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Thriller गहरी साजिश

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ठीक दस बजे मैं थाने पहुंचा, तो तिवारी को मैंने बेसब्री से अपना इंतजार करते पाया।

‘‘एक घंटे में पहुंचने की बात कही थी गोखले।‘‘

‘‘हां जिसे आपने ही दस बजे तक के लिए एक्स्टेंड कर दिया था और देख लीजिए इस वक्त ठीक दस बजे हैं।‘‘

‘‘ठीक है चल! - वो उठता हुआ बोला, फिर बड़े प्यार से मेरी पीठ पर दो बार थपकी दी और मेरे कंधे पर हाथ रखकर वो बाहर तक आया। उसका ये दोस्ताना व्यवहार मुझे कुछ चुभ सा गया। कुछ ना कुछ गड़बड़ तो जरूर थी। क्यों वो यूं पेश आ रहा था जैसे मैं उसका कोई जिगरी यार था।

बहरहाल मुझे लॉकअप तक पहुंचाकर वो वापिस लौट गया। भीतर मनोज गायकवाड़ एक चेयर पर सिर झुकाये बैठा था। एक ही रात में वो सालों का बीमार लगने लगा था। आहट पाकर उसने चेहरा ऊपर उठाया, फिर मुझपर निगाह पड़ते ही उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। मैं वहां मौजूद एक स्टूल खींचकर उसके सामने बैठ गया।

‘‘क्यों फंसाया मुझे?‘‘

‘‘क्या कह रहे हो जनाब! मैं भला आपको क्यों फंसाऊंगा, फिर पता तो चले कि मैंने ऐसा क्या कर दिया।‘‘

‘‘रिवाल्वर की खरीद-फरोख्त वाली बात तुमने पुलिस को बताई थी।‘‘

‘‘किसने कहा आपसे ऐसा?‘‘

‘‘सोचो! मैं यहां हवालात में बंद हूं तो पुलिस के सिवाय ये खबर मुझे कौन दे सकता है। कैसे पीडी हो तुम जो क्लाइंट के लिए कातिल को तलाशने की बजाय, क्लाइंट को ही कत्ल के केस में लपेट दिया।‘‘

‘‘मैंने ऐसा कुछ नहीं किया - कहते हुए मैंने अपने जेब से एक डायरी और पेन निकाला फिर उसपर लिखा ‘चुपचाप मेरी पीठ पर देखिये क्या वहां कोई चीज चिपकी नजर आती है आपको‘ फिर वो पुर्जा फाड़कर मैंने उसे पकड़ाया और बात आगे बढ़ाई - ‘जनाब आप मेरी वजह से नहीं फंसे हैं, आपको फंसाया है आपके कुकर्मो ने क्या जरूरत थी आपको यूं कत्लेआम मचाने की।‘‘

‘‘मैंने कोई कत्ल नहीं किया।‘‘ कहते हुए उसने मेरी पीठ पर से बड़ी सी बिंदी जैसी चीज नोंचकर मेरे हाथों में रख दी। तो ये माजरा था! यकीनन वो कोई माइक्रोफोन था जिसके जरिए तिवारी ने हमारी बातें सुनने का इंतजाम किया था। मैने गायकवाड़ को इशारा किया कि उसे दोबारा वहीं चिपका दे। उसने ऐसा ही किया और दोबारा मेरा सामने आकर बैठ गया।

‘‘आपके कहने से क्या होता है, आपके खिलाफ ठोस सबूत हैं, आप हरगिज भी बच नहीं सकते।‘‘

कहने के साथ-साथ मैंने पुनः डायरी में लिखा, ‘‘ये कोई माइक्रोफोन है, जिसके जरिए हमारी बातें सुनी जा रही हैं, क्या आप कुछ खास कहना चाहते हैं, ऐसी कोई बात जो पुलिस को नहीं बताना चाहते।‘‘

‘‘मैंने तो तुम्हारा बहुत नाम सुना है इस धंधे में।‘‘ कहते हुए उसने कागज पर निगाह टिका दी, फिर सिर हिलाकर हामी भरी।

‘‘क्या नाम सुना है कि मैं अपने क्लाइंट का गुनाह अपने सिर ले लेता हूं, या मैं इतना बड़ा उस्ताद हूं कि स्याह को सफेद करके दिखाता हूं।‘‘

मैंने पुनः डायरी में लिखा, ‘‘मैं जल्द ही आपसे दोबारा मिलूंगा आज की ही डेट में! अभी कोई भी बात करते रहिए, कुछ नहीं तो इसी जिद पर अड़े रहिए कि आपने कुछ नहीं किया है।‘‘

उसने पढ़ा फिर सहमति में सिर हिलाते हुए बोला, ‘‘देखो मैं ये नहीं कह रहा कि तुम स्याह को सफेद कर के दिखाओ, मगर मैंने तुम्हे रिटेन किया है तो कम से कम कातिल की तलाश तो तुम्हें जारी रखनी चाहिए।‘‘

‘‘कातिल तो मेरे सामने बैठा है जनाब।‘‘

‘‘मैं तुम्हारा क्लाइंट हूं, तुम्हें मेरी बात पर यकीन करना चाहिए, और जाकर असली कातिल की तलाश में हाथ-पांव मारने चाहिए। यूं अगर तुम मुझे ही कातिल समझ लोगे तो इंवेस्टिगेशन कैसे करोगे।‘‘

‘‘मैं आपकी सारी बातें मान लूंगा बस आप एक सवाल का जवाब दे दीजिए कि अगर आप कातिल नहीं हैं तो जो रिवाल्वर आपके पास थी, उससे रंजना चावला का कत्ल क्योंकर हो गया।‘‘

‘‘मुझे नहीं मालूम! - वो दृढ़ स्वर में बोला - यही सीधा और सच्चा जवाब है। जो तुम्हें समझ में आता हो तो ठीक वरना समझ लो मैंने तुम्हें यहां बुलाकर सिर्फ वक्त बर्बाद किया।‘‘

‘‘पुलिस का कहना था कि आप मुझे कुछ बताना चाहते हैं, कोई ऐसी बात जो आप पुलिस को नहीं बताना चाहते।‘‘

‘‘ऐसी कोई बात नहीं थी, मैं बस तुमसे मिलना चाहता था। ताकि तुम्हें हत्यारे की तलाश में लगने के लिए तैयार कर सकूं, जो कि मैं देख रहा हूं कि होता नहीं दिख रहा। अब बेशक तुम जा सकते हो।‘‘

‘‘जैसी आपकी मर्जी।‘‘ कहकर मैं उठकर खड़ा हो गया। लॉकअप से बाहर निकलते ही मुझे तिवारी अपनी तरफ आता दिखाई दिया।

‘‘कुछ बताया उसने!‘‘

‘‘नहीं, बस यही राग अलापता रहा कि वो निर्दोष है और मुझे असली कातिल के पीछे पड़ना चाहिए।‘‘

‘‘तेरी पीठ पर कुछ लगा है गोखले।‘‘ कहकर उसने वहां चिपके माइक्रोफोन को नोंचकर अलग किया और यूं दिखावा किया जैसे पीठ से हटाकर कुछ फेंका हो, मगर अगले ही पल मैंने उसके हाथ को जेब में सरकते साफ देखा।

‘‘अब मेरा लिए क्या हुक्म है।‘‘

‘‘जा भई काम तो कुछ बना नहीं, अब तुझे यहां रोककर क्या फायदा।‘‘ कहकर वो सीधा अपने कमरे में जा घुसा।

उसके इस अंदाज पर मैं तिलमिला कर रह गया। फिर मैंने ये सोचकर खुद को तसल्ली दी कि मैंने ही कौन सी उसकी मनमानी चलने दी थी।

बाहर निकल कर मैंने अंकुर रोहिल्ला के मैनेजर महीप शाह को फोन किया तो पता चला कि वो उस घड़ी हौज खास थाने में पुलिस की हाजिरी भर रहा था।

मैं थाने पहुंचा, तो वो मुझे डियुटी रूम में एक चेयर पर बैठा मिला। बड़े ही अनमने भाव से उसने मुझसे हाथ मिलाया।

‘‘जरूर मरे जा रहे होगे मुझसे मिलने के लिए जो यहां तक आ पहुंचे, नहीं।‘‘

‘‘था तो कुछ ऐसा ही।‘‘

उसने असहाय भाव से मेरी ओर देखा।

‘‘आखिरकार पुलिस को तुमपर शक हो ही गया।‘‘

‘‘बकवास मत करो।‘‘

‘‘कब से बैठे हो यहां।‘‘

‘‘चार घंटे होने वाले हैं - वो कलपता हुआ बोला - अभी और जाने कितना वक्त लगायेंगे ये लोग।‘‘

‘‘बैठा क्यों रखा है तुम्हें।‘‘

‘‘कहते हैं मेरा बयान लेंगे। कल एक ही बात को हजार बार पूछने के बाद भी आज मेरा बयान लेंगे। और अगर लेना ही है तो फिर जल्दी से लेते क्यों नहीं, क्यों मुझे यूं यहां बैठा रखा है जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया हो।‘‘

‘‘किया है?‘‘

जवाब में उसने मुझे खा जाने वाली निगाहों से घूरा।

मैं हौले से हंसा।

‘‘क्यों कलपा रहा है भाई मेरे को, कल जो सिर पर इतना बड़ा गूमड़ निकाल दिया उससे पेट नहीं भरा क्या।‘‘

‘‘वो तुम्हारी गलती थी, मैं निहत्था था फिर भी पिस्तौल दिखाकर तुम मुझे हूल दिए जा रहे थे। ऐसे में तुम्हारे कस बल ढीले करना तो बनता ही था।‘‘

‘‘अब यहां क्या करने आये हो।‘‘

‘‘तुमसे मिलने आया हूं भई! पुलिस ने अगर तुम्हे हवालात में डाल दिया तो कोई वकील वगैरह का इंतजाम करने वाला होना चाहिए या नहीं।‘‘

‘‘लिहाजा जले पर नमक छिड़कने आए हो।‘‘

जवाब में मैं फिर से हंसा तो वो मुंह फेर कर बैठ गया।
 
‘‘मैं तुम्हारे बारे में कुछ सोच रहा था।‘‘

‘‘मेरे बारे में सोच रहे थे! - वो पलटकर हैरानी से बोला - क्या सोच रहे थे।‘‘

‘‘यही कि अगर मैं पुलिस को बता दूं कि मकतूला रंजना चावला के कत्ल के वक्त तुम मौकायेवारदात पर मौजूद थे तो क्या ये लोग तुम्हें जल्दी से फ्री कर देंगे।‘‘

‘‘शी...धीरे बोलो यार! तुम तो तुम्हें मरवाने पर तुले हुए हो।‘‘

‘‘नहीं तुलूंगा, बस तुम स्वीकार कर लो कि रंजना को गोली तुमने ही मारी थी।‘‘

‘‘पागल हुए हो मैं भला ऐसा क्यों करता।‘‘

‘‘क्योंकि उसने तुम्हें बताया था कि मंदिरा का मोबाइल उसके हाथ लग गया है, जिसमें कातिल के साथ उसका आखिरी वार्तालाप भी रिकार्ड है। सुनकर तुम्हारे तो छक्के छूट गये होंगे, कहो कि मैं गलत कह रहा हूं।‘‘

‘‘नहीं भाई तुम गलत क्यों कहोगे, आखिर त्रिकालदर्शी जो ठहरे, गलती तो मैंने की तुमपर पिस्तौल तानकर, जिसका खामियाजा पता नहीं कब तक भुगतना पड़ेगा मुझे। कोई सॉरी वगैरह बुलवाना चाहते हो तो मैं अभी बोले देता हूं, लेकिन भगवान के लिए आज के बाद मुझे अपनी सूरत मत दिखाना प्लीज।‘‘

‘‘प्लीज कहते हो तो समझो मैंने मानी तुम्हारी बात, बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दो, तुमने अपने बॉस को गोली क्यों मारी। कोई सैलरी वगैरह का लफड़ा तो नहीं था।‘‘

जवाब में उसने बड़ी अप्रत्याशित हरकत की, उठकर वहां बैठे हवलदार के पास पहुंचा और गरजता हुआ बोला, ‘‘तुम लोगों ने मुझे बयान देने के लिए यहां बुलाया है, या टाइम पास करने के लिए। दो मिनट में या तो मेरा बयान दर्ज करो या मुझे जाने को कहो, वरना सब लोग पछताओगे।‘‘

हवलदार ने हकबकाकर एक बार उसकी शक्ल देखी फिर फोन करने में लग गया।

महीप शाह दोबारा अपनी सीट पर आकर बैठ गया।

‘‘बहुत बढ़िया - मैं हौले से बोला - एकदम सही ट्रीट किया तुमने उसे।‘‘

‘‘हां, अपने हाथों अपनी कब्र खोदने का इससे अच्छा रास्ता और क्या हो सकता है।‘‘

इससे पहले कि मैं दोबारा सवाल जवाब शुरू करता, उसे बयान नोट करवाने के लिए राइटर के पास भेज दिया गया। लिहाजा मुझे अपनी पूछताछ मुल्तवी करनी पड़ी। क्योंकि यूं बयान नोट होते-होते घंटों जाया हो जाते थे। उतनी देर वहां रूककर उसका इंतजार करने का कोई औचित्य नहीं था।

वहां से मैं चौहान को फोन करके उसके फ्लैट तक पहुंचा। आगे मेरा इरादा उसको साथ लेकर नीलम तंवर के पास जाने का था, जिसे बदली हुई परस्थितियों से अवगत कराना जरूरी था।

मैं सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंचा तो सीढ़ियों के दहाने पर खड़ा डॉक्टर खरवार दिखाई दिया। वो किताबों का कितना बड़ा रसिया था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उस वक्त भी वो एक मोटी सी किताब अपने हाथ में थामें हुए था।

‘‘नमस्कार जनाब!‘‘

‘‘नमस्कार भई कैसे हो।‘‘

‘‘अभी तक तो ठीक हूं आगे मालिक की मर्जी।‘‘

सुनकर वो हौले से हंस दिया।

‘‘किसी का इंतजार कर रहे हैं।‘‘

‘‘अरे नहीं भई, बस अंदर बैठे-बैठे घुटन सी महसूस हुई तो यहां आकर खड़ा हो गया। - कहकर वो तनिक रूका फिर बोला - तो ये सब किया-धरा गायवकवाड़ का निकला।‘‘

‘‘लगता तो यही है जनाब! आखिर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया है तो यूंही तो नहीं कर लिया होगा।‘‘

‘‘ठीक कहते हो मगर जाने क्यों मुझे यकीन नहीं आ रहा कि वो कत्ल जैसी वारदातों का अंजाम दे सकता है। आज सुबह ही मैं उससे मिलने गया था, बड़ी मुश्किल से पुलिस ने इजाजत दी, तब उसने एक ऐसी बात कही जिससे मुझे लगने लगा कि वो कातिल नहीं हो सकता।‘‘

‘‘ऐसी भी क्या कह दिया उसने?‘‘ मैं उत्सुक स्वर में बोला।

‘‘वो कहता था कि अगर ये सारे कत्ल उसने किये होते तो उसे रंजना के कत्ल के लिए रिवाल्वर खरीदने की क्या जरूरत थी। क्यों न उसने रंजना को भी उसी रिवाल्वर से गोली मार दी जिससे उसने अंकुर रोहिल्ला का कत्ल किया था।‘‘

‘‘दम तो है जनाब उसकी दलील में, देखते हैं पुलिस उसका क्या जवाब तलाशती है! वैसे अंकुर के कत्ल वाले दिन वो था कहां? मेरा मतलब है इस बारे में आपको कुछ पता हो।‘‘

‘‘कहां था मैं नहीं जानता। उस रोज ग्यारह बजे के करीब वो अपना फ्लैट लॉक करके चला गया था। उसके बाद शाम के सात बजे जब मैं अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए निकला तो उस वक्त भी उसके फ्लैट को ताला लगा हुआ था। बाद में वो किस वक्त लौटा कहना मुहाल है क्योंकि मैं तो अगली सुबह ही अस्पताल से वापिस लौटा था।‘‘

‘‘आपको उसकी गिरफ्तारी की खबर कब लगी?‘‘

‘‘आज सुबह। जब मैं अपनी नाईट ड्यूटी से वापिस लौटा तो पड़ोसी ने बताया कि बीती रात पुलिस गायकवाड़ को पकड़कर ले गई थी, जहां से वो तब तक वापिस नहीं लौटा था। सुनते ही मैं सीधा थाने चला गया। जहां बड़ी मुश्किल से मेरी उससे मुलाकात हो पाई। पता नहीं पुलिस ने उसके साथ कोई मारपीट की थी, या हवालात में रात गुजारने की वजह से उसकी हालत बदरंग हो गयी थी! मगर सच्चाई यही है कि उस वक्त उसकी हालत देखने लायक नहीं थी।‘‘

अभी हमारी बातें चल ही रही थीं कि तभी चौहान की काल आ गई, ‘‘कहां रह गया भई।‘‘

‘‘बाहर हूं आ जाओ।‘‘ कहकर मैंने काल डिस्कनैक्ट कर दी।

चौहान बाहर आया तो मैं डॉक्टर से विदा लेकर उसके साथ हो लिया।

‘‘डॉक्टर से क्या बातें कर रहा था?‘‘ चौहान कार में बैठता हुआ बोला।

‘‘कुछ खास नहीं, वो मुझे सीढ़ियों पर मिल गया तो गायकवाड़ के बारे में बातें करने लगा, कहता था उसे यकीन नहीं कि ये सब किया-धरा गायकवाड़ का है।‘‘

‘‘एक नंबर का चिपकू इंसान है, सुनीता से चिपकने की भी खूब कोशिश करता था, बस दाल नहीं गली उसकी।‘‘

‘‘बतौर डॉक्टर उसकी स्पेशिलिटी क्या है?‘‘

‘‘मैं नहीं जानता भाई, मेरी उससे कोई दुआ-सलाम नहीं है।‘‘

‘‘बोल रहा था कि उसकी नाईट ड्युटी चल रही है आजकल।‘‘

‘‘हो सकता है तभी तो दिनभर घर में पड़ा रहता है।‘‘

‘‘वैसे पोस्टिंग कहां है उसकी।‘‘

‘‘सरोजनी नगर में कोई अस्पताल है, वहीं।‘‘
 
बारह बजे के करीब हम नीलम के ऑफिस पहुंचे, जहां से फारिग होने में पूरा एक घंटा सर्फ हो गया। वहां से हम दोनों थाने पहुंचे। तिवारी के बारे में पता करने पर मालूम हुआ कि वो कोर्ट गया हुआ है। चौहान को बाहर छोड़कर मैं एसएचओ के कमरे में पहुंचा। उस वक्त वो मेज पर झुका कुछ लिखने में व्यस्त था। मुझे देखकर उसने सिर उठाया और बोला, ‘‘बहुत व्यस्त हूं भई, कोई जानकारी चाहते हो तो तिवारी से मिल लो।‘‘

‘‘तिवारी साहब कोर्ट गये हैं जनाब! और फिलहाल बंदा कोई जानकारी नहीं चाहता बल्कि आपकी दयादृष्टि का मोहताज है।‘‘

‘‘कितना घुमा-फिराकर बातें करते हो यार! खैर बताओ क्या चाहते हो?‘‘

‘‘अपने मुजरिम से एक मुख्तर सी मुलाकात का इंतजाम करवा दीजिए प्लीज।‘‘

‘‘सुबह मिले तो थे, ख्वाहिश पूरी नहीं हुई।‘‘

‘‘क्या करूं जनाब जब तक मैं किसी काम को रिपीट नहीं कर लेता मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं होती। बहुत परेशान हूं इस लत से, कम्बख्त छूटती ही नहीं।‘‘

जवाब में खान ने घूरकर मुझे देखा फिर मेज पर रखी घंटी पर हाथ मारा। तत्काल एक सिपाही वहां हाजिर हुआ, ‘‘साहब को ले जाकर गायकवाड़ के साथ बंद कर दो, आगे जब ये फारिग हो जाएं तो इन्हें बाहर का रास्ता दिखा देना।‘‘

मैं सिपाही के साथ हो लिया।

गायकवाड़ को मैंने ऐन सुबह वाली हालत में वहां बैठा पाया। मुझे देखकर उसने सिर उठाया फिर बोला, ‘‘मैं तो तुम्हारे आने की उम्मीद ही छोड़ बैठा था।‘‘

‘‘जनाब उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, उम्मीद है तो आदमी है वरना सब खाक समझिये।‘‘

‘‘ठीक कहते हो बैठो।‘‘

मैं सुबह वाला स्टूल खींचकर उसके सामने बैठ गया। फिर सिगरेट का पैकेट निकाल कर उसे ऑफर करने के बाद लाइटर निकालकर दोनों सिगरेट बारी-बारी से सुलगा दिए।

‘‘अब बताइए क्या कहना चाहते थे सुबह।‘‘

‘‘लिहाजा अब सुने जाने का कोई खतरा नहीं।‘‘

‘‘उम्मीद तो नहीं है, क्योंकि मैं एकदम अचानक यहां आया हूं इसलिए ऐसा कोई इंतजाम उनके लिए मुमकिन नहीं था। बशर्ते कि हवालात में ही कोई माइक्रोफोन ना फिट कर दिया हो।‘‘

‘‘कल रात के बाद से तो ऐसा कुछ होते मैंने नहीं देखा, शुरू से ही रहा हो तो नहीं कह सकता।‘‘

‘‘फिर तो बेफिक्र हो जाइए, क्योंकि शुरू से अगर ऐसा कोई इंतजाम यहां होता तो तिवारी को अलग से मेरी पीठ पर माइक्रोफोन चिपकाने की जरूरत नहीं पड़ी होती! अब बताइए क्या कहना चाहते हैं।‘‘

‘‘पिछले कुछ दिनों से कोई मुझे लगातार कॉल कर रहा था। वो सिलसिला दस मई के बाद शुरू हुआ था। नंबर हर बार नया होता था, मगर काल करने वाला वही होता था। पहली बार फोन पर उसनेे मुझे बताया था कि मेरी बीवी का किसी युवक के साथ अफेयर था। फिर उसने मुझे कुछ ऐसी तस्वीरें भेजीं जिसमें सुनीता की कमर में हाथ डाले कोई युवक खड़ा था। वो तस्वीरें हालांकि पीछे से ली गईं थीं, मगर मैं सुनीता को झट पहचान गया।‘‘

‘‘जनाब आपने मुझे कोई कहानी तो नहीं सुना रहे।‘‘

‘‘नहीं!‘‘

‘‘ठीक है आगे बढ़िये।‘‘

‘‘उसके बाद उसकी कॉल अक्सर आने लगी। वो मुझे बताता कि आज मेरी बीवी उस युवक के साथ फलाना जगह गई थी, आज उन दोनों ने फलाना होटल में रात गुजारी थी, वगैरह-वगैरह। अपनी बातों को प्रूव करने के लिए उसने किसी होटल में खड़ी सुनीता की फोटो भी मुझे भेजीं। फिर एक रोज उसने मुझे बताया कि सुनीता उस युवक पर शादी के लिए दबाव डाल रही है मगर युवक उससे शादी करने को तैयार नहीं था लिहाजा आजकल उनमें तू-तू मैं-मैं होने लगी है। तब मैंने सोचा चलो अच्छा है मुसीबत खुद बा खुद ही दूर हो जायेगी।‘‘

कहकर उसने खामोशी से सिगरेट का एक गहरा कश लिया।

‘‘फिर क्या हुआ! - मैं उत्सुक स्वर में बोला - क्या उन दोनों का ब्रेकअप हो गया।‘‘

‘‘नहीं, उसके कुछ दिनों बाद उस अंजान फोनकर्ता ने मुझे बताया कि सुनीता ने अपने प्रेमी को धमकी दी है कि अगर उसने शादी में आनाकानी की तो वो उसपर बलात्कार का मुकदमा दायर कर देगी। अब तक मैं उस अंजान फोनकर्ता की बातों पर पूरी तरह यकीन करने लगा था। वैसे भी काफी दिनों से मुझे अपनी बीवी का व्यवहार बदला-बदला सा लगने लगा था। मैं जब भी फोन करता वो कोई ना कोई बहाना बनाकर फोन काट देती थी। ऊपर से मेरी लाख कोशिशों के बावजूद वो दुबई आने को तैयार नहीं हो रही थी।‘‘

‘‘जनाब आपके ही बताये मुझे मालूम हुआ था कि आपकी बीवी को ऊंचाई से डर लगता था।‘‘

‘‘उस वक्त वो बात मैंने यूंही कह दी थी, ये साबित करने के लिए कि क्यों वो दुबई नहीं आना चाहती थी।‘‘

‘‘ठीक है आगे बढ़िये, फिर क्या हुआ।‘‘

‘‘तीस मई को उस अंजान व्यक्ति का फिर से फोन आया, उसने मुझसे कहा कि वो युवक सुनीता की हत्या की प्लानिंग कर रहा है।‘‘

मैंने हैरानी से गायकवाड़ को देखा।

‘‘मैं सच कह रहा हूं यकीन करो मेरा।‘‘

‘‘वजह क्या बताई उसने।‘‘

‘‘यही कि वो लड़का किसी भी कीमत पर एक शादीशुदा औरत से शादी नहीं करना चाहता, इसलिए उससे हमेशा के लिए पीछा छुड़ाने पर उतारू था। सुनकर मेरे होश उड़ गये। आगे उसने सलाह दी कि मुझे फौरन दिल्ली पहुंचकर अपनी पत्नी की जान बचाने की कोशिश करनी चाहिए। उसकी बात मानकर मैंने आनन-फानन में छुट्टी की अर्जी लगाई जो कि मेरा पिछला रिकार्ड देखते हुए फौरन मंजूर हो गई। फिर मैंने बहुत हैवी प्राइस चुकाकर अपने लिए दुबई से दिल्ली का एक टिकट हासिल किया। उस रोज उसका कई बार फोन आया लिहाजा मैंने उसे बता दिया कि मेरी छुट्टी मंजूर हो गई थी, साथ ही मैंने उसे अपनी फ्लाईट का शेड्युल भी बता दिया। इस तरह अगले रोज एक जून को दोपहर दो बजे के करीब मैं दिल्ली पहुंच गया।‘‘

‘‘इस बाबत आपको अपनी बीवी से दरयाफ्त करना नहीं सूझा?‘‘

‘‘सूझा था, सूझना ही था। मगर मैं जानता था कि उस बाबत वो कुछ बक के नहीं देने वाली थी। भला कौन ऐसी औरत होगी जो अपने पति के सामने गैरमर्द से अपनी आशनाई को स्वीकार करेगी। लिहाजा उस बाबत उससे कुछ पूछने का अपना इरादा मैंने बदल दिया।‘‘

‘‘ओके, तो आप दिल्ली पहुंच गये। आगे क्या हुआ?‘‘

‘‘उसका फिर फोन आया, तब मैंने उसे बता दिया कि मैं दिल्ली आ चुका था। जवाब में उसने कहा कि अगर मैं अपनी बीवी को उसके प्रेमी के साथ रंगे हाथों पकड़ना चाहता हूं तो ठीक छह बजे अपने फ्लैट पर पहुंचूं। मैंने उसकी बात मान ली और एयरपोर्ट पर बैठकर ही वक्तगुजारी करने लगा।‘‘

‘‘यूं आप एयरपोर्ट पर कितने घंटे बैठे रहे।‘‘
 
‘‘भई मैं चार बजे वहां से अपने घर के लिए रवाना हुआ था, लिहाजा दो घंटे मैंने एयरपोर्ट पर बैठकर गुजारे थे। जिसके बाद मैं एयरपोर्ट से बाहर निकला और कैब बुक करके घर के लिए रवाना हो गया। जब मैं कालकाजी पहुंचा तो पाया कि अभी सिर्फ पांच बजे थे। तब मैंने अपने फ्लैट से कुछ दूरी पर एक रेस्टोरेंट के सामने टैक्सी रूकवाई और अगला पौना घंटा मैंने वहां बैठकर गुजारा। इसके बाद मैं बाहर निकला और पैदल ही अपने फ्लैट वाली इमारत तक पहुंचा। वहां पहुंचकर मैंने फिर घड़ी देखी तो पाया कि ऐन छह बजे थे। मैं सीढ़ियां चढ़कर अपने फ्लैट तक पहुंचा तो मुझे दरवाजा चौखट से लगा हुआ नहीं जान पड़ा। मैं बिना कोई आवाज किए दरवाजा धकेलता हुआ भीतर दाखिल हुआ और थमककर खड़ा हो गया। सामने सुनीता की रक्तरंजित लाश पड़ी थी। यूं लगता था जैसे ढेर सारे गिद्धों ने मिलकर एक साथ उसे नोंच खाया हो। खड़े-खड़े मुझे चक्कर सा आने लगा पर मैंने जैसे-तैसे करके खुद को संभाला और दरवाजा भीतर से बंद करके उससे पीठ सटाकर फर्श पर बैठ गया। ठीक तभी उसका फोन आया। उसने मुझसे पूछा कि मैं दोनों को रंगे हाथों पकड़ने में कामयाब हुआ या नहीं, जवाब में मैंने उसे सुनीता के कत्ल की बात बता दी। सुनकर उसने दुःख प्रगट किया और बोला, ‘आखिरकार उसके प्रेमी ने उसकी जान ले ही ली।‘ जवाब में मेरे मुंह से एक शब्द तक नहीं निकला। तब उसी ने मुझे राय दी कि यूं सुनीता की लाश के साथ मेरा देखा जाना ठीक नहीं होगा, पुलिस मुझपर ही शक करने लगेगी। इसलिए जितना जल्दी हो सके मैं अपने फ्लैट से दफा हो जाऊं।‘‘

‘‘सूटकेस पलंग के बॉक्स में रखने की सलाह भी उसी ने दी थी।‘‘

‘‘हां उसी ने दी थी। ये कहते हुए कि अगर मैं सामान के साथ बाहर निकला तो किसी की नजर मुझपर पड़कर रहनी थी। इसलिए मैं सारा सामान फ्लैट में ही कहीं छिपा दूं। और अपनी जरूरत की चीजें बाहर से परचेज कर लूं।‘‘

‘‘फिर क्या किया आपने?‘‘

‘‘हालात को देखते हुए मुझे उसकी बात एकदम जायज लगी। मैंने उसकी बात पर अमल करते हुए सूटकेस को बेडरूम में रखे पलंग के हवाले किया और खाली हाथ, लोगों की निगाहों से बचता हुआ बिल्डिंग से भाग खड़ा हुआ और होटल में जाकर शरण ली।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ, क्या उसकी दोबारा काल आई।‘‘

‘‘हां आई, उसने मुझसे कहा कि वो मुझे पुलिस के लफड़े से बचाने की पूरी कोशिश करेगा जिसकी शुरूआत वो कर भी चुका था। उसने मुझे ये भी बताया कि ऐन सुनीता की तरह ही कातिल ने एक और लड़की को कत्ल कर दिया है। जिसका मंगेतर एक पुलिस वाला है जो कि मेरा नेक्स्ट डोर नेबर है। उसने मुझसे कहा कि फिलहाल वो कुछ ऐसे क्लू छोड़ने वाला है जिससे पुलिस का ध्यान उसके मंगेतर की ओर चला जायेगा और मंगेतर क्योंकि पुलिसवाला है इसलिए पुलिस उसे बचाने की पूरी कोशिश करेगी, लिहाजा मेरी तरफ किसी का ध्यान नहीं जायेगा। बस मुझे कोई ऐसा इंतजाम करना था कि पुलिस अगर मेरे मेरे मोबाइल की बजाय मेरे ऑफिस में फोन करे तो वो कॉल फौरन मेरे मोबाइल पर ट्रांसफर कर दी जाय। फिर अगले रोज मैं यूं जाहिर करूं जैसे पुलिस द्वारा सुनीता की हत्या की खबर मिलने के बाद ही मैं दुबई से दिल्ली आया था।‘‘

‘‘और फिर आपने ऑफिस में ऐसा कोई इंतजाम कर छोड़ा।‘‘

‘‘वो बहुत आसान काम था, मैंने स्विच बोर्ड ऑपरेटर को फोन करके बोल दिया कि अगर कोई मुझे पूछे तो बजाय ये कहने के की मैं इंडिया में था! वो चुपचाप वो कॉल मेरे मोबाइल नंबर पर ट्रांसफर कर दे। लिहाजा पुलिस ने जब मुझे दुबई कॉल किया तो वो कॉल मेरे मोबाइल पर ट्रांसफर कर दी गयी और इस तरह ये भ्रम बना रहा कि सुनीता के कत्ल वाले दिन मैं दुबई में था।‘‘

‘‘जनाब मैं ये सोचकर हैरान हूं कि आज के जमाने में कोई पढ़ा-लिखा आदमी भी इतना बड़ा बेवकूफ हो सकता है। जानते हैं अगर उसी रोज आपने सबकुछ सच-सच पुलिस को बता दिया होता तो आज ऐसा बखेड़ा नहीं खड़ा होता और आपकी यूं दुर्गति नहीं हो रही होती।‘‘

‘‘मैं अब बताये देता हूं।‘‘

‘‘अब कोई आपकी बात पर यकीन नहीं करने वाला, सच पूछिये तो मुझे तो यूं लग रहा है जैसे आप किसी सस्पेंस फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़कर सुना रहे हैं। खैर आगे बढ़िये फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘उसके बाद कल दिन में उस अंजान व्यक्ति ने फिर मुझे कॉल किया और बोला कि उसने सब ठीक कर दिया है अब पुलिस का ध्यान मेरी तरफ बिल्कुल नहीं जाने वाला था। साथ ही उसने बताया कि सुनीता के कातिल ने अंकुर रोहिल्ला नाम के एक टीवी स्टार का भी कत्ल कर दिया है। हो सकता है वो मेरे कत्ल की भी कोशिश करे इसलिए मुझे उससे सावधान रहना चाहिए। फिर उसने मुझसे पूछा कि क्या मेरे पास कोई हथियार है, मेरा मना करने पर उसने कहा कि मुझे फौरन कहीं से एक रिवाल्वर का इंतजाम करना चाहिए। जवाब में मैंने उसे बताया कि मैं इस शहर में बिल्कुल अंजान हूं भला रिवाल्वर का इंतजाम कैसे कर सकता हूं। सुनकर वो थोड़ी देर के लिए खामोश हो गया फिर उसने मुझे एक नंबर नोट करवाया और कहा कि वहां से मेरी हथियार की जरूरत पूरी हो सकती थी। इसके बाद मैं रजनीश अग्रवाल नाम के एक लड़के से मिला और उसके जरिए तेखंड गांव से एक लाख रूपयों में एक रिवाल्वर हांसिल करके अपने फ्लैट पर वापिस लौट गया। आगे क्या हुआ वो तुम्हें पता ही है।‘‘

‘‘नहीं पता, जैसे कि मुझे ये नहीं पता कि कल शाम आप अपने फ्लैट पर वापिस लौटने के बाद कहां गये थे।‘‘

‘‘कहीं नहीं गया था! सच पूछो तो वहां पहुंचने के बाद मैंने रिवाल्वर को गद्दे के नीचे छिपाया और ड्रिंक करने बैठ गया, दिन भर की भागदौड़ से मैं इतना थक गया था कि जल्दी ही मुझे ऊंघ आने लगी और मैं गहरी नींद के हवाले हो गया। जिसके बाद पुलिस ने वहां पहुंचकर मुझे सोते से जगाया था।‘‘

‘‘और कुछ जो आप बताना चाहें।‘‘

‘‘नहीं मेरे साथ जो कुछ भी घटित हुआ था वो सब मैंने तुम्हें कह सुनाया। अब तुम खुद फैसला करो कि मेरी बात में कोई सच्चाई है या नहीं।‘‘

‘‘जनाब सवाल मेरे फैसला करने का नहीं है बल्कि कानून की निगाहों में आपको बेकसूर साबित करने का है। जो कि मुझे दूर दूर तक होता नहीं नजर आ रहा। आप अगर चार की बजाय पांच बजे एयरपोर्ट से निकले होते तो वहां की सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद यह माना जा सकता था, कि आपके पास इतना वक्त नहीं था कि आप मंदिरा और अपनी बीवी दोनों को मौत के घाट उतार पाते। मगर आप तो अपनी बीवी के कत्ल से करीब घंटा भर पहले से उस इलाके में मौजूद थे। उस दौरान मंदिरा का कत्ल करके आप बड़े आराम से वापिस लौटकर अपनी बीवी को मौत के घाट उतार सकते थे।‘‘

‘‘वो एक घंटा मैंने रेस्टोरेंट में गुजारे थे, जहां कोई इस बात का गवाह बन सकता है। बाहरी ना सही मगर वहां के स्टाफ ने तो मुझे वहां लंबे समय तक बैठे देखा ही था।‘‘

‘‘उससे कोई फर्क नहीं पड़ता और यूं अगर कोई ये कहने वाला निकल भी आया कि आप वहां लंबे समय तक बैठे रहे थे, तो ये बात कोई कील ठोक कर नहीं कहने वाला कि वो लंबा अरसा पौना घंटा का था। उसके बावजूद अगर कोई हरिश्चंद का खानदानी निकल भी आया तो पुलिस को दो मिनट लगेंगे उसके बयान को तोड़ने-मड़ोड़ने में। लिहाजा अभी पुलिस के सामने उस रेस्टोरेंट का जिक्र हरगिज भी नहीं आना चाहिये, इसी में आपकी कोई गति दिखाई देती है।‘‘

‘‘उससे क्या होगा?‘‘

‘‘देखेंगे क्या होता है, और कुछ नहीं तो आपका वकील बतौर गवाह ऐसे किसी सख्स को - अगर कोई निकल आया तो - कोर्ट में पेश करके उसका बयान रिकार्ड करवा देगा, जो कि एकदम सच्चा होगा क्योंकि तब तक पुलिस को उसकी भनक नहीं लगी होगी। अब बराय मेहरबानी आप मुझे ये बताइए कि जिन नंबरों से आपको फोन किए जाते थे क्या आपने उनको नोट करके रखा हुआ है।‘‘

‘‘नोट करके तो नहीं रखा मैंने, मगर कल रात हवालात में बंद होने के बाद जब पहली बार मेरे ज्ञान चक्षु खुले तो सबसे पहला काम मैंने यही किया कि अपने मोबाइल ऑपरेटर एमकॉम को मेल भेजकर उनसे पिछले दो महीने का इनकॅामिंग कॉल का डॉटा मंगवा लिया। वो मैं तुम्हें अभी व्हाट्सएप्प पर भेज देता हूं। तुम बड़ी आसानी से उन नंबरों को बाकी नंबरों से अलग कर लोगे, क्योंकि लैंडलाइन नंबर के तौर पर सिर्फ वही नंबर हैं जिनसे मुझे इंडिया से कॉल की गई थी।‘‘

‘‘गुड और कुछ!‘‘

‘‘तुम मेरे लिए एक वकील का भी इंतजाम करो प्लीज, और अगर हो सके तो वो चौहान के केस वाली वकील! क्या नाम था उसका हां नीलम तंवर से बात करो प्लीज।‘‘

‘‘जनाब मैं माफी के साथ अर्ज करता हूं कि मैं तब तक ऐसा नहीं कर सकता जब तक कि पुलिस आपकी गिरफ्तारी शो नहीं कर देती। अभी उन्होंने आपकी गिरफ्तारी को राज रखा हुआ है। अगर मैंने यह राज खोला तो पूरे थाने का स्टॉफ मेरे खिलाफ हो जायेगा और कल को मुझसे यूं परहेज करने लगेंगे जैसे मैं कोई छूत की बीमारी हूं। नतीजा ये होगा कि आपका तो कुछ संवरते-संवरते संवरेगा, मेरा फौरन बिगड़ जायेगा। कम से कम इस थाने में तो मुझे हर कोई पहचानने से इंकार कर देगा। इसका मेरे धंधे पर इतना बड़ा इफेक्ट पड़ेगा जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं होगी।‘‘

‘‘तुम तो मुझे निराश किये दे रहे हो।‘‘

‘‘सिर्फ इस मामले में, बाकी मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि अगर आप कातिल नहीं हैं तो मेरी हर चंद कोशिश यही होगी कि असली हत्यारा जल्द से जल्द गिरफ्तार हो और आपको इस जहमत से छुटकारा मिल सके।‘‘

‘‘यूं तो ये पता नहीं कब तक मुझे यहां बंद रखें, अगर ये सिलसिला ज्यादा दिन चला तो मेरा दम तो यूंही निकल जायेगा।‘‘

‘‘ऐसा नहीं होगा, बड़ी हद कल तक ये लोग आपको कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर देंगे।‘‘

‘‘ऐसा फौरन हो सके इसका कोई रास्ता है तुम्हारे जहन में।‘‘

‘‘हां है, डॉक्टर खरवार! वोे आपसे सुबह मिलकर जा चुका है, ऐसे में उसका आपके लिए किसी वकील का इंतजाम करना आम बात दिखाई देगी। बशर्तेे कि वो ऐसी किसी कोशिश के लिए राजी हो जाय।‘‘

‘‘भई कोई याराना तो है नहीं मुझसे उसका, मगर सुबह बोल तो रहा था वो कि कोई भी जरूरत हो तो मैं उसे बेहिचक बताऊं।‘‘

‘‘ठीक है मैं उसे खबर करता हूं, फिर देखते हैं क्या होता है।‘‘

जवाब में उसने सहमति में सिर हिला दिया। मैं उठकर सींखचों वाले दरवाजे के पास पहुंचा और आवाज लगाकर सिपाही को गेट खोलने को कहा। फिर मैं ड्यिूटी रूम में पहुंचा जहां चौहान मेरा इंतजार कर रहा था।

उसके बाद हम दोनों बाहर निकल आये।

‘‘क्या रहा?‘‘

‘‘बुरा ही रहा, लगता है हमने गलत आदमी चुन लिया। वो ना सिर्फ खुद को बेकसूर बताता है बल्कि ऐसी-ऐसी दलीलें देता है, जिनका जवाब दे पाना मुमकिन नहीं है।‘‘

‘‘गोखले हमारी कोई निजी अदावत तो है नहीं उससे। इसलिए अगर तुझे वो निर्दोष दिखाई देता है तो हम नये सिरे से कातिल के पीछे पड़ सकते हैं। वैसे भी अभी कोर्ट में मेरी पेशी में दो दिन बाकी हैं, इस दौरान समझ ले कि मैं चौबीसों घंटे की ड्यिूटी तेरे साथ अंजाम देने को तैयार बैठा हूं। अब बोल क्या बताया उसने तुझे।‘‘

जवाब में मैंने उसे सारी कथा कह सुनाई।

वो मंत्र-मुग्ध सा सुनता रहा और जब मेरी बात खत्म हुई तो बोला, ‘‘कमाल है यार यूं लग रहा था जैसे किसी हॉलीवुड फिल्म की स्टोरी सुना रहा था तू मुझे।‘‘

मैं हंसा।

‘‘अभी हम कहां जा रहे हैं?‘‘

‘‘डॉक्टर के पास, मेरा इरादा उसके जरिए गायकवाड़ के लिए किसी वकील का इंतजाम करने का है, ताकि तुम्हारा महकमा उसे कोई थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट ना देने लग जाय।‘‘

‘‘और तुझे लगता है कोई वकील उसे पुलिस की मार से बचा सकता है।‘‘

‘‘हां उसने बस ये करना होगा कि वो किसी तरह पुलिस पर दबाव बनाये, ताकि वे लोग आज ही गायकवाड़ को कोर्ट में पेश करने को मजबूर हो जायं! और कुछ नहीं तो वो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तो कोर्ट में लगा ही सकता है। आगे जब कोर्ट में पेश होने के बाद अदालत उसे पुलिस रिमांड पर सौंपेगी तो साथ ही ये फरमान जारी करेगी कि थाने ले जाये जाने से पहले मुलजिम का मैडिकल कराया जाय और अगली पेशी पर दोबारा उसका मैडिकल करा कर उसे कोर्ट में पेश किया जाय। ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि रिमांड के दौरान उसके साथ कोई ज्यादती नहीं की गई थी।‘‘
 
‘‘गोखले मैं तो तुझे बहुत सयाना समझता था।‘‘

‘‘अब नहीं समझते।‘‘

‘‘इस मामले में तो नहीं समझता। तू भूल रहा है कि पुलिस हर केस में रिमांड से पहले मुलजिम का मैडिकल चैकअप कराती है, यही प्रोसीजर है! तो क्या वो इंटेरोगेशन में उससे जी सर, यस सर, राइट अवे सर, प्लीज सर! कहकर पेश आती है।‘‘

‘‘नहीं आती!‘‘

‘‘हरगिज भी नहीं आती, पुलिस के हाथों उसकी दुर्गति होकर रहती है, बस उसे ठोका कुछ इस तरह से जाता है कि मैडिकल रिपोर्ट में उसका खुलासा नहीं हो पाता।‘‘

‘‘फिर कैसे बात बने?‘‘

‘‘पुलिस की मार से उसे सिर्फ पुलिस ही बचा सकती है। लिहाजा अगर तू सचमुच उसे पुलिसिया खातिरदारी से बचाना चाहता है तो उसका एक ही रास्ता है और वो ये कि तू इस बारे में एसीपी साहब से बात कर। किसी तरह उनसे मोहलत हासिल कर और उस वफ्ते में असली कातिल को खोजकर उनके सामने हाजिर कर।‘‘

‘‘वो भी करेेंगे, पहले जरा डॉक्टर से बात करके देखते हैं वो क्या कहता है। अगर उसने गायकवाड़ की कोई मदद करने से इंकार कर दिया तो बात ही खत्म हो जायेगी।‘‘

‘‘तेरी मर्जी है भैया।‘‘

कालकाजी पहुंचकर हमने डॉक्टर को सोते से जगाया। फिर उसे बताया कि गायकवाड़ उससे क्या उम्मीद रखता था। जवाब में उसने झट मदद करने की हामी भर दी और अपने किसी पहचान के वकील को फोन करके उसे सूरतेहाल कह सुनाया। जवाब में वकील ने उसे आश्वासन दिया कि वो सब संभाल लेगा।

हम दोबारा थाने पहुंचे तो पता चला एसीपी साहब हौज खास स्थित डीसीपी ऑफिस गये हुए हैं। हम हौज खास पहुंचे तो पता चला वो डीसीपी साहब के साथ किसी मीटिंग में व्यस्त थे।

हम वहीं बैठकर उनका इंतजार करने लगे।

वो इंतजार दो घंटा लंबा साबित हुआ। तब जाकर कहीं हमें एसीपी पांडेय के दर्शन हुए।

हमें वहां देखकर वो कुछ चौंक सा गया फिर बोला, ‘‘सब खैरियत तो है।‘‘

जवाब में चौहान की तो कुछ कहने की मजाल हुई नहीं, लिहाजा मैं ही बोल पड़ा, ‘‘जनाब खैरियत तो है मगर अभी हाल ही में कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं जो ये सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि गायकवाड़ बेकसूर है।‘‘

मुझे लगा वो फट पड़ेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ।

‘‘गोखले होश में आ, कल तूने ही ये साबित करके दिखाया था कि सब किया-धरा उसी का है और आज तू ये नया राग अलाप रहा है। कहीं उसने कोई बड़ी रकम तो ऑफर नहीं कर दी तुझे।‘‘

‘‘आप बेहतर जानते हैं जनाब कि ऐसा नहीं हो सकता। कम से कम इस केस में तो हरगिज भी नहीं हो सकता। भले ही मेरी प्राथमिकता चौहान को बेकसूर साबित करने की थी। मगर उसके लिए किसी बेगुनाह को जेल जाना पड़े ऐसा तो आप खुद भी नहीं चाहेंगे।‘‘

‘‘तो क्या चाहता है तू, छोड़ दे उसे।‘‘

‘‘वो तो खैर मुमकिन नहीं जनाब!‘‘

‘‘फिर!‘‘

‘‘फिलहाल तो आपसे बस इतनी इल्तिजा है कि अगले चौबीस घंटों तक उसके साथ कोई सख्ती ना बरती जाय, ये सुनिश्चि कर दें।‘‘

‘‘कोई खास ही लगाव हो गया दिखता है उससे।‘‘

‘‘जनाब बात लगाव की नहीं है, समझ लीजिए इंसानियत के नाते ये मेहरबानी उसपर कर के दीजिए। बीवी की बेवफाई और मौत से वो वैसे ही टूटा हुआ है। हवालात में उसपर कोई सख्ती हुई तो यकीन जानिये पहला मौका मिलते ही वो अपनी जान दे दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। बाज लोग इस प्रकार की घटनाओं को आसानी से नहीं भुला पाते।‘‘

‘‘और इस बात का फैसला तू करेगा कि वो गुनहगार है या नहीं।‘‘

‘‘जनाब फैसला तो आप करेंगे, अदालत करेगी, मैं तो बस आपसे चौबीस घंटे की मोहलत चाहता हूं।‘‘

‘‘और अगर चौबीस घंटों में तू उसे बेगुनाह साबित नहीं कर पाया तो!‘‘

‘‘तो जनाब की मर्जी, तब आप गायकवाड़ के साथ-साथ मुझे भी किसी सजा का हकदार समझें तो मेरे सिर आंखों पर।‘‘

‘‘ठीक है जा, करके दिखा कोई चमत्कार, ताकि मुझे एक बार फिर यकीन आ सके कि तू अभी भी पहले जैसा ही जहीन है, ना कि बे सिर-पैर की बातें उड़ाने लगा है।‘‘

‘‘शुक्रिया जनाब!‘‘

मेरा शुक्रिया सुनने से पहले वो अपनी कार में जा बैठा। मैं और चौहान दोबारा वेटिंग लाउंज में जा बैठे। चौहान ने वहीं गायकवाड़ की इनकॉमिंग कॉल की डिटेल्स का प्रिंट आउट निकलवाया, जिसके बाद हम उसमें से उन नंबरों को अलग करते गये जो कि इंडिया के थे। ऐसी कुल जमा सोलह कॉल की गयी थी गायकवाड़ के नंबर पर। उनमें से कई नंबर रिपीट भी हो रहे थे। लिहाजा जब हमने काट-छांटकर लिस्ट तैयार की तो हमारे सामने जांच के लिए छह नंबर बचे। अब हमें ये पता करना था कि वो नंबर कहां-कहां लगे हुए थे। इसका सीधा तरीका ये था कि हम उन नंबरों पर कॉल करते और यूं फोन उठाने वाले से ही दरयाफ्त करते कि वो कहां से बोल रहा था। मगर चौहान मुझसे सहमत नहीं था, उसका कहना था कि यूं अगर कोई नंबर कातिल के घर या ऑफिस का हुआ तो वो सावधान हो सकता था जो कि हमारे लिए दुश्वारी का काम होता।

लिहाजा उसने अपने पुलिसिया होने का फायदा उठाया और अगले एक घंटे में ना सिर्फ उन तमाम नंबरों के मालिकान का पता लगाया बल्कि ये भी जान लिया कि वे नंबर कहां-कहां लगे हुए थे। और जब हमारी वांछित जानकारी सामने आई तो ये देखकर हम हैरान रह गये कि वे तमाम के तमाम नंबर कालकाजी के इलाके में अलग-अलग पतों पर रजिस्टर्ड थे।

जिससे फौरी अंदाजा हमने ये लगाया कि हो ना हो गायकवाड़ का घोस्ट फोनकर्ता कालका जी में ही कहीं रहता था।

फिर हमने उन नंबरों की जांच की मुहीम छेड़ दी। पहला नंबर जो हमने जांच के लिए चुना वो कालकाजी के डीडीए फ्लैट के इलाके में स्थित एक पीसीओ का था जो कि एक परचून की दुकान में लगा हुआ था।

वहां से जब हमने उस कॉल की जानकारी हासिल करनी चाही तो जैसी की हमें उम्मीद थी, दुकानदार फोनकर्ता के बारे में कुछ नहीं बता पाया। चौहान ने घुमा फिराकर कई तरीके से उससे पूछताछ करने की कोशिश की, मगर उसके रिकार्ड की सूई बस एक ही जगह अटकी रही कि वो नहीं जानता कि फोन किसने किया था। बावजूद इसके कि उसके यहां से तीन बार आइएसडी कॉल की गई थी।

हारकर हम अगले पड़ाव की ओर बढ़े। वो नंबर तुगलकाबाद एक्सटेंसन से तनिक पहले स्थित एक पीसीओ का निकला। वहां से गायकवाड़ के नंबर पर पांच बार कॉल की गई थी। मगर उसका जवाब भी दूसरे दुकानदार जैसा ही निकला।

तीसरा नंबर पान की एक दुकान का निकला जो कि गोविंदपुरी के ठीक सामने सड़क के दूसरी ओर एक कपड़ों के शोरूम के नीचे थी। वहां दुकानदार का जवाब हमारी पसंद का निकला। उसने हमें बताया कि वो व्यक्ति कई बार उसके यहां से दुबई कॉल कर चुका था। वो बेहद लंबी बातें करता था और उसका बिल भी चार-पंाच सौ के करीब आता था इसलिए दुकानदार को वह याद रह गया था।

मगर जवाब में उसने फोनकर्ता का जो हुलिया बयान किया उसने हमारी तमाम आशाओं पर पानी फेर कर रख दिया। क्योंकि उसने जो हुलिया बताया था वो ऐन गायकवाड़ से मिलता था। जो कि अगर मुमकिन था तो फिर हमारी इस तमाम ड्रिल का कोई फायदा नहीं था। लिहाजा चौहान ने उसे अपना नंबर देकर हिदायत देते हुए कहा कि अगर वो व्यक्ति दोबारा वहां कॉल करने के लिए आये तो दुकानकार ने उसे इंफार्म करना था।

चौथे और पांचवे नंबर की दुकान हमें बंद मिली। पता चला दोनों के मालिकान अपने परिवार के साथ अपने होम टाउन गये हुए थे, जहां से वो कब वापिस लौटते इस बारे में किसी को भी पता नहीं था। अब हमारे पास सिर्फ एक नंबर चेक करने के लिए रह गया था जो कि कालका जी में देशबंधु कॉलेज से तनिक आगे एक स्टेशनरी शॉप पर लगा हुआ था। हमारी लिस्ट बताती थी कि वहां से गायकवाड़ को चार काल्स की गई थीं।

दुकानदार एक साठ-पैंसठ साल का बुढ़ापे की ओर अग्रसर किंतु चुस्त-दुरूस्त व्यक्ति निकला। जिसने हमें बताया कि वो रिटायर्ड पुलिस अधिकारी था। हमने उसपर अपनी मंशा जाहिर की तो उसे झट से काल करने वाला व्यक्ति याद आ गया।

‘‘देखो मैं उसका नाम तो नहीं जानता, मगर था वो खूब लंबा-चौड़ा कसरती बदन वाला युवक! शक्लो-सूरत से उच्च शिक्षित जान पड़ता था। मेरा खुद का अंदाजा ये है कि वो कोई पुलिसवाला ही था। उसके लहजे में कुछ शब्द पश्चिमी उत्तर प्रदेश के थे, जैसे उसने कहा था कि ‘अंकल नेक फोन दियो, दुबई कॉल करनी है।‘ लेकिन जब उसने फोन पर बात करनी शुरू की तो उसकी भाषा एकदम से बदल गई थी। वो पूरी तरह से हिंदी में बात करने लगा।‘‘

‘‘उसकी बातों का कोई अंश बेध्यानी में आपको सुनाई दे गया हो, याद रह गया हो।‘‘

‘‘भई वो जब आखिरी बार मेरे यहां आया था तो उसने फोन पर किसी से कहा था कि वो ठीक छह बजे अपने फ्लैट पर पहुंचे, इसके अलावा मुझे कुछ याद नहीं।‘‘

‘‘कोई अंदाजा कि वो आस-पास से ही आया था या...!‘‘ कहकर चौहान ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

‘‘कहना मुहाल है भई, अलबत्ता वो आया मोटरसाइकिल से था। मगर उससे क्या फर्क पड़ता है, आजकल की नौजवान पीढ़ी इतनी आरामतलब हो गई है कि घर के बगल से दूध लेकर आना हो तो भी मोटरसाइकिल पर सवार हो जाती है।‘‘

‘‘ठीक कहते हैं जनाब, बहरहाल वक्त देने का शुक्रिया।‘‘ कहकर चौहान ने उसे भी अपना नंबर देकर पहले वाली हिदायत दोहरा दी अलबत्ता इस बार हुक्म देने की बजाय उसे वृद्ध से बाकायदा रिक्वेस्ट करना पड़ा था।

चौहान की जुगलबंदी में हम एक बार फिर कार में सवार हो गये।
 
‘‘इतनी मेहनत का क्या सिला मिला गोखले।‘‘

‘‘सिर्फ इतना कि अब हमें यकीन है कि गायकवाड़ को सचमुच उस तरह की फोन काल्स आती थीं जिसका जिक्र उसने मुझसे किया था-ना कि उसने मुझे कोई कहानी सुनाई थी।‘‘

कहकर मैंने सिगरेट सुलगाया और एक उसे देते हुए बोला, ‘‘बस एक नंबर और चेक करना है।‘‘

‘‘अब कौन सा बचा है, कर तो लिए छह के छह! भले ही दो जगहों पर हमारी किसी से मुलाकात नहीं हो पाई।‘‘

‘‘मैं उस नंबर की बात कर रहा हूं, जो तुम्हें रजनीश अग्रवाल से हासिल हुआ था, जिसके जरिए उसे किसी वकील ने मंदिरा की वसीयत का झांसा देकर मौकायेवारदात पर बुलाने की कोशिश की थी।‘‘

‘‘ठीक कहता है उसे तो मैं भूल ही गया था।‘‘ कहकर उसने जब उस नंबर की बाबत जानकारी हासिल की तो पता चला वो तो साकेत में ही लगा हुआ था, और यूं जो पता हमें हासिल हुआ वो मंदिरा के फ्लैट से मुश्किल से एक किलोमीटर की दूरी पर था।

हम उस पते पर पहुंचे।

दुकानदार एक चश्माधारी युवक था जो उस वक्त जेम्स हेडली चेईज का उपन्यास ‘सनकी कातिल‘ पढ़ने में मशगूल था। वो किस कदर उपन्यास में डूबा हुआ था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम उसकी दुकान पर जाकर खड़े हो गये मगर उसे एहसास तक नहीं हुआ। चौहान ने बाकायदा काउंटर खटखटाकर उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कराया और बोला, ‘‘पुलिस!‘ तो उसने पल भर को हमारी तरफ देखा फिर, ‘‘एक मिनट प्लीज‘ कहकर वो पुनः उपन्यास पढ़ने में व्यस्त हो गया।

उस वक्त चौहान का गुस्सा उसपर फूटने ही वाला था जब उसने उपन्यास को उल्टा करके काउंटर पर रख दिया और बोला, ‘‘अब बताइए क्या बात है।‘‘

‘‘सबसे पहले तो अपना कोई अच्छा सा नाम बता दो।‘‘

‘‘अच्छा या बुरा मेरा एक ही नाम है, सूरज सिंह! - वो तीखे लहजे में बोला - क्या चाहते हैं आप लोग?‘‘

जवाब में मैंने उसे उस फोन काल के बारे में बताया जो उसकी दुकान से रजनीश अग्रवाल को की गई थी और यथा संभव वार्तालाप भी दोहरा दिया। सुनकर वो चहकता हुआ बोला, ‘‘वाऊ! मेरा अंदाजा एकदम सही निकला। मुझे तो उसी वक्त उसपर शक हो गया था कि वो कोई फ्रॉड व्यक्ति है, जो खुद को वकील बताकर अपना कोई उल्लू सीधा करना चाहता था।‘‘

‘‘गुड! अब लगे हाथों ये भी बता दो कि तुम्हे उसपर शक क्यों हुआ था?‘‘

‘‘उसने अपनी पतलून की बैल्ट में रिवाल्वर खोंस रखी थी। जिसे छिपाने के लिए उसने अपनी शर्ट को बाहर निकाल रखा था। वो जब बातें कर रहा था तो एक बार हवा से उसकी शर्ट तनिक ऊपर को उठ गयी तब मैंने रिवाल्वर की झलक साफ देखी थी।‘‘

‘‘कैसे पता कि वो रिवाल्वर ही थी?‘‘

‘‘बस पता है किसी तरह।‘‘

‘‘रिवाल्वर के अलावा कोई और बात जो तुम्हें खटकी हो।‘‘

‘‘कई बातें थीं, जैसे कि काल करने के करीब पांच मिनट बाद उसने मुझसे एक कोल्ड्रिंक ली जिसे उसने बीस मिनट से कम में तो क्या खतम किया होगा। उसके बाद उसने मुझसे पानी की एक बोतल ली और यूं ठहर ठहर कर घूंट लगाने लगा जैसे, विस्की चुसक रहा हो। पानी की आधी बोतल खाली कर चुकने के बाद उसने एक बर्गर खाया। फिर अपनी रिस्ट वॉच पर एक नजर डालने के बाद वोे पैसे चुकाकर चलता बना। साफ जाहिर हो रहा था कि उसे एक निश्चित समय पर कहीं पहुंचना था, जिसके बीच के वफ्ते में वो यहां खड़ा होकर महज टाईम पास कर रहा था।‘‘

‘‘देखने में कैसा था वो?‘‘

जवाब में उसने जो हुलिया बताया वो और किसी से मिलता ना मिलता मगर गायकवाड़ से जरूर मैच कर रहा था।

‘‘उसके पहनावे के बारे कुछ और बताओ, इसके अलावा कि वो पैंट शर्ट पहने था।‘‘

‘‘वो क्रीम कलर की सीधी धारियों वाली शर्ट और स्लेटी रंग की पैंट पहने हुए था। शर्ट लिवाइस की थी, पैंट के बारे में कुछ बता पाना पॉशिबल नहीं है। बालों वो जरूर खिजाब या मेंहदी लगाता था, क्योंकि उसके बालों का काफी सारा हिस्सा तांबे की रंगत लिए हुए था।‘‘

सुनकर मेरा दिमाग भिन्ना सा गया। ये तो वही कपड़े थे जिसे दिन में गायकवाड़ पहने था। शर्ट लिवाइस की थी या नहीं कहना मुहाल था मगर रंग और डिजाइन वही थे। और बालों का रंग भी ऐन गायकवाड़ से मिलता था। ऊपर से वो तीसरा ऐसा व्यक्ति था जो उस घोस्ट फोनकर्ता के बारे में बताते हुए गायकवाड़ का हुलिया बयान कर रहा था। क्या माजरा था! कहीं हम गायकवाड़ के हाथों उल्लू तो नहीं बन रहे थे! आखिर अंकुर रोहिल्ला ने भी तो मंदिरा के सीक्रेट विजिटर के बारे में बताते हुए गायकवाड़ का ही हुलिया बयान किया था।

‘‘कोई और खास बात जो तुमने नोट की हो।‘‘

‘‘खास बात तो अभी मैंने आप लोगों को बताई ही नहीं।‘‘

‘‘अच्छा! फिर तो कमाल ही हो गया, अब बरायमेहराबानी वो माल भी दिखा दो जिसकी पोटली तुमने अभी तक नहीं खोली है।‘‘

‘‘दिखाता हूं मगर मुझे शाबासी दिये बिना मत जाना! क्योंकि अब मैं ऐसा बम फोड़ने वाला हूं जो एक झटके में आप लोगों की तमाम प्रॉब्लम्स सॉल्ब कर देने वाला है।‘‘

‘‘ऐसी बात है तो जल्दी बताओ प्लीज!‘‘

‘‘वो बजाज की दो सौ बीस सीसी वाली, काले रंग की, पल्सर मोटरसाइकिल पर यहां पहुंचा था। मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट पर उसने कुछ पोत रखा था जिससे वो दिखने बंद तो नहीं हुए थे मगर उन्हें बेहद नजदीक से ही देखने पर पढ़ा जा सकता था। नंबर इस कदर धुंधला गये थे कि अगर आप सड़क के उस पार से भी देखते तो वो आपको दिखाई नहीं देते।‘‘

‘‘लेकिन तुम्हें वो नंबर पता है।‘‘ मैं बोला।

जवाब में वो बड़ी शान से मुस्कराया।

‘‘तुम बेशक कमाल के लड़के हो, तुम्हारी ऑब्जर्वेशन भी कमाल की है। तुम्हें तो जासूस होना चाहिए!‘‘

‘‘थैंक्यू सर!‘‘

‘‘तो मिस्टर जासूस! अब उसकी मोटरसाइकिल के रजिस्ट्रेशन नंबर पर कोई रोशनी डालिए प्लीज!‘‘

‘‘नोट करो डीएल थ्री एस टू फाईव.....।‘‘

मैंने अपने मोबाइल में उसका बताया नंबर नोट कर लिया।

‘‘शुक्रिया, तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया।‘‘

‘‘आप पुलिस वाले नहीं हो सकते।‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘क्योंकि पुलिसवाले कभी किसी का शुक्रिया अदा नहीं करते। अलबत्ता आपके साथी टिपिकल पुलिसिये लगते हैं! जो मेरे हर जवाब में होती देरी पर तिलमिला कर रह जाते थे। इनका बस चलता तो ये मेरे हलक में हाथ डालकर सारी जानकारियां एक ही बार में बाहर निकाल लेते।‘‘

सुनकर चौहान जोर से हंस पड़ा, ‘‘क्या लड़का है भई तू, तेरी निगाहों की दाद देनी पड़ेगी। बहरहाल मैं तेरा दिल से शुक्रिया बोलता हूं। पुलिसवाला होते हुए भी शुक्रिया बोलता हूं।‘‘

‘‘यू आर मोस्ट वैलकम सर!‘‘

इसके बाद जब हमने उसके बताये मोटरसाइकिल का रजिस्ट्रेशन चेक किया तो मारेे हैरत के उछल से पड़े। मेरे जैसा ही हाल चौहान का भी हुआ। हम दोनों हकबका कर एक दूसरे की सूरतें देखने लगे।

कितने बड़े अक्ल के अंधे थे हम! कितना बड़ा सयाना था वो!

बहरहाल आनन-फानन में मैंने कातिल को रंगे हाथों पकड़ने की एक योजना बना डाली। मगर उस योजना को सूरज सिंह नाम के इस युवक की मदद के बिना अमली जामा नहीं पहनाया जा सकता था, मैं दोबारा उसके काउंटर पर पहुंचा, ‘‘मिस्टर जासूस! क्या तुम एक खतरनाक कातिल को पकड़वाने में पुलिस की मदद करना पसंद करोगे?‘‘

‘‘अफकोर्स सर! इट्स माई प्लेजर, बताइए मुझे क्या करना होगा।‘‘

‘‘बताएंगे पहले हमें कुछ और अहम कामों को अंजाम देना है, उसके बाद हम तुम्हें बता देंगे कि तुम्हें क्या करना है।‘‘

‘‘कब बतायेंगे।‘‘ वो उतावले स्वर में बोला।

‘‘आज ही बतायेंगे, तब तक के लिए अलविदा दोस्त।‘‘

‘‘अरे इतना तो बताते जाइए कि आप करते क्या हैं?‘‘

जवाब में मैंने उसे अपना एक विजटिंग कार्ड सौंपा और चौहान के साथ कार में सवार हो गया।

‘‘तौबा क्या लड़का था, हर बात ताड़े बैठा था।‘‘

‘‘ठीक कहते हो और अगर उसने कोई गलतबयानी नहीं की है तो समझो लो उसने कातिल को बाकायदा प्लेट में सजाकर हमें परोसा है।‘‘

‘‘सो तो है, अब आगे क्या इरादा है।‘‘

‘‘आज रात को हम सूरज सिंह के जरिए कातिल को एक्सपोज करेंगे।‘‘ कहते हुए मैंने उसे अपनी योजना कह सुनाई।

‘‘खामखाह बात को इतना घसीटने की क्या जरूरत है, हम सीधे-सीधे उसे गिरफ्तार क्यों नहीं करा देते।‘‘

‘‘कोई फायदा नहीं होगा, उसने अपने पीछे कहीं कोई सबूत नहीं छोड़ा है। बड़ी हद तुम इस लड़के के बयान को उसके खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हो! मगर क्या फायदा होगा, वो कोई चश्मदीद गवाह तो है नहीं। ऐसे में उसके बयान का हम तभी कोई फायदा उठा सकते हैं, जब कातिल के खिलाफ हमारे पास पहले से कोई सपोर्टिंग सबूत हो। ऊपर से इस बार मैं ठोक-बजाकर देख लेना चाहता हूं कि सब किया धरा उसी का है। वरना कहीं बाद में वो भी गायकवाड़ की तरह इनोसेंट निकला तो इस बार हमें लेने के देने पड़ जायेंगे। मत भूलो कि मोटरसाइकिल उसने किसी को उधार दिया हो सकता है और उसके पास रिवाल्वर की मौजूदगी महज उस लड़के की कल्पना की उपज हो सकती है। जिसपर उपन्यासों का किस हद तक असर है हम देख ही चुके हैं।‘‘

‘‘शुरूआत कहां से करें?‘‘

‘‘हम उसके घर में घुसेंगे।‘‘

‘‘किसलिए?‘‘ वो हैरान होता हुआ बोला।

‘‘उस रिवाल्वर की तलाश में जिससे उसने अंकुर रोहिल्ला का कत्ल किया था।‘‘

‘‘वो जरूर अभी तक रिवाल्वर सहेजे बैठा होगा।‘‘

‘‘ना सही मगर रिवाल्वर की तलाश में लगने पर क्या पता कोई और काम की जानकारी हासिल हो जाए। कोई ऐसी चीज हासिल हो जाय जो उसके खिलाफ पुलिस के हाथ मजबूत कर सके, या उसे निर्विवाद रूप से कातिल साबित कर सके।‘‘

‘‘भई उम्मीद तो कतई नहीं है मुझे, मगर तुम कहते हो तो देख लेते हैं। लेकिन हम उसके घर में घुसें कैसे, दिन में होने वाला काम तो ये दिखाई नहीं देता। लिहाजा हमें रात होने तक इंतजार करना पड़ेगा।‘‘

‘‘चौहान साहब! दिन अब रहा कहां, छह बजने को है। हम अभी से अपनी मुहीम पर लगेंगे तब जाकर रात को हम अपने बाकी की योजना को अंजाम दे पायेंगे। फिर तुम्हें महज उसके घर का ताला खोलना है, उसके बाद अगर तुम चाहो तो बाहर रह कर मेरा इंतजार कर सकते हो। उस दौरान अगर मैं पकड़ा गया तो वो गुनाह मैं अपने सिर ले लूंगा, ऐसे में कम से कम तुमपर कोई आंच नहीं आएगी।‘‘

‘‘अब इतना बेमुरब्बत तो नहीं हूं मैं।‘‘

‘‘तो फिर साथ चलो और वो करामात दिखाओ जो पूजा अवस्थी के कत्ल वाले केस में पहले भी दिखा चुके हो।‘‘

‘‘यार कुछ तो शरम कर मैं पुलिस वाला हूं! जो चाहता है कर के दूंगा। मगर कम से कम मुझे ताला तोड़ साबित करने की कोशिश तो न कर।‘‘

मैं हंसा। जवाब में उसने खा जाने वाली निगाहों से मुझे घूरा, मगर मुझपर असर होता ना पाकर बोला, ‘‘अगर वो घर पर हुआ तो!‘‘

‘‘तो हम दोबारा वहां का फेरा लगायेंगे, दूसरी बार भी घर पर हुआ तो तीसरा फेरा लगायेंगे। कहने का मतलब ये है चौहान साहब की हमें इस काम को हर हाल में रात होने से पहले अंजाम देकर रहना है।‘‘

‘‘और अगर वो टला ही नहीं अपने घर से फिर?‘‘

‘‘फिर हम उसे घर से बाहर निकालने की कोई जुगत करेंगे। मगर वो बाद की बात है, मुझे पूरी उम्मीद है कि हम अपने पहले ही फेरे में सफल हो जायेंगे।‘‘

मैंने तत्काल कार आगे बढ़ा दी।

उस वक्त शाम के साढ़े सात बजने को थे, जब कलपते हुए ही सही, सब-इंस्पेक्टर चौहान ने वो दरवाजा खोल दिखाया जहां की हमें मुकम्मल तलाशी लेनी थी। हम दोनों भीतर दाखिल हुए! जैसा कि हम पहले ही दरयाफ्त कर चुके थे, घर में उस घड़ी कोई नहीं था। हमने तलाशी की शुरूआत बैठक से की, जो कि आगे एक्स्टेंड होती हुई मास्टर बेडरूम तक पहुंची।
 
उस वक्त मैं वहां रखे पलंग के भीतर बने बॉक्सेज का जायजा ले रहा था, जब वो पुलंदा मेरे हाथ लगा। मैंने उस पुलंदे को - जो कि एक काले रंग के पॉलीथीन में बांधकर रखा गया था - खोलकर देखा। भीतर एक नजर पड़ते ही शक की तमाम गुंजाईश खत्म हो गयी। बेशक हम एकदम सही जगह पर पहुंचे थे। सबसे पहले मेरी निगाह सुनीता गायकवाड़ और उसके साथ मौजूद एक युवक की तस्वीर पर पड़ी। तस्वीर भले ही पीछे से ली गई थी किंतु उसमें मैंने चौहान को साफ पहचाना। उसी प्रकार की कुछ तस्वीरें और मेरे हाथ लगीं, जिनमें चौहान और सुनीता एक साथ दिखाई दे रहे थे। निश्चय ही ये वैसी ही तस्वीरें थीं जो मनोज गायकवाड़ के बताये अनुसार उसके घोस्ट फोनकर्ता ने तब भेजी थीं, जब वो अभी दुबई में था। तस्वीरों के अलावा जो दूसरी अहम चीज मेरे हाथ लगी, वो किसी बड़े मकान या बंगले का नक्शा था, जिसपर काफी सिर खपाने के बाद मैंने ये अंदाजा लगाया कि वो नक्शा मकतूल अंकुर रोहिल्ला के बंगले का हो सकता था। अलबत्ता दावे के साथ ऐसा कह पाने की स्थिति में फिलहाल मैं नहीं था।

बॉक्स से ही मुझे एक ऐसी चीज मिली जिसकी वहां मौजूदगी का कोई मतलब मैं समझ ही नहीं पाता अगरचे कि उसके बगल में ही वो पैंट-शर्ट ना पड़ी होती जो कल दिन में मनोज गायकवाड़ पहने था। वो चीज एक बिग थी जिसे मैंने अपने सिर पर रखकर वहां लगे आदमकद शीशे में अपना अक्स देखा तो पता चला कि वो ऐन गायकवाड़ की हेयर स्टाइल की नकल करके तैयार किया गया था। बिग के बाल गायकवाड़ के बालों की तरह ही जगह जगह से तांबे की रंगत लिए हुए थे। यही वजह थी जिस किसी ने भी घोस्ट फोनकर्ता का हुलिया बयान किया वो हमें गायकवाड़ का हुलिया ही जान पड़ा था। क्योंकि बालों की रंगत और डील डोल के बारे में सुनते ही हमारे जहन में गायकवाड़ का अक्स उभर आता था, लिहाजा हम उससे आगे कुछ सोच ही नहीं पाते थे। जो आखिरी चीज उस पुलंदे से बरामद हुई वो मंदिरा चावला के इकबालिया बयान की फोटो कॉपी थी।

मैंने मोबाइल निकालकर तमाम चीजों का क्लोज एंड लांग शॉट लिया फिर सभी चीजें यथास्थान वापिस रखकर मैं मेज की दराज की तलाशी लेते चौहान के पास पहुंचा।

‘‘कुछ मिला?‘‘ चौहान ने बगैर मेरी ओर देखे पूछा।

‘‘रिवाल्वर तो नहीं मिली अलबत्ता ये साबित हो गया कि इस बार हम सही राह पर हैं। तुम अपनी कहो कुछ हाथ लगा तुम्हारे!‘‘

‘‘ये चैन देख, मुझे ये दराज की तलाशी के दौरान मिली है।‘‘

‘‘ऐसी क्या खास बात है इसमें, सिवाय इसके कि ये मुझे सोने की चैन जान पड़ती है।‘‘

‘‘ये है ही सोने की! सुनीता की चैन है ये, जो कि मैंने उसके बर्थ-डे पर गिफ्ट की थी। जरूर उसकी हत्या के बाद कमीने ने उसके गले से इसे नोंच लिया होगा। दिल तो करता है अपने हाथों से गोली मार दूं स्साले को।‘‘

इसके बाद हमारे बीच खामोशी छा गयी। उस वक्त हम आजिज आकर रिवाल्वर की तलाश बंद करने ही वाले थे कि अचानक चौहान को सूझा कि उसने बॉथरूम और किचन में नहीं झांका था।

सबसे पहले वो बॉथरूम में पहुंचा, जहां पानी की टंकी का ढक्कन उठाते ही रिवाल्वर उसे दिखाई दे गई। वो एक पिन्नी में पैक करके टंकी के ढक्कन के अंदरूनी हिस्से के साथ टेप की सहायता से चिपका दी गयी थी। बॉथरूम की तलाशी का ख्याल अगर चौहान के जहन में नहीं आया होता तो शायद उस रिवाल्वर तक हमारी पहुंच नहीं बन पाती।

बहरहाल कातिल का चेहरा अब पूरी तरह साफ हो चुका था। अब हम जानते थे कि उन चारों हत्याओं के पीछे किसका हाथ था। लेकिन उसको कातिल साबित करने के मामले में दिल्ली अभी दूर थी। वो हर बात से मुकर सकता था, हर चीज को प्लांट किया हुआ बता सकता था। इसलिए जरूरी था कि वो रंगे हाथों हिरासत में लिया जाता। जिसकी योजना मैं पहले ही बना चुका था।

रिवाल्वर को यथास्थान रखकर मैंने उसके भी कुछ फोटो क्लिक किए फिर हम दोनों बाहर निकल आये। चौहान ने दोबारा वो ताला बंद कर दिया।

अब आगे जो भी होना था वो पुलिस अधिकारियों ने करना था। मुझे तो बस उनको अपनी योजना की स्क्रिप्ट पढ़ कर सुनानी थी, जिससे उन्हें इत्तेफाक होता भी या नहीं फिलहाल ये कह पाना मुहाल था।

बाहर निकल कर मैंने एसीपी पांडे को फोन करके अपनी योजना बताई, तो कुछ काट-छांट करने के बाद उसने मुझे आश्वासन दिया कि सबकुछ ऐन उसी ढंग से होगा जैसे कि मैं चाहता था। और मेरी तसल्ली के लिए वो मामले की कमान खुद संभालेगा।

उस वक्त रात के साढ़े आठ बजने को थे। मनोज गायकवाड़ एसएचओ के कमरे में अपने वकील के साथ बैठा हुआ था। उसके अलावा वहां चौहान का पड़ोसी, डॉक्टर खरवार, इंश्योरेंस एजेंट मुकेश सैनी, अंकुर रोहिल्ला का मैनेजर महीप शाह और रजनीश अग्रवाल मौजूद थे। जिन्हें पुलिस ने बहुत ही शार्ट नोटिस पर वहां तलब किया था।

पुलिस महकमें की बात करें तो उस घड़ी वहां एसीपी पांडेय, एसएचओ नदीम खान तथा एडिशनल एसएचओ सदानंद तिवारी मौजूद थे।

‘‘साहबान! - एसीपी वहां मौजूद तमाम लोगों के चेहरों पर निगाह दौड़ाते हुए बोला - आज यहां जिस मुद्दे पर हम बात करने जा रहे हैं उससे आप सभी बाखूबी वाकिफ हैं। पिछले दिनों एक के बाद एक चार लोगों को - पहले मंदिरा चावला, फिर सुनीता गायकवाड़, फिर अंकुर रोहिल्ला और उसके बाद मकतूला मंदिरा चावला की बहन रंजना चावला को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया। इनमें से दो मामले - सुनीता गायकवाड़ और अंकुर रोहिल्ला का कत्ल - इस थाने में रजिस्टर नहीं हैं। लेकिन ये तीनों थाने क्योंकि एक ही डिस्टिक कमिश्नर ऑफ पुलिस के अधिकार क्षेत्र में ही आते हैं। इसलिए डीसीपी साहब के हुक्म पर मैं चारों मामलों की तफ्तीश पर निगाह रखे हुए हूं। इन सभी वारदातों के लिए हमने, पहले सब-इंस्पेक्टर नरेश चौहान को और बाद में गायकवाड़ साहब को जिम्मेदार ठहराया! दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई मगर बात नहीं बनी।‘‘

‘‘इसका मतलब ये हरगिज नहीं है कि हमने इन्हें बेगुनाह मान लिया है। बल्कि कुछ ऐसी बातें हैं जो इन दोनों के खिलाफ हमारे केस में अड़चनें पैदा कर रही हैं। जिनका जवाब तलाशने के लिए हमने आप सभी को इस वक्त यहां बुलाया है। क्योंकि आप सभी महानुभाव किसी ना किसी रूप में इन चारों हत्याओं से जुड़े हुए हैं। लिहाजा हमनें सिर्फ कुछ अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब ढूंढना है, जिसके बाद मुझे पूरा यकीन है कि अभी और यहीं कातिल हमारी मुट्ठी में होगा। क्योंकि हमारा ये मानना है कि इन सभी वारदातों को किसी एक सख्स ने ही अंजाम दिया है और वो इस वक्त हमारे बीच मौजूद है। मुझे ये स्वीकार करते हुए बेशक शर्म महसूस हो रही है कि कातिल के इतना करीब होते हुए भी हम उसे नहीं पहचानते।‘‘

एसीपी की बात सुनकर तत्काल वहां मौजूद सभी लोग एक दूसरे की शक्ल देखने लगे। मानों इस तरह निगाहों से ही कातिल को शार्टआउट कर लेना चाहते हों।

‘‘हो सकता है यहां मौजूद कातिल की सूरत देखकर आपमें से कोई ऐसा कहने वाला निकल आए कि फलाना व्यक्ति कातिल हो सकता है। या चौहान और गायकवाड़ साहब के मामले में जो अनसुलझे प्रश्न हैं उनका जवाब आपमें से किसी को मालूम हो। आप सभी के बयान पहले से ही हमारे रिकार्ड में हैं। हो सकता है उसमें आप कुछ नया जोड़ना या घटाना चाहें। इसलिए मेरी आप सभी से ये रिक्वेस्ट है कि तमाम घटनाक्रम को अपने दिमाग में दोबारा से ताजा करें, क्या पता ऐसा करने से आपको कोई नई बात सूझ जाय जो कातिल की गिरफ्तारी में हमारी मदद कर सके।‘‘

एक बार फिर सभी, एक दूसरे की शक्ल देखने लगे।

‘‘इसकी क्या गारंटी की! - सबसे पहले अंकुर रोहिल्ला के मैनेजर महीप शाह ने चुप्पी तोड़ी - कातिल यहां मौजूद लोगों में से ही कोई एक है।‘‘

‘‘जनाब इसकी गारंटी अब तक की पुलिस तफ्तीश की वजह से है। जिसके बारे में कुछ बताना और कातिल को खबरदार करना एक जैसी बात होगी। लिहाजा मैं आप सभी से उम्मीद करता हूं कि हमारी जानकारी पर प्रश्न चिन्ह लगाने की बजाय आप अपने दिमाग को थोड़ी सी कसरत करायें। यकीन जानिये यह पुलिस डिपार्टमेंट पर ही नहीं बल्कि समाज पर भी आपका उपकार होगा। क्योंकि कातिल बेहद शातिर और खतरनाक है उसका खुले में घूमते रहना, इस तरह की वारदातों को बढ़ावा देने जैसा ही होगा।‘‘

कमरे में पिन ड्रॅाप सन्नाटा छा गया।

तभी एक सब-इंस्पेक्टर भीतर दाखिल हुआ।

‘‘जयहिंद जनाब।‘‘

‘‘जयहिंद! - एसीपी अनमने भाव से बोला - क्या तुम्हें बताया नहीं गया कि यहां एक बेहद जरूरी मीटिंग चल रही है।‘‘

‘‘मैं माफी चाहता हूं जनाब, मगर मैं जो कहना चाहता हूं वो इस मीटिंग से कहीं ज्यादा जरूरी है।‘‘

तत्काल एसीपी की त्यौरियां चढ़ीं, मगर एसआई तनकर खड़ा रहा, वो जरा भी टस से मस नहीं हुआ। तब एसीपी थोड़ा नम्र लहजे में बोला - ‘‘क्या कहना चाहते हो।‘‘

‘‘जनाब यूं सबके सामने....।‘‘

‘‘हां सबके सामने कहो, वरना बाहर जाकर हमारी मीटिंग खत्म होने का इंतजार करो।‘‘
 
‘‘जनाब हमने एक लड़के को काबू में किया है, जो साकेत में ही मकतूला मंदिरा चावला के आवास से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर, जनरल स्टोर की दुकान चलाता है। वो रंजना चावला के कातिल को पहचानने का दावा करता है। कहता है कि कल कत्ल से कुछ देर पहले तक कातिल उसकी दुकान पर मौजूद था। कातिल वहां तक बजाज की दो सौ बीस सीसी वाली ब्लैक कलर की पल्सर मोटरसाइकिल पर पहुंचा था। उस वक्त वो लिवाइस की लंबी धारियों वाली, क्रीम कलर की शर्ट और स्लेटी कलर की पैंट पहने हुए था। साथ ही वो लड़का दावा करता है कि कातिल ने अपनी पतलून की बैल्ट में रिवाल्वर खोंस रखी थी! - कहकर वो तनिक दम लेने को रूका फिर आगे बोला - कातिल ने वहां से किसी रजनीश अग्रवाल को, मंदिरा चावला का वकील बनकर फोन भी किया था और ठीक चार बजे उसे मकतूला के आवास पर पहुंचने को कहा था।‘‘

‘‘वो काल मुझे की गई थी! - रजनीश अग्रवाल उत्तेजित स्वर में बोला - उसने मुझसे कहा था कि चार बजे मंदिरा चावला की वसीयत पढ़ी जाने वाली थी जिसमें मेरे पिता का भी जिक्र था, जिसके अनुसार मुझे एक लाख रूपये मिलने थे।‘‘

अग्रवाल की बात सुनकर सब हैरानी से उसकी शक्ल देखने लगे।

‘‘तुम उसकी आवाज पहचान सकते हो।‘‘ एसीपी ने पूछा।

‘‘कहना मुश्किल है सर! ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता।‘‘

‘‘ठीक है! - इस बार एसीपी अपने सब-इंस्पेक्टर से मुखातिब हुआ - उसे भीतर बुला लो और यहां मौजूद लोगों से उसका आमना-सामना कराओ, देखें क्या रिजल्ट निकलता है। यूं हमें ये भी पता चल जायेगा कि यहां मौजूद लोगों पर शक कर के हम कोई गलती तो नहीं कर रहे थे।‘‘

‘‘वो तो यहां नहीं है।‘‘ एसआई दबे स्वर में बोला।

‘‘नहीं है! व्हाट डू यू मीन नहीं है - एसीपी गर्जा - तुम क्या हमें कहानी सुनाने आये थे यहां।‘‘

‘‘जनाब मैंने उसे साथ लाने की कोशिश की थी, मगर वो इस जिद्द पर अड़ गया, कि अपनी दुकान के क्लोजिंग टाइम के बाद ही थाने आयेगा।‘‘

‘‘अरे राजी से नहीं आता था तो उठा लाना था।‘‘

‘‘आप इजाजत दीजिए जनाब, मैं अभी उसे पकड़ लाता हूं।‘‘

‘‘अब रहने दो! - एसीपी भुनभुनाता हुआ बोला - टाइम क्या है उसका दुकान बंद करने का, या सूझा नहीं तुम्हें ये सवाल करना!‘‘

‘‘कहता था नौ बजे दुकान बंद करके, दस बजे तक वो यहां पहुंच जाएगा।‘‘

‘‘इतनी देर तक मैं इतने लोगों को यहां कैसे बैठाए रख सकता हूं - एसीपी यूं बोला जैसा उस बात से भारी असुविधा महसूस कर रहा हो - हम सबको उसकी दुकान पर ही चलना पड़ेगा।‘‘

‘‘एसीपी साहब! - महीप शाह बोला - इतने लोग पुलिस के साथ वहां पहुंचेंगे तो दुकानदार का तो जुलूस निकल जायेगा। ऊपर से वहां भीड़ देखकर आस-पास के लोगों का हुजूम भी इकट्ठा हो जाएगा जिसे काबू करना आसान काम नहीं होगा। इसलिए परेशान होने की जरूरत नहीं है। नौ तो बजने ही वाले हैं, मेरे ख्याल से हम सभी एक़ घंटा उसका इंतजार करने की जहमत गवारा कर सकते हैं, या फिर जाकर वापिस आ सकते हैं।‘‘

जवाब में एसीपी ने वहां मौजूद बाकी लोगों के चेहरों पर निगाह दौड़ाई, तो सबने अनमने भाव से सहमति में सिर हिला दिया।

इसके बाद वो मीटिंग वहीं समाप्त हो गयी।

सब लोग एक-एक करके वहां से बाहर निकल गये। एसीपी ने मुझे और चौहान को अपने पास आकर बैठने के लिए कहा, फिर बोला, ‘‘अब देखना है तुम्हारा प्लान काम करता है या फ्लॉप हो जाता है।‘‘

‘‘जनाब छोटी मुंह और बड़ी बात, मगर कहे बिना नहीं रहा जा रहा। हम यहां बैठे हैं, और वहां कातिल उस लड़के का काम तमाम करके अपने खिलाफ इकलौते गवाह का मुंह बंद करके चलता बनेगा।‘‘

‘‘गोखले बहुत बेसब्रा है तू! मत भूल कि तू खुद भी यही तो चाहता था कि वो वहां पहुंचकर लड़के का कत्ल करने की कोशिश करे।‘‘

‘‘सिर्फ कोशिश जनाब! ना कि मैं ये चाहता हूं कि वो सचमुच वहां पहुंच कर उस लड़के का काम तमाम कर दे।‘‘

‘‘परेशान मत हो, कुछ नहीं होता लड़के को! कोई सिगरेट वगैरह पीना चाहता है तो पी ले और इत्मिनान से बैठ। सब इंतजाम कर रखा है खान नेे, वो पहुंचे तो सही वहां। फिर देखना उसका अगला मुकाम जेल में ही होगा।‘‘

इससे पहले कि मैं और कुछ कहता मेज पर रखा एसीपी का मोबाइल बाइब्रेट होने लगा। उसने कुछ क्षण फोन सुना फिर मोबाइल दोबारा मेज पर रखता हुआ बोला, ‘‘सब इंतजाम हो गया है! हमारे चार ऑफिसर इस घड़ी उसकी दुकान के आस-पास मौजूद हैं, जबकि दो दुकान के भीतर छिपे हुए हैं, जिन्हें हुक्म है कि अगर कातिल काबू से बाहर जाता दिखे तो बेशक उसे गोली मार दें।‘‘

‘‘वो तो ठीक है जनाब लेकिन!‘‘

‘‘अभी भी लेकिन! ठीक है उठो, हम भी वहीं चलते हैं, अगर कातिल सचमुच यहां मौजूद लोगों में से कोई था - जैसा की तुम्हारा दावा है - तो उसे निकले अभी ज्यादा देर नहीं हुई है, आगे-पीछे ही हम वहां पहुंच जायेंगे! - कहकर वो चौहान की ओर घूमा - एक प्राइवेट कार का इंतजाम करो फौरन, जिसका हमसे या थाने से कोई ताल्लूक ना हो।‘‘

चौहान ने मोबाइल पर किसी से बात की और बोला, ‘‘चलिए।‘‘

जवाब में मैं, चौहान, एसीपी पांडेय, एसएचओ खान और तिवारी थाने से एक साथ बाहर निकले। गेट पर पहुंचने के करीब दो मिनट बाद ही वहां एक स्कॉर्पियो आ खड़ी हुई, जिसमें मैं पुलिस पार्टी के साथ सवार हो गया।

‘‘हम पूरे दस मिनट लेट हैं साहब।‘‘ तिवारी बोला।

‘‘चिंता मत करो, इतना टाइम तो उसे भी लगेगा वहां का माहौल भांपने में, और गोखले अब तू मुझे ये बता कि असल में कातिल है कौन? वहां हमने किसके स्वागत के लिए ट्रैप लगाया हुआ है।‘‘

‘‘जनाब हम पहुंच तो रहे ही हैं वहां, जो भी होगा वो आपके सामने आ जायेगा।‘‘

‘‘क्या मतलब लगाऊं मैं तेरी बात का, ये कि तुझे खुद नहीं पता कि वहां कौन पहुंचने वाला है।‘‘

‘‘ऐसा तो नहीं है जनाब।‘‘

‘‘फिर बता क्यों नहीं देता, क्यों सस्पेंस फैला रहा है।‘‘

‘‘जनाब क्लाइमैक्स का मजा किरकिरा हो जाएगा, वो जब आपके आदमियों कि गिरफ्त में आ जाए, तो बेशक आप मुझसे ये कंफर्म कर लेना कि मैं वहां किसके पहुंचने की उम्मीद कर रहा था।‘‘

‘‘मेरा अपना ख्याल है कि वहां महीप शाह पहुंचेगा, क्योंकि जब मैंने शिनाख्त के लिए सबको साथ लेकर वहां चलने की बात कही थी, तो इकलौता वही सख्स था, जिसे उस बात से सबसे ज्यादा असुविधा महसूस हुई थी। मगर मुझे इस बात पर जरा भी यकीन नहीं कि वो कातिल हो सकता है। केस में उसकी इंवॉल्वमेंट ना के बराबर दिखाई देती है। अब उसके नाम पर तू कुछ हां ना तो बोल के दिखा।‘‘

जवाब में मैंने एक कागज पर कातिल का नाम लिखा और उसे फोल्ड करके एसीपी को थमा दिया, ‘‘जनाब इस कागज पर कातिल का नाम लिखा हुआ है। उसकी गिरफ्तारी के बाद आप बेशक इसे खोलकर देख़ लीजिएगा कि मेरा अंदाजा दुरूस्त था या नहीं। और मैं कोई इकलौता सख्स नहीं हूं जो उसको पहचानता है। बल्कि चौहान को भी पहले से पता है कि वहां कौन पहुंचने वाला है। उसकी मदद के बिना तो मेरे लिए कातिल को खोज निकालना असंभव की हद तक कठिन काम था। लिहाजा कातिल की गिरफ्तारी तक सस्पेंस बरकरार रहने दीजिए। उससे पहले आप लोग जितनी अटकलें लगा सकते हैं, लगाकर देख लीजिए। मेरा दावा है कि कातिल की सूरत देखकर आप हैरत से उछल पड़ेंगे।‘‘

इसके बाद कोई कुछ नहीं बोला।

उस वक्त हम सूरज सिंह के जनरल स्टोर सेे करीब दो सौ मीटर की दूरी पर थे, जब अचानक ही वातावरण में गोली चलने की जोरदार आवाज गूंजी। मैंने हकबका कर पहले एसीपी और फिर खान की ओर देखा, जिसने ड्रायवर को तत्काल स्पीड बढ़ाने का आदेश दे दिया।

हवा की तरह स्कॉर्पियो सूरज सिंह की दुकान तक पहुंची। चौहान के इशारे पर ड्राइवर ने दुकान के आगे गाड़ी रोक दी। तत्काल हम सभी लगभग छलांग लगाने वाले अंदाज में स्कॉर्पियो से नीचे उतरे।

मगर दुकान के भीतर दाखिल होने की जरूरत नहीं पड़ी।
 
मुझे और चौहान को छोड़कर सब लोग भौंचक्के से उस शख्स की सूरत देखते रह गये जो दो पुलिसियों की गिरफ्त में फंसा बुरी तरह से छटपटा रहा था। मैंने एसीपी के साथ-साथ खान और तिवारी के चेहरों पर एक निगाह फिराई तो ये देखकर मुझे बहुत सकून हासिल हुआ कि सभी की स्थिति एक जैसी थी। सबके सब हैरान निगाहों से पुलिसवालों के बीच सैंडविच बने डॉक्टर खरवार को देखे जा रहे थे। उसका एक हाथ घायल था जिसमें से तेजी से खून बह रहा था।

पुलिसवालों के पीछे-पीछे सूरज सिंह बड़ी शान से चलता हुआ बाहर निकला और मेरे पास आकर खड़ा हो गया।

‘‘कैसा रहा?‘‘

‘‘एकदम कमाल का, तुमने एक ऐसे काम को अंजाम देकर दिखाया है जिसे तुम्हारी मदद के बिना नहीं किया जा सकता था। सच पूछो तो अगर तुम्हारा दखल नहीं होता, तो कातिल तक पहुंचना भी लगभग असंभव था।‘‘

सुनकर वो खुश हो गया।

‘‘खुशामदीद जनाब! - मैं आगे बढ़कर डॉक्टर उमेश खरवार से मुखातिब हुआ - मैं आपके आला दिमाग को सलाम करता हूं। बेशक आपने ना सिर्फ एक हैरान कर देने वाली खतरनाक साजिश रची, बल्कि उसपर पूरी तरह अमल करके दिखाया। इसमें कोई शक नहीं सबकुछ एकदम वैसा ही हुआ जैसा कि आप चाहते थे। मुझे ये स्वीकार करने में भी कोई झिझक नहीं कि आप ने जो चक्रव्यूह रचा था, उसे तोड़ पाना पुलिस के लिए भी असंभव जैसा साबित हो रहा था। फिर इस अदने से प्राईवेट डिटेक्टिव की तो बिसात ही क्या थी। मगर आप भूल गये कि जहां चक्रव्यूह होता है वहां एक अभिमन्यु भी होता है, जो कि आपके मामले में सूरज सिंह नाम का यह नौजवान साबित हुआ। जिसने आपको बजाय एक आम ग्राहक समझने के, आप के उस घड़ी के हाव-भाव पर बाकायदा रिसर्च कर डाला था। लिहाजा इसे ना सिर्फ आपका हुलिया और मोटरसाइकिल का नंबर याद रह गया। बल्कि इसकी निगाहों से आप की पतलून की बेल्ट में खुंसी हुई रिवाल्वर भी नहीं छिप सकी। नतीजतन आप इस घड़ी पुलिस की हिरासत में हैं और आगे आपका वही मुकाम बनने वाला है जो आप जैसे तमाम अपराधियों का होता है। तिहाड़ जेल में कटने वाली आपकी आगे की जिंदगी के लिए एडवांस में मुबारकबाद कबूल कीजिए।‘‘

जवाब में वो कसमसाया, पहलू बदला, कुछ कहने के लिए मुंह खोला फिर मुंह फेरकर खड़ा हो गया।

‘‘इसे गोली कैसे लगी।‘‘ मेरा भाषण खत्म होते ही खान ने अपने सहकर्मियों की ओर देखते हुए सवाल किया।

‘‘और कोई चारा नहीं था जनाब, ये हमारी चेतावनी के बावजूद लड़के पर फायर करने को आमादा था लिहाजा मैंने इसके हाथ का निशाना लेकर गोली चला दी।‘‘

‘‘गुड जॉब! अब इसकी मलहम पट्टी का इंतजाम करो, फिर थाने में इसकी खातिरदारी करते हैं, देखते हैं खुद सबकुछ बकता है या हमसे मेहनत कराके ही दम लेगा।‘‘

इसके बाद पुलिस पार्टी अपनी कार्रवाई में जुट गई।

अब मेरा वहां कोई काम नहीं था।

पुलिस अधिकारियों से विदा लेकर मैं अपने फ्लैट पर पहुंचा और लंबी तान कर सो गया।

आठ जून 2017

वो एक छोटी सी पार्टी थी, जो कातिल की गिरफ्तारी और अपनी जान जोखिम से निकलने की खुशी में मनोज गायकवाड़ द्वारा कालकाजी स्थित एक रेस्टोरेंट में रखी गई थी - लिहाजा जान बचने की खुशी में वो बीवी की मौत का गम भूल चुका था - आपके खादिम के अलावा जिन लोगों की उस पार्टी में शिरकत थी उनमें - शीला वर्मा, नीलम तंवर, मुकेश सैनी, महीप शाह, और नरेश चौहान के नाम शुमार थे।

उस घड़ी हमारे बीच ड्रिंक और डिनर का दौर चल रहा था, ये जुदा बात थी कि वहां मौजूद लेडीज ने ड्रिंक के नाम पर ऑरेंज जूश प्रेफर किया था। चर्चा का विषय - जैसा की होना ही था - डॉक्टर उमेश खरवार था। जिसके बारे में चौहान हमें बता चुका था कि डॉक्टर ने ना सिर्फ अपना जुर्म कबूल कर लिया था, बल्कि पुलिस उसके फ्लैट का सारा ताम-झाम अपने कब्जे में कर चुकी थी। अलबत्ता डॉक्टर ने ये सारे कत्ल क्यों किए थे, इस बात से पर्दा उठना अभी बाकी था। बतौर चौहान बीती रात उसके फ्लैट की तलाशी तथा उसे चिकित्सा उपलब्ध कराने में पुलिस का इतना वक्त जाया हो गया था कि उसका मुकम्मल बयान - जो कि डीसीपी की उपस्थिति में होना था - नहीं लिया जा सका था।

लिहाजा सभी ये जानने को उत्सुक थे कि बीते दिनों घटित हुई चारों हत्याओं के पीछे असल वजह क्या थी। ऐसी कौन सी बात थी जिसने एक क्वालीफाईड डॉक्टर को कत्ल जैसा संगीन जुर्म करने को मजबूर कर दिया था। उनकी उत्सुकता स्वाभाविक थी, क्योंकि ऐसी कोई बात अभी तक सामने नहीं आई थी जो हत्या की कोई संभावित वजह सुझा पाती।

मैंने सिगरेट का पैकेट निकालकर एक सिगरेट सुलगाया, फिर इत्मिनान से एक गहरा कस लेकर हवा में धुंए का छल्ला बनाता हुआ बोला, ‘‘जनाबे-हाजरीन! मेरा खुद का अंदाजा ये कहता है कि इस हत्याकांड के पीछे कभी कोई ठोस वजह थी ही नहीं। आगे आप खुद देखेंगे कि बतौर कातिल डॉक्टर खरवार भी कील ठोक कर कोई वजह बयान नहीं कर पायेगा। हकीकत तो ये थी कि वो सिर्फ मंदिरा चावला और मिसेज गायकवाड़ की हत्या करना चाहता था जिसका इल्जाम, वो चाहता था कि चौहान पर आए। मगर हालात ने कुछ यूं पलटा खाया कि आगे चलकर अंकुर रोहिल्ला और रंजना चावला की हत्या करना उसकी मजबूरी बन गयी।‘‘

‘‘खामखाह! - चौहान बड़ी अधीरता से बोला - मेरे से भला उसकी क्या दुश्मनी थी, जो यूं मुझे फ्रेम करने की कोशिश करता।‘‘

‘‘कोशिश नहीं चौहान साहब! उसने ऐसा करके दिखाया था। तुम्हारी जिंदगी का सकून छीन लिया था उसने। तुम्हारी पुलिस की नौकरी, तुम्हारी इज्जत! तुम्हारा कैरियर! अपनी तरफ से तो सबकुछ खत्म कर चुका था वो। मत भूलो कि तुम्हारा जेल जाना लगभग तय था। तुम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उसने जमकर खाना खराब किया था तुम्हारा। साथ ही तुम्हें उसके आला दिमाग की तारीफ भी करनी पड़ेगी, उसने तुम्हें और गायकवाड़ साहब को जैसे चाहा वैसे नचाकर दिखाया। उसने चाल ही कुछ ऐसी चली थी कि अगर तुम किसी तरह बच भी जाते, तो गायकवाड़ साहब को जेल जाकर रहना था। मत भूलो कि हम खुद इनका तबोस्सुर कातिल के रूप में कर चुके थे, क्यों? क्योंकि डॉक्टर ऐसा चाहता था। वो शुरू से ही बतौर अल्टरनेट कातिल इनको साथ लेकर चल रहा था। ताकि किसी तरह से अगर तुम बच भी जाओ तो यूं कातिल की खाली हुई कुर्सी पर इन्हें बैठाया जा सके।‘‘

‘‘ठीक कहते हो तुम - गायकवाड़ बोला - खासतौर से मैं तुम्हारा ये एहसान जीवन भर नहीं भुला सकता कि तुमने मुझे निश्चित तौर पर जेल जाने से ना सिर्फ बचाया, बल्कि मेरी बात पर यकीन करके ये साबित करके दिखाया कि मैं बेकसूर हूं और असली कातिल कोई और है।‘‘

‘‘उस बात का तो सारा क्रेडिट चौहान को जाता है! चौहान के बिना वो सब कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं था। जिस तरह एक छोटे से वफ्ते में इसने जानकारियां मुहैया करा के दिखाईं, वो सिर्फ एक पुलिस वाला ही कर सकता था, मुझ जैसे किसी पीडी के वश की बात तो हरगिज भी नहीं थी। सच पूछिये तो सूरज सिंह की बाबत - जिसका इस केस के अनावरण में बहुत बड़ा योगदान था - हमें सिर्फ इसलिए पता चल पाया, क्योंकि चौहान ने सरेआम कानून की धज्जियां उड़ाते हुए रजनीश अग्रवाल को उस वक्त अगवा कर लिया, जब वो घर से फरार हो रहा था। फिर मेरी रनिंग कार में इसने अग्रवाल को जो ट्रीटमेंट दिया - उस घड़ी इसका रौद्र रूप देखकर मेरा कलेजा कांप उठा था, एक बारगी तो मैं ये तक सोचने लगा था कि कहीं ये अग्रवाल को गोली ही ना मार दे - इसके दिये पुलिसिया ट्रीटमेंट ने ही अग्रवाल को मुंह खोलने पर मजबूर किया। वो काम भी किसी पीडी के वश का नहीं था। यकीन जानिये अगर उसने मुंह नहीं खोला होता, तो ना तो हम सूरज सिंह तक पहुंच पाते, ना वो लड़का हमें डॉक्टर के बारे में बता पाता, लिहाजा इस केस के क्लाइमैक्स का पूरा-पूरा क्रेडिट चौहान को जाता है।‘‘

‘‘तो समझो मैं तुम दोनों का दिल से शुक्रगुजार हूं। ये एक ऐसा उपकार है तुम दोनों का मुझपर, जिसका बदला मैं चाहकर भी नहीं चुका सकता।‘‘

‘‘चुका तो सकते हैं जनाब! एक रास्ता तो मैं आपको अभी सुझा सकता हूं।‘‘

‘‘प्लीज टैल मी!‘‘

‘‘आप चौहान को माफ कर सकते हैं।‘‘

‘‘किसलिए भई?‘‘

‘‘आपकी शरीकेहयात का - खुदा उन्हें जन्नतनशीं करें - जिस लड़के के साथ अफेयर था, वो कोई और नहीं बल्कि चौहान ही था।‘‘

उसने हैरानी से चौहान की ओर देखा! चौहान का सिर झुक गया। गायकवाड़ कुछ क्षण तक उसको देखता रहा फिर बोला, ‘‘क्या जरूरत थी बताने की, इस बाबत तुम खामोशी भी तो अख्तियार कर सकते थे।‘‘

‘‘कर सकता था, अभी तक किया भी था। मगर आगे ये ऐसा नहीं चाहता था! आपके द्वारा अपनी जमानत कराए जाने पर ये इतना द्रवित हो उठा था, कि उस रोज कोर्ट में ही आपको सारी सच्चाई बता देने पर अमादा था। तब बड़ी मुश्किल से नीलम ने इसे ऐसा करने से रोका था - वो बात सुनकर नीलम ने तत्काल खा जाने वाली निगाहों से मुझे घूरा, उससे बेहतर कौन जानता था कि वैसी कोई बात हमारे बीच कभी नहीं हुई थी। मगर साहबान मैं भी क्या करता! चौहान की तरफ से गायकवाड़ का दिल साफ होना जरूरी था। मैं नहीं चाहता था कि कल को गायकवाड़ अपनी मकतूला बीवी के आशिक का - जो कि चौहान था - कत्ल करने पर अमादा हो जाए। ऊपर से चौहान और सुनीता के अफेयर की बात सामने लाए बिना ये कहानी आगे नहीं बढ़ने वाली थी।‘‘

‘‘नेवर माइंड! - कुछ क्षण खामोश रहने के बाद गायकवाड़ बोला - जब अपना ही सिक्का खोटा था तो इसको क्या दोष देना। ये अकेले तो जिम्मेदार नहीं था उसके लिए! दोनों के बीच जिस तरह के ताल्लूकात थे उसके लिए सुनीता, बल्कि मैं खुद भी उतना ही जिम्मेदार था जितना कि चौहान। इसके बावजूद अगर माफी से इसके दिल को कोई चैन मिलता हो तो समझो मैंनेे इसे माफ कर दिया। तुम आगे बढ़ो और बेहिचक बताओ कि बात हत्या तक कैसे जा पहुंची।‘‘

‘‘हत्या की वजह जैसा कि मैं पहले ही बयान कर चुका हूं कोई कील ठोक कर बताने वाली वजह नहीं है। उसके पीछे डॉक्टर की गंदी मानसिकता थी, चौहान के प्रति उसकी कुढ़न थी, जो धीरे-धीरे इतना विकराल रूप लेती चली गई कि डॉक्टर इससे खुंदक खाने लगा। दरअसल वो आपकी पत्नी पर बुरी तरह से आशक्त था, जबकि मकतूला उसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं देती थी। ये बात वो खुद मेरे सामने स्वीकार कर चुका है। चौहान और मकतूला के संबंधों के बारे में वो जब भी सोचता उसके सीने पर सांप लोटने लगते थे। वो हर वक्त ये सोचकर कुढ़ता रहता था कि मकतूला के संबंध चौहान के साथ थे, उसके साथ क्यों नहीं! धीरे-धीरे उसके दिमाग में ये बात गहरी पैठती चली गई कि चौहान के रहते हुए वो मकतूला की नजदीकियां हासिल नहीं कर सकता। इसी दौरान एक रोज चौहान से मिलने मंदिरा चावला इसके फ्लैट पर आई। निश्चय ही उस रोज वो काफी देर तक इसके फ्लैट में रही होगी, तभी....।‘‘

‘‘दो घंटे - चौहान मेरी बात काट कर बोला - उस रोज वो तकरीबन दो घंटे मेरे फ्लैट पर रही थी। फिर जब मैं उसे छोड़ने के लिए बाहर निकला तो देखा कि डॉक्टर अपने दरवाजे पर खड़ा हमें ही घूर रहा था।‘‘
 
‘‘लिहाजा उसका लंबे समय तक चौहान के फ्लैट में बने रहने का मतलब डॉक्टर ने ये लगाया कि हो ना हो इसका मंदिरा चावला से भी अफेयर था। लिहाजा पहले से कुढ़ता डॉक्टर और ज्यादा जल-भुन गया। गुजरते वक्त के साथ वो चौहान को मन ही मन अपना दुश्मन मानने लगा। फिर एक वक्त वो भी आया जब वो चौहान को अपने रास्ते से हटाने योजनायें बनाने में जुट गया।‘‘

मैंने सिगरेट का आखिरी कस लेकर उसे एक्स्ट्रे में मसल दिया। फिर अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘बात इतनी भी होती तो शायद ये मामला मंदिरा की हत्या से आगे नहीं बढ़ता। मगर आगे चल कर एक ऐसी मुख्तर सी घटना घटित हुई जिसने एक ही झटके में डॉक्टर के मन में मिसेज गायकवाड़ के लिए नफरत सी पैदा कर दी। उस रोज हुआ ये था कि मकतूला ने किसी बात पर डॉक्टर को ‘भइया‘ कहकर पुकार लिया, अपने लिए मकतूला के मुंह से ‘भइया‘ का संबोधन सुनकर उसका खून खौल उठा। यकीन जानिए वो इकलौता शब्द ही आपकी बीवी के कत्ल की वजह बना था। डॉक्टर ने उसी वक्त ‘तू मेरी नहीं तो किसी की नहीं‘ वाले तर्ज पर आर-पार वाला फैसला कर डाला।‘‘

‘‘तुम्हे कैसे मालूम?‘‘ चौहान पूछे बिना नहीं रह सका।

‘‘डॉक्टर की जुबानी ही मालूम हुआ था भई और कैसे मालूम होता।‘‘

‘‘ओह! आगे बढ़ो।‘‘

‘‘एक बार जब डॉक्टर ने मकतूला को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया तो वो अपने फैसले को अंजाम तक पहुंचाने की उधेड़ बुन में लग गया। वो मिसेज गायकवाड़ की हत्या तो करना चाहता था, मगर साथ ही वो ये भी चाहता था कि उसके कत्ल का इल्जाम चौहान के सिर आए ताकि उसका बदला पूरा हो सके। हकीकतन वो चौहान को तड़पता हुआ, मिमियाता हुआ देखना चाहता था। इसकी जिंदगी बद् से बद्तर कर देना चाहता था। उसपर मकतूला की हत्या का जुनून उतना हावी नहीं था जितना कि चौहान को बरबाद कर देने का जुनून उसपर सवार था। यही वजह थी कि उसने अपनी हिट लिस्ट में एक नाम और जोड़ लिया, मंदिरा चावला का नाम! वरना तो उसकी मंदिरा से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई अदावत नहीं थी। वो तो उसे जानता तक नहीं था। इस तरह जब उसकी हिट लिस्ट पूरी हो गयी तो उसने एक साजिश रची, एक ऐसी खतरनाक साजिश जिसके बारे में हमारे लिए सोच पाना भी मुमकिन नहीं था।‘‘

‘‘अपनी योजना के जेरेसाया सबसे पहले उसने खुद को महफूज रखने का इंतजाम करना था। जिसके तहत उसे दरकरार थी एक बलि के बकरे की, जो कि गायकवाड़ साहब बने। आपको उसने अपने जाल में कैसे फंसाया ये आप जानते ही हैं। धीरे-धीरे उसने आपको एक ऐसी कहानी परोसी जिसमें आपकी पत्नी के अफेयर वाली बात को छोड़कर और कोई सच्चाई नहीं थी। वो आपके आगे चारा डालता गया और आप उसे निगलते चले गये। आप खुद ये बात स्वीकार करते हैं कि आपको उसपर कभी शक नहीं हुआ।‘‘

‘‘ठीक कहते हो तुम।‘‘

‘‘ऐसा भी क्या किया था उसने?‘‘ नीलम बोली।

जवाब में मैंने सबको डॉक्टर द्वारा गायकवाड़ को दुबई में की जाने वाली फोनकाल्स के बारे में बताया।

‘‘इसके बाद - मैं आगे बोला - उसने आपको किस तरह दिल्ली आने को मजबूर कर दिया ये भी आप जानते हैं। उसका इरादा मंदिरा और आपकी वाईफ का कत्ल करके उसमें चौहान को फंसाना था। मगर वो एक अल्टरनेट कातिल साथ लेकर चलना चाहता था। ताकि बाद में अगर किसी तरह चौहान बेगुनाह साबित हो जाय, तो सारा किया धरा वो आप पर थोप सके। यही वजह थी कि उसने दिल्ली पहुंचने के बाद आपको एक तयशुदा वक्त से पहले फ्लैट पर पहुंचने से रोक दिया। इसके लिए उसने आपके आगे ये चारा डाला कि अगर आप ठीक छह बजे अपने फ्लैट पर पहुंचेंगे तो आप अपनी पत्नी को उसके यार के साथ रंगे हाथों दबोच सकते हैं।‘‘

‘‘मान लो बावजूद उसकी तमाम बातों के मैं उसकी ये बात नहीं मानता तो वो क्या करता?‘‘

‘‘ना मानने का तो सवाल ही नहीं था, आपकी जगह कोई भी होता यही करता। इसके बावजूद अगर आप वहां अपनी बीवी की हत्या होने से पहले पहुंच जाते तो वो बाद में किसी बहाने से आपको घर से बाहर निकालता। फिर आपके पीठ पीछे उस काम को अंजाम देता जो आपके वक्त से पहले वहां पहुंचने की वजह से अधूरा रह गया होता। कहने का तात्पर्य ये है कि उस रोज उसने आपकी बीवी और मंदिरा की हत्या तो करनी ही करनी थी और उन दोनों की हत्या के इल्जाम में चौहान को फंसाकर रहना था।‘‘

‘‘एक बात शायद तुम भूल रहे हो - चौहान बोला - वो मुझे हत्या की वारदात में इसलिए लपेटने में कामयाब हो गया क्योंकि मंदिरा ने मेरी विस्की में कोई नशीली चीज मिला दी थी, जिससे मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा था। अगर मैं होशो हवास में होता तो उसकी मजाल नहीं होती मेरे पास फटकने की।‘‘

‘‘लगता है चंद दिनों की फजीहत ने तुम्हारे दिमाग को जंग लगा दिया है, जो इतनी सी बात तुम्हें समझ में नहीं आती कि वो नशीली चीज डॉक्टर और मंदिरा की मिली भगत से तुम्हारी विस्की में मिलाई गयी थी।‘‘

‘‘अब तुम कुछ ज्यादा ही लंबी-लंबी हांकने लगे हो, भला उसकी और मंदिरा की जुगलबंदी क्योंकर मुमकिन हो सकती थी।‘‘

‘‘इसका बेहतर जवाब तो तुम्हे डॉक्टर ही दे सकता है, मैं तो बस अपना अंदाजा बयान कर सकता हूं कि वास्तव में क्या हुआ होगा।‘‘

‘‘वही करो।‘‘

‘‘डॉक्टर तुम्हारी गैर हाजिरी में किसी रोज तुम्हारे फ्लैट में घुसा था। उसने किस फिराक में ऐसा किया मैं नहीं जानता! मगर वो घुसा जरूर था। क्योंकि ऐसा किये बिना उसकी पहुंच मंदिरा के इकबालिया बयान तक नहीं हो सकती थी, जिसकी फोटो कॉपी कल उसके फ्लैट से बरामद हुई थी।‘‘

‘‘वो उसने मंदिरा के कत्ल के बाद हथियाई हो सकती है।‘‘

‘‘तुमने उस कॉपी को गौर से नहीं देखा वरना झट समझ जाते कि ऐसा हुआ नहीं हो सकता।‘‘

‘‘ऐसी क्या खास बात थी उसमें?‘‘

‘‘वो कॉपी किसी जेरॉक्स मशीन से नहीं कराई गयी थी, बल्कि उसे तुम्हारे पलंग पर बिछी बेडशीट के ऊपर रखकर, उसका किसी मोबाइल या कैमरे से फोटो लिया गया था। जिसकी वजह से उसके बैकग्राउंड में तुम्हारे पलंग पर बिछी बेडशीट साफ दिखाई दे रही थी। ऐसा उसने तुम्हारी गैरहाजिरी में तुम्हारे फ्लैट में घुसकर नहीं किया तो तुम बताओ कि कब किया।‘‘

‘‘चलो मान ली तुम्हारी बात, कि किसी भी तरीके से वो मेरे फ्लैट में घुसा था, जहां वो मंदिरा के इकबालिया बयान की फोटो लेने में कामयाब हो गया, मगर इसका मंदिरा और उसकी जुगलबंदी से क्या ताल्लूक था।‘‘

‘‘ताल्लूक था! उस बयान को पढ़ने के बाद डॉक्टर ने उसे नजरअंदाज नहीं कर दिया। बल्कि किसी तरह उसने घटना के बारे में पूरी जानकारी हांसिल की और यूं जो बात सामने आई उससे डॉक्टर को समझते देर नहीं लगी कि असल में क्या हुआ था। फिर वो मंदिरा के पीछे पड़ा और किसी तरह उसे अपने झांसे में फांसने में कामयाब हो गया। इसके बाद उसने मंदिरा को सुझाया होगा कि अगर किसी तरह वो तुमसे अपना इकबालिया बयान हांसिल करने में कामयाब हो जाय तो उसकी जान सासत से निकल सकती थी। हो सकता है उसने मंदिरा की कोई मदद करने का आश्वासन भी दिया हो। बल्कि कोई बड़ी बात नहीं होगी अगर बेहोशी वाली दवा भी उसी ने मंदिरा को मुहैया कराई हो। मत भूलो कि वो एक क्वालीफाइड डॉक्टर था जिसकी ऐसी चीजों तक पहुंच आम बात थी।‘‘

जवाब में वहां मौजूद सभी लोगों के सिर एक साथ सहमति में हिले।

‘‘आगे सीन कुछ यूं बनता है कि एक जून को डॉक्टर ने मंदिरा चावला को फोन करके बताया कि चौहान का उस रोज वीकली ऑफ है, इसलिए वो अपने काम को अंजाम दे सकती थी। डॉक्टर की बात पर अमल करते हुए मंदिरा तुम्हें फोन करके तुम्हारे फ्लैट तक पहुंची। जहां उसने जानबूझकर बातचीत का रूख इस तरह मोड़ा की तुम उसे ड्रिंक ऑफर किये बिना नहीं रह सके। तुम बोलो ऐसी कोई बात हुई थी तुम दोनों के बीच।‘‘

‘‘हुई तो थी - चौहान याद करता हुआ बोला - मेरे खयाल से उसने मुझसे कहा था, कि उस रोज वो बहुत डिस्टर्ब थी, इतना ज्यादा कि उसका दिन में ही ड्रिंक करने का दिल हो रहा था। और अपने घर पहुंचकर सबसे पहला काम वो यही करने वाली थी। जवाब में मैंने उससे कहा था कि ड्रिंक का इंतजाम तो अभी भी हो सकता था।‘‘

‘‘सो देयर!‘‘

‘‘ठीक है भई, ज्यादा फूंक मत लो आगे बढ़ो।‘‘

‘‘मंदिरा ने हामी भर दी तो तुमने दो पैग बनाकर एक उसे थमा दिया। ड्रिंक के दौरान मंदिरा ने तुम्हें सुझाया कि किचन से पानी गिरने की आवाज आ रही है, शायद सिंक की टूटी खुली रह गयी है। तब तुम उठकर किचन में चले गये जहां तुम्हे सिंक की टूटी बंद मिली, आगे तुमने बाथरूम भी चैक किया फिर वापिस बेडरूम में लौटे। तब तक मंदिरा तुम्हारे पैग में डॉक्टर द्वारा मुहैया कराया गया कोई नशीला पाउडर मिला चुकी थी। बेडरूम में पहुंचकर तुमने अपना जाम चुसकना शुरू किया तो तुमपर बेहोशी तारी होने लगी, जिसे तुमने विस्की का असर समझकर इग्नोर कर दिया। मगर वो असर इतना तेज था कि जल्दी ही तुम बेहोश होकर बेड पर गिर गये। तब मंदिरा ने तुम्हे हिला-डुलाकर देखा होगा, जवाब में तुम्हेे दीन दुनिया से बेखबर पाकर वो अपना इकबालिया बयान तलाश करने लगी, जो कि दीवार में लगी बुकसेल्फ से सहज ही उसे मिल गया।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘होना क्या था, उसका मतलब तो हल हो चुका था। लिहाजा वो वहां से बाहर निकल कर अपने घर की राह हो ली। मेरा अपना खयाल ये है कि उसने रास्ते से ही मुझे फोन करके पांच और छह के बीच मिलने आने को कहा। वो शायद मुझसे उस बयान की बाबत ही कुछ डिसकस करना चाहती थी। हो सकता है उसका इरादा तुम्हारे खिलाफ कोई रिपोर्ट वगैरह लिखवाने का रहा हो, जिसके बारे में वो मेरी राय जानना चाहती हो। बहरहाल ये सिर्फ मेरा खयाल है हकीकत कुछ और भी रही हो सकती है।‘‘

‘‘मंदिरा के जाते ही डॉक्टर, चौहान के फ्लैट में पहंुचा, जहां से उसने चौहान की एक वर्दी और जूते हासिल किये। इसके बाद वो मंदिरा को फोन करके या बिना फोन किए उसके फ्लैट पर जा धमका। इत्तेफाकन यही वो वक्त था जब अंकुर रोहिल्ला मंदिरा के फ्लैट से बाहर निकल रहा था। लिहाजा दोनों का आमना-सामना होकर रहा। इसमें अहम बात ये रही कि डॉक्टर, अंकुर रोहिल्ला को बतौर टीवी स्टार झट से पहचान गया जबकि अंकुर रोहिल्ला के लिए वो काला चोर था। बहरहाल डॉक्टर भीतर पहुंचा तो मंदिरा ने उसे अपनी स्टडी में रिसीव किया। ये बात भी इशारा करती है कि दोनों एक दूसरे को पहले से जानते थे।

‘‘एक मिनट जरा रूको प्लीज - अंकुर रोहिल्ला का मैनेजर महीप शाह बीच में बोल पड़ा - अगर अंकुर बाबा ने उसे मंदिरा चावला के फ्लैट में दाखिल होते देख लिया था, तो डॉक्टर ने कत्ल के अपने प्लान को मुल्तवी क्यों नहीं कर दिया।‘‘
 

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