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Thriller तरकीब

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जुगल और किशोर, प्रीति अहलावत को लेकर फार्म हाउस पहुँच चुके थे।

इस समय प्रीति एक ऑफिसनुमा कमरे में बैठी थी। उसके दाँये बाएँ जुगल और किशोर बैठे थे। प्रीति की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। लेकिन उसने शॉक की स्थिति गुज़र जाने पर जब पुनः सारी बातों पर गौर किया, तो उसे मामला कुछ अलग लगा। कम से कम जो दिख रहा था, वह तो नहीं था। उसे अब लगने लगा था कि उसे सुनियोजित ढंग से फँसाया गया था। पर क्यों ? इस क्यों का जवाब उसके पास नहीं था। जो दो अफ़सर उसे यहाँ लाए थे, जो एयरपोर्ट पर सतर्कता और जाँबाज़ी की प्रतिमूर्ति लग रहे थे, अब अचानक ही मूर्ख लगने लगे थे। कहो कुछ, सुनते कुछ थे, और करते कुछ थे।

“कब तक आएँगे आपके अफ़सर ?”–उसने तीसरी बार ये सवाल दोहराया।

“तीन आदमी कभी सुखी नहीं रह सकते।”–जुगल दार्शनिक अंदाज़ में बोला।

“कौन ?”–प्रीति बोली।

“शरणवीर, रामपाल और विशंबर।”–जुगल बोला।

“अब ये कौन हैं ?”

“ये तीनों मेरी बुआ के लड़के हैं। तीनों की पत्नी इतनी खूँखार और लड़ाका हैं कि ये तीनों मासूम कभी सुखी नहीं रह सकते।”–जुगल उदास स्वर में बोला।

“लेकिन इससे मेरा क्या मतलब ?”–प्रीति का दिमाग़ ख़राब हो गया।

“कोई मतलब नहीं। कतई कोई मतलब नहीं। आपने पूछा, तो मैंने बता दिया। वरना मेरा सिद्धांत है कि मैं अपना ग़म कभी किसी को नहीं बताता।”–जुगल की आँखें भर आईं।

“मैंने कब पूछा ? और मैं क्यों पूछूँगी ?”

“बाज लोगों को होता है शौक़, दूसरों के ग़मों का मज़ा लेने का।”–जुगल की आँख से एक आँसू टपका।

“चुप हो जा भाई। ये दुनिया ऐसी ही है। ग़म के मारों का यहाँ मजाक ही उड़ाया जाता है।”–किशोर उठ कर उसकी पीठ थपथपाता हुआ हमदर्दी भरे स्वर में बोला।

“मुझे आप लोगों का ही समझ नहीं आ रहा। अरे मैं पूछ रही हूँ कि आपके अफ़सर कब तक आयेंगे ?”

“आपकी उम्र कितनी है ?”–किशोर ने पूछा।

“फोर्टी थ्री। क्यों ?”

“लेकिन आपके पासपोर्ट के हिसाब से तो फिफ्टी फोर है

।” “हाँ...वह…दरअसल ऐसा है कि…पर मेरी एज से क्या लेना देना ?”

“ग्यारह साल !...पूरे ग्यारह साल ! कौन देगा इनका हिसाब, मैडम जी? ग्यारह साल कम नहीं होते।”–किशोर उसे घूरता हुआ बोला।

“कौन से ग्यारह साल ?”

“फिफ्टी फोर साल आप कन्ज्यूम कर चुकी हैं अपनी एज के और फोर्टी थ्री बता रही हैं। तो ये जो ग्यारह साल का अंतर है इसकी अदायगी कौन करेगा ?

“आप क्या पागल हो ?”–प्रीति चिल्लाई।

“आपको ग्यारह साल कुछ नहीं लग रहे ? और अगर आपको ग्यारह साल हम जेल में डाल दें तो पता चलेगा। क्योंकि आपके हिसाब से तो ग्यारह साल कुछ होते ही नहीं।”

“आप कहाँ की बात कहाँ ले जा रहे हो। अरे हर औरत अपनी उम्र थोड़ी बहुत कम बताती ही है।”–प्रीति के सिर में दर्द होने लगा था।

“आप हर औरत के ख़िलाफ़ कोर्ट में गवाही दे सकती हो ?”–किशोर ने गंभीरता से पूछा।

“मैं अब हर औरत के ख़िलाफ़ गवाही कैसे दे सकती हूँ ? मैं क्या हर औरत को जानती हूँ।”–प्रीति सिर पकड़ती हुई बोली।

“यानी बिना जाने ही आरोप लगा दिया। आप क्या हमारे रायता मास्टर की बहन हो ?”

“कौन रायता मास्टर ?”–प्रीति असमंजस भरे स्वर में बोली।

“मैडम जी, पहले तो ये बताओ कि रायता मास्टर में आपकी दिलचस्पी क्या है ?”–जुगल ने पूछा।

“मेरी भला क्या दिलचस्पी होगी ?”–वह जुगल की तरफ़ घूम कर बोली।

“तो जब दिलचस्पी है ही नहीं, तो उनके बारे में पूछ क्यों रही हो ?”

“मैं कहाँ पूछ रही हूँ ? कब पूछा मैंने ?”–वह दयनीय स्वर में बोली।

“अभी आपने पूछा नहीं कि कौन रायता मास्टर ?”–जुगल तेज स्वर में बोला।

अभी प्रीति कोई जवाब देती, कि दरवाज़ा खुला और अमित और आरिफ ने अंदर कदम रखा। उनके पीछे राज और डॉली भी थे। आरिफ को देखते ही दोनों खड़े हो गए। उन्हें खड़ा होता देख प्रीति भी खड़ी हो गई।

“कितनी देर हो गई आये हुए ?”–आरिफ ने पूछा।

“आधा घंटा हुआ है सर।”–दोनों समवेत स्वर में बोले।

“बैठ जाइए।”–आरिफ एक कुर्सी पर बैठता हुआ प्रीति से बोला। सहमी सकुचाई सी प्रीति बैठ गई। आरिफ ने वहीं मेज पर पानी का ढका रखा गिलास उठाया और जेब से निकालकर डिस्प्रिन की गोली निकाली और गिलास में डाल कर प्रीति की तरफ़ बढ़ा दिया–“लीजिए। आप कई घंटों से हमारे इन दो अफसरों के साथ हैं। आपको इसकी सख़्त ज़रूरत होगी।”

प्रीति ने कृतज्ञ भाव से गिलास थाम लिया और गोली के पूरी तरह घुलते ही पूरा पानी पी गई। “थैंक्स।”–वह गिलास टेबल पर रखती हुई बोली।

“मैं एन०सी०बी० से आरिफ अली, और ये आई०बी० से अमित आनंद।”–आरिफ ने परिचय दिया।

“मैं डॉक्टर प्रीति अहलावत।”–उसने हाथ जोड़ कर अभिवादन किया।

“देखिए डॉक्टर प्रीति, मुझे बात घुमा फिरा कर कहने की आदत नहीं है। इसलिए मैं सीधे मुद्दे पर आता हूँ।”–आरिफ गंभीर स्वर में बोला।

“सर मैं क़सम खा कर कहती हूँ कि वह पैकेट मेरा नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि वह मेरे सामान में कैसे आ गया ?”–प्रीति रुआँसी आवाज़ में बोली।

“ठीक है मान ली आपकी बात। अब आप दो मिनट उस पैकेट का पीछा छोड़िये और मेरी सुनिये।”

“जी।”

“आप रणविजय को जानती हैं ?”

“कौन रणविजय ?”

“रणविजय। आपका अलवर वाला आशिक़।”–आरिफ बोला।

“अलवर वाले आशिक़ से आपका क्या आशय है ? मेरा क्या हर शहर में एक आशिक़ है ?”–वह अप्रसन्न भाव से बोली।

“नहीं, मेरा वह मतलब नहीं था। वह तो मैंने आपको याद दिलाने के लिए अलवर का नाम लिया।”–आरिफ नम्र स्वर में बोला। उसके चेहरे से अप्रसन्नता के भाव फिर भी नहीं गए। “देखिए, आप याद करने की कोशिश कीजिये। रणविजय सिंह...बड़ा सुंदर स्मार्ट लड़का था। ऑटो चलाता था…याद आया कुछ ?”–आरिफ ने आशापूर्ण स्वर में पूछा।

“मुझे कुछ याद नहीं। अब तीस बत्तीस साल पहले का किसे याद रहता है ?”–वह भुनभुना कर बोली।

“सर आप जाकर फ्रेश हो लीजिये। पंद्रह मिनट बाद आइये। तब तक मैडम को याद आ जाएगा।”–अमित–जो बड़ी देर से ये सब देख रहा था–बोला। आरिफ ने सहमति में सिर हिलाया और आँखों ही आँखों में बाहर आने का इशारा करता हुआ उठा और कमरे से बाहर चला गया।

“मैं एक प्रतिष्ठित डॉक्टर हूँ। समाज में मेरा एक रुतबा है। आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”

अमित उसकी बात को अनसुनी करते हुए बाहर निकल गया।

“कहिये सर।”–बाहर आकर वह आरिफ से बोला।

“हम उससे इस तरह से पेश नहीं आ सकते।”–आरिफ बोला।

“किस तरह से सर ?”

“सख्ती बहुत नहीं कर सकते। ग्रिलिंग तो कतई नहीं। किया ही क्या है उसने ?”

“ऐसे तो वो मानने से रही।”

“डरा दो, लेकिन फिजिकल तो कतई नहीं। न मानी तो सोचा जायेगा कुछ और।”

अमित ने सिर हिलाकर सहमति जताई। आरिफ आगे बढ़ गया। अमित वापस कमरे में पहुँचा।

“हाँ, तो क्या कह रही थीं, मैडम जी ?”–भीतर आकर वो बोला।

“आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते।”–प्रीति बोली।

“नहीं, कुछ और भी कह रही थीं। क्या है आपका समाज में ?”

प्रीति कुछ न बोली।
 
“हाँ रूतबा। ये पाउडर वाली बात जब मीडिया में जायेगी तो रहेगा ये रुतबा ? इसलिए मैडम जी, हमारी छोड़िये। हम क्या कर सकते हैं, क्या नहीं, इस पर सिर खपाना छोड़िये। अब जो भी मैं पूछूँ, बस उसका सीधा सीधा जवाब दीजिये।”

“तुम लोग हो कौन ? और किस हैसियत से ये सब कर रहे हो ?”

“डॉली ! तुम ज़रा बाहर जाओ, और जुगल भाई! ज़रा डॉक्टर साहिबा को बताओ तो कि हमारी हैसियत क्या है।”–अमित बोला।

डॉली उठी, और अनिश्चित भाव से उन्हें देखती हुई बाहर चली गई। अब जुगल और किशोर उठे और प्रीति के दाएँ और बाएँ आकर खड़े हो गए। प्रीति ने सशंक भाव से उनकी तरफ़ देखा।

“मैडम जी, आपके पास दो ही रास्ते थे। या तो चुपचाप हमारे साथ सहयोग करो, या अपनी कुटाई करा कर हमें सहयोग करो। हमे अफ़सोस है कि आपने दूसरा रास्ता चुना।”–जुगल बड़े प्यार से बोला।

“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”–वह बोली।

जवाब में किशोर ने जेब से सर्जिकल टेप निकाला और उसके मुँह पर चिपका दिया। जुगल ने मेज की ड्राअर से रस्सी निकाली और उसके हाथ पकड़ कर कुर्सी के हत्थे से बाँध दिए। उसने विरोध किया, लेकिन व्यर्थ गया। प्रीति बुरी तरह डर गयी। कोई घाघ क्रिमिनल तो थी नहीं। वह बुरी तरह तड़फड़ा रही थी। लेकिन बंधी होने की वजह से तड़प कर रह जा रही थी।

“क्या कहते हो भाई, हेलीकाप्टर उड़ाया जाये ? लग रहा है मैडम जी ऐसे तो मानेंगी नहीं।”–किशोर कमरे की छत में लगे कुंडे की ओर देखते हुए बोला।

“हाँ भाई।”–जुगल ने प्रीति की ओर हाथ बढ़ाया। अब प्रीति की बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा था। उसने निरीह दृष्टि से अमित की तरफ़ देखा। अमित ने हाथ उठा कर उन्हें रुकने का इशारा किया।

“अभी कहाँ डोज़ पूरी हुई है। ये पाँच मिनट बाद ही फिर हमारी हैसियत पूछेगी।”–किशोर बोला।

अमित ने प्रीति की तरफ़ देखा। प्रीति ने जल्दी से इनकार में सिर हिलाया। “चलो एक बार देख लेते हैं। अगर सहयोग नहीं करेगी, तो दोबारा तुम्हारे हवाले कर दूँगा।”–अमित बोला।

“वादा।”

“पक्का वादा।”–अमित हँसते हुए बोला।

जुगल और किशोर ने पूरी पूरी असंतुष्टि दिखाते हुए उसके हाथ खोल दिए और उसके मुँह से टेप हटा दिया। प्रीति ने खुलते ही दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया और लंबी-लंबी साँसें लेने लगी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

“हाँ तो मैडम जी, पहला सवाल वही है कि क्या रणविजय को जानती हो ?”–अमित ने पूछा। उसने जल्दी जल्दी स्वीकृति में सिर हिलाया।

“मैडम हम पूछेंगे तो टाइम ख़राब होगा। इसलिए आप खुद ही सारा क़िस्सा बयान कर दो।”

“कोई क़िस्सा नहीं है सर। वह अलवर में मेरा बॉयफ्रेंड था। मैंने उसकी पर्सनैलिटी से रोब खाकर उससे दोस्ती कर ली थी। लेकिन वह तो गँवार था, और उस पर लानत ये कि गरीब था। ऑटो चलाता था। बहुत जल्दी मुझे मेरी गलती का अहसास हो गया। मेरा और उसका मानसिक स्तर एवं सामाजिक स्तर बिलकुल ही अलग था। फिर भी दो साल तक, जब तक मेरी एम०बी०बी०एस० पूरी नहीं हो गई, हम मिलते रहे। फिर पढ़ाई पूरी करके मैं उसे बिना बताए अपने घर इंदौर चली गई। लेकिन वह तो पता करके मेरे घर तक आ गया। फिर जब मेरे लिए दिवाकर का रिश्ता आ गया, तो मैंने उससे मिलकर सब कुछ साफ-साफ बता दिया, और शादी करके अमेरिका चली गई। उसके बाद आज बत्तीस साल बाद आपके मुँह से उसका नाम सुना है। बस इतना ही जानती हूँ उसे।”

“आपके उसके साथ रिश्ते कहाँ तक थे ?”–राज –जो बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था–बोला।

“कहाँ तक थे मतलब ?”–उसने पूछा।

“मतलब वही, जो आप समझ रही हैं। क्या रिश्ते जिस्मानी थे ?”–राज बोला।

प्रीति ने निगाह झुका ली।

“क्या उसमें कोई विचित्र बात थी। मतलब अंतरंग पलों में कुछ अजीब फरमाइश या कोई ऐब्नॉर्मल हरकत ?”–राज बोला।

“नहीं, ऐसा तो कुछ भी नहीं था। वह बिल्कुल नॉर्मल था।”

“और आप ?”

“मतलब ?”

“आप नॉर्मल हो ?”–राज ग़ौर से उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला।

“क्या बकवास है ये ?”–वह भड़की।

“मैडम, हमें आपकी पर्सनल लाइफ से कोई लेना देना नहीं है। हम सिर्फ अपने मुर्गे के बारे में जानना चाहते हैं। उसकी कोई कमी। कोई ऐसा कमजोर पॉइंट, जिससे उसे फँसाया जा सके। हमें आपसे कोई मतलब नहीं। अगर आपने कोई हल्की फुल्की ग़ैरक़ानूनी हरकत की भी होगी, तो हम उसे अनदेखा कर देंगे।”

“अब मैं आपको क्या बताऊँ, जब कुछ है ही नहीं।”

चलिए छोड़िए, ये बताइए कि आपका तलाक़ हुआ है। आपकी माली हालत कैसी है इस समय ?”

“ठीक ठाक ही है। अब डॉक्टर हूँ, तो इतना तो कमा ही लेती हूँ, कि अच्छी तरह रह सकूँ।”

“आपके सपने पूरे करने लायक़ है ?”

“वह तो किसी के पास नहीं होता।”–वह धीमे से बोली।

“कमाना है सपने पूरे करने लायक़ पैसा ?” उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी ओर देखा।

“एक बात और, आप तो रणविजय से पीछा छुड़ाना चाहती थीं। लेकिन उसका आपके प्रति क्या नज़रिया था ?”–अमित ने पूछा।

“वह मेरे प्यार में पागल था। उसकी दुनिया मुझसे शुरू होकर मुझपे ही ख़त्म हो जाती थी।”–उसके लहजे में गर्व का पुट आ गया।

“तो जब आपने उससे ब्रेकअप किया, तो वह क्या बोला ?”

“वह बोला, मैं गरीब हूँ ना, इसलिए छोड़ रही हो मुझे। तुम मुझे थोड़ा सा समय दो, दौलत का ढेर लगा दूँगा तुम्हारे कदमों में। अब बताओ एक ऑटो वाला क्या ढेर लगाता दौलत का ? दो लाख, चार लाख ?” अमित और राज की निगाहें मिलीं।

“आप बताओ, आप क्या कह रहे थे पैसे कमाने के बारे में ?”–वह अमित से बोली।

“मैडम एक सौदा करिए हमसे। हमें हमारा मुर्गा दीजिए, और उसकी सारी दौलत आपकी।”

“कौन मुर्गा ?”

“आपका अपना रणविजय, जो इस समय कम से कम चार हज़ार करोड़ का मालिक है। हमें रणविजय दो, बदले में उसकी सारी दौलत तुम्हारी।”

“रणविजय चार हज़ार करोड़ का मालिक…हे भगवान!”–उसकी आँखों में आश्चर्य के भाव आये।

“अब बताइए क्या कहती हैं ? सौदा मंज़ूर है आपको ?”

“दूसरी कोई स्थिति है ?” कोई कुछ नहीं बोला। प्रीति चुपचाप मनन करती रही। किसी ने कुछ और नहीं पूछा।

“मंज़ूर है।”–काफी देर बाद वह शाँत स्वर में बोली–“और ये चार हज़ार करोड़ का क्या किस्सा है ? कैसे मुझे पूरे मिलेंगे ?”

“पूरे चार हज़ार करोड़ नहीं। क्योंकि उसकी दूसरी पत्नी की प्रॉपर्टी की वारिस उसकी बेटी, अभी सलामत है।”

“अच्छा।”–उसने हुँकारी सी भरी।

“आपको रणविजय की मुंबई वाली फैक्ट्री और प्रॉपर्टी मिलेगी। कुछ अन्य प्रॉपर्टी भी मिल सकती है। मोटे तौर पर आप ये मान कर चलिए कि आपको दो से ढाई हज़ार करोड़ की सम्पत्ति मिलेगी। ये भी कोई कम तो नहीं।”

उसने हल्के से ऊपर नीचे सिर हिलाया।

“तो मिलाइए हाथ।”–अमित ने हाथ बढ़ाया।

प्रीति ने उसका आगे बढ़ा हुआ हाथ थाम लिया।

“बस एक बात याद रखिएगा कि आपके इकबालिया बयान सहित हमारे पास इतना कुछ है, कि अगर हमें धोखा देने के बारे में सोचा भी, तो बाक़ी की ज़िंदगी जेल में ही कटेगी आपकी।”–अमित हाथ छुड़ाते हुए सख्त लहजे में बोला।

“मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं।”–प्रीति बोली।

“रणविजय से मिलने के बाद, बन भी सकता है। आपको लग सकता है कि अब आपका कोई कुछ नही बिगाड़ सकता। लेकिन हमारे लिए नहीं, पर अपने लिए इस ख्याल से दूर ही रहिएगा।”

“मेरा सरकार से लड़ने का कोई इरादा नहीं है।”–प्रीति निश्चयात्मक स्वर में बोली।

“गुड।” “वैसे आप लोग रणविजय का करेंगे क्या ?”–वह कुछ सोचकर अमित से बोली।

“हम आपको रणविजय की सम्पत्ति की वारिस बना रहे हैं, इसी से समझ जाओ कि क्या होना है रणविजय का।”–अमित बोला।

“ओह्ह यानी उसका मरना तय है। चलो कोई नहीं। किया भी क्या जा सकता है।”–वह बोली।

“अब ये बताओ कि क्या रणविजय तुमसे शादी करने के लिए तैयार हो जाएगा ?”

वह हँसने लगी। उसकी हँसी में ही उसका जवाब छुपा था।

“गुड।”–तब जाकर अमित ने राहत की साँस ली। एक पड़ाव तो पार हो गया था। पर असली सवाल

अब भी मुँह बाए खड़ा था कि वह क्या तरकीब हो, जिससे रणविजय को मौजूदा राजनीतिक माहौल में ठोका जा सके और कोई हंगामा भी ना हो।

*********************
 
आहना शर्मावत पी॰डब्लू॰डी॰ के गेस्ट हाउस में एक कमरे में अपना ऑफिस सजाए बैठी थी। शाम के पौने छह बजे थे। रणविजय की कोठी से निकलने के बाद उसने आरिफ को रिपोर्ट दी थी, तो आरिफ़ ने उसे आज फैक्ट्री जाने से मना कर दिया था। अब उनका इरादा रणविजय की पार्टी मीटिंग को वॉच करने का था। उसी से उसके अगले कदम का पता चलना था। अभी उन्हें माहौल को परखना था। उसकी पूरी टीम वहीं ऑफिस में उसके साथ बैठी थी। तभी एक सिपाही ने संजय तिवारी के आने की सूचना दी। आहना ने उसे अंदर भेजने के लिए बोल दिया। संजय तिवारी अंदर आया, तो आहना ने उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया। वह खामोशी से बैठ गया। आहना सामने पड़ी फाइल में व्यस्त हो गई।

बीस मिनट गुज़र गए। संजय तिवारी बैठा बेचैनी से पहलू बदलता रहा। काफी देर इंतज़ार करने के बाद उसने धीरे से खंखार कर गला साफ किया। “क्या है ?”–वह सख़्त लहजे में बोली।

ये उनका खास तरीका था, सामने वाले के कॉन्फ़िडेन्स को तोड़ने का।

“जी आपने बुलाया था।”–वह बोला।

“संजय तिवारी।” “जी।” “हमारे पास तुम्हारे लिए एक ऑफर है।”

“क्या ?”–वह सशंक स्वर में बोला।

“हमारा साथ दे, तेरे सारे गुनाह माफ।”

“मेरे गुनाह ? मेरे कौन से गुनाह ?” “यानी पहले इम्तिहान लेगा हमारा। पत्ते देखेगा हमारे, फिर फैसला करेगा कि शो करानी है या चाल चलेगा।” “जी मैं समझा नहीं।” “देख, तेरा आका तो गया। अब तू बता, आका के साथ जाएगा या अपनी जान बचाएगा।” “मैडम मैं सीधा सादा आदमी हूँ। एम०पी० साहब का पी०ए० हूँ। मेरा सीधा सा काम है। उनकी मीटिंग और प्रोग्राम सब क़ायदे से सेट करता हूँ। मेरा किसी ग़लत काम से कोई वास्ता नहीं।”–वह विनीत भाव से बोला।

आहना ने सामने पड़ी फाइल उठाई और तेज आवाज में पढ़ना शुरू किया–“संजय तिवारी वल्द राधेश्याम तिवारी, निवासी डी 175, शाहगंज, न्यू आगरा, उमर अड़तालीस साल, क़द पाँच फुट आठ इंच, वजन सत्तर किलो, शिक्षा सेंट जॉन्स डिग्री कॉलेज से उन्नीस सौ चौरानवे में स्नातक, दो हज़ार एक में उषा जी से विवाहित, दो संतान, एक सत्रह साल का लड़का अभिषेक, और एक पंद्रह साल की लड़की रुक्कु उर्फ़ रुक्मणी...”–आहना साँस लेने के लिए रुकी। उसने देखा कि संजय तिवारी मुँह बाए उसे ही देख रहा था। उसने आगे पढ़ना शुरू किया–“घर में इन चार लोगों के परिवार में एक अन्य सदस्य भी है। संजय तिवारी के दूर के रिश्ते का भतीजा सत्ताईस वर्षीय सौरभ। अनाथ सौरभ पिछले आठ साल से इनके साथ ही रह रहा है। हमारे संजय तिवारी जी पिता और पति का फर्ज तो अच्छे से निभा ही रहे हैं, लेकिन साथ ही एक अन्य फर्ज भी निभा रहे हैं। अपने भतीजे सौरभ के साथ उसकी पत्नी का फर्ज। गाहे बगाहे मौक़ा मिलने पर

वह इस फर्ज का निर्वहन भी अच्छे से कर रहे हैं। तिवारी जी के कई मित्र बताते है कि संजय जी चुनिंदा मित्रों की राग रंग की महफ़िल में ऐसे फर्ज बड़ी लगन और शिद्दत से निभाते रहे हैं, और संजय जी की पत्नी और संतान उनकी इस फर्जशनाशी से पूर्णतया अनजान हैं।”–आहना एक क्षण को रुकी, और फिर अर्थपूर्ण अंदाज़ मे बोली–“फ़िलहाल...” संजय तिवारी का चेहरा पीला पड़ा हुआ था। उसका शरीर हलके हलके काँप रहा था। वह मुँह बाए फटी फटी आँखों से अपलक आहना को देखे जा रहा था।

“अरे संजय जी को चाय पिलवाओ। देखो उन्हें ठंड लग रही है शायद।

”–आहना व्यंगपूर्वक बोली।

“आप लोग जो बोलोगे, मैं करूँगा।”–वह फुसफुसाया।

“अरे संजय जी, क्यों परेशान हो रहे हैं। अब तो कोर्ट ने भी इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है।”

“मेरे बीबी बच्चों को कुछ मत बताना प्लीज़।”–वह गिड़गिड़ाया।

“नहीं बताएँगे। हम क्यों बताने लगे भला ? आप बिलकुल चिंता मत करो।”–आहना सांत्वना देती हुई बोली।

“आप जो बोलोगे, वह मैं करूँगा।”

“लीजिए ये पेपर लीजिए, और इस पर आप जो भी जानते हैं रणविजय के बारे में वह सब लिख दीजिए। छोटी से छोटी बात जो आपको मालूम हो। क्या पसंद है, क्या नापसंद है, दोस्त, दुश्मन, कहाँ जाता है, कौन उसके सबसे क़रीब है, और कोठी में कौन कौन रहता है, सुरक्षा के क्या इंतज़ाम हैं, सब लिख दो।”–आहना उसकी तरफ़ एक प्लेन पेपर और पेन बढ़ाती हुई बोली। उसने पेपर थाम लिया और शुरू हो गया। आहना संतुष्टिपूर्वक उसकी तरफ़ देखती रही।

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आहना शर्मावत पी॰डब्लू॰डी॰ के गेस्ट हाउस में एक कमरे में अपना ऑफिस सजाए बैठी थी। शाम के पौने छह बजे थे। रणविजय की कोठी से निकलने के बाद उसने आरिफ को रिपोर्ट दी थी, तो आरिफ़ ने उसे आज फैक्ट्री जाने से मना कर दिया था। अब उनका इरादा रणविजय की पार्टी मीटिंग को वॉच करने का था। उसी से उसके अगले कदम का पता चलना था। अभी उन्हें माहौल को परखना था। उसकी पूरी टीम वहीं ऑफिस में उसके साथ बैठी थी। तभी एक सिपाही ने संजय तिवारी के आने की सूचना दी। आहना ने उसे अंदर भेजने के लिए बोल दिया। संजय तिवारी अंदर आया, तो आहना ने उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया। वह खामोशी से बैठ गया। आहना सामने पड़ी फाइल में व्यस्त हो गई।

बीस मिनट गुज़र गए। संजय तिवारी बैठा बेचैनी से पहलू बदलता रहा। काफी देर इंतज़ार करने के बाद उसने धीरे से खंखार कर गला साफ किया। “क्या है ?”–वह सख़्त लहजे में बोली।

ये उनका खास तरीका था, सामने वाले के कॉन्फ़िडेन्स को तोड़ने का।

“जी आपने बुलाया था।”–वह बोला।

“संजय तिवारी।” “जी।” “हमारे पास तुम्हारे लिए एक ऑफर है।”

“क्या ?”–वह सशंक स्वर में बोला।

“हमारा साथ दे, तेरे सारे गुनाह माफ।”

“मेरे गुनाह ? मेरे कौन से गुनाह ?” “यानी पहले इम्तिहान लेगा हमारा। पत्ते देखेगा हमारे, फिर फैसला करेगा कि शो करानी है या चाल चलेगा।”

“जी मैं समझा नहीं।”

“देख, तेरा आका तो गया। अब तू बता, आका के साथ जाएगा या अपनी जान बचाएगा।”

“मैडम मैं सीधा सादा आदमी हूँ। एम०पी० साहब का पी०ए० हूँ। मेरा सीधा सा काम है। उनकी मीटिंग और प्रोग्राम सब क़ायदे से सेट करता हूँ। मेरा किसी ग़लत काम से कोई वास्ता नहीं।”–वह विनीत भाव से बोला।

आहना ने सामने पड़ी फाइल उठाई और तेज आवाज में पढ़ना शुरू किया–“संजय तिवारी वल्द राधेश्याम तिवारी, निवासी डी 175, शाहगंज, न्यू आगरा, उमर अड़तालीस साल, क़द पाँच फुट आठ इंच, वजन सत्तर किलो, शिक्षा सेंट जॉन्स डिग्री कॉलेज से उन्नीस सौ चौरानवे में स्नातक, दो हज़ार एक में उषा जी से विवाहित, दो संतान, एक सत्रह साल का लड़का अभिषेक, और एक पंद्रह साल की लड़की रुक्कु उर्फ़ रुक्मणी...”–आहना साँस लेने के लिए रुकी। उसने देखा कि संजय तिवारी मुँह बाए उसे ही देख रहा था। उसने आगे पढ़ना शुरू किया–“घर में इन चार लोगों के परिवार में एक अन्य सदस्य भी है। संजय तिवारी के दूर के रिश्ते का भतीजा सत्ताईस वर्षीय सौरभ। अनाथ सौरभ पिछले आठ साल से इनके साथ ही रह रहा है। हमारे संजय तिवारी जी पिता और पति का फर्ज तो अच्छे से निभा ही रहे हैं, लेकिन साथ ही एक अन्य फर्ज भी निभा रहे हैं। अपने भतीजे सौरभ के साथ उसकी पत्नी का फर्ज। गाहे बगाहे मौक़ा मिलने पर

वह इस फर्ज का निर्वहन भी अच्छे से कर रहे हैं। तिवारी जी के कई मित्र बताते है कि संजय जी चुनिंदा मित्रों की राग रंग की महफ़िल में ऐसे फर्ज बड़ी लगन और शिद्दत से निभाते रहे हैं, और संजय जी की पत्नी और संतान उनकी इस फर्जशनाशी से पूर्णतया अनजान हैं।”–आहना एक क्षण को रुकी, और फिर अर्थपूर्ण अंदाज़ मे बोली–“फ़िलहाल...” संजय तिवारी का चेहरा पीला पड़ा हुआ था। उसका शरीर हलके हलके काँप रहा था। वह मुँह बाए फटी फटी आँखों से अपलक आहना को देखे जा रहा था।

“अरे संजय जी को चाय पिलवाओ। देखो उन्हें ठंड लग रही है शायद।”–आहना व्यंगपूर्वक बोली।

“आप लोग जो बोलोगे, मैं करूँगा।”–वह फुसफुसाया।

“अरे संजय जी, क्यों परेशान हो रहे हैं। अब तो कोर्ट ने भी इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है।”

“मेरे बीबी बच्चों को कुछ मत बताना प्लीज़।”–वह गिड़गिड़ाया।

“नहीं बताएँगे। हम क्यों बताने लगे भला ? आप बिलकुल चिंता मत करो।”–आहना सांत्वना देती हुई बोली। “आप जो बोलोगे, वह मैं करूँगा।”

“लीजिए ये पेपर लीजिए, और इस पर आप जो भी जानते हैं रणविजय के बारे में वह सब लिख दीजिए। छोटी से छोटी बात जो आपको मालूम हो। क्या पसंद है, क्या नापसंद है, दोस्त, दुश्मन, कहाँ जाता है, कौन उसके सबसे क़रीब है, और कोठी में कौन कौन रहता है, सुरक्षा के क्या इंतज़ाम हैं, सब लिख दो।”–आहना उसकी तरफ़ एक प्लेन पेपर और पेन बढ़ाती हुई बोली। उसने पेपर थाम लिया और शुरू हो गया। आहना संतुष्टिपूर्वक उसकी तरफ़ देखती रही।

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‘राष्ट्रवादी चेतना दल’ का ऑफिस बालूगंज इलाक़े में जिस पुरानी कोठी में स्थित था, वहाँ आज काफी गहमागहमी थी। अब से थोड़ी ही देर में शुरू होने वाली मीटिंग में पार्टी के तक़रीबन सभी बड़े लीडर शामिल हो रहे थे। एक बहुत बड़े, डबल हाइट हॉल में ज़मीन पर गद्दे और सफेद चादरें बिछी हुई थीं। पार्टी की कमान इस समय जिस वयोवृद्ध गाँधीवादी नेता श्री विश्वनाथ कर्माकर के हाथ में थी, वह पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एकमात्र जीवित सदस्य थे। कर्माकर जी आज भी उसी पुरानी परिपाटी से पार्टी का संचालन करते थे। उसी का परिणाम था कि आज भी ज़मीन पर गद्दे बिछाकर उस पार्टी की पार्टी मीटिंग हो रही थी, जिसके प्रदेश में साठ विधानसभा सदस्य और लोकसभा में पच्चीस लोकसभा सदस्य थे। पार्टी का एक बड़ा तबका उनकी कार्यप्रणाली से खुश नहीं था, पर जनता के बीच कर्माकर जी की स्वच्छ छवि और वोट बटोरने की क्षमता उन्हें बग़ावत करने नहीं दे रही थी। कर्माकर जी से सबसे ज़्यादा दिक़्क़त रणविजय को ही थी। भला आज के दौर में जब राजनीति पूर्णकालिक व्यवसाय का दर्जा प्राप्त कर चुकी थी, उस दौर में ये महाशय त्याग, सेवा, समर्पण, समाज सुधार और भी ना जाने क्या-क्या ऊलजलूल सनक पाले बैठे थे। ना तो स्वर्ग सिधार रहे थे, और ना ही पार्टी की कमान छोड़ कर पार्टी के आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे। हालाँकि रणविजय ने उन्हें अपने काले धंधों की हवा भी नहीं लगने दी थी, पर पता नहीं क्यों बावजूद रणविजय के लगातार दो बार लोकसभा सीट जीत जाने पर भी वह उससे

कुछ ख़ुश नहीं रहते थे। हॉल में सभी लोग गद्दों पर अपने अपने आसन ग्रहण कर चुके थे। करीब चालीस लोग थे, जो थोड़ी दूरी मेंटेन करते हुए बैठे थे। कोरोना की आपदा की वजह से उपस्थिति शत प्रतिशत तो नहीं हुई थी, लेकिन अगले सप्ताह होने वाली मुख्य विपक्षी दलों की संयुक्त मीटिंग के लिए नीतियाँ और शर्तें निर्धारित करने के लिए निर्णय कर सकने लायक सदस्य उपस्थित थे।

“प्यारे पार्टी मेंबरान आप सभी जानते हैं कि आज देश के जो हालात हैं, कोरोना की महामारी, चीन की विस्तारवादी सोच और देश के अंदर बढ़ता असहिष्णुता का माहौल, इन सबको देखते हुए सरकार से हमें शिकायत है कि वह विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं ले रही है। अगले सप्ताह इन्ही मुद्दों पर सभी प्रमुख विपक्षी दलों की एक अहम बैठक होने जा रही है। तो मेरी सभी मेंबरान से गुज़ारिश है वह अपने अपने सुझाव यहाँ सबके समक्ष रखें।”–विश्वनाथ कर्माकर की वृद्ध किंतु ओजस्वी आवाज गूँजी।” कर्माकर जी के बराबर में ही उन्हीं की उम्र के उनके पुराने साथी इरफान अली बैठे थे। उन्होंने अपने क्लीन शेव चेहरे पर हाथ फिराया और सहमति में सिर हिलाते हुए अपना मास्क सही किया।

“जनाब सम्मानित मेंबरान अपने विचार रखें, उससे पहले मैं कुछ बातें पार्टी की जानकारी में लाना चाहता हूँ।”–रणविजय कर्माकर जी की तरफ़ देखता हुआ बोला। कर्माकर जी ने सिर हिलाते हुए उसे अपनी बात कहने की इजाज़त दी। “जनाब ये फासीवादी सरकार अब अपने विरोधियों के दमन पर उतर आई है।”–रणविजय बैठक में मौजूद अपने

समर्थकों की तरफ़ देखता हुआ बोला। “बात बताइए, हुआ क्या है ?”–कर्माकर जी स्थिति से अनजान नहीं थे, फिर भी पूछा। जवाब में रणविजय ने आज सुबह हुआ वाक़या दोहरा दिया।

“ये तो आपका पर्सनल मामला है। इसमें पार्टी कहाँ से आ गई ?”–कर्माकर जी का शांत स्वर गूँजा।

“नहीं, ये विपक्ष की आवाज़ दबाने के लिए जाँच एजेंसियों का गलत इस्तेमाल हो रहा है। हम ये हिटलरशाही नहीं चलने देंगे।”–रणविजय गरजा। उसका इशारा पाकर उसके समर्थकों ने भी नारेबाज़ी कर दी। कर्माकर जी कुछ देर तो देखते रहे, फिर हाथ उठा कर सदस्यों से शांत होने की अपील की। थोड़ा शोर कम हुआ, तो कर्माकर जी बोले–“नारेबाज़ी, मतांध लोगों, बहरे लोगों को, सुनाने के लिए होती है। आप लोग यहाँ नारेबाज़ी करके यहाँ किसको सुनाना चाहते हैं ? यहाँ तो सब ही एक दल के लोग हैं। यहाँ नारेबाज़ी का क्या अभिप्राय है ?” सदस्य एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

“ये सरकार तानाशाह है। ये विपक्ष की आवाज़ को कुचल देना चाहती है। ये सांप्रदायिक सरकार है। यही वह लोग हैं, जिन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ी।” “बाबरी मस्जिद!”–इरफान अली एकटक रणविजय को देखते हुए बोले–“आपकी आवाज़ दबाने के लिए शहीद की गई थी ?” “नोटबंदी, जी०एस०टी०, नकली सर्जिकल स्ट्राइक, सबने देश को बर्बाद कर दिया है। हमें राष्ट्रव्यापी हड़ताल करनी चाहिए। चक्का जाम कर देना चाहिए। तभी इस सरकार

के होश ठिकाने आएँगे।”–रणविजय इरफान अली के सवाल को अनसुना करता हुआ गरजा। “और हड़ताल और चक्का जाम से देश की पहले से ही गिरती जी०डी०पी० कहाँ पहुँच जाएगी ? महीनों से घर बैठे लोग बड़ी मुश्किल से काम पर जाना शुरू हुए हैं, वह फिर घर बैठ जाएँगे। उनके बारे में सोचा है कुछ ?”–इरफान अली बोले। “ये सोचना सरकार का काम है, हमारा नहीं। वह सत्ता में है। अगर जी०डी०पी० और गिरती है, तो हमारा तो फायदा ही है। जनता ग़ुस्से में आ जाएगी। चारों तरफ हाहाकार होगा, और इसका सीधा फायदा हमें चुनावों में मिलेगा।”–रणविजय बोला।

“लाहौल बिला कूवत। ये सोच है हमारी युवा ब्रिगेड की ? अरे कूढ़मगज देश के नुकसान से, जनता के नुकसान से, हमारा फायदा कैसे होगा ?”–“इरफान अली थोड़ा उग्र हो उठे।

“बुजुर्गवार ज़रा तहज़ीब का ख्याल रखें। वरना इस बेअदबी के मैदान में हम आपसे कहीं ऊँचे खिलाड़ी हैं।”–रणविजय बोला।

“कृपया आप इस तरह बात ना करें इरफान भाई से। वह आपसे उम्र में बहुत बड़े हैं और अनुभवी भी।“–कर्माकर जी चेतावनी देते लहजे में बोले।

“माफी चाहता हूँ, पर मुझे कूढ़मगज पहले बुजुर्गवार ने ही कहा था।”

“तो क्या ग़लत कहा था बरखुरदार ? तुम अपने घर पड़े एन०सी०बी० के छापे को नोटबंदी, जी०एस०टी० और यहाँ तक कि बाबरी मस्जिद को तोड़ने की घटना तक से जोड़ रहे हो, और क्या कहूँ तुम्हें ?”–इरफान अली तल्ख़ आवाज़ में बोले। “कैसे मुसलमान हो बड़े मियाँ ? तुम्हारी बाबरी मस्जिद

छीन ली गई और तुम्हारा खून नहीं खौल रहा ?”–रणविजय हिकारत भरे स्वर में बोला। “तुम सिखाओगे मुझे इस्लाम ? तुम ? जो पूरे देश को उपद्रव की, अव्यवस्था की आग में झोंक देना चाहते हो। वो भी सिर्फ और सिर्फ अपने ज़ाती फायदे के लिए।” “शांत शांत। इस तरह किसी मसले का हल नहीं निकलेगा। अन्य मेंबरों की भी राय ले लेनी चाहिए।”–कर्माकर जी बोले। इरफान अली परे देखने लगे। उनके होंठ रह रह कर फड़क रहे थे। वह अपने ग़ुस्से को पीने का प्रयास कर रहे थे। फिर एक के बाद एक सभी मेम्बर अपनी अपनी राय रखने लगे। कुछ आंदोलन के पक्ष में थे, कुछ विरोध में। रणविजय का पारा चढ़ता जा रहा था। अंत में इरफान अली का नम्बर आया। “जनाबे हाजरीन इसमें कोई शक नहीं कि हम सरकार की कई नीतियों से मुतमईन नहीं हैं। और हम इसकी पुरज़ोर मुखालफ़त भी करेंगे। लेकिन उसका तरीका वह नहीं होना चाहिए, जो हमारे कई माननीय सदस्य और श्री रणविजय जी ने कहा है। हम सरकार में नहीं हैं, तो क्या केवल इस वजह से देश के लिए हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं रह जाती है ? नहीं जनाब, इन हालात में हमारी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। इस समय देश महामारी की आपदा से त्रस्त है। ऐसे में कोई आंदोलन करके भीड़ लगाना देश हित में नहीं है, और ना ही आवाम के हित में है। लेकिन हम विरोध करेंगे, और ज़रूर करेंगे। मेरा प्रस्ताव है कि हमें बिना भीड़ लगाए चार पाँच के गुट में मुख़्तलिफ़ इलाकों में आमरण अनशन करना चाहिए। जब तक सरकार सर्वदलीय बैठक ना बुलाए, भूख हड़ताल जारी रहनी चाहिए।”–इरफान अली ने इसके साथ ही अपना

मत स्पष्ट कर दिया। रणविजय साफ साफ असंतुष्ट नज़र आ रहा था।

“मेरे भी विचार से इरफान भाई की बात सही है। तो फिर ये तय रहा कि संयुक्त विपक्ष की बैठक में हमारी पार्टी का स्टैंड यही रहेगा। हम भूख हड़ताल ही करेंगे, चाहे जान ही क्यों ना चली जाए।”–कर्माकर जी बोले।

“जान बची ही कितनी है जाने को।”–रणविजय भुनभुनाया।

“कुछ कहा आपने ?”–कर्माकर जी बोले।

“जी मैंने कहा कि मैं इससे सहमत नहीं हूँ।”–रणविजय बोला।

“वह तो कतई ज़रूरी नहीं कि सभी का मत समान हो। बहुमत से ही फैसला होता है। और हम भी इस पर वोटिंग ही कराएँगे।”–कर्माकर जी शांति से बोले। वोटिंग हुई। चूँकि ओपन वोटिंग हुई थी, इसलिए इरफान अली का प्रस्ताव ध्वनि मत से पास हो गया। रणविजय उठा और सबको हाथजोड़ कर सबसे विदा ली। आज तगड़ी हार हुई थी उसकी, लेकिन वह निराश नहीं था। अभी उसके तरकश में बहुत तीर बाकी थे। *********************
 
फार्महाउस के उसी ऑफिसनुमा कमरे में सभी लोग बैठे हुए थे। केवल डॉक्टर प्रीति नहीं थी। उन्हें एक अन्य कमरे में बैठा दिया गया था। फिलहाल वह सब आगे की रणनीति पर विचार कर रहे थे। आरिफ के हाथ में कुछ काग़ज़ थे, जो वह बड़े ध्यान से पढ़ रहा था। ये काग़ज़ अभी फैक्स से प्राप्त हुए थे, जो आहना शर्मावत ने भेजे थे। आरिफ ने काग़ज़ पढ़ कर अमित की तरफ़ बढ़ा दिए। फिर बारी बारी सभी ने वह काग़ज़ पढ़ लिए।

“बढ़िया काम कर रही है अपनी आहना ।”–आरिफ बोला।

“जी सर, काफी एफ़िशिएन्ट है लड़की।”

“बहरहाल अब जो हालात हैं उसकी रू में हमारी पहुँच कोठी तक हो जाएगी, और संजय तिवारी की सूरत में उसके सुरक्षा कवच की भी जानकारी मिलती रहेगी। लेकिन इससे होगा क्या ? जब तक हमारे पास उसे मार गिराने का कोई ठोस प्लान ना हो, कोई ऐसी तरकीब न हो, जिससे उसकी मौत पर कोई बवाल ना हो, तब तक हम उसके सिर पर भी खड़े हों, तो भी क्या कर लेंगे ?”

“सोच लेंगे सर कुछ। आप चिंता ना कीजिये।”–अमित बोला।

“कब सोचेंगे ? अमित हमारे पास समय नहीं है। जो आज सुबह हुआ है, उसी न्यूज़ को न्यूज़ चैनल वालों ने चला चला कर माहौल हमारे खिलाफ कर दिया है। भाई इस केस का मीडिया ट्रायल शुरू हो चुका है। कल और भी उपद्रव हो सकता है। क्या लगता है ये रणविजय चुप बैठेगा ? कल ज़रूर कुछ ना कुछ नया बखेड़ा खड़ा करेगा। हालात बिगड़ते देख सरकार कभी भी हमें इस केस से हटा सकती है।”–आरिफ परेशान स्वर में बोला।

“सर कल तो कुछ नहीं होने वाला। मेरे पास रिपोर्ट आ गई है रणविजय की। पार्टी ने आंदोलन करने से मना कर दिया है। अब जो भी कुछ होगा, वह अगले हफ़्ते हो तो हो, हाल-फ़िलहाल तो कुछ भी नहीं होने वाला। अगर रणविजय ने अपने समर्थकों को साथ लेकर कुछ भी किया, तो पार्टी उसे पार्टी से ही निकाल देगी।”–अमित ने बताया।

“चलो इधर से तो थोड़ी राहत मिली। आहना को बोल दो कि अभी फैक्ट्री पर छापा ना मारे। बस आराम से स्टाफ के बयान लेती रहे, जिससे रणविजय को ये लगता रहे, कि कुछ हो रहा है। बस बोल दो कि तीन चार दिन कोई बखेड़ा ना हो। इतना टाइम बहुत होगा हमारे लिए।”–आरिफ बोला।

“ओके सर।”–अमित तत्पर स्वर में बोला।

“अपनी साइबर टीम एक्टिव है ना ?”

“बिलकुल। उसकी एक एक कॉल पर निगाह है हमारी टीम की। ऊपर वाले कमरे में पूरा सेट–अप लगा हुआ है उनका। चौबीस घंटे निगाह है उस पर भी और उसके स्टाफ पर भी।”

“बढ़िया।”–आरिफ संतुष्ट स्वर में बोला।

“एक कॉल की है रणविजय ने, जिसमें आपकी दिलचस्पी हो सकती है।”–अमित बोला।

“किसको की है कॉल ?”

“राकेश कटियार को।”–अमित मुस्कुराते हुए बोला।

“क्या..? राकेश कटियार !…लेकिन वह तो सत्ता पक्ष का सांसद है।”

“जी सर वही।”

“क्या बात हुई उससे ?”

“कुछ खास तो नहीं, बस हाल चाल पूछा, सामान्य बातचीत की और कल मुलाकात का समय लिया है।”

“संभव है वैसे ही मिल रहा हो। राजनीतिक मित्रता हो राकेश कटियार से। अलग-अलग पार्टी से हैं तो क्या, आखिर हैं तो दोनों सांसद ही।”

“संभव है सर। और ये भी संभव है कि सरकार से सिफारिश करके अपनी जान छुड़ाने के प्रयास में हो।”

“अब हमारे पास पूरा प्लान है उस तक पहुँचने का। लेकिन बिना उसके अंत का, बिना बखेड़े वाला हल, सोचे बगैर हम ये ऑपरेशन शुरू नहीं कर सकते। क्योंकि जो तरकीब हम अभी तक नहीं सोच पाए हैं, क्या पता वह अगले दस दिन तक ना सोच पाए। इसलिए पहले ऑपरेशन का एंड सोचो तब शुरू करो।”–आरिफ निर्णायक स्वर में बोला। “मिलेगी सर, तरकीब भी मिलेगी।”–अमित विश्वास पूर्ण स्वर में सबकी तरफ़ देखता हुआ बोला।

सबने गंभीरता से सिर हिला कर उसका अनुमोदन किया।

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शाम के पाँच बजे रणविजय बेहद उखड़े हुए मूड में फैक्ट्री पहुँचा। पहुँचते ही उसने बोतल खोल ली। आनन फानन दो पटियाला पैग एक साँस में खींच गया और तीसरा बना कर सामने रख लिया। एक सिगरेट सुलगाई और आराम से बैठ कर स्थिति पर मनन करने लगा।

“साले मादरजात।”–वह भुनभुनाया। आज पार्टी मीटिंग में हुई हार वह पचा नही पा रहा था।

“साला सब कुछ कंट्रोल में था। मेंबरों का बहुमत भी मेरे पक्ष में था। पता नही कैसे सब उन्ही बुड्ढों की गाने लगे। इतना अच्छा मौका था सरकार को दबाव में लेने का। इस समय पार्टी को तो राजनीतिक बढ़त मिल ही जाती, खुद मेरा पीछा भी इन मुसीबतों से छूट जाता। पर नहीं, इन्हें तो देश भक्ति का बुख़ार है। कैसे मानते ? अरे सालों कुछ भी कर लो, मिलेगा सर्टिफिकेट देशद्रोही होने का ही।”–उसकी बड़बड़ाहट जारी थी। तभी उसके ऑफिस की घंटी बजी। उसने सामने देखा। टी०वी० स्क्रीन पर आफताब नजर आया। उसने रिमोट उठा कर दरवाजा अनलॉक कर दिया।

आफताब अंदर दाखिल हुआ और उसकी खुली बोतल और उसके तमतमाए चेहरे को देखा।

“सब ख़ैरियत ?” जवाब में रणविजय के मुँह से एक भद्दी सी गाली निकली।

“अब मैंने क्या कर दिया साहब ?”–आफताब हैरानी से बोला।

“अबे तुझे नही कह रहा। उन साले बुड्ढों को कह रहा हूँ।”–रणविजय झल्लाया।

आफताब को पता था कि वह साले बुड्ढे कौन थे। उन बुड्ढों का ज़िक्र गाहे बगाहे उसके सामने होता ही रहता था।

“हुआ क्या है ?”–आफताब ने डरते डरते पूछा।

“तेरी......हुआ है।”–रणविजय फुफकारा।

“साहब!”–आफताब आहत भाव से बोला।

“अबे तुझे नही कह रहा। आ बैठ।”–तत्काल रणविजय को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ।

आफताब उसके सामने विज़िटर चेयर पर बैठ गया, पर उसके चेहरे से नाराज़गी के भाव नही गए।

“पियेगा ?”–रणविजय, संभ्रांत रणविजय के पीछे छुप चुका था। अब उसके चेहरे पर वही सदाबहार मुस्कान थी, जो उसकी पहचान थी।

“साहब मैं कुछ कहूँगा, तो आप फिर मेरी माँ बहन एक कर दोगे।”–आफताब क्षोभ भरे स्वर में बोला।

“अरे नही मियाँ। तुझे कैसे कुछ कह सकता हूँ ? बता पियेगा ?”

“अब साहब ऐसे सवाल तो ना ही पूछो, जिसका जवाब ना में देना मुश्किल हो।”–आफताब कुछ सामान्य हुआ।

रणविजय हँसा। उसने ड्राअर से एक और गिलास निकाला और पैग बना कर उसके सामने रखा। आफताब ने गिलास उठाया और अपने सामने रख लिया।

“मियाँ ऐसे कैसे बीतेगी ? ये बुड्ढे तो मर कर ही नहीं दे रहे। क्या करें?”–रणविजय उदास स्वर में बोला।

“आप आदेश तो करो, सुबह का सूरज नही देखेंगे दोनों।”–आफताब साधारण स्वर में बोला।

“बच्चों जैसी बात ना कर आफताब। इस समय नहीं कर सकते हम ऐसा कुछ भी।”–रणविजय विवश स्वर में बोला।

“वैसे दिक़्क़त क्या है ? एन०सी०बी० वाले आए, सब देख गए, कुछ नहीं मिला उन्हें, और अब कुछ मिलने वाला भी नहीं। फिर क्या कर लेंगे ये?”

“नही आफताब ये हमलावर बाँह नहीं है। ये वह है, जो मुझे दिखाया जा रहा है। ये हमारा ध्यान बँटा रहे हैं। हमला तो कहीं और से ही होगा।”–रणविजय गंभीर स्वर में बोला।

“तो आप बताओ कि अब क्या करना चाहिए ?”–आफताब अपना गिलास खाली कर के मेज पर रखता हुआ बोला। '

“अब हम भी इन्हें कुछ और ही दिखाते हैं।”–रणविजय कुछ सोचता हुआ बोला।

“वो क्या ?”–आफताब उत्सुक स्वर में बोला।

“कुछ ऐसा, जिससे ये सामने आयें और इनका असली मक़सद पता चले।”–रणविजय कुछ सोचता हुआ बोला।

“मगर क्या ?”

“बताता हूँ। पहले ये बता कि कृपाल यादव के क्या हाल हैं ?”

“नही मान रहा। ना मान रहा है, ना ही डर रहा है।”–आफताब शर्मिंदगी भरे स्वर में बोला।
 
कृपाल यादव आगरा का ही एक मध्यम श्रेणी का उद्यमी था। कृपाल यादव के पास रणविजय की फैक्ट्री से लगता हुआ एक ज़मीन का टुकड़ा था, जो रणविजय को अपनी फैक्ट्री एक्सटेंड करने के लिए चाहिए ही चाहिए था। मगर कृपाल यादव किसी भी कीमत पर वह टुकड़ा बेचने के लिए तैयार नहीं था। ऐसा नहीं था कि रणविजय ने ज़्यादा पैसे की पेशकश नहीं की थी, पर स्थानीय राजनीति में वह मामला ऐसा उलझ गया था कि सौदा हो ही नहीं पा रहा था। “मान नहीं रहा, तो चल आज चलकर उसे मना ही लेते है।”–रणविजय मुस्कुराया।

“आज ?”–आफताब के माथे पर बल पड़ गए।

“आज नहीं, अभी।”–रणविजय ठोस आवाज में बोला।

“ठीक है। मैं अभी किसी को भेजता हूँ।”

“क्या भेजना है किसी को, मैं और तू चलते हैं ना।”

“आप चलोगे ? पर आपका नाम आ जाएगा तो ?”

“नाम आ जाएगा तो बढ़िया है ना। जब रणविजय खुद अपनी गरदन उनके फंदे में डालेगा, तभी तो पता चलेगा ना, कि फंदा किस का है।”–रणविजय हँसा।

आफताब ने असमंजस भरे भाव से उसकी तरफ़ देखा।

“देहली गेट पर रहता है ना कृपाल यादव ?”

“जी।”

“तो देहली गेट थाने का थानाध्यक्ष विनोद सेंगर है, उससे बात करा हमारी। अपने मोबाइल से मिला और व्हाटसएप्प काल मिलाना।”–रणविजय बोला।

आफताब ने अपना मोबाइल निकाल कर कॉल मिलाई और मोबाइल रणविजय को थमा दिया। सम्पर्क होते ही रणविजय थानाध्यक्ष सेंगर से धीमे स्वर में बात करने लगा। उसकी बात जब समाप्त हुई, तो आफताब के चेहरे पर उसके लिए प्रशंसा के भाव थे।

“वाह नेताजी वाह ! क्या दाँव खेला है ! एक तीर से दो निशाने।”

“चल, तो पहुँच रोहित को लेकर और याद रख ठीक आठ बजे काम होना है।”

“आप चिंता ना करो साहब। ठीक आठ बजे उसे प्रभुदर्शन हो जाएँगे।”–आफताब खड़ा होता हुआ बोला।

“चल तो हम भी निकलते हैं। काम होते ही त्रिलोकी को खबर कर देना।”

“ठीक है साहब।” आफताब और रणविजय दोनों ही अपने अपने गंतव्य को रवाना हो गए।

कृपाल यादव करीब चालीस साल का हट्टा-कट्टा आदमी था। मूलरूप से आज़मगढ़ का रहने वाला कृपाल यादव पिछले बीस साल से आगरा में ही रह रहा था। उसका लैदर का कारख़ाना था। एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता से–जिसका रणविजय से छत्तीस का आँकड़ा था–आजकल उसके घनिष्ठ संबंध बने हुए थे। उसी की शह पर उसने रणविजय को बाज़ार से दुगनी कीमत पर भी ज़मीन देने से इनकार कर दिया था। कृपाल यादव को आने वाले चुनाव में विधानसभा का टिकट मिलने की भी पूरी उम्मीद थी।

करीब पौने आठ बजे उसके गेट पर एम०पी० साहब की बत्ती लगी फ़ोर्चुनर आकर रुकी, तो उसके माथे पर बल पड़ गए। अगली सीट पर सवार व्यक्ति ने गाड़ी रुकते ही उतर कर अदब से पिछला दरवाज़ा खोला। सफेद कलफ़ लगे खादी के कुर्ते पायजामे और नीले रंग की जवाहर जैकेट पहने नेता जी ने बाहर कदम रखा, तो कॉलोनी में हलचल सी मच गई। नेता जी सर पर फर वाली कश्मीरी टोपी लगाए थे और मुँह पर मास्क भी लगा रखा था। गाड़ी से निकलते ही नेता जी ने जेब से सेनेटाइज़र की छोटी सी बोतल निकालकर कर हाथ सेनेटाइज किए और कृपाल यादव की तरफ़ हाथ जोड़ दिए। कृपाल यादव के हाथ खुद-ब-ख़ुद जुड़ गए। उसके लिए ये पहला मौक़ा था, जब उसकी मुलाक़ात रणविजय से हो रही थी। कृपाल यादव ने उन्हें सम्मान से अंदर ले जाकर बिठाया। आफताब मास्क लगाए और हाथों पर दस्ताने पहने उनके साथ ही था। अंदर ड्रॉइंग रूम में तीन चार पड़ोसी पहले ही बैठे हुए थे। उन्होंने नेता जी को देखा, तो सम्मान में खड़े होकर अभिवादन किया।

“अरे बैठिए बैठिए।”–नेताजी हाथ जोड़कर अभिवादन स्वीकार करते हुए बोले। दो लोगों ने तो मोबाइल निकाल कर नेता जी की वीडियो तक बनानी शुरू कर दी।

“और सुनाइए यादव जी क्या हाल हैं ?”–नेता जी मधुर स्वर में बोले।

“जी आपकी कृपा है।”–कृपाल यादव असमंजस भरे स्वर में बोला।

“जी वह तो थी ही। मगर अब आज और अभी से हम वह कृपा वापस ले रहे हैं।”–नेता जी मीठे स्वर में बोले।

“जी क्या मतलब ?”–यादव चौंका।

नेता जी ने आफताब की तरफ़ हाथ बढ़ाया। आफताब ने सहज भाव से अपने हाथ में पकड़े बैग से पिस्टल निकाल कर नेता जी को थमा दी। नेता जी ने पिस्टल पकड़ी और कृपाल यादव की तरफ़ तान दी। कृपाल यादव की आँखें फट पड़ीं। लेकिन इससे पहले कि वह हिल भी पाता, नेता जी ने उसे पॉइंट ब्लैंक शूट कर दिया। गोली सीधी उसके माथे पर लगी और वह निशब्द पीछे की तरफ लुढ़क गया। ड्रॉइंगरूम में मौजूद हर आदमी को जैसे लकवा मार गया। नेताजी ने निर्विकार भाव से पिस्टल वापस आफताब को थमाई और जेब से सेनेटाइज़र निकाल कर हाथ फिर से सेनेटाइज किए और हाथों को आपस में मसलते हुए बाहर निकले और गाड़ी में बैठकर विदा हो गए। तब कहीं जाकर लोगों को अहसास हुआ कि क्या हो गया था। मकान के अंदर से रोने पीटने की आवाज़ आनी शुरू हो गई।

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‘ब्रेकिंग न्यूज़–सांसद रणविजय सिंह हत्या के अभियोग में गिरफ़्तार।’ टी०वी० पर लगातार ये न्यूज़ फ्लैश हो रही थी। आरिफ, अमित, डॉली , आहना , राज , जुगल और किशोर सभी अवाक से टी०वी० की तरफ़ देखे जा रहे थे।

“भाई ये...।”–डॉली कुछ बोलने को थी कि आरिफ ने हाथ उठा कर उसे ख़ामोश कर दिया। उसका ध्यान टी०वी० पर एंकर जो बोल रही थी उस पर लगा हुआ था।

“आज शाम शहर के व्यवसायी श्री कृपाल यादव की गोली मार कर हत्या कर दी गई। श्री कृपाल यादव की हत्या में पुलिस ने सांसद रणविजय सिंह को उनकी कोठी से अभी अभी गिरफ़्तार कर लिया है। हत्या के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हत्या खुद सांसद महोदय ने की है। कुछ लोगों ने घटना की वीडियो मोबाइल द्वारा बनाई थी, जो उन्होंने पुलिस को सौंप दी है, जो कि इस हत्या का मुख्य सबूत है। देहली गेट थाने के थानाध्यक्ष श्री विनोद सेंगर ने स्पष्ट बताया है कि प्रथमदृष्ट्या सांसद महोदय द्वारा ही हत्या किया जाना प्रतीत हो रहा है। यहाँ गौरतलब है कि एक ज़मीन के टुकड़े को लेकर सांसद महोदय और कृपाल यादव का विवाद चल रहा था।”

फिर जब एंकर बार-बार उन्ही बातों को दोहराने लगी, तो आरिफ ने रिमोट से वॉल्यूम धीमी कर दी।

“सर मेरी समझ से तो बाहर की बात है ये।”–अमित आरिफ की तरफ़ देखते हुए बोला। आरिफ कुछ नहीं बोला। वह किसी गहरी सोच में डूबा था।

“सर अब हमारा काम तो हो गया। क़त्ल की सजा भी कम से कम उम्रक़ैद तो है ही। यानी अब हमें क्या ज़रूरत है कोई सबूत तलाशने की ? हमारा काम तो नेताजी ने खुद ही कर दिया।”–किशोर बोला।

“सवाल तो यही है कि क्यों कर दिया ?”–आरिफ बुदबुदाया।

“मतलब ?”–किशोर बोला।

“मतलब यही कि हमारा काम नेता जी ने क्यों कर दिया ?”–आरिफ धीमे स्वर में बोला।

“अरे सर अचानक ग़ुस्सा आ गया होगा। गोली चल गई। अब ग़ुस्से में आदमी में सोचने समझने की शक्ति कहाँ रह जाती है।”–किशोर बोला।

“तुम्हारी बात मान लेता, अगर क़त्ल कहीं सड़क या सार्वजनिक स्थल पर हुआ होता। लेकिन क़त्ल तो कृपाल यादव के मकान पर हुआ है। वहाँ तो नेताजी सोच समझ कर ही गए होंगे।”–आरिफ बोला।

“शायद बात करने गए होंगे। और वहाँ बात-चीत के दौरान गर्मागर्मी हो गई होगी।”

“मोबाइल क्लिप देखते हैं घटना की। पता चल जाएगा कि कितनी गर्मागर्मी हुई थी।”–अमित बोला।

आरिफ ने सहमति में सिर हिलाया।

“आरिफ भाई एक बात है, जो कि सामान्य नहीं है।”–राज बोला।

आरिफ सहित सबने उसकी तरफ़ देखा।

“जब आहना जी ने उसकी कोठी पर छापा मारा था, तो समर्थकों का हुजूम जुड़ गया था। टीम को वहाँ से निकलना तक मुश्किल हो गया था। जबकि अब पुलिस उसे गिरफ़्तार तक कर लाई, लेकिन किसी हंगामे की कोई ख़बर नहीं है।”–राज बोला। अमित और आरिफ की निगाह मिली। फिर दोनों ने प्रशंसात्मक निगाहों से उसे देखा।

“बहुत बढ़िया पॉइंट है वकील साहब।”–अमित बोला।

डॉली के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे तारीफ़ उसकी हो रही हो। सत्य ही है कि नफरत छुपाई जा सकती है, प्रेम नहीं।

“तो अब हमारा अगला ऐक्शन क्या होना चाहिए ?”–आहना बोली।

“पहले क्लिप मँगवाओ। उसे देखते हैं, फिर निर्धारित करते हैं अपना ऐक्शन।”–आरिफ बोला।

“नेट पर तलाशो वह क्लिप तो वायरल हो रही होगी।”–

आहना अपना मोबाइल निकालती हुई बोली।

“नहीं है नेट पर।”–काफी देर सर्च करने के बाद आहना बोली।

“ऐसा कैसे हो सकता है ? वीडियो तो बनाई ही वायरल करने के लिए जाती है। इतनी सनसनीख़ेज़ क्लिप कोई क्यों नही डालेगा नेट पर, जिसे लाखों व्यूज मिलने तय हैं ?”–अमित के माथे पर बल पड़ गए।

“इसमें भी पेंच है।”–आरिफ बोला।

“कोई नही हम मँगवा लेते हैं। पहले देख लें। फिर आगे की सोचेंगे।”–अमित बोला।

“मँगवाओ।”–आरिफ बोला। अमित मोबाइल निकाल कर कॉल करने में व्यस्त हो गया।

*********************
 
रात के साढ़े बारह का वक़्त था। मूसला धार बारिश हो रही थी। बारिश की वजह से तापमान काफी गिर गया था। बादल तो शाम से ही छाये हुए थे, लेकिन बारिश ग्यारह बजे शुरू हुई थी। रणविजय देहली गेट थाने के एक कमरे में मौजूद था। जींस, टीशर्ट और जैकेट पहने रणविजय के चेहरे पर तनाव का हल्का सा भी निशान नही था। कमरे में उसके साथ ही एस०पी० सिटी, डी०एम० और थानाध्यक्ष विनोद सेंगर मौजूद थे। रणविजय ने एक सिगरेट सुलगा रखी थी और उसके छोटे छोटे कश लगा रहा था।

“सर आपसे निवेदन है कि सारा वाकया सही सही बता दें, हुआ क्या था ? कैसे हुआ ?”

“एक कॉफी मँगवाइए हमारे लिए। और एक रूम हीटर लगवाइए यहाँ। ठंड काफी बढ़ गई है।”–रणविजय डी०एम० साहब से मुख़ातिब हुआ।

एस०पी० सिटी ने विनोद सेंगर की तरफ़ देखा। वह सिर हिलाकर तत्काल कमरे से बाहर निकल गया।

“भाई डी०एम० साहब, आप क्यों इतनी ठंड में यहाँ मौजूद हैं ? ये आपका काम तो नहीं है।”–रणविजय डी०एम० साहब से बोला।

“सर मैं तो बस आपके लिए आया हूँ। आपको किसी क़िस्म की तकलीफ़ ना हो।”–डी०एम० विनीत स्वर में बोला।

“अरे हमें कोई दिक़्क़त नहीं है। भारतीय संविधान में गहरी आस्था है हमारी। हम हर संवैधानिक प्रक्रिया में सहयोग करेंगे। चाहे सामने वाले की हमारे सामने कोई औक़ात हो, या ना हो।”–रणविजय हँसते हुए सामान्य स्वर में बोला।

एस०पी० के चेहरे पर सख़्ती के भाव आए। उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर कुछ सोचकर सख़्ती से भींच लिया।

“सर प्लीज़ सहयोग कीजिए।”–डी०एम० साहब बोले।

“क्या सहयोग करें ? पैंट खोलकर खड़े हो जायें तुम्हारे सामने ?”–रणविजय फिर हँसा।

दोनों अफ़सरों का चेहरा कानों तक लाल हो गया। तभी एक कांस्टेबिल रूम हीटर लेकर आया और कमरे में लगा गया। उसके पीछे पीछे एक लड़का आया और कॉफी रणविजय के सामने रखे स्टूल पर रख गया। रणविजय ने कॉफी का मग उठाया और एक सिप ली। “आप लोग नही लेंगे ?”–उसने दोनों अफ़सरों से पूछा।

“नहीं सर आप लीजिए।”–डी०एम० साहब विनयपूर्वक बोले।

“सर बड़ी माजरत से कहना चाहता हूँ कि इस दुनिया में वक़्त से बड़ा कुछ भी नहीं है।”–एस०पी० से जब्त नहीं हुआ, तो बोलने से खुद को नही रोक पाया।

“सही कह रहे हैं आप। वक़्त से बड़ा कुछ भी नहीं। बहुत पहले भी कई बार थाने जाने का अवसर आया था, और आज भी अवसर आया है। बहुत फर्क है पिछली बार की विज़िट और आज की विज़िट में। सब वक़्त का ही खेल है।”–रणविजय कॉफी में घूँट भरता हुआ बोला।

एस०पी० ने असहाय भाव से कंधे उचकाए।

“सर आपके साथ और कौन था ?”–डी०एम० साहब ने पूछा।

“आप के इलाक़े में जनगणना कब से नहीं हुई ?”–रणविजय ने डी०एम० साहब के सवाल पर कोई ध्यान ही नही दिया।

“काफी टाइम हो गया। शायद अब करवाई जाए।”–डी०एम० साहब बोले।

“हमने ही करवाई थी। लगता है कि फिर हमें ही आकर करवानी पड़ेगी।”–रणविजय अर्थपूर्ण स्वर में बोला। दोनों अफ़सर उसकी बात में छुपे अर्थ और उसकी धमकी को अच्छी तरह समझ गए।

“सर हमारे लिए क्या आदेश है ?”–अंततः डी०एम० साहब बोले।

“गुड, अब सही लाइन पकड़ी है आपने।”–रणविजय संतुष्ट स्वर में बोला। दोनों अफ़सर मौन उसकी तरफ़ देखते रहे।

“तो अब हमारी सुनिए।”–रणविजय निर्णायक स्वर में बोला। दोनों चुप ही खड़े रहे।

“हमे पता है कि हमारे ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत हैं आप लोगों के पास। हमारी हाँ या ना की आपको कोई ज़रूरत नहीं है। हमे अब लम्बे समय तक जेल में रहकर अपने पापों का प्रायश्चित करना ही है। तो अब हमारी आत्मा पर जो बोझ है, उसे हम हल्का करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि अपने हर उस अपराध का प्रायश्चित कर लें, जो हमने किए हैं। चाहे वह किसी को पता हो, या ना पता हो।”–रणविजय गंभीर स्वर में बोला।

दोनों अफ़सरों ने एक दूसरे की तरफ़ देखा। दोनों की आँखों में चमक थी।

“आप लोग बाकी सब लोगों को भी बुला लीजिए। हम अपने सब अपराध एक ही बार में स्वीकार करना चाहते हैं।”

“बाकी सब लोग ? बाकी सब लोग कौन सर ?”–डी०एम० साहब बोले।

“बहुत सी सरकारी एजेंसियाँ हैं, जो हमारी जाँच कर रही हैं। उन सबको बुला लीजिए। यही मौक़ा है जब वह हमसे दरयाफ़्त कर सकती हैं। हमें पता है कि इस अपराध से हम बच नही सकते। और सभी अपराधों की सजा एक साथ ही चलेगी। तो हम अपनी आत्मा पर कोई बोझ क्यों रखें ?”–रणविजय भावपूर्ण स्वर में बोला।

“सर आपके साथ इस हत्या में कौन था और हत्या में प्रयुक्त फार्चुनर गाड़ी कहाँ है ?”–एस०पी० साहब ने पूछा।

“सब लोग आइए। हम एक ही बार में सब बताएँगे।”–रणविजय निर्णायक स्वर में बोला।

“सर सिर्फ इतना ही बता दीजिए कि आपके साथ कौन था ?”

“ये रूम हीटर किस कम्पनी का है ? बड़ी अच्छी हीट है इसकी।”–रणविजय मुस्कुराते हुए बोला।

“सर आपके पीछे पलंग बिछा हुआ है। आप आराम करिए। हम लोग अभी आते हैं।”–डी०एम० साहब एस०पी० सिटी को उठने का इशारा करते हुए बोले। दोनों उठकर कमरे से बाहर आ गए। उनके चेहरे से ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी। प्रोमोशन और मैडल उनकी आँखों के सामने नाच रहे थे।

मोबाइल की लगातार बजती घंटी ने आरिफ को उठने पर मजबूर कर दिया। उसने बंद आँखों से ही टटोल कर मोबाइल उठाया और कॉल रिसीव की। कॉल ख़त्म होने तक उसकी आँख पूरी तरह खुल चुकी थी। उसने टाइम देखा। डेढ़ बजे थे। एक बजे तक तो उन लोगों की मीटिंग ही चली थी, यानी अभी उसे सोए आधा घंटा ही हुआ था। उसने अमित को फोन लगाया और सभी लोगों को नीचे ऑफिसनुमा कमरे में बुलाने के लिए बोलकर, नाइट सूट उतार कर पैंट शर्ट पहन कर तैयार होने लगा। वह नीचे कमरे में पहुँचा, तो सभी लोग वहाँ पहले ही पहुँच चुके थे। वह अंदर दाखिल हुआ और एक कुर्सी पर बैठ गया। कमरे में मौजूद सभी लोगों ने सवालिया निगाहों से उसकी तरफ़ देखा।

“हमारा मुर्गा कनफेस करना चाहता है।”–आरिफ ने बम सा फोड़ा।

“क्या ?”–तक़रीबन सभी के मुँह से निकला।

“हाँ, उसका कहना है कि उसे मालूम है, कि उसके ख़िलाफ़ इस हत्या के पर्याप्त सुबूत हैं, और उसे सजा होकर ही रहेगी। तो फिर वह दिल पर बोझ लेकर क्यों जिए। वह अपने सारे अपराध क़ुबूल करना चाहता है।”

“दिल पर बोझ ? उसके दिल पर बोझ है ! ये भी कोई मानने वाली बात है।”–आहना बोली।

“हज़म तो नही हो रही, पर जो सामने है उसे कैसे झुठलाया जाए ? मुर्गा फँसा हुआ तो है और उसके ख़िलाफ़ पर्याप्त साक्ष्य भी हैं। वीडियो क्लिप तक है। बचेगा भी कैसे ? सजा तो उसे होकर ही रहेगी।”–आरिफ बोला।

“कोई भेद है सर। हर हाल में कोई भेद है।”–अमित बोला।

“तो क्या करें ? वह तो लम्बे समय के लिए जेल गया। अब बाहर हम क्या करेंगे ? उससे प्राप्त जानकारी के आधार पर ही तो उसका गैंग नेस्तनाबूद होगा।”–आरिफ उलझन भरे स्वर में बोला।

“वह क्लिप कहाँ है ?”–राज बोला।

“वह एस०ओ० के मोबाइल में है। उसके मोबाइल में कोई दिक़्क़त हो गई है, इसलिए फॉरवर्ड नहीं कर पाया। जल्दी ही मिल जाएगी।”–आरिफ बोला।

“ये कोई मानने वाली बात है। ये तो पुलिसियों की खास स्टाइल है।”–राज बोला।

डॉली को छोड़ सबने उसे घूर कर देखा।

“ओह सॉरी, मेरा मतलब था कि खास पुलिसियों की खास स्टाइल है।”–राज शर्मिंदा हो गया।

“बहरहाल अब हालात बदल चुके हैं, तो उससे मिलना तो पड़ेगा ही।”–आरिफ बोला।

“या तो केवल आप जाओ, या केवल मैं जाता हूँ, जिससे अगर कोई फंदा हो भी, तो सब ना फँसे।”–अमित बोला।

“मैं ही जाता हूँ।”–आरिफ बोला।

“मैं तो जा सकती हूँ साथ में। मैं तो पहले से ही एक्सपोज हूँ।”–आहना जल्दी से बोली।

“हाँ तुम चल सकती हो।”–आरिफ विचार करता हुआ बोला।

“कब चलना है सर ?”–आहना उत्सुक भाव से बोली।

“अभी।”–आरिफ ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

“मैं दो मिनट में तैयार होकर आती हूँ।”–आहना बोलकर तेजी से कमरे से निकल गई।

दस मिनट बाद ही आरिफ स्कार्पियो को द्रुत गति से दौड़ाए लिए जा रहा था। बारिश अब भी हो रही थी और मूसलाधार हो रही थी। सड़कें और पेड़ पौधे धुलकर बिलकुल साफ हो गए थे। ठीक आधा घंटे बाद उनकी स्कार्पियो थाने के सामने खड़ी थी। देहली गेट थाने के बाहर इतनी बारिश में भी न्यूज़ चैनल वालों का हुजूम सा लगा हुआ था। आरिफ और आहना बड़ी मुश्किल से अंदर तक पहुँच पाए। दो बीस पर विनोद सेंगर, आरिफ, आहना , डी०एम० साहब और एस०पी० सिटी ने रणविजय वाले कमरे में प्रवेश किया। रणविजय अब भी कुर्सी पर बैठा सिगरेट के कश लगा रहा था। पूरे कमरे में सिगरेट का धुआँ भरा हुआ था।

“आइए आइए, मैं तो आप ही लोगों का इंतज़ार कर रहा था।”–रणविजय के चेहरे पर चिर परिचित मुस्कान थी। तनाव या थकान का कोई नामो निशान तक नहीं था। “कहिए आहना जी, ठीक तो हैं न आप ?”–रणविजय हाथ जोड़कर बोला।

आहना ने कोई जवाब ना देकर, उसकी तरफ़ से मुँह फेर लिया।

“आप की तारीफ़ ?”–वह आरिफ से मुख़ातिब हुआ।

“सर मैं आरिफ अली फ्रॉम एन०सी०बी०।”–आरिफ उसका अभिवादन करता हुआ बोला।

“और आपकी कोई नई तारीफ़ ?”–वह फिर आहना से मुख़ातिब हुआ।

“सर मैं आहना शर्मावत फ्रॉम आई०बी०।”–आहना धीमे स्वर में बोली।

“चलो शुक्र है इस बार केवल डिपार्टमेंट बदला, नाम नहीं बदला।”–रणविजय हँसता हुआ बोला। आहना के कलेजे में वह हँसी तीर की तरह लगी। वह कसमसा कर रह गई।

“बैठिए आप लोग, खड़े क्यों हैं।”–रणविजय सामने कुर्सियों की तरफ़ इशारा करता हुआ बोला। सभी लोग खामोशी से बैठ गए।

“और कोई साहबान भी आने वाले हैं ?”–रणविजय आरिफ की तरफ़ देखता हुआ बोला।

“नही क्यों ?”–आरिफ़ ने असमंजस से पूछा।

“ये तो दो ही डिपार्टमेंट हुए। कोई एन०आई०ए० से, रॉ से, ई०डी० से और आना हो ?”

“नहीं सर और कोई नही आना।”–आरिफ धैर्यपूर्वक बोला।

“यानी आप ही हैं इन सब के पीछे।”–रणविजय मुस्कुरा कर बोला।

“सर ऐसी कोई बात नहीं है।”–आरिफ अनमने स्वर में बोला।

“चलिए पूछिए। क्या पूछना है ?”–रणविजय एक नई सिगरेट जलाता हुआ बोला।

“चार दिसंबर 2019 में कनाडा में आप मार्क हैडली, बलविंदर सिंह और हाजी राशिद से मिले थे। ये मुलाक़ात किस संदर्भ में हुई थी ?”–आहना ने पूछा।

“ओह तो ये बात है।”–रणविजय के चेहरे से मुस्कान ग़ायब हो गई।

“बताइए सर।”–आहना ज़ोर सा देती हुई बोली।

“मित्र हैं हमारे। मिल गए तो मिल लिए।”–रणविजय के चेहरे पर पुनः मुस्कान खेलने लगी ।

“ये लोग आपके मित्र हैं ?”–आहना का स्वर गंभीर था।

“मेरे सब मित्र हैं। कोई शत्रु नहीं। मैं पाप से घृणा करता हूँ, पापी से नहीं।”

“आपको पता है कि मार्क हैडली के तार मुंबई में हुए आतंकवादी हमले से जुड़े हुए हैं ?”

“नहीं, हमें नही मालूम।”
 
“सर आप पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं। कैसे मान लें कि आपको नहीं मालूम?”–आहना सख़्त स्वर में बोली।

“हमें ये नहीं मालूम था कि जिससे हम मिल रहे हैं और जो हमारा मित्र है, ये वह मार्क हैडली है।”–रणविजय आराम से बोला।

“सर आप यहाँ से कनाडा गए। कनाडा से पाकिस्तान, पाकिस्तान से फिर कनाडा होते हुए वापिस आए। आप सीधे यहीं से पाकिस्तान क्यों नहीं गए थे ?”

“हमारी मर्ज़ी।”–रणविजय लापरवाह अंदाज़ में बोला।

“सर आप पाकिस्तान गए, तो पाकिस्तान ने आपके पासपोर्ट पर इंडोर्स करके मोहर क्यों नहीं लगाई ?”–आहना उसकी आँखों में झाँकती हुई बोली।

“जाकर पाकिस्तान से पूछो। हमें क्या पता क्यों नही लगाई।”–रणविजय के चेहरे पर गंभीरता के भाव थे।

“सर अपने कहा था कि आप कनफेस करना चाहते हैं।”–आहना सख़्त स्वर में बोली।

“अरे तो तुम कुछ भी ऊटपटाँग बोलोगे, वह भी कनफेस कर लें क्या? जो पाप हमसे हुए हैं, वही तो कनफेस करेंगे न ?”–रणविजय उसे घूरता हुआ बोला।

“चलिए सर आप ही बताइए कि आप क्या कनफेस करना चाहते हैं।”–आरिफ सब्र के साथ बोला।

“हमें शिव भगवान में बड़ी आस्था है। हम पिछले तीस साल से हर सोमवार का व्रत रखते हैं। आज तक नागा नहीं हुआ, न ही कभी भंग हुआ। लेकिन पिछले सोमवार को हमसे गलती से व्रत भंग करने का पाप हो गया। हमें याद ही नही रहा।”–रणविजय गंभीरता से बोला। चारों एक दूसरे की शक्ल देखने लगे।

“पिछले महीने हमारी गाड़ी के नीचे गिलहरी आकर मर गई। उस समय गाड़ी भी हम ही चला रहे थे। ये हमारे दिल पर पिछले महीने से ही बोझ है।”

“सर आप मज़ाक़ कर रहे हैं ?”–आरिफ के माथे पर बल पड़ गए।

“नही ऑफिसर, सच में हमारी आत्मा पर बोझ है।”–रणविजय गंभीरता से बोला।

“छोड़िए, आप पहले कृपाल यादव की हत्या के बारे में बताइए।”–आरिफ बोला।

“मौजूदा सरकार के शासन में अपराधी निरकुंश हो रहे हैं। शरीफ़ आदमी का घर से निकलना मुश्किल है। बिलकुल जंगल राज है। हम इसके ख़िलाफ़ राज्यव्यापी आंदोलन करेंगे।” चारों फिर एक दूसरे की शक्ल देखने लगे।

“ये हत्या आपने की है ?”–आरिफ बोला।

“राम राम कैसी बातें कर रहे हो आप। हमें तो उस गिलहरी का अब तक अफ़सोस है और तुम आदमी मारने की बात कर रहे हो।”–रणविजय कानों को हाथ लगाता हुआ बोला।

“हमारे पास चश्मदीद गवाह है।”–एस०पी० साहब रोष से बोले।

“हमारे मुँह पर कहलवा दो। हम मान लेंगे।”–रणविजय आत्मविश्वास से बोला।

“ठीक है। ये काम तो जरूर करा देंगे।”–एस०पी० साहब बोले।

“स्वतंत्र गवाह हो। मृतक के परिवार वाले ना हों।”–रणविजय बोला।

एस०पी० साहब ने थानेदार विनोद सेंगर की तरफ़ देखा। सेंगर ने स्वीकृति में सिर हिलाया

। “ठीक है। स्वतंत्र गवाह से ही कहलवाएँगे।”–एस०पी० साहब बोले।

“वीडियो क्लिप भी तो है।”–सेंगर दबे स्वर में बोला।

“दिखाओ।”–रणविजय चैलेंज सा देता हुआ बोला। रणविजय का आत्मविश्वास आरिफ को उलझन में डाल रहा था।

“एक मिनट बाहर आइए आप सब।”–आरिफ बोला और उठ खड़ा हुआ। पाँचों लोग बाहर आ गए।

“किसी ने क्लिप देखी है ?”–आरिफ ने उन सभी से पूछा।

“हाँ हमने देखी है। ये साफ साफ हत्या करता नज़र आ रहा है। और घर के बाहर लगे सी०सी०टी०वी० में इसकी गाड़ी तक नज़र आ रही है।”–एस०पी० साहब बोले।

“ज़रा मेरे मोबाइल पर भेजिए...।”–आरिफ एक क्षण को रुका, फिर सेंगर की आँखों में झाँकते हुए वाक्य पूरा किया–“अगर मोबाइल ठीक हो गया हो तो।”

“नही, वह हैंग हो गया था। अब ठीक है। आप नम्बर बताओ मैं भेजता हूँ।”–कहने के साथ ही सेंगर ने जेब से आईफोन 12 प्रो निकाला और आरिफ की तरफ़ प्रश्नसूचक निगाह से देखा। आरिफ ने उसके मोबाइल को ग़ौर से देखते हुए नम्बर बताया। सेंगर ने क्लिप सेंड कर दी।

आरिफ ने देखा डी०एम० और एस०पी० साहब की निगाह भी उसके मोबाइल पर ही थी। आरिफ ने क्लिप चलाई और गौर से देखने लगा। एक बार चला कर उसने दोबारा देखी। फिर सी०सी०टी०वी० वाली क्लिप भी देखकर मोबाइल जेब में रख लिया।

“सर बवंडर होने वाला है। नेता जी से माफी माँगिए और इन्हें बाइज़्ज़त घर छुड़वाइए।”–आरिफ फीकी मुस्कान के साथ बोला।

“क्या मतलब ?”–डी०एम० और एस०पी० दोनों ही उछल पड़े।

“क्लिप में नेता जी नहीं हैं, कोई और है। जिसने कृपाल यादव पर गोली चलाई उसके हाथ में छह अंगुलियाँ हैं।” एस०पी० साहब ने तत्काल मोबाइल निकालकर क्लिप देखी।

डी०एम० साहब भी झाँककर देखने लगे। आरिफ ने सेंगर की तरफ़ देखा। उसने मोबाइल निकालकर क्लिप देखने का कोई उपक्रम नही किया। आरिफ के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“अरे हाँ वाक़ई!”–एस०पी० साहब क्लिप देखकर बोले।

“और गाड़ी का नम्बर बता रहा है कि गाड़ी 2020 मॉडल है। पर हाई सिक्योरिटी नम्बर प्लेट नहीं है। यानी नम्बर प्लेट नकली है। चाहे असली गाड़ी की नम्बर प्लेट के ऊपर दूसरी प्लेट पर असली नम्बर ही हो, पर साबित नहीं होगा।”

“पर नेताजी ने गिरफ़्तारी से अब तक ये नहीं कहा था कि उन्होंने खून नही किया। बल्कि एक तरह से इक़बाले जुर्म सा ही कर लिया था।”–डी०एम० साहब बोले।

“अब इन बातों का कोई फ़ायदा नहीं। अब ये मान कर चलिए कि कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं मिलेगा। बाकी इस बारे में हम बाद में बात करेंगे क्योंकि इस समय हमारी सारी बातें नेता जी सुन रहे हैं।”–आरिफ बोला।

“नहीं, वह तो कमरे में हैं। यहाँ की बात वहाँ तक सुनाई नहीं देती।”–एस०पी० साहब जल्दी से बोले।

“मैंने कहा है कि सुन रहे हैं, तो मान लीजिए कि सुन रहे हैं। इस समय वक्त हमारे साथ नहीं है। ना तो हम नेताजी का कुछ बिगाड़ पाएँगे, और ना नेता जी के होते सोतों का।”–अंतिम लाइन आरिफ ने सेंगर को देखते हुए कही।

एस०पी० साहब ने आरिफ की निगाहों का अनुसरण किया, तो उनकी आँख सिकुड़ गई। उन्होंने दाँत भींच कर सहमति में सिर हिलाया। आरिफ वापस घूमा और रणविजय के कमरे में दाखिल हो गया। आहना भी उसके पीछे पीछे आ गई। रणविजय उन्हें देख कर मुस्कुराया।

“सर आपको तकलीफ़ हुई, उसका हमें खेद है। आपके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों ने आपके ख़िलाफ़ षड्यन्त्र किया था। लेकिन हमारे प्रतिभाशाली थानेदार ने अपनी विवेचना और आपके सहयोग से दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। लेकिन फिर भी सेंगर ने आपको गिरफ़्तार करने की गुस्ताखी की है। तो अगर आप कहें, तो उसे सस्पेंड कर दें ?”–आरिफ विनयपूर्वक बोला।

“अरे नहीं। वह तो अपना फर्ज निभा रहा था। उसका तो प्रमोशन होना चाहिए। उसे इन्स्पेक्टर बना कर सी०ओ० का चार्ज मिलना चाहिए।”–रणविजय उसी मीठी मुस्कान के साथ बोला।

“जी सर, आपकी आज्ञा है, तो ऐसा ही होगा।”

“बढ़िया, तो अब आपका क्या इरादा है ? दिल्ली जाओगे या अभी यहीं रुक कर तमाशा देखोगे ?”

“दिल्ली जाएँगे सर। यहाँ का तो पानी सूट ही नहीं कर रहा। बहुत खारा है।”–आरिफ हँस कर बोला।

रणविजय ने ज़ोर का ठहाका लगाया। ठहाके में दम्भ और अहंकार भरा पड़ा था।

“सर मैं आपको कोठी पहुँचवाने का प्रबंध करता हूँ।”

“उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। हमारी गाड़ी बाहर खड़ी होगी।”–रणविजय आराम से बोला।

“सर बाहर न्यूज़ चैनल वाले हैं। आपको घेर लेंगे।”

“हमें तो आप घेर नहीं पाए, वह क्या घेर पाएँगे।”–रणविजय व्यंग्य सा करता हुआ बोला।

“सर प्लीज़, न्यूज़ वालों से कुछ ऐसा मत कहिएगा, जो हमारे लिए मुसीबत बन जाए।”

“वह तो वहीं जा कर डिसाइड करेंगे कि क्या कहना है, पर फ़िलहाल तुम्हें एक सलाह देकर जा रहे हैं।”

आरिफ ने उसकी तरफ़ सवालिया निगाहों से देखा।

“साले ठुल्लों भूला मत करो कि सामने रणविजय है।”–रणविजय का स्वर एक पल के लिए क्रूर हुआ। फिर अगले ही पल उसके चेहरे पर सदाबहार मुस्कान खेलने लगी।

आरिफ और आहना का चेहरा अपमान से जल उठा। रणविजय हँसा। पहले धीमे, फिर ज़ोर से, फिर उससे भी ज़ोर से।

आरिफ और आहना मुट्ठी भींचे ग़ुस्से को पीने का प्रयास करते रहे। रणविजय हँसता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

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तीन बज चुके थे। अमित, राज , जुगल, किशोर और डॉली फार्महाउस पर बैठे टी०वी० देख रहे थे। टी०वी० पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही थी–‘सांसद रणविजय सिंह रिहा।’ टी०वी० पर मास्क पहने रणविजय को थाने से निकलता दिखाया जा रहा था। बारिश अब भी हो रही थी। और बावजूद रात के कर्फ्यू के पता नहीं कहाँ से उसके समर्थकों का सैलाब सा उमड़ आया था। रणविजय की जय जयकार से पूरा इलाका गूँज रहा था। समर्थकों ने उसे फूल मालाओं से लाद दिया था। सोशल डिस्टेंसिंग की सरेआम धज्जियाँ उड़ रही थीं। अमित ने जल्दी जल्दी चैनल बदले। एक चैनल पर रणविजय कैमरे पर बोलता नजर आया। अमित ने वॉल्यूम बढ़ा दी। “भाइयों ! न्याय और गरीब जनता के हक के लिए आवाज उठाना अगर देशद्रोह है, तो हाँ मैं हूँ देशद्रोही। मेरे प्यारे भाईयों, अब इस अत्याचारी सरकार का अंत निकट है। क्योंकि जुल्म जब हद से गुजरने लगे, तो वह ज़ालिम के अंत की शुरुआत होती है। मुझे आतंकवादी बताया जा रहा है। हत्यारा बताया जा रहा है। क्यों ? क्योंकि मैं युवाओं के लिए रोजगार माँग रहा हूँ। हम रोजगार की बात करते हैं तो वह कहते हैं ‘पकोड़े तलो’।

हम गैस पर सब्सिडी की बात करते हैं, तो वह कहते हैं–गंदे नाले से गैस निकाल लो। हम कहते हैं कि जनता को कोरोना से बचाओ, तो वह कहते हैं–ताली बजाओ, थाली बजाओ। भाइयों, ये ताली थाली नाली वाली सरकार अब आवाम के सर पर रखा बोझ बन गई है। आज देश का अन्नदाता सड़कों पर है। सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल खुलेआम विपक्ष के दमन के लिए हो रहा है। लेकिन आज मैं इस फासीवादी सरकार को खुलेआम चेतावनी देते हुए कह देना चाहता हूँ कि जनता आ रही है, सिंहासन खाली करो। अब इस सिंहासन पर जनता बैठेगी, देश का अन्नदाता बैठेगा।”–रणविजय अपनी प्रभावशाली आवाज में धाराप्रवाह बोल रहा था। जनता ने नारेबाज़ी तेज कर दी। अमित ने रिमोट उठाकर टी०वी० बंद कर दिया। सब पिटा सा मुँह लेकर एक दूसरे को देख रहे थे। “अब ?”–डॉली के मुँह से निकला। “अब क्या ? अब पहले तो, अपनी जान बचाते हैं। बाकी आरिफ सर आ जाएँ। वह ही बताएँगे सही सही कि वहाँ आख़िर हुआ क्या है ?”–अमित बोला। “ये रणविजय आख़िर चीज़ क्या है ?”–जुगल बुदबुदाया। “इसे तो देख ही लेंगे, पर मुझे तो डर है कि आज न्यूज़ चैनलों में हंगामे के बाद दिल्ली से फोन आता ही होगा हमारी वापसी के फरमान के साथ।”–अमित लाचारगी भरे स्वर में बोला। “मेरे साथ ऐसी कोई दिक़्क़त नहीं है। मेरे हाथ बंधे हुए नहीं हैं। मैं इसे नहीं छोड़ने वाला।”–राज दाँत पीसते हुए बोला।

“वकील साहब, तुम इसके पास भी नहीं फटक पाओगे। अलबत्ता वह तुम्हें ज़रूर चींटी की तरह मसल देगा।”–अमित बोला। “कोई मज़ाक है ?”–राज नाराज़गी भरे स्वर में बोला। “वकील साहब, हमारे पास हर तरह की सलाहियत भी है और सहूलियत भी। सरकार हमारे पीछे है, फिर भी हम उसे छू तक नहीं पा रहे और वह अपनी मर्ज़ी से जैसे चाहे हमारे साथ खेल रहा है। बाकी आप खुद ही सोच लो कि आप कहाँ स्टैंड करते हो। वकील साहब, ये काम हड़बड़ी या जोश से होने वाला नहीं है। कोई तरकीब सोचनी पड़ेगी। कोई ऐसी तरकीब जो बिना शोरशराबे के, बिना किसी हंगामे के नेता जी का चैप्टर क्लोज़ कर दे।”–अमित उसे समझाता हुआ बोला। राज ख़ामोश रहा, पर असहमति उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। तभी अमित के मोबाइल की घंटी बजी। उसने देखा तो आरिफ की कॉल थी। उसने कॉल रिसीव की। कॉल मुश्किल से पंद्रह सेकंड चली और उसमें भी अमित केवल उधर की बात ही सुनता रहा। कॉल डिस्कनेक्ट होते ही उसने मोबाइल जेब के हवाले किया और उठ खड़ा हुआ। “जुगल, तुम और डॉली यहीं रुको। यहाँ दो आदमी हैं, उन पर निगाह रखो। बाकी लोग मेरे साथ आओ।”–अमित अपनी पिस्टल चैक करके जैकेट की अंदर वाली जेब में रखता हुआ बोला। “डॉली क्यों रुके ?”–डॉली विरोधपूर्ण स्वर में बोली। “सर ने कहा है। वही ऑपरेशन को लीड कर रहे हैं। तुम उन्हें कॉल कर सकती हो।”–अमित फुर्ती से बाहर की तरफ़ चलता हुआ बोला।

बाकी लोग भी अपने हथियार चेक करते हुए अमित के पीछे लपके। डॉली चेहरे पर तीव्र अनिच्छा के भाव लिए ख़ामोश रही। जबकि जुगल मुस्कुरा रहा था। *********************
 

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