड़ा घबराया हुआ था की जाने क्या होगा और उधर भाभी मेरा होंसला बढ़ाने लगी थी की सब ठीक ही होगा. पर मैं घबराया हुआ था तो भाभी ने घर फ़ोन कर के सब को बुला लिया. कुछ ही देर में पूरा घर हॉस्पिटल आ गया, भाभी ने माँ से कहा की वो साक्षी को मुझे सौंप दें| साक्षी जैसे ही मेरी गोद में आई मेरे दिल को कुछ चैन आया और ठीक उसी वक़्त नर्स बाहर आई और बोली; "सागर जी! मुबारक हो आपको जुड़वाँ बच्चे हुए हैं!" ये सुनते ही मैं ख़ुशी से उछल पड़ा और फ़ौरन नितु को मिलने कमरे में घुसा. नितु उस वक़्त बेहोश थी. मैंने डॉक्टर से पुछा तो उन्होंने बताया की नितु आराम कर रही है और घबराने की कोई बात नहीं हे. ये सुन आकर मेरी जान में जान आई! कुछ मिनट बाद नर्स दोनों बच्चों को ले कर आई, एक लड़का और एक लड़की! दोनों को देख कर मेरी आंखें छलछला गई. मैंने पहले साक्षी को माँ की गोद में दिया और बड़ी एहतियात से दोनों बच्चों को गोद में उठाया. ये बड़ा ही अनोखा पल था जिसने मेरे अंदर बड़ा अजीब सा बदलाव किया था. दोनों बच्चे शांत थे और सो रहे थे, उनकी सांसें तेज चल रही थी. मैंने एक-एक कर दोनों के माथे को चूमा, अगले ही पल मेरे चेहरे पर संतोष भरी मुस्कराहट आ गई. मेरी छोटी सी दुनिया आज पूरी हो गई थी! बारी-बारी से सब ने बच्चों को गोद में उठाया और उन्हें प्यार दिया. तब तक नितु भी जाग गई थी. मैं उसके पास पहुँचा और उसका दाहिना हाथ पकड़ कर उसके माथे को चूमा. "बेबी .... ट्वीन!!!!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा. नितु के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गई. इतने में भाभी मसखरी करते हुए बोलीं; "हाय राम! तुम दोनों सच्ची बेशर्म हो! हम सब के सामने ही ....!" भाभी बोलीं तो ताई जी ने उनके कान पकड़ लिए और बोलीं; "तो तू आँख बंद कर लेती!" ये सुन कर सारे हँस पडे. "अच्छा बेटा कोई नाम सोचा है तुम दोनों ने?" ताऊ जी ने पुछा तो नितु मेरी तरफ देखने लगी; "अनुज" मैंने कहा और मेरे पीछे-पीछे नितु बोली; "सृष्टी"! दोनों नाम सुन घरवाले खुश हो गए और ताऊ जी ने यही नाम रखने को कहा. कुछ देर बाद डॉक्टर साहिबा आईं और हमें मुबारकबाद दी. साथ ही उन्होंने मेरी तारीफ भी की कि मैंने नितु का इतना अच्छा ख्याल रखा की ट्वीन होने के बाद भी डिलीवरी में कोई परेशानी नहीं हुई. शाम को मैं नितु और बच्चों को लेकर घर आया, तो सारे विधि-विधान से हम घर के भीतर आये. रात को सोने के समय मैंने नितु से बात की; "थैंक यू! मेरी ये छोटी सी दुनिया पूरी करने के लिए!" उस समय पलंग पर तीनों बच्चे एक साथ सो रहे थे और ये ही मेरी दुनिया थी!

मेरे लिए तीनों बच्चों को संभालना एक चैलेंज था. जब एक रोता तो उसकी देखा देखि बाकी दो भी रोने लगते और तीनों को चुप कराते-कराते मेरा बैंड बज जाता. जब तीनों घुटनों पर चलने लायक हुए तब तो और गजब हुआ! तीनों घर भर में रेंगते हुए घूमते रहते! जब उन्हें तैयार करना होता तब तो और भी मजा आता क्योंकि एक को तैयार करने लगो बाकी दोनों भाग जाते. नितु मेरी मदद करती तब भी एक तो भाग ही जाता और जब तक उसे तैयार करते बाकी दोनों अपने कपडे गंदे कर लेते.मैं और नितु हँस-हँस के पागल हो जाते. मेरे दोस्त मोहित ने तो मुझे एक स्पेशल ट्रीपलेट कॅरी बॅग ले कर दिया जिससे मैं तीनों को एक साथ गोद में उठा सकता था.२७ साल बाद.......

दिन प्यार-मोहब्बत भरे बीतने लगे और बच्चे धीरे-धीरे बड़े होने लगे, मैं और नितु दोनों ही के बाल अब सफ़ेद हो गए थे पर हमारा प्यार अब भी वैसा का वैसा था. बच्चे बड़े ही फ़रमाबरदार निकले, कोई गलत काम या कोई बुरी आदत नहीं थी उनमें, ये नितु और मेरी परवरिश का ही नतीजा था. साल बीते और फिर जब साक्षी शादी के लायक हुई तो मैंने उसे अपने पास बिठा कर सारा सच बयान कर दिया. वो चुप-चाप सुनती रही और उसकी आँखें भर आई. वो उठी और मेरे गले लग कर रो पड़ी; "पापा... आई स्टील लव यू! आपने जो किया वो हालात के आगे मजबूर हो कर किया, अगर आपने वो नहीं किया होता तो शायद आज ये सब नहीं होता. आप कभी भी इसके लिए खुद को दोषी मत मानना, मुझे गर्व है की मैं आपकी बेटी हूँ! और माँ... आपने जितना प्यार मुझे दिया शायद उतना मेरी सगी माँ भी नहीं देती. मेरे लिए आप ही मेरे माता-पिता हो, वो (आशु) जैसी भी थी मेरा पास्ट थी... उनकी गलती ये थी की उन्होंने कभी पापा के प्यार को नहीं समझा अगर समझती तो इतनी बड़ी गलती कभी नहीं करती!" इतना कह कर साक्षी ने हम दोनों को एक साथ अपने गले लगा लिया. साक्षी के मुँह से इतनी बड़ी बात सुन कर हम दोनों ही खुद पर गर्व महसूस कर रहे थे. आज मुझे मेरे द्वारे किये गए पाप से मुक्ति मिल गई थी!

साक्षी की शादी बड़े धूम-धाम से हुई और विदाई के समय वो हमारे गले लग कर बहुत रोई भी. कुछ समय बाद उसने अपने माँ बनने की खुश खबरी दी....

उसके माँ बनने के साल भर बाद अनुज की शादी हुई, उसे युएस में एक अच्छी जॉब मिल गई और वो हमें अपने साथ ले जाना चाहता था पर नितु ने मना कर दिया और हमने हँसी-ख़ुशी उसे वहाँ सेटल कर दिया. कुछ महीने बाद सृष्टी के लिए बड़ा अच्छा रिश्ता आया.सृष्टी की शादी भी बड़े धूम-धाम से हुई. हमारे तीनों बच्चे सेटल हो गए थे और हम दोनों से खुशनसीब इंसान शायद ही और कोई होता.

एक दिन शाम को मैं और नितु चाय पी रहे थे की नितु बोली; "थैंक यू आपको की आपने इस प्यारी दुनिया को इतने प्यार से सींचा!" ये थैंक यू उस थैंक यू का जवाब था जो मैंने नितु को अनुज और सृष्टी के पैदा होने के बाद दिया था. हम दोनों गाँव लौट आये और अपने जीवन के अंतिम दिन हाथों में हाथ लिए गुजारे. ऐसे ही एक सुबह हम दोनों के जीवन की शाम साबित हुई....!रात को जो हाथ में हाथ ले कर सोये की फिर सुबह आँख ही नहीं खुली और दोनों ख़ुशी-ख़ुशी एक साथ इस दुनिया से विदा हो गए!
 
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