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बेकसूर
बेकसूर
“कूकूकूकू... कूकूकूकू... कूकूकू... कू... ।” मोबाइल फोन के अलार्म की आवाज बेडरूम में गूंजने लगी थी । बिस्तर में अलसाए-अलसाए, बिना आँख खोले ही मैंने इधर-उधर हाथ मारा । बेड के सहारे लगी हुई साइड टेबल पर हाथ बढ़ाकर मोबाइल उठाया । बजते हुए अलार्म को बंद किया, मोबाइल को टेबल पर रखने के बजाय सिरहाने तकिये के साइड में रखा और ‘बस 5 मिनट थोड़ी देर और सो लूँ’ कहते हुए मैंने फिर से खुद को नींद के हवाले कर दिया ।
मेरे साथ ही नहीं बल्कि हर किसी के साथ हमेशा ऐसा ही होता है । चाहे आप रात भर की पूरी नींद ले लो, फिर भी घड़ी या मोबाइल के अलार्म की आवाज से जागने के बाद 5 मिनट सोना तो बनता ही है । ये बात अलग है वह 5 मिनट की नींद कब आधे घंटे की हो जाती है, हमें खबर भी नहीं होती । पर ना जाने क्यों इस बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ । मैं थोड़ी देर तक इधर-उधर बिस्तर में करवट बदलता रहा और फिर जब पलकों से नींद का मिलन नहीं हुआ तो हाथ फैलाकर तकिये के बगल में से मोबाइल बरामद किया और बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलकर टाइम देखने के लिए मोबाइल की स्क्रीन पर नजर दौड़ाई । मोबाइल इस समय 2 बजकर 6 मिनट का टाइम दिखा रहा था, यानी कि 5 मिनट थोड़ी देर और से सिर्फ 1 मिनट ज्यादा ही टाइम हुआ था ।
“उफ़्फ़...! अभी तो 2 ही बजे हैं । सारा दिन कैसे पास होगा !” मोबाइल में टाइम देखते हुए मैं बड़बड़ाया ।
हाँ, दोपहर के 2:06 मिनट ही बज रहे थे । अब ये मत सोचना कि मैं दिन में क्यों सो रहा था ? आजकल मेरी नाइट शिफ्ट जो चल रही थी । रात के 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ऑफिस में काम और फिर सुबह 6:30 तक घर आकर दोपहर 2 बजे तक सोना, आजकल मेरी बस यही दिनचर्या चल रही थी ।
मेरा नाम राज है, मूलतः मैं दिल्ली से हूँ और एक एमएनसी में जॉब कर रहा हूँ । फिलहाल जॉब के सिलसिले में वर्तमान में मुंबई मेरा रैन बसेरा है । मैं अपने परिवार के साथ मुंबई के कुकटपल्ली क्षेत्र की नवभारत टाइम्स टाउनशिप की बिल्डिंग नंबर 5 के फ्लैट नंबर 165 में रहता हूँ ।
नवभारत टाइम्स मुंबई की सबसे बड़ी और सबसे पहले बनी सरकार और प्राइवेट कंपनी के जाइंट वेंचर में लगभग 100 एकड़ में बनी हुई टाउनशिप थी, जिसमें 20 बड़ी-बड़ी बिल्डिंग थी । ये सारी बिल्डिंग 7 मंजिल से लेकर 15 माले की थी, जिसमें 23-4 बेडरूम, हर टाइप के फ्लैट थे । वैसे भारत के एक महानगर में नवभारत टाइम्स के नाम से टाउनशिप क्या कर रही थी; ये तो उसे बनाने वाला बिल्डर ही बेहतर बता सकता था कि आखिर उसने ये नाम क्यों रखा था ? बाकी सुविधाओं के नाम पर देखा जाए तो टाउनशिप वाकई में एक विकसित टाउनशिप थी और अपने नाम को चरितार्थ कर रही थी ।
अलसाये मन से मैं उठा और रसोई की तरफ चल पड़ा । उठने के बाद जब तक चाय शरीर में नहीं जाती, तब तक जैसे शरीर में जान ही नहीं आती । बेटे के स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थी । बीवी उसे अपने साथ लेकर मायके गई थी; तो ये चाय बनाने का कमबख्त काम भी मुझे ही करना था । चाय बनाकर उसे कप में डाला और फिर ड्राइंगहॉल में आकर बैठ गया । अभी चाय का पहला सिप लेने ही वाला था कि फ्लैट के बाहर कुछ खटपट-सी, हलचल-सी महसूस हुई । उसे इग्नोर करते हुए मैं चाय का सिप लेने लगा । पर अभी 23 सिप ही पीये होंगे कि खटपट की आवाज कुछ ज्यादा ही तेज हो गई ।
‘साला ! चैन से चाय भी नहीं पीने देते । पता नहीं क्या हो रहा है बाहर । जब देखो कुछ ना कुछ होता रहता है । जरूर वह कॉर्नर वाला फ्लैट होगा, जहाँ तीन तितलियाँ रहती हैं । जब देखो कुछ ना कुछ ड्रामा करती रहती हैं ।’ मैं मन ही मन बड़बड़ाया और चाय पीने लगा । अभी फिर से चाय के 23 सिप पीये होंगे कि खटपट की आवाज के साथ-साथ किसी के चिल्लाने की भी आवाज आने लगी ।
‘लगता है, बाहर कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है ।’ सोचते हुए मैंने कप से चाय के 23 घूंट जल्दी-जल्दी खींचे । इस जल्दबाजी में गले में जलन-सी हुई, पर उसे इग्नोर करते हुए एक नजर कप में आधी बची हुई चाय पर हसरत भरी नजर डाली और उठ खड़ा हुआ । अभी घर का मुख्य द्वार खोलकर मैं बाहर कदम रखने ही वाला था कि ध्यान आया, मैं सिर्फ बनियान और नेकर में ही हूँ । फटाफट मैंने दरवाजा बंद किया और ड्राइंगरूम के सोफ़े पर पड़ी हुई टी-शर्ट उठाकर पहनी । चलने से पहले मैंने वहीं टेबल पर रखे हुए कप को उठाया और उसमें बची हुई आधी चाय को एक घूंट में अंदर खींच ली । खाली कप को वहीं टेबल पर वापस से रखा और संतुष्टि से अपने होंठों पर अपनी जीभ फेरकर मैं अपने फ्लैट से बाहर आ गया । बाहर का नजारा देखते ही मैं चौंक पड़ा । बाहर आसपास के फ्लैट के काफी लोग खड़े थे । ना सिर्फ मेरी मंजिल के बल्कि ऊपर-नीचे की मंजिलों के भी कुछ जाने-पहचाने चेहरे नजर आ रहे थे ।
‘ना जाने क्या बात हो गई है ?’ मैंने मन ही मन सोचा । तभी मुझे उस कॉर्नर वाले फ्लैट से पुलिस के दो सिपाही बाहर निकलते हुए नजर आए । उनके पीछे-पीछे महिला कॉन्स्टेबल एक लड़की को हथकड़ी लगाए हुए निकली । साथ में पुलिस का एक इंस्पेक्टर रेंक का अधिकारी भी था । लड़की को देखते ही मैं चौंक गया । वह डॉली शर्मा थी, उस फ्लैट में रहने वाली उन्हीं तीन तितलियों में से एक । बाहर निकलते-निकलते उसके होंठों से निकल रहा था, “मैं बेगुनाह हूँ । मैंने कुछ भी नहीं किया । प्लीज, मुझे छोड़ दीजिये ।”
वह आसपास खड़े लोगों से खुद को बचाने की गुहार लगा रही थी, “कोई तो मेरी मदद कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया, मुझे फँसाया गया है ।” पर सब लोग उसकी बात को सुनकर भी अनसुना कर रहे थे । शायद उनमें से कोई भी पुलिस की नजरों में नहीं आना चाहता था । तभी उसकी नजर मेरे ऊपर पड़ी ।
मुझे देखते ही उसने लेडी कॉन्स्टेबल की गिरफ़्त से अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की पर सफल नहीं हो पाई । पुलिस उसे लेकर लिफ्ट की तरफ बढ़ी । लिफ्ट का रास्ता मेरे फ्लैट के दरवाजे से होकर ही जाता था । जैसे ही वह लोग मेरे नजदीक पहुँचे, डॉली ने मुझे छूने और बात करने की कोशिश की, पर पुलिस की पकड़ ज्यादा मजबूत थी । जाते-जाते वह मुझसे फरियाद लगाती गई, “सर ! प्लीज, आप तो मेरा विश्वास कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया है । मुझे फँसाया गया है । प्लीज, मेरी मदद कीजिये ।” बस इससे ज्यादा वह नहीं बोल पाई थी और पुलिस उसे लेकर लिफ्ट में प्रवेश कर गई । उसके जाने के बाद पीछे खड़े लोग उसके बारे में बातें बनाने लग गए थे, जिसमें मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं था, इसलिए मैं वापस से अपने फ्लैट के अंदर आ गया । दरवाजा बंद करके मुड़ा तो नजर टेबल पर रखे हुए चाय के खाली कप पर पड़ी ।
‘उफ़्फ़ ! अब इसे भी धोना है । बाद में धो लूँगा ।’ सोचते हुए मैं सोफ़े पर आकर पसर गया और डॉली के बारे में सोचने लगा, ‘आखिर पुलिस ने उस लड़की को क्यों गिरफ्तार किया है ? उसने ऐसा क्या किया होगा ? शक्ल से तो बड़ी मासूम लगती है । लगता तो नहीं, उसने कुछ किया होगा । वैसे क्या मुझे उसकी मदद करनी चाहिए ?’ मेरे मन में खयाल आया, पर अगले ही पल अपने सिर को झटका देते हुए खुद से कहा, ‘मुझे क्या मतलब किसी से ? साली, वैसे ही बड़े भाव खाती है । 24 बार मिली लिफ्ट में, मगर क्या मजाल एकाध बार से ज्यादा कभी हाय, हैलो भी किया हो ।’
बेकसूर
“कूकूकूकू... कूकूकूकू... कूकूकू... कू... ।” मोबाइल फोन के अलार्म की आवाज बेडरूम में गूंजने लगी थी । बिस्तर में अलसाए-अलसाए, बिना आँख खोले ही मैंने इधर-उधर हाथ मारा । बेड के सहारे लगी हुई साइड टेबल पर हाथ बढ़ाकर मोबाइल उठाया । बजते हुए अलार्म को बंद किया, मोबाइल को टेबल पर रखने के बजाय सिरहाने तकिये के साइड में रखा और ‘बस 5 मिनट थोड़ी देर और सो लूँ’ कहते हुए मैंने फिर से खुद को नींद के हवाले कर दिया ।
मेरे साथ ही नहीं बल्कि हर किसी के साथ हमेशा ऐसा ही होता है । चाहे आप रात भर की पूरी नींद ले लो, फिर भी घड़ी या मोबाइल के अलार्म की आवाज से जागने के बाद 5 मिनट सोना तो बनता ही है । ये बात अलग है वह 5 मिनट की नींद कब आधे घंटे की हो जाती है, हमें खबर भी नहीं होती । पर ना जाने क्यों इस बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ । मैं थोड़ी देर तक इधर-उधर बिस्तर में करवट बदलता रहा और फिर जब पलकों से नींद का मिलन नहीं हुआ तो हाथ फैलाकर तकिये के बगल में से मोबाइल बरामद किया और बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलकर टाइम देखने के लिए मोबाइल की स्क्रीन पर नजर दौड़ाई । मोबाइल इस समय 2 बजकर 6 मिनट का टाइम दिखा रहा था, यानी कि 5 मिनट थोड़ी देर और से सिर्फ 1 मिनट ज्यादा ही टाइम हुआ था ।
“उफ़्फ़...! अभी तो 2 ही बजे हैं । सारा दिन कैसे पास होगा !” मोबाइल में टाइम देखते हुए मैं बड़बड़ाया ।
हाँ, दोपहर के 2:06 मिनट ही बज रहे थे । अब ये मत सोचना कि मैं दिन में क्यों सो रहा था ? आजकल मेरी नाइट शिफ्ट जो चल रही थी । रात के 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ऑफिस में काम और फिर सुबह 6:30 तक घर आकर दोपहर 2 बजे तक सोना, आजकल मेरी बस यही दिनचर्या चल रही थी ।
मेरा नाम राज है, मूलतः मैं दिल्ली से हूँ और एक एमएनसी में जॉब कर रहा हूँ । फिलहाल जॉब के सिलसिले में वर्तमान में मुंबई मेरा रैन बसेरा है । मैं अपने परिवार के साथ मुंबई के कुकटपल्ली क्षेत्र की नवभारत टाइम्स टाउनशिप की बिल्डिंग नंबर 5 के फ्लैट नंबर 165 में रहता हूँ ।
नवभारत टाइम्स मुंबई की सबसे बड़ी और सबसे पहले बनी सरकार और प्राइवेट कंपनी के जाइंट वेंचर में लगभग 100 एकड़ में बनी हुई टाउनशिप थी, जिसमें 20 बड़ी-बड़ी बिल्डिंग थी । ये सारी बिल्डिंग 7 मंजिल से लेकर 15 माले की थी, जिसमें 23-4 बेडरूम, हर टाइप के फ्लैट थे । वैसे भारत के एक महानगर में नवभारत टाइम्स के नाम से टाउनशिप क्या कर रही थी; ये तो उसे बनाने वाला बिल्डर ही बेहतर बता सकता था कि आखिर उसने ये नाम क्यों रखा था ? बाकी सुविधाओं के नाम पर देखा जाए तो टाउनशिप वाकई में एक विकसित टाउनशिप थी और अपने नाम को चरितार्थ कर रही थी ।
अलसाये मन से मैं उठा और रसोई की तरफ चल पड़ा । उठने के बाद जब तक चाय शरीर में नहीं जाती, तब तक जैसे शरीर में जान ही नहीं आती । बेटे के स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थी । बीवी उसे अपने साथ लेकर मायके गई थी; तो ये चाय बनाने का कमबख्त काम भी मुझे ही करना था । चाय बनाकर उसे कप में डाला और फिर ड्राइंगहॉल में आकर बैठ गया । अभी चाय का पहला सिप लेने ही वाला था कि फ्लैट के बाहर कुछ खटपट-सी, हलचल-सी महसूस हुई । उसे इग्नोर करते हुए मैं चाय का सिप लेने लगा । पर अभी 23 सिप ही पीये होंगे कि खटपट की आवाज कुछ ज्यादा ही तेज हो गई ।
‘साला ! चैन से चाय भी नहीं पीने देते । पता नहीं क्या हो रहा है बाहर । जब देखो कुछ ना कुछ होता रहता है । जरूर वह कॉर्नर वाला फ्लैट होगा, जहाँ तीन तितलियाँ रहती हैं । जब देखो कुछ ना कुछ ड्रामा करती रहती हैं ।’ मैं मन ही मन बड़बड़ाया और चाय पीने लगा । अभी फिर से चाय के 23 सिप पीये होंगे कि खटपट की आवाज के साथ-साथ किसी के चिल्लाने की भी आवाज आने लगी ।
‘लगता है, बाहर कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है ।’ सोचते हुए मैंने कप से चाय के 23 घूंट जल्दी-जल्दी खींचे । इस जल्दबाजी में गले में जलन-सी हुई, पर उसे इग्नोर करते हुए एक नजर कप में आधी बची हुई चाय पर हसरत भरी नजर डाली और उठ खड़ा हुआ । अभी घर का मुख्य द्वार खोलकर मैं बाहर कदम रखने ही वाला था कि ध्यान आया, मैं सिर्फ बनियान और नेकर में ही हूँ । फटाफट मैंने दरवाजा बंद किया और ड्राइंगरूम के सोफ़े पर पड़ी हुई टी-शर्ट उठाकर पहनी । चलने से पहले मैंने वहीं टेबल पर रखे हुए कप को उठाया और उसमें बची हुई आधी चाय को एक घूंट में अंदर खींच ली । खाली कप को वहीं टेबल पर वापस से रखा और संतुष्टि से अपने होंठों पर अपनी जीभ फेरकर मैं अपने फ्लैट से बाहर आ गया । बाहर का नजारा देखते ही मैं चौंक पड़ा । बाहर आसपास के फ्लैट के काफी लोग खड़े थे । ना सिर्फ मेरी मंजिल के बल्कि ऊपर-नीचे की मंजिलों के भी कुछ जाने-पहचाने चेहरे नजर आ रहे थे ।
‘ना जाने क्या बात हो गई है ?’ मैंने मन ही मन सोचा । तभी मुझे उस कॉर्नर वाले फ्लैट से पुलिस के दो सिपाही बाहर निकलते हुए नजर आए । उनके पीछे-पीछे महिला कॉन्स्टेबल एक लड़की को हथकड़ी लगाए हुए निकली । साथ में पुलिस का एक इंस्पेक्टर रेंक का अधिकारी भी था । लड़की को देखते ही मैं चौंक गया । वह डॉली शर्मा थी, उस फ्लैट में रहने वाली उन्हीं तीन तितलियों में से एक । बाहर निकलते-निकलते उसके होंठों से निकल रहा था, “मैं बेगुनाह हूँ । मैंने कुछ भी नहीं किया । प्लीज, मुझे छोड़ दीजिये ।”
वह आसपास खड़े लोगों से खुद को बचाने की गुहार लगा रही थी, “कोई तो मेरी मदद कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया, मुझे फँसाया गया है ।” पर सब लोग उसकी बात को सुनकर भी अनसुना कर रहे थे । शायद उनमें से कोई भी पुलिस की नजरों में नहीं आना चाहता था । तभी उसकी नजर मेरे ऊपर पड़ी ।
मुझे देखते ही उसने लेडी कॉन्स्टेबल की गिरफ़्त से अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की पर सफल नहीं हो पाई । पुलिस उसे लेकर लिफ्ट की तरफ बढ़ी । लिफ्ट का रास्ता मेरे फ्लैट के दरवाजे से होकर ही जाता था । जैसे ही वह लोग मेरे नजदीक पहुँचे, डॉली ने मुझे छूने और बात करने की कोशिश की, पर पुलिस की पकड़ ज्यादा मजबूत थी । जाते-जाते वह मुझसे फरियाद लगाती गई, “सर ! प्लीज, आप तो मेरा विश्वास कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया है । मुझे फँसाया गया है । प्लीज, मेरी मदद कीजिये ।” बस इससे ज्यादा वह नहीं बोल पाई थी और पुलिस उसे लेकर लिफ्ट में प्रवेश कर गई । उसके जाने के बाद पीछे खड़े लोग उसके बारे में बातें बनाने लग गए थे, जिसमें मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं था, इसलिए मैं वापस से अपने फ्लैट के अंदर आ गया । दरवाजा बंद करके मुड़ा तो नजर टेबल पर रखे हुए चाय के खाली कप पर पड़ी ।
‘उफ़्फ़ ! अब इसे भी धोना है । बाद में धो लूँगा ।’ सोचते हुए मैं सोफ़े पर आकर पसर गया और डॉली के बारे में सोचने लगा, ‘आखिर पुलिस ने उस लड़की को क्यों गिरफ्तार किया है ? उसने ऐसा क्या किया होगा ? शक्ल से तो बड़ी मासूम लगती है । लगता तो नहीं, उसने कुछ किया होगा । वैसे क्या मुझे उसकी मदद करनी चाहिए ?’ मेरे मन में खयाल आया, पर अगले ही पल अपने सिर को झटका देते हुए खुद से कहा, ‘मुझे क्या मतलब किसी से ? साली, वैसे ही बड़े भाव खाती है । 24 बार मिली लिफ्ट में, मगर क्या मजाल एकाध बार से ज्यादा कभी हाय, हैलो भी किया हो ।’