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Guest
ठीक दस बजे मैं थाने पहुंचा, तो तिवारी को मैंने बेसब्री से अपना इंतजार करते पाया।
‘‘एक घंटे में पहुंचने की बात कही थी गोखले।‘‘
‘‘हां जिसे आपने ही दस बजे तक के लिए एक्स्टेंड कर दिया था और देख लीजिए इस वक्त ठीक दस बजे हैं।‘‘
‘‘ठीक है चल! - वो उठता हुआ बोला, फिर बड़े प्यार से मेरी पीठ पर दो बार थपकी दी और मेरे कंधे पर हाथ रखकर वो बाहर तक आया। उसका ये दोस्ताना व्यवहार मुझे कुछ चुभ सा गया। कुछ ना कुछ गड़बड़ तो जरूर थी। क्यों वो यूं पेश आ रहा था जैसे मैं उसका कोई जिगरी यार था।
बहरहाल मुझे लॉकअप तक पहुंचाकर वो वापिस लौट गया। भीतर मनोज गायकवाड़ एक चेयर पर सिर झुकाये बैठा था। एक ही रात में वो सालों का बीमार लगने लगा था। आहट पाकर उसने चेहरा ऊपर उठाया, फिर मुझपर निगाह पड़ते ही उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। मैं वहां मौजूद एक स्टूल खींचकर उसके सामने बैठ गया।
‘‘क्यों फंसाया मुझे?‘‘
‘‘क्या कह रहे हो जनाब! मैं भला आपको क्यों फंसाऊंगा, फिर पता तो चले कि मैंने ऐसा क्या कर दिया।‘‘
‘‘रिवाल्वर की खरीद-फरोख्त वाली बात तुमने पुलिस को बताई थी।‘‘
‘‘किसने कहा आपसे ऐसा?‘‘
‘‘सोचो! मैं यहां हवालात में बंद हूं तो पुलिस के सिवाय ये खबर मुझे कौन दे सकता है। कैसे पीडी हो तुम जो क्लाइंट के लिए कातिल को तलाशने की बजाय, क्लाइंट को ही कत्ल के केस में लपेट दिया।‘‘
‘‘मैंने ऐसा कुछ नहीं किया - कहते हुए मैंने अपने जेब से एक डायरी और पेन निकाला फिर उसपर लिखा ‘चुपचाप मेरी पीठ पर देखिये क्या वहां कोई चीज चिपकी नजर आती है आपको‘ फिर वो पुर्जा फाड़कर मैंने उसे पकड़ाया और बात आगे बढ़ाई - ‘जनाब आप मेरी वजह से नहीं फंसे हैं, आपको फंसाया है आपके कुकर्मो ने क्या जरूरत थी आपको यूं कत्लेआम मचाने की।‘‘
‘‘मैंने कोई कत्ल नहीं किया।‘‘ कहते हुए उसने मेरी पीठ पर से बड़ी सी बिंदी जैसी चीज नोंचकर मेरे हाथों में रख दी। तो ये माजरा था! यकीनन वो कोई माइक्रोफोन था जिसके जरिए तिवारी ने हमारी बातें सुनने का इंतजाम किया था। मैने गायकवाड़ को इशारा किया कि उसे दोबारा वहीं चिपका दे। उसने ऐसा ही किया और दोबारा मेरा सामने आकर बैठ गया।
‘‘आपके कहने से क्या होता है, आपके खिलाफ ठोस सबूत हैं, आप हरगिज भी बच नहीं सकते।‘‘
कहने के साथ-साथ मैंने पुनः डायरी में लिखा, ‘‘ये कोई माइक्रोफोन है, जिसके जरिए हमारी बातें सुनी जा रही हैं, क्या आप कुछ खास कहना चाहते हैं, ऐसी कोई बात जो पुलिस को नहीं बताना चाहते।‘‘
‘‘मैंने तो तुम्हारा बहुत नाम सुना है इस धंधे में।‘‘ कहते हुए उसने कागज पर निगाह टिका दी, फिर सिर हिलाकर हामी भरी।
‘‘क्या नाम सुना है कि मैं अपने क्लाइंट का गुनाह अपने सिर ले लेता हूं, या मैं इतना बड़ा उस्ताद हूं कि स्याह को सफेद करके दिखाता हूं।‘‘
मैंने पुनः डायरी में लिखा, ‘‘मैं जल्द ही आपसे दोबारा मिलूंगा आज की ही डेट में! अभी कोई भी बात करते रहिए, कुछ नहीं तो इसी जिद पर अड़े रहिए कि आपने कुछ नहीं किया है।‘‘
उसने पढ़ा फिर सहमति में सिर हिलाते हुए बोला, ‘‘देखो मैं ये नहीं कह रहा कि तुम स्याह को सफेद कर के दिखाओ, मगर मैंने तुम्हे रिटेन किया है तो कम से कम कातिल की तलाश तो तुम्हें जारी रखनी चाहिए।‘‘
‘‘कातिल तो मेरे सामने बैठा है जनाब।‘‘
‘‘मैं तुम्हारा क्लाइंट हूं, तुम्हें मेरी बात पर यकीन करना चाहिए, और जाकर असली कातिल की तलाश में हाथ-पांव मारने चाहिए। यूं अगर तुम मुझे ही कातिल समझ लोगे तो इंवेस्टिगेशन कैसे करोगे।‘‘
‘‘मैं आपकी सारी बातें मान लूंगा बस आप एक सवाल का जवाब दे दीजिए कि अगर आप कातिल नहीं हैं तो जो रिवाल्वर आपके पास थी, उससे रंजना चावला का कत्ल क्योंकर हो गया।‘‘
‘‘मुझे नहीं मालूम! - वो दृढ़ स्वर में बोला - यही सीधा और सच्चा जवाब है। जो तुम्हें समझ में आता हो तो ठीक वरना समझ लो मैंने तुम्हें यहां बुलाकर सिर्फ वक्त बर्बाद किया।‘‘
‘‘पुलिस का कहना था कि आप मुझे कुछ बताना चाहते हैं, कोई ऐसी बात जो आप पुलिस को नहीं बताना चाहते।‘‘
‘‘ऐसी कोई बात नहीं थी, मैं बस तुमसे मिलना चाहता था। ताकि तुम्हें हत्यारे की तलाश में लगने के लिए तैयार कर सकूं, जो कि मैं देख रहा हूं कि होता नहीं दिख रहा। अब बेशक तुम जा सकते हो।‘‘
‘‘जैसी आपकी मर्जी।‘‘ कहकर मैं उठकर खड़ा हो गया। लॉकअप से बाहर निकलते ही मुझे तिवारी अपनी तरफ आता दिखाई दिया।
‘‘कुछ बताया उसने!‘‘
‘‘नहीं, बस यही राग अलापता रहा कि वो निर्दोष है और मुझे असली कातिल के पीछे पड़ना चाहिए।‘‘
‘‘तेरी पीठ पर कुछ लगा है गोखले।‘‘ कहकर उसने वहां चिपके माइक्रोफोन को नोंचकर अलग किया और यूं दिखावा किया जैसे पीठ से हटाकर कुछ फेंका हो, मगर अगले ही पल मैंने उसके हाथ को जेब में सरकते साफ देखा।
‘‘अब मेरा लिए क्या हुक्म है।‘‘
‘‘जा भई काम तो कुछ बना नहीं, अब तुझे यहां रोककर क्या फायदा।‘‘ कहकर वो सीधा अपने कमरे में जा घुसा।
उसके इस अंदाज पर मैं तिलमिला कर रह गया। फिर मैंने ये सोचकर खुद को तसल्ली दी कि मैंने ही कौन सी उसकी मनमानी चलने दी थी।
बाहर निकल कर मैंने अंकुर रोहिल्ला के मैनेजर महीप शाह को फोन किया तो पता चला कि वो उस घड़ी हौज खास थाने में पुलिस की हाजिरी भर रहा था।
मैं थाने पहुंचा, तो वो मुझे डियुटी रूम में एक चेयर पर बैठा मिला। बड़े ही अनमने भाव से उसने मुझसे हाथ मिलाया।
‘‘जरूर मरे जा रहे होगे मुझसे मिलने के लिए जो यहां तक आ पहुंचे, नहीं।‘‘
‘‘था तो कुछ ऐसा ही।‘‘
उसने असहाय भाव से मेरी ओर देखा।
‘‘आखिरकार पुलिस को तुमपर शक हो ही गया।‘‘
‘‘बकवास मत करो।‘‘
‘‘कब से बैठे हो यहां।‘‘
‘‘चार घंटे होने वाले हैं - वो कलपता हुआ बोला - अभी और जाने कितना वक्त लगायेंगे ये लोग।‘‘
‘‘बैठा क्यों रखा है तुम्हें।‘‘
‘‘कहते हैं मेरा बयान लेंगे। कल एक ही बात को हजार बार पूछने के बाद भी आज मेरा बयान लेंगे। और अगर लेना ही है तो फिर जल्दी से लेते क्यों नहीं, क्यों मुझे यूं यहां बैठा रखा है जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया हो।‘‘
‘‘किया है?‘‘
जवाब में उसने मुझे खा जाने वाली निगाहों से घूरा।
मैं हौले से हंसा।
‘‘क्यों कलपा रहा है भाई मेरे को, कल जो सिर पर इतना बड़ा गूमड़ निकाल दिया उससे पेट नहीं भरा क्या।‘‘
‘‘वो तुम्हारी गलती थी, मैं निहत्था था फिर भी पिस्तौल दिखाकर तुम मुझे हूल दिए जा रहे थे। ऐसे में तुम्हारे कस बल ढीले करना तो बनता ही था।‘‘
‘‘अब यहां क्या करने आये हो।‘‘
‘‘तुमसे मिलने आया हूं भई! पुलिस ने अगर तुम्हे हवालात में डाल दिया तो कोई वकील वगैरह का इंतजाम करने वाला होना चाहिए या नहीं।‘‘
‘‘लिहाजा जले पर नमक छिड़कने आए हो।‘‘
जवाब में मैं फिर से हंसा तो वो मुंह फेर कर बैठ गया।
‘‘एक घंटे में पहुंचने की बात कही थी गोखले।‘‘
‘‘हां जिसे आपने ही दस बजे तक के लिए एक्स्टेंड कर दिया था और देख लीजिए इस वक्त ठीक दस बजे हैं।‘‘
‘‘ठीक है चल! - वो उठता हुआ बोला, फिर बड़े प्यार से मेरी पीठ पर दो बार थपकी दी और मेरे कंधे पर हाथ रखकर वो बाहर तक आया। उसका ये दोस्ताना व्यवहार मुझे कुछ चुभ सा गया। कुछ ना कुछ गड़बड़ तो जरूर थी। क्यों वो यूं पेश आ रहा था जैसे मैं उसका कोई जिगरी यार था।
बहरहाल मुझे लॉकअप तक पहुंचाकर वो वापिस लौट गया। भीतर मनोज गायकवाड़ एक चेयर पर सिर झुकाये बैठा था। एक ही रात में वो सालों का बीमार लगने लगा था। आहट पाकर उसने चेहरा ऊपर उठाया, फिर मुझपर निगाह पड़ते ही उसके चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। मैं वहां मौजूद एक स्टूल खींचकर उसके सामने बैठ गया।
‘‘क्यों फंसाया मुझे?‘‘
‘‘क्या कह रहे हो जनाब! मैं भला आपको क्यों फंसाऊंगा, फिर पता तो चले कि मैंने ऐसा क्या कर दिया।‘‘
‘‘रिवाल्वर की खरीद-फरोख्त वाली बात तुमने पुलिस को बताई थी।‘‘
‘‘किसने कहा आपसे ऐसा?‘‘
‘‘सोचो! मैं यहां हवालात में बंद हूं तो पुलिस के सिवाय ये खबर मुझे कौन दे सकता है। कैसे पीडी हो तुम जो क्लाइंट के लिए कातिल को तलाशने की बजाय, क्लाइंट को ही कत्ल के केस में लपेट दिया।‘‘
‘‘मैंने ऐसा कुछ नहीं किया - कहते हुए मैंने अपने जेब से एक डायरी और पेन निकाला फिर उसपर लिखा ‘चुपचाप मेरी पीठ पर देखिये क्या वहां कोई चीज चिपकी नजर आती है आपको‘ फिर वो पुर्जा फाड़कर मैंने उसे पकड़ाया और बात आगे बढ़ाई - ‘जनाब आप मेरी वजह से नहीं फंसे हैं, आपको फंसाया है आपके कुकर्मो ने क्या जरूरत थी आपको यूं कत्लेआम मचाने की।‘‘
‘‘मैंने कोई कत्ल नहीं किया।‘‘ कहते हुए उसने मेरी पीठ पर से बड़ी सी बिंदी जैसी चीज नोंचकर मेरे हाथों में रख दी। तो ये माजरा था! यकीनन वो कोई माइक्रोफोन था जिसके जरिए तिवारी ने हमारी बातें सुनने का इंतजाम किया था। मैने गायकवाड़ को इशारा किया कि उसे दोबारा वहीं चिपका दे। उसने ऐसा ही किया और दोबारा मेरा सामने आकर बैठ गया।
‘‘आपके कहने से क्या होता है, आपके खिलाफ ठोस सबूत हैं, आप हरगिज भी बच नहीं सकते।‘‘
कहने के साथ-साथ मैंने पुनः डायरी में लिखा, ‘‘ये कोई माइक्रोफोन है, जिसके जरिए हमारी बातें सुनी जा रही हैं, क्या आप कुछ खास कहना चाहते हैं, ऐसी कोई बात जो पुलिस को नहीं बताना चाहते।‘‘
‘‘मैंने तो तुम्हारा बहुत नाम सुना है इस धंधे में।‘‘ कहते हुए उसने कागज पर निगाह टिका दी, फिर सिर हिलाकर हामी भरी।
‘‘क्या नाम सुना है कि मैं अपने क्लाइंट का गुनाह अपने सिर ले लेता हूं, या मैं इतना बड़ा उस्ताद हूं कि स्याह को सफेद करके दिखाता हूं।‘‘
मैंने पुनः डायरी में लिखा, ‘‘मैं जल्द ही आपसे दोबारा मिलूंगा आज की ही डेट में! अभी कोई भी बात करते रहिए, कुछ नहीं तो इसी जिद पर अड़े रहिए कि आपने कुछ नहीं किया है।‘‘
उसने पढ़ा फिर सहमति में सिर हिलाते हुए बोला, ‘‘देखो मैं ये नहीं कह रहा कि तुम स्याह को सफेद कर के दिखाओ, मगर मैंने तुम्हे रिटेन किया है तो कम से कम कातिल की तलाश तो तुम्हें जारी रखनी चाहिए।‘‘
‘‘कातिल तो मेरे सामने बैठा है जनाब।‘‘
‘‘मैं तुम्हारा क्लाइंट हूं, तुम्हें मेरी बात पर यकीन करना चाहिए, और जाकर असली कातिल की तलाश में हाथ-पांव मारने चाहिए। यूं अगर तुम मुझे ही कातिल समझ लोगे तो इंवेस्टिगेशन कैसे करोगे।‘‘
‘‘मैं आपकी सारी बातें मान लूंगा बस आप एक सवाल का जवाब दे दीजिए कि अगर आप कातिल नहीं हैं तो जो रिवाल्वर आपके पास थी, उससे रंजना चावला का कत्ल क्योंकर हो गया।‘‘
‘‘मुझे नहीं मालूम! - वो दृढ़ स्वर में बोला - यही सीधा और सच्चा जवाब है। जो तुम्हें समझ में आता हो तो ठीक वरना समझ लो मैंने तुम्हें यहां बुलाकर सिर्फ वक्त बर्बाद किया।‘‘
‘‘पुलिस का कहना था कि आप मुझे कुछ बताना चाहते हैं, कोई ऐसी बात जो आप पुलिस को नहीं बताना चाहते।‘‘
‘‘ऐसी कोई बात नहीं थी, मैं बस तुमसे मिलना चाहता था। ताकि तुम्हें हत्यारे की तलाश में लगने के लिए तैयार कर सकूं, जो कि मैं देख रहा हूं कि होता नहीं दिख रहा। अब बेशक तुम जा सकते हो।‘‘
‘‘जैसी आपकी मर्जी।‘‘ कहकर मैं उठकर खड़ा हो गया। लॉकअप से बाहर निकलते ही मुझे तिवारी अपनी तरफ आता दिखाई दिया।
‘‘कुछ बताया उसने!‘‘
‘‘नहीं, बस यही राग अलापता रहा कि वो निर्दोष है और मुझे असली कातिल के पीछे पड़ना चाहिए।‘‘
‘‘तेरी पीठ पर कुछ लगा है गोखले।‘‘ कहकर उसने वहां चिपके माइक्रोफोन को नोंचकर अलग किया और यूं दिखावा किया जैसे पीठ से हटाकर कुछ फेंका हो, मगर अगले ही पल मैंने उसके हाथ को जेब में सरकते साफ देखा।
‘‘अब मेरा लिए क्या हुक्म है।‘‘
‘‘जा भई काम तो कुछ बना नहीं, अब तुझे यहां रोककर क्या फायदा।‘‘ कहकर वो सीधा अपने कमरे में जा घुसा।
उसके इस अंदाज पर मैं तिलमिला कर रह गया। फिर मैंने ये सोचकर खुद को तसल्ली दी कि मैंने ही कौन सी उसकी मनमानी चलने दी थी।
बाहर निकल कर मैंने अंकुर रोहिल्ला के मैनेजर महीप शाह को फोन किया तो पता चला कि वो उस घड़ी हौज खास थाने में पुलिस की हाजिरी भर रहा था।
मैं थाने पहुंचा, तो वो मुझे डियुटी रूम में एक चेयर पर बैठा मिला। बड़े ही अनमने भाव से उसने मुझसे हाथ मिलाया।
‘‘जरूर मरे जा रहे होगे मुझसे मिलने के लिए जो यहां तक आ पहुंचे, नहीं।‘‘
‘‘था तो कुछ ऐसा ही।‘‘
उसने असहाय भाव से मेरी ओर देखा।
‘‘आखिरकार पुलिस को तुमपर शक हो ही गया।‘‘
‘‘बकवास मत करो।‘‘
‘‘कब से बैठे हो यहां।‘‘
‘‘चार घंटे होने वाले हैं - वो कलपता हुआ बोला - अभी और जाने कितना वक्त लगायेंगे ये लोग।‘‘
‘‘बैठा क्यों रखा है तुम्हें।‘‘
‘‘कहते हैं मेरा बयान लेंगे। कल एक ही बात को हजार बार पूछने के बाद भी आज मेरा बयान लेंगे। और अगर लेना ही है तो फिर जल्दी से लेते क्यों नहीं, क्यों मुझे यूं यहां बैठा रखा है जैसे मैंने कोई जुर्म कर दिया हो।‘‘
‘‘किया है?‘‘
जवाब में उसने मुझे खा जाने वाली निगाहों से घूरा।
मैं हौले से हंसा।
‘‘क्यों कलपा रहा है भाई मेरे को, कल जो सिर पर इतना बड़ा गूमड़ निकाल दिया उससे पेट नहीं भरा क्या।‘‘
‘‘वो तुम्हारी गलती थी, मैं निहत्था था फिर भी पिस्तौल दिखाकर तुम मुझे हूल दिए जा रहे थे। ऐसे में तुम्हारे कस बल ढीले करना तो बनता ही था।‘‘
‘‘अब यहां क्या करने आये हो।‘‘
‘‘तुमसे मिलने आया हूं भई! पुलिस ने अगर तुम्हे हवालात में डाल दिया तो कोई वकील वगैरह का इंतजाम करने वाला होना चाहिए या नहीं।‘‘
‘‘लिहाजा जले पर नमक छिड़कने आए हो।‘‘
जवाब में मैं फिर से हंसा तो वो मुंह फेर कर बैठ गया।