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चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल compleet

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चक्रव्यूह -हिन्दी नॉवल by Ved prakash sharma



"तुम तुम-तुम यहाँ ?'" अपने आँफिस में दाखिल होते युवक को देखकर बैरिस्टर विश्वनाथ चौंक पड़े ।

युवक का चेहरा गम्भीर था बल्कि अगर यह कहा जाये कि उसकी 'नीली' आंखों से हल्की हल्की वेदना झांक रहीं थी तो गलत न होगा, मेज के नजदीक पहुंचकर उसने पूछा…- ""क्या मैं बैठ सकता हू ?"

"तुम अपने ऊपर चल रहे मुकदमे के सिलसिले में ही यहाँ आाए हो न ?" बैरिस्टर विश्वनाथ का स्वर उखडा हुआ था ।

“जी हां ।"

"तब तो हम तुम्हें बैठने के लिए नहीं कह सकते ।"

"क-क्यों ?"' उसने ऐसे स्वर में पूछा जैसे अभी रो देगा ।

“क्योंकि हम सरकारी वकील हैं और सरकारी वकील कोर्ट में मुजरिम की "पैरवी" नहीं करते, बल्कि उनकी पैरवी करने वालों की मुखालफत करते हैं । तुम्हारी पैरवी बचाव पक्ष के सबसे ज्यादा काबिल और खुर्राट माने जाने वाले वकील मिस्टर शहजाद राय कर रहे हैं---अपने मुकदमे से हैं सम्बन्धित जो बातें करना चाहते हो उन्हीं से करो ।"

"उनसे की जा सकने वाली सभी बाते मैं कर चुका हूं ।"

"जवाब में क्या कहा उन्होंने ?"

"राय साहब का कहना है कि सारे सबूत और शहादतें मेरे खिलाफ हैंं---- आपके द्वारा पेश किये गये गवाहों को वे नहीं तोड सकते-उन्होंने साफ लफ्जों में स्वीकार किया है बैरिस्टर साहब कि वे मुझे बचा पाने में असमर्थ हैं ।"

बैरिस्टर विश्वनाथ के होंठों पर ऐसी मुस्कान उभरी जेसी सिर्फ तब उभरती थी जव उनके कान न्यायाधीश के श्रीमुख से अपने पक्ष में सुनाया जाने वाला फैसला सुन रहे होते थे----थ्रोडी गर्वीली मुस्कराहट के साथ उन्होंने बगल वाली कुर्सी पर बैठी अपनी वेटी किरन की तरफ देखा और बोले-तुमने सुना किरन, मिस्टर राय ने अपने मुवक्किल के सामने कबूल कर लिया है कि वे मुकदमा हार रहें हैं ।"

किरन युवक की तरफ देखती हुई बोली…"इन्हे बैठने के लिए तो कहो पापा ।”

"मैं इसे बैठने की इजाजत इसलिए नहीं दे रहा हू वेटी, क्योंकि मुल्जिम का वकील कोर्ट में जब यह महसूस करने लगता है कि वह केस 'लूज' कर रहा है तो मुल्जिम को सलाह देता है कि अगर यह किसी तरह कोर्ट सरकारी वकील को बोलने से रोक सके तो बच सकता है और तुम जानती हो कि तब मुल्जिम सरकारी वकील के मुंह पर नोटों की गड्रिडयां चिपकाने चले जाते हैं ।"

एकाएक थोड़े उत्तेजित स्वर में बोला युवक----कम से कम मैं अपके पास इस मकसद से नहीं अाया हू बैरिस्टर साहब ।"

अब !

बैरिस्टर विश्वनाथ ने चौंककर उसकी तरफ देखा ।
 
कुछ देर पहले तक जो युवक गिड़गिड़ा रहा था वह अचानक उत्तेजित नजर आने लगा, वहुत ध्यान से उसका चेहरा देखते हुए वेरिस्टर विश्वनाथ ने पूछा…“तो क्यों आए हो ? "

कुछ देर पहले तक जो युवक गिड़गिड़ा रहा था वह अचानक उत्तेजित नजर आने लगा, वहुत ध्यान से उसका चेहरा देखते हुए वेरिस्टर विश्वनाथ ने पूछा…“तो क्यों आए हो ? "

"अगर आप बैठने के लिए कहें तो मैं बैठ जाऊं ।"

विश्वनाथ को कहना पड़ा-“बैठो ।"

कानूनी किताबों और अनेक केसों की फाइलों से लदी फ़दी मेज के इस तरफ पडी तीन में से एक कुर्सी के कोने पर बैठ गया युवक…-पहले मेज के पार बैठी किरन के खूबसूरत मुखड़े की तरफ देखा और फिर… नीली अांखें विश्वनाथ के चेहरे पर गड़ा दी---विश्वनाथ और उनकी बेटी …आंखों में सवालिया निशान लिए उसी की तरफ देख रहे थे ।

लम्बी खामोशी के बाद विश्वनाथ ने कहा----" कहो ।"

"क्या मैं सिगरेट पी सकता हू?"

बैरिस्टर विश्वनाथ थोड़े हिचके जरूर मगर फिर जाने क्या सोचकर बोले…"पी लो ।"

""थेंक्यू।” कहने के बाद उसने 'जीन' की जेब से विल्स फिल्टर का मुडा तुड़ा पैकिट निकाला और एक सिगरेट सीधी करके सुलगाने के बाद बोला---" यह 'श्योर' है कि अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में मुझे फांसी होकर रहेगी जिसने कोर्ट की अब तक की कार्यवाही देखी सुनी हेै…हद तो ये है बैरिस्टर साहब कि मैं खुद भी मान चुका हू कि दुनिया की कोई ताकत मुझे फांसी से नहीं बचा सकती मगर-

“मगर ? "

"एक बात कहने का ख्वाहिंशमन्द हूं मैं ।"

"क्या ?"

"यह कि सच्चाई तर्कों से उपर होती है ।” '

"यानि ? "

"सच्चाई ये है कि मैं बेगुनाह हूं !”

" तुमने अपनी बीबी की हत्या नहीं की ?"

मुकम्मल दृढ़ता के साथ कहा युवक ने…-"'बिल्कुल नहीं की । "

"बकवास !" बैरिस्टर विश्वनाथ ने बुरा सा मुह बनाकर कहा…

"कोरी बकवास-हर तर्क चीख चीखकर कह रहा है कि संगीता की हत्या तुम्हीं ने की है ।"

"और मैं कह चुका हूं कि सचाई तर्कों से ऊपर होती !!!!

बैरिस्टर विश्वनाथ की आंखों में झांकता युवक कहता चला गया----“यह जरूरी नहीं कि तर्क हमेशा यही साबित करें जो सच्चाई हो-ऐसा अक्सर होता है कि सच्चाई कुछ और होती है और तर्क कुछ और साबित कर देते हैं ।"

"हम अब भी नहीं समझे ।”

" फार एग्जाम्पिल " युवक ने अपना सिगरेट बाला हाथ आगे किया----"मेरे हाथ में सिगरेट है---अाप तर्कों से यह साबित करने पर अमादा हो जाते हैं कि मेरे हाथ में सिगरेट नहीं है और बहस करने लगते हैं…मैं यह साबित करने के लिए तर्क देने लगता हूं कि मेरे हाथ में सिगरेट है---बुद्धि और तर्क शक्ति में आप मुझसे मीलों आगे हैं, सो अपने तर्कों से मुझे लाजवाब कर देगे---साबित कर देगे कि मेरे हाथ में सिगरेट नहीं है ।”

“इस वक्त भला कैसे साबित हो जाएगा कि तुम्हारे हाथ में सिगरेट नहीं है ?"

"हो जाएगा ।" युवक ने कहा---"मैं खुद कर सकता हू।"

बैरिस्टर विश्वनाथ ने दिलचस्प स्वर में कहा…“करो।"

“आप क्यों मानते हैं कि मेरे हाथ में सिगरेट है ?"

हम अपनी आंखी से देख रहे हैं । "गलत देख रहे हैं अाप ।" युवक अपने एक एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला --"आपकी भली----चंगी आखें आप को धोखा दे रही हैं !"

" कैसे ?"

एकाएक युवक ने किरन से पूछा-"क्या आप भी यह देख रही हैं मिस मेरे हाथ में सिगरेट है ?"

“आँफ़क्रोसं ?" किरन ने दिलचस्प स्वर में कहा ।

_ "मैँ जानना चाहता हूं कैसे ?"

आपनी आंखों से देख रही हूं ।"

"आपकी आंखे धोखा दे रही ।"'

"कैसे ? "

"सिगरेट मेरे हाथ में नहीं बल्कि अंगुलियों में है ।”

किरन हकबका सी गई ।

सकपका बैरिस्टर विश्वनाथ भी गए थे, मगर शीघ्र ही संभलकर बोले---"बात तो एक ही हुई अंगुलियां हाथ का हिस्सा है ।"

"और हाथ जिस्म का हिस्सा है, आपने यह क्यों नहीं कहा कि सिगरेट मेरे जिस्म में है ?"

बैरिस्टर विश्वनाथ अवाक रह गया, जवाब न बन पड़ा उन पर !

युवक कहता चला गया---झेंप मत मिटाइये बैरिस्टर साहब, 'नुक्ता' होने के नाते आप जानते हैं कि जरा सा 'नुक्ता' निकल अाने से कानून की नजर में बात बदल जाती है----हमारी बहस इस "प्योंइंट' पर छिड़ी थी कि सिगरेट हाथ में है या नहीं--- आप कह रहे थे कि है, मैं कह रहा था नहीं है----मेने साबित कर दिया कि सिगरेट मेरी अंगुलियों में है, हाथ में नहीं--खुले दिल से जवाब दीजिये कि अगर यह बहस इसी ढंग से कोर्ट में है होती तो न्यायाधीश यह कहता कि आप ठीक कह रहें है या यह कि मैं ठीक कह रहा हू?”

बैरिस्टर विश्वनाथ को कहना पड़ा-"जज को तुम्हारी बात ज्यादा सटीक लगती ।"

"यानि मैंने साबित कर दिया कि सिगरेट मेरे हाथ में नहीं है, आप दोनों की आंखें धोखा दे रही थीं ?"

"बेशक साबित कर दिया ।”

युवक ने किरन से पूछा…"आप क्या कहती है ?"

"मानती हूं कि तुमने हमेँ गलत साबित कर दिया ।"

"जबकि मैं अभी भी यह साबित कर सकता हूं कि सिगरेट न मेरे हाथ में है, न अगुंलियों में ।"

किरन उछल पडी-“त--तुम यह साबित कर सकते हो?"

"पवके तौर पर ।" युवक ने दृढ़तापूर्वक कहा ।

किरन ने उत्सुक स्वर में पूछा-“कैसे साबित कर सकते हो?”

"करूं बैरिस्टर साहब ?" युवक ने विश्वनाथ की आंखों में झांककर पूछा ।

"एक मिनट ।” बैरिस्टर विश्वनाथ ने हाथ उठाकर उसे रोका, साफ़ जाहिर था कि वे अपने दिमाग पर जोर डालने के कोशिश कर रहे थे और उन्हें इस मुद्रा में देखकर युवक के होंठ होले से मुस्करा उठे, मुस्कान में एक अजीब सा फीकापन था, बोला---"लीजिए, अच्छी तरह सोच लीजिए कि मैं ये बात कैसे साबित कर सकता हूं कि सिगरेट न मेरी अंगुलियों में है, न हाथ में, सिगरेट कहीं और ही है ! " एकाएक बैरिस्टर विश्वनाथ बोले-“सिगरेट तुम्हारी अंगुलियों के बीच में है ।"

“बेशक आप समझ गए कि मैं क्या कहना चाहता हूं !”

"में शब्द का अर्थ है "अंन्दर" ।" विश्वनाथ कहते चले गए---" अगुंलियों का मतलब हुआ अंगुलियों के अन्दर यानी चमडी के अन्दर, वहां जहां खून है, नसें हैं, हड्डियां हैं –

सिगरेट वहां नहीं है लिहाजा यह कहना गलत है र्कि सिगरेट तुम्हारी अंगुलिंयों में है-यह कहना ज्यादा उपयुक्त है कि सिगरेट अंगुलियों के बीच में है ।'"

 


“यानि आप मान गए कि सिगरेट मेरी 'अंगुलियों' के बीच में है?”

"नि:सन्देह !"

"जबकि यह गलत है ।"

"क्या मतलब ?" इस बार बैरिस्टर विश्वनाथ भी उछल पड़े ।

"अंगुलियां सोलह होती है बैरिस्टर साहब, सिगरेट उन सोलह अंगुलियों के बीच नहीं हो सकती बल्कि कहना चाहिए कि नहीं है----अर्थात् केवल यह कह देना सही नहीं है कि सिगरेट मेरी अंगुलियों के बीच है बल्कि यह कहना ज्यादा सही है कि मेरे दायें हाथ की कनिष्ठा और तर्जनी अंगुलियों के बीच में है ।"

"तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो ।’" बैरिस्टर विश्वनाथ ने हथियार डाल दिए ।

किरन आंखों में प्रशंसा के भाव लिए युवक को निहारे जा रही थी जबकि युवक अपना मुकम्मल ध्यान बैरिस्टर विश्वनाथ पर कैन्द्रित किए एक…एक शब्द पर जोर देता हुआ कहता चला गया…"जब सिगरेट पर बहस हुई थी तब आप इस बात को सच सान रहे थे कि सिगरेट मेरे हाथ में है---मैंनें तर्क दिया तो आप मानने लगे कि सिगरेट अंगुलियों में है और जब मैंने उससे आगे तर्क दिए तो आपको मानना पड़ा कि सिगरेट अंगुलियों के बीच है… अन्त में मैंने यह साबित कर दिया कि सिगरेट मेरी अंगुलियों के बीच नहीं बल्कि दायें हाथ की तर्जनी और कनिष्ठा के बीच है ।"

बैरिस्टर विश्वनाथ ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा---"तर्कों से अन्त में वही साबित हुआ न जो सच्चाई है?”

"क्या गारन्टी है कि सच्चाई यही है ?"

"मतलब ?"

“जहां तक में तर्क दे चुका हु", वहां से आगे तर्क देने की क्षमता मुझमें नहीं है, आपने नहीं है इसलिए हम इसे सच्चाई मान रहे हैं जबकि किसी अन्य व्यक्ति में मुझसे और आपसे ज्यादा तर्कशक्ति हो सकती है---अपने तर्क से वह पलक झपकते ही साबित कर सकता है कि सच्चाई वह भी नहीं है जिस तक हम पहुंचे हैं-ठीर उसी तरह जेसे अगर मैं तर्क न देता तो अाप इसी को सच्चाई मानते कि सिगरेट मेरे हाथ में है, मानते या नहीं मानते ?"

"बिल्कुल मानते बल्कि कहना चाहिए कि मान रहे थे !"

"जबकि वह सच्चाई नहीं थी ?"

"बेशक नहीं थी ।"

"कहने का मतलब ये कि हर व्यक्ति उस बात को सच्चाई मान लेता है जहां उसके अपने दिमाग की तर्क क्षमता चूक जाती है जबकि वास्तव में वह सच्चाई नहीं होती-मेरे केस में ठीक वैसा ही हुआ है बैरिस्टर साहब, तर्क भले ही कह रहे हो कि मैं हत्यारा हूं मगर हकीकत यह है कि मैंने संगीता की हत्या नहीं की ।”

"बार-बार यह बात कहने के पीछे तुम्हारा मकसद क्या है ? "

"जानता हू कि अगले तीन दिन बाद मेरे केस के फैसले की तारीख है और उस तारीख पर वह तारीख मुकर्रर कर दी जाएगी जिस तारीख पर मुझे फांसी पर चढाया जाना है----" जब यह बात मेरी समझ में आ गई तो दिल से एक 'गुब्बार' सा उठा आपकी और जज साहब को यह जताने का गुब्बार, भले ही मैं खुद को बेगुनाह साबित न कर सका,

भले ही मैं अपनी पत्नी का हत्यारा साबित हो गया, मगर सच्चाई ये है कि मैं हत्यारा नहीं हूं… मैं अपनी मरहूम पत्नी की कसम खाकर कहता हू बैरिस्टर साहब कि मैंने उसे नहीं मारा ।" कहने के साथ उसने सिगरेट का अन्तिम सिरा 'ऐश ट्रे' में मसला और खड़ा हो गया ।

जाने क्या बात थी कि बैरिस्टर विश्वनाथ और उनकी बेटी हकबकाकर रह गए ।

युवक तेजी से दरवाजे की तरफ बढा ।

"ठहरो ।" बैरिस्टर विश्वनाथ कह उठे ।

वह ठिठका ।

चेहरा बुरी तरह भभक रहा था, अंगारे जैसी आंखें उनके चेहरे पर गड़ाकर बोला वह…“जो मुझे कहना था कह चुका हूं अब अाप क्या चाहते हैं मुझसे ?"

"यह सव हमसे कहने से तुम्हें क्या मिला ?"

“सुकून ।"

"सुकून ???"

"मुमकिन है कि कल.........मेरी मौत के बाद, मेरे फांसी पर चढ़ जाने के बाद कोई ऐसा चमत्कार हो जाए जिससे अाप और जज साहब इस नतीजे पर पहुंचे कि वह सब नहीं था जिसे आपने सबूतों, तर्कों, और वक्त के चक्रव्यूह में र्फसकर सच मान लिया था-----उस वक्त आपको यह बात जरूर याद आएगी कि शेखर मल्होत्रा अन्तिम सांस तक अपने बेगुनाह होने की बात कहता रहा था------निश्चित रूप से उस वक्त आपको यह सोचकर अफसोस होगा कि अाप सबूत और शहादतों के चक्रव्यूह में क्यों फंसे रहे----अाज के हालात में मुझे कुछ और तो हासिल हो नहीं सकता-सो, अगर मैं यह सोच सोचकर 'सुकून' महसूस कर रहा हू कि एक न एक दिन आपकी अफसोस जरूर होगा तो क्या गुनाह कर रहा हूं मैं ?"

"नहीं, कोई गुनाह नहीं कर रहे ।"

शेखर, मल्होत्रा नामक युवक ने अजीब स्वर में पूछा--"अब मैं चलू?”

"जज साहब से मिल चुके हो या मिलोगे?"

"मिलूंगा ।"

“यह जानते बूझते कि तुम्हारी बातों को वे बकवास समझेंगे? "

 
शेखर मल्होत्रा चला गया ।

आँफिस में छोड़ गया सन्नाटा ।

डायमंड की धार जैसा पैना और कलेजे को चीरकर रख देने वाला सन्नाटा ।

काफी देर तक न तो बैरिस्टर विश्वनाथ के मुंह से कोई लफ़्ज निकल सका, न किरन के-----दोंनों अपनी-अपनी सोचों में गुम थे ।

एकाएक किरन ने सन्नाटे का भेजा उडा दिया----" केस से "कनेक्टिड' फाइल कहाँ है पापा ?"

"क-क्यों ?" विश्वनाथ बुरी तरह चौंककर उसकी तरफ पलटे-----"तुम क्यों पूछ रही हो ---- "मैं उसे पढ़ना चाहती हू ।"

"वजह ?"

"" देखना चाहती हूं कि ये मामला क्या है ?"

"सारे मामले को संक्षेप में यूं बयान किया जा सकता है कि- अपनी बीबी की दौलत हड़पने के लिए शेखर मल्डोत्रा ने उसकी हत्या कर दी !"

"दौलत हड़पने के लिए ?"

"संगीता के पिता यानि गुलाब चन्द जैन हमारे अच्छे दोस्त थे-----संगीता उनकी इकेलीती बेटी थी और उसने गुलाब चन्द की इच्छा के विरुद्ध जाकर शेखर मल्होत्रा से 'लव-मैरिज' की थी-गुलाब चन्द ने शेखर मल्होत्रा को कभी पसन्द नहीं किया-----वे अक्सर कहा करते थे कि देख लेना विश्वनाथ, एक दिन मैं रहस्यमय परिस्थितियों में मरा पाया जाऊंगा और अगर ऐसा हो जाए तो समझ जाना कि दौलत की खातिर मेरी हत्या मेरे दामाद ने की है-----तुम उसका पर्दाफाश करके मेरी बेटी की आंखें खोल देना----गुलाब चन्द की मौत संगीता की मौत से केवल तीन महीने पेहले सचमुच रहस्यमय परिस्थितियों में हुई । हिल एरिया में कार ड्राइव करता मरा था वह------दुर्घटना की जांच करने के बाद पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि नशे की ज्यादती की वजह से गुलाब चन्द अपनी फियेट सहित सैकडों फूट गहरी खाई में जा गिरा----यानि पुलिस ने उसे दुर्घटना ही माना पर हमे आज़ भी रह-रहकर गुलाब चन्द के शब्द याद जाते और लगता है कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि शेखर द्वारा किया गया मर्डर था------हम चाहकर ही कुछ न कर सके और फिर इसने संगीता की भी हत्या कर दी लेकिन झूठ की हांडी रोज नहीं चढ़ती---संयगता का मर्डर करता वह घर के तीन नौकरों द्वारा रंगे हाथों पकड़ लिया गया-नौकरों के नाम बुन्दू निक्के और रधिया हैं ।"

किरन ने बडी गहरी नजरों से अपने पापा की तरफ देखा और बोली-----आपके हवाई ख्यालों के मुताबिक शेखर मल्होत्रा अपके दोस्त और उसकी बेटी का हत्यारा है, कहीं यही वजह तो नहीं है पापा कि अाप उसके द्वारा कही गई

किरन ने बडी गहरी नजरों से अपने पापा की तरफ देखा और बोली-----आपके हवाई ख्यालों के मुताबिक शेखर मल्होत्रा अपके दोस्त और उसकी बेटी का हत्यारा है, कहीं यही वजह तो नहीं है पापा कि अाप उसके द्वारा कही गई -----------------

बातों को रत्ती भर भी महत्व नहीं दे रहे है"'

"तुम भी महत्व मत दो, वे बात महत्व दी जाने लायक हैं ही नहीं ।"

“क्यों ?"

"क्योंकि वे एक मुजरिम के मुंह से निकली हैं, हर मुजरिम अपने अन्तिम समय तक यहीं कहता रहता है कि वह बेगुनाह है और फिर शेखर मल्होत्रा तो एक ऐसा मुजरिम है जिसे यकीन हो चुका है कि उसे फांसी होने वाली है-----जो कुछ उसने कहा वह उसकी हताशा से ज्यादा कुछ नहीं था ।"

मुकम्मल दृढ़ता के साथ कहा किरन ने-----" मैं आपकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती ।"

बैरिस्टर विश्वनाथ अपने एक----एक शब्द पर जोर देते हुए उसे समझाने वाले अन्दाज में बोले…“तुम्हें हमने एल. एल. एम. कराया, एडवोकेट की डिग्री दिलवाई, अनुभव 'गेन' करने के लिए साथ बैठाना शुरू किया, इस यत्न से तुम्हें यह शिक्षा लेनी चाहिए कि एक हताश और पूरी तरह कानून की गिरफ्त में फंस चुका मुजरिंम कितने व वजनदार ढंग से लोगों को विवश कर सकता है ।"

"अगर मैं यह कहूं कि अाप अपने अनुभवों की वजह से पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं तो ?"

" क्या मतलब ?"

"आप जानते हैं कि खुद को बचाने के लिए प्रत्येक मुजरिम अंतिम समय तक खुद को बेगुनाह बताता रहता -------आप मानते हैं कि तर्क, बहस, सबूत और शहादतें हमेशा वही साबित कराती हैं जो सच होता है -------आपके दिलो-दिमाग में यह बात बैठी हुई है पापा कि झूठ कभी साबित नहीं हो सकता ---इन्ही सब पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर एक क्षण के लिए भी आप मुलजिम के हक में सोचना तक नहीं चाहते बल्कि उससे भी ऊपर की स्थिति ये है कि मेरी तरह अगर कोई हक में सोचने की चेष्टा करता भी है तो आप उसे बेवकूफ़, मूर्ख और प्रभावित हो जाने वाले की संज्ञा देते है ।"

"कहना क्या चाहती हो तुम ?"

 


"सिर्फ इतना कि जो कुछ मल्होत्रा ने कहा अगर उसकी जांच कर ली जाए तो क्या बुराई है ?"

"कैसे जांच करना चाहती हो ?"

" इस केस की फाइल पढ़कर, सारे मामले की "इन्वेस्टीगेशन करके ।"

"जिस केस में से शहजाद राय जैसा काइयां एडवोकेट कुछ नहीं निकाल सका उसमें से तुम भला क्या निकाल लोगी ?"

" ऐसे वहुत-से-काम होते है पापा, जिन्हें हाथी नहीं कर पाता मगर चींटी कर देती है ।"

"तुम उन तिलों में से तेल निकालने की कोशिश करोगी जिनमें तेल नहीं है ।"

"कोल्हू में डालने से पहले कोई नहीं बता सकता कि किन तिलों में तेल है किन में नहीं।''

“बता देते हैं बेटी ।" बैरिस्टर विश्वनाथ ने कहा------" अनुभवी लोग तिलों को देखते ही, विना उन्हें कोल्हू में डाले बता देते है कि उनमें तेल है या नहीं ।"

"देखना यहीं है पापा कि आपका अनुभव जीतता है या . . मेरे दिल की आवाज ।"

अजय देशमुख नामक जिला एवं सत्र न्यायधीश ने शेखर मल्होत्रा की सभी बाते धैर्य पूर्वक सुनी और सुनने के बाद सवाल किया----“अगर तुम बेगुनाह हो तो तुम्हारे खिलाफ़ इतने पुख्ता गवाह और ऐसे अकाटय सबूत कहां से पैदा हो गए जिन्हें शहजाद राय जैसा धुरन्धर वकील न काट सका ।"

"इस किस्म के सवालों का जवाब अगर मेरे पास होता तो आज आप उसे सच न मान रहे होते जिसे मान रहे हैं ।"

"एक सेकेंड के लिए मान ले कि तुम सच बोल रहे हो तो-;------"'इसका मतलब ये हुआ कि तुम्हें हत्यारा सावित करने वाले पुख्ता गवाह और अकाट्य सबूत किसी के द्वारा प्लांट किये गये हैं !"

"अब इन बातों पर गौर करने का वक्त निकल चुका है जज साहब ।"

"क्या तुम्हें किसी पर शक है !"

"कैसा शक ?”

"कि फलां शख्स तुम्हें अपनी बीबी की हत्या के जुर्म में फंसाने की चेष्टा कर सकता है ।"

"जो कुछ एाप कह रहे हैं वह मेरे लिए नया नहीं है, राय साहब भी यही सब कहते रहे है और मैं-----मैं यह सब सोचता रहा हू…इतना सोचा है मैंने कि अब तो सोचने की " कल्पना से ही दिमाग में दर्द शुरू हो जाता है सोचते-सोचते आपकी तरह मुझे भी हर बार ऐसा जरूर लगा कि किसी के प्रयास कि बगैर मैं इतनी बुरी तरह नहीं कंस सकता किसी-न-किसी ने तो मेरे चारों तरफ चक्रव्यूह रचा ही है ।"

"चक्रव्यूह ?"

"हां, जो कुछ हुआ है, उसे शायद यही शब्द दिया जाना उपयुक्त है-----किसी ने, ऐसे शख्स ने मेरे चारों तरफ कोई चक्रव्यूह रचा है 'जिसके बोरे में मैं कल्पनाओं तक में नहीं सोच पाया हूं

जब मुझे यही नहीं मालूम कि चक्रव्यूह किसने रचा है तो उसे तोडने का प्रयास कहां से शुरू करता और फिर.......... "मेरी तो बिसात क्या है-इस चक्रव्यूह को इंस्पेक्टर अक्षय श्रीवास्तव जैसा घाघ पुलिसिया न तोड़ सका, शहजाद राय जैसे धुरन्धर वकील न तोड सके---और बैरिस्टर साहब तक इस चक्रव्यूह में फंस गए हैं !"

"हम और विश्वनाथ ?"

"क्यों, क्या खुद को आप चक्रव्यूह के चक्र से बाहर समझते हैं ?"

"हम कैसे फंसे हुए हैं ?"

" आपने खुद कबूल किया कि अगर मां बेगुनाह हूं तो किसी ने मुझे फंसाया है-जाहिर है कि फंसाने वाले का लक्ष्य मुझे अपनी बीबी की हत्या के जुर्म में फांसी करा देना है, और मुझे फांसी के फंदे तक पहुचाने की जिम्मेदारी से न आप बच सकते हैं, न बैरिस्टर साहब ।"

“देखो शेखर, हम सिर्फ वह करते हैं जो सबूत और गवाह कराते हैं ।"

"और वे सबूत और गवाह वकील अाप ही के किसी के द्वारा 'प्लॉट' किये गए हो सकते हैँ…प्लांट किये गये सबूत और गवाहों के फेर में पडकर अगर आप एक बेगुनाह को फांसी पर चढा देते हैं तो क्या यह नहीं माना जायेगा कि किस अदृश्य ताकत द्वारा रचे गये चक्रव्यूह में फंसकर मैं फांसी के फंदे पर झूल जाऊंगा उसी ताकत द्वारा रचे गये चक्रव्यूह में फंसकर अाप व बैरिस्टर साहब भी वह कर रहे हैं, जो वह करवा रहा है ?"

"हम नहीं समझते कि हम किसी चक्रव्यूह में फंसे हुए ।"

"वह चक्रव्यूह ही क्या हुआ जज साहब, जिसमें फंसे शख्स को यह इल्म हो जाये कि वह फंसा हुआ है खैर , मुझें लगता है कि बहस लम्बी होती जा रही है बहस भी वह जिसका कोई लाभ नहीं है-----मैँ आपको दोष देने नहीं आया----इतना जाहिल भी नहीं हूं कि आपके और बैरिस्टर साहब के कर्त्तव्य को न समझता होऊं-------जानता हूं कि आप और बैरिस्टर साहब अपना कर्तव्य मुकम्मल ईमानदारी से निभा रहे हैं, मैं तो सिर्फ इतना सावित करके अपने दिल को समझाने की चेष्टा कर रहा हूँ कि चक्रव्यूह जिसने रचा है, उसके फेर में मैं कम-से-कम अकेला फंसा हुआ नहीं हूं बल्कि-------आप, बैरिस्टर साहब, शहजाद राय और श्रीवास्तव भी फंसे हुए हैं-------यह सोच-सोचकर मुझे चैन मिलता है कि जिस चक्रव्यूह का शिकार ऐसी-ऐसी धुरन्धर 'घाघ' खुर्राट और काइयां हस्ती हैं , उसमें अगर मैं फंस गया तो कौन-सी बडी बात है-जिस चक्रव्यूह को ऐसी हस्तियां न तोड़ सकी उसे तोड़ने की 'कुव्वत' मैं अदना-सा शख्स भला कहाँ से लाता…खैर आपने मेरी बातें सुनीं --- बहस की, भले ही कुछ सेकेंड के लिए सही, मगर मुझे बेगुनाह माना तो है ही, इन सबके लिए शुक्रिया ---- अब मैं चलता हूं ।

कहने के बाद शेखर मल्होत्रा लम्बे-लम्बे कदमों के साथ ड्राइंगरूम से बाहर निकल गया, जिला एवं सत्र न्यायधीश ने उसे रोकने की चेष्टा नहीं की ।

वातावरण गोलियों की आवाज से थर्रा उठा ।

किरन इस हमले का तात्पर्य तक न समझ पाई थी कि स्टेयरिंग काबू से बाहर होने लगा-----गाड़ी नशे में धुत शराबी के भांति लडखडाई और यह पहला क्षण था जब किरन को लगा की किसी ने उसकी गाड़ी के टायरों को निशाना बनाया गया है !

दिमाग पर आतंक सवार हो गया ।

 


गाडी की रफ्तार यदि ज्यादा होती तो निश्चित रूप से उलट जाती----इस वक्त सिर्फ इतना हुआ कि किरन के ब्रेक मारने पर गाडी दो-तीन जबरदस्त झटकों के साथ रुक गई । " तभी !"

"धांय.....धांय..…धांय ।"

गोलियों की एक और बाढ़ गाडी पर झपटी ।

इस बार मारुति डीलक्स के टिंटिड ग्लास चकनाचूर होगये ।

किरन ने तेजी से खुद को अगली सीटो पर गिरा दिया-----गोलियां चलने और खतरनाक कांच टूटने की आवाजों ने उसके रोंगटे खड़ेे कर दिए।

सीट में मुंह दिये उकडू वैठी थी वह !

गोलियों की बाढ़ जिस तेजी से अाई थी उसी तेजी से शति पड़ गयी ।

परन्तु । किरन का दिल धाड़धाड़ करके बज रहा था ।

चेहरा पसीने-पसीने हो गया ।

मारे दहशत के हालत ऐसी हो गई कि काफी देर तक कोई घटना न घटने के बावजूद सिर उठाकर देखने का साहस न कर सकी कि हुआ क्या है ?

उसके जीवन की यह पहली भयानक घटना थी ।

हाथ-पावं फूल गये ।

एकाएक दिमाग में ख्याल उभरा कि हमलावर उसकी गाडी को घेरने का प्रयत्न कर रहे होंगे और इस ख्याल ने तो छक्के ही छुडा दिये उसके------दिमाग हालांकि ठीक से काम नहीं कर रहा था मगर फिर भी, उकडू अवस्था में ही उसने खुद को दोनों सीटों के बीच से गुजार कर पिछली सीट पर डाल दिया !

एकाएक दिमाग में ख्याल उभरा कि हमलावर उसकी गाडी को घेरने का प्रयत्न कर रहे होंगे और इस ख्याल ने तो छक्के ही छुडा दिये उसके------दिमाग हालांकि ठीक से काम नहीं कर रहा था मगर फिर भी, उकडू अवस्था में ही उसने खुद को दोनों सीटों के बीच से गुजार कर पिछली सीट पर डाल दिया !

तभी !

ऐसी आवाज सुनी जैसे कोई गाड़ी "सर्र ..र्र ..रररर......से दौडती चली गई हो ।

चेहरा ऊपर उठाकर देखा ।

आंधी-तूफाऩ की तरह दोडी चली अा रही एक काली एम्बेसेडर के पृष्ट भाग पर उसकी आंखें स्थिर हो गई--नम्बर पढने के चेष्टा की, परन्तु 'प्लेट' गायब थी और तब तक गाडी इतनी दूर निकल चुकी थी कि प्रयास के बावजूद किरन यह अनुमान न लगा सकी कि एम्बेसेडर में कितने आदमी थे ?

चकनाचूर हुई अपनी 'विंड-स्कीन' के पार सुनसान सडक पर दौडी चली जा रही एम्बेसेडर को वह तब तक देखती रही जब तक कि बिन्दु की शक्ल में चेंज होने के बाद आंखों की रेंज से -बाहर न निकल गई ।

हालांकि उसे विश्वास था कि हमलावर अभी गाडी में सवार थे और अब वे यहां नहीं हैं, परन्तु इतना साहस न जुटा सकी कि गाडी का दरवाजा खोलकर सडक पर आ जाती !

चूहे की मानिन्द सहमी किरन के दिमाग ने धीरे-घीरे काम करना शुरू किया-----जहन में यह विचार उभरा कि हमला करने वालों का आखिर उद्देश्य क्या था ?

केवल गाडी को क्षति पहुंचाकर क्यों भाग गये ?

अभी दिमाग ने ज़वाब नहीं उगला था कि पीछे से अाई 'ग्रे' कलर की एक फियेट 'सर्र.........'र्र.......से गुज़र गई ।

किरन उसके पिछले हिस्से को देख ही रही थी कि करीब दो सो गज आगे जाने के बाद ब्रेकों की चरपराहट के साथ फियेट रुकी

किरन का दिल पुन: जोर जोर से धड़कने लगा ।

हालांकि उसने नोट कर लिया था कि फियेट में केवल एक व्यक्ति था और वह भी जो ड्राइव कर रहा था किन्तु फियेट के बैक गेयर में पड़कर वापस सरकते ही उसके होश फाख्ता हो गए ।

चेहरा पीला पड़ चुका था ।

फियेट उसकी गाडी के ठीक बगल में रुकी, ड्राइविंग सीट पर मौजूद युवक ने ऊचीं आवाज में पूछा-----" क्या मैं आपकी मदद कर सकता हुं ?"

" हहह हां ।" हलक सूखा होने के कारण बडी मुश्किल से कह सकी किरन ।

युवक ने पूछा-----" आपकी गाड़ी को यह क्या हो गया है ?"

" म-मुझ पर कुछ बदमाशों ने गोलियां चलाई थी ।"

"गोलियां ?" युवक हकला गया, अातंक के भाव उसके चेहरे पर भी उभर आये !

किरन यह सोचकर घबरा गई कि कहीं एकमात्र मददगार स्वयं डरकर न भाग जाये, अत: तेजी से बोली----" अब वे भाग गये है, काले रंग की एम्बेसेडर में थे वे” ।

युवक के चेहरे की रौनक लौटी पूछा…"आपसे क्या चाहते थे ?"

"प-पता नहीं ।"

"मेरी गाडी चलने लायक नहीं है, क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकते हैं ?"

"आँफकोर्स ?" युवक ने आकर्षक मुस्कान के साथ कहा ।

किरन ने फुर्ती से डैशबोर्ड के टॉप पर पड़ा अपना पर्स उठाया, मारुति का दरवाजा खोला और फियेट में युवक की बाल में बैठती हुई बोली -----"थेंक्यू।" .

"कहां चलना है ?"

"मुझे किसी पब्लिक टेलीफोन बूथ में छोड दीजिए ।"

युवक ने जवाब मुह से नहीं दिया मगर आंखों में ऐसे भाव अवश्य उत्पन्न किये जैसे उसे अपने प्रभाव में लेना चाहता हो ----जाने क्यों, उस क्षण किरन को लगा कि इस युवक को उसने कहीं देखा है !

कहां देखा है ?

अभी जवाब नहीं सूझा था कि गाडी अागे बढाते हुऐ युवक ने पूछा---" हृमलाबर कौन थे ? "

"मैं देख नहीं पाई ।"

“अनुमान तो होगा कुछ, किसी से आपकी दुश्मनी होगी ?"

"द-दुश्मनी ?" किरन के मस्तिष्क में विस्फोट-सा हुआ-----पलक झपकते ही दिमाग में वह विचार कौंधा कि जो होलनाक घटना घटी है जिसकी वजह इसके अलावा कुछ और नहीं हो सकती कि उसने संगीता मर्डर कैस की रिं-इन्वेस्टीगेशन के लिए कदम बढा दिये हैं ।

युवक ने तन्द्रा भंग की ----"आपने जवाब नहीं दिया, किसी से दुश्मनी है आपकी हैं''

"नहीं ।” किरन ने युवक को संक्षिप्त जवाब देकर टरका दिया, परन्तु स्वयं उसका मस्तिष्क यही तेजी से काम कर रहा था----हमले के बारे में जितना सोचती गई उतना ही विश्वास होता गया कि कारण संगीता मर्डर कैस की रि--इन्वेटीगेशन का उसका फैसला है ।

 


हमलावरों ने सिर्फ उसकी गाडी को क्षति पहुंचाई । वे केवल उसे आतंकित करना चाहते थे ।

क्यों ?

क्या वे यह कहना चाहते है कि अगर मैंने इस केस की रि'-इन्वेस्टीगेशन की तो अंजाम खतरनाक होगा ?

हां…यही वजह है ।

इसके अलावा दूसरी कोई वजह हो ही नहीं सकती ।

बात किरन को जम गई ।

और इस बात के जमते ही उसके दिलो--दिमाग पर छाया सारा भय, सारा आतंक, सारा खौफ़ यूं काफूर हो गया जैसे आग में गिरते ही कपूर काफूर हो जाता है------सफलता से लबालब मुस्कराहट पहले से गुलाबी होंठों का श्रृंगार बन गई,,,, आंखें 'विजयी' अंदाज से 'देदीप्यमान' हो उठी----उसकी इस अवस्था को देखकर युवक चकरा गया ।

चकराने की बात भी थी ।

. जिस युवती को क्षण-भर पूर्व शेर से डरी हिरनी की सी हालत में देखा था उसी को इस वक्त चालाक लोमडी की भाति मुस्कराते देख रहा था, बोला----" जाने आप क्या सोच रहीं हैं ?"

“क-कुछ नहीं ।" किरन ने उसे टालना चाहा ।

"कुछ देर पहले आप बुरी तरह डरी हुई थी । मगर अब ! "

" व-वो सामने पब्लिक टेलीफोन बूथ है, मुझे यहीं उतार दीजिए ।"' किरन ने उसकी बात काट दी ।

"मेरे ख्याल में आपको पुलिस स्टेशन जाना चाहिए ।"

"क्यों ?"

“जो हुआ है, उसकी 'रपट' लिखवाने ।"

"नहीं, रपट की जरूरत नहीं है-मुझें उतार दो ।"

युवक ने कंधे उचकाने के साथ ब्रेक लगाये----गाडी बूथ के नजदीक रुकी और किरन गजब की तेजी के साथ दरवाजा खोलकर बाहर निकलती हुई बोली ----" थैक्यू फॉर लिफ्ट !"

" इंसपेक्टर अक्षय हियर !" दूसरी तरफ से कहा गया !

“बैरिस्टर विश्वनाथ की बेटी बोल रही हूं इंस्पेक्टर, अम्बेडकर रोड़ पर मुझ पर हमला हुआ है ।"

"कैसा हमला?"

"मेरी गाड़ी पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गई ।" किरन कहती चली गई----" पहले उसके टायर "ब्रस्ट' किये फिर शीशों को चकनाचूर किया गया और इसके बाद बिना नम्बर प्लेट वाली काले रंग की एक एम्बेसेडर में हमलावर फरार हो गये ।"

" क-क्या कह रहीं हैं अाप ?"

"मेरी रपट दर्ज कर लीजिए-क्षतिग्रस्त गाडी वहीं खडी है-जैसे चाहें, जांच करने के बाद मारुति को वर्कशाप में पहुंचवा दीजिए ।"

“आप कहां से बोल रही हैं ?"

"सुभाष मार्ग स्थित बूथ से ।"

"में अम्बेडकर मार्ग पर गाडी के नजदीक पहुंच रहा हूं आप भी वहीं--

" नहीं, मैं वहां नहीं पहुंच रही हूं इंस्पेक्टर------मुझे इस वक्त कहीं और पहुंचना है ।"

“कहां ? "

"जहां मुझे संगीता का हत्यारा नहीं पहुचने देना चाहता ।" रहस्यमय स्वर में कहने के साथ उसने सम्बन्थ विच्छेद कर दिया ।

"ओह, किरन बेटी !" शहजाद राय की अावाज उभरी----"कैसे फोन किया ?"

"मैं आपसे "संगीता मर्डर कैस' के सिलसिले में बात करना चाहती हूं अंकल ।"

" संगीता मर्डर केस ?" ये शब्द शहजाद राय के मुंह से ऐसे अन्दाज में निकले जेसे वह उस सिलसिले को याद न करना चाहते हों, कुछ देर चुप्पी के बाद बोले----" उस बारे में बात करने के लिए अब बचा ही क्या है ?"

"जब क्रोईं "क्लाइन्ट' अपना केस लेकर बचाव पक्ष के वकील के पास जाता है तो वकील क्लाइन्ट से सबसे पहला यह सवाल यह पूछता है कि 'जो अभियोग तुम पर लगाया गया है वह सच्चा है या झूठा----क्या यह सवाल आपने शेखर मल्होत्रा से किया था ?"

"अनेक बार ।"

"क्या जवाब दिया उसने ?"

"यही तो मुसीबत रही…हंमने उससे हर तरह से पूछा, एक बार नहीं बल्कि अनेक बार यह कहा कि अगर तुमने कुछ किया है तो साफ़-साफ़ बता दो----" वताने से तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा नहीं बल्कि फायदा ही होगा, क्योंकि तब हम ज्यादा सशक्त ढंग में कोर्ट से तुम्हारा बचाव कर सकेगे--वह पटृठा था कि लगातार झूठ रहा, आज तक झूठ बोल रहा है ।"

“झूठ बोल रहा है ?”

“यह झूठ नहीं तो और क्या है कि उसने संगीता की हत्या नहीं की ?"

" अाप ? " "किरन चकित रह गई-----“आप उसके वकील होने के बाबजूद ऐसा कह रहे है है"'

"कोर्ट में जो कुछ भी कहें मगर कोर्ट के बाहर हम वही कहते हैं जो लग रहा होता है और फिर इस मामले में तो शायद इतना भी दम नहीं रहा कि कोर्ट में हमारे कहने से कुछ हो सके ।”

"आप तो जरूरत से ज्यादा निराश हैं अंकल ! " किरन बोली…“अब मेरी समझ में इतना सब आ रहा है कि आप शेखर मल्होत्रा क्रो बेगुनाह साबित क्यों नहीं कर सके हैं"'

"क्या कहना चाहती हो ?"

' "जो वकील अपने ही दिल में अपने क्लाइन्ट को भी गुनेहगार मानता हो वह उसे कोर्ट में बेगुनाह साबित कैसे कर सकता है ?” कहने के साथ उसने रिसीवर हैंगर पर लटका दिया ।

" सिगार मुंह में दबाये कीमती कपडे़ पहने और लान में खडे अधेड़ आदमी ने पूछा---"'किससे मिलना है तुम्हें ?"

"शेखर मल्होत्रा से ।"

"श-शेखर ?""' यह लपज उसके मुंह से . कुछ यूं निकला जैसे भद्दी गाली निकली हो और फिर लगभग गुर्राता-सा बोला ----“कौन हो तुम ?"

""मेरा नाम किरन अग्निहोत्री है ।"

 


. अधेड के चेहरे पर मौजूद भाव साफ-साफ बता रहे थे कि वह शेखर मल्होत्रा से ही नहीं बल्कि उससे मिलने अाने वालों से भी नफरत करता है, ऊंची आवाज में बोला---“अरे बुन्दू है ?"

"जी मालिक ?" फूलों की पानी देता बलिष्ठ नौकर आकर्षित हुआ ।"

"ये लड़की शेखर से मिलना चाहती है, उसके कमरे में ले जाओ ।"

"जीं ।" उसने वहीं से चीखकर कहा और फिर किरन को कुछ ऐसी नजरों से देखता हुआ इस तरफ अाने लगा जैसे वह चिडि़याघर से निकल भागी हिरनी हो ।

किरन ने अधेड़ से पूछा-“क्या मैं आपका परिचय जान सकती हूँ ?"

"क्यो ?-"' उसने अक्खड़ स्वर में कहा----" हमारा परिचय जानकर क्या करोगी ?"

नजदीक आते वुन्दू पर एक नजर डालती हुई किरन बोली…"नौकर द्वारा, आपको 'मालिक' कहने से असमंजस में पड़ गई हूं क्योंकि जानती हू कि इस कोठी का मालिक शेखर मल्होत्रा है 1”

किरन के इन शब्दों ने अधेड़ को तिलमिलाकर रख दिया--मारे गुस्से से चेहरा भभक उठा, गुर्राया ---" बुन्दु , इस बेवकूफ़ लड़की को बताओ कि कोठी का मालिक कौन है ?"

"य-ये बड़े शाब के भाई हैं मेमसाब ।"' बुन्दू ने किरन से कहा ।

“कौन बड़े साहब ?"

"सेठ गुलाब चन्द जी, संगीता मेमसाब के पिता ।"

"ओह !" बात किरन की समझ में आ गई----" तो ये ' संगीता के चाचा हैं ?"

हां ।" सिगार मुंह में दबाये अधेड ने अागे बढ़त्ते हुए कहा-----''" अनजाने में जो भूल की सो की, मगर भविष्य में कभी उस हत्यारे को इस कोठी का मालिक कहने की 'जुर्रत' मत करना ।"

' “क्यों ?"

क्योंकि उसने इस जायदाद का मालिक बनने के फेर में पहले हमारे बड़् भाई को ऐसे ढंग से मरवा दिया कि जिसे पुलिस 'हत्या' ही नहीं समझती----" फिर उस हरामजादे ने हमारी बेटी संगीता की हत्या कर दी मगर पाप की हांडी रोज नहीं चढ़ती-इस वार फूट गई-यह जायदाद भला उस कमीने की कैसे हो सकती है जिसने इसे हथियाने के लिए दो दो हत्याएं कर दी , अंधेर है क्या ?"

"आपने किस अधिकार से जायदाद का चार्ज सम्भाल लिया है?"\\

"अधिकार--- तुम अधिकार की बात करती हो ?" अधेड भड़क उठा---" हमें कोर्ट ने सम्पूर्ण जायदाद और र्फवट्री का 'रिसीवर' नियुक्त किया है ।"

"र-रिसीवर ?”

"हुंह......तुम बेवकूफ लड़की भला क्या जानो कि रिसीवर किसे कहते है है"'

हौले से मुस्कूराईं किरन, बोली---" आप बता दीजिए !"

"जब कोई ऐसा शख्स किसी ऐसे व्यक्ति की हत्या के जुर्म में फंस जाता है जिसके बाद जिसकी सारी दौलत फंसने वाले की होनी हो तो कोर्ट वारिस नम्बर दो को मरने वाले की जायदाद का 'रिसीवर' नियुक्त कर देती है…रिसीवर को कानून यह अधिकार सौंपता है कि जब तक _ बारिस नम्बर एक पर मुकदमा चले तब तक जायदाद की देखभाल तुम्हें करनी है-----वारिस नम्बर एक अगर बेगुनाह साबित हो जाता है तो वारिस नम्बर दो यानि रिसीवर को सारा चार्ज उसे वापस सोंप देना होता है और अगर वह गुनाहगार साबित होता है तो वारिस नम्बर दो मालिक बन जाता है ।"

किरन अचानक अागे बढी और अधेड़ की आंखों में आंखें डालकर बोली-----"अाप तो यह सोचते होंगे कि शेखर मल्होत्रा ने संगीता की हत्या करके अच्छा ही किया ?”

" क---क्या मतलब ?" अधेड़ सकपका गया । किरन ने तपाक से कहा----"उसकी बेवकुफी के कारण आप करोडों की जायदाद के मालिक बन गये ।"

"क-क्या' ' ' 'क्या बका तुमने !" अधेड़ हलक फाड़कर चीख पड़ा-“त--तुम हमेँ जायदाद का लालची समझती हो?"

"अजी क्या हुआ........ 'इतनी जोर'-जोर से क्यों चीख रहे है आप ?" कहती हुई एक अधेड़ महिला ड्राइंगरूम से निकलकर लॉन में आ गई ।

यह अकेली नहीं थी ।

एक जवान लडकी और दो युवा लडके भी लॉन में आ गये थे ।

किरन उन सबको ध्यान से देख ही रही थी कि शक्ल से गुन्डा और लफंगा--सा नजर आने वाला लड़का अधेड़ के नजदीक पहुंचता हुआ बोला----'"क्या हुआ पापा, अाप इतने गुस्से में क्यों हैं ?"

जरा इस लड़की की बात सुनो ।" अधेड़ किरन की तरफ हाथ नचाकर बोला---"कहती है हम बड़े भाई और संगीता बेटी की मौत पर वहुत खुश होंगे, यह जायदाद जो मिल गई है हमें ।"

लड़के ने सुर्ख आंखों से किरन को घूरा ।

अधेड़ स्त्री ने पुछा ---" कौन है ये ?"

"पता नहीं कौन है, हत्यारे से मिलने आई है ।"

सबकी नजरें किरन पर स्थिर थीं ।

किरन यह सोच-सोच-कर मुस्करा रही थी कि उसके शब्दों का प्रभाव ठीक बैसा ही हुआ जैसा वह चाहती थी----"दरअसल वह यह जानना चाहती थी कि शेखर मल्होत्रा के बाद वारिस किस मन: स्थिति में है ?"

अभी यह मुस्करा ही रही थी कि बड़ा लड़का बांहें चढाता हुआ उसकी तरफ़ बढा और नजदीक पहुंचकर गुर्राया-“कौन है तू?"

"तमीज से बात करो मिस्टरा" किरन गुर्राई !

 


"त--तु मुझे तमीज सिखाएगी ?" कहने साथ उसने हाथ हवा में उठाया ही था कि-----

अधेड़ झपटकर उसे पकड़ता हुआ चीखा--" क्या बेवकूफी है कमल, छोटे लोगों के मुंह नहीं लगते !"

"कमल ने कुछ कहने के लिए मुहं खोला ही था कि---" अरे आप…आप यहाँ किरन जी ?"

किरन सहित सभी ने आवाज की दिशा में देखा !

साइड गैलरी से निकलकर सफेद कुर्ता और पायजामा पहने शेखर मल्होत्रा अभी-अभी वहां पहुंचा था-उसके पहुचते ही अधेड, उसकी पत्नी, बेटी पर ही नहीं बुन्दू तक पर सन्नाटा छा गया ।

" हां शेखर ।" किरन ने संयत स्वर में क्ला-“मैं यहाँ ।"

"अअ-आप यहां किसलिए अाई है ?"

"तुमसे मिलने ।"

"म-मुझसे मिलने है"' शेखर उछल पड़ा-"क-क्यों ?"

किरन ने पूछा-"क्या हम कहीं अराम से बैठकर बाते नहीं कर सकते ?‘"

"क-क्यों नहीं--म-मगर.............'मुझसे क्या बातें करना चाहती हैं आप ?"

किरन ने एक नजर कमल, अधेड़ और उसके पूरे परिवार पर डाली तथा शेखर से बोली--" तुम्हें बेगुनाह साबित करने निकली हुं ।"

" ब-बेगुनाह-म---मैं समझा नहीं ।" शेखर बुरी तरह बौखला गया ।

"मेरी बात जल्दी ही तुम्हारी समझ में अा जायेगी और इनकी समझ में भी ।" कहने के साथ उसने 'खुखार नजरों से कमल की तरफ़ देखा-कमल-अभी तक खा जाने वाली नजरों से घूर रहा था ।

 


कौठी के भीतर कमरे में अधेड़ , उसकी पत्नी, दौनों बेटे और बेटी आपस में सिऱ जोड़े फुसफुसाते के से अन्दाज में बातें कर रहे थे ।

उनके बीच एक छोटी सीं सेन्टर टेबल थी ।

अधेड की पत्नी ने अभी-अभी कहा था…"मुझे तो उस लड़की की इस बात से डर लग रहा है कि वह उस मुए को बेगुनाह साबित करने निकली है---' उसने-उसे सचमुच बेगुनाह साबित कर दिया तो हमारा क्या होगा ?"

"बरबाद हो जायेगे हम ।" बड़ा लड़का अर्थात् कमल कह उठा ।"

छोटे ने पूछा----"कैसे ?"

"कैसे ?"---कमल भड़क उठा-"पूछ्ता है कैसे-----तेरे भेजे में भूसा भरा है क्या----हम अपनी अमीनाबाद वाली दुकान बेच चुके हैं---अगर दौलत हाथ से निकल गई तो खायेंगे क्या ?"

"उस दुकान से हमें मिलता--ही क्या था?"

"कुछ न सही…मगर पेटे भर रोटी तो दे ही रही थी दुकान ।" कमल कहता चला गया-कुछ भी हो अब हम इस जायदाद और फेवट्री को किसी भी कीमत पर नहीं गंवा सकते ।"

"फैसले की तारीख में अब केवल तीन दिन रह गए है और ये लगभग स्पष्ट है कि अदालत का फैसला क्या होने जा रहा है ---- दुनिया की कोई ताकत उसे सजा से नहीं बचा सकती ।" अधेड़ ने कहा ।

"लेक्ति अगर उससे पहले इस लड़की ने उसे बेगुनाह साबित कर दिया है?" अधेड स्त्री ने पुन: शंका व्यक्त की ।

"ऐसा नहीं होगा, एड़ी--चोटी का जोर लगाने के बावजूद वह ऐसा नहीं क़र सकेगी ।"

कमल बोला----" और अगर मुझे लगा कि वह ऐसा कर सकती है तो तुम सब यकीन रखो मैं ऐसी स्थिति कर दूगा कि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी ।"

"यानि ?"

"शेखर का काम तमाम कर दूंगा मैं !"

" तुम ऐसी बेवकूफी हरगिज नहीं करोगे ।" गुर्राकर अधेड ने सख्त स्वर में कहा---""जरा-सी चूक होते ही सारे किए-धरे पर पानी फिर सकता है, हम बरबाद हो जायेगे ।"

कुछ कहने के लिए कमल ने मुंह खोता ही था कि मां पर नजर पड़ते ही ठिठक गया…होठों पर अंगुली रखे बड़े रहस्यमय अन्दाज में वह सबको चुप रहने का इशारा कर रही थी ।

कमल का मुंह खुला रह गया ।

सबकी नजरें अधेड़ स्त्री के चेहरे पर स्थिर थी , दिल जोर-जोर से धड़कने लगे थे ।

कमरे में संनाटा छा गया ।

. डायमंड की धार'-सा पैना सन्नाटा ।

"अधेड ने उसके कान पर झुककर पूछा…"क्या बात है सुमित्रा?"

"उ उधर देखिये, उधर ।” सुमित्रा ने अंगुली से कमरे के बन्द दरवाजे की तरफ इशारा किया ।

अधेड़ सहित सबकी नजरें दरवाजे की तरफ उठ गई और'वहां नजर पड़ते ही सबके दिल धक्क से रह गये-----" चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगी, सबकी हालत सुमित्रा जैसी हो गई थी ।

बंद किवाडों और फर्श के बीच बनी बारीक झिर्री से एक जोड़ी पैरों का थेड़ा सा हिस्सा अस्पष्ट नजर आ रहा था…समझते देर न लगी कि वहाँ खड़ा कोई शख्स बाते सुनने का प्रयत्न कर रहा है ।

आतंक की ज्यादती के कारण छोटा लड़का चीख पड़ा…

" कौन कौन है दरवाजे पर?"

और बस !

खेल बिगड गया ।

पैर तेजी के साथ हटे और गेलरी में भागते कदमों की आवाज गूंजी । "

सबसे पाले उछलकर कमल खडा हुआ-दौड़कर दरवाजे तक पहुंचा, चटकनी गिराकर जब उसने दरवाजा खोला तो कोई पांच मीटर लम्बी गेलरी....सन्नाटे में डूबी हुई थी ।

एक साया कोठरी के अन्तिम मोड़ पर गुम होते जरूर देखा था उसने ।

अभी कमल वहीं खड़ा था और जिस्म में एक अजीब-सी सनसनी का अहसास कर रहा था कि थर्राते से उसके मम्मी, पापा, भाई-बहन नजदीक अाये, अधेड़ ने पूछा---"कौन था कमल ?"

"पता नहीं ।" कमल अपने छोटे भाई पर चढ दौडा…“इसकी बेवकूफी से भाग गया ।"

"अ--अाप .......आप कहीं मजाक तो नहीं कर रही हैं किरन जी ?"

किरन ने गम्भीर स्वर में कहा--"' मैं इतनी दूर से चलकर तुमसे मजाक करने अाई हूं?"'

"म......मगर.......मगर मेरे लिए यह बात दुनिया के नौवें आश्चर्य जैसी है कि किसी ने मुझे मेरे कहने---सिर्फ कहने के आधार पर बेगुनाह मान लिया---कोई तर्क, सबूत पेश नहीं किया है मैंने ।"

“अगर ऐसा है तो यूं समझो कि दुनिया का नोवां आश्चर्य हो चुका है ।"

 
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