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राजेश्वर ने अपने आपको छुड़ाने का अथवा जैकी और अशरफ को प्रतिरोध करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। उसने अपने आपको उनके हवाले कर दिया और उठता हुआ बड़े आराम से विजय से बोला- ‘तो तुमने मुझे पहचान ही लिया?’
‘तुमसे तो मुझे सच्चा प्यार है लूमड़ भाई।’ विजय अपने दिल पर हाथ रखकर एक ठंडी सांस के साथ बोला- ‘क्या कभी कोई सच्चे प्यार वाली आँखों से भी छुप सका है?’
अशरफ आश्चर्यचकित था। उसे यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ था कि वह व्यक्ति जिसने जहाज पर अपने हीरों के चले जाने का स्टंट बनाया था। वास्तव में अलफांसे है। वह निर्दोष व्यक्ति जिससे अशरफ अलफांसे समझे हुए था, व्यर्थ में ही उसे डराता रहा।
‘वैसे संसार की कोई शक्ति ऐसी नहीं है जो अलफांसे को बांधकर रख सके।’ अलफांसे विजय को सम्बोधित करते हुए बोला।
‘बहुत गर्व है अपने आप पर?’
‘मैं चीज ही ऐसी हूं।’
‘अगर स्त्री होते जरूर मान लेता।’ विजय बोला-‘वैसे तुम मेरे सम्बन्ध में सुन लो। खैर सुनने से पहले यह बताओ कि क्या तुम जानते हो भारत में एक पुस्तक है आल्हा?’
‘जानता ही नहीं मैंने उसके भाग पढ़े भी हैं।’
‘अच्छा, तब तो काफी जीनियस आदमी हो।’ विजय उसे देखता हुआ बोला-‘खैर तुम उसमें लिखी हुई मेरे बारे में एक कविता सुनो। लिखा है।
एक को मारें दो मर जायें, तीसरा दहशत से गिर जाये।
और बड़ा लडै़या विजया बापू, याकी मार सही न जाये।।
‘तो बन्धुवर।’ विजय बोला-‘मैं ऐसी ही अजीब चीज हूं। इसलिए भलाई इसी में है कि तुम अपने आपको मेरे हवाले कर दो।’
इतने में एक पुलिस ऑफिसर जहाज पर से उतर कर उनके निकट आया और देखकर बोला-‘व्हाट इज दी मैटर... व्हाट इज दी मैटर।’
‘अल्फांसे जिसकी आपको तलाश थी।’ विजय ने बड़े ही नाटकीय ढंग से अलफांसे की ओर संकेत करते हुए कहा।
‘क्या मतलब?’ ऑफिसर कुछ चौंका।
‘जी हां। आज के शब्दकोष में अलफांसे का मतलब है अंगूठी चोर।’
‘यानि कि यही वह चोर है जिसने कि जहाज पर हीरे की अंगूठी चुराई थी।’
‘जी हां।’
‘लेकिन कैप्टेन ने तो कहा था कि चोर ने इनके भी लगभग पचास हजार रु. की लागत के हीरे चुरा लिये थे?’ ऑफिसर अभी तक आश्चर्य-चकित स्वर में ही बोल रहा था। उसका आश्चर्य उस समय और भी बढ़ गया जब उसने अलफांसे को स्वयं ही बोलते पाया।
वह कहा रहा था-‘जी दर असल एक झूठी खबर उड़ाई थी जिस पर कि सब लोगों ने विश्वास कर लिया। वास्तव में मेरे पास कोई हीरे इत्यादि नहीं थे।’
‘लेकिन...।’ ऑफिसर ने कुछ पूछना चाहा लेकिन अलफांसे ने उसे रोक दिया और बोला- ‘आप यही कहना चाहते हैं ताकि मेरी तलाशी लेने के बावजूद भी मेरे पास से हीरे की अंगूठी क्यों नहीं निकली। उसका कारण यह है कि जब आप लोगों को यह मालूम हो गया कि मेरे भी पचास हजार रुपये के हीरे चोरी चले गये हैं तो आपको मुझसे सहानुभूति हो गई और सही ढंग से मेरी तलाशी नहीं ली गई। अन्यथा मेेरे कैमरे के अन्दर से आपको वह अंगूठी अवश्य मिल जाती।’
अलफांसे ने अपना कैमरा खोला और उसमें से हीरे की अंगूठी निकाल कर ऑफिसर को देते हुए कहा-‘यह मेरी ओर से मिसेज बाटली-वाला को वापिस कर देना। मैं यह केवल इसलिए वापिस कर रहा हूं क्योंकि मेरा इरादा जेल जाने का है। इसलिए मैं यह वापिस कर रहा हूं। वापसी में अगर आवश्यकता अनुभव हुई तो मैं फिर इसे वापिस ले लूंगा।’
अलफांसे ने उपस्थित जनता पर ऐसा प्रभाव डाल दिया था कि जैसे वह कोई बहुत बड़ा जादूगर हो और उसने पूरी सभा को सम्मोहित कर दिया हो। उसके कृत्य से सब लोग उसे एक अजूबा समझने लगे थे। अपने जीवन में किसी ने भी ऐसा दिलेर चोर नहीे देखा था।
सबके साथ-साथ विजय पर भी उसका प्रभाव पड़ रहा था और वह अजीब-अजीब मुंह बना कर उसके इस प्रभाव को नष्ट करने की चेष्टा कर रहा था।
‘मुझे तो तुम्हारे साथ ही चलना पड़ेगा।’ अलफांसे विजय से बोला-‘मेरे ऊपर भारत में ही मुकदमा चलेगा। क्योंकि मैंने भारत में ही यह अपराध किए हैं। चलो मैं चलने को तैयार हूं। लेकिन मित्र इस बार हवाई जहाज से यात्रा करते हुए चलेंगे। खर्चा मैं दूंगा। जाने क्यों मुझे समुद्री सफर में मजा नहीं आया।’
(7)
न्यूयॉर्क के हवाई अड्डे पर ही विजय ने जैकी को विदा कर दिया और वह तीनों विमान में बैठ गये। विमान भारत के लिए उड़ चला।
विजय और अलफांसे एक ही सीट पर बैठे हुए थे। उससे पिछली सीट पर ही अशरफ बैठा हुआ था।
‘लेकिन प्यारे लूमड़ भाई।’ विजय ने अलफांसे से पूछा-‘उस आविष्कार का वह फार्मूला जो तुम मेरे यहाँ से लेकर आये थे वह कहाँ है?’
‘यह रहा मेरे पास।’ अलफांसे ने अपनी जेब में से वह कागज निकाले और उनमें से आधे उसने अपने बराबर की खिड़की खोलकर नीचे फेंक दिये। यह काम उसने इतनी जल्दी किया था कि विजय उसे रोक भी नहीं पाया।
‘अबे यह क्या किया?’ विजय ने उसके हाथ से बाकी के कागज छीनते हुए कहा।
‘कुछ नहीं।’ अलफांसे लापरवाही से बोला-‘इन आधे कागजों से तुम या तुम्हारे देश के वैज्ञानिक कुछ न मालूम कर सकेंगे। इसलिए बेहतर यह है कि तुम इन्हें भी फाड़ कर नीचे फेंक दो।’
लेकिन विजय ने उन्हें नीचे फेंकने की बजाय जेब में रख लिया।
‘तुम इस फार्मूले का क्या करते?’
‘किसी भी देश के हाथ ऊँची कीमत पर बेच देता।’ सादा सा उत्तर था।
‘लेकिन तुम्हें इनके सम्बन्ध में कैसे मालूम हुआ था?’
‘इसे तुम छोड़ो।’ अलफांसे इस प्रकार बोला जैसे वह कोई काफी बुजुर्ग व्यक्ति हो और विजय उसके सामने बच्चा है, ‘मैं समझ गया हूं कि तुम क्या चाहते हो। तुम इस समस्त कहानी को जानना चाहते हो। वह मैं तुम्हें बता देता हूं। कहानी इस प्रकार है कि जयसिंह की कम्पनी में चन्दन और रमण दोनों भाई मैनेजर थे। जयसिंह ने एक वैज्ञानिक भी पाल रखा था जो कि एक ऐसी वस्तु का आविष्कार करना चाहता था जो जमीन, पानी और आकाश सब जगह समान रूप से चल और उड़ सके। जयसिंह उसे इस आविष्कार को पूर्ण करने के लिए आर्थिक सहायता देता था। जयसिंह की चौथी पत्नी शीलकुमार पर फिदा हो गई और उससे प्रेम करने लगी। अब यह बात अज्ञात है कि शीलकुमार भी उससे प्रेम करता था अथवा नहीं। बहरहाल यह सच है कि दोनों एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखा करते थे। जिससे यही ज्ञात होता है कि दोनों तरफ थी आग बराबर लगी हुई। जयसिंह की पत्नी शीलकुमार द्वारा भेजे गए पत्रों को फाड़ कर फेंक देती थी लेकिन शीलकुमार न जाने क्या सोचकर उन्हें सम्हाल कर रखता गया।
एक दिन शीलकुमार अपने उस आविष्कार का फार्मूला बनाने में सफल हो गया। उसने इसकी सूचना उसी रात जयसिंह को दे दी। जयसिंह ने उससे वह फार्मूला मांगा लेकिन उसने इन्कार कर दिया। शीलकुमार जयसिंह से विदा हो गया तो जयसिंह ने दोनों भाईयों को जो कि उस समय उसकी कोठी में ही मौजूद थे, सब बातें बताई और उन्हें शीलकुमार से उस आविष्कार का फार्मूला प्राप्त करने के लिए कहा।
दोनों भाई शीलकुमार के पीछे चल दिये।
वह शीलकुमार को किसी प्रकार अपनी उसी कोठी में जिसमें कि आज कल तुम रह रहे हो, ले गए और वहाँ उससे वह फार्मूला माँगा। शीलकुमार के इन्कार करने पर उन्होंने जबर्दस्ती की और इस जबर्दस्ती में शीलकुमार मर गया।
दोनों भाईयों ने उसके पास से वह फार्मूला बरामद कर लिया। उनके साथ ही उन्हें जयसिंह की पत्नी के प्रेम पत्र भी मिले। उसके पश्चात उन्होंने शीलकुमार की लाश को लोहे की एक प्लेट के साथ जिसमें कि हुक्म के इक्के के निशान के बीच में सुराख था कोठी के कम्पाउन्ड में ही दफना दिया। वह प्लेट उसके साथ दफनाने से उनका क्या आशय था इसका पता मुझे नहीं लग सका।
दोनों चीजें हथियाने के बाद उन्होंने वे जयसिंह को न देकर अपने पास ही रख लीं और जयसिंह से उसके बदले में रकम माँगने लगे। जयसिंह ने उन्हें अपनी कम्पनी से बर्खास्त कर दिया उन दोनों भाईयों ने वह दोनों चीजें कहां छिपा कर रखी थी यह तो तुमने देख ही लिया है। लेकिन अन्तिम जगह पर उन्होंने केवल वह फार्मूला ही छुपाया था। प्रेमपत्र उन्होंने एक तस्वीर के सिर के पीछे पैदा होने वाले खाने में ही रख दिए थे।
किसी कारणवश वह दोनों भाई यह कोठी छोड़कर चले गये। लेकिन उन्होंने उन चीजों को वहीं छुपे रहने दिया। क्योंकि इससे बेहतर छुपाने की जगह उन्हें अभी तक नजर नहीं इई थी। इन चीजों का यहां छुपाकर वह निश्चिन्त थे।
न जाने किस प्रकार जयसिंह को उन तस्वीरों के खुलने का रहस्य मालूम हो गया। वह अपने मैनेजर के साथ कुछ किराये के गुन्डे लेकर तुम्हारी कोठी पर आया। तुम्हें बेहोश करके और रस्सियों से बाँध कर उसने लोहे के प्लेट पर बने हुए हुक्म के इक्के के निशान को बादशाह की छाती पर रख कर उस गोल सुराख में उंगली रखकर दबाई। तस्वीर का सिर आगे को झुक गया। जयसिंह ने उसके पीछे से अपनी पत्नी के प्रेमपत्र तो निकाल लिये लेकिन आठों तस्वीरों के पिछले खानों की तलाशी लेने के बावजूद भी उसे फार्मूला नहीं मिला। जिसके कारण जयसिंह निराश होकर वापिस आ गया।
उसके पश्चात जब अखबारों में यह खबर छपी तो चन्दन का भाई रमण प्रेमपत्र यथा स्थान देखने के लिए आ पहुंचा। लेकिन प्रेम पत्र अपने स्थान पर न पाकर उसने आत्महत्या कर ली। प्रेम पत्रों के स्थान पर ताश के पत्तों में से हुक्म का इक्का था जिसके बीच में कि गोल सुराख था। उसने आत्महत्या केवल इसलिए की थी क्योंकि उसने और चन्दन ने जयसिंह से यह कहा था कि जिस रोज वह उनसे अपनी पत्नी के प्रेम पत्र वसूल कर लेगा तो वह दोनों आत्महत्या कर लेंगे।
रमण ने अपना वायदा पूरा करके यह दिखा दिया कि पुराने जमाने के मूर्खों की अभी भी इस दुनिया में कोई कमी नहीं है।
‘क्या यह सही है कि वह केवल प्रेम पत्र अपने स्थान से गायब देखकर ही आत्महत्या करने की मूर्खता कर बैठा?’ पीछे बैठे हुए अशरफ ने जोकि ध्यान पूर्वक अलफांसे की बातें सुन रहा था बोला।
‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि वह परले सिरे का मूर्ख था। अन्यथा आत्महत्या करने का कोई और कारण नजर नहीं आ रहा है।’ अलफांसे बोला- ‘वैसे इस प्रकार के मूर्ख आज से चार सौ पांच सौ वर्ष पहले तो हुआ करते थे लेकिन...,’
‘लेकिन अब कुछ दूसरे प्रकार के मूर्ख होते हैं। जैसे कि तुम।’ विजय बोला। अलफांसे ने किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं की।
‘तुम्हें उस लाश के कोठी के कम्पाउन्ड में होने के सम्बन्ध में कैसे पता चला?’ कुछ देर बाद विजय ने पूछा।
‘मैं एक बार चन्दन से भी मिला था और उसी समय उसकी बातों से मैंने यह मतलब निकाल लिया था कि उन्होंने उस वैज्ञानिक की हत्या कर दी है और उसे कहीं कोठी में दबा दिया है। मैंने कम्पाउन्ड का अच्छी प्रकार से निरीक्षण किया और एक स्थान की मिट्टी कुछ पीली और दूसरे स्थान की मिट्टी से कुछ भिन्न थी। मैंने वहां पर खुदाई की और कुछ उसमें से निकला था वह तुमने देख ही लिया था।’
‘कैसे न देखता।’ विजय बड़े ही फूहड़पन से बोला-‘भगवान ने यह आँख देखने के लिए ही तो दी हैं।’
‘वैसे तुम्हें मेरे सम्बन्ध में इतनी जल्दी कैसे पता चल गया कि मैंने इस जहाज से भागने का प्रबन्ध कर रखा है।’
‘तभी तो मैं कहता हूं कि मुझ से डरो।’ विजय छाती फुलाकर बोला- ‘मैं बहुत महान व्यक्ति हूं। यह दूसरी बात है कि काम कोई बहुत महान नहीं था।’
‘तुमने किया क्या था?’
‘मैंने विमान द्वारा और पानी के जहाज द्वारा सफर करने वाले समस्त यात्रियों की सूची प्राप्त कर ली थी और उनके पतों पर थोड़ी बहुत जानकारी भी प्राप्त कर ली थी। केवल तुम्हारे बारे में सन्देह था। सो एक आदमी को सन्देह के कारण तुम्हारे पीछे लगा दिया था। बाद में जब मैंने तुम्हारे सम्बन्ध में और अधिक जानकारी प्राप्त करनी चाही तो कुछ भी प्राप्त नहीं कर सका। मेरा सन्देह और भी बढ़ गया और बाद में जब मैंने तुम्हे न्यूयॉर्क के तट पर उतरते देखा तो तुम्हारे मेकअप में होने के बावजूद भी मैं तुम्हें पहचान ही गया।’
‘तो तुम पुलिस में काम करते हो?’ अलफांसे का उससे पूछने का ढंग बिल्कुल ऐसा था जैसे किसी बहुत ही घनिष्ठ मित्र से बात कर रहा हो।
‘नहीं।’
‘फिर?’
‘मजे करते हैं।’
‘यह बहुत बुरा करते हैं।’ अलफांसे खामोश हो गया।
राजनगर के एयरपोर्ट पर उतरते ही विजय ने अलफांसे को रघुनाथ के हवाले कर दिया। रघुनाथ ने तुरन्त उसके हाथ में हथकड़ियाँ डाल दीं। जिस समय वह हथकड़ी डाल रहा था तो अलफांसे मुस्करा कर बोला- ‘व्यर्थ की मेहनत कर रहे हो सुपर। विश्वास करो मैं भागूंगा नहीं। मैं तो जरा भारत की जेल का निरीक्षण करना चाह रहा हूं। अन्यथा जब मैं भागना चाहूंगा तो तुम तो क्या संसार की कोई भी शक्ति मुझे न रोक सकेगी।’
‘अबे लूमड़ अगर ऐसी ही बात थी तो फिर तुम यहां से जहाज द्वारा अमरीका क्यों भागे थे?’
‘दरअसल मैं मूडी अर्थात सनकी आदमी हूं और दुनिया के मजे लेता फिर रहा हूं।’ अलफांसे ने मुस्करा कर कहा फिर रघुनाथ से बोला- ‘आओ सुपर चलें।’
रघुनाथ आश्चर्य चकित सा अलफांसे के साथ जीप में बैठ गया। जाते ही अशरफ विजय से बोला- ‘क्या यह सच है कि तुमने ही यात्रियों की तालिकाएँ लेकर उनके सम्बन्ध में छानबीन की थी?’
अशरफ का स्वर संदिग्ध था। विजय की समझ में नहीं आया कि वह किस प्रकार उसका सन्देह दूर करे। क्योंकि उसे डर था अगर अशरफ को यह मालूम हो गया कि वही सीक्रेट सर्विस का चीफ है तो बहुत बुरा होगा। लेकिन और कोई चारा भी नहीं था। इसलिए कुछ अभिनय सा करके बोला, ‘बिल्कुल देखते नहीं हो कि इन थोड़े से दिनों में ही मैंने इतनी मेहनत की है कि बिल्कुल सूख गया।’
‘झूठ बोलना बहुत बुरी बात है।’ उनके निकट से गुजरते हुए एक व्यक्ति ने पवन की सी भर्राई हुई आवाज में कहा।
अशरफ और विजय दोनों ही एक बारगी सकते में आ गये।
लेकिन विजय मन ही मन ब्लैकब्वाय के इस अभिनय पर खुश हो रहा था कि उसने मामले को किस खूबी से सम्हाल लिया।
ब्लैकब्वाय को उसने न्यूयॉर्क से ही एयरोड्रोम पर पहुंचने की सूचना दे दी थी। क्योंकि उसे विश्वास था कि अलफांसे कोई न कोई चाल अवश्य खेलेगा। लेकिन अलफांसे ने कुछ नहीं किया। उसने अशरफ से अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया।
और विजय की समस्त तैयारियाँ धरी रह गई।
◆◆◆
‘तुमसे तो मुझे सच्चा प्यार है लूमड़ भाई।’ विजय अपने दिल पर हाथ रखकर एक ठंडी सांस के साथ बोला- ‘क्या कभी कोई सच्चे प्यार वाली आँखों से भी छुप सका है?’
अशरफ आश्चर्यचकित था। उसे यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ था कि वह व्यक्ति जिसने जहाज पर अपने हीरों के चले जाने का स्टंट बनाया था। वास्तव में अलफांसे है। वह निर्दोष व्यक्ति जिससे अशरफ अलफांसे समझे हुए था, व्यर्थ में ही उसे डराता रहा।
‘वैसे संसार की कोई शक्ति ऐसी नहीं है जो अलफांसे को बांधकर रख सके।’ अलफांसे विजय को सम्बोधित करते हुए बोला।
‘बहुत गर्व है अपने आप पर?’
‘मैं चीज ही ऐसी हूं।’
‘अगर स्त्री होते जरूर मान लेता।’ विजय बोला-‘वैसे तुम मेरे सम्बन्ध में सुन लो। खैर सुनने से पहले यह बताओ कि क्या तुम जानते हो भारत में एक पुस्तक है आल्हा?’
‘जानता ही नहीं मैंने उसके भाग पढ़े भी हैं।’
‘अच्छा, तब तो काफी जीनियस आदमी हो।’ विजय उसे देखता हुआ बोला-‘खैर तुम उसमें लिखी हुई मेरे बारे में एक कविता सुनो। लिखा है।
एक को मारें दो मर जायें, तीसरा दहशत से गिर जाये।
और बड़ा लडै़या विजया बापू, याकी मार सही न जाये।।
‘तो बन्धुवर।’ विजय बोला-‘मैं ऐसी ही अजीब चीज हूं। इसलिए भलाई इसी में है कि तुम अपने आपको मेरे हवाले कर दो।’
इतने में एक पुलिस ऑफिसर जहाज पर से उतर कर उनके निकट आया और देखकर बोला-‘व्हाट इज दी मैटर... व्हाट इज दी मैटर।’
‘अल्फांसे जिसकी आपको तलाश थी।’ विजय ने बड़े ही नाटकीय ढंग से अलफांसे की ओर संकेत करते हुए कहा।
‘क्या मतलब?’ ऑफिसर कुछ चौंका।
‘जी हां। आज के शब्दकोष में अलफांसे का मतलब है अंगूठी चोर।’
‘यानि कि यही वह चोर है जिसने कि जहाज पर हीरे की अंगूठी चुराई थी।’
‘जी हां।’
‘लेकिन कैप्टेन ने तो कहा था कि चोर ने इनके भी लगभग पचास हजार रु. की लागत के हीरे चुरा लिये थे?’ ऑफिसर अभी तक आश्चर्य-चकित स्वर में ही बोल रहा था। उसका आश्चर्य उस समय और भी बढ़ गया जब उसने अलफांसे को स्वयं ही बोलते पाया।
वह कहा रहा था-‘जी दर असल एक झूठी खबर उड़ाई थी जिस पर कि सब लोगों ने विश्वास कर लिया। वास्तव में मेरे पास कोई हीरे इत्यादि नहीं थे।’
‘लेकिन...।’ ऑफिसर ने कुछ पूछना चाहा लेकिन अलफांसे ने उसे रोक दिया और बोला- ‘आप यही कहना चाहते हैं ताकि मेरी तलाशी लेने के बावजूद भी मेरे पास से हीरे की अंगूठी क्यों नहीं निकली। उसका कारण यह है कि जब आप लोगों को यह मालूम हो गया कि मेरे भी पचास हजार रुपये के हीरे चोरी चले गये हैं तो आपको मुझसे सहानुभूति हो गई और सही ढंग से मेरी तलाशी नहीं ली गई। अन्यथा मेेरे कैमरे के अन्दर से आपको वह अंगूठी अवश्य मिल जाती।’
अलफांसे ने अपना कैमरा खोला और उसमें से हीरे की अंगूठी निकाल कर ऑफिसर को देते हुए कहा-‘यह मेरी ओर से मिसेज बाटली-वाला को वापिस कर देना। मैं यह केवल इसलिए वापिस कर रहा हूं क्योंकि मेरा इरादा जेल जाने का है। इसलिए मैं यह वापिस कर रहा हूं। वापसी में अगर आवश्यकता अनुभव हुई तो मैं फिर इसे वापिस ले लूंगा।’
अलफांसे ने उपस्थित जनता पर ऐसा प्रभाव डाल दिया था कि जैसे वह कोई बहुत बड़ा जादूगर हो और उसने पूरी सभा को सम्मोहित कर दिया हो। उसके कृत्य से सब लोग उसे एक अजूबा समझने लगे थे। अपने जीवन में किसी ने भी ऐसा दिलेर चोर नहीे देखा था।
सबके साथ-साथ विजय पर भी उसका प्रभाव पड़ रहा था और वह अजीब-अजीब मुंह बना कर उसके इस प्रभाव को नष्ट करने की चेष्टा कर रहा था।
‘मुझे तो तुम्हारे साथ ही चलना पड़ेगा।’ अलफांसे विजय से बोला-‘मेरे ऊपर भारत में ही मुकदमा चलेगा। क्योंकि मैंने भारत में ही यह अपराध किए हैं। चलो मैं चलने को तैयार हूं। लेकिन मित्र इस बार हवाई जहाज से यात्रा करते हुए चलेंगे। खर्चा मैं दूंगा। जाने क्यों मुझे समुद्री सफर में मजा नहीं आया।’
(7)
न्यूयॉर्क के हवाई अड्डे पर ही विजय ने जैकी को विदा कर दिया और वह तीनों विमान में बैठ गये। विमान भारत के लिए उड़ चला।
विजय और अलफांसे एक ही सीट पर बैठे हुए थे। उससे पिछली सीट पर ही अशरफ बैठा हुआ था।
‘लेकिन प्यारे लूमड़ भाई।’ विजय ने अलफांसे से पूछा-‘उस आविष्कार का वह फार्मूला जो तुम मेरे यहाँ से लेकर आये थे वह कहाँ है?’
‘यह रहा मेरे पास।’ अलफांसे ने अपनी जेब में से वह कागज निकाले और उनमें से आधे उसने अपने बराबर की खिड़की खोलकर नीचे फेंक दिये। यह काम उसने इतनी जल्दी किया था कि विजय उसे रोक भी नहीं पाया।
‘अबे यह क्या किया?’ विजय ने उसके हाथ से बाकी के कागज छीनते हुए कहा।
‘कुछ नहीं।’ अलफांसे लापरवाही से बोला-‘इन आधे कागजों से तुम या तुम्हारे देश के वैज्ञानिक कुछ न मालूम कर सकेंगे। इसलिए बेहतर यह है कि तुम इन्हें भी फाड़ कर नीचे फेंक दो।’
लेकिन विजय ने उन्हें नीचे फेंकने की बजाय जेब में रख लिया।
‘तुम इस फार्मूले का क्या करते?’
‘किसी भी देश के हाथ ऊँची कीमत पर बेच देता।’ सादा सा उत्तर था।
‘लेकिन तुम्हें इनके सम्बन्ध में कैसे मालूम हुआ था?’
‘इसे तुम छोड़ो।’ अलफांसे इस प्रकार बोला जैसे वह कोई काफी बुजुर्ग व्यक्ति हो और विजय उसके सामने बच्चा है, ‘मैं समझ गया हूं कि तुम क्या चाहते हो। तुम इस समस्त कहानी को जानना चाहते हो। वह मैं तुम्हें बता देता हूं। कहानी इस प्रकार है कि जयसिंह की कम्पनी में चन्दन और रमण दोनों भाई मैनेजर थे। जयसिंह ने एक वैज्ञानिक भी पाल रखा था जो कि एक ऐसी वस्तु का आविष्कार करना चाहता था जो जमीन, पानी और आकाश सब जगह समान रूप से चल और उड़ सके। जयसिंह उसे इस आविष्कार को पूर्ण करने के लिए आर्थिक सहायता देता था। जयसिंह की चौथी पत्नी शीलकुमार पर फिदा हो गई और उससे प्रेम करने लगी। अब यह बात अज्ञात है कि शीलकुमार भी उससे प्रेम करता था अथवा नहीं। बहरहाल यह सच है कि दोनों एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखा करते थे। जिससे यही ज्ञात होता है कि दोनों तरफ थी आग बराबर लगी हुई। जयसिंह की पत्नी शीलकुमार द्वारा भेजे गए पत्रों को फाड़ कर फेंक देती थी लेकिन शीलकुमार न जाने क्या सोचकर उन्हें सम्हाल कर रखता गया।
एक दिन शीलकुमार अपने उस आविष्कार का फार्मूला बनाने में सफल हो गया। उसने इसकी सूचना उसी रात जयसिंह को दे दी। जयसिंह ने उससे वह फार्मूला मांगा लेकिन उसने इन्कार कर दिया। शीलकुमार जयसिंह से विदा हो गया तो जयसिंह ने दोनों भाईयों को जो कि उस समय उसकी कोठी में ही मौजूद थे, सब बातें बताई और उन्हें शीलकुमार से उस आविष्कार का फार्मूला प्राप्त करने के लिए कहा।
दोनों भाई शीलकुमार के पीछे चल दिये।
वह शीलकुमार को किसी प्रकार अपनी उसी कोठी में जिसमें कि आज कल तुम रह रहे हो, ले गए और वहाँ उससे वह फार्मूला माँगा। शीलकुमार के इन्कार करने पर उन्होंने जबर्दस्ती की और इस जबर्दस्ती में शीलकुमार मर गया।
दोनों भाईयों ने उसके पास से वह फार्मूला बरामद कर लिया। उनके साथ ही उन्हें जयसिंह की पत्नी के प्रेम पत्र भी मिले। उसके पश्चात उन्होंने शीलकुमार की लाश को लोहे की एक प्लेट के साथ जिसमें कि हुक्म के इक्के के निशान के बीच में सुराख था कोठी के कम्पाउन्ड में ही दफना दिया। वह प्लेट उसके साथ दफनाने से उनका क्या आशय था इसका पता मुझे नहीं लग सका।
दोनों चीजें हथियाने के बाद उन्होंने वे जयसिंह को न देकर अपने पास ही रख लीं और जयसिंह से उसके बदले में रकम माँगने लगे। जयसिंह ने उन्हें अपनी कम्पनी से बर्खास्त कर दिया उन दोनों भाईयों ने वह दोनों चीजें कहां छिपा कर रखी थी यह तो तुमने देख ही लिया है। लेकिन अन्तिम जगह पर उन्होंने केवल वह फार्मूला ही छुपाया था। प्रेमपत्र उन्होंने एक तस्वीर के सिर के पीछे पैदा होने वाले खाने में ही रख दिए थे।
किसी कारणवश वह दोनों भाई यह कोठी छोड़कर चले गये। लेकिन उन्होंने उन चीजों को वहीं छुपे रहने दिया। क्योंकि इससे बेहतर छुपाने की जगह उन्हें अभी तक नजर नहीं इई थी। इन चीजों का यहां छुपाकर वह निश्चिन्त थे।
न जाने किस प्रकार जयसिंह को उन तस्वीरों के खुलने का रहस्य मालूम हो गया। वह अपने मैनेजर के साथ कुछ किराये के गुन्डे लेकर तुम्हारी कोठी पर आया। तुम्हें बेहोश करके और रस्सियों से बाँध कर उसने लोहे के प्लेट पर बने हुए हुक्म के इक्के के निशान को बादशाह की छाती पर रख कर उस गोल सुराख में उंगली रखकर दबाई। तस्वीर का सिर आगे को झुक गया। जयसिंह ने उसके पीछे से अपनी पत्नी के प्रेमपत्र तो निकाल लिये लेकिन आठों तस्वीरों के पिछले खानों की तलाशी लेने के बावजूद भी उसे फार्मूला नहीं मिला। जिसके कारण जयसिंह निराश होकर वापिस आ गया।
उसके पश्चात जब अखबारों में यह खबर छपी तो चन्दन का भाई रमण प्रेमपत्र यथा स्थान देखने के लिए आ पहुंचा। लेकिन प्रेम पत्र अपने स्थान पर न पाकर उसने आत्महत्या कर ली। प्रेम पत्रों के स्थान पर ताश के पत्तों में से हुक्म का इक्का था जिसके बीच में कि गोल सुराख था। उसने आत्महत्या केवल इसलिए की थी क्योंकि उसने और चन्दन ने जयसिंह से यह कहा था कि जिस रोज वह उनसे अपनी पत्नी के प्रेम पत्र वसूल कर लेगा तो वह दोनों आत्महत्या कर लेंगे।
रमण ने अपना वायदा पूरा करके यह दिखा दिया कि पुराने जमाने के मूर्खों की अभी भी इस दुनिया में कोई कमी नहीं है।
‘क्या यह सही है कि वह केवल प्रेम पत्र अपने स्थान से गायब देखकर ही आत्महत्या करने की मूर्खता कर बैठा?’ पीछे बैठे हुए अशरफ ने जोकि ध्यान पूर्वक अलफांसे की बातें सुन रहा था बोला।
‘तभी तो मैं कह रहा हूं कि वह परले सिरे का मूर्ख था। अन्यथा आत्महत्या करने का कोई और कारण नजर नहीं आ रहा है।’ अलफांसे बोला- ‘वैसे इस प्रकार के मूर्ख आज से चार सौ पांच सौ वर्ष पहले तो हुआ करते थे लेकिन...,’
‘लेकिन अब कुछ दूसरे प्रकार के मूर्ख होते हैं। जैसे कि तुम।’ विजय बोला। अलफांसे ने किसी प्रकार की टिप्पणी नहीं की।
‘तुम्हें उस लाश के कोठी के कम्पाउन्ड में होने के सम्बन्ध में कैसे पता चला?’ कुछ देर बाद विजय ने पूछा।
‘मैं एक बार चन्दन से भी मिला था और उसी समय उसकी बातों से मैंने यह मतलब निकाल लिया था कि उन्होंने उस वैज्ञानिक की हत्या कर दी है और उसे कहीं कोठी में दबा दिया है। मैंने कम्पाउन्ड का अच्छी प्रकार से निरीक्षण किया और एक स्थान की मिट्टी कुछ पीली और दूसरे स्थान की मिट्टी से कुछ भिन्न थी। मैंने वहां पर खुदाई की और कुछ उसमें से निकला था वह तुमने देख ही लिया था।’
‘कैसे न देखता।’ विजय बड़े ही फूहड़पन से बोला-‘भगवान ने यह आँख देखने के लिए ही तो दी हैं।’
‘वैसे तुम्हें मेरे सम्बन्ध में इतनी जल्दी कैसे पता चल गया कि मैंने इस जहाज से भागने का प्रबन्ध कर रखा है।’
‘तभी तो मैं कहता हूं कि मुझ से डरो।’ विजय छाती फुलाकर बोला- ‘मैं बहुत महान व्यक्ति हूं। यह दूसरी बात है कि काम कोई बहुत महान नहीं था।’
‘तुमने किया क्या था?’
‘मैंने विमान द्वारा और पानी के जहाज द्वारा सफर करने वाले समस्त यात्रियों की सूची प्राप्त कर ली थी और उनके पतों पर थोड़ी बहुत जानकारी भी प्राप्त कर ली थी। केवल तुम्हारे बारे में सन्देह था। सो एक आदमी को सन्देह के कारण तुम्हारे पीछे लगा दिया था। बाद में जब मैंने तुम्हारे सम्बन्ध में और अधिक जानकारी प्राप्त करनी चाही तो कुछ भी प्राप्त नहीं कर सका। मेरा सन्देह और भी बढ़ गया और बाद में जब मैंने तुम्हे न्यूयॉर्क के तट पर उतरते देखा तो तुम्हारे मेकअप में होने के बावजूद भी मैं तुम्हें पहचान ही गया।’
‘तो तुम पुलिस में काम करते हो?’ अलफांसे का उससे पूछने का ढंग बिल्कुल ऐसा था जैसे किसी बहुत ही घनिष्ठ मित्र से बात कर रहा हो।
‘नहीं।’
‘फिर?’
‘मजे करते हैं।’
‘यह बहुत बुरा करते हैं।’ अलफांसे खामोश हो गया।
राजनगर के एयरपोर्ट पर उतरते ही विजय ने अलफांसे को रघुनाथ के हवाले कर दिया। रघुनाथ ने तुरन्त उसके हाथ में हथकड़ियाँ डाल दीं। जिस समय वह हथकड़ी डाल रहा था तो अलफांसे मुस्करा कर बोला- ‘व्यर्थ की मेहनत कर रहे हो सुपर। विश्वास करो मैं भागूंगा नहीं। मैं तो जरा भारत की जेल का निरीक्षण करना चाह रहा हूं। अन्यथा जब मैं भागना चाहूंगा तो तुम तो क्या संसार की कोई भी शक्ति मुझे न रोक सकेगी।’
‘अबे लूमड़ अगर ऐसी ही बात थी तो फिर तुम यहां से जहाज द्वारा अमरीका क्यों भागे थे?’
‘दरअसल मैं मूडी अर्थात सनकी आदमी हूं और दुनिया के मजे लेता फिर रहा हूं।’ अलफांसे ने मुस्करा कर कहा फिर रघुनाथ से बोला- ‘आओ सुपर चलें।’
रघुनाथ आश्चर्य चकित सा अलफांसे के साथ जीप में बैठ गया। जाते ही अशरफ विजय से बोला- ‘क्या यह सच है कि तुमने ही यात्रियों की तालिकाएँ लेकर उनके सम्बन्ध में छानबीन की थी?’
अशरफ का स्वर संदिग्ध था। विजय की समझ में नहीं आया कि वह किस प्रकार उसका सन्देह दूर करे। क्योंकि उसे डर था अगर अशरफ को यह मालूम हो गया कि वही सीक्रेट सर्विस का चीफ है तो बहुत बुरा होगा। लेकिन और कोई चारा भी नहीं था। इसलिए कुछ अभिनय सा करके बोला, ‘बिल्कुल देखते नहीं हो कि इन थोड़े से दिनों में ही मैंने इतनी मेहनत की है कि बिल्कुल सूख गया।’
‘झूठ बोलना बहुत बुरी बात है।’ उनके निकट से गुजरते हुए एक व्यक्ति ने पवन की सी भर्राई हुई आवाज में कहा।
अशरफ और विजय दोनों ही एक बारगी सकते में आ गये।
लेकिन विजय मन ही मन ब्लैकब्वाय के इस अभिनय पर खुश हो रहा था कि उसने मामले को किस खूबी से सम्हाल लिया।
ब्लैकब्वाय को उसने न्यूयॉर्क से ही एयरोड्रोम पर पहुंचने की सूचना दे दी थी। क्योंकि उसे विश्वास था कि अलफांसे कोई न कोई चाल अवश्य खेलेगा। लेकिन अलफांसे ने कुछ नहीं किया। उसने अशरफ से अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया।
और विजय की समस्त तैयारियाँ धरी रह गई।
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