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Thriller बारूद का ढेर

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' मैं समझ रहा हूं।'

'अब आप यह भी बताएं, किया क्या जाए

'सुन..।'

'जी?'



' ते रा एक ही काम है।'

'लाम्बा की तलाश न ?'

'हा।'

' और दुग्गल वाला मामला?'

'उसे फिलहाल जोजफ देखेगा।'

' समझ ले बॉस... वहमामला बहुत सीरियस है। बच्चों का खेल नहीं। जिन लोगों ने बी स लाख एडवांस दिए हुए है। उन्हें अपने काम में किसी तरह का नुक्स नहीं चाहिए होगी।'

'तू फिक्र मत कर। मुझे किसी भी कीमत पर लम्बा चाहिए । तू लाम्बा को ले आ। दुग्गल का काम मैं पूरी करवा दूंगा।'

'लगता नहीं।'

'क्या नहीं लगता ?'

' दोनों में से एक भी काम होता। '

'तुझे जो करने को बोला है वो कर...बस! '

.

.

.

'जो आज्ञा बॉस।'

'अब तुझे यहां रुकने की जरूरत नहीं है।'

कोठारी ने कनखियों से जोजफ की तरफ देखा और फिर वह चुपचाप तहखाने की सीढियों की

ओर बढ़ गया।

उसके चले जाने के बाद देशमुख धीमे स्वर में जोजफ को कुछ समझाने लगा।

लम्बा ने सलीम के गोरव में अपनी खस्ता हालत कार बनने को छोड़ दी थी। उसका नया ठिकाना समीप ही था। जिस तरह की जिन्दगी वह जी रहा था , उसके लिए उसे कितने ही ठिकाने दरकार थे।

यह एक पुरानी बिल्डिंग थी।

उस क्षेत्र में बिखरी हुई आबादी थी।

बिल्डिंग में जरूरत का तमाम सामान पहले से ही जमा था। इस तरह के इंतजाम वह करके रखता

था।

उसे विश्वास था कि उसे आसानी से वहां तलाश नहीं किया जा सकता था।

उसके ठिकानों से मकान मालिकों के अलावा अगर कोई वाकिफ होता था , तो वह खुद होता था।

पूनम को मुक्त कराने के बाद उसे जो शांति मिली थी, उसके आगे जैसे उसे और कुछ चाहिए ही

नहीं था।

वह शाम उसने शानदार कॉकटेल पार्टी करके सेलीब्रेट को थी।

उस पार्टी में उसके और पूनम के अतिरिक्त तीसरा कोई न था।

नशे में दोनों अपने-आपको दुनिया का सब से खुशकिस्मत व्यक्ति महसूस कर रहे थे।

बैडरूम में दाखिल होते ही पूनम एका एक ही ठोकर लगने के बाद बड़बड़ाई- ' ऐई धक्का देते हो?'

वह हंसा।

'हंसना ' नहीं।'

वह फिर हंसा।

प्रत्युत्तर में पूनम भी हंसी।

उसकी हंसी में नशे की आजादी को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता था। उस समय उसने हल्के पीले रंग का स्वेटर और ब्राउन जींस पहनी हुई थी।

नशे की वजह से उसकी आंखो में चमकी उभर आयी। उसके गोरे विकसित कपोल तपकर लाल हो चले थे।

जिस अंदाज से वह देख रही थी , उससे लाम्बा के दिल में विचित्र-सी हलचल मचती जा रही थी।

__कैद से मुक्त पंछी जिस त रह खुश होता है, वैसी ही खुशी पूनम के चेहरे पर देखी जा सकती थी। शराब के नशे ने उस खुशी में चार-चांद लगा दिए थे।

उस उच्छृखल खुशी के आगे दुनिया की कोई भी खुशी उसके लिए फीकी थी।

लाम्बा आदतन अपने आसपास का ध्यान रखे हुए था। वह एक पेशेवर हत्यारा था और उसके लिए हमेशा अपने कान और आंखों को खुला रखना

होता था।

उसने खिड़की से बाहर झांका फिर वापस लौट आया।

हालांकि उस खुले क्षेत्र में किसी प्रकार के खतरे की आ शा नहीं थी , लेकिन फिर भी वह चूंकि सजग रहने का आदी था-इसलिए हर त रफ उसकी निगाहें घूमती रहती थीं।

धीरे-धीरे पूनम की मस्ती बढ़ती जा रही थी।

नशा उसकी आंखों में मस्ती को बढ़ाता जा रहा था।

लम्बा का ध्यान जब उसे इधर-उधर भटकता-सा लगा तो वह स्वयं आगे बढकी और उसने अपनी सुडौल बांहों का हार लम्बा की गर्दन में पहना दिया।

लाम्बा के हाथ उसकी कमर पर जा पहुंचे ।

उसके बाद गर्म सांसें घुलने लगीं। अधरों से अधर जुगाये। एक प्रगाढ़ चुम्बन!

उस ए की चुम्बन ने पैट्रोल में चिंगारी का काम किया।

वासना की आग भड़की उठी।

पूनम के दोनों हाथों की उंग लिया लाम्बा के सिर के बालों में घूमनी आरंभ हो गई। उसका नि चला

अधर लम्बा के मुंह के अंदर जा चुका था।

दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में गुंथ गए ।

फिर लम्बा ने पूनम को एकाएक ही अपनी बांहों में उठा लिया।

__ 'हाय रे...क्या कर रहे हो?' वह उसे आंख मारती हुई नशे में डूबे स्वर में बोली।

' प्यार।।

' कैसे करोगे प्यार ?'

' प्यार से करूँगा...प्यार।'

'हाय।'

'बहुत खुश नजर आ रही हो?'

'तुम्हारे पास किसी भी हाल में खुश हूं।'

'किसी भी हाल में ?'

'हां...किसी भी हाल में।'

मुस्कराते हुए लाम्बा ने पूनम को ऊपर से ही बैड पर छोड़ दिया।

'उई मां।' वह नीचे गिरती हुई बनावटी क्रोध के साथ चिल्लाई।

'मुलायम डनलप बैड पर गिरने से चोट लगने का सवाल ही नहीं उठता था ।

हंसता हुआ लाम्बा उसके ऊपर ही ढेर हो

गया।

उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे के शरीर से उनके वस्त्र उतार फे के। निर्वसन, स्निग्ध ब द न। करंट लगने जैसा स्पर्श और तेज होती हुई सांसें।

एकाकार होते हुए आलिंगनबद्ध हो गए वे।

दोनों ही एक-दूसरे को विभिन्न स्थानों पर चूम रहे थे। पूनम नीचे आ चुकी थी।

उसके मुख से कामुकी सत्कार निकले आरंभ हो गए। उसकी सांसें लम्बा की सांसों के साथ ही तीव्र होती जा रही थीं।

अंत में वह क्षण भी आया जब आनन्द के चरमोत्कर्ष पर पहुंचती पूनम के दांत लाम्बा के कंधे में गढ़ गए।

वह लम्बा से कसकर लिपट गई।

दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में देर तक जकड़े रहे।

और!

उसी स्थिति मे उन्हें नीद ने आ दबोचा।

कोठारी ने रंजीत लाम्बा की तलाश में कुछ आदमियों को भेजने के साथ-साथ स्वयं भी भाग-दौ ड़ की थी और उस समय वह थका-हारा निराशा में डूबा विला में दाखिल हुआ ही था कि एक गार्ड ने उसे सूचित किया की विदेशमुख साहब उसे अपने कमरे में बुला रहे हैं।

वह सीधा माणिकी देशमुख के कमरे में जा पहुंचा।

कमरे में कदम रखते ही वह चैका ।

वहां देशमुख अकेला नहीं था।

जोजफ था और जोजफ के अतिरिक्त था जार्ज पीटर। अ ण्ड रवर्ल्ड का एक अहम मोहरा।

'कुछ पता चला ?' उसे देखते ही मुणिकी देशमुख ने पूछा।

' अभी नहीं। ' उसने अपेक्षाकृत धीमे स्वर में कहा।

'पी टर तेरी मदद करेगा रंजीत लम्बा की तलाश करने में।'

'क्यों बॉस...क्या मैं लाम्बा को तलाश कर नहीं सकूँगा?'

'अभी तक तो नहीं ही कर सका है न और पीटर ने लम्बा से अपना कुछ उधार

भी चुकता करना है। ' देशमुख जार्ज पीटर की ओर देखता हुवा विषैले अंदाज में मुस्कराया।

'ले किन बॉस...।'

.

.

.

.

.

.

'नो इफ एण्ड नो बट . ..जो मैं कह रहा हू वह तू कर। लम्बा की तलाश में पीटर की तू हर तरह की मदद करेगा। पीटर भी तुझे मदद करेगा और उसकी यहमदद फ्री ऑफ कॉस्ट होगी। अगर इसे लम्बा का मर्डर भी करना पड़ा तो उसका भी कोई चार्ज नहीं।'

कोठारी खामोश रहा। लेकिन उसकी खामोशी के बावजूद इस बात को भली-भांति समझा जा सकता था कि वह अपने बॉस के उस फैसले से नाखुश था।

जार्ज पीटर का दखल उसकी समझ में नहीं आ रह था।

'तू समझ रहा है न मैं क्या कह रहा हूं?' माणिकी देशमुख उसके चेहरे को पढने की चेष्टा करता हुआ बोला।

'जी।'

'तो अब जा...जाकर पीटर की मदद कर।'

पीटर उठ खड़ा हुआ।

कोठारी माणिकी देशमुख से कुछ कहना चाहता था किन्तु फिर उसने इरादा बदल दिया।

पीटर उसके चलने के इंतजार में उससे दो कदम आगे खड़ा उसे निहार रहा था।

मजबूरन उसे पीटर के साथ चल देना पड़ा।

वह पीटर को लेकर बाहरले हॉल में जा पहुंचा।

हॉल में उन दोनों के अतिरिक्त कोई नहीं था।

पीटर ने कोई भी औपचारिकी ता निभाए बिना सिगरेट सुलगाई और फिर आराम के साथ उसके कश लगाने लगा।

'तुमने लाम्बा को कहां-कहां तलाश किया ?' कुछ देर बाद उसने धुवां उगलते हुए अपने और कोठारी के बीच की खामोशी को तोड़ा।

'उसके जितने भी ठिकानों की जानकारी और उसने जोजफ के नाम की जानकारी तुमसे हासिल करने के बाद तुम्हें गोली नहीं मारी। वरना तो वह अपने किसी भी दुश मन को कभी क्षमा नहीं करता। वह ए ग्जीक्यूशनर है। जल्लाद! और जल्लाद बेरहम होता है।'

'मुझे गोली मारने के लिए शेर का कलेजा चाहिए।'

'वह शेर ही है।'

'शेर नहीं-गीदड़ है , इसीलिए तो दुम-दबाए भागा फिर रहा है। शेर होता तो कब का सीना ताने मेरे सामने आ चुका होता।'

शेर जब अपना शिकार करता है तो उसे पहले तो छिपना ही पड़ता है घात लगाने के लिए। अगरु वह सामने आ गया तो फिर शिकार ने तो भाग ही जाना होगा न। ' कोठारी ने अपलकी उसकी

आंखों में झांकते हुए बेझिझकी कहा।

वह पीटर के बारे में जानता था-लेकिन उसका अपना दबदबा भी अण्डर वर्ल्ड में कुछ कम नहीं था। वह खुद एक बहुत बड़ा दादा हुआ करता

था।'

वह पीटर जैसे लोगों से खौफ खाने वालों में नहीं था। पीटर कोठारी की शक्ति से वाकिफ था।

__'बहुत तारीफ कर रहे हो उसकी?' पीटर उसके चेहरे को पड़ने की कोशिश करता हुआ बोला।
 
'तारीफ नहीं...उसकी वाकफियत करा रहा

'अच्छा अब यह बताओ , व हमिल कहां सकता है ?'

'उसके सभी ठिकाने जो मैं जानता था , उन्हें देख चुका।'

' वहां वह नहीं मिला ?'

'नहीं।'

'कहीं वह शहर छोड़कर भाग तो नहीं गया ?'

' किसी भी संभावना से कैसे इंकार किया जा सकता है।'

'तुम्हारे बॉस ने तुम्हें मुझे सहयोग करने को कहा है।'

' हां।'

' मैं लाम्बा को तलाश करना चाहता हूं।'

'ठीकी है। उसके लिए तुम जो बताओ मैं वो करने को तैयार हूं।'

-

' मैं यह जानता हूं कि लम्बा का देशमुख साहब की बेटी पूनम से कुछ था और उसी कुछ के नतीजतन यहां इतना सारा झमेला हुआ। लड़की लाम्बा के साथ चली गई।'

कोठारी ने उसे घूरकर देखा , बोला कुछ नहीं।

'वह किसी कार में आया था। उसने विला के बाहरले फाटकी को कार की ठोकर से उड़ा डाला था। उड़ा डाला था न ?'

'हां।'

' इसका मतलब वह कार...| ' पीटर एकाएक ही खामोश होकर विचारों में डू बता चला गया।

'वह कार क्या ?'

' वह कार जरूर टूटी-फूटी होगी।' ' वह उसकी पर्सनल कार थी ?' 'ऐसे लोगों का कुछ भी पर्सनल नहीं होता। '

'यानी पर्सनल नहीं थी।'

'नहीं।'

' अच्छा कौन-सी कार थी' उसका नम्बर कलर आदि ?'

कोठारी ने उसे सब बता दिया।

वह एक-एक बात नोट की र ता चला गया ।

'उस कार से तुम क्या मालूम कर लोगे?' को ठारी ने विचारपूर्ण स्वर में कहा।

'शायद कर लूं।'

'कैसे?'

' उसकी कार में इतनी सारी विशेषताएं हैं। तलाश आसान नहीं , फिर भी तलाश हो तो सकती

है।।

' कैसे?'

'जाहिर है , वह टूटी-फूटी कार का इस्तेमाल तो कर नहीं रहा होगा। जरूर कहीं न कहीं उसकी मरम्मत हो रही होंगी। हमें तो महज गिनती के गैराज झांकने , होंगे। छोटे-मोटे गैराज नही। बड़े गैराज देखने होंगे और बड़े गैराज को देखना कोई बड़ा काम नहीं।'

कोठारी को लगा कि पीटर- सही कह रहा

था।

जहां तक पीटर का दिमाग पहुंचा था वहां वह स्वयं नहीं पहुंच सका था।

'क्यों...कैसा लगा मेरा आइडिया ?'

.

.

.



'आइडिया अच्छा है , लेकिन यह आ इडिया तभी लागू हो सकेगा जबकि लाम्बा इसी शहर में होगा , शहर छोड़कर कहीं चला नहीं गया होगा। '

_ 'हां.. .ये चांस तो लेना ही पड़ेगा। ' कहता हुआपीटर टेलीफोन की ओर बढ़ गया।

उसने चार जगह फोन किया और चारों जगह कार का हुलिया बयान करते हुए खामोशी के साथ उसकी तलाश का काम करने का आदेश दे डाला। -

फिर कोठारी से बोला-'चलो...अब हम भी कुछ करते हैं।'

'चलो।' कुछ ठहरकर उसने स्वीकृति दे दी।

पीटर तो तैयार था ही। कोठारी को निकलने में थोड़ा-सा वक्त लगा। उस वक् फे में वह पीटर को छोड़कर एक बार तन्हा माणिकी देशमुख से मिलने गया।

'बॉस..! ' वह आदर प्रदर्शित करता हुआ बोला-'पीटर चाहता है मैं उसके साथ जाऊं।'

' लाम्बा की तलाश में न?'

। हां।'

'मुझे भी लगता है।'

___ 'फिर देर मत कर...फौरन उसके साथ जा और सुन... उसके साथ रहने के साथ-साथ तुझे अपने दिमाग का

इस्तेमाल भी करना होगा। क्या समझा ?'

'जी...समझ गया।'

'क्या समझ गया ?'

'जैसे - ही किसी तरह की कोई खबर लगे, मैं तुरन्त आपको सूचित कर दू।'

' हां।'

'मैं जाऊं?'

'तू अभी तक यहीं खड़ा है। अरे , मुझे

अपनी बेटी की खातिर एक-एक पल भारी हो रहा है। जा मेरे बाप...जा और जल्द से जल्दी उस हरामखोर की कोई खबर भेज।

जा! ' -

कोठारी तुरंत ही वहां से निकलकर पीटर के साथ चला गया ।

सुबह के चार बजे लाम्बा की आंख खुल गई।

वह उठना नहीं चाहता था-लेकिन मजबूरन उसे उठना पड़ा। सर्दी ने उसे उठा दिया था। उसने देखा , साइड मे पूनम चादर को अस्त-व्यक्त स्थिति में लपेटे पड़ी थी।

.

-

-

.

चादर उस की कम र से लिपटकर टांगों में जा उलझी थी।

उसके बदन पर चादर के अतिरिक्त कोई कपड़ा नहीं था। उसकी कमर का खम और गोल पुष्ट नितम्बों का गोरा उभार स्पष्ट चमकी रहा था।

दायीं टांग पूरी तरह न ग न थी। केले के तने-सी चिकनी और चमकदार। '

उस स्थिति मैं वह बेहद सैक्सी नजर आ रही थी। लम्बा उसका वह कामोत्तेजकी रूप देख सब-कुछ भूल गया। न उसे सर्दी याद रह गई, न नींद। वह अपलकी उसके यौवन का रसपान करने लगा।

कितनी ही देर तक वह उसके पासब ठा उसे जगाने न जगाने के बारे में विचार करता रहा।

अन्त में।

वह अपने पर संयम न रख सका ।

उसका हाथ पूनम के नग्न नितम्ब से फिसलता हुआ उसकी कमर पर जा पहुंचा। '

तत्पश्चात् वह उस पर झुकता चला गया और उसके अधर पूनम के रक्त म अधरों से जा चिपके । वह उससे सटता चला गया।

गहरी नींद में डूबी पूनम कस मसा ई।

और नींद में ही वह लाम्बा की सशक्त बांहों में सिमट गई- क्यों सता रहे हो इतना। मै थककर चूर हो

चुकी है।'

प्यार करने में बार-बार थकने का ही तो मजा है। ' उसकी चिकनी पीठ पर हाथ फेरता हुआ लाम्बा उत्तेजकी स्वर में बड़बड़ाया।

पूनम ने पूरी आँखें खोल दीं।

प्यार भरे अंदाज से उसने लम्बा की आँखें में देखा। देखती ही रही वह।

फिर उसने एक झटके के साथ लाम्बा का चेहरा अपने वक्षों में भींच लिया।'

उसके बाद!

सांसों का शोर उमड़कर शांत हो गया और वे दोनों एक-दूसरे की बांहों में गुथकर बेहोशी की नींद सो गए।

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खबर शीघ्र ही पीटर तक पहुंच गई।

सलीम के गैराज में वह कार मौजूद है जिसका हुलिया बताया गया था।

पीटर कोठारी के साथ तेजी से सलीम के गैराज जा पहुंचा।

सलीम एक परिश्रमी युवकी था।

उसे पीटर ने उसके गैराज में ही जा घेरा।

पीटर के साथ कोठारी के अतिरिक्त दो आदमी और थे। चार आदमियों के घेरे में घिरकर सलीम एकाएक ही घबरा-सा गया।

'क्या बात है साहब ?' ग्रीस से काले हो रहे हाथों को कपड़े से साफ करते हुए उसने तनिकी बौखलाए हुए स्वर में पूछा।

' इस कार का मालिकी कौन है ?' पीटर ने क्षतिग्रस्त कार की ओर संकेत करते हुए पूछा।

' मालूम नहीं साहब। '

'ज्यादा चालाकी बनने की कोशिश मत कर ! ' एकाएक ही पीटर के तेवर बदल गए। वह दांत पीसता हुआ क्रोधित स्वर में गुर्राया।

'नहीं साहब , मैं सच कह रहा हूं।'

'तू अपने ग्राहकों को जा ने बिना ही उनकी गाड़ी ले लेता है ?'

'ज्या द तर ग्राहकी मेरी पहचान के ही हैं, लेकिन कुछ ग्राहकी तो नए होते ही हैं । उन्हीं नए ग्राहकों में इस गाड़ी का मालिकी भी था।'
 
' कैसा था वह ? उसका हुलिया बता?'

कोठारी ने बीच में दखल देते हुए पूछा।

सलीम ने हुलिया बताया।

हुलिया रंजीत लाम्बा का ही था।

वह संतुष्ट हुआ। ' उसने तुझे क्या बोला?'

'वह जल्दी से जल्दी अपनी कार की मरम्मत कराना चाहता था। लेकिन मैंने उसे बोला कि जितना काम उसकी गाड़ी में है उतना काम इतनी जल्दी नहीं हो सकता। गाड़ी में काम बहुत था। उसे मैं इतनी जल्दी पूरा नहीं कर सकता था।'

' तूने गाड़ी कब बनाकर देने को कहा है ? जार्ज पीटर पुन: बीच में बोल उठा।

'कोई टाइम नहीं दिया। मैंने उसे बोला था कि चक्की र लगाता रहे। गाड़ी में बीच-बीच में कोई बड़ी जरूरत भी पड़ सकती है । इसलिए उस जरूरत को पूरा कर ने के लिए उसे पैसा लगाना होगा।'

'वह कितनी बार आया अब तक ?'

'सिर्फ एक बार।'

'त ब तक कुछ बना था ?' 'काम ही शुरू नहीं हुआ था तब । '

' फिर ?'

' फिर वहमुझे एक हजार रुपया देकर चला

गया।।

दोबारा कब आने को कहा था ?'

'दो एक दिन बाद।'

' आर्ह सी।'

__' तूने उसे पूछा नहीं कहां रहता है वह ?' कोठारी ने आतुर स्वर में उससे पूछा।

'नहीं।'

'तूने पूछना तो चाहिए था न ?'

सलीम खामोश रहा। उसे उस पुलिस प्रकार कि तहकीकात पर गुस्सा तो आ रहा था, लेकिन क्या करता वह। मजबूरन उसे सवालों के जवाब देने पड़ रहे थे। पीटर ने कोठारी को पीछे आने का संकेत किया। कोठारी उसके पीछे-पीछे आ गया।

'क्या लगता है ?' अपनी कार के निकट पहुंचकर उसने कोठारी से धीमे स्वर में पूछा।

'किसबारे में?'

' इ स छोकरे के बारे मैं ?'

'लगता तो सच्चा है।'

'मक्कार भी हो सकता है न ?'

'मक्कारी होगी तो हाई क्लास की होगी। बड़ा एक्टर साबित होगा वो।'

'हां...।'

' वैसे मेरा तजुर्बा कहता है कि वह सच कह रहा है।'

'हो सकता है, कह रहा हो। लेकिन सवाल इस बात का है अब किया क्या जाए ?'

'इंतजार।'

' यानी यहां अपने आदमी छोड़ने पड़ेंगे?'

'गैराज में नहीं।'

' फिर ?'

'गैराज का ज्यादातर हिस्सा खुला हुआ है। वह सामने उस कोने में जो चाय की छोटी-सी दुकान है, वहां से आसानी से नजर रखी जा सकती है। '

'ठीकी है।'

उसके बाद पीटर ने अपने दो आदमी वहां छोड़ दिए।

और !

कोठारी चला गया माणिकी देशमुख को फोन करने।

उसने टेलीफोन बूथ से फोन किया।

'कौन है ?' दूसरी- ओर से पूछा गया।

'कोठारी बोल रहा हूं बॉस। ' व ह देशमुख की आवाज पहचानता हुआ बोला।

'हां....बोल ?'

'गाड़ी मिल गई।'

' किसकी? लाम्बा की?'

'यसबॉस।'

' और लाम्बा ?'

'वो भी मिल जाएगा । आप चार आदमी भेज दें। यहां पीटर ने अपने आदमी छोड़ रखे हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि उस से पहले लाम्बा का पता हमें लगे।'

___ 'तू जगह बता , मैं आदमी भेजता हूं।'

कोठारी ने तुरन्त सलीम के गैराज का पता बता दिया। उसके बाद वह वहां तब तक चक्कर लगाता रहा जब तक कि माणिकी देशमुख द्वारा भेजे हुए आदमी वहां पहुंच नहीं गए।

उन आदमियों को निर्देश देकर वह वहां से लौट आया।

अपने हिसाब से उसने चतुराई से काम लिया था-लेकिन वहां स्थिति डाल -डाल और पात-पात वाली थी।

कोठारी-ने जो हिसाब लगाया था , जार्ज पीटर उससे भी दो कदम आगे था।

उसकी गणित के अनुसार जिस क्षेत्र में सलीम का गैराज था , रंजीत लाम्बा का ठिकाना भी उसके हिसाब से आसपास ही होना चाहिए।

उसने बिस आदमी वहां बुलवाए।

सभी को रंजीत लाम्बा का हुलिया अच्छी तरह समझाने के पश्चात् उसने उन्हें उस क्षेत्र में फैला दिया। उन बीस आदमियों में से तीन आदमी ऐसे भी थे जो लाम्बा से वाकिफ थे।'

उन्हें उसका हुलिया जानकर पहचानने की जरूरत नहीं थी। वे सीधे-सीधे ही लम्बा को पहचान सकते थे।

पीटर अपना हिसाब बराबर करने को आतुर

था।

उसका एक आदमी उसी क्षेत्र में रहता था। उसी के पलैट में उसने डेरा जमा लिया। वह वहां की खबर दूर कहीं अपने किसी ठिकाने पर बैठकर नहीं सुनना चाहता था।

उसे वहीं की वहीं खबर सुननी थी।

जिस ढंग से उसने अपने आदमियों का जाल वहां फैलाया था, उस हिसाब से कामयाबी उसे मिल सकती थी।

םם

लम्बा की आंख खुली तब जब चाय की खुशबू के साथ उसे कोम ल स्पर्श के साथ जगाया गया।

उसने देखा।

लजाई- शरमाई पूनम उसके लिए चाय लेकर आई थी।

नहाकर उसने अपने बाल सुखा लिए थे और कपड़ों की जगह चादर लपेट रखी थी।

'चाय पी लीजिए । ' वह दृष्टि झुकाए हुए ही बोली।

हाएं ! चाय पी लीजिए ... लाइए। ' लम्बा ने कुछ ऐसे अंदाज में कहा कि उसे बरबस ही हंसी आ गई। वहमुंह छिपाकर हंसी तो बालों की लम्बी लटों से उसका आधा चेहरा छिप गया।

खुले हुए लम्बे बालों में वह कुछ अधिकी ही सुन्दर प्रतीत हो रही थी।

'बड़े वो हो।'

'किसलिए?'

' मेरे लिए।

पूनम ने गहरी निगाहों से उसकी ओर देखा।

उसने चाय की प्याली नीचे रखकर पूनम को अपने ऊपर खींच लिया।

'नहीं... नहीं ... अब कोई शरारत नहीं चलेगी।'

'शरारत नहीं कर रहा। यहां बैठो , मेरे पास और यह बताओ कि मुझसे प्यार करती हो ?'

उसने अपलकी लाम्बा की आंखों में दे खना आरंभ कर दिया।

दोनों कितनी ही देर तक एक- दूसरे की आंखों में खोए रहे।

दिल की धड़कनें निगाहों के उस टकराव से स्वत: ही बढ़ती चली गई।

'तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया ?' लाम्बा पूनम को अपनी बांहों में भर ता हुआ बोला।

'कौन-सा सवाल ?' वह उसके अधरों से अपने अधर सटाती हुई फुसफुसाहट भरे स्वर में बोली।

' प्यार करती हो या नहीं? '

' मुझसे क्यों पूछ रहे हो ?'

'तुमसे ही तो पूछना है।'

_ ' न पूछो ... मुझसे न पूछो।'

'फिर किससे पूर्छ ?' लाम्बा उसके अधरों से अपने अधर तनिकी दूर हटाता हुआ बोला।
 
' अपने दिल से। ' उसने लाम्बा की आंखों में अपलकी झांकते हुए कहा।

' मेरा दिल ? '

' हां...तुम्हारा दिल मेरे प्यार के बारे में सच-सच बता देगा। उससे पूछकर देखो।'

लाम्बा मुस्कराया।

पूनम ने उसके अधरों पर चुम्बन अंकित कर

दिया।

लम्बा ने उसे मदहोशी भरे अंदाज में देखते हुए अपने और अधिकी नजदीकी खींच लिया और ऐसा करते हुए ही उसके हाथ पूनम के संगमरमरी जिस्म से लिपटी चादर के भीतर खिसकी गए।

पूनम ने बनाबटी क्रोध द र्शाते हुए उसकी ओर देखा।

वहमुस्कराया। ' बहुत शैतान हो गए हो।'

' कहां शैतान हो गया हूं। कुछ भी तो नहीं किया मैंने।' लम्बा ने भोलेपन से कहा।

_' सारी रात सताते रहे और कह रहे हो कुछ नहीं किया।

'बीती रात को याद करने से क्या फायदा। '

'क्यों...क्यों न याद करू बीती रात ?'

.

.

.

'जोरात गुजर गई उसे भूल ही जाओ। ब र्तमान को याद रखा करो। रात गई...बात गई।'

'सुबह हो चुकी है।'

'हां।'

'सूरज सिर पर चढ़ आया है।'

'हां। चढ़ आया है।'

'सो ते ही रहोगे ? उठोगे नहीं ?'

' उठता हूं बाबा उठता हूं।' कहने के साथ ही लाम्बा ने पून म को छोड़ दिया। फिर वह बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। अंगड़ाई लेने के बाद उसने चाय पी डाली। तत्पश्चात्नि त्यप्रति के कामों में व्यस्त हो गया

इसी बीच पूनम ने नाश्ता तैयार कर लिया।

नाश्ते के बाद उस ने तैयार होना शुरू कर

दिया।

'क्यों.. .कहीं जा रहे हो क्या ?' पूनम ने उसे तैयार-होते देख पूछा।

'हां...जा रहा हूं।'

'कहां?'

' नाश्ते के बाद भी तो कुछ होता है न ? हो ता है न ?'

'खाना?'

'राइट खाना। '

'तो खाने के लिए बाहर जाने कीक्या जरूरत है?'

'क्यों जरूरत क्यों नहीं है बाहर जाने की ?'

'क्या जरूरत है। जैसे नाश्ता बनाया वैसे ही खाना बना दूंगी।'

' नहीं बना सकोगी।'

'क्यों?'

' क्योंकि खाना बनाने की लिए कुछ है ही नहीं। इसलिए सामान लेने जाना पड़ेगा।'

' ब्रैड रखी हैं। अण्डे हैं। काम चल जाएगा।'

'नहीं। ब्रैड नाश्ते में ही बासी लग रही थी , खाने में तो खट्टी क्या ने लगेगी।'

'लेकिन...।'

___ 'तुम फिक्र बिल्कुल न करो । मैं जल्दी ही सारा सामान लेकर लौट आ ऊंगा।'

'लौट तो आओगे , मग र न जाने क्यों मेरा दिल डर रहा हैं।'

'पागल हो गई हो।'

'हां हो गई हु । ' पूनम रूठने का अभिनय करती हुई बोली- ' तुम्हारे अलावा मेरा कोई नहीं, अगर तुम्हें कुछ हो गया तो ... म ...मैं यूं ही मर जाऊंगी।'

कहते-कहते उसके नेत्र डबडबा गए और गला रुध गया।

वह एकाएक ही भाबुकी हो उठी थी।

लाम्बा ने प्यार से उसे गले लगा लिया।

उसकी भी आंसू आंखों को चूम-चुमकर उसके आंसू पोंछ डाले।

'नहीं रोते। नहीं पून म नहीं। जब तक मैं जिन्दा हूं, अपने-आपको अकेला कभी नहीं समझना। मैं हूं न। सब ठीकी हो जाएगा।'

'मुझे डर लगता है अपने डैडी के आदमियों

से।'

' उनकी चिन्ता मत करो।'

'अकेले बाहर जाओगे, कहीं उन सबने मिलकर तुम्हें घेर लिया तो?'

'मुझे घेरना इतना आसान नहीं और फिर किसे मालूम है कि मैं यहां रह रहा हूं।'

'वो लोग तुम्हारी तलाश में लगे होंगे। '

'तुम्हारे डैडी पूरे शहर में अपने आदमियों का जाल नहीं फैला सकते।'

'कुछ भी हो , मेरे डैडी खामोश नहीं बैठ सकते। उनके आदमी चारों तरफ हम दोनों की तलाश में घूम रहे होंगे।'

'मानता हूं। घूम रहे होंगे, लेकिन मुझे विश्वास है वो लोग यहां तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे।

मेरा दिल तो डर रहा है न।'

' अपने दिल को संभालो।'

पूनम ने उसे तिरछी नजरों से देखा। उसके चेहरे पर भय की हल्की-सी छाया को स्पष्ट देखा जा सकता था। लम्बा ने उसके दोनों गालों पर चुम्बन अंकित करने के बाद प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसे समझाया और फिर बाहर निकल आया।

सबसे पहले रेडीमेड वस्त्रों की एक दुकान के शो-रूम में झूलती एक ड्रेस उसे पूनम के लिए बहुत पसंद आई। पहले उसने उसी दुकान में दाखिल होना चाहा किन्तु अंतिम समय पर उसने इरादा बदल दिया।

वह पहले नम्बर पर कपड़े खरीदकर उन्हें लटकाए हुए पूरा बाजार करना नहीं चाहता था। कार के बिना उसे परेशानी हो रही थी , इसलिए उसे कार भी देखनी थी। लेकिन खाने के सामान को उसने प्राथमिकता देते हुए अव्वल नम्बर पर वही काम शुरू किया।

खाने के सामान को खरीदते-खरीदते उसने फल , मिठाई, मक्खन के अलावा अण्डे भी खरीद डाले।

अण्डे खरीदकर वह फंस गया।

अण्डे फूट न जाएं, इसके लिए वह सामान लेकर रिकुस पर बैठा और जा पहुंचा सीधा अपने ठिकाने पर।

सामान उतारकर अन्दर पहुंचने पर उसने पूनम को अपनी प्रतीक्षा करते पाया।

__'आ गए। ' वह प्रफुल्लित होती हुई उसकी ओर बढ़ी।

'आ तो गया मगर मुझे फौरन ही लौटकर बापस जाना है।'

'क्यों?'

क्योंकि बहुत जरूरी काम बाकी रह गया है।

'अब क्या बाकी रह गया ?'

' रह गया। मैं अभी आता हूं। ' इतना कहकर लाम्बा उसे बिना कोई अवसर दिए बाहर निकल गया

वह वहां से सीधा कपड़ों की दुकान में जा घुसा और फिर उसने कितनी ही अच्छी-अच्छी ड्रेसि ज पूनम के लिए खरीद डालीं।

mmmmmmmmmmmmmmmmm00

पूनम को वह दिल की गहराइयों से प्यार करने लगा था।

उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि कार ठीकी होते ही वह पूनम को लेकर कहीं द र निकल जाएगा। किसी ऐसी अनजानी जगह जहां माणिकी देशमुख के हाथ

न आ सके।

वह कार देखने सलीम के गैरज पहुंचा।

सलीम ने उसे बता दिया कि अभी कार ठीकी होने में दो-तीन दिन और लग जाने थे।

नतीजतन वह वापस लौट चला।
 
लौटते हुए उसने पूनम के लिए एक खूबसूरत-सी रिंग खरीदी। डायमंड रिंग। कपड़ों के पैकेट ढेर सारे हो रहे थे । रिक्शे पर बैठने के बाद उसने वह पैकेट तलाश करके सबसे ऊपर रख लिया जिसमें शादी का जोड़ा था।

वह पूनम से शादी करने का निश्चय कर चुका था। अपने निश्चय की बावत अभी तक उसने पूनम को कुछ बताया नहीं था , लेकिन आज वह अपने दिल की बात उसे बता देना चाहता था।

उस सस्पैंस को खोलने के लिए ही उसने शादी के जोड़े वाला पैकेट सबसे ऊपर रख लिया।

उसे यकीन था कि उस पैकेट को खोलते ही पूनम का चेहरा गुलाब की तरह खिल उठेगा और उसके बाद वह आजयुक्त मुस्कान के साथ उसकी ओर देखे गी। फिर शरमाकर पलकें झुका लेगी।

वह विचारों में खोया हुआ रिकुश पर बैठा चला जा रहा था।

चौंका उस समय जब उसका ठिकाना पीछे छूटने लगा।

उसने तुरन्त रिकुश रुकवाया। किराया अदा किया और सामान उठाकर खुशी से उछलता हुआ

मकान में दाखिल हो गया।

मकान के अन्दर वाले दरवाजे से दाखिल होते ही वह चौंका।

अन्दर वाला दरवाजा तो पूनम ने बंद करके रखना चाहिए था।

'पूनम! ' उसने तेजी से आगे बढ़ते हुए पुकारा।

प्रत्युत्तर में खामोशी छायी रही। 'पूनम! ' वह उत्तेजित स्वर में चिल्लाया।

दूसरे कमरे कि ओर बढ़ते उसके कदम एकाएक ही ठिठकी गए।

फर्श पर जूतों के निशान खून से बने थे। कितने ही निशान थे।

उस सन्नाटे में उसे अपना दिल अपने दिमाग में धड़कता महसूस होने लगा। कितनी ही देर तक वह एक जगह खड़ा फटी-फटी आंखों से उस दृश्य को देखता रहा। फिर हिम्मत जुटाकर उसने अन्दर वाले कमरे में झांका। कमरे का तमाम सामान उल्टा-पुल्टा पड़ा था।

खून के छींटे यहां-वहां नजर आ रहे थे।

और!

बीचों-बीच पुनम अपने ही खून के तालाब में पडि थी। उसके जिस्म पर लिपटी चादर खून में डूबकर उसके निर्वसन जिस्म से चिपकी गई थी।

उसका वक्ष , उसका सपाट पेट और टांगें सभी कुछ नग्न था।

उसके पेट और कंधे पर घाव के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे। घाव कुछ और भी थे लेकिन वो छोटे

थे।

स मान लाम्बा के हाथ से छूटकर जा गिरा। ऊपरला पैकेट गिरते ही खुल गया।

शादी का जोड़ा पूनम के खून में डूबता चला गया। लाम्बा के चेहरे पर विचित्र से भाव आ-जा रहे थे। उसने बगली होलस्टर से रिवाल्वर निकाला, सेपटीकैच हटाया और फिर रिवाल्वर की नाल अपनी कनपटी से लगा ली।

वह बुरी तरह टूट जाने के बाद अचानकी ही आत्महत्या के फैसले पर जा पहुंचा था।

ट्रेगर पर उंगली रखते हुए उसने नेत्र बंद किए।

तभी!

हल्की सिसकी ने उसे चौंका दिया ।

उसने जल्दी से पूनम की ओर देखा , फिर वह लपककर उसके नजदीकी पहुंचा। उसने उसके वक्ष पर हाथ रखकर देखा।

दिल धडकी रहा था।

सास चल रही थी।

यानी अभी-वह जिन्दा थी।

अगले ही पल उसने पूनम को बैडशीट में लपेटकर उठाया और लम्बे-लम्बे डग भरता बाहर की

ओर निकल पड़ा।

टैक्सी भाग्यवश उसे तुरन्त ही मिल गई।

उसके बाद बीच रास्ते वह पूनम को होश में लाने का प्रयास करने लगा।

'पूनम! पूनम! पूनम आँखें खोलो पूनम ...आंखेंखोले!'

कुछ देर बाद पूनम ने आँखें खोलि ।

' किसने किया पूनम ? कौन है वह जिसने यह सब किया ?' लाम्बारौद्र स्वर में बोला।

पूनम इस प्रकार, उसके चेहरे की ओर देखती रही मानो शून्य में ताकी रही हों।

__'बोलो पूनम बोलो! मुझे उसका नाम बताओ' प... प... पीटर...।'

'पीटर! ' एकाएक ही लम्बा के नेत्र क्रोध से दहकी उठे।

पूनम पुन: मूर्छि त हो गई।

'ड्राइवर! और तेज चलो! ' उसे मूर् छित होता देख वह चिल्लाकर बोला।

स्थिति की नजाकत को समझते हुए टैक्सी ड्राइवर ने रफ्तार बदा दी।

टैक्सी कार हवा से बातें करने लगी।

ड्राइवर ने उसे तब ही रोका जब हॉस्पिटल का एमरजेंसी वार्ड सामने आ गया।

लम्बा खून से लथपथ पूनम को दोनों बाहों में उठाकर अंदर दौड़ा चला गया।

00

माणिकी देशमुख के चार आदमी सलीम के गैराज के आसफस फैले हुए थे। जैसे ही लाम्बा वहां पहुंचा चारों में से एक तुरन्त ही कोठारी को फोन करने चला गया।

शेष तीन में से दो लम्बा के पीछे चल पड़े।

एक वहीं रुका रहा।
 
कुछ देर बाद कोठारी की कार तूफानी रफ्तार से दौडती हुई वहां आकर रुकी। कोठारी बाहर निकला।

बचा हुआ आदमी अभी उसे रिपोर्ट देकर हटा ही था कि पीछा करने वाले दोनों आदमी वहां आपहुंचे।

'पता चला क्या ?' उन्हें देखते ही उसने आतुर स्वर में पूछा।

' हां...।' एक आदमी ने उत्तर दिया ।

'कहां है लम्बा का ठिकाना ?'

' मेरे साथ चलो।'

कोठारी ने तुरन्त उन्हें कार में बिठाया और वहां से चल पड़ा।

उसकी कार ज्यों ही बाहरले क्षेत्र में बनी बिल्डिंग की ओर बढ़ी और एक आदमी ने उसब शिल्डिंग की ओर उंगली उठाई-त्यों ही लम्बा खून में लथपथ पूनम को लिए बदहवास स्थिति में बिल्डिंग से बाहर निकलता दिखाई दिया।

फिर टैक्सी कार में बैठकर वह निकल चला।

'उसे रोकें बॉस ?' एक आदमी ने कोठारी से पूछा।

'नही। रोको नहीं सिर्फ पीछा करो।' अपने-आप पर संयम रखते हए उसने आदेश दिया। खून में डूबी पूनम ने उसका दिल दहला दिया था।

हॉस्पि टल तक उसने लम्बा का पीछा किया।

फिर वह छिपता-छिपाता अन्दर दाखिल हुआ। एक डाक्टर से कुछ जानकारी हासिल की। उसके बाद बाहर आकर एक टेलीफोन बूथ में जा

घुसा।

उसने कांपती उंगलियों से माणिकी देशमुख के नम्बर डायल किए।

'देशमुख साहब. . .मैं कोठारी बोल रहा हू।' लाइन मिलने पर वह धीमे स्वर में बोला।

'सुन रहा हूं. . . । बो ल...बोल कुश पता चला लम्बा का या अभी भी ख्याली घो ड़े ही दौड़ा रहा है। 'दूसरी ओर से माणिकी देशमुख का उखड़ा हुआ

स्वर उभरा।

'पता चला साहब , लेकिन...।'

'क्या लेकिन ?'
 
' बॉस , बात कुछ समझ में नहीं- आ रही है।

'पहेलियां मत बुझा। साफ-साफ बता , क्या मामला है ?'

उसने झिझकते हुए बतायया।

'कोठारी...!' सुनने के बाद दूसरी और से माणिकी देशमुख का तीखा स्वर उभरा- ' मेरी बेटी जिन्दा तो है न ?'

हां बॉस ।'

'फिर वह हरामजादा लम्बा अभी तक जिन्दा क्यों है ?'

'वह...बॉस...व ह पूनम बेबी को बचाने की कोशिश की र रहा है।'

'मा रने की कोशिश भी उसी ने की होगी।'

'मुझे नहीं लगता।'

'तुझे लगना चाहिए।'

' नहीं बॉस...वह ऐसा नहीं कर सकता। ' 'क्यों! क्यों नहीं कर सकता ?'

'इ... इसलिए कि वह बेबी को लव करता है।

'नहीं ! वह...वह किडनेपर है। उसने पूनम को किडनेप किया है । तूं उधर ही ठहर और जब तक मैं वहां पहुंच न जाऊं , उसे वहां से निकलेने मत देना।'

'लेकिन बॉस ...?'

शटअप ! ' चिल्लाती हुई आवाज के साथ ही दूसरी ओर से लाइन डिस्कनेक्ट हो गई।

फोन करने के बाद कोठारी उलझन में पड

गया।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि करे तो की रे क्या। वहमाणिकी देशमुख के क्रोध से वाकिफ था । उसे मालूम था कि उसका बॉस तूफान की तरह वहां आकर लाम्बा पर टूट पड़ेगा।

उसे विश्ववास था कि लाम्बा ने पूनम के साथ वह सब नहीं लिया।

__ अगर किया होता तो वह पूनम को बचाने की इस तरह की कोशिश न कर रहा होता।

'कोठारी साहब...! ' एकाएक ही उसके एक आदमी ने सामने आते हुए कहा- ' लाम्बा टैक्सी का र पकड़कर जल्दी में कहीं चला कि गया।'

कोठारी एकदम हरकत में आया।

उसे लम्बा की बावत देशमुख के सम्मुख जवाबदेह होना था।

अपने आदमियों को बाहर ही छोड़कर वह तेजी से एमरजेंसी वार्ड में दाखिल हो गया। जिस डाक्टर से उसने पहले पूछा था उसी से उसने पूनम की बावत दोबारा पूछा।

' अब कैसी है वह डाक्टर ?'

'खून बहुत बह गया है। उसके ग्रुप का खून लेने वह लडका गया है जो उसे यहां लेकर आया है। 'डाक्टर ने उसे बताया।'

खबर सुनकर उसकी जान में जान आई।

'पूनम की जान को तो कोई खतरा नहीं डाक्टर?'

.

हो भी सकता है। ''

'प्लीज डाक्टर , उसे कैसे भी बचा लो। खर्चे की फिक्र बिल्कुल नहीं करो। '

__'पूरी कोशिश की जा रही है। फिलहाल-सबसे ज्यादा जरूरी है। '

'खून...मैं अभी...।'

'वह लड़का गया है खून लेने। आप बाहर ही रहे। कभी भी कोई दूसरी जरूरत पड़ सकती है।'

'ओ० के०।'

चिंतित अवस् था में कोठारी बाह र निकल आया।

डाक्टर की बातों से वह समझ चुका था की पूनम खतरे में है और उसकी पहली जरूरत खून है! हालांकि खून लेने वह खुद ब्लड बैंकी जा सकता था, लेकिन डाक्टर के आदेशानुसार उसे बाहर ही रुकना पड़ रहा था।

उसके दोनों आदमी सड़की की तरफ चहलकदमी कर रहे थे।

थोड़ी देर बाद!

अचानक!

अचानकी ही गोलियों की आवाज ने उसे चौंका दिया।

वह उछलकर बाहर की ओर भागा।

फाटकी के बा हर दायीं ओर सड़की पर ही उसे लम्बा फायर करता नजर आया। उसने बाएं हाथ से खून की दो बोतलों को अपने सीने से लगा रखा था

और दाहिने हाथ में संभाल रखी पिस्तौल से करवटें बदलता हुआ आगे खड़ी कार पर फायरिंग करता चला जा रहा था।

इसी बीच !

एक और कार वहां आपहुंची।

उस कार से माणिकी देशमुख और जोजफ झांक रहे थे। उन दोनों ने लाम्बा को देखते ही गोलीबारी शुरू कर दी।

नहीं... नही ! ' कोठारी पागलों की तरह चिल्लाया। उसने दौड़कर बीच में आना चाहा। लेकिन जिस तरह उस क्षेत्र में गोलियां बरस रही थीं, उसे देखते हुए वह झिझकी कर रुकी गया । वह जानता था कि गोलियों की उसब रसात में अपने-आपको झोकना , मौत को दावत देने के अति रिक्त कुछ नहीं होगा।

वह इस सच्चाई से वाकिफ था कि पूनम की जान बचाने के लिए रंजीत लम्बा सिर पर कफन बांधकर उसके लिए खून लेने गया था।

और!

इस हकीकत से अनजान माणिकी देशमुख उस पर गोलियों की बौछार किए जा रहा था । एक प्रकार से बाप खुद अपनी बेटी की जान का दुश्मन बना हुआ था।

उसकी कार बाद में आती खुद , कोठारी ने अपनी आंखों देखी थी। वह यह नही समझ पा रहा था कि जिस कार से पहले ही गोलियां बरसाई जा रही थीं , उसमें कौन था।
 
इधर!

करवट बदलते लाम्बा को अपनी जान बचानी मुश्किल हो रही थी। वह तेजी से करवट बदलता डूबा सड़क के किनारे की ओट में पहुंच जाना चाहता था। तभी उसके हाथ से खून की एक बोतल निकल गई।

उसने झपटकर- बोतल पर हाथ डालना चाहा लेकिन इसी बीच एक गोली बोतल से टकराई और बोतल छार -छार होकर बिखर गई।

सड़की पर खून ही खून फैल गया।

लाम्बा ने क्रोध में उस दिशा में देखा जिस दिशा से चलने वाली गोली ने खून की बोतल जोड़ी थी। उसे कार की खिड़की से झांकता हुआ जोजफ नजर आया।

अगले ही पल उसके पिस्तौल का ट्रेगर दब गया। जोजफ अगर फुर्ती से हट न गया होता तो पिस्तौल की गोली उसका भेजा बिखरा देती।

लाम्बा उस समय बच निकलने की फिरंकी में

था।

लड़ने के लिए बाद में उसके पासब हुत वक्त था , तब तक वक्त नहीं था जब तक कि वह खून की बोतल डाक्टर को पहुंचा नहीं देता।

उस समय उसके पास वह खून की बोतल अपनी जान से भी ज्यादा कीमत रखती थी।

वह लुटकता हुआ सड़की के किनारे तक पहुंच गया था।

उसने अपनी पिस्तौल सामने की ओर खाली किया। वह तब तक फायरिंग करता रहा जब तक

कि पिस्तौल खाली नहीं हो गया।

पिस्तूल खाली होते ही उसने होल्सतर से रिवा ल्व र निकाल लिया और फिर बोतल संभालते हुए हॉस्पिटल की दिशा में दौड़ लगा दी।

वह सीधा रास्ते न जाकर फुलवारी के बीच कूद गया।

सीधा रास्ता खुली और साफ था।

उसे निशाना बनाया जा सकता था।

फुलवारी से होकर जब वह हॉस्पिटल के कम्पाउंड में दाखिल हुआ तो आते-जाते मरीजों में खलबली मच गई। एक हाथ में छून की बोतल , दूसरे हाथ में रिवाल्वर, बदहवास-सा आदमी।

वह जिस तरफ दौड़ता उस ओर काई-सी फूट जाती।

जैसे ही उसे पूनम को देखने वाला बाकुर मिला , उसे खून की बोतल सौंपकर वह वहां

से तुरन्त भाग निकला , क्योंकि पुलिस सायरन की कर्कश ध्वनि वहां गूंज उठी थी।

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'जानते हैं आप , वो खून की बो तल जो सड़की पर चकनाचूर हुई पड़ी है , किसके लिए. थी? जानते हैं ? ' कोठारी माणिकी देशमुख की ओर देखता हुआ तीखे स्वर में बोला- वो बोतल जो

आपकी गोली का शिकार बनी , आपकि बेटी के लिए लेकर आया था लाम्बा । वह सिर पर कफन बांधकर पूनम को बचाना चाह रहा था और आप...! आप अपनी बेटी की जिन्दगी की रहमें कांटे चुन रहे थे! कांटे! '

माणिकी देशमुख सकते की हालत में खड़ा अपने ले फ्टीनेंट की चुभती हुई बातों को सुन रहा था।

जसब हादुर इंसान ने अपनी जान की बाजी लगा दी पूनम को बचान में। वहमौत के दहाने से गुजरकर भी पूनम की जरूरत का खून डाक्टर को पहुंचाकर यहां से गया है।'

'खून. . .खून दिया जा रहा है उसे ?' देशमुख ने लड़खड़ाते हुए स्वर में पूछा।

__ 'हां...दिया जा रहा है खून मगर एक बोतल खून कम पड़ सकता है। उसबोतल का सूच जिसे आपने गोलियों से उड़ा डाला। '

_ 'खून...खून का बंदोबस्त कर कोठारी। फौरन!

'आदमी भेज दिया है लेकिन उसे आने में वक्त लग सकता है। अगर बोतल आने

में देर हो गई...अगर पूनम को कुछ हो गया तो उसके जिम्मेदार आप होंगे। सिर्फ आप

अपनी ओर तनी कोठारी की उंगली से देशमुख इस तरह घबरों गया जैसे कि उसके सीने की

ओर कोठारी , ने उंगली नहीं रिवा ल्व र तान रखी हो।

'कोठारी...मैंने समझा था कि लम्बा ...।'

___ ' हां....आप तो शुरू से ही उसे दुश्मन मानते चले आ रहे हैं । कैसे-समझा ऊं आपको कि पूनम के साथ जो कुछ भी घटा है वह किसी और की कार्यवाही है। अगर लम्बा ने ऐसा-वैसा कुछ करना होता तो वह पूनम को बचाने की जान तोड़ कोशिश कभी न करता।'

'ठीकी कह रहे हो।'

'यह अब समझ में आया। '

'ओह गॉड! यहमैंने सग कर डाला। '

'अब आपके पास पछताने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।'

'कोटारी -मुझे पर लानत-मलानत तू बाद में भेजता रहना-अभी. सिर्फ इतना मालूम करके आ कि पूनम कैसी है ?'

'वहां किसी को जाने नहीं दिया जा रहा है। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस है। अफसोस इसी बात का है कि पुलिस को भी उसी नौजवान यानी लम्बा की तलाश है , ' जो घायल पूनम को लेकर वहां आया

और उसके लिए खून का बंदोबस्त किया। '

'अगर यह काम लम्बा का नहीं है तो फिर किसका है ?'

' इस बात को सिर्फ लम्बा ही जानता है। '

'तो फिर लम्बा की तलाश कर। मैं उससे फौरन मिलना चाहता हूं।'

'आप तो मिलना चाहते हैं लेकिन वह तो आप से मिलना नहीं चाहता होगा।' उसे खत्म करने के लिए आपने कोई कसर तो उठा नहीं रखी न।'

'वह सब गलतफहमी में हुआ ।'

' लेकिन आपकी गलतफहमी से वह तो वाकिफ नहीं।'

कोठार ... कुछ कर-कुछ कर! मुझे इस तरह परेशान मत कर।'

'सब से पहले तो आपको-अपने तमाम ऐसे आदमी हटाने होंगे यहां से , जो हथियार बंद हैं। '

'क्यों?'

'क्योंकि अगर उनमें से एक भी पुलिस के हाथ लग गया तो पुलिस आसानी से उसका मुंह

खुलवा लेगी। वक्ती तौर पर आप हॉस्पिटल के बाहर होने वाली फायरिंग के लिए जिम्मेदार ठहरा दिए जाएंगे। हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ है , मगर आपको आतकवादियों का साथी ठहराकर जेल में पहुंचाया जा सकता है।'

'ठीकी है , तूही कर यह काम। मैं पूनम को देखने जाता हूं।'

'अभी नहीं। अभी मैं चक्कर लगा लूं उसके बाद।'

'जल्दी जा कोठारी..जल्दी! '

कोठरी चला गया।

उसने हॉस्पिटल का पूरा चक्कर लगाया और वहां मौजूद अपने सभी आदमियों को वहां से हटा दिया।

उन्हें आगाह भी कर दिया कि उन्हें पुलिस की रेंज से दूर रहना है।

फिर वह वापस देशमुख के निकट पहुंचा।

'हट गए ?' उसे देखते ही देशमुख ने पूछा।

'हां।'

'अब चलें हम?'

' हां ...चलिए।'

माशिकी देशमुख बौखलाया हुआ-सा कॉरीडोर में बढ़ने लगा।

कोठारी उसके पीछे चल पड़ा।

एमरजेंसी वार्ड के विशेष चैम्बर के बाहर पुलिस ही!

पुलिस थी। उसी चैम्बर में पूनम का इलाज चल रहा

था।

ज्योंही देशमुख ने बताया कि पूनम उसकी बेटी है , पुलिस इंस्पेक्टर ने तुरन्त उसे घेर लिया। सवालों की झड़ी लगा दी।

वह जवाब देता-देता परेशान हो गया।

इसी बीच एक नर्स ने सूचना दी कि खून और चाहिए।

'कोठारी।' देश मुख उत्तेजित स्वर में चिल्लाया-खून कोठारी...खून! '

'मैं अभी बंदोबस्त करता हूं। ' कह ता हुआ कोठारी वंहा से जाने लगा।

तभी!
 
इसी बीच एक नर्स ने सूचना दी कि खून और चाहिए।

'कोठारी।' देश मुख उत्तेजित स्वर में चिल्लाया-खून कोठारी...खून! '

'मैं अभी बंदोबस्त करता हूं। ' कह ता हुआ कोठारी वंहा से जाने लगा।

तभी!

एक कमजोर-सा भिखारी हाथ में खून की बोतल लिए वहां आपहुंचा-'बाबू साहब , यह खून की बोतल मुझे यहां पहुंचाने को दी है। किसी को खून चाहिए क्या ?'

पुलिस इंस्पेक्टर ने फौरन बोतल लेकर नर्स को दे दी और देशमुख को छोड़कर भिखारी को घेर लिया।

'खून की बोतल किसने दी तुम्हें ?' उसने संदिग्ध दृष्टि से भिखारी को घूरते हुए पूछा।

एक नौजवान ने दरोगा जी।'

'कौन था वह ?'

'नहीं मालूम।'

'तुम किसी का भी काम करने को तैयार हो जाते हो ?'

'नहीं साहब...उसने लालच दिया था। '

'कैसा लालच ?'

भिखारी ने अपने लबादे की जेब से सौ-सौ के मुड़े-तुड़े कितने ही नोट इंस्पेक्टर को दिखाए-'ये सब उस नौजवान ने दिए थे। उसने कहा था कि अगर मैने बोतल यहाँ पहुंचा दी तो किसी की जान बच सकती है।।

'वह नौजवान कहां गया ?'

' नहीं मालूम।'

देशमुख को अवसर मिला और व ह पूनम वाले चैम्बर में दाखिल हो गया। पूनम को खून की दूसरी बोतल लगाई जा रही थी।

पुलिस इंस्पेक्टर भिखारी से अन्य किसी प्रकार की जानकारी हासिल नहीं कर सका।

___ भिखारी से उसने नौजवान का हुलिया पूछा गे भिखारी ने बताया कि उसकी एक आंख में मोतिया है और दूसरी से सिर्फ काम चलाऊ वाला हिसाब है। इसलिए वह हुलिया नहीं बता सकता।

पुलिस कुछ न कर सकी।

आखिरकार भिखारी को छोड . देना पड़ा।

थोड़ी देर बाद चिंतित अवस्था में माणिकी देशमुख चैम्बर से बाहर निकला।

'कोठारी ! ' बहु कोठारी की ओर बढ़ता हुआ बोला -खून की चार बोतलें और मंगवा लो।'

'क्यों बॉस ... क्या दूसरी बोतल भी खत्म हो गई?'

'अभी नहीं।'

' फिर'

'सावधानी के लिए। मैं नहीं चाहता कि खून की कमी की वजह से मेरी बेटी को कुछ हो जाए। '

'एक अदमी गया हुआ है। '

' उसे कुछ हो सकता है। कहीं फंस सकता है वह इसीलिए दूसरा आदमी भेज दे। जल्दी कर।'

जो आज्ञा ।'

कोठारी दूसरा आदमी भेजने के लिए वहां से चला गया।

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श्याम दुग्गल बहुत बड़ा नेता था। उसे सुरक्षा के उच्च कोटि के साधन उपलब्ध थे। वह जानता था कि हिट लिस्ट में उसका ना म बहुत ऊपर था इसीलिए वह हमेशा सतर्की रहा करता था। वह जहां भी जाता , ब्लैकी कैट कमाण्डोज उसके साथ होते।

उसने कभी भी कमाण्डोज का घेरा पार करके बाहर निकलने की कोशिश नहीं कि थी। आज उसे एक पब्लिकी मीटिंग में तब किसी ने चौंकाया जबकि वह कमाण्डोज के घेरे में चलता हुआ भाषण के बाद मंच से नीचे आ रहा था।'नेताजी तुम्हें सावधानी बरतनी होगी। इसके बाद कोई भी पब्लिकी मीटिंग अटैण्ड करना हानिकारकी हो सकता है।'

कहने वाला एक युवकी था।

उसके शब्दों को उसने स्पष्ट सुना था।

कमाण्डोज के' अतिरिक्त उसके कुछ आदमी सादा वर्दी में भी आस पास ही रहा करते,थे ताकि कोई असामाजिकी तत्व सहज ही उसके निकट न जा सके।

वैसे ही एक सादा वर्दी वाले को उसने आंखों ही आंखों ' में आदेशित किया।

और अब!

अब वह अपने उसी आदमी की प्रतीक्षा कर रहा था ताकि वह उससे उस युवकी की बावत जानकारी हासिल कर सके।

__ 'साहब। ' एक कमाण्डो ने आकर आदर सूचकी स्वर में कहा- 'वह आ गया।'

' उसे फौरन हाजिर करो। '

कमाण्डो वापस चला गया।
 
सादा वर्दी वाला उस युवकी को लेकर वहां दाखिल हुआ। युवकी रंजीत लाम्बा के अतिरिक्त कोई न था।

उसे दुग्गल ने तुरन्त पहचान लिया।

__ 'कौन हो तुम ?' उसने शंकित स्वर में लाम्बा से पूछा।

'आपका हितकारी।' लाम्बा ने सहरन स्वर में उत्तर दिया।

'तुम्हें कैसे मालूम कि अगली कोई मीटिंग मेरे लिए हानिकारकी हो सकती है ? '

'जिस स्थिति में आप हैं उस स्थिति वाले व्यक्ति को ऐसे समय में सिर्फ आम खाने से मतलब रखना चाहिए ... पेड़ गिनने से नहीं।'

लाम्बा का जवाब सुनकर श्याम दुग्गल की भक्ति तन गई। उसने गौर से लम्बा को सिर से पांच तक निहारा।

'तुम मेरे हितकारी हो ना?' वह गुर्राया।

' इसीलिए सावधान किया है। '

'सावधान किया है तो जो भी कुछ जानते हो उसके बारे में मुझ सब-कुछ ब ता दो। अगर दो मिनट के अंदर तुम रिकार्ड कि तरह बजना शुरू नहीं हुए

तो!'

'तो?' एकाएक ही लाम्बा ने तेवर बदलकर

पूछा।

'तो तुमजानते हो क्या हो सकता है। समझदार को समझाने की जरूरत नहीं होती।'

'तुम उसे धमका रहे हो जिसने तुम्हें आने वाले खतरे से आगाह किया है...उसे।'

'हितचिन्तकों के साथ इस-तरह के खेल नजरें बदल कर हमें अक्सर खेलने पड़ते है। राजनीतिकी क्षेत्र इस प्रकार की विचित्रताओं से भरा पड़ा है।'

'ओह...समझा।'

'समझ हो गए लेकिन अब जल्दी से सब-कुछ बता डालो वरना बात बिगड़ते देर नहीं लगेगी।'

'अच्छा !'

' हां।'

' तो फिर मिंस्टर दुग्गल तुम बात को-बिगाड़ ही लो । क्या समझे? '

श्या म दुग्गल ने उसे क्रोधित दृष्टि से घूर कर देखा।

' मैं तुम्हारी इन निगाहों से डरने वाला नहीं।'

'लगता है जिन्दगी से बैर मान लिया है ?'

'जान से मार दोगे न...तो ये भी सही , लेकिन अब मैं तुम्हें कु छ बताऊंगा नहीं।'

'बाद में पछताओगे।'

' आत्मा शेष रह जाएगी और आत्मा के पास इस तरह के फिजूल कामों के लिए वक्त नहीं होता।'

वक्त मेरे पास भी नहीं है। आखिरी बार पूछ रहा हूं बताते हो या नहीं?'

'बे कार ही वक्त बरबाद कर रहे हो।'

'ले जाओ इसे ! ' आंखों से भाले-बी बरसाता हुआ दुग्गल हिंसकी स्वर में गुर्राया।

दो कमाण्डोज और एक सादा वर्दी वाले ने उसे तुरन्त कवर कर लिया।

ए की साथ तीन-तीन गनों की नालें उस की ओर तन गई।

उसने तुरन्त ही समर्पण की मुद्रा में दोनों हाथ ऊपर उठा दिए।

'चलो! उसे गन की बैरल-से टहोका ग या ।

वह सांकेतिकी दिशा में चल पडा।

बाहर आ कर उसे काले शीशों वाली एक बन्द वै न में पहुंचा दिया गया।

तीनों गनर उसके साथ बैठे।

वैन वहां से चल पड़ी। धीरे-धीरे वैन की रफ्तार में वृद्धि होती चली गई।

कुछ देर बाद एक वीरान जगह पर वह रुकी।

एक गनर ने वैन का दरवाजा खोला।

दूसरे ने भद्दी-सी गाली देते हुए लम्बा को ठोकर मारकर बाहर उछाल दिया।

वो तीन थे।

तीनों के पास गने थीं और उनकी नजर में लाम्बा एक मूर्ख नौजवान था। इसलिए वे उसकी तरफ से पूरी तरह असा वधा न थे।

उन्होंने सपने में भी नहीं सोता था कि उन तीन गनों के खिलाफ लम्बा किसी तरह का कदम उठाएगा। उनके हिसाब से तो लाम्बा ने कुत्ते की मौत मरना था।

उन्हें नहीं मालूम था कि वे हत्यारों की दुनिया में जल्लाद कहे जाने वाले खतरनाकी हत्यारे के रूबरू थे।

अगर वे यह जानते कि सामने वाला कोई ल ल्लू नहीं, रंजीत लम्बा नाम का खूखार व्यक्ति है तो शायद वे उसकी तरफ से इतने लापरवाह नहीं हो ते ।

नीचे गिरते ही लाम्बा ने अपनी गर्दन के ठीकी पीछे दोनों हाथ डालकर छोटे आकार का माउजर निकाल लिया।

इसके पहले कि कोई कुछ समझता , माउजर की दहाड़ से वह वीरान क्षेत्र गूंज उठा।

__ गोलियो की बाड़ निकली और उन तीनों को चाट गई।'

- चीते जैसी फुर्ती से उछलकर लम्बा ड्राइवर की तरफ लपका। वह ड्राइवर को भी उड़ा डालना चाहता था लेकिन ड्राइवर ने घिघियाते हुए दोनों हाथ उठा दिए।

म... मुझे मत मारो साहब ...मैंने तो हुक्म मानना होता है गाड़ी चलाने का। म...मेरे पास कोई गन भी नहीं है। आप तलाशी ले लो साहब। मैं गरीब आदमी हूं। मेरे बच्चे अनाथ हो जाएंगे। ' वह गिड़गिडा ता हुआ बोला।

लाम्बा ने उसे कठोर दृष्टि से निह रा!

वह बुरी तरह घबरा रहा था। '

माउजर उसकी ओर तना था।

ट्रेगर कसने भर को देर थी और ... |

ड्राइवर एकदम से उसके पैरों में गिर पड़ा- ' नहीं-नहीं मालिकी , मुझे मत मारो।'

'उठो !'

वह उठ गया।

' गाड़ी की चाबी कहां है ?'

'गाड़ी में साहब ।'

'ठीकी है , अब उस तरफ दौड़ लगा। ' लाम्बा ने मुख्य सड़की से विपरीत दिशा की ओर सकेत करते हुए कहा।

ड्राइवर ने संदिग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखा।

'डर मत...मैं दो मिनट तक गोली नहीं चलाऊंगा। दो मिनट यानी एक सौ बीस सैकिण्ड।'

'स..साहब

'भाग!'

'साहब।'

'भाग! ' चिल्लाते हुए लम्बा ने हवाई फायर किया। फायर के साथ ही वह वहां से पूरी शक्ति लगाकर निकल भा गा। भागते हुए वह बार-बार मुड़कर शंकित दृष्टि सें लाम्बा की ओर देख रहा था।

लम्बा पहले अपना जगह खड़ा रहा। उसके बाद उसने माउजर यथास्थान पहुंचाकर वैन की ड्राइविंग सीट संभाल ली।

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