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Guest
इधर जब अश्विनी का पेट हँस-हँस कर दुःख गया तब वो अपनी हँसी रोकते हुए बोली; "ये जो साक्षी को खो देना का डर तेरे पति के मन में है ना इससे कई गुना ज्यादा डर मैंने झेला है!" अश्विनी ने गंभीर होते हुए कहा. "पता है कैसा लगता है जब कोई तुम्हारी जान लेने घर में घुस आता है? मुझे पता है.... सब कुछ था मेरे पास...पैसा, घर, नौकर-चाकर, गाडी, इतना बड़ा घर, रुतबा.... इस घर का हर एक शक़्स गर्व महसूस कर रहा था. सिर्फ और सिर्फ मेरी वजह से! मेरी वजह से उन्हें इतने बड़े घर से नाता जोड़ने का मौका मिला था! क्या गलती थी मेरी? क्या एक लड़की को चैन की जिंदगी जीने का हक़ नहीं होता? सागर मुझे ये सब कभी नहीं दे सकता था. इसलिए मैंने उसे छोड़ दिया! बिग डील?! पर उसने मुझे बद्दुआ दी....ऐसी बद्दुआ जिसने मेरे हँसते-खेलते जीवन में आग लगा दी थी! मैं प्रेग्नेंट थी....तुम्हार पति के 'बीज' से! हाँ मैंने ये सच कभी रक्षित को नहीं बताया ...खुदगर्जी की...तो क्या? पर फिर वो काली रात आई मेरे जिंदगी में, वो चार लोग घर में घुस आये और गोलियाँ चलाने लगे. मैं कितना डर गई थी. पर रक्षित ने मुझे संभाला और मुझे ऊपर के स्टोर रूम में छुपने को कहा. मैं ऊपर पहुँची और स्टोर रूम के दरवाजे के पीछे छुप गई. मैंने अपने पूरे परिवार की चीखें सुनी! सोच सकती हो वो डर क्या होता है? वो लोग मुझे ढूंढते हुए ऊपर आ गए और स्टोर रूम के बाहर खड़े हो गये. मैंने साँस लेना रोक लिया था क्योंकि अगर उन्हें मेरी साँस लेने की आवाज सुनाई दे जाती तो वो मुझे भी मार देते! वो तो मेरी क़िस्मत थी की मैं बच गई और सुबह होने तक वहीँ छुपी रही.
सुबह जब वहाँ से निकली तो सबसे पहले अपनी पति की लाश देखि और उसे खून में लथ-पथ देख मैंने अपने होश खो दिए!
जब होश आया तो मैं हॉस्पिटल के बेड पर थी और मेरे आस-पास सब थे! होश आने के बाद मैंने दो दिन तक किसी से बात नहीं की, क्योंकि मेरे मन में जो आग लगी थी वो थी तुम्हारे पति से बदला लेने की! फिर साक्षी पैदा हुई और जानती हो मैंने उसका नाम 'साक्षी' क्यों रखा? क्योंकि मैं अपने दुश्मन का नाम भूलना नहीं चाहती थी. आखिर ये नाम उसी ने मुझे बताया था! एक-एक दिन मैंने जलते हुए काटा फिर छोटी दादी (मेरी माँ) का ड्रामा शुरू हो गया और घर में तुम्हारे पति की वापसी की बातें चलने लगी. यही वो समय था जब मैंने उससे बदला लेने का प्लान बनाना शुरू कर दिया. पर मेरे पास कोई जरिया नहीं था. उसकी कोई कमजोरी नहीं थी. इसलिए मैंने कमजोरी पैदा करने की सोची और साक्षी को जानबूझ कर उसकी गोद में डाल दिया. कुछ ही दिन में उसे साक्षी से प्यार हो गया, मुझे लगा शायद उसका मन मेरे लिए पिघल जायेगा और मैं एक बार फिर उसे अपने प्यार के चक्कर में फाँस कर उसका इस्तेमाल करूँ यहाँ से निकलने के लिए पर वो साला मेरे झांसे में ही नहीं आया. तो मैंने अपनी आखरी चाल चली और साक्षी को उससे दूर कर दिया! वो दो दिन वो जिस तरह तड़प-तड़प कर रोया उसे देख कर मेरे दिल को सुकून मिला! पर मेरी किस्मत ने मुझे एक बार फिर धोका दे दिया.....तुझे यहाँ भेज कर! बस तबसे मेरे सारे डाव उलटे पड़ने लगे! तुम दोनों को इस तरह रोमांस करते देख मेरा खून जलता है, कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब मैं तुम दोनों को बद्दुआ ना दूँ!" अश्विनी ने अपने दिल की साऱी बढास निकाल दी थी और नितु को ये सब सुन कर बहुत बड़ा झटका लगा. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की अश्विनी अपने अंदर इतना जहर पाले है! पर अब नितु के सब्र की इंतेहा हो चुकी थी. अश्विनी का एक और कड़वा शब्द और वो अपना आपा खो देती!
"वैसे इतना नशा करने के बाद तो जान रही नहीं होगी उसमें जो तुझे माँ बना सके? तभी तो उसने तुझे यहाँ भी दिया मेरे पास, भीख मांगने! नामर्द कहीं का!" अश्विनी घमंड में बोली
पर नितु ने उसे एक जोरदार जवाब देते हुए एक झन्नाटेदार तमाचा मारा. "उन्होंने मुझे यहाँ नहीं भेजा, मेरी मति मारी गई थी जो मैं यहाँ तुझे समझाने आई! तेरे साथ जो हुआ उसके लिए मुझे जरा भी अफ़सोस नहीं, तू इसी के लायक थी! बुरा लगता है तो सिर्फ उस लड़के के लिए जो तुझ जैसी मतलबी लड़की से प्यार कर बैठा! तेरी ही काली किस्मत खा गई उसे! भगवान् ने तुझे इतना प्यार करने वाला दिया जिसने तेरे पैदा होने से ले कर बड़े होने तक प्यार किया और तूने उसी के जज्बातों से खेला! तुझे समझाया था न 'इन्होने' की तेरे इस 'सो कॉल प्यार' में कितना खतरा है? बताया था न तुझे तेरी माँ की करनी पर तब तो तू 'इनसे' सच्चा प्यार करती थी! तब तो तू आग का दरिया पार करने को तैयार थी. जरा सी स्ट्रगल क्या करनी पड़ी तेरी हालत खराब हो गई! हो भी क्यों न, हराम का जो खाती आई है आजतक? मर यहाँ और सड़ती रह! "प्यार क्या होता है ये तुझे कुछ दिनों में पता चल जायेगा जब मैं इनके बच्चे की माँ बनूँगी! साक्षी के प्यार की कमी को तो मैं पूरा नहीं कर सकती पर जब इनकी गोद में हमारा बच्चा होगा तब ये खुद को संभाल ले लेंगे!" इतना कहते हुए नितु जाने को पलटी,
अश्विनी अपने गाल पर हाथ रखे खड़ी रही और रोती हुई बोली; "इस थप्पड़ का बदला तू याद रखेगी!"
नितु ने उसकी इस धमकी का कोई जवाब नहीं दिया और नीचे आ गई.
कुछ देर बाद भाभी, माँ और ताई जी कीर्तन से लौट आये. शाम तक मैं भी सबके साथ लौट आया और नितु में अलग सा बदलाव पाया. और दिन वो सिर्फ तभी घूंघट करती थी जब ताऊजी, पिताजी या गोपाल भैया सामने होते वरना वो सर पर पल्ला रखे काम करती पर आज मैं जब से आया था वो घूंघट काढ़े घूम रही थी और मुझसे नजरें चुरा रही थी. मैंने बहाने से उसे ऊपर आने को कहा तो उसने घूंघट किये हुए ही सर ना में हिला दिया. मैं समझ गया की कुछ तो बात है, मैं अपने कमरे में आया और वहाँ से आवाज लगा कर नितु को ऊपर बुलाया. आखिर नितु को ऊपर आना पड़ा और उसने अभी भी घूंघट कर रखा था.
मैंने फ़ौरन उसे अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर दिया. हाथ पकड़ कर नितु को पलंग पर बिठाया और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया.जैसे ही मैंने नितु का घूंघट उठाया तो उसकी आँखों को आसुओं से भरा हुआ पाया, मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो बिफर पड़ी; "आई एम सॉरी…. मैं अपना वादा पूरा नहीं कर सकी!” और फिर नितु ने रोते हुए साऱी बात बताई,
मैंने नितु की बात बड़े इत्मीनान से सुनी और जब उसकी बात खत्म हुई तब पहले उसके आँसू पोछे; "मेले बेबी ने मेले लिए इतना कुछ किया? पर ये बताओ आपको उसके मुँह लगने की क्या जरुरत थी? और जो आप उसे ऐशों-आराम देने की बात कर रहे थे उसके लिए हम पैसे कहाँ से लाते? बेबी मैं साक्षी से बहुत प्यार करता हूँ पर हालात ऐसे हैं की मैं उसे छह कर भी नहीं अपना सकता! कई बार जब कोई रास्ता नहीं रह जाता तो खुद को हालातों के सहारे छोड़ देना चाहिए! समय हमेशा एक सा नहीं रहता! कहने को तो जब उसने मेरा दिल तोडा तो मैं बहुत कुछ कर सकता था और उसकी शादी कभी होने नहीं देता पर मैंने ऐसा नहीं किया. मैंने खुद को हालात के सहारे छोड़ दिया और देखो मुझे आप मिल गए! आपने आज जो किया वो मेरे लिए बहुत है, रही बात साक्षी की तो.......देखते हैं क्या होता है!" मैंने नितु के सर को चूमा और उसे गले लगा लिया. इतने दिनों में मुझ में इतनी तो समझ आ गई थी की मैं साक्षी को अपना नाम नहीं दे सकता और रहा उसका मोह, तो वो भी मैं चाह कर भी नहीं छोड़ सकता. जानता था की जुदाई के समय बहुत दर्द होगा....पर सह लेंगे थोड़ा!
मैंने और नितु ने सब को हमारे न्यूयॉर्क जाने की बात बता दी थी और ये भी की वहाँ से लौट कर हमें बैंगलोर ही रहना हे. मेरा बैंगलोर रहने का फैसला घर में सब के लिए कष्टदाई था तो नितु बोली; "माँ आप चिंता ना करो, हम धीरे-धीरे अपना काम समेटना शुरू करते हैं और फिर लखनऊ में अपना ऑफिस शिफ्ट कर लेंगे! या फिर अपना मैं ऑफिस यहाँ खोल लेंगे!" नितु की बात सुन माँ को संतुष्टि हुई की उन बेटा उनके पास जल्द ही लौट आयेगा. इसी के साथ नितु ने सब को बैंगलोर आने का भी निमंत्रण दे दिया और सब ख़ुशी-ख़ुशी मान गये.
सुबह जब वहाँ से निकली तो सबसे पहले अपनी पति की लाश देखि और उसे खून में लथ-पथ देख मैंने अपने होश खो दिए!
जब होश आया तो मैं हॉस्पिटल के बेड पर थी और मेरे आस-पास सब थे! होश आने के बाद मैंने दो दिन तक किसी से बात नहीं की, क्योंकि मेरे मन में जो आग लगी थी वो थी तुम्हारे पति से बदला लेने की! फिर साक्षी पैदा हुई और जानती हो मैंने उसका नाम 'साक्षी' क्यों रखा? क्योंकि मैं अपने दुश्मन का नाम भूलना नहीं चाहती थी. आखिर ये नाम उसी ने मुझे बताया था! एक-एक दिन मैंने जलते हुए काटा फिर छोटी दादी (मेरी माँ) का ड्रामा शुरू हो गया और घर में तुम्हारे पति की वापसी की बातें चलने लगी. यही वो समय था जब मैंने उससे बदला लेने का प्लान बनाना शुरू कर दिया. पर मेरे पास कोई जरिया नहीं था. उसकी कोई कमजोरी नहीं थी. इसलिए मैंने कमजोरी पैदा करने की सोची और साक्षी को जानबूझ कर उसकी गोद में डाल दिया. कुछ ही दिन में उसे साक्षी से प्यार हो गया, मुझे लगा शायद उसका मन मेरे लिए पिघल जायेगा और मैं एक बार फिर उसे अपने प्यार के चक्कर में फाँस कर उसका इस्तेमाल करूँ यहाँ से निकलने के लिए पर वो साला मेरे झांसे में ही नहीं आया. तो मैंने अपनी आखरी चाल चली और साक्षी को उससे दूर कर दिया! वो दो दिन वो जिस तरह तड़प-तड़प कर रोया उसे देख कर मेरे दिल को सुकून मिला! पर मेरी किस्मत ने मुझे एक बार फिर धोका दे दिया.....तुझे यहाँ भेज कर! बस तबसे मेरे सारे डाव उलटे पड़ने लगे! तुम दोनों को इस तरह रोमांस करते देख मेरा खून जलता है, कोई ऐसा दिन नहीं जाता जब मैं तुम दोनों को बद्दुआ ना दूँ!" अश्विनी ने अपने दिल की साऱी बढास निकाल दी थी और नितु को ये सब सुन कर बहुत बड़ा झटका लगा. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की अश्विनी अपने अंदर इतना जहर पाले है! पर अब नितु के सब्र की इंतेहा हो चुकी थी. अश्विनी का एक और कड़वा शब्द और वो अपना आपा खो देती!
"वैसे इतना नशा करने के बाद तो जान रही नहीं होगी उसमें जो तुझे माँ बना सके? तभी तो उसने तुझे यहाँ भी दिया मेरे पास, भीख मांगने! नामर्द कहीं का!" अश्विनी घमंड में बोली
पर नितु ने उसे एक जोरदार जवाब देते हुए एक झन्नाटेदार तमाचा मारा. "उन्होंने मुझे यहाँ नहीं भेजा, मेरी मति मारी गई थी जो मैं यहाँ तुझे समझाने आई! तेरे साथ जो हुआ उसके लिए मुझे जरा भी अफ़सोस नहीं, तू इसी के लायक थी! बुरा लगता है तो सिर्फ उस लड़के के लिए जो तुझ जैसी मतलबी लड़की से प्यार कर बैठा! तेरी ही काली किस्मत खा गई उसे! भगवान् ने तुझे इतना प्यार करने वाला दिया जिसने तेरे पैदा होने से ले कर बड़े होने तक प्यार किया और तूने उसी के जज्बातों से खेला! तुझे समझाया था न 'इन्होने' की तेरे इस 'सो कॉल प्यार' में कितना खतरा है? बताया था न तुझे तेरी माँ की करनी पर तब तो तू 'इनसे' सच्चा प्यार करती थी! तब तो तू आग का दरिया पार करने को तैयार थी. जरा सी स्ट्रगल क्या करनी पड़ी तेरी हालत खराब हो गई! हो भी क्यों न, हराम का जो खाती आई है आजतक? मर यहाँ और सड़ती रह! "प्यार क्या होता है ये तुझे कुछ दिनों में पता चल जायेगा जब मैं इनके बच्चे की माँ बनूँगी! साक्षी के प्यार की कमी को तो मैं पूरा नहीं कर सकती पर जब इनकी गोद में हमारा बच्चा होगा तब ये खुद को संभाल ले लेंगे!" इतना कहते हुए नितु जाने को पलटी,
अश्विनी अपने गाल पर हाथ रखे खड़ी रही और रोती हुई बोली; "इस थप्पड़ का बदला तू याद रखेगी!"
नितु ने उसकी इस धमकी का कोई जवाब नहीं दिया और नीचे आ गई.
कुछ देर बाद भाभी, माँ और ताई जी कीर्तन से लौट आये. शाम तक मैं भी सबके साथ लौट आया और नितु में अलग सा बदलाव पाया. और दिन वो सिर्फ तभी घूंघट करती थी जब ताऊजी, पिताजी या गोपाल भैया सामने होते वरना वो सर पर पल्ला रखे काम करती पर आज मैं जब से आया था वो घूंघट काढ़े घूम रही थी और मुझसे नजरें चुरा रही थी. मैंने बहाने से उसे ऊपर आने को कहा तो उसने घूंघट किये हुए ही सर ना में हिला दिया. मैं समझ गया की कुछ तो बात है, मैं अपने कमरे में आया और वहाँ से आवाज लगा कर नितु को ऊपर बुलाया. आखिर नितु को ऊपर आना पड़ा और उसने अभी भी घूंघट कर रखा था.
मैंने फ़ौरन उसे अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर दिया. हाथ पकड़ कर नितु को पलंग पर बिठाया और उसके सामने घुटनों पर बैठ गया.जैसे ही मैंने नितु का घूंघट उठाया तो उसकी आँखों को आसुओं से भरा हुआ पाया, मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो बिफर पड़ी; "आई एम सॉरी…. मैं अपना वादा पूरा नहीं कर सकी!” और फिर नितु ने रोते हुए साऱी बात बताई,
मैंने नितु की बात बड़े इत्मीनान से सुनी और जब उसकी बात खत्म हुई तब पहले उसके आँसू पोछे; "मेले बेबी ने मेले लिए इतना कुछ किया? पर ये बताओ आपको उसके मुँह लगने की क्या जरुरत थी? और जो आप उसे ऐशों-आराम देने की बात कर रहे थे उसके लिए हम पैसे कहाँ से लाते? बेबी मैं साक्षी से बहुत प्यार करता हूँ पर हालात ऐसे हैं की मैं उसे छह कर भी नहीं अपना सकता! कई बार जब कोई रास्ता नहीं रह जाता तो खुद को हालातों के सहारे छोड़ देना चाहिए! समय हमेशा एक सा नहीं रहता! कहने को तो जब उसने मेरा दिल तोडा तो मैं बहुत कुछ कर सकता था और उसकी शादी कभी होने नहीं देता पर मैंने ऐसा नहीं किया. मैंने खुद को हालात के सहारे छोड़ दिया और देखो मुझे आप मिल गए! आपने आज जो किया वो मेरे लिए बहुत है, रही बात साक्षी की तो.......देखते हैं क्या होता है!" मैंने नितु के सर को चूमा और उसे गले लगा लिया. इतने दिनों में मुझ में इतनी तो समझ आ गई थी की मैं साक्षी को अपना नाम नहीं दे सकता और रहा उसका मोह, तो वो भी मैं चाह कर भी नहीं छोड़ सकता. जानता था की जुदाई के समय बहुत दर्द होगा....पर सह लेंगे थोड़ा!
मैंने और नितु ने सब को हमारे न्यूयॉर्क जाने की बात बता दी थी और ये भी की वहाँ से लौट कर हमें बैंगलोर ही रहना हे. मेरा बैंगलोर रहने का फैसला घर में सब के लिए कष्टदाई था तो नितु बोली; "माँ आप चिंता ना करो, हम धीरे-धीरे अपना काम समेटना शुरू करते हैं और फिर लखनऊ में अपना ऑफिस शिफ्ट कर लेंगे! या फिर अपना मैं ऑफिस यहाँ खोल लेंगे!" नितु की बात सुन माँ को संतुष्टि हुई की उन बेटा उनके पास जल्द ही लौट आयेगा. इसी के साथ नितु ने सब को बैंगलोर आने का भी निमंत्रण दे दिया और सब ख़ुशी-ख़ुशी मान गये.