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Thriller तरकीब

“अरे जुगल, वह बन्दा कहाँ है जिसे तुम गाजियवाद से लाए थे ?”–आरिफ ने पूछा।

“कौन ? मामा ? उन्हें तो कमरे में सेट किया हुआ है। उन्हें सब समझा दिया है कि जान की सलामती चाहिए तो जब तक केस चल रहा है चुपचाप आराम करो।”

“नहीं, यहाँ क्या दिक्कत है। अगर फार्म हाउस में घूमना चाहे तो घूमने दो।”

“ठीक है सर। अब आप कह रहे हो, तो सुबह शाम घुमा दिया करेंगे।”

“और सबसे बोल देना कि नाश्ता कर के ठीक दस बजे ऑफिस में आ जाए।

“जी।” ठीक दस बजे सभी लोग ऑफिस नुमा कमरे में मौजूद थे। सिर्फ देशराज और कर्नल साहब मौजूद नहीं थे। कर्नल साहब अपने दिल्ली स्थित घर चले गए थे, और देशराज की उपस्थिति आवश्यक नहीं थी। जैसा कि आप सभी लोगों को पता है कि हमारा ऑपरेशन क्लीन अब अपने आख़िरी चरण में है। सब कुछ शांतिपूर्वक निपट जाए और पर्फ़ेक्ट टाइमिंग से हो इसके लिए हमें हर चीज़ कई बार दोहरा लेनी चाहिए।”–आरिफ गंभीरता पूर्वक बोला।

सबने सहमति में सिर हिलाया।

“डॉक्टर प्रीति, इसमें आपका सबसे महत्वपूर्ण रोल है।” प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया।

“प्रीति जी वर्तमान हालात में ये ज़रूरी है कि उसकी मौत पर कोई हल्ला गुल्ला ना हो। अब ये आपके ऊपर है। क्योंकि एक बार आगे कदम बढ़ाने के बाद, मारेंगे तो हम उसे हर हाल में। अगर आपने उसे सतर्क किया, या और कोई घपला किया तो फिर हम उसके साथ आपको भी ठोक देंगे।”

“मैं कोई गड़बड़ नहीं करूँगी।”–डॉक्टर प्रीति भयभीत स्वर में बोली।

“फिर तो आपका फ़ायदा ही फ़ायदा है। उसकी सारी जायदाद, फैक्ट्री, बैंक बैलेन्स सब आपका। आनंद लूटिएगा ज़िंदगी का। वरना मुर्गे के साथ आपका भी अंतिम संस्कार हो जाएगा।”–आरिफ चेतावनीपूर्ण लहजे में बोला।

“मुझे हर हाल में ज़िंदा रहना है।”–वह दृढ़ स्वर में बोली।

“बढ़िया। तो अब अच्छी तरह एक बार फिर दोबारा से समझ लीजिए कि क्या और कैसे करना है।”–आरिफ बोला।

डॉक्टर प्रीति ने सिर हिलाया और ध्यान उसकी तरफ़ लगा दिया। आरिफ उसे समझाता रहा और पहले भी कई बार समझ चुकी प्रीति फिर एक बार समझने लगी।

“सब समझ गईं आप ?”–अपनी बात पूरी करके आरिफ ने पूछा।

“समझ गई। अच्छी तरह समझ गई।”–डॉक्टर प्रीति बोली।

“बाकी अपनी बहन राजेश्वरी देवी से आप मिल ही चुकी हैं। रणविजय से आपकी चैट चार दिन से चल ही रही है। वह लगातार आपसे अपनी ज़िंदगी में आने की विनती कर रहा है, तो आज शाम आप पिघल जाओ और उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लो। इजी।”

प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया।

“गुड इसके बाद जब आप भली भाँति कोठी में सेट हो जाएँ तो उसे कोई ऐसी दवाई दें, जिससे उसका गला ख़राब हो जाये और हल्का बुख़ार भी आ जाए। फिर आपको उस पर कोरोना का शक ज़ाहिर करके उसका कोरोना टेस्ट करवाना है। रिज़ल्ट नेगेटिव आए या पॉजिटिव आपके पास रिपोर्ट पॉज़िटिव की ही पहुँचेगी। फिर वह अपना इलाज कोठी के ही एक कमरे में कॉरेनटाइन होकर कराएगा और उस कमरे में केवल डॉक्टर आरिफ, कम्पाउण्डर अमित और आनंद, बतौर नर्स आहना ही जाएँगे और वह भी पी०पी०ई० किट पहन कर। पी०पी०ई० किट में कौन पहचानेगा किसी को ? और दो दिन बाद वह कोरोना से मर जाएगा। उसका मृत शरीर किट में पैक होगा। कोई उसे नहीं देख पाएगा और ऐसे ही पैक पैक उसका अंतिम संस्कार हो जाएगा। घरवालों के नाम पर कोई है नहीं। तो सब कुछ पत्नी डॉक्टर प्रीति को ही करना है, या बेटी डॉली को। और वैसे भी कोरोना के डर से कोई लाश के पास तक नहीं फटकेगा।”–आरिफ बोला। सबने सहमति में सिर हिलाया। डॉक्टर प्रीति ने भी।

“लेकिन मैं पत्नी कैसे सिद्ध होऊँगी।”–प्रीति झिझकते हुए बोली।

“वैसे तो मुर्गा ही शादी को कहेगा, तो जाकर मंदिर में कर लेना शादी और ना भी हो, तो भी हम बैठे हैं। हम बनवा कर देंगे काग़ज़। और वैसे भी डॉली इकलौती वारिस है। इसलिए जो आपसे कहा है, वह आपको ही मिलेगा। ये हमारा वादा है आपसे।”

“मुझे आप लोगों पर विश्वास है।”–प्रीति अनमने भाव से बोली।

“डॉक्टर प्रीति मैं आपसे कहती हूँ कि मैं और भाई सिर्फ अपने मम्मी-पापा का हिस्सा ही लेंगे। उस राक्षस का सारा पैसा आपका ही होगा।”–डॉली बोली।

“ठीक तो है ना मम्मी। हो जाएगा सब। मैं हूँ ना। मैं सब ठीक कर दूँगा।”–जुगल बोला।

डॉक्टर प्रीति ने उसकी तरफ़ देखकर बुरा सा मुँह बनाया।
 
शाम के चार ही बजे थे। रणविजय अपनी कोठी स्थित ऑफिस में बैठा सोच विचार में डूबा था। साला कुछ भी तो उसके हिसाब से नहीं हो रहा था। पार्टी में इन दोनों बुड्ढों ने सब प्लानिंग चौपट कर रखी है। उस कटियार से भी अभी तक कोई शुभ समाचार नहीं मिला था। उधर से हरी झंडी मिले, तो इधर वह अपनी पार्टी में बगावत का बिगुल फूँके। जल्दी ही विपक्ष द्वारा कोई बड़ा हंगामा ना हुआ, तो सरकार जो इस समय बैकफ़ुट पे दिख रही है, फ्रंटफुट पर खेलने लगेगी। इस समय कोई नया बखेड़ा ना हो जाए, इस वजह से तो इस साली काव्या का कुछ नहीं किया अब तक। कुछ कर रणविजय जल्दी ही कुछ कर।” उसने टेबल पर रखी घंटी बजाई। तत्काल अंदर से काव्या दौड़ती हुई आई।

“ड्रिंक का सामान ला।”–वह काव्या को नख से शिख तक देखते हुए बोला।

“जी।”–काव्या तुरंत अंदर को दौड़ गई। ज़रा देर में काव्या एक ट्रॉली खींचती हुई लाई और रणविजय के पास लगा कर रणविजय की तरफ़ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगी।

“भाग जा।” वह तुरंत अंदर को दौड़ गई। रणविजय ने एक पैग बनाया और एक ही साँस में पी गया। एक सिगरेट सुलगाई और छोटे छोटे कश लगाने लगा। यकायक कुछ ध्यान आया। उसने झपट कर मोबाइल उठाया और फेसबुक खोलकर देखने लगा। तुरंत उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। उसने चैट पढ़ी और टाइप करने में व्यस्त हो गया। उधर से भी तुरंत जवाब आया। जवाब मिलते ही उसने ऑफलाइन होकर एक नम्बर मिला दिया।

“हेल्लो।”–उधर से मधुर नारी स्वर आया।

“हेल्लो...प्रीति ?”–उसने हौले से पूछा।

“यस डॉक्टर प्रीति बोल रही हूँ। आप क़ौन ?”

“मैं रणविजय।”–वह सूख आए गले से बोला। दूसरी तरफ़ खामोशी छा गई।

“हेल्लो प्रीति।”–वह फिर बोला।

“विजय बहुत समय निकल गया। अब इस सब से क्या फ़ायदा ?”–उधर से धीमी आवाज़ में कहा गया।

“कुछ समय नहीं निकला प्रीति। मेरे लिए तो सब कुछ जैसे कल की बात है।”

“विजय मैंने तुम्हारी फ्रेंड रिक्वेस्ट ऐक्सेप्ट कर ली। हम दोस्तों की तरह बात कर सकते हैं।”

“प्रीति जो तुमने तब कहा, मैंने मान लिया था। जो तुम अब कहोगी, वह भी मान लूँगा। पर प्रीति तुम सिर्फ एक बार मेरी बात मान लो। बस एक बार। मैं तुम्हारे कदमों में दुनिया जहान की ख़ुशियाँ डाल देना चाहता हूँ।”

“विजय अब हमारी वह उम्र नहीं रही। मेरा एक जवान बेटा है। वह ऐब्नॉर्मल है विजय। उसे मेरी ज़रूरत है।”

“जो तुम्हारा बेटा, वह मेरा बेटा। हम रखेंगे उसका ध्यान। बस एक बार प्रीति, बस एक बार, मेरा कहना मान लो।”

“तुम क्या चाहते हो विजय ?”

“मुझसे शादी कर लो प्रीति। बस एक बार।”

“बस एक बार कर लूँ ?”–उधर से हँसने की आवाज़ आई।

“मतलब बस एक बार मेरी बात मान लो।”

“तुमने शादी नहीं की विजय ?”

“बहुत कुछ बताना है तुम्हें। मिलोगी तो बताऊँगा।”

“बहुत प्यार करते हो मुझसे ?”

“पता है तुम्हें।”

“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी विजय।”–उधर से अफ़सोस भरे लहजे में कहा गया।

“तो गलती सुधार लो अब।”–रणविजय लालसापूर्ण स्वर में बोला।

“ऐसा हो सकता है ?”–उधर से अनिश्चित सा स्वर आया।

“हाँ बोलो। आज ही पता चल जाएगा।”–रणविजय दृढ़ स्वर में बोला।

“हाँ।”

“क्या ?”–रणविजय को जैसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ।

“हाँ।”

“मैं आ रहा हूँ प्रीति।”

“आ जाओ विजय। अब बस आ जाओ।”

“अभी आता हूँ प्रीति, अभी आता हूँ।”

रणविजय ने मोबाइल ऑफ किया और बाहर को लपका।

*********************
 
फार्महाउस के पीछे की साइड घने पेड़ों की कतार थी। शहर के कोलाहल और प्रदूषण से दूर बहुत शांति और शुद्ध वातावरण था। डॉली नहाने गई तो राज वहाँ आ गया। पेड़ों से छनकर धूप आ रही थी। पास ही तरह तरह के फूलों के पौधों की कतार थी, जिन पर रंग बिरंगे फूल लगे हुए थे। उनकी सुगंध पूरे वातावरण में फैली हुई थी। राज को वह जगह ख़ासतौर पर पसंद थी। अभी वह इस सुंदर नज़ारे में खोया हुआ ही था कि उसे अपने पीछे आहट सुनाई दी। वह पलटा तो आरिफ को खड़े पाया।

“नमस्ते आरिफ भाई।”–उसने अभिवादन किया।

“नमस्ते राज । प्रकृति के नज़ारे लिए जा रहे हैं ?”–आरिफ मुस्कुराते हुए बोला।

“जी आरिफ भाई।”–राज संकोचपूर्वक बोला।

“राज मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। आओ आगे थोड़ा दूर चलते हैं। यहाँ डॉली आ सकती है और उसके सामने होने वाली बात नहीं है ये।”–आरिफ उसे ध्यान से देखते हुए बोला।

“जी चलिए।”–राज तनिक विस्मय से बोला। उसकी समझ में नहीं आया कि आरिफ को उससे अलग से क्या बात करनी है। दोनों उस कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ चले जो खेतों की तरफ़ जा रहा था।

“देखो राज , मैं डॉली को इस ऑपरेशन में शामिल नही कर सकता। हक़ीक़त में उसके करने लायक़ कोई काम है भी नही।”

उसकी समझ में नहीं आया कि आरिफ को उससे अलग से क्या बात करनी है। दोनों उस कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ चले जो खेतों की तरफ़ जा रहा था।

“देखो राज , मैं डॉली को इस ऑपरेशन में शामिल नही कर सकता। हक़ीक़त में उसके करने लायक़ कोई काम है भी नही।”

“वह तो मैं भी नहीं चाहता आरिफ़ भाई।”–राज तुरंत बोला।

“पर वह मानेगी नहीं।”–आरिफ बोला।

“जी बिलकुल नहीं मानेगी। तूफान खड़ा कर देगी।”–राज उसकी बात से सहमत होता हुआ बोला।

“ये काम उसे बिना बताए करना होगा।”

“कैसे आरिफ भाई ?”

“उसे बेहद महत्वपूर्ण बता कर किसी महत्वहीन काम पर लगाना होगा।”–आरिफ कुछ सोचता हुआ बोला।

“बहुत शातिर काइयाँ है वह। तुरंत भाँप जाएगी।”–राज तुरंत बोला।

“देखेंगे उसका शातिरपन भी। तुम साथ देना बस।”–आरिफ हँसा।

“वह तो आप निश्चिंत रहो।”–राज बोला।

“और एक बात है।”–आरिफ धीमे से बोला। “जी कहिए।”

“मैं तुम पर कितना विश्वास कर सकता हूँ ?”–आरिफ उसकी आँखों में झाँकता हुआ बोला।

“आरिफ भाई आप मुझ पर पूरा यक़ीन कर सकते हो। बेहिचक कहिए जो कहना है।”–राज दृढ़ता से बोला।

“देश के लिए क्या कर सकते हो ?”–आरिफ की निगाहें उसके चेहरे पर ही जमी हुईं थीं। “आप बताओ आरिफ भाई। देश के लिए तो कुछ भी कर सकता हूँ।”

“इस ऑपरेशन में हमें तुम्हारी ज़रूरत है राज ।”

“मैं आपके साथ हूँ। आप बताओ करना क्या है ?”–राज का स्वर आत्मविश्वास से ओत प्रोत था।

“एक हत्या करनी है।”–आरिफ सपाट लहजे में बोला।

“ह...हत्या !”–राज चौंका।

“हाँ हत्या…क्यों क्या हुआ ?”

“किसकी ?”

“देश के, इंसानियत के दुश्मन की।”–आरिफ की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं।

राज सोच में पड़ गया।

“बोलो कर लोगे ?”

“कर दूँगा आरिफ भाई। देश के लिए ये भी कर दूँगा। वैसे भी यही करने तो आया था डॉली के साथ। लेकिन आरिफ भाई ये समझ नहीं आया कि आप लोग ये काम मुझसे क्यों करवाना चाहते हो ? जबकि आप लोग ट्रेंड हो, ये काम बहुत आसानी से कर सकते हो।”–राज बोला।

“जिस समय ये काम होगा, उस समय हम सब सरकारी आदमी अपने ऑफिस में हाज़िर रहेंगे। हम नहीं चाहते कि किसी भी तरह ये काम सरकार से जोड़ कर देखा जाए। वैसे हमारा प्लान सॉलिड है, पर अतिरिक्त सुरक्षा ले रहे हैं बस।”

“ठीक है आरिफ भाई। जैसा आप कहोगे, हो जायेगा।”

“गुड। तो समझो कि ये ऑपरेशन तुम्हारी ट्रेनिंग भी है और इम्तिहान भी।”–आरिफ बोला।

“ट्रेनिंग ?”

“देखो राज मुझे मालूम है कि तुम आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो और अब डॉली से शादी कर रहे हो, तो वैसे भी तुम दोनों के पास बहुत पैसे होंगे। जमा जमाया बिज़नेस होगा। तुम्हें पैसे के लिए कोई काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन फिर भी मेरे पास एक प्रस्ताव है तुम्हारे लिए।”–आरिफ कुछ सोचता हुआ बोला।

“क्या ?”–राज उत्सुक भाव से बोला।

“जो बता रहा हूँ वह अपने तक ही रखना। यहाँ तक कि डॉली को भी नहीं बताना।”

“नही बताऊँगा आरिफ भाई आप बेफ़िक्र रहो।”

“सरकार के सभी विभाग सार्वजनिक नहीं होते। कुछ विभाग देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए गुप्त रूप से भी काम करते हैं। और इसमें काम करने वाले भी अज्ञात ही रहते हैं। उन्हें किसी अन्य सरकारी विभाग का कर्मचारी दिखा दिया जाता है। वह वहाँ काम भी करते हैं। लेकिन उनका असली काम कुछ ऐसे ही ऑपरेशन करना होता है जैसा कि इस वक़्त हम कर रहे हैं।”–आरिफ इतना बोल कर रुका।

राज तन्मयता से सुन रहा था। आरिफ को रुकता पाकर उसने प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी तरफ़ देखा।

“तुम जैसे युवाओं की देश को हमेशा ज़रूरत है। इसलिए मैंने कहा कि ये ऑपरेशन तुम्हारा इम्तिहान और ट्रेनिंग दोनों हैं। अगर देश के लिए कुछ करने का जज़्बा हो तो ज्वाइन कर लेना।”

“मुझे मंज़ूर है।”–राज तुरंत बोला।

“फैसला करने से पहले ये समझ लो कि कफ़न जेब में रख कर काम करना होता है।”

“मुझे मंज़ूर है आरिफ भाई। देश के लिए शहीद होना तो किस्मत वालों को ही नसीब होता है।”–राज तत्परता से बोला।

“तो समझ लो हो गया। मैंने तुम्हारी योग्यता पहचान ली है।”–आरिफ उसके कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला।

“आरिफ भाई क्या ये ज़रूरी है किसी सरकारी विभाग में ही नौकरी दिखाई जाए ? मैं वकालत करता हुआ भी तो ये काम कर सकता हूँ।”

“बिलकुल कर सकते हो। मतलब तो सिर्फ एक फ्रंट बना कर रखने से है, वह कोई भी हो।”–आरिफ बोला।

“तो आरिफ भाई मुझे मंज़ूर है। सच पूछो तो ये तो मेरा बचपन का सपना था। जब मैं जेम्स बॉंड की, सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स पढ़ता था, तो खुद को उनकी जगह रख कर ही सोचता था।”

“कॉमिक्स और हक़ीक़त में बहुत फर्क होता है मेरे भाई। ग्लैमर और फेम जैसी किसी चीज की जरा सी भी गुंजाइश नहीं है हमारे विभाग में।”–आरिफ हँसा।

“कुछ भी हो, बन तो रहा ही हूँ ना।”–राज भी हँसा।

“हाँ वह तो है। ख़ैर अब सुनो आगे की सारी योजना कि क्या होना है और कैसे होना है।”–आरिफ बोला।

“जी बताइए।” जवाब में आरिफ उसे धीमे स्वर में सब कुछ बताता चला गया। राज बीच बीच में सहमति में सिर हिला देता था।

करीब आधा घंटा उनकी ये वार्ता चली। उसके बाद दोनों वापस अंदर इमारत की तरफ़ लौट चले।

*********************
 
होटल मुगल शेरेटन के अपने कमरे में डॉक्टर प्रीति और जुगल मौजूद थे। प्रीति बेड पर बैठी थी, जबकि जुगल कमरे में मौजूद सोफे पर बैठा था। प्रीति ने मोबाइल डिस्कनेक्ट हो जाने के बाद मोबाइल सामने बेड पर रख दिया।

“वह आ रहा है।”–वह जुगल की तरफ़ देखती हुई बोली।

“जी मम्मी जी।”–जुगल शराफत से बोला। प्रीति ने उसे घूर कर देखा, पर कुछ कहा नहीं। उसे पता था कि कहने का कुछ फ़ायदा भी नहीं होने वाला है। जुगल ने पैंट और फुल बाजू की शर्ट पहन रखी थी। लेकिन शर्ट के ऊपर के दो बटन टूटे हुए थे और कफ के बटन भी खुले हुए थे, जिससे शर्ट बेतरतीब सी हो रही थी। सिर के बाल भी बिखरे हुए थे और वह इस समय अखबार में बने चित्रों पर पेन से कारीगरी करने में व्यस्त था।

“मम्मी एक चॉकलेट दो ना।”–वह बग़ैर अख़बार से सर उठाए बोला।

“जब वह आ जाए, तभी कर लेना ये सब।” जवाब में जुगल इतनी तेज चिल्लाता हुआ रोया कि घबरा कर प्रीति ने जल्दी से पर्स से चॉकलेट निकल कर उसकी ओर उछाल दी। जुगल ने चॉकलेट फाड़ी और बड़े लापरवाह अंदाज़ में खाने लगा। खा कम रहा था, शर्ट और मुँह पर ज्यादा लगा रहा था। प्रीति बड़े विचित्र भाव से उसकी तरफ देख रही थी।

“मम्मी खम हो गई।”–थोड़ी देर बाद ही वह प्रीति को अपने दोनों हाथ दिखाता हुआ बोला।

“ठीक है।”

“मम्मी मैं और नहीं खाऊँगा।”–जुगल फिर बोला।

“अरे तो मत खा, मेरे से क्या कह रहा है।”

“मम्मी आप मुझसे प्यार नहीं करतीं।”–जुगल मचल कर बोला।

“चुप हो जा मेरे बाप।”–प्रीति माथे पर हाथ मारती हुई बोली। जुगल फिर अख़बार में छपे चित्रों की दाढ़ी मूँछ बनाने में व्यस्त हो गया। थोड़ी ही देर बाद रिसेप्शन से फोन आया। प्रीति ने फोन उठाकर बात की और रिसीवर वापिस क्रेडिल पर रख दिया।

“वह आ रहा है।”–उसने जुगल की तरफ़ देखते हुए कहा। जुगल ने क्षण भर को उसकी तरफ़ देखा और फिर अख़बार में चित्रकारी में व्यस्त हो गया। दरवाज़े पर नॉक होते ही उसने झपट कर दरवाज़ा खोल दिया। रणविजय उसे अपलक देखता रह गया। जाने कितनी देर वह एक दूसरे को देखते रह गए। फिर प्रीति को ही होश आया।

“आओ अंदर आओ।”–वह दरवाज़े से एक साइड होती हुई बोली। रणविजय अंदर आया और एक कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन इस सारी प्रक्रिया में उसकी नज़र एक पल के लिए भी प्रीति से नहीं हटी थी।

“कितना टाइम हो गया ना ?”–प्रीति बोली।

“नहीं हुआ। मुझे तो कल की ही बात लगती है।”

“पूरे बत्तीस साल हो गए। तुम कितना बदल गए हो।”

“पर तुम नहीं बदलीं। बिलकुल वैसी की वैसी हो।” प्रीति हँसी।

“बिलकुल वही हँसी है।”

“छोड़ो भी, बताओ क्या लोगे ?”

“कुछ नहीं। बस तुम चलकर अपना घर सँभाल लो।”

“मेरा कौन सा घर है यहाँ ?”–वह रणविजय की आँखों में देखते हुए बोली।

“अभी ना सही, पर यहाँ से सीधे आर्य समाज मंदिर चल रहे हैं। वहाँ से फ्री होते ही घर तुम्हारा हो जाएगा।”

“तुम मज़ाक़ कर रहे हो ?”

“नहीं प्रीति, आज और अभी होगी हमारी शादी। मुझे अपनी किस्मत का कोई भरोसा नहीं।”

“पर एकदम से आज अचानक कैसे हो जाएगी ?”

“हो जाएगी। क्योंकि ये रणविजय की शादी है। तुम चलो तो सही।”

“चलो। बस मैं दो मिनट में तैयार होती हूँ।”

“ये है हमारा बेटा ?”–रणविजय जुगल को देखता हुआ बोला।

“हाँ यही है। जुगल नमस्ते करो अंकल को।” जुगल ने नज़र उठाकर रणविजय को देखा, फिर वापस अपने काम में लग गया।

“बहुत बदमाश हो गया है। जुगल चलो तुम्हारा मुँह साफ कर दूँ। सारे हाथ और मुँह पर चॉकलेट लगा रखी है। फिर अंकल के साथ घूमने चलना है ना।” जुगल घूमने के नाम पर तुरंत उठ खड़ा हुआ। प्रीति उसे लेकर बाथरूम में चली गई। रणविजय बैठा बैठा कमरे का निरीक्षण करने लगा। फिर उसने सामने पड़ा अख़बार उठा लिया और उसमें की गई जुगल की चित्रकारी देखने लगा। यकायक वह काफी गंभीर नज़र आने लगा। उसने अख़बार वापस रखा और गंभीरता से कुछ सोचने लगा। फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगाया। कॉल मिलते ही वह धीरे स्वर में किसी को कुछ निर्देश देने लगा। *********************
 
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