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' मैं समझ रहा हूं।'
'अब आप यह भी बताएं, किया क्या जाए
'सुन..।'
'जी?'
त
' ते रा एक ही काम है।'
'लाम्बा की तलाश न ?'
'हा।'
' और दुग्गल वाला मामला?'
'उसे फिलहाल जोजफ देखेगा।'
' समझ ले बॉस... वहमामला बहुत सीरियस है। बच्चों का खेल नहीं। जिन लोगों ने बी स लाख एडवांस दिए हुए है। उन्हें अपने काम में किसी तरह का नुक्स नहीं चाहिए होगी।'
'तू फिक्र मत कर। मुझे किसी भी कीमत पर लम्बा चाहिए । तू लाम्बा को ले आ। दुग्गल का काम मैं पूरी करवा दूंगा।'
'लगता नहीं।'
'क्या नहीं लगता ?'
' दोनों में से एक भी काम होता। '
'तुझे जो करने को बोला है वो कर...बस! '
.
.
.
'जो आज्ञा बॉस।'
'अब तुझे यहां रुकने की जरूरत नहीं है।'
कोठारी ने कनखियों से जोजफ की तरफ देखा और फिर वह चुपचाप तहखाने की सीढियों की
ओर बढ़ गया।
उसके चले जाने के बाद देशमुख धीमे स्वर में जोजफ को कुछ समझाने लगा।
लम्बा ने सलीम के गोरव में अपनी खस्ता हालत कार बनने को छोड़ दी थी। उसका नया ठिकाना समीप ही था। जिस तरह की जिन्दगी वह जी रहा था , उसके लिए उसे कितने ही ठिकाने दरकार थे।
यह एक पुरानी बिल्डिंग थी।
उस क्षेत्र में बिखरी हुई आबादी थी।
बिल्डिंग में जरूरत का तमाम सामान पहले से ही जमा था। इस तरह के इंतजाम वह करके रखता
था।
उसे विश्वास था कि उसे आसानी से वहां तलाश नहीं किया जा सकता था।
उसके ठिकानों से मकान मालिकों के अलावा अगर कोई वाकिफ होता था , तो वह खुद होता था।
पूनम को मुक्त कराने के बाद उसे जो शांति मिली थी, उसके आगे जैसे उसे और कुछ चाहिए ही
नहीं था।
वह शाम उसने शानदार कॉकटेल पार्टी करके सेलीब्रेट को थी।
उस पार्टी में उसके और पूनम के अतिरिक्त तीसरा कोई न था।
नशे में दोनों अपने-आपको दुनिया का सब से खुशकिस्मत व्यक्ति महसूस कर रहे थे।
बैडरूम में दाखिल होते ही पूनम एका एक ही ठोकर लगने के बाद बड़बड़ाई- ' ऐई धक्का देते हो?'
वह हंसा।
'हंसना ' नहीं।'
वह फिर हंसा।
प्रत्युत्तर में पूनम भी हंसी।
उसकी हंसी में नशे की आजादी को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था। उस समय उसने हल्के पीले रंग का स्वेटर और ब्राउन जींस पहनी हुई थी।
नशे की वजह से उसकी आंखो में चमकी उभर आयी। उसके गोरे विकसित कपोल तपकर लाल हो चले थे।
जिस अंदाज से वह देख रही थी , उससे लाम्बा के दिल में विचित्र-सी हलचल मचती जा रही थी।
__कैद से मुक्त पंछी जिस त रह खुश होता है, वैसी ही खुशी पूनम के चेहरे पर देखी जा सकती थी। शराब के नशे ने उस खुशी में चार-चांद लगा दिए थे।
उस उच्छृखल खुशी के आगे दुनिया की कोई भी खुशी उसके लिए फीकी थी।
लाम्बा आदतन अपने आसपास का ध्यान रखे हुए था। वह एक पेशेवर हत्यारा था और उसके लिए हमेशा अपने कान और आंखों को खुला रखना
होता था।
उसने खिड़की से बाहर झांका फिर वापस लौट आया।
हालांकि उस खुले क्षेत्र में किसी प्रकार के खतरे की आ शा नहीं थी , लेकिन फिर भी वह चूंकि सजग रहने का आदी था-इसलिए हर त रफ उसकी निगाहें घूमती रहती थीं।
धीरे-धीरे पूनम की मस्ती बढ़ती जा रही थी।
नशा उसकी आंखों में मस्ती को बढ़ाता जा रहा था।
लम्बा का ध्यान जब उसे इधर-उधर भटकता-सा लगा तो वह स्वयं आगे बढकी और उसने अपनी सुडौल बांहों का हार लम्बा की गर्दन में पहना दिया।
लाम्बा के हाथ उसकी कमर पर जा पहुंचे ।
उसके बाद गर्म सांसें घुलने लगीं। अधरों से अधर जुगाये। एक प्रगाढ़ चुम्बन!
उस ए की चुम्बन ने पैट्रोल में चिंगारी का काम किया।
वासना की आग भड़की उठी।
पूनम के दोनों हाथों की उंग लिया लाम्बा के सिर के बालों में घूमनी आरंभ हो गई। उसका नि चला
अधर लम्बा के मुंह के अंदर जा चुका था।
दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में गुंथ गए ।
फिर लम्बा ने पूनम को एकाएक ही अपनी बांहों में उठा लिया।
__ 'हाय रे...क्या कर रहे हो?' वह उसे आंख मारती हुई नशे में डूबे स्वर में बोली।
' प्यार।।
' कैसे करोगे प्यार ?'
' प्यार से करूँगा...प्यार।'
'हाय।'
'बहुत खुश नजर आ रही हो?'
'तुम्हारे पास किसी भी हाल में खुश हूं।'
'किसी भी हाल में ?'
'हां...किसी भी हाल में।'
मुस्कराते हुए लाम्बा ने पूनम को ऊपर से ही बैड पर छोड़ दिया।
'उई मां।' वह नीचे गिरती हुई बनावटी क्रोध के साथ चिल्लाई।
'मुलायम डनलप बैड पर गिरने से चोट लगने का सवाल ही नहीं उठता था ।
हंसता हुआ लाम्बा उसके ऊपर ही ढेर हो
गया।
उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे के शरीर से उनके वस्त्र उतार फे के। निर्वसन, स्निग्ध ब द न। करंट लगने जैसा स्पर्श और तेज होती हुई सांसें।
एकाकार होते हुए आलिंगनबद्ध हो गए वे।
दोनों ही एक-दूसरे को विभिन्न स्थानों पर चूम रहे थे। पूनम नीचे आ चुकी थी।
उसके मुख से कामुकी सत्कार निकले आरंभ हो गए। उसकी सांसें लम्बा की सांसों के साथ ही तीव्र होती जा रही थीं।
अंत में वह क्षण भी आया जब आनन्द के चरमोत्कर्ष पर पहुंचती पूनम के दांत लाम्बा के कंधे में गढ़ गए।
वह लम्बा से कसकर लिपट गई।
दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में देर तक जकड़े रहे।
और!
उसी स्थिति मे उन्हें नीद ने आ दबोचा।
कोठारी ने रंजीत लाम्बा की तलाश में कुछ आदमियों को भेजने के साथ-साथ स्वयं भी भाग-दौ ड़ की थी और उस समय वह थका-हारा निराशा में डूबा विला में दाखिल हुआ ही था कि एक गार्ड ने उसे सूचित किया की विदेशमुख साहब उसे अपने कमरे में बुला रहे हैं।
वह सीधा माणिकी देशमुख के कमरे में जा पहुंचा।
कमरे में कदम रखते ही वह चैका ।
वहां देशमुख अकेला नहीं था।
जोजफ था और जोजफ के अतिरिक्त था जार्ज पीटर। अ ण्ड रवर्ल्ड का एक अहम मोहरा।
'कुछ पता चला ?' उसे देखते ही मुणिकी देशमुख ने पूछा।
' अभी नहीं। ' उसने अपेक्षाकृत धीमे स्वर में कहा।
'पी टर तेरी मदद करेगा रंजीत लम्बा की तलाश करने में।'
'क्यों बॉस...क्या मैं लाम्बा को तलाश कर नहीं सकूँगा?'
'अभी तक तो नहीं ही कर सका है न और पीटर ने लम्बा से अपना कुछ उधार
भी चुकता करना है। ' देशमुख जार्ज पीटर की ओर देखता हुवा विषैले अंदाज में मुस्कराया।
'ले किन बॉस...।'
.
.
.
.
.
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'नो इफ एण्ड नो बट . ..जो मैं कह रहा हू वह तू कर। लम्बा की तलाश में पीटर की तू हर तरह की मदद करेगा। पीटर भी तुझे मदद करेगा और उसकी यहमदद फ्री ऑफ कॉस्ट होगी। अगर इसे लम्बा का मर्डर भी करना पड़ा तो उसका भी कोई चार्ज नहीं।'
कोठारी खामोश रहा। लेकिन उसकी खामोशी के बावजूद इस बात को भली-भांति समझा जा सकता था कि वह अपने बॉस के उस फैसले से नाखुश था।
जार्ज पीटर का दखल उसकी समझ में नहीं आ रह था।
'तू समझ रहा है न मैं क्या कह रहा हूं?' माणिकी देशमुख उसके चेहरे को पढने की चेष्टा करता हुआ बोला।
'जी।'
'तो अब जा...जाकर पीटर की मदद कर।'
पीटर उठ खड़ा हुआ।
कोठारी माणिकी देशमुख से कुछ कहना चाहता था किन्तु फिर उसने इरादा बदल दिया।
पीटर उसके चलने के इंतजार में उससे दो कदम आगे खड़ा उसे निहार रहा था।
मजबूरन उसे पीटर के साथ चल देना पड़ा।
वह पीटर को लेकर बाहरले हॉल में जा पहुंचा।
हॉल में उन दोनों के अतिरिक्त कोई नहीं था।
पीटर ने कोई भी औपचारिकी ता निभाए बिना सिगरेट सुलगाई और फिर आराम के साथ उसके कश लगाने लगा।
'तुमने लाम्बा को कहां-कहां तलाश किया ?' कुछ देर बाद उसने धुवां उगलते हुए अपने और कोठारी के बीच की खामोशी को तोड़ा।
'उसके जितने भी ठिकानों की जानकारी और उसने जोजफ के नाम की जानकारी तुमसे हासिल करने के बाद तुम्हें गोली नहीं मारी। वरना तो वह अपने किसी भी दुश मन को कभी क्षमा नहीं करता। वह ए ग्जीक्यूशनर है। जल्लाद! और जल्लाद बेरहम होता है।'
'मुझे गोली मारने के लिए शेर का कलेजा चाहिए।'
'वह शेर ही है।'
'शेर नहीं-गीदड़ है , इसीलिए तो दुम-दबाए भागा फिर रहा है। शेर होता तो कब का सीना ताने मेरे सामने आ चुका होता।'
शेर जब अपना शिकार करता है तो उसे पहले तो छिपना ही पड़ता है घात लगाने के लिए। अगरु वह सामने आ गया तो फिर शिकार ने तो भाग ही जाना होगा न। ' कोठारी ने अपलकी उसकी
आंखों में झांकते हुए बेझिझकी कहा।
वह पीटर के बारे में जानता था-लेकिन उसका अपना दबदबा भी अण्डर वर्ल्ड में कुछ कम नहीं था। वह खुद एक बहुत बड़ा दादा हुआ करता
था।'
वह पीटर जैसे लोगों से खौफ खाने वालों में नहीं था। पीटर कोठारी की शक्ति से वाकिफ था।
__'बहुत तारीफ कर रहे हो उसकी?' पीटर उसके चेहरे को पड़ने की कोशिश करता हुआ बोला।
'अब आप यह भी बताएं, किया क्या जाए
'सुन..।'
'जी?'
त
' ते रा एक ही काम है।'
'लाम्बा की तलाश न ?'
'हा।'
' और दुग्गल वाला मामला?'
'उसे फिलहाल जोजफ देखेगा।'
' समझ ले बॉस... वहमामला बहुत सीरियस है। बच्चों का खेल नहीं। जिन लोगों ने बी स लाख एडवांस दिए हुए है। उन्हें अपने काम में किसी तरह का नुक्स नहीं चाहिए होगी।'
'तू फिक्र मत कर। मुझे किसी भी कीमत पर लम्बा चाहिए । तू लाम्बा को ले आ। दुग्गल का काम मैं पूरी करवा दूंगा।'
'लगता नहीं।'
'क्या नहीं लगता ?'
' दोनों में से एक भी काम होता। '
'तुझे जो करने को बोला है वो कर...बस! '
.
.
.
'जो आज्ञा बॉस।'
'अब तुझे यहां रुकने की जरूरत नहीं है।'
कोठारी ने कनखियों से जोजफ की तरफ देखा और फिर वह चुपचाप तहखाने की सीढियों की
ओर बढ़ गया।
उसके चले जाने के बाद देशमुख धीमे स्वर में जोजफ को कुछ समझाने लगा।
लम्बा ने सलीम के गोरव में अपनी खस्ता हालत कार बनने को छोड़ दी थी। उसका नया ठिकाना समीप ही था। जिस तरह की जिन्दगी वह जी रहा था , उसके लिए उसे कितने ही ठिकाने दरकार थे।
यह एक पुरानी बिल्डिंग थी।
उस क्षेत्र में बिखरी हुई आबादी थी।
बिल्डिंग में जरूरत का तमाम सामान पहले से ही जमा था। इस तरह के इंतजाम वह करके रखता
था।
उसे विश्वास था कि उसे आसानी से वहां तलाश नहीं किया जा सकता था।
उसके ठिकानों से मकान मालिकों के अलावा अगर कोई वाकिफ होता था , तो वह खुद होता था।
पूनम को मुक्त कराने के बाद उसे जो शांति मिली थी, उसके आगे जैसे उसे और कुछ चाहिए ही
नहीं था।
वह शाम उसने शानदार कॉकटेल पार्टी करके सेलीब्रेट को थी।
उस पार्टी में उसके और पूनम के अतिरिक्त तीसरा कोई न था।
नशे में दोनों अपने-आपको दुनिया का सब से खुशकिस्मत व्यक्ति महसूस कर रहे थे।
बैडरूम में दाखिल होते ही पूनम एका एक ही ठोकर लगने के बाद बड़बड़ाई- ' ऐई धक्का देते हो?'
वह हंसा।
'हंसना ' नहीं।'
वह फिर हंसा।
प्रत्युत्तर में पूनम भी हंसी।
उसकी हंसी में नशे की आजादी को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था। उस समय उसने हल्के पीले रंग का स्वेटर और ब्राउन जींस पहनी हुई थी।
नशे की वजह से उसकी आंखो में चमकी उभर आयी। उसके गोरे विकसित कपोल तपकर लाल हो चले थे।
जिस अंदाज से वह देख रही थी , उससे लाम्बा के दिल में विचित्र-सी हलचल मचती जा रही थी।
__कैद से मुक्त पंछी जिस त रह खुश होता है, वैसी ही खुशी पूनम के चेहरे पर देखी जा सकती थी। शराब के नशे ने उस खुशी में चार-चांद लगा दिए थे।
उस उच्छृखल खुशी के आगे दुनिया की कोई भी खुशी उसके लिए फीकी थी।
लाम्बा आदतन अपने आसपास का ध्यान रखे हुए था। वह एक पेशेवर हत्यारा था और उसके लिए हमेशा अपने कान और आंखों को खुला रखना
होता था।
उसने खिड़की से बाहर झांका फिर वापस लौट आया।
हालांकि उस खुले क्षेत्र में किसी प्रकार के खतरे की आ शा नहीं थी , लेकिन फिर भी वह चूंकि सजग रहने का आदी था-इसलिए हर त रफ उसकी निगाहें घूमती रहती थीं।
धीरे-धीरे पूनम की मस्ती बढ़ती जा रही थी।
नशा उसकी आंखों में मस्ती को बढ़ाता जा रहा था।
लम्बा का ध्यान जब उसे इधर-उधर भटकता-सा लगा तो वह स्वयं आगे बढकी और उसने अपनी सुडौल बांहों का हार लम्बा की गर्दन में पहना दिया।
लाम्बा के हाथ उसकी कमर पर जा पहुंचे ।
उसके बाद गर्म सांसें घुलने लगीं। अधरों से अधर जुगाये। एक प्रगाढ़ चुम्बन!
उस ए की चुम्बन ने पैट्रोल में चिंगारी का काम किया।
वासना की आग भड़की उठी।
पूनम के दोनों हाथों की उंग लिया लाम्बा के सिर के बालों में घूमनी आरंभ हो गई। उसका नि चला
अधर लम्बा के मुंह के अंदर जा चुका था।
दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में गुंथ गए ।
फिर लम्बा ने पूनम को एकाएक ही अपनी बांहों में उठा लिया।
__ 'हाय रे...क्या कर रहे हो?' वह उसे आंख मारती हुई नशे में डूबे स्वर में बोली।
' प्यार।।
' कैसे करोगे प्यार ?'
' प्यार से करूँगा...प्यार।'
'हाय।'
'बहुत खुश नजर आ रही हो?'
'तुम्हारे पास किसी भी हाल में खुश हूं।'
'किसी भी हाल में ?'
'हां...किसी भी हाल में।'
मुस्कराते हुए लाम्बा ने पूनम को ऊपर से ही बैड पर छोड़ दिया।
'उई मां।' वह नीचे गिरती हुई बनावटी क्रोध के साथ चिल्लाई।
'मुलायम डनलप बैड पर गिरने से चोट लगने का सवाल ही नहीं उठता था ।
हंसता हुआ लाम्बा उसके ऊपर ही ढेर हो
गया।
उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे के शरीर से उनके वस्त्र उतार फे के। निर्वसन, स्निग्ध ब द न। करंट लगने जैसा स्पर्श और तेज होती हुई सांसें।
एकाकार होते हुए आलिंगनबद्ध हो गए वे।
दोनों ही एक-दूसरे को विभिन्न स्थानों पर चूम रहे थे। पूनम नीचे आ चुकी थी।
उसके मुख से कामुकी सत्कार निकले आरंभ हो गए। उसकी सांसें लम्बा की सांसों के साथ ही तीव्र होती जा रही थीं।
अंत में वह क्षण भी आया जब आनन्द के चरमोत्कर्ष पर पहुंचती पूनम के दांत लाम्बा के कंधे में गढ़ गए।
वह लम्बा से कसकर लिपट गई।
दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में देर तक जकड़े रहे।
और!
उसी स्थिति मे उन्हें नीद ने आ दबोचा।
कोठारी ने रंजीत लाम्बा की तलाश में कुछ आदमियों को भेजने के साथ-साथ स्वयं भी भाग-दौ ड़ की थी और उस समय वह थका-हारा निराशा में डूबा विला में दाखिल हुआ ही था कि एक गार्ड ने उसे सूचित किया की विदेशमुख साहब उसे अपने कमरे में बुला रहे हैं।
वह सीधा माणिकी देशमुख के कमरे में जा पहुंचा।
कमरे में कदम रखते ही वह चैका ।
वहां देशमुख अकेला नहीं था।
जोजफ था और जोजफ के अतिरिक्त था जार्ज पीटर। अ ण्ड रवर्ल्ड का एक अहम मोहरा।
'कुछ पता चला ?' उसे देखते ही मुणिकी देशमुख ने पूछा।
' अभी नहीं। ' उसने अपेक्षाकृत धीमे स्वर में कहा।
'पी टर तेरी मदद करेगा रंजीत लम्बा की तलाश करने में।'
'क्यों बॉस...क्या मैं लाम्बा को तलाश कर नहीं सकूँगा?'
'अभी तक तो नहीं ही कर सका है न और पीटर ने लम्बा से अपना कुछ उधार
भी चुकता करना है। ' देशमुख जार्ज पीटर की ओर देखता हुवा विषैले अंदाज में मुस्कराया।
'ले किन बॉस...।'
.
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'नो इफ एण्ड नो बट . ..जो मैं कह रहा हू वह तू कर। लम्बा की तलाश में पीटर की तू हर तरह की मदद करेगा। पीटर भी तुझे मदद करेगा और उसकी यहमदद फ्री ऑफ कॉस्ट होगी। अगर इसे लम्बा का मर्डर भी करना पड़ा तो उसका भी कोई चार्ज नहीं।'
कोठारी खामोश रहा। लेकिन उसकी खामोशी के बावजूद इस बात को भली-भांति समझा जा सकता था कि वह अपने बॉस के उस फैसले से नाखुश था।
जार्ज पीटर का दखल उसकी समझ में नहीं आ रह था।
'तू समझ रहा है न मैं क्या कह रहा हूं?' माणिकी देशमुख उसके चेहरे को पढने की चेष्टा करता हुआ बोला।
'जी।'
'तो अब जा...जाकर पीटर की मदद कर।'
पीटर उठ खड़ा हुआ।
कोठारी माणिकी देशमुख से कुछ कहना चाहता था किन्तु फिर उसने इरादा बदल दिया।
पीटर उसके चलने के इंतजार में उससे दो कदम आगे खड़ा उसे निहार रहा था।
मजबूरन उसे पीटर के साथ चल देना पड़ा।
वह पीटर को लेकर बाहरले हॉल में जा पहुंचा।
हॉल में उन दोनों के अतिरिक्त कोई नहीं था।
पीटर ने कोई भी औपचारिकी ता निभाए बिना सिगरेट सुलगाई और फिर आराम के साथ उसके कश लगाने लगा।
'तुमने लाम्बा को कहां-कहां तलाश किया ?' कुछ देर बाद उसने धुवां उगलते हुए अपने और कोठारी के बीच की खामोशी को तोड़ा।
'उसके जितने भी ठिकानों की जानकारी और उसने जोजफ के नाम की जानकारी तुमसे हासिल करने के बाद तुम्हें गोली नहीं मारी। वरना तो वह अपने किसी भी दुश मन को कभी क्षमा नहीं करता। वह ए ग्जीक्यूशनर है। जल्लाद! और जल्लाद बेरहम होता है।'
'मुझे गोली मारने के लिए शेर का कलेजा चाहिए।'
'वह शेर ही है।'
'शेर नहीं-गीदड़ है , इसीलिए तो दुम-दबाए भागा फिर रहा है। शेर होता तो कब का सीना ताने मेरे सामने आ चुका होता।'
शेर जब अपना शिकार करता है तो उसे पहले तो छिपना ही पड़ता है घात लगाने के लिए। अगरु वह सामने आ गया तो फिर शिकार ने तो भाग ही जाना होगा न। ' कोठारी ने अपलकी उसकी
आंखों में झांकते हुए बेझिझकी कहा।
वह पीटर के बारे में जानता था-लेकिन उसका अपना दबदबा भी अण्डर वर्ल्ड में कुछ कम नहीं था। वह खुद एक बहुत बड़ा दादा हुआ करता
था।'
वह पीटर जैसे लोगों से खौफ खाने वालों में नहीं था। पीटर कोठारी की शक्ति से वाकिफ था।
__'बहुत तारीफ कर रहे हो उसकी?' पीटर उसके चेहरे को पड़ने की कोशिश करता हुआ बोला।